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अनुराग अनंत की ग्यारह कविताएँ

आज युवा कवि अनंत अनुराग की कविताएँ पढ़िए। ताज़गी का अहसास होगा-
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!! लगभग सिर्फ़ एक शब्द नहीं है !!
 
(1)
 
एक बरसात से दूसरी बरसात तक जाते हुए
बीच में मिलती है सर्दी और गर्मी
बहुत से लोग, उनकी प्यास
उदास कुत्ते और उनकी भूख
बेहाल परिंदे और उनके क्षतिग्रस्त पंख
एक नदी और उसकी अनंत व्यथाएं
एक कहानी और उसके हज़ार संभावित अंत
मेरी माँ की टूटी ऐनक
उस ऐनक से छिटक कर गिरा एक नवजात दृश्य
भाषा की मांद में सोती एक खूँखार असमर्थता
और एक निरीह कर्तव्यबोध
एक कविता
और बहुत कुछ अपरिभाषित-अपरिचित
अपने आपको छू लेता हूँ रह रह कर
यह जाँचने के लिए कि
चलते हुए तो लगभग जीवित था
पहुँचते हुए लगभग मर तो नहीं गया ?
 
(2)
खेलने की उम्र में खाने लगा था मैं
 
मार खाने और गाली खाने के बीच के अंतर को
मैंने अपनी भूख के ठीक बगल रखा
और तराजू बराबर हो गया
 
मैंने धोखा खाया
और फिर बहुत दिनों तक कुछ खाने को जी नहीं किया
पेट पीठ से सट गया
उदासी नदी के किनारे बैठी रही
मेरे भीतर के न जाने कितने राम
छपाक-छपाक कर कूद गए नदी में
किसी थाने में कोई केस दर्ज़ नहीं हुआ
किसी अदालत में कोई मुक़दमा नहीं चला
न जाने कितनी मौतें न्याय की राह देखती रहती हैं
अभागी प्रेमिकाओं की तरह, सूनी माँग लिए
 
मैंने मुँह की खाई तो पता चला प्रतियोगिता अन्याय का अखाड़ा है
प्रत्येक प्रतियोगिता से ठीक पहले एक प्रतिस्पर्धा होती है
नियम बनाने के अधिकार पर कब्ज़े की प्ररिस्पर्धा
और इसी प्रतिस्पर्धा का परिणाम लगभग तय कर देता है प्रतियोगिता का भविष्य
उसका परिणाम
 
हार जाने से कहीं ज़्यादा दुःखद होता है
लगभग हार जाना
हार के तय होने से ज़्यादा आतंकित करता है
हार का लगभग तय होना
 
(3)
 
मेरी नींद ने कभी मेरा साथ नहीं दिया
स्वप्न सदैव विश्वासघात करते रहे
जब लगभग स्पर्श करने वाला होता हूँ स्वप्निल दृश्य
नींद टूट जाती है
 
नींद का टूटना सिर्फ़ नींद का टूटना नहीं होता
नींद का टूटना एक स्वप्न का टूटना भी है
 
मेरी नींद और मेरे स्वप्न के टूट जाने का दुःख मुझे कभी नहीं रहा
मुझे बस इतना ही दुःख है कि
लगभग स्पर्श, स्पर्श में नहीं बदल सका कभी
 
लगभग स्पर्श न कर पाने का दुःख
स्पर्श न कर पाने के दुःख से कहीं बड़ा होता है
 
(4)
 
नदी की तरफ लौटते
और नदी की तरफ से लौटते
मनुष्य में क्या अंतर होता है ?
 
कुछ नहीं बस यही कि
नदी की तरफ लौटता मनुष्य लगभग बंजर होता है
और नदी की तरफ से लौटता मनुष्य लगभग नदी
 
ध्यान रहे
लगभग बंजर होना बंजर होना नहीं
लगभग नदी होना नदी होना भी नहीं
जो लगभग बंजर है वह लगभग नदी भी हो सकता है
जो लगभग नदी है वह लगभग बंजर भी हो सकता है
 
पूरी तरह नदी या पूरी तरह बंजर
कोई नहीं होता
 
(5)
 
!! ‘जीवित रहना’ बनाम ‘लगभग जीवित रहना’ !!
 
आत्मा सिर्फ़ एक शब्द भर बची है
अब उसके आँगन में नहीं लगती कोई अदालत
जीवित हैं जो वे जीवित रहने का अभिनय कर रहे हैं
विद्रोहियों को भी समर्पण का संक्रमण लग चुका है
आईने से सामने जाने से अब कोई नहीं डरता
आईने खरीदे जा चुके हैं
अब वे न्यायाधीशों की तरह सुंदरता के वकील बन गए हैं
कुरूपता को अब कुरूपता नहीं कहता कोई
कुरूपता के लिए ‘लगभग सुंदर’ शब्द गढ़ लिया गया है
देश में लोकतंत्र लगभग लोकतंत्र में बदल चुका है
हम स्वतंत्र नहीं बल्कि लगभग स्वतंत्र हैं
 
मर जाने से बेहतर नहीं होता लगभग मर जाना
‘जीवित रहने’ का विकल्प ‘लगभग जीवित रहना’ कभी नहीं हो सकता
 
(6)
 
!! लगभग जान देना, जान देने से बड़ा होता है !!
 
जरूरी नहीं कि तुम बोलो और कोई सुन ही ले
जरूरी तो यह भी नहीं कि सुन कर कुछ कर ही दे
इसलिए आवाज़ निकालने की व्यर्थता
को सहलाते हुए मौन रहने का विकल्प
चुन लेते हैं जीवन और दुनिया देख चुके लोग
 
सब लोगों की दुनिया एक बराबर नहीं
किसी की दुनिया में सिर्फ चार लोग हैं
तो किसी की दुनिया में वह अकेला
और किसी किसी की दुनिया में
वह स्वयं भी नहीं है, जिसकी वह दुनिया है
वहां मात्र स्मृति और अबूझे विचार हैं
उस पान वाले के उदास चेहरे की तरह
जो मेरा नाम नहीं जानता पर मुझे जानता है
उसे मालूम होता है कि जब मैं उसकी दुकान के सामने खड़ा होता हूँ
तो तुम्हारे बारे में सोच रहा होता हूँ
उसे मालूम है मंगल ग्रह सिर्फ अंतरिक्ष में ही नहीं है
बल्कि तुम्हारी गली के चौथे मकान में भी है
उसे मालूम है ‘यथार्थ’ और ‘लगभग यथार्थ’ के बीच कितना फ़ासला है
और यह भी कि मैं एक दिन
इसी फासले के बीच
गिर कर लगभग ख़त्म हो जाऊँगा
वह व्यक्ति कवि नहीं है
पर यह जरूर जानता है कि लगभग गायब हो चुके
लोगों को बचा लिया जाना चाहिए
 
यदि बचाना चाहते हैं हम
यह दुनिया और इसके रंग
 
वह मुझसे कहता है
कि यदि जरूरत पड़ेगी तो
वह मुझे बचाने के लिए
लगभग अपनी जान दे सकता है
उसके बीबी बच्चे हैं
इसलिए जान देना का विकल्प उसके पास नहीं है
 
‘जान देना’ छोटी बात है
और ‘लगभग जान देना’ उससे बड़ी
एक छोटी बात के सामने उससे बड़ी बात खड़ी हो
तो जीवन ‘लगभग जीवन’ होने से बच जाता है
 
(7)
 
मेरे स्वप्न में मछलियों के पंख हैं
चिड़िया जल में तैर सकती है
मैं दौड़ते हुए निकल जाता हूँ क्षितिज के पार
उंगलियों में नचाता रहता हूँ पृथ्वी
मेरे दाँत पर चमकता रहता है आसमान
आँखें स्वप्न में मनुष्यों में बदल जाती हैं
तुम्हारी आँख मेरे स्वप्न में हरे रिबन वाली बच्ची है
और मेरी आँखें खिलौने के लिए ज़िद्द करता बच्चा
हमारी इच्छाएँ एक गिद्ध की तरह खुजलाती है पंख
और हम एक ही समय में हंसते-रोते बरामद होते हैं
अपने अपने एकांत में
 
कोई भी असंभव पूरी तरह असंभव नहीं होता
प्रत्येक असंभव लगभग असंभव होता है
स्वप्न असंभव और लगभग असंभव के पार कहीं
संभावना में निवास करते हैं
सारे असंभवों और लगभग असंभवों पर विजय पाते हुए
 
(8)
 
!! ‘लगभग मनुष्यों’ की पशुता !!
 
अधिकतर कवि लगभग कवि थे
अधिकतर कविता लगभग कविता
अधिकतर मनुष्य लगभग मनुष्य भी नहीं हो सके
पशुयों के साथ ऐसा नहीं रहा
वे अपनी पशुता में भरपूर थे
इसीलिए उनमें बची रही जरूरी मनुष्यता
 
किसी शेर ने किसी हिरण का शिकार करने के लिए दोस्ती नहीं की
एक रोटी के लिए सौ बार पूँछ हिलाते रहे कुत्ते
पशुओं ने संभोग के लिए प्रेम का बहाना नहीं बनाया
कभी किसी को नीचा नहीं दिखाया
किसी का अपमान नहीं किया
पशुओं के यहां विश्वास सुरक्षित रहा
और मनुष्यों के यहां क्षतिग्रत
 
पशु लगभग मनुष्यों से ज़्यादा मनुष्य रहे
मनुष्य न पशु हो सका न मनुष्य
लगभग लगभग वह सब कुछ था
सिवाय मनुष्य होने के
 
(9)
 
!! ‘लगभग देवताओं’ की त्रासदी !!
 
दुःखों के देवता के पाँव में लगा तीर
और वह जीवन के बीचोंबीच बैठ गया
प्रेम के देवता के हृदय पर बैठा गिद्ध
रह रह कर कुतरता रहा प्रिय का नाम
मैं किसी का प्रिय होने से डरता हूँ
यही गिद्ध डराता है मुझे
 
प्रेम की मार इस दुनिया में सबसे ख़तरनाक मार है
प्रेम का स्पर्श सबसे बड़ी औषध
दुःखों का देवता सब जगह विद्यमान है
हर जगह सबंध खोजने वाले खोजी स्वानों
यदि बता सकते हो तो बताओ
प्रेम के देवता और दुःख के देवता में संबंध
 
प्रेम करने वाले लगभग देवता हो जाते हैं
लगभग देवताओं को ही झेलनी पड़ती है
देवताओं के हिस्से की पीड़ा
उनका संत्रास
उनका एकांत
लगभग देवताओं का भविष्य देवताओं का भविष्य नहीं होता
वे अपने अतीत से आहत वर्तमान में झेलते रहते हैं
देवत्व की त्रासदी
 
(10)
एक लगभग की पीड़ा दूसरा लगभग ही समझ सकता है
 
एक लगभग हारे हुए व्यक्ति को दूसरा लगभग हारा हुआ व्यक्ति जब देखता है तो
आईने में ‘लगभग हारने’ का प्रतिबिंब उभर आता है
 
एक लगभग टूटे हुए व्यक्ति को जब दूसरा लगभग टूटा हुआ व्यक्ति छूता है तो
‘लगभग टूटा हुआ’ ‘लगभग जुड़े हुए’ में बदल जाता है
 
एक लगभग प्यासा आदमी दूसरे लगभग प्यासे आदमी के लिए ‘लगभग नदी’ होता है
एक लगभग विस्तापित दूसरे लगभग विस्थापित में पाता है शरण
 
‘लगभग भुला दिए गए लोग’ ही याद रखते हैं ‘लगभग भुला दिए गए लोगो’ को
‘लगभग भटक चुके लोग’ ही गंतव्य तक पहुँचाते हैं ‘लगभग भटक चुके लोगो’ को
 
‘लगभग बेसहारा’ ही सहारा देता है दूसरे ‘लगभग बेसहारा’ को
‘लगभग उपेक्षितों’ से ही अपेक्षा है फिसलती हुई दुनिया को थाम लेंगे वे
 
(11)
 
वह प्रेमिका जो लगभग ब्याहता थी
किसी और से ब्याह दी गई
वह प्रेमी जो लगभग पति था
कुँआरा ही रहा आया
 
लगभग सिर्फ़ एक शब्द नहीं होता
हर लगभग की एक कहानी होती है
कहानी जिसके लिए एक शब्द काफ़ी नहीं
कहानी जिसके लिए कोई शब्द काफ़ी नहीं
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