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लोक संस्कृति के अद्भुत नायक देवेंद्र सत्यार्थी: प्रकाश मनु

आज यायावर लेखक देवेंद्र सत्यार्थी जी की जयंती है। लेखक प्रकाश मनु का उनके साथ लम्बा समय बीता। आज देवेंद्र सत्यार्थी पर प्रकाश मनु का लिखा यादगार लेख पढ़िए-

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किसी दरवेश सरीखे अपने ढंग के विलक्षण लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी के काम और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर कई दशकों पहले डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी ने टिप्पणी की थी, “सत्यार्थी जी आदि से अंत तक एक चिंतनशील और अग्रगामी संस्कृति-दूत के रूप में सदैव हमारी भाषाओं की रंगभूमि पर खड़े रहेंगे।”

ऐसे ही हिंदी के एक बड़े संस्कृति चिंतक वासुदेवशरण अग्रवाल ने उन्हें ‘जनपदीय भारत का सच्चा चक्रवर्ती’ कहा, “जिनके रथ का पहिया अपनी ऊँची ध्वजा से ग्रामवासिनी भारतमाता की वंदना करता हुआ सब जगह फिर आया है।” मैं समझता हूँ, इससे अच्छे अल्फाज सत्यार्थी जी के धूल-धूसरित पैरों के निरंतर” सफर की कहानी को नहीं दिए जा सकते।

रामनरेश त्रिपाठी, जिन्होंने स्वयं भी लोकगीतों के संग्रह में बड़ा काम किया है, 22 अप्रैल 1940 को प्रयाग से लिखे गए पत्र में बहुत आदर के साथ सत्यार्थी जी के काम के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। उन्होंने बड़े भावुक हृदय से लिखा, “ग्रामगीतों के संबंध में जिस मार्ग पर चलने की इच्छा मैं वर्षों से कर रहा था, उसे तो आपने नाप डाला।…आपके साहस को धन्य है। आपकी सच्ची लगन इतिहास की वस्तु हो गई है। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।”

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने युवावस्था में बैलगाड़ी पर बैठकर पूरे बंगाल की यात्रा करते हुए, बंगला पल्लीगीतों के संग्रह का सपना देखा था। पर वह अधूरा ही रह गया। शांतिनिकेतन में सत्यार्थी जी उनसे मिले, तो गुरुदेव ने उनमें अपना आत्मचित्र ही देखा। इसीलिए विभोर होकर उन्होंने सत्यार्थी जी की डायरी में लिखा—

दुनिया भर के खानाबदोशो,

मेरे शब्दों में छोड़ जाओ अपनी गंध!

उन्होंने सत्यार्थी जी से कहा, “जब तक आप शांतिनिकेतन में है, शाम की चाय आप मेरे साथ पी सकते हैं।”

सत्यार्थी जी के लिए यह सुख दुनिया के बड़े से बड़े खजाने से भी बढ़कर था। वे प्रतिदिन शाम को गुरुदेव के पास पहुँच जाते, तो उनके साथ साहित्य और कला की चर्चा का सुयोग मिलता। कई बार बड़े दुर्लभ अनुभव होते, जिनकी चर्चा सत्यार्थी जी ने गुरुदेव टैगोर पर लिखे संस्मरणों में बड़े रोचक ढंग से की है। टैगोर की बड़ी विलक्षण छवियाँ सत्यार्थी जी द्वारा उन पर लिखे गए संस्मरणों में उपस्थित हैं।

यों सत्यार्थी जी को न सिर्फ अपनी इन बीहड़ लोकयात्राओं पर गुरुदेव का आशीर्वाद मिला, बल्कि शांतिनिकेतन उनके लिए एक हाल्ट स्टेशन बन गया। अपनी लोकयात्राओं में कहीं भी आते-जाते उनके पाँव अनजाने ही उन्हें शांतिनिकेतन ले जाते, जहाँ का वातावरण उऩ्हें प्रेरणा देने के साथ-साथ उत्साह और आनंद से भऱ देता था। वहाँ से वे पुनर्नवा होकर लौटते।

शांतिनिकेतन में गुरुदेव टैगोर ही नहीं, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, मास्टर मोशाय नंदलाल बसु और रामकिंकर बैज से उनकी काफी निकटता हो गई। आचार्य द्विवेदी मन की मौज में की गई उनकी असाधारण लोकयात्राओं से बहुत प्रभावित थे और अकसर अपने पत्रों में इसका जिक्र करते थे। 18 जनवरी 1940 को शांतिनिकेतन से लिखे गए पत्र में आचार्य द्विवेदी ने एक अनूठा लोकगीत रचकर भेजा, जिसके नायक अद्भुत लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी हैं। भावनाओं से छलछलाता यह लोकगीत काफी लंबा है, जिसमें सत्यार्थी जी की लोकगीत इकट्ठे करने की लाजवाब धुन का बड़े निराले ढंग से वर्णन है। इस लोकगीत की शुरुआत कुछ इस तरह होती है—

कि सतार्थी भैया रे!

पवलों तोरी चिठिया, वजवलों रे वधौआ,

कि सतार्थी भैया रे!

तोरी डगरी अकेल कि सतार्थी भैया रे!

एक हम देख लों सगरगा विचवा रे,

एक सुरुज अकेल सरगवा विचवा रे!

दोसर हम देखलों सरगवा विचवा रे,

एक चँदवा अकेल सरगवा विचवा रे!

तीसरे हों देख लों सरगवा विचवा रे,

तोरी डगरी अकेल कि सतार्थी भैया रे!

कि सतार्थी भैया रे!

और अब स्वयं आचार्य द्विवेदी द्वारा किए गए इस लोकगीत के सुंदर भावानुवाद का आनंद लीजिए—

“अरे ओ सत्यार्थी भैया! पाई तेरी चिट्ठी, बजाया बधाव, अरे ओ सत्यार्थी भैया! तेरा चलने का रास्ता अकेले का रास्ता है, अरे ओ सत्यार्थी भैया!

एक मैंने देखा है, सरग (आकाश) के बीच एक सूर्य का रास्ता अकेले का रास्ता है, दूसरा मैंने देखा, सरग (आकाश) के बीच एक चाँद का रास्ता अकेले का रास्ता है। तीसरा मैंने देखा, दुनिया के बीच तेरा रास्ता अकेले का रास्ता है—अरे ओ सत्यार्थी भैया!”

यह लोकगीत काफी लंबा है, पर इस कदर भावनाओं से ओतप्रोत कि उसे पूरा का पूरा उद्धृत करने का लोभ सँवरण करना कठिन है। पर विस्तार भय से उसे छोड़ रहा हूँ। कृपालु मित्र उसे सत्यार्थी जी की पुस्तक ‘बाजत आवे ढोल’ में पढ़ सकते हैं, जिसके परिशिष्ट में उन्होंने अपने समय के दिग्गज साहित्यकारों और लोक साहित्य के मर्मज्ञों द्वारा लिखे गए चौबीस दुर्लभ पत्रों को सहेजा है, जिनसे सत्यार्थी जी के इस असाधारण लोक अभियान और उसके महत्त्व का पता चलता है।

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असल में सत्यार्थी जी ने जब तरुणाई के जोश में पूरे देश के लोकगीतों का संग्रह करने के लिए अपना पूरा जीवन अर्पित करने का निर्णय किया, तब शायद वे स्वयं भी नहीं जानते थे, उन्हें कैसे असंभव लगने वाले विरल अनुभवों से गुजरना पड़ेगा और उनके हाथों से एक ऐसा ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य संपन्न होगा, जिसकी न उन्होंने पहले कभी कल्पना की थी, और न किसी और ने।

लोकगीत-संग्रह की अपनी अनोखी और शानदार धुन के कारण उन्होंने बिना किसी संस्था या सरकारी मदद के, अकेले अपने बूते जो काम कर दिखाया, वह खुद में इतना बड़ा और कालजयी है कि सिर्फ उसी के कारण देवेंद्र सत्यार्थी आधुनिक भारत के एक बड़े ‘संस्कृति-दूत’ साबित होते हैं। महात्मा गाँधी ने सत्यार्थी जी के लोक साहित्य संबंधी इस काम का महत्त्व समझा था और बार-बार चिट्ठियों में वे लिखते हैं कि अलग-अलग प्रदेश और भाषा के लोकगीतों पर लिखे गए “तुम्हारे लेख मैं खूब रस ले-लेकर पढ़ता हूँ।”

यह ‘रस’ इसलिए भी है कि सत्यार्थी जी जब किसी भाषा के लोकगीतों पर लिखते हैं तो उनके शब्दों में उन लोकगीतों का-सा सरल आवेग खुद ही फूट पड़ता है और उस आवेग में किसानों, मजदूरों, स्त्रियों के सुख-दुख और इच्छाओं का संसार, गहरा-गहरा-सा पारिवारिक रस और हुमचती फसलों का संगीत बसा होता है।

सत्यार्थी जी लोकगीतों में समूची जनता का दुख-दर्द और धरती की आकुल पुकार सुनते हैं और उसी को अपने सीधे-सादे ममत्वभरे शब्दों में कह डालते हैं। इसीलिए उनके लोक साहित्य संबंधी लेखों में वह चीज आती है, जो महात्मा गाँधी को भी अपनी सारी राजनीतिक व्यस्तताओं के बावजूद रस ले-लेकर पढऩे के लिए तैयार करती है। शायद इसीलिए महात्मा गाँधी को सत्यार्थी जी का काम देश की आजादी की लड़ाई का एक जरूरी हिस्सा ही लगता था। वे बार-बार इस बात को जोर देकर कहते हैं कि सत्यार्थी जी निरंतर गाँव-गाँव भटककर, लोकगीतों के संग्रह के जरिए भारत की आत्मा की जो खोज कर रहे हैं, वही तो आजादी की लड़ाई की बुनियादी प्रेरणा है। हम भारत की जिस विशाल जनता के दुख-दर्द की बात करते हैं, उसकी समूची अभिव्यक्ति तो अलग-अलग भाषाओं के लोकगीतों में ही होती है।

इसीलिए सन् 1936 में कांग्रेस का फैजपुर अधिवेशन हुआ तो गाँधी जी ने काका कालेलकर को विशेष रूप से भेजकर, सत्यार्थी जी को इस महाधिवेशन में भाग लेने के लिए न्योता। वहाँ गाँधी जी और बहुत-से अन्य प्रतिनिधियों ने सत्यार्थी जी के काम की खुलकर प्रशंसा की। सत्यार्थी जी जब अंग्रेजी राज में हाहाकार करती जनता के दर्द पर यह लोकगीत सुनाते हैं, “रब्ब मोया, देवते भज्ज गए, राज फिरंगियाँ दा,” तो इस पर गाँधी जी की टिप्पणी गौरतलब है। वे मानो भावनाओं में बहते हुए रोमांचित होकर कहते हैं, “अगर तराजू के एक पलड़े पर मेरे और जवाहरलाल के सारे भाषण रख दिए जाएँ और दूसरे पर अकेला यह लोकगीत, तो लोकगीत वाला पलड़ा ही भारी रहेगा।”

आज यह सोचकर रोमांच होता है कि इस धुनी शख्स ने बीस बरस तक बिना रुके, बिना थके घूम-घूमकर भारत के कोने-कोने, गाँव-गाँव की यात्रा की है। और सभी भाषाओं के लगभग तीन लाख लोकगीत इकट्ठे किए। वह भी इस हालत में जबकि कहीं से कोई सहारा नहीं था। किसी संस्था का कोई अनुदान या फैलोशिप नहीं और कभी-कभी तो हालत यह होती थी कि जेब में चार पैसे तक नहीं। किसी ने किराए के पैसे जुटा दिए, तो आगे बढ़ गए। न कल के भोजन का ठिकाना, न ठहरने का। और यों अकेले एक व्यक्ति द्वारा लोकगीतों के क्षेत्र में इतना बड़ा काम न पहले कभी हुआ, न बाद में। देवेंद्र सत्यार्थी यहाँ अकेले हैं, अपनी मिसाल खुद।

रामनरेश त्रिपाठी, जिन्होंने स्वयं भी ग्रामगीतों के संग्रह का बड़ा काम किया है, अकसर अपने पत्रों में सत्यार्थी जी की इन दुष्कर लोकयात्राओं का बड़े सम्मान से जिक्र करते। यहीं एक बात गौर करने की है। रामनरेश त्रिपाठी जिसे ‘ग्रामगीत’ कहते हैं, सत्यार्थी उसके लिए शुरू से ‘लोकगीत’ शब्द का प्रयोग करते आए हैं। ‘ग्राम’ शब्द से उन्हें कुछ आपत्ति नहीं थी, बल्कि वह अच्छी तरह जानते थे कि ज्यादातर लोकगीत गाँव की पृष्ठभूमि से उपजे हैं। लेकिन ‘लोक’ की परिव्याप्ति ज्यादा है तथा एक ऐसी चेतना की उपज है जो मनुष्य और मनुष्य में फर्क नहीं करती, ग्रामीण और शहरी में भी नहीं। शायद इसीलिए सत्यार्थी जी को ‘लोकगीत’ शब्द अधिक मोहता रहा और आज ‘लोकगीत’ शब्द ही प्रचलन में है, ‘ग्रामगीत’ नहीं।

सचाई यह है कि ‘लोकगीत’ ही नहीं, ‘लोककथा’, ‘लोक साहित्य’, ‘लोककला’ और ‘लोकयान’ जैसे शब्दों के हिंदी में प्रचलन का बड़ा श्रेय सत्यार्थी जी को ही जाता है। यह दीगर बात है कि उन्होंने कभी गर्वपूर्वक यह दावा नहीं किया और न ऐसा करने की इच्छा या विचार उनके मन में आया। उन्होंने हमेशा विनम्रता से यही कहा कि मैं आखिर जनता से ली हुई चीज ही तो जनता को दे रहा हूँ। इसमें मेरा अपना क्या है!

यहाँ तक कि आजादी से पहले ऑल इंडिया रेडियो के निदेशक अहमद शाह बुखारी ‘पितरस’ ने सत्यार्थी जी से अपने इकट्ठे किए गए चुनिंदा लोकगीत ऑल इंडिया रेडियो को देने का आग्रह किया, जिन्हें उस समय के बेहतरीन गायकों के स्वर में प्रस्तुत किया जा सके। सत्यार्थी जी ने अलग-अलग भाषाओं के एक हजार एक चुनिंदा लोकगीत ऑल इंडिया रेडियो को दिए। लेकिन पारिश्रमिक की बात आई, तो सत्यार्थी जी ने तुरंत प्रतिवाद किया। बोले, “देखिए, इन्हें मैंने जगह-जगह घूमकर इकट्ठा अवश्य किया है, पर ये गाँव वालों की चीजें हैं। उन्हीं की पूँजी हैं। इन पर तो कॉपीराइट ‘भारतमाता’ का है!” और सचमुच उन लोकगीतों का पारिश्रमिक उन्होंने नहीं लिया।

इससे सत्यार्थी जी की निरभिमानता ही पता नहीं चलती, उनके अंत:करण का यह दृढ़ विश्वास भी सामने आता है कि लोक साहित्य पर सबसे पहला हक जनता का है, ‘धरतीपुत्रों’ का है। पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी, तथाकथित संस्कृति विशारद और प्रोफेसर इनकी बारीक-बारीकतर व्याख्याएँ भले ही कर लें, पर रहेंगी ये गाँव वालों की चीजें ही।

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सत्यार्थी जी के लोक साहित्य संबंधी अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जब वे लोकगीतों पर लेख लिखते हैं, तो उनकी भाषा में भारत की विशाल जनता का दुख-दर्द बहा चला आता है। जिस भाषा में भारत का गरीब मजदूर या किसान सोचता है, जो उसके रोने-गाने, उल्लास और सपनों की भाषा है, वही भाषा खुद-ब-खुद सत्यार्थी जी की कलम से उतरने लगती है। इसीलिए जब सत्यार्थी जी के ये लेख ‘मॉडर्न रिव्यू’ जैसी अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि की पत्रिका में छपने जाते थे, तो रामानंद चटर्जी का संपादकीय विभाग को यह आदेश भी साथ ही नत्थी होता था कि, “सत्यार्थी जी द्वारा किए गए लोकगीतों के अनुवाद का एक भी शब्द इधर से उधर न किया जाए और न उन्हें बदला जाए। इसलिए कि लोकगीतों के हृदय को सत्यार्थी जी और उनके लिखे अल्फाज ही सबसे बेहतर ढंग से खोल सकते हैं, कोई और नहीं।”

इसी तरह पश्तो लोकगीतों पर उनका जो लेख न्यूयार्क से निकलने वाली ‘एशिया’ पत्रिका में छपा, उसकी चतुर्दिक चर्चा थी। डॉ. श्यामाचरण दुबे सरीखे विद्वान और नृतत्वशास्त्री तो उनसे बेहद प्रभावित थे और बार-बार पत्र लिखकर उनके काम के महत्त्व को चीन्ह रहे थे। यहाँ तक कि वे अपनी पुस्तक ‘इंडियन विलेज’ की भूमिका सत्यार्थी जी से लिखवाना चाहते थे। उन्होंने काफी आग्रह किया, पर सत्यार्थी जी का विन्रमतापूर्वक इनकार। उनका कहना था कि मैं लोक साहित्य का एकेडेमिक विद्वान नहीं। लिहाजा यह कार्य किसी और से करवाएँ!

असल में सत्यार्थी जी की यह विनम्रता ही उन्हें बड़े कद का इनसान बनाती है। औरों की तरह कभी उन्हें अपने काम और योगदान को जताना नहीं आया। पर इसी कारण सत्यार्थी जी आज बहुत याद आते हैं और उनकी कृतियाँ कहीं अधिक शिद्दत से हमें अपने पास बुलाती हैं।

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प्रभाकर माचवे ने अपने एक लेख में सत्यार्थी जी के लोक साहित्य में योगदान को बड़ी कृतज्ञता से याद करते हुए लिखा है कि देवेंद्र सत्यार्थी के लोक साहित्य के काम ने देखते ही देखते कैसे एक आंदोलन का रूप ले लिया। ‘लेखक गाँवों में जाएँ’ की प्रेरणा से भारतीय भाषाओं के बहुतेरे लेखक लोक साहित्य के अध्ययन और संग्रह के लिए गाँवों की ओर निकल पड़े। गुजराती में झबेरचंद मेघाणी इस काम में जुटे थे तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में रामनरेश त्रिपाठी ने ऐतिहासिक महत्त्व का काम करके दिखाया। पर गौर से देखें तो सब पर सत्यार्थी जी के काम का प्रभाव और छाप साफ दिखाई देती है। इसलिए कि वे एक बार इस काम में जुटे तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और उनके पैर बरसों बरस धूलभरी पगडंडियों पर निरंतर चलते ही रहे।

यों देवेंद्र सत्यार्थी की लोकगीतों की तलाश ने उन्हें ‘इतिहास पुरुष’ भले ही बना दिया हो, पर जब वह सब कुछ छोड़कर लोक-यात्रा पर निकले तो ख्याति की बात गौण ही रही। बस, लोकगीत अच्छे लगते थे। बचपन से उनका रस-स्वाद चखा था, तो उन्हें इकट्ठा करने के लिए मन ललक उठा। अपने प्रथम लोकगीत-अध्ययन ‘धरती गाती है’ की भूमिका में वे अत्यंत विनत भाव से लिखते हैं—

“आज सोचता हूँ कि कैसे इस लघु जीवन के बीस बरस भारतीय लोकगीतों से अपनी झोली भरने में बिता दिए तो चकित रह जाता हूँ। कोई विशेष साधन तो था नहीं। सुविधाओं का तो कभी प्रश्न नहीं उठा था। फिर भी एक लगन अवश्य थी—एक धुन। आज सोचकर भी यह कहना कठिन है कि नए-नए स्थान देखने, नए-नए लोगों से मिलने की धुन अधिक थी या वस्तुत: लोकगीत-संग्रह करने की धुन। जो भी हो, मैंने निरंतर लंबी-लंबी यात्राएँ कीं। कई जनपदों में तो मैं दो-दो, तीन-तीन बार गया। इन्हीं यात्राओं में मैंने शिक्षा की कमी को भी पूरा किया।”

सत्यार्थी जी जिस सरलता और निरभिमानता से अपनी कमियाँ खोलकर बता देते हैं और अपने भीतर जरा भी कोई गाँठ नहीं रखते, उससे उनके व्यक्तित्व के ऐसे रहस्य का पता चलता है जिसने उन्हें इस हद तक लोकगीतों का दीवाना बनाया। यह था जीवन को हृदय की आँख से देखना और कविता को कर्म में उतारना। इसी चीज ने देवेंद्र सत्यार्थी को उनकी इस अनोखी धुन के साथ-साथ एक ऐसी भाषा दी कि गाँव के सीधे-सादे जन, मजदूर, किसान और स्त्रियाँ ही नहीं, उनके लोकगीत भी उनके आगे आकर नि:संकोच अपना हृदय खोलने लगे। और यों सत्यार्थी जी और लोकगीतों में कुछ ऐसी ‘बतकही’ चल पड़ती है, जिसे साध पाना विश्वविद्यालयों के बड़े-बड़े पंडितों और आचार्यों के बस की तो नहीं ही है।

प्रभाकर माचवे ने जब यह कहा कि “अकेले सत्यार्थी ने सैकड़ों साहित्य प्राध्यापकों से अधिक मूल्यवान काम किया है,” तो वे सत्यार्थी जी की इसी तरल संवदेना और आद्र्रता की ओर इशारा कर रहे थे, जिसने उन्हें वह भाषा दी है कि वे हर लोकगीत को उसकी अलग जमीनी और सांस्कृतिक पहचान को हमारी आँख के आगे ले आते हैं। जैसे इस ‘लोक यायावर’ के सामने वे लोकगीत ‘सदेह’ हो गए हैं। यहाँ सत्यार्थी जी की भाषा की लोच और कल्पना-शक्ति की जीवंतता देखते ही बनती है—

“चिर-परिचित शब्द। चिर-परिचित बातें। चिर-परिचित स्वर—यही लोकगीत की शक्ति है। कोई गीत पहाड़ी पगडंडी के समान ऊँचा-नीचा, कोई समतल प्रदेश के दूर तक फैले हुए क्षितिज की छवि लिए हुए। नीरव, उदास दोपहरी के गीतों का रंग और होता है, रात्रि के गीतों का और। प्रत्येक ऋतु, प्रत्येक उत्सव, कातने-बुनने के धंधे, जुताई-बुआई और निराई-कटाई की सामाजिक क्रियाएँ—सभी के साथ टाँके लगे हुए हैं। मकई की रोटी जैसा सूर्य उदय होता है, साँझ हो आती है, रात बीत जाती है और समय-चक्र के साथ लोकगीत के पहिए निरंतर चलते रहते हैं।”

देवेंद्र सत्यार्थी के लिए लोकगीत संग्रह का काम कोई थोपा हुआ कर्तव्य नहीं था। बचपन से वे उसके आकर्षण से बँध चुके थे। स्त्रियों और चरवाहों के बीच सुनने के लिए उनका मन ललकता था। धीरे-धीरे लोकगीतों की दुनिया में और अधिक रमे तो सत्यार्थी जी को समझ में आने लगा, यह तो सचमुच अपनी जड़ों की ओर लौटना है। भारत की सांस्कृतिक एकता की सूक्ष्म पहचान छिपा है इन लोकगीतों में। इन्हें समझे बगैर भारत और भारत की जनता को समझना नामुमकिन है।

खुद सत्यार्थी जी ने जो लोकगीत एकत्र किए, वे भी समग्रता में यही बात कहते हैं। बुंदेली लोकगीतों में आँखों में काजल डाले सिंदूर से माँग भरे, हरियाले वस्त्र पहनकर खड़ी धरती माँ का विश्वमोहिनी रूप है, तो गढ़वाली गीतों में अपने मलेथ गाँव के लिए कुछ ऐसा प्रेम उमड़ आता है कि शब्द-शब्द बोलने लगता है—

कैसा है ओ भंडारी, तेरा मलेथ?

देखने में भला लगता है साहबो, मेरा मलेथ…!

सत्यार्थी जी ने इतनी सहज भाषा में इस लोकगीत की काव्यानुवाद किया है कि कभी-कभी तो भ्रम होने लगता है कि कहीं यह कोई समकालीन कविता तो नहीं है।

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सत्यार्थी जी के भंडार में इतने रंग-रूपों के, सुंदर और प्रभावी लोकगीत समाए हुए हैं कि देखकर अचरज होता है। एक ओर उन्हें मल्लाहों के गीत आकर्षित करते हैं जिनके चप्पू आजाद लहरों का गाना गाते हैं, तो दूसरी ओर चरखा-गीतों में उन्होंने स्त्री की आजादी का नया भाष्य किया। फिर विद्रोह और स्वाधीनता संग्राम के गीत तो हैं ही। पर इनमें मल्लाहों के गीत में सबसे अधिक गति और उन्मुक्तता है—

  1. दिन भर मैं किश्ती चलाता हूँ

तेरे पानियों पर, ओ इरावती!

मल्लाह का जीवन है अपने आप में एक गीत

तेरे पानियों पर, ओ इरावती!

  1. सुंदर कुँवारियाँ नाच रही हैं, झूम रही हैं,

तेजी से, कभी धीरे-धीरे।

तुमने यह नाच कहाँ सीखा?

बताओ, बताओ, इरावती की बेटियो!

हम हैं मोर और तुम हो मोरनियां,

मोर मारे जाएँगे और तुम रोया करोगी।

नदी के इस मोड़ पर यह नाच सीखा या उस पहाड़ पर

जहाँ से इरावती निकलती है?

तुमने यह नाच कहाँ सीखा?

बताओ, बताओ, इरावती की बेटियो!

  1. इरावती में हमारे आँसू समाते रहे हैं, भाइयो!

इरावती कितनी मैली हो रही है।

और जब गरीबी हमारे गले घोंट देगी

इरावती इसी तरह बहती रहेगी।

इरावती में किश्ती चलाने वाले मल्लाहों के इन गीतों में गजब का सौंदर्य-बोध है। पर इसके बावजूद इन मल्लाहों के गरीबी के आँसू और दारुण पीड़ा कहाँ छिप पाती है?

अपनी लोकयात्राओं में भूख, अकाल और ठेकेदारी प्रथा के कष्टों और जमींदारों के उत्पीड़न को प्रकट करने वाले ऐसे तमाम गीत सत्यार्थी जी को सुनने को मिले। ऐसा ही एक करुण गोंड लोकगीत बालाघाट जिले में बरासिवनी से प्राप्त हुआ। इस गीत में गिट्टी तोड़ती स्त्री का दर्द मानो आँसुओं की जलधारा के रूप में बह आया है और सुनने वाले को बार-बार स्तब्ध करता है। सत्यार्थी जी द्वारा किए गए इस लोकगीत का अनुवाद पढक़र लगेगा, जैसे हम हाल-फिलहाल की कोई कविता पढ़ रहे हों—

अंग पर अँगिया नहीं

भूखी-प्यासी मैं गिट्टी तोड़ती हूँ…

ओ, माँ, मैं कब तक गिट्टी तोड़ती रहूँ?

इस जीवन से मुझे घृणा हो गई है।

दुनिया गरम बिछौने पर सोती है, दीवाली का जाड़ा पड़ रहा है,

ओ माँ, थर-थर काँपती हुई मैं गिट्टी तोड़ती हूँ।

इस जंगल, पहाड़ में बसकर

जब पयाल बिछाकर हम सोते हैं—चार हाथ की गाती बाँधकर

गजब के जाड़े में नींद नहीं आती, पयाल जलाकर हम रात भर जागते हैं।

इतनी मुसीबत में मैं गिट्टी तोड़ती हूँ, दो आना रोज मिलता है

जीवन-भर मुझे बच्चे और बच्ची की सोच लगी रहेगी।

ओ माँ, पिता के घर मैंने सुख न भोगा, न ससुराल में सुख पाया,

ओ माँ, मैं मर जाती तो अच्छा होता। मांस तो गया, हड्डियाँ रह गईं।

जी चाहता है, जल्दी मरकर स्वर्ग में जाऊँ और हाथ जोड़कर अर्ज करूँ,

बाबा, मुझे आदमी का जन्म न देना और कोई जन्म दे देना।

कोई पत्थर-दिल शख्स ही होगा जिसकी आँखें इस गीत को पढ़ते समय भीग न जाएँ? हमारे दौर का कोई बड़ा से बड़ा कवि भी इस जमीनी सच्चाई को इतने मार्मिक अल्फाज में कह सकता है, यकीन नहीं आता! इससे लोकगीतों की ताकत ही नहीं, उनका दस्तावेजी महत्त्व भी सामने आता है। इसलिए कि उनमें अपने समय और इतिहास की मार्मिक गूँजें समाई है।

इसी तरह 1856 में मारवाड़ में जो भयंकर अकाल पड़ा था, उसकी कैसी दर्दनाक गूँजें इस गीत में समा गई हैं—

छपनिया काल रे छपनिया काल,

फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।

आइयो जमाइड़ो धड़कियाँ जीव,

काँ ते लाऊँ शक्कर, भात, घीव, जमाइड़ो?

फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।

छपनिया काल रे छपनिया काल,

फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।

भूखे लोगों को मुट्ठी भर अन्न देने का तरीका यह खोजा गया कि भूखे लोगों से सड़क बनवाई जाए। यों देश में विकास की लंबी सड़क बन रही है और भूखे लोग उसे कैसे बना रहे हैं, उसका एक चित्र देखें—

ईदू बेना आपेते दादा, ईदू बेना आपेते दादा

दादा ले वया, दादा ले वया।

जर्रू ऊबाम पेइत्ता दादा, जर्रू ऊबाम पेइत्ता दादा

दादा ले वया, दादा ले वया।…

इस गीत का भाव भी जरा सत्यार्थी जी के शब्दों में सुनें। समझ में आ जाएगा कि लोकगीतों से एक संवेदनशील आदमी की दोस्ती कैसी होती है और लोकगीत कैसे उसके आगे अपना अर्थ खोल देते हैं—

अर्थात, यह कैसी आफत है भाई, यह कैसी आफत है भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

बहुत पसीना निकला भाई, बहुत पसीना निकला भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

पेट में अन्न नहीं भाई, पेट में अन्न नहीं भाई, ओ भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

यह कैसी आफत है भाई, यह कैसी आफत है भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

हाथों में छाले पड़ गए भाई, हाथों में छाले पड़ गई भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

सबके हाथों में दुरमट हैं भाई, सबके हाथों में दुरमट हैं भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

जमादार हम पर नाराज होता है भाई, जमादार हम पर नाराज होता है भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

पानी छिड़को, पानी छिड़को, पानी छिड़को भाई,

ओ भाई, ओ भाई, ओ भाई!

पानी छिड़को, पानी छिड़को, पानी छिड़को भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

हमारे देश की लंबी सड़क है भाई, हमारे देश की लंबी सड़क है भाई,

ओ भाई, ओ भाई!

यह लोकगीत मानो बिन कहे एक बड़ा गंभीर सवाल उठाता है कि विकास के नाम पर चल रही बड़ी-बड़ी योजनाएँ अगर देश की गरीब जनता के सुख-दुख और रोजमर्रा की मुश्किलों की चिंता नहीं करतीं, और अगर भूखे आदमी की हाय उन तक नहीं पहुँचती, तो क्या उनसे सच में देश का कुछ भला हो सकता है?

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बहरहाल इससे पता चलता है कि सत्यार्थी जी लोकगीतों के कोई निर्भाव संग्रहकर्ता नहीं रहे कि जो कुछ मिला, चट झोली में डाल लिया। वे अच्छे, सार्थक, भावपूर्ण और कालांकित लोकगीतों को न सिर्फ अलगाते रहे, बल्कि अपने लेखों में उनकी शक्ति, सौंदर्य और विशेषताओं को उन्होंने बार-बार रेखांकित ही किया।

शायद यही वजह है कि मन की मौज में आकर शुरू किया गया लोकगीत-संग्रह का उनका काम स्वराज्य की लड़ाई का अटूट हिस्सा बनता चला गया। और उनके पीछे-पीछे चलने और उनसे प्रेरणा लेने वाले लोकसाधकों का पूरे देश में इतना बड़ा काफिला खड़ा हो गया कि देखते ही देखते देश के हर प्रांत, हर खंड में लोक साहित्य का यह आंदोलन छा गया। देश के विश्वविद्यालय, प्रबुद्ध जन और बुद्धिजीवी भी अब इसे गंभीरता से लेने लगे। के.एम. मुंशी, वासुदेवशरण अग्रवाल, श्यामाचरण दुबे जैसे समाज-चिंतकों और साहित्य-मर्मज्ञों ने ही नहीं, वेरियर एल्विन और डब्ल्यू.जी. आर्चर जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के लोकचिंतकों ने भी बड़े आदर से सत्यार्थी जी के काम को याद किया और जगह-जगह उनके महत्त्व और उनकी अनोखी और कठिन साधना का उल्लेख किया।

दीनबंधु एंड्र्यूज शांतिनिकेतन में मिले तो सत्यार्थी जी को बाँहों में भर लिया। बोले, “लोकगीतों पर आपके लेख मैंने पढ़े हैं। आपके काम को मैं भारत की आजादी की लड़ाई का एक हिस्सा मानता हूँ!” इसी तरह वेरियर एल्विन सत्यार्थी के काम से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने अपने पत्रों और लोक साहित्य संबंधी पुस्तकों में सत्यार्थी जी का जिक्र बड़े सम्मान से किया है। गाँधी जी तो सत्यार्थी जी को बार-बार अंतरंग वार्ता के लिए बुलाते ही थे। यहाँ तक कि उन्होंने के.एम. मुंशी से कहा था कि मुंबई में उनके निवास का जो कमरा सिर्फ महात्मा गाँधी के लिए रिजव्र्ड रहता है, वह इस लोकयात्री के लिए खोल दिया जाए। ताकि जब तक वह वहाँ रहना चाहे, रहे और वहाँ काम करते हुए उसे कोई कष्ट न हो।

देश की आजादी के बाद सत्यार्थी जी ने हिंदी में अपने लोकगीत-अध्ययन की पहली पुस्तक ‘धरती गाती है’ तैयार की, तो गाँधी जी से उसकी भूमिका लिखने का आग्रह किया। जवाब में गाँधी जी ने खूब उत्साह और स्नेह दिखाया—

“अच्छा तो ‘धरती गाती है’ की हस्तलिखित प्रति मेरे पास छोड़ जाओ। मैं इसका आमुख लिखूं, यह तुम्हारा अनुरोध है। यह तो ऐसे ही है जैसे कोई मीठे दूध में एक मुट्ठी चीनी डालने को कहे। इससे हमेशा स्वाद बिगडऩे का डर रहता है। फिर भी तुम कह रहे हो, तो लिख दूंगा।…’विशाल भारत’, ‘मॉडर्न रिव्यू’ और ‘एशिया’ में तुम्हारे लेख बराबर रस से पढ़ता रहा हूँ। बहुत-से लेख छूट भी गए होंगे। किसी खेत की मेंड़ पर बैठ तुम किसी लोकगीत के चार बोल लिख रहे होगे या गाँव की किसी कच्ची पगडंडी पर चले जा रहे होंगे—मेह हो, चाहे धूप चाहे आंधी—ऐसी कल्पना मैंने कई बार की है।”

गाँधी जी ने जिन पत्रों ‘विशाल भारत’, ‘मॉडर्न रिव्यू’ और ‘एशिया’ की चर्चा की है, उनमें सत्यार्थी जी के लोकगीत संबंधी लेख बड़े सम्मान से छपते थे। और वह एकाएक चर्चा के केंद्र में आ गए थे। ‘मॉडर्न रिव्यू’ और ‘एशिया’ तो खैर अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि की पत्रिकाएँ थी। ‘विशाल भारत’ की भी हिंदी में खासी धूम थी। पहले बनारसीदास चतुर्वेदी और फिर अज्ञेय ‘विशाल भारत’ में सत्यार्थी जी के लेखों को विशेष रूप से आमंत्रित करके छापते थे। अज्ञेय ने तो बड़े अपनत्व और आग्रह से उन्हें पत्र लिखा था कि उनकी इच्छा है उनके संपादन में ‘विशाल भारत’ का जो पहला अंक निकले, उसमें सत्यार्थी जी का लेख जरूर होना चाहिए। और ‘मॉडर्न रिव्यू’ के संपादक रामानंद चटर्जी तो सत्यार्थी जी के व्यक्तित्व की सरल सादगी और उनकी रोमांचक लोकयात्राओं से प्रभावित होकर उन्हें अपना पुत्र मानकर ही प्रेम करने लगे थे।

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लोक साहित्य की खुरदरी जमीन पर चलते सत्यार्थी जी की भावाकुलता उन्हें जल्दी ही सृजनात्मक क्षेत्र में आई। उन्होंने कहानी, कविता, उपन्यास, निबंध, रेखाचित्र, आत्मकथा, संस्मरण—साहित्य की लगभग हर विधा में लिखा और उसमें कुछ न कुछ नया और महत्त्वपूर्ण जोड़ा। ‘कुंगपोश’, ‘इकन्नी’, ‘नए देवता’, ‘कब्रों के बीचोंबीच’, ‘जन्मभूमि’, ‘अन्न देवता’, ‘टिकुली खो गई’, ‘नए धान से पहले’, ‘सड़क नहीं बंदूक’, ‘चाय का रंग’ जैसी सत्यार्थी जी की कहानियों की खासी धूम रही है। इसलिए कि इनमें उनकी लोक यात्राओं के ऐसे सच्चे और खरे अनुभव थे, जिंदगी की बहुत नजदीक से देखी गई ऐसी अजीबोगरीब शक्लें और गरमजोशी थी जो इस लोकयात्री की कलम से उतरने को मानो बेचैन थी।

सत्यार्थी जी के रेखाचित्रों, संस्मरणों और यात्रा-वृत्तांतों में भी उनकी घुमक्कड़ी की ऐसी दास्तानें बिखरी पड़ी हैं कि मंटो ने एक बार सत्यार्थी जी को पत्र लिखा कि वह उनके साथ गाँव-गाँव, नगरी-नगरी घूमना चाहते हैं और कृश्न चंदर ने तो बड़ी ललक से कहा था, “भाई, अपने सुख मुझे भी दे दो!”

और वाकई सत्यार्थी जी की खुली जिंदगी की तरह, उनके गरमजोशी से लबरेज रेखाचित्रों का तो कहना ही क्या। ज्यादातर रेखाचित्रों में उनके निजी जीवन के दस्तावेज और घुमक्कड़ी की कहानियाँ बिखेरी पड़ी हैं। भावनाओं के उस आलोड़न में निर्जीव पत्थर और नदियाँ भी बोल पड़ती हैं। चाहे गोदावरी हो या रावी, उसकी कलकल-छलछल में सत्यार्थी जी इतिहास की गूँज और युगों का नाद सुनते हैं। उसके साथ उनका अजीब-सा मानवीय रिश्ता कायम हो जाता है, जिसके सहारे वे उसका हृदय टटोलने लगते हैं। बीच-बीच में सत्यार्थी जी अपने सुख-दुख का ऐसा संवाद पिरो देते हैं कि मानव-अस्तित्व की एक नई ही पहचान उभरती है। देखा जाए तो सत्यार्थी जी की आत्मकथा यहाँ बिखरी पड़ी है, चप्पे-चप्पे पर उनकी छाप है।

इसी तरह सत्यार्थी जी की आत्मकथा ‘चाँद-सूरज के बीरन’ का स्वाद अनोखा है, जिसमें पंजाब का लोक मानस गहरे समाया हुआ है। यह दीगर बात है कि सत्यार्थी जी की आत्मकथा सारी की सारी अंतर्मन की ही कहानी है जिसमें सब कुछ है, मगर गणित में दुनियावी जोड़तोड़ और हिसाब-किताब नहीं। हाँ, जमीन की जो एक नैसर्गिक प्यास होती है, उसकी समझ उनमें है। धरती के गाते, छलछलाते उल्लास को उन्होंने जाना और उसी को शब्दों में पिरो दिया। बहुत साधारण, बहुत मामूली पात्र हैं सत्यार्थी जी की आत्मकथा में। आसासिंह, फत्तू, नूरा चरवाहा, गंगी ताई, माँ जी, मौसी भागवंती, भाभी धनदेवी, पंडित घुल्लूराम, मास्टर केहरसिंह। इन लोगों के कितने ही किस्से सत्यार्थी जी से सुनने को मिले। पर उनकी आत्मकथा ‘चाँद-सूरज के बीरन’ में उन्हें एक जीवन-धारा में बहते देखने का आनंद ही कुछ और है।

सत्यार्थी जी की जन्मभूमि भदौड़ से जुड़ी ऐतिहासिक कथाएँ और किंवदंतियाँ भी यहाँ बहुत हैं और एक बालक जिसने लोकगीतों का रस-स्वाद जाना तो वह कुछ और ही हो गया। वह नहीं रहा, जो पहले था। अंतर्मन में एक ऐसी अजीब-सी प्यास जाग उठी जो उसे किसी बड़ी भटकन के लिए तैयार कर रही थी। लेकिन इन छोटे-छोटे पात्रों, छोटी-मोटी, मामूली घटनाओं के सहारे ही सत्यार्थी जी ने गन्ने की मिठास की तरह मीठे कथा-रस की सृष्टि की है। और इसका कारण वह रचनाकार मन है जो हर घटना को किसी नए जन्म ले रहे ‘लोक-इतिहास’ की शक्ल में देखने का आदी है।

एक शिशु किस तरह परिवेश से रस-गंध और संस्कार लेकर बढ़ता है। उसके छोटे-छोटे तुतलाते सवाल, आदतें और घरेलू संस्कार कैसे एक कहानी से भी दिलचस्प कहानी कह रहे होते हैं, बारीकी से यह देखना हो तो सत्यार्थी जी की ‘चाँद-सूरज के बीरन’ से अच्छी किताब कोई और न होगी। एक ऐसी आत्मकथा जिसमें पूरा पंजाब समाया है।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि सत्यार्थी जी के ‘रथ के पहिए’, ‘कठपुतली’, ‘ब्रह्मपुत्र’, ‘दूध-गाछ’ और ‘कथा कहो उर्वशी’ जैसे महाकाव्यात्मक उपन्यास जिनमें एक तरह से उनके लोक अनुभवों का विस्तार ही है, कुछ इस ऊष्मा और सच्चाई के साथ लिखे गए हैं कि सत्यार्थी जी मानो उन अलग-अलग अंचलों के अणु-अणु और रेशे-रेशे से परिचित हैं, जिनकी नींव पर ये उपन्यास निर्मित हुए हैं।

असम की आंदोलित जमीन पर रचे गए ‘ब्रह्मपुत्र’ को पढ़ते हुए लगता है, मानो सत्यार्थी जी जन्म से ही असम की लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और जन-संस्कृति से परिचित से हों, तो ‘कथा कहो उर्वशी’ पढ़ते समय धोखा होता है कि कहीं वे सचमुच उड़ीसा के मूर्ति शिल्पियों के परिवार के तो नहीं हैं। ‘दूध-गाछ’ पढ़ते हुए लगता है—अरे, वे तो मूलत: केरल की जमीन और अंचलों के वासी लगते हैं! तो ‘कठपुतली’ और ‘तेरी कसम सतलुज’ को पढ़ते हुए, इन उपन्यासों की पंक्ति-पंक्ति मानो यह गवाही देती है कि वे ठेठ पंजाब की जमीन के सिवा और कहीं के हो ही नहीं सकते। मानो जिस जमीन और अंचल पर लिखा, वे मन और आत्मा से वहीं के हो गए।

साहित्य और कला की यह साधना क्या बगैर ‘हृदय की मुक्तावस्था’ के संभव है? उसके लिए एक यात्री का जो दिल, गरमजोशी और फक्कड़ी चाहिए, वह सत्यार्थी जी में भरपूर है और सच कहा जाए तो वही उनका असली खजाना भी है।

शायद इसीलिए देवेंद्र सत्यार्थी बीसवीं शताब्दी के उन महाकाय व्यक्तित्वों में से हैं जिनके बीहड़ व्यक्तित्व और महाकाव्यात्मक अनुभवों से भरपूर दर्जनों रचनाओं से गुजरते हुए, हमें समूची बीसवीं शताब्दी के साहित्य, इतिहास और एक नई पहचान के साथ सामने आते मामूली आदमी को देखने-समझने की ‘नई आँख’ मिलती है।

आज जब सत्यार्थी जी नहीं हैं और साहित्य तथा लोकयान को अपना सर्वस्व देकर जा चुके हैं, तो यह कहे बगैर नहीं रहा जाता कि काश, सत्यार्थी जी जैसे सच्चे और निरभिमानी लेखकों को समझने की कुछ ज्यादा ईमानदार कोशिशें हमारे यहाँ होतीं! तब लोक साहित्य में झाँकती जनता की अपार ताकत हमारी पूँजी होती, और यह पूँजी दुनिया के किसी भी महादेश की पूँजी और सिक्कों की ताकत से छोटी नहीं है!

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प्रकाश मनु

प्रकाश मनु, 545, सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008

मो. 09810602327,

ईमेल – prakashmanu333@gmail.com

 

 

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One comment

  1. प्रकाश मनु

    आभारी हूँ भाई प्रभात रंजन जी। आपने बहुत थोड़े समय में इतने सुरुचिपूर्ण ढंग से सामग्री दी, कि अभिभूत हूँ। आज सुबह से ही बहुत से साहित्यिक मित्रों की बड़ी सुखद प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। सत्यार्थी जी की बेटियों अलका सोईं और पारुल जी ने भी बड़ी रुचि से लेख पढ़ा और आपको अपनी स्नेहपूर्ण शुभकामनाएँ दी हैं। आज मेरे गुरु सत्यार्थी जी के जन्मदिन पर आपने बड़ा खूबसूरत उपहार दिया। यह याद रहेगा। एक बार फिर से मेरा स्नेह और शुभकामनाएँ, प्रकाश मनु

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