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प्रियंका ओम की कहानी ‘शर्त एक सौ अस्सी रुपये की’

आज पढ़िए युवा लेखिका प्रियंका ओम की कहानी ‘शर्त एक सौ अस्सी रुपये की’, यह कहानी ‘पाखी’ में प्रकाशित है। आप यहाँ पढ़कर अपनी राय दे सकते हैं-

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बेटे के चीखने की आवाज़ आ रही थी; वह नींद में डर गया था, शायद कोई बुरा सपना देखा होगा | हम दोनों एक साथ दौड़ कर उसके कमरे में गए |

तीन कमरे वाले इस फ्लैट के मास्टर बेडरूम और बेबी रूम के बीच बड़े से हॉल के कारण दूरी कुछ अधिक थी | पत्नी ने हमारे लिए बेबी रूम के निकट वाला तीसरा कमरा चुना | हमारे बेडरूम के दरवाज़े से बेटे के कमरे के दरवाज़े के बीच मात्र दो कदम की दूरी है | कुछ सेकंड में ही हम उसके कमरे में थे !

वह बिस्तर पर बैठा चीख रहा था | उसके चीखने की आवाज़ ऐसी थी कि एक पल के लिए मैं भी भयभीत हो गया | मैं उसे गोद में उठाकर हमारे बेडरूम में ले आया | पत्नी ने भयातुर होकर पूछा “बुरा सपना देखा?’’

उसने हां में सर हिलाया ।

“सपने में क्या देखा?”

“भूत” | उसने जीभ बाहर निकालकर कहा “हा” |

उस वक़्त उसकी मासूमियत पर बेहद प्यार उमड़ा | मैंने उसे स्वयं से लिपटा लिया | पत्नी ने आगे कुछ पूछना चाहा तो मैंने इशारे से मना कर दिया | बेटा आज पहली बार नहीं डरा है | इससे पहले भी कई बार डर चुका है | हर बार सोचता हूँ उसे अपने साथ ही सुलाऊं, लेकिन फिर सोचता हूँ इस तरह तो और भी डरपोक हो जायेगा |

यहाँ मैं, मेरे बेटे के बारे में एक बात कहना चाहूँगा | जब ईश्वर उसकी संरचना कर रहे थे तब उसमें चुन-चुन कर हमारी कमजोरियां ठूंस रहे थे |

पत्नी बेहद डरपोक है | मई की अकेली दिन-दोपहर में भी डरती है | रात में अक्सर हॉरर सीरियल के दृश्य की तरह उसकी आँख अचानक खुलती है और एक घूमती हुई भंवर (व्हर्लपूल) का पीछा करती है, जो उसकी दृष्टि पड़ते ही या तो निकटतम कोने में विलीन हो जाती है या दोहरे परदे में घुस गायब हो जाती है | कई बार गहरी नींद में वह डरी हुई आवाज़ में कुछ कुछ बोलती भी है, जिसकी मुझे आदत हो गई है | एक दो बार उसकी नींद की भाषा समझने की कोशिश की, लेकिन फिर निराशा हाथ लगी | अब मैंने वो कोशिशें छोड़ दी है |

मैं जरा भी नहीं डरता | डर किस चिड़िया का नाम है, मैं नहीं जानता | बावजूद इसके कि मैंने एक पूरा दिन भूत के साथ बिताया है | मैं जानता हूँ आप नहीं मानेंगे | आप क्या कोई भी नहीं मानेगा | उस रात से पहले मैं भी नहीं मानता था |

आज से लगभग 15-16 वर्ष पूर्व

दरवाज़े की घंटी दीवारें चीर रही थी | ऐसा लग रहा था मानो छत गिर जायेगी | कान के परदे फट जायेंगे |

कौन जाहिल है ? घंटी बजाने का भी शऊर नहीं | मैं अनमने ही उठता हूँ | समय देखा तो छोटी सुई तीन पर टिकी थी और बड़ी सुई अभी-अभी चार का पड़ाव पार कर आगे बढ़ी थी | अर्थात तीन बजकर बीस मिनट और कुछ सेकंड | शायद ऐसी ही किसी रात के इंतज़ार में मैंने दीवार पर रेडियम डायल वाली घडी लटका रखी थी | इस वक़्त को आप रात या सुबह अपनी सुविधा अनुसार जो चाहे, कह सकते हैं | लेकिन मैं इस बात की तस्दीक कर सकता हूँ कि अमुक वक़्त नीम स्याह चद्दर ओढ़े हुए था और मेरी पुतलियों से पलकें गहरी नींद वाली ग्लू से चिपकी हुई थीं |

ये भी कोई वक़्त है किसी के घर आने का ? घर, मैं भी क्या मज़ाक कर रहा हूँ | मेरा घर सराय बन चुका था | अक्सर रिश्तेदार, पुराने दोस्त-साथी या उनके भाई-बहन आते जाते रहते थे | मुंबई जैसे महानगर में नौकरी की तलाश उन्हें मेरे घर तक ले आती | ऐसे हालात से मैं बारहा दो-चार होता रहता था | उस दफे अंतर इतना रहा कि मैं पूर्व सूचित नहीं था और बेवक्ती अलग से |

हे ईश्वर | तीसरे पहर की सुखद नींद से जगाने वाले इस निर्दयी को कभी माफ़ मत करना, उसकी सारी नींदें छीन लेना, उसकी रातें उनींदी ही रखना, उसके रतजगे में इतनी बेचैनियाँ भर देना कि वह तमाम जिंदगी…… लेकिन दरवाज़े तक पहुँचते ही मेरी बद्दुआओं का स्टॉक खाली हो गया था |

घंटी अब भी लगातार बज रही थी | उसी तरह अपने कर्कश स्वर में |

मैं भन्नाता हुआ दरवाज़ा खोलता हूँ और हतप्रभ रह जाता हूँ | वह मेरे सामने किसी दुर्बोध रहस्य से आवरण हटा उपस्थित हो आया था |

तुम ? औचक इतने सालों बाद ? कहाँ रहे इतने दिन ? आजकल क्या कर रहे हो ? मेरा पता किसने दिया ? उसे पहचानने में पल भर की देरी किये बिना मैंने प्रश्नों का ताँता लगा दिया |

तुम आज भी दरवाज़े पर आये आगंतुक को अन्दर नहीं बुलाते ? उसने मीठा तंज़ किया |

और तुम आज भी रात के तीसरे पहर दरवाज़ा खटखटाते हो ?

दो भिन्न ठहाकों की सम्मिश्रित गूँज |

वह मेरे स्टूडियो फ्लैट के अन्दर आ सोफा कम बेड पर पसर गया था | मैंने देखा वह निःसंग ही आया था, उसके हाथ खाली थे, न लैपटॉप बैग न ट्रेवलिंग बैग न कलाई में बंधी घड़ी | किसी विशेष प्रयोजन से आया है, मैंने अंदाज़ा लगाया |

बाहर कुत्तों का एक झुण्ड बेतरह भूंक रहा था | मुंबई में रात नहीं होती, इस खुशफहमी में कुत्तो को नींद नहीं आती, साले बेवक्त भूंकते रहते हैं | एक लम्बे अर्से बाद की मुलाकात में बात की शुरुआत करने के खयाल से कुत्तों के भूँकने का जिक्र उपयुक्त लगा था मुझे | सच पूछिए तो हम दोनों के मौन से उपजे उस नीरव अरण्य में आखेट हेतु कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था |

“रात को कुत्ते दूसरी दुनिया के लोगों को देखकर भौंकते हैं और बिल्लियाँ रोती है” उसने लापरवाही से कहा |

“तुम इतने सालों बाद भी वही गीत गा रहे हो?” हालाँकि मुझे कुत्तों के भूँकने के साथ-साथ बिल्ली के रोने की भी आवाज़ आ रही थी |

“एक दिन तुम्हें मेरी बात का यकीन होगा |”

 “वह दिन कभी नहीं आएगा” मैंने दृढ़ता से कहा |

“मैं वह दिन दिखाने आया हूँ दोस्त” कहते हुए उसने मेरी आँखों में घूरा | पता नहीं, उसकी नज़र में ऐसा क्या था कि डर की एक लहर मेरे रगों में दौड़ गई | मेरे रोंगटे खड़े हो गए |

“बताया क्यूँ नहीं, मैं स्टेशन आ जाता” मैंने फट से बात बदल दिया |

मैं उड़कर आया हूँ |

“क्या” मैं उसके इस जवाब पर हैरान हुआ था | दरअसल उसे देखकर कतई नहीं लग रहा था कि वह हवाई यात्रा कर आया है, वह इतना बेतरतीब और बेढंगा नुमायाँ हो रहा था कि फिलवक्त मुझे उसपर तरस आ रहा था |

“ एक सिगरेट मिलेगी ?” मेरे मनोभावों से रत्ती-माशा अनभिज्ञ उसने कहा |

सिगरेट का डब्बा और लाइटर लेते हुए उसकी उँगलियाँ मेरे हाथों को छू गई | मैंने जाना उसकी उँगलियाँ बेहद ठंडी थी, ठीक उस रात जैसी, लेकिन मैंने इस बाबत चुप रहना श्रेयस्कर समझा | अपने हाथों का घेरा बनाकर उसने सिगरेट जलाया और जोर से कश खींच कर फेफड़ों में भर लिया, पुनः उस धुंए का छल्ला बनाकर हवा में उछाल दिया | मैं देर तक उसे यही क्रिया दोहराते हुए देखता रहा | हालाँकि मुझे उसके सिगरेट पीने का यह तरीका  बहुत लुभाता था और हज़ार कोशिशों बाद भी मैं कभी सीख नहीं पाया | लेकिन उस वक़्त मुझे बोरियत होने लगी थी और नींद से आँखें मुंदी जा रही थी |

चाय पियोगे ? नींद भगाने का इससे कारगर दूसरा कोई उपाय मैं नहीं जानता था |

“काश इस वक़्त मैंने कुछ और चाहा होता” उसकी आवाज़ में बेतरह उदासी थी |

भूतकाल के विराट् वृक्ष से स्मृति के पत्ते झडकर वर्तमान के पटल पर बिछ गए थे | उन पीले पड़ते पत्तों में एक पत्ता आज भी हरित था | शिशिर की स्मृति का पत्ता जो दरअसल कभी सूखा ही नहीं था |

उन दिनों मैं इंजीनियरिंग का छात्र था और हॉस्टल में रहकर पढाई कर रहा था | तब शिशिर से मेरी पहली मुलाकात हुई थी |

फर्स्ट इयर के सेकंड सेमेस्टर के बाद छुट्टियाँ शुरू हो गई थी, और छुट्टियों के बाद कॉलेज खुलते ही परीक्षा थी | जॉइंट फैमिली के बच्चे-बुजुर्गो से ठसाठस भरा घर, सारा दिन स्त्रियों की किचकिच और बच्चों की धमाचौकड़ी | ऐसे में घर जाकर परीक्षा की तैयारी कर पाना किसी हाल मुमकिन नहीं था | मैंने होस्टल में ही रहकर तैयारी करने का निर्णय लिया था |

भिन्न भिन्न विभागों से मिलाकर कुल तेइस लड़के थे हम, और एक कुक जो ऊपरी कमाई के लालच में रुक गया था | वह लोकल ही था, दोपहर से पहले आता और रात का खाना बना शाम ढले निकल जाता | रह जाते हम तेइस, एक दूसरे से नितांत अनजान | इतने अनभिज्ञ कि कहीं बाहर मिल जाएँ तो पहचानना मुश्किल | अक्सर दोपहर मेस में एक दूसरे को देख अपरिचय से मुस्कुराना ठीक वैसा ही होता जैसा रात बिरात नींद का उचट आना |

न जाने क्यूँ शिशिर की मुस्कराहट बुलाने लगी थी, मैं खिंचता जाता था | कभी कभी लगता मैं ‘गे’ तो नहीं, पुनः जेहन में उस लड़की की आँखें कौंध जाती, जिसकी पलकें मुझपर नज़र पड़ते ही झुक जाती | कभी कभी उन झुकती नजरों की चाह में मैं दस दफे उस गली से गुजरता जिसकी बायीं मोड़ पर उसका घर था | ठीक अभी वह लड़की मेरी बायीं ओर गहरी नींद में सो रही है, मैं उसे देख मुस्कुराता हूँ |

सुबह का नाश्ता और दिन भर की चाय का इंतजाम हमने अपने-अपने कमरे में कर लिया था, कुछ बाहर टपरी से फ्लास्क भर ले आते तो कुछ ने कैटल रख लिया था और तो कुछ ने हीटर | मेरे पास एक चूल्हे वाला गैस स्टोव था, मैं कभी कभी आलस्य से नाश्ते में मैगी बना लेता और पूरा दिन कमरे में बिता देता |

उस पूरे दिन मैं कमरे से बाहर नहीं निकला था, जिसकी रात दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज़ के तुरंत बाद मुझे चौंकने का मौका दिए बगैर ही उसने पूछा था, “एक सिगरेट मिलेगी?”

मैंने किताब में घुसा सर उठाकर देखा, वह खुले दरवाज़े के पार चेहरे पर औपचारिक मुस्कराहट लिए खड़ा था | वह शिशिर था |

मैंने वहीँ बैठे-बैठे पास रखे सिगरेट के डब्बे से दो सिगरेट निकाल उसकी तरफ बढ़ा दिया |

उसने झिझकते हुए कदम अन्दर रखा “तुम बहुत सिगरेट पीते हो”

मैंने देखा कमरे की फर्श पर जली हुई सिगरेट की बट बिछी हुई थी, जिन्हें कुचलता हुआ वह मुझ तक पहुँच मेरे हाथ से सिगरेट ले लेता है | सिगरेट लेते हुए उसकी उँगलियाँ बेखयाली से मेरे हाथों को छू गई |

“तुम्हारी उँगलियाँ बेहद ठंडी है, जैसे बर्फ”

“मैंने अभी-अभी उसे देखा” उसने कहा और वहीँ जड़ हो गया |

“किसे?” कौतुक की सघनता का विस्तार मेरी जुबां तक हो आया था |

“तुम भूत-प्रेत में मानते हो” उसने जवाब देने की बजाय सवाल पूछा था |

“नहीं, मैं नहीं मानता भूत प्रेत में |”

“बहुत जल्दी मानने लगोगे, यह हॉस्टल एक कब्रगाह पर खड़ी है |”

“तमाम हॉस्टल के मुताल्लिक ऐसी किवदंतियां प्रचलित हैं | दरअसल जूनियर्स को डराने के लिए यह सीनियर्स के उडाये किस्से हैं |”

“मुझे बचपन से ही डरावनी कहानियां सुनना बहुत पसंद था और नानी के पास तो भूत-प्रेत की कहानियों का ख़ज़ाना था | जब भी नानी आती मेरे लिए ढेर सारी कहानियां लेकर आती, जैसे उनके पास भुतहा कहानी बनाने वाली कोई मशीन हो | हर बार नई-नई कहानियां, रोंगटे खड़े कर देने वाली रोमांचक कहानियां, लेकिन मैं किंचित न डरता |

कहानी के अंत में मैं यह पूछना कभी न भूलता कि “नानी क्या सचमुच भूत होते हैं ?”

तब वह दृढ़ता से कहती “नहीं, भूत नहीं होते है” और ऐसा कहते हुए उनका चेहरा विकृत हो जाता | कभी-कभी तो डर से मैं सहम भी जाता, लेकिन फिर नानी की मुखाकृति बदलकर कोमल हो जाती और वह मुझे थपकी देकर सुला देती |

कहानियां सुनाने के दौरान नानी अक्सर कहती “भूत की झूठी कहानी सुनाने से भूत पकड़ लेता है’’

उन्होंने बताया, एक लड़का जिसे भूतों पर ज़रा भी यकीन नहीं था, सबको भूत की झूठी कहानी सुनाया करता | उसकी कहानी सुनकर बच्चे बहुत डरते थे, इस बात से भूत नाराज़ हो गए और उन्होंने उसे सबक सिखाने की ठान ली | वे उस लड़के को हर जगह दिखाई देने लगे | कॉलेज में, घर में, बस स्टॉप, छत पर | इस तरह बार बार भूतों के दिखने से वह लड़का मानसिक रूप से बीमार हो गया, उसे आम इंसान भी भूत लगने लगे | अंततः उसे इलाज़ के लिए हॉस्पिटल में दाखिल करवाना पड़ा |”

“फिर ?” कथ्य के जुम्बिश में मैंने बेहद उत्सुकता से पूछा था | हालाँकि बाद में मुझे खुद पर बेहद गुस्सा आया “मैं क्यूँ बेकार की कहानी में दिलचस्पी लेने लगा था |”

“हॉस्पिटल के सभी डॉक्टर और नर्स भूत थे” उसने उसी निश्चिंतता से कहा |

“फिर तो तुम्हारी नानी को भूत ने अवश्य पकड़ लिया होगा, किसी दिन” यह बात मैंने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा था |

लेकिन उसने उसी तरह गंभीरता ओढ़े कहा “माँ कहती है, जब मैं माँ के गर्भ में था, तब नानी की मृत्यु हो गई थी | नानी भूत बन गई थी |”

“किसी दिन भूत तुम्हे भी पकड़ेगा, देखना तुम’ मैं बुरी तरह चिढ गया था |

मेरा उत्तर सुन वह थोड़ी देर उसी तरह चुप खड़ा रहा, फिर मुड़ा और चला गया |

उस रात के बाद शिशिर मुझे देख नज़रें चुराने लगा था, वह मुझे अवॉयड करने लगा था |

मैं अपने बर्ताव पर बेहद शर्मिंदा था, मुझे उससे उस तरह से बात नहीं करनी चाहिए थी | मैंने मां से फ़ोन पर पूछा “क्या भूत होते हैं ?”

“अगर तुम्हें वहां डर लग रहा है तो मौसी के यहाँ चले जाओ |”

“माँ, यह मेरी बात का जवाब नहीं |”

“नहीं, भूत नहीं होते हैं |” माँ ने प्रगाढ़ता से कहा और साथ में यह भी कहा कि मैं हनुमान चालीसा का पाठ रोज सुबह-शाम किया करूँ |

हनुमान चालीसा? हाँ याद आया, पैकिंग के वक़्त माँ ने बैग में रखते हुए कहा था, कम से कम एक बार जरूर पढना, जिसे मैं बैग से निकालना भूल गया |

उस दिन मेस में शिशिर नजरें चुराते हुए मुझसे दूर बैठा था, मैंने दोस्ती करने की गरज से उसके पास जाकर धीरे से कहा “मेरी माँ ने कहा भूत नहीं होते हैं”|

उसने पलट कर जलती निगाहों से मुझे देखते हुए चीख कर कहा “भूत होते हैं और इस वक़्त वह ठीक तुम्हारी बगल में खड़ा है, इस कमरे में तेइस नहीं, कुल चौबीस लड़के हैं |

मैं जोर से ठहाका लगा हंस पड़ा, भूत जी मैं आपके साथ सिगरेट पीना चाहता हूँ | प्लीज प्रकट हो आइये और मेरे साथ कश लगाइए, कहते हुए मैंने अपनी सिगरेट सुलगा ली |

खामोशी के सन्नाटे से टकरा कर मेरी आवाज़ लौट वापस मुझ तक आ गई | वहां मौजूद सभी लड़के हंसने लगे थे | शिशिर का मज़ाक उड़ाने लगे थे यद्यपि मैं ऐसा चाहता नहीं था किंतु अनजाने ही मैं उसकी मखौल का कारण बना |

वह उठकर चला गया फिर कभी नहीं दिखा | वह उसी दिन हॉस्टल छोड़ चला गया, मुझे तमाम जिंदगी अपराध बोध के सघन कोहरे के धुंधलके में छोड़कर |

धीरे धीरे शिशिर की बातें, यादें धूमिल पड़ती गई और जिंदगी अपने ढर्रे पर चलती गई | किन्तु मेरे जहन में कहीं न कहीं उसकी तस्वीर खिंच गई थी, मैं उसे भूला नहीं था | वह मेरी यादों के एक सुरक्षित घेरे में कैद रहा |

बड़े पापा की मौत के बाद घर में एक बिल्ली का आना-जाना बढ़ गया था, वह बड़े पापा के बिस्तर पर जा सोती, खास उस कुर्सी पर बैठी दिखाई देती जिसपर बड़े पापा बैठा करते थे और सबसे अचम्भा यह था कि वह घर कतई गन्दा न करती |

घर में बिल्ली के बाबत खुसर फुसर चलती रहती, माँ ने कहा गरुड़ पुराण की मान्यता के अनुसार बालू पर बिल्ली के पैर बने थे | मुझे हैरानज़दा छोड़ तेरहवी के बाद आश्चर्यजनक रूप से वह बिल्ली दिखाई देनी बंद हो गई थी जैसे शिशिर उस दिन के बाद से दिखाई देना बंद हो गया था |

वर्तमान में वह मेरे गोचर उंगलियों में सिगरेट फंसाए त्यों बैठा है, जैसे अभी अभी सुलगाई हो, एक भी कश नहीं ली गई हो, चाय के दो कप सामने टेबल पर यूँ ही रखे हैं | बेस्पर्श | भाप अभी भी निकल रही है, कमरे में अँधेरा व्याप्त है लेकिन मैं थका हुआ महसूस कर रहा हूँ, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं घंटो से  यूँ ही  बैठा हुआ हूँ, कमर की नसे तनी मालूम पड़ रही थी लेकिन वक़्त ठहरा हुआ था, वक़्त को जैसे सांप सूंघ गया हो, घड़ी की सुइयां तीन बजकर बीस मिनट और कुछ सेकंड पर टिकी हुई थी शायद बैटरी ख़तम हो गई थी | ठीक उसी वक़्त | वह वक़्त जो ठहरा हुआ है |

कहाँ रहे इतने दिन ? मैंने प्रश्न दोहराया |

भूतों की खोज में भटक रहा था, उसने पहले की तरह बेपरवाही से कहा |

वे मिले तुम्हें ? मैं बीते दिनों की उपेक्षा संजीदा था |

“नहीं, उन्होंने कहा वे सिर्फ उन्हें मिलते हैं जो भूतो में नहीं मानते” उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा तो डर की एक सिहरन रगों में फिर से दौड़ गई |

फिर से मौन का पसारा, सांसों की चलती ध्वनियाँ, मुझे ऊब सी होने लगी थी; मेरे पास बात बदलने के लिए भी कुछ नहीं था मैंने आंखे मूँद ली, जब आँख खुली तो सर भारी लग रहा था | शायद मुझे नींद आ गई थी | मैं देर तक सोता रहा |

मैंने भी एक सिगरेट जलाकर चाय का कप उठा लिया “तुम किसी और से भी मिले ?”

कोई दूसरा याद नहीं, वह उसी तरह सिगरेट पीता रहा | सिगरेट अब भी त्यों थी |दूसरी जलाई होगी |

तुम्हारे पास कुछ पैसे होंगे ? उसने अचानक पूछा |

ओह, तो यह बात है | मैं मन ही मन सोच कर हंसा और पूछा “कितने?”

दो सौ तीस रूपए |

दो सौ तीस रूपए ? मैंने हैरानी से पुछा |

हाँ, मेरी जेबें बिलकुल खाली है |

मैंने अपना बटुआ उठाकर टटोला, उसमे मात्र एक सौ अस्सी रूपए थे |

उसके हॉस्टल से जाने के बाद अक्सर मुझे कोई सिगरेट मांगता दिखाई देता तो कभी “एक सिगरेट मिलेगी” सुनाई देता | मैं माँ के निर्देशानुसार सुबह-शाम हनुमान चालीसा पढने लगा और इसे hallucination (वहम) समझ नज़रंदाज़ करता रहा | दूसरे लड़कों ने बताया शिशिर हमेशा भूतों के बारे में बात करता था, उसका मन पढाई में बिलकुल न लगता | वह सारा दिन इंटरनेट पर भूतों के बारे में पड़ताल करता रहता, उनसे जुडी कथाओं पर रिसर्च करता और न जाने कौन कौन से तंत्र मंत्र का जाप किया करता | वह कहा करता “एक दिन मैं पूरी दुनिया को यकीन दिलाकर रहूँगा कि भूत होते हैं” |

एक दूसरे लड़के ने बताया भगवान जाने उसपर क्या सनक सवार थी, वह शर्त पर भूतों को बुलाता, अगर भूत नहीं आये तो वह एक सौ अस्सी रूपए देने की बात करता |

हर बार हारता होगा वह पागल, मैंने लापरवाही से कहा |

“नहीं, उसके पास एक शीट थी जिसपर अंग्रेजी में लिखे कुछ शब्द और गिनतियाँ लिखी थी और ठीक बीच में एक सर्किल बना था जिसके आस पास यस और नो लिखा था | सर्किल पर एक उलटी कटोरी रखकर उसपर तीन लोग ऊँगली रख अगरबत्ती जलाकर आत्मा का आह्वान करते थे | जब आत्मा आ जाती तब कटोरी अपने आप ही चलने लगती और पूछे गए सवाल का जवाब देती |”

“तुमने भूत की आवाज़ सुनी थी” मैंने यह प्रश्न तय मानकर पूछा था कि वह कहेगा “नहीं” और हुआ भी ठीक ऐसा ही |

नहीं |

मैं कुछ और कहता इससे पहले ही उसने कहना शुरू किया “दरअसल कटोरी का चलना शुरू होते ही मैं भाग खड़ा हुआ था | शिशिर ने कहा था प्लैंचिट भूत बुलाने का सबसे प्राचीनतम तरीका है | इसके अतिरिक्त भी अन्य कई तरीके हैं, किन्तु सबसे अधिक प्रचलित यही है हालाँकि यह सभी नहीं कर सकते क्यूंकि यह आसान भी नहीं | इसे करने हेतु सर्वप्रथम भूत होते हैं, यह यकीन करना होगा |”

यह प्लैंचिट भी साइंस का कोई नुस्खा होगा, कहकर मैं उठ गया था |

कुछ दिनों बाद मुझे केमिस्ट्री की किताब के बीच एक पर्ची मिली जिसपर लिखा था “जिस दिन तुम भूत के साथ सिगरेट पियोगे, उस दिन एक सौ अस्सी रूपए की शर्त हारोगे, यह वादा रहा” मैंने उलट पुलट कर देखा, इसके अतिरिक्त उस पेज पर कुछ और नहीं लिखा था | मैंने वह पर्ची मोड़कर फेंक दी, लेकिन बाद इसके वह पर्ची दफा ज दफा किसी न किसी किताब में मिलती रही, तंग आकर मैंने उसे जला कर राख कर दिया |

मेरे पास इतने ही है | उसकी तरफ पैसे बढ़ाते हुए मैंने उसे संदिग्ध निगाहों से देखा |

पैसे लेकर वह जाने को हुआ |

“फिर आओगे कभी ?”

“नहीं, अब आना नहीं हो सकेगा | बस तुमसे मिलने की आस थी चला आया” कहकर वह झटके से निकल गया | बाहर सघन अँधेरा था, शायद अमावस की रात थी, मैं उसे जाते नहीं देख पाया |

दरवाजा बंद कर पलटा तो देखा घड़ी चल रही थी | टिक..टिक | समय तीन बजकर बीस मिनट से कुछ आगे बढ़ चुकी थी |

कई बार ऐसा होता है, किसी मशीनरी गड़बड़ी के कारण सुई किसी वक़्त पर अटक जाती है फिर स्वयं चलने लगती है, सोचकर मैंने हाथ घड़ी में वक़्त देखा | हाथ घड़ी भी दीवार घड़ी समान समय बता रही थी | मैं बेतरह झुंझला गया | सर एक अजीब भारीपन से फटा जा रहा था | ऑफिस जाने में अभी काफी वक़्त है, सोचकर सो गया |

ऑफिस पहुच कर भी मन बीती रात की घटना से आजाद नहीं हुआ था, रह रह कर शिशिर का अचानक आ जाना और अचानक से बिना कुछ कहे लौट जाना….सबकुछ बहुत अजीब लग रहा था, उसका सिगरेट पीना, पैसे माँगना और मुझे हैरतजदा छोड़ते हुए बटुवे में मात्र एक सौ अस्सी रूपए ही होना …मेरा सर दर्द से भन्ना उठा ..मैं चाय ऑर्डर कर काम में व्यस्त होने की कोशिश कर रहा था कि एक अनजान नंबर से आये पुरुष आवाज़ ने चौंका दिया “कल ठीक तीन बजकर बीस मिनट की सुबह शिशिर की मौत हो गई, उसकी अंतिम इक्षा थी आपको इत्तला कर दूँ ” |

कल ठीक इसी वक़्त शिशिर मेरे साथ था, मैं हतप्रभ सूखे कंठ से थूक निगलता इतना कह पाया ।

“उसे उनींदी की बीमारी थी, वह महीनों से सोया नहीं था” अब नींद की अनंत यात्रा पर निकल चुका है कहकर फ़ोन रख दिया ।

मैं बेहद हैरान था, दुविधा की स्थिति में तबियत ख़राब का बहाना बनाकर घर आ गया, दरवाज़ा खोलते ही एक पर्ची मिली जिसपर लिखा था “तुमने भूत के साथ सिगरेट पी, तुम एक सौ अस्सी रूपए हार गए, भूत होते हैं” |

भूत होते है | मेरे मुँह से अनायास निकला था !

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One comment

  1. राजेन्द्र सजल

    कहानी पढ़ी किन्तु समझ नहीं आई । जो समझ आया वही है तो फिर अन्धविश्वसों को पोषने जैसा है ।

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