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नवीन चौधरी के उपन्यास ‘ढाई चाल’ का एक अंश

युवा लेखक नवीन चौधरी का दूसरा उपन्यास एक लम्बे इंतजार के बाद आया है। उनका पहला उपन्यास ‘जनता स्टोर’ एक रोमांचक पोलिटिकल थ्रिलर था। दूसरे उपन्यास ‘ढाई चाल’ से भी उसी रोमांच की उम्मीद है। उपन्यास राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुआ है। फ़िलहाल आप अंश पढ़िए-

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सीमा और अज़हर जयपुर होते हुए बिना किसी दिक़्क़त के कोटा में एजाज़ के आदमी के दिए पते पर पहुँच गए। अच्छी कॉलोनी में बने उस घर की चाभी कहाँ रखी है यह अज़हर को पता था। कोटा शहर आईआईटी और मेडिकल की परीक्षा देने वाले बच्चों का तीर्थ है। कुछ बच्चे बारहवीं पास करके वहाँ तैयारी करने पहुँचते हैं लेकिन मेरा बच्चा आईआईटी में पढ़ता है का तमगा लगा के घूमने के इच्छुक माता-पिता उन्हें आठवीं के बाद ही कोटा पहुँचा देते हैं। शहर में पीजी, हॉस्टल, कोचिंग सेंटरों में चौदह से उन्नीस साल के बच्चे पढ़ने आते ही रहते हैं इसीलिए कोई वहाँ ध्यान भी नहीं देता।

सीमा को घर पर छोड़ अज़हर आसपास के बाज़ार और गलियों के चक्कर लगा आया। उसकी माँ ने उसे सिखाया था कि जब भी नई जगह जाओ तो आसपास की जगहों और रास्तों को थोड़ा घूमकर देख लो। कोई काम पड़ने पर इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा। अज़हर खाने का सामान लेता हुआ वापस आया। सीमा डरी हुई घर में दुबकी पड़ी थी।

“हम यहाँ क्यों रुके हैं? मुझे डर लग रहा है कि हम पकड़े जाएँगे।” काफ़ी देर चुप बैठे रहने के बाद सीमा ने अपनी चिन्ता ज़ाहिर की।

“चिन्ता मत कर। बस एक-दो दिन में इन्तज़ाम होते ही यहाँ से निकल जाएँगे।”

“कहाँ जाएँगे?”

“मुम्बई जाएँगे। मैं हीरो बनूँगा, तू हीरोइन बन जाना।”

“बकवास बन्द कर…सच बता। भागते टाइम मैं भाग आई लेकिन अब सोच रही हूँ कि हम करेंगे क्या? कैसे खाएँगे? कहाँ रहेंगे? वापस चलें क्या? घर जाकर बात कर लूँगी, मना लूँगी पापा को।”

सीमा की घबराहट देख अज़हर को चिन्ता हुई। उसे एजाज़ ने सचेत किया था कि लड़की डर सकती है, और वापस आने की बात करेगी। बातों से मनाना और न माने तो उसे ये गोली किसी चीज में मिला के देना। ध्यान रखना कि वो वापस न आने पाए, अगर आ गई तो तुझे कोई नहीं बचा पाएगा। अज़हर ने बातों से मनाने की जगह आसान तरीक़ा अपना लिया और कोक में चुपके से गोली मिला दी।

“चिन्ता मत कर बावली। मेरे बहुत जानने वाले हैं। मुम्बई में नौकरी, रहने, खाने सबका इन्तज़ाम हो रहा है। ले पिज्जा और कोक लाया हूँ, खा ले।” अज़हर ने सीमा के सामने सब खाने को रख दिया।

रात के 2.30 बज चुके थे। अज़हर ने सीमा को तो सुला दिया लेकिन उसे ख़ुद नींद नहीं आ रही थी। वह जल्दी से जल्दी मुम्बई जाना चाहता था। एजाज़ के जिस सम्पर्क ने यह घर दिया था उसका फ़ोन बन्द था। क्या मुम्बई में वाकई उसके लिए इन्तज़ाम कर पाएँगे ये लोग, अगर नहीं कर पाए तो वह क्या करेगा? सीमा को कैसे रखेगा? बदला लेने के नाम पर सीमा को भगा तो लाया लेकिन उसे नुक़सान पहुँचाने का कोई इरादा नहीं था। बदला तो यूँ भी उसके बाप से लेना था जिसने पिटवाया। वह इन्हीं सब विचारों में उलझा था कि बाहर कुछ आवाज़ आई। झाँकने पर कोई नहीं दिखा। अज़हर को लगा कि डर से उसे ऐसा लग रहा है लेकिन फिर कुछ हलचल हुई। इस बार अज़हर ने छत पर जाकर देखा तो नीचे कुछ लोग नज़र आए। दो पुलिस वाले भी एक गाड़ी के पास खड़े थे। उसी गाड़ी से उसे अमित उतरता हुआ दिखा। अज़हर समझ गया कि भांडा फूट चुका है।

एजाज़ ने यह भी कहा था कि अगर लगे कि फँसने वाले हो तो हीरो मत बनना, भाग लेना। वो लोग लड़की को कुछ नहीं करेंगे लेकिन तुझे ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे। अज़हर के मन में सीमा को छोड़कर भागने को लेकर उधेड़बुन थी लेकिन इतने लोगों को देखकर उसके मन में डर बैठ गया। वह एक छत से दूसरी छत, फिर तीसरी, चौथी, पाँचवीं होते हुए एक पोल का सहारा लेकर उतरा और भाग निकला। माँ की सीख काम आई। इन गलियों को वो शाम को ही छान चुका था।

अमित जब अपने आदमियों के साथ कमरे में पहुँचा तो सीमा नशे में बेहोश मिली।

“कल इंस्पेक्टर तुम्हारा और सीमा का बयान लेगा। तुम बेटी के अपहरण की बात कहना और सीमा कहेगी कि अज़हर उसे बेचने की कोशिश कर रहा था। उसे नशे की गोलियाँ देकर वहाँ रखा हुआ था। कोई दिक़्क़त लगे तो सीधे मुझे फ़ोन करना।” डीएसपी अजय सिंह ने रामफूल को समझाया।

साल 2000 से अब तक अजय सिंह और राघवेन्द्र एक-दूसरे को आगे बढ़ाने में सहयोगी रहे। हज़ारा में एसएचओ बनकर आए अजय का कभी ट्रान्सफ़र नहीं हुआ। उसे समय-समय पर कोई ऐसा बड़ा मामला मिल जाता जिसे सुलझाने पर उसका समय से पहले प्रमोशन हो जाता। ये अलग बात है कि प्रायः इन मामलों में दोषी कहीं न कहीं से राघवेन्द्र के धंधे में टाँग अड़ा रहे होते थे।

रामफूल ने कातर निगाहों से अजय को देखा। उसे जवाब न देकर वह राघवेन्द्र की तरफ़ मुख़ातिब हुआ और बोला–“बहुत बड़ा एहसान किया आपने मुझ पर। आप न होते तो जाने क्या करते वो लोग मेरी बच्ची के साथ लेकिन अब पुलिस का चक्कर नहीं चाहिए।”

“बेटी अपनी मर्ज़ी से गई थी न उसके साथ ?” राघवेन्द्र ने रामफूल की आँखों में आँखें गड़ाकर तल्ख़ी के साथ पूछा। रामफूल सहम गया और उसने हामी में सिर हिलाते हुए नज़रें चुराई। राघवेन्द्र बोला–“फिर भी उसको नशे की गोली दी…इसका मतलब समझ रहा है?”

सहमे हुए रामफूल ने हाथ जोड़कर कहा–“लेकिन मुक़दमेबाज़ी से बदनामी होगी। मेरी बेटी भी तो आपकी ही बेटी है। कुछ उसकी ज़िन्दगी का सोचिए।”

“इस इलाक़े की हर बेटी मेरी बेटी है। तू सिर्फ़ अपनी बेटी के लिए सोच रहा है और मैं पूरे इलाक़े की बेटियों के लिए। हुसैन बाप-बेटे के एजेंडे से इलाक़े की हर बेटी को बचाने के लिए ये मुक़दमा ज़रूरी है। तेरी बेटी का नाम बाहर नहीं आएगा। चिन्ता मत कर।”

रामफूल के चेहरे पर बेचारगी झलक रही थी। उसकी बेटी मिल गई वही काफ़ी था।

“कितना एहसान फ़रामोश है तू रामफूल…क्या नहीं किया मंत्री जी ने तेरे लिए और तू अब मुँह फेर रहा है।” डीएसपी अजय सिंह ने रामफूल को अपमानित करते हुए कहा।

अमित ने अजय को चुप होने का इशारा किया और रामफूल को प्यार से समझाया–“अगर हमने कुछ नहीं किया तो कल को तेरी बेटी को ये लोग फिर भगा लेंगे। उन्हें यहीं पर रोकना ज़रूरी है। तू डर मत, मैं बैठा हूँ। जाकर आराम कर, कल बयान देने थाने पहुँच जाना।”

रामफूल के जाने के बाद अजय सिंह ने अमित से कहा–“मैं बता रहा हूँ तुझे, ये भी अपने भाई की तरह धोखा देगा।”

अमित रामफूल की सादगी और ईमानदारी को पसन्द करता था। रामफूल का भाई सतबीर अब इनके गैंग का नहीं रहा, इसके बावजूद सिर्फ़ अमित की वजह से ही रामफूल यहाँ टिका हुआ था। अमित चिढ़ते हुए बोला–“अगर ऐसा हुआ तो मैं पहला आदमी होऊँगा इसको सबक सिखाने वाला।”

अगले दिन के अख़बारों के स्थानीय एडिशन में ख़बर थी–हिन्दू लड़की को प्रेम के नाम पर भगाकर बेचने की कोशिश। लड़की को छुड़ाया, आरोपी अज़हर फरार। पुलिस का कहना है कि हज़ारा में इस तरह का एक गैंग सक्रिय है। पुलिस जल्दी ही अज़हर और उसके गैंग को गिरफ़्तार कर लेगी।

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