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हृषीकेश सुलभ की कहानी ‘तूती की आवाज़’

आज पढ़िए प्रसिद्ध लेखक हृषीकेश सुलभ की कहानी ‘तूती की आवाज़’। करीब 25 साल पहले ‘कथन’ पत्रिका में प्रकाशित यह कहानी आज के संदर्भ में बहुत प्रासंगिक लगने लगी है।

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मुरली बाबू चीख़ते हुए नींद से जागे। वैसे उनके जागने का समय हो चुका था, पर इस तरह कभी नहीं जागे थे वह। उन्हें लगा, जैसे बाघ आकर छाती पर सवार हो गया हो और दहाड़ रहा हो।

“अल्लाह हो अकबर अल्लाह हो अकबर…..अशहदोल्लाह…” की ध्वनि गूँज रही थी। अचानक नींद टूटने की वजह से कुछ देर तक वह समझ ही नहीं पाये कि यह कैसी आवाज़ है।…पर धीरे-धीरे उन्होंने अपनी चेतना पर क़ाबू किया, तब उन्हें पता चला कि यह फ़जर की अज़ान की आवाज़ है। और अपने ही मोहल्ले की मस्जिद से आ रही है।

उनकी साँस तेज़ चलने लगी थी। यह मरज़ उनकी जान के पीछे लग गया है। दिल का मरीज़ होने के कारण तबीयत घबराने लगती है। कोई ऐसी-वैसी बात न हो जाए इस आशंका से मन हमेशा उद्विग्न रहता है। हालाँकि, वह भरसक मस्त रहने की कोशिश करते हैं और रहते भी हैं।…पर अप्रत्याशित कुछ घट जाए, तो सँभलना थोड़ा मुश्किल होता है।… और यह अज़ान की आवाज़ अप्रत्याशित ही थी। सत्तर वर्ष की ज़िन्दगी में पहली बार ऐसी दहाड़ती हुई अज़ान की आवाज़ उन्हें सुनने को मिली। अज़ान की आवाज़ अपनी खास लय के कारण उन्हें हमेशा प्रिय रही है। वह अक्सर इस आवाज़ को राह चलते रुककर ध्यान से सुनते और शब्दों को पकड़ने की कोशिश करते रहे हैं।…पर आज तो यह अज़ान की आवाज़ उन पर वज्र की तरह गिरी है।

मुरली बाबू इस मोहल्ले के काफ़ी पुराने बाशिन्दे हैं। उनके दादा यहाँ आकर बसे थे। उन्होंने छत्तीस साल नौकरी की है। बाईस साल की उम्र में, सन् इक्यावन में सचिवालय के गृह विभाग में क्लर्क के पद पर नौकरी शुरू की और प्रोमोट होते-होते अन्डर सेक्रेटरी के पद तक पहुँचकर यहीं से रिटायर्ड हुए। इन छत्तीस सालों में एक-से-एक ख़ूख़्वार अफसरों को उन्होंने आते-जाते देखा। जटिल-से-जटिल मामलों वाली फाइल साहबों के घर ले जाकर उनसे हस्ताक्षर करवा लेना मुरली बाबू के बायें हाथ का खेल रहा।…पर आज तो जान ही निकल गयी थी। इस अज़ान की आवाज़ ने तो उन्हें दहलाकर रख दिया।

मुरली बाबू ने सामने दीवार में टॅगी घड़ी की ओर देखा। वह आधा घण्टा लेट हो चुके थे। आनन-फ़ानन में दैनिक क्रिया से निवृत्त हुए और टहलने के लिए निकले। सोचा, मस्जिद की ओर ही चलते हैं। देखें तो सही इस लाउडस्पीकर को। ज़रा पता तो करें कि कब आया और कहाँ टँगा है? नबी अहमद होते तो पता चलता। पर वह तो दस दिनों से अपने बड़े बेटे के पास जमशेदपुर जाकर बैठे हैं।

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चौबीस घण्टों में पाँच बार अज़ान की आवाज़ गूँजी और मोहल्ले में धीरे-धीरे चर्चा शुरू हुई। पर इस चर्चा में सबकी रुचि नहीं थी। जब आवाज़ आती, अधिकांश लोग क्षण भर के लिए चौंकते और फिर अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते। धीरे-धीरे लोगों को आदत पड़ गयी।

जब नबी अहमद जमशेदपुर से लौटे, मुरली बाबू ने उनसे लाउडस्पीकर के बारे में पूछा। नबी अहमद ने कहा- “हाँ, सुना तो।..अब मुल्लाओं को अपनी आवाज़ की ताक़त पर भरोसा नहीं रहा। ठीक ही पूछा था कबीर ने…क्या बहरा हुआ खुदाय?”

 “यह आया कहाँ से?” मुरली बाबू ने जानना चाहा।

नबी अहमद खीझ उठे—“तुम तो ऐसे पूछ रहे हो, जैसे किसी क्रिमिनल केस की तफ़तीश हो रही हो।…अरे मुझे क्या मालूम! मैं तो शहर से बाहर था। तुम तो यहीं थे। तुम बताओ। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि यह कहाँ से आया।“

     “तुम मेरी परेशानी समझे बिना मुझ पर नाराज़ हो रहे हो।” मुरली बाबू ने उन्हें समझाना चाहा।

“बोलो, क्या परेशानी है?”…नबी ने अपना स्वर मीठा किया।

   “अब क्या बताएँ? यह आवाज़  छाती पर आकर बैठ जाती है। अचानक हाई पीच से शुरू होती है, सो तबीयत परेशान हो उठती है। चौबीसों घण्टे इस आवाज़  का भय बना रहता है। अज़ान का वक़्त आने से पहले ही मेरा दिल डूबने लगता है कि…।”

“पागल हो गये हो तुम? अज़ान से भला कैसा डर! हाँ, यह अलग बात है कि तेज़ और तीखी आवाज़ का असर पड़ता है….और दिल के मरीज़ पर तो काफ़ी गहरा असर पड़ता है। फ़िक्र मत करो। आदत पड़ जाएगी। मुझे भी यह तमाशा पसन्द नहीं।…पर क्या करें? रहना तो इसी दुनिया में है। अब तो शहर में निकलते डर लगता है।…पर जाएँ कहाँ? शहर के बाशिन्दे ठहरे, सो यहीं मरना-खपना है। अपना कोई गाँव होता, तो चले जाते। वहीं सुकून से रहते।”

“तुम बातें बहुत बनाते हो।” सपनों की दुनिया में दौड़ लगाते नबी अहमद की लगाम खींचते हुए मुरली बाबू बोले-“गाँव में होते, तब पता चलता। लुंगी उठाकर खेतों में बैठना पड़ता और सुबह की सैर के बदले सिर पर गोबर की टोकरी लिये दौड़ते नज़र आते। समझे?… गाँव होता तो चले जाते! हुँह!… नसीब वाले हो कि लायक बेटे हैं और हुनरमन्द बीवी, जो इस उम्र में भी तुम्हारी दाढ़ी को मेहँदी से रँगती हैं।”

ठहाकों के साथ दोनों अलग हुए। मुरली बाबू को आज अच्छा लग रहा था। यही तो है नबी अहमद की ख़ूबी। बचपन की ऐसी लँगोटिया यारी सबके भाग्य में नहीं होती। मुरली बाबू यह सोचते हुए घर लौट रहे थे कि इधर कई दिनों से वह नबी अहमद के घर नहीं गये और ना ही नबी अहमद उनके घर आये। मुरली बाबू ने निश्चय किया कि जाएँगे किसी दिन। अपने यहाँ भी बुला सकते हैं, पर पिछले कुछ दिनों से उनका छोटा बेटा नबी अहमद के आने पर भीतर-ही-भीतर थोड़ा कुनमुनाता है। ऐसा उनको लगता है। हो सकता है, उनका यह सन्देह ग़लत हो।

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थोड़े ही दिनों बाद, एक रात जब मुरली बाबू भोजन के बाद सोने की तैयारी कर रहे थे, उनकी बड़ी बहू कमरे में आयी। पत्नी के गुज़रने के बाद लगभग दस वर्षों से यह दायित्व बड़ी बहू निभाती आ रही थी। वह कमरे में आती। ताँबे के लोटे में पानी रखती। उनके दाँतों का सेट एक छोटी कटोरी के जल में डुबोती। सुबह के लिए एक गिलास में ईसबगोल भिगोकर रखती। उनकी मच्छरदानी बाँधती। फिर चादर ओढ़ाती, पैर छूकर प्रणाम करती और बत्ती बुझाकर बाहर निकल जाती। इसी अवधि में बड़ी बहू से बाबूजी का संवाद होता। बीच में बातें होतीं ज़रूर, पर इस समय बाबूजी परिवार के बारे में पूछताछ करते, सूचनाएँ हासिल करते या फिर आनेवाले कल की अपनी दिनचर्या के बारे में उन्हें कुछ कहना होता, तो कहते। छोटी बहू को फ़ुर्सत कम मिलती थी। वह कामकाजी महिला थी। एक प्राइवेट कम्पनी के दफ़्तर में काम करती थी। ऊपर से पति मिला था क्रोधी, सो बेचारी बच्चों, पति और दफ़्तर में ही उझली रहती। छोटी बहू के जिम्मे बाहर के काम थे। मुरली बाबू की ज़रूरत की चीज़ों का सारा बाज़ार वही करती – ईसबगोल से लेकर कपड़े और दवाएँ तक । जेठ को व्यवसाय से और उसके पति को बैंक से लौटने के बाद दोस्तों के साथ ताश फेंटने से फुर्सत नहीं थी। महीने में एक दिन अपने दफ़्तर से छुट्टी लेकर वह मुरली बाबू के साथ डॉक्टर के यहाँ चेक-अप के लिए जाती। डॉक्टर के यहाँ से लौटते हुए वह श्यामा मन्दिर जाती। गंगातट पर एकान्त में बने इस मन्दिर में मुरली बाबू अपनी पत्नी के साथ आया करते थे। यह जानने के बाद कि यहाँ आना बाबूजी को प्रिय है, वह उन्हें साथ लेकर आने लगी थी। मुरली बाबू पेन्शन का पैसा अपने पास नहीं रखते थे। दोनों बेटों को एक-एक बेटी थी। पैसे अपनी पोतियों के नाम रेकरिंग डिपॉजिट के खाते में डालते और एक निर्धारित राशि अपनी बेटी के नाम भेज देते। बेटी के दिन तंगहाली में कट रहे थे।

     दामाद वयस्क शिक्षा में थे और इन दिनों छँटनीग्रस्त कर्मचारियों में शामिल थे। बड़ी बहू ने उनके सोने की व्यवस्था को ठीक-ठाक करने के बाद कहा- “बाबूजी!”

     “हाँ बेटी, बोलो।” मुरली बाबू ने आँख मूँदे-मूँदे बहू को बात कहने की अनुमति दी।

     “कल सुबह टहलकर ज़रा जल्दी लौट आते, तो अच्छा रहता।” बहू ने आग्रह किया।

“क्यों? देर हो जाती है क्या?” मुरली बाबू ने पूछा।

     “नहीं, देर तो नहीं होती। सिर्फ़ कल जल्दी आ जाते… ।”

“कल कुछ होनेवाला है क्या?”

      “जी, कल शिवालय में सुबह से अष्टयाम कीर्तन है। मुझे और छोटी, दोनों को जाना है। कीर्तन शुरू होने से पहले पूजा होगी। पूजा में शामिल होकर हम लोग आठ बजे तक लौटेंगे। तब तक आपके नाश्ते में देर हो जाएगी।… और घर में भी कोई नहीं होगा। सब लोग जा रहे हैं। बच्चे और ये दोनों भी…।”

“वाह! मुझ बूढ़े को छोड़कर इस घर में सब-के-सब ईश्वर के भक्त हो गये। …ठीक है। मैं जल्दी ही लौट आऊँगा। घर को अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा। … हाँ, रही बात नाश्ते की, तो इतनी सुबह मैं नाश्ता करूँ और तुम लोग भूखे पेट रहो, यह भला कैसे होगा?… तुम सब लौटना, तभी नाश्ता करूँगा। उतनी देर तक भूखा रहूँ, तो शायद तुम लोगों के पुण्य का थोड़ा हिस्सा मेरे खाते में भी जमा हो जाए।” मुरली बाबू ने हँसते हुए अपनी बात समाप्त की।

बहू को भी हँसी आ गयी। एकाएक मुरली बाबू को यह जानना ज़रूरी लगा कि आखिर यह अष्टयाम कीर्तन क्यों? उन्होंने बहू से पूछा- “बहू! अचानक अष्टयाम कीर्तन का प्रोग्राम कैसे बन गया ?”

   “बाबूजी, शिवालय के लिए लाउडस्पीकर का सेट ख़रीदा गया है। पूरे मोहल्ले ने चन्दा करके ख़रीदा है। काफ़ी चन्दा जमा हो गया था, सो सबने सोचा कि अष्टयाम कीर्तन करवा लिया जाए। लाउडस्पीकर का उद्घाटन भी हो जाएगा और … ” बहू चुप लगा गयी। उसे लगा, बाबूजी झपकी ले रहे हैं।

मुरली बाबू को लगा, वह कुम्हार की चाक पर मिट्टी के लोंदे की तरह पसरे हैं और चाक तीव्र गति से घूम रहा है। उनका माथा चक्कर खा रहा था। वह उठना चाह रहे थे, पर उठ नहीं पा थे। बहू ने सोचा, बाबूजी बातें करते-करते सो गये। उसने पाँव छूकर प्रणाम किया और बत्ती बुझाती हुई बाहर निकल गयी।

मुरली बाबू ने मन्दिरों में देव-प्रतिमाओं की स्थापना के समय प्राण-प्रतिष्ठा की पूजा-अर्चना के बारे में तो सुना था, पर लाउडस्पीकर की स्थापना के समय पूजा और कीर्तन के बारे में जानकर भौंचक थे। उन्हें नींद नहीं आ रही थी। वह सारी रात जगे रहे। करवटें बदलते रहे। आरम्भ होने से पहले ही अष्टयाम कीर्तन की ध्वनि उनके कानों में बज रही थी।

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मुरली बाबू सुबह देर से उठे। फ़जर की अज़ान के बाद तो नींद ही आयी। आँखें अभी लगी ही थीं कि बड़ी बहू ने जगाकर पूछा- “बाबूजी, घूमने नहीं जाएँगे? तबीयत तो ठीक है?”

“हाँ, ठीक है। आज घूमने का प्रोग्राम कैन्सिल । तुम लोग शिवालय जाओ।” जम्हाई लेते हुए मुरली बाबू ने कहा। सब उनके उठने से पहले ही तैयार थे। जाने लगे, तो उन्होंने पूछा- “मन्नू कहाँ है? वह नहीं जा रहा है?”

“मन्नू तो वहीं है। सारी रात मन्दिर की सजावट चलती रही है। उसके दोस्तों ने ही चन्दा जमा किया है। इस बार कीर्तन के इन्तज़ामकर्ता ये लड़के ही हैं।” बड़ी बहू ने उत्साह के साथ अपने बेटे के बारे में सूचना दी।

मन्नू बी.ए. में थे। पिछले कुछ दिनों से मन्नू की दिनचर्या को लेकर मुरली बाबू आशंकित थे। मन्नू का दिन-दिन भर ग़ायब रहना और देर रात गये लौटना, उन्हें चिन्तित करता था। मुरली बाबू को लगा, उनकी आशंका सही साबित होने जा रही है। सबों के जाते ही मुरली बाबू नित्य-क्रिया से निवृत्त हुए और अख़बार लेकर बरामदे में बैठ गये। बेमन अख़बार के पन्ने पलटते रहे। कुछ देर बाद ‘कूँ-काँ-की’ की आवाज़ गूंजी। इसके बाद-“हलो माइक टेस्टिंग… माइक टेस्टिंग… वन-दू-थ्री-फोर…माइक टेस्टिंग… माइक टेस्टिंग…।”…और फिर गूँजी मन्त्र-ध्वनि-   “गजाननमभूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्… उमासुतं शोकविनाशकारकम् नमामि विघनेश्वर… ।”

नबी अहमद ने बुद्धमूर्ति चौक के पास पहुँचकर इन्तज़ार किया, पर मुरली बाबू नहीं पहुँचे। नबी अहमद ने सोचा, हो सकता है कुछ पहले आ गये हों वह। पर काफ़ी इन्तज़ार के बाद भी जब मुरली बाबू नहीं आये, उन्हें लगा, हो सकता है मुरली बाबू ही यहाँ पहले पहुँचे हों और टहलते हुए आगे निकल गये हों। अमूमन ऐसा होता तो नहीं, पर…।

नबी अहमद आगे बढ़े। निर्धारित लक्ष्य तक टहलते गये और वापस आये। …पर मुरली बाबू नहीं मिले। उन्हें चिन्ता हुई। कहीं तबीयत न बिगड़ गयी हो! दिल के मरीज़ ठहरे। पिछले कुछ दिनों से लाउडस्पीकर के चलते परेशान चल रहे हैं। उन्होंने निर्णय लिया कि टहलते हुए मुरली बाबू के घर हो लेना अच्छा रहेगा। नबी अहमद रास्ता बदलकर मुरली बाबू के घर की ओर बढ़ते हुए भुनभुना रहे थे-“यह दुनिया भी अजीब है।… हर रोज़ नयी मुसीबतें… । अब यह कमबख्त लाउडस्पीकर आकर छाती पर सवार हो गया…।”

नबी अहमद रिटायर्ड इन्स्पेक्टर ऑफ़ स्कूल्स थे। अपने ज़माने में शिक्षा विभाग में काफ़ी रोबदाब और रसूखवाले आदमी माने जाते थे। आज़ाद ख़याल और हमेशा दूसरों की मदद करने को तत्पर रहनेवाले नबी अहमद ने लगभग चालीस साल पहले अपने अब्बा से ख़िलाफत करके प्रेम विवाह किया था। उनकी बेगम प्राइमरी मदरसे में टीचर थीं। रिटायरमेंट के बाद ख़ुशहाल ज़िन्दगी थी। बच्चे पढ़े-लिखे और सलीक़ेदार थे और अच्छी नौकरियों में लगे थे। बड़ा बेटा टाटा में इंजीनियर, मँझला बैंक में और छोटा कॉलेज में उर्दू पढ़ाता था। मियाँ-बीवी दोनों को पेन्शन मिलती थी और पुश्तैनी मकान तो था ही। नवी अहमद के दोस्तों की संख्या काफ़ी थी। मुरली बाबू बचपन के दोस्त थे और बुढ़ापे में सुबह की सैर के पार्टनर। ऐसे ही शाम की महफ़िल के अलग दोस्त थे, जिनके साथ बैठकर वह राजनीति से लेकर अदब तक पर वह बातें किया करते थे। उन्हें मोहल्ले में काफ़ी ज़िन्दादिल और समाजी व्यक्ति के रूप में जाना जाता था।

नबी अहमद गेट खोलकर दाख़िल हुए तो मुरली बाबू की नज़र उन पर पड़ी। भीतर आते हुए नबी अहमद बोले- “वाह जनाब! आप यहाँ बरामदे में बैठे पूरे जहान की ख़बरें टटोल रहे हैं और मैं आपके लिए सड़कों की ख़ाक छानकर लौट रहा हूँ। …क्या हुआ?… अच्छे तो हो?”

“हाँ, ठीक हूँ। आओ, बैठो। मुरली बाबू ने कहा।

     “सैर के लिए नहीं निकले?”

 “नींद ही नहीं खुली। समझो, रात भर नींद आयी ही नहीं और सुबह ठीक उठने से पहले आँख लग गयी।… और फिर सारा घर पुण्य कमाने शिवालय गया है, सो घर की रखवाली भी मेरे ज़िम्मे है।” मुरली बाबू जबरन मुस्कराने का प्रयास कर रहे थे।

“हाँ, आज तो ख़ूब गहमागहमी है। लगता है, शिवालय में भी लाउडस्पीकर आ गया।”

“आना ही था। नबी यार। मैं अब बचूँगा नहीं।”

“अजीब अहमक़ हो तुम! बिना बात का बतंगड़ बना देते हो। नाहक परेशान हुए बैठे हो। जो हो रहा है, होने दो। कौन हमें सौ-दो सौ सालों तक जीना है कि फ़िक्र करें। जिन्हें जीना है, वे अपने हाथों गड्ढा खोदकर दफ़न होने को तैयार हैं और तुम हो कि… ।”

नबी अहमद ने झिड़कते हुए उन्हें समझाना चाहा। दोनों कुछ देर चुपचाप बैठे रहे। शिवालय से आती मन्त्र-ध्वनि गूँज रही थी। मुरली बाबू के सिर में भयानक पीड़ा हो रही थी। कलेजे की धड़कन भी तेज़ थी। रात की अनिद्रा ने पहले ही चूर-चूर कर दिया था और ऊपर से लाउडस्पीकर पर गूँजती यह मन्त्र-ध्वनि उन्हें लगातार मथे जा रही थी। उन्होंने आँखें मूँद लीं। उन्हें लगा, मानो दसों दिशाओं से मन्त्रोच्चार करते हुए कापालिक चले आ रहे हों…हाथ में लहू छलकाते खप्पर लिये…, जटाएँ खोले…, लावा उगलती आँखों से घूरते…., विचित्र भंगिमाओं में नृत्य करते। उन्हें पसीना छूटने लगा। नबी अहमद उनकी हालत देखकर परेशान हो उठे। उठकर उनके बिल्कुल क़रीब आये। उनका कन्धा पकड़कर झकझोरते हुए आवाज़ दी- “मुरली! मुरली…!

     मुरली बाबू ने आँखें खोलकर नबी अहमद की ओर देखा। उनकी आँखों में भय था और चेहरा ज़र्द पड़ता जा रहा था। घर में कोई था नहीं। नबी अहमद भीतर भागे। गिलास में पानी लेकर लौटे। मुरली बाबू को पानी पिलाया। माथा और पीठ सहलाते रहे। थोड़ी देर बाद मुरली बाबू की चेतना लौटी।

 लाउडस्पीकर पर मन्त्र ध्वनि रुक गयी थी। कीर्तन शुरू हो चुका था। अब चारों तरफ़ गूँज रहा था- “हरे राम हरे राम… राम-राम हरे-हरे…।”

     “कीर्तन शुरू हो गया।” मुरली बाबू ने धीरे से कहा।

     “चौबीस घण्टों तक चलेगा?” नबी अहमद ने पूछा।

     “हाँ, अखण्ड। बिना रुके।… अब जल्दी ही लौटेंगे सब।” मुरली बाबू ने बहू-बेटों के जल्दी आने की आशा प्रकट की।   शिवालय पास ही था। सब जल्दी ही लौट आये। नबी अहमद को बाबूजी के साथ बैठे पाकर सब अचानक असहज हो गये। बहुएँ, बच्चों के साथ भीतर गयीं। छोटे भी नहीं रुके। मन्नू लौटा ही नहीं था। बड़े दोनों के पास आकर बैठ गये।

“अच्छा, मुरली अब मैं चलता हूँ।” नबी अहमद ने उठते हुए कहा। बच्चों का नमस्कार नहीं करना उन्हें आहत कर गया था। वे बड़े से बोले- “बेटा, इनकी तबीयत थोड़ी गड़बड़ लग रही है। डॉक्टर से चेक-अप करवा लेना।”

   मुरली बाबू उठने लगे, तो उन्होंने उठने नहीं दिया। गेट खोलकर भारी क़दमों से बाहर निकल गये ।

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मुरली बाबू की डॉक्टरी जाँच हुई। जो पहले से थी, उसे छोड़कर कोई नयी बीमारी नहीं निकली। डॉक्टर ने कहा कि एंग्जाइटी है। आराम करने, प्रसन्न रहने तथा सुबह की सैर और पुरानी दवाएँ जारी रखने की सलाह के साथ मुरली बाबू डॉक्टर के यहाँ से लौटे।

सुबह की सैर और दवाएँ पहले से जारी थीं। आराम के सिवा उनके पास करने को और कुछ था ही नहीं। रही बात प्रसन्न रहने की, तो यही नहीं हो पा रहा था। वह गुमसुम रहने लगे थे। इन दिनों लाउडस्पीकरों की प्रतिस्पर्धा ज़ोरों पर थी। एक रात मस्जिद के सहन में मिलाद का आयोजन हुआ। उधर फ़जर की अज़ान शुरू होती और इधर हनुमान चालीसा का पाठ। उधर मामला कुछ दिनों तक पाँचों वक़्त की नमाज़ से पहले अज़ान तक ही सिमटा रहा, पर इधर सुबह-शाम दो-दो घण्टे हरिओमशरण और अनूप जलोटा वातावरण को आच्छादित किये रहते थे। फिर एक दिन उधर भी नातिया कलाम और हम्द के कैसेट्स आ गये। मुरली बाबू को लगता, उनका मोहल्ला किसी दुर्गम जंगल में बदल गया है, जहाँ सिर्फ भयावह पशुओं के दहाड़ते-गरजते झुण्ड रहते हैं। उनकी हालत दिन-पर-दिन गिरती जा रही थी। हालाँकि, उन्होंने सुबह की सैर को जारी रखा था। सैर की इच्छा में इन दिनों नबी अहमद से मुलाक़ात का लालच ही प्रमुख था। टहलते हुए दोनों चुप ही रहते थे। बातें कम होतीं। फिर भी, साथ-साथ टहलने की इच्छा के चलते मुरली बाबू ने सुबह की दिनचर्या को भंग नहीं किया था।

टहलते हुए, एक सुबह मुरली बाबू ने नबी अहमद से कहा- “नबी! एक आईडिया है। सुनोगे?”

“हाँ बोलो।”

“ये लाउडस्पीकर चोरी नहीं हो सकते?”

 “चोरी!” नबी अहमद चौंक गये।

“हाँ, चोरी।… मैं सोचता हूँ कि हम लोग किसी चोर को ठीका दे दें कि वह दोनों लाउडस्पीकर ग़ायब कर दे।”

“वे फिर खरीद लेंगे।”

“हम फिर चोरी करवा देंगे।”

“ऐसा कब तक चलेगा ?”

“जब तक हम ज़िन्दा रहेंगे।”

“चोर पकड़ा भी तो जा सकता है।”

 “नहीं, हम टॉप क्लास का प्रोफेशनल चोर ढूँढ़ेंगे।”

“फिर भी, यदि वह पकड़ा गया और उसने यह भेद खोल दिया, तो?”

     “हम शहर छोड़ देंगे। तुम बेटे के पास जमशेदपुर चले जाना और मैं बेटी के घर चला जाऊँगा।

“तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है।…तुम ऐसा करो किसी अख़बार में इश्तहार दे दो कि ज़रूरत है एक सत्तर साल के बुड्ढे के लिए लाईफ़ पार्टनर की। कोई बुढ़िया मिल ही जाएगी। तुम्हारा दिमाग़ उलझा रहेगा। ख़ाली दिमाग़ शैतान का डेरा”

   “मज़ाक़ नहीं। सीरियसली कह रहा हूँ नबी।” मुरली बाबू सचमुच गम्भीर थे। वे बोले-“क्या हम इतने लाचार हो गये हैं कि कुछ नहीं कर सकते?”

     “ठीक है। तुम चोर को ढूँढ़ो। होम डिपार्टमेण्ट में काम किया है तुमने। पुलिसवालों से अच्छी जान-पहचान है तुम्हारी । चोरों का पता पुलिस ही दे सकती

है। पूछो किसी से पता करो। जो ख़र्च आएगा, हम दोनों आधा-आधा शेयर करेंगे।” नबी अहमद तैयार हो गये। सोचा, इसमें उलझकर शायद मन बदल जाए मुरली बाबू का।

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अगले दिन की सुबह बुद्धमूर्ति चौक के पास खड़े होकर नबी अहमद प्रतीक्षा कर रहे थे। कल उन्होंने टालने की गरज से चोर वाली बात पर हामी भर ली थी, पर आज… । मुरली बाबू आते हुए दिखे। पास आये तो नबी अहमद ने पूछा- “तबीयत कैसी है?… आज देर हो गयी?”

     “अब तबीयत का क्या… बस ठीक है। आजकल नींद नहीं आती है।” मुरली बाबू ने कहा।

 नबी अहमद चुप लगा गये। दोनों चुपचाप टहलते रहे।     राजेन्द्र नगर पुल के पार जाना और लौटना। लौटते हुए पुल के मध्य में रुककर ऊँचाई पर बहती थोड़ी शुद्ध हवा फेफड़े में भरना… लम्बी-लम्बी साँसें लेना छोड़ना – यह रोज़ का नियम था। वापस होते हुए पुल के मध्य में पहुँचकर जब दोनों रुके, नबी अहमद ने कहा- “कल मैं वकील के यहाँ गया था।”

     “क्यों?… क्या हुआ?” मुरली बाबू ने आतुरता से पूछा।

“बताता हूँ। तसल्ली रखो।… हमारे छोटे साहबजादे के एक दोस्त हैं-वकील साहब। इस लाउडस्पीकर वाले मसअले पर बातचीत के लिए उनके पास गया था। सोचा, दरियाफ़्त करूँ कि कोई क़ानूनी मामला बनता है या नहीं?”

 “क्या कहा वकील ने?” मुरली बाबू जल्दी से जल्दी सब कुछ जान लेने के लिए बेचैन थे।

“शोर करने के ख़िलाफ़ मामला तो बनता है… पर उसने कहा यह मामला मस्जिद और मन्दिर से भी तआल्लुक़ रखता है।…कोर्ट आजकल ऐसे मुक़दमों को जजमेण्ट रिजर्व करके सालों-साल लटका देता है। वकील बता रहा था कि शायद कोई ऐसा मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट में लटका हुआ है।…फिर उसने कहा कि इससे भी बड़ी बात यह है कि आप दोनों अपने मोहल्ले में विलन बन जाएँगे। सब मिलकर आप दोनों की फज़ीहत करेंगे। हो सकता है, लोग सोशल बायकाट भी कर दें। …. बुढ़ापा तो वैसे ही अपनों के बीच बेगाना कर देता है। फिर ऊपर से यह मुसीबत …वकील की राय थी कि हमें इस झंझट में नहीं पड़ना चाहिए।…सुन रहे हो?” नबी अहमद ने मुरली बाबू को गुमसुम पाकर पूछा।

 “हाँ, सुन रहा हूँ।” मुरली बाबू बुदबुदाये।

“तुमने क्या किया?… चोर को ढूँढ़ा?” नबी अहमद ने पूछा।

“हाँ, कल कुछ लोगों से मिला था।”

“कहाँ?…किन लोगों से?”

“यहीं। ठीक इसी पुल के नीचे कल दिन में आया था। मुझे मालूम था कि यहाँ नीचे चाय की दुकानों में इस इलाक़े के शराबी जुआरी और चोर-लफंगे जमावड़ा लगाये रहते हैं। चाय पीने के बहाने बहुत देर तक बैठा रहा। कुछ लोगों से बातें हुई। सब कम उम्र के लौंडे थे।”

 “क्या बातें हुई ?”

“मैंने कहा, दोनों लाउडस्पीकर खोलकर कहीं बेच दो। इस काम के लिए मैंने हज़ार रुपये तक का ऑफर दिया, पर… ।”

     “पर?… पर क्या कहा उन लोगों ने?”

“सब मुझे पागल समझने लगे। पहले तो ख़ूब मज़ाक उड़ाया। फिर समझा-बुझाकर हटाना चाहा। … मैं ज़िद करने लगा, तो बोले, बुड्ढे… बहू-बेटों की हत्या करवानी हो तो बोल गोली मार आयें, पर यह काम नहीं हो सकता।… मैं गिड़गिड़ाया, तो नाराज़ हो गये सब। कहने लगे, भाग बुड्ढे, नहीं तो पुलिस बुलाकर अन्दर करवा देंगे।…साला, दंगा करवाएगा क्या?…क्या ज़माना है। चोर-लफंगे पुलिस बुलाने की धमकी दे रहे थे।… मैं रुआँसा होकर चलने लगा, तो एक बोला,…बाबा, हम लोग चोरी करते हैं पर भगवान् के घर में नहीं।… हाँ, भगवान् को ज़रूर चुरा सकते हैं, अगर वह सोने-चाँदी का बना हो। जाओ बाबा…घर जाओ।… वह थोड़ा पढ़ा-लिखा लग रहा था।”

मुरली बाबू चुप लगा गये। उनकी आँखें नम हो चुकी थीं। पहले हिचकी फूटी और आँखों से आँसू बहने लगे। नबी अहमद को काठ मार गया था। वह भी लगभग संज्ञाशून्य थे। दोनों कुछ देर तक वहीं खड़े रहे। पुल के इस मध्य भाग से उनके मोहल्ले का आसमान दिख रहा था। शिवालय और मस्जिद के शिखरों पर बँधे लाउडस्पीकरों की आकृतियाँ साफ-साफ दिख रही थीं। चारों तरफ ध्वनियाँ थीं… मरे हुए पशु को देखकर आसमान में हर्षोन्माद से उड़ते गिद्धों की हर्षध्वनियाँ। किसी लुप्त हो रही आदिवासी बस्ती के अन्तिम- जर्जर-मरणासन्न वृद्धों की तरह उन्होंने बेबस आँखों से आसमान को देखा।

 
      

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