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प्रिया वर्मा की पाँच कविताएँ

आज पढ़िए युवा कवयित्री प्रिया वर्मा की कविताएँ। अंग्रेज़ी से एमए प्रिया वर्मा सीतापुर में रहती हैं और स्वतंत्र लेखन करती हैं। इनकी कविताओं में ताज़गी दिखाई देती है-
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१- कवि में समय की दृष्टि
 
अनायास ऐसे जागती है कि वह मृत्यु से प्रेम करते हुए लिखता है ललित पद्य
 
और मृत्यु!
 
कवि में
समय की दृष्टि को सिद्ध करने
उसी के प्रिय को ले भागती है।
 
न मृत्यु भगोड़ी है और न ही कवि का कोई प्रिय
 
त्रासदी यह है
कि शब्द अपने उच्चारण में अर्ध
और घटित होने पर ही पूरे समझ आते हैं
 
मृत्यु में लेशमात्र विदा नहीं है
मृत्यु आघात से बढ़कर है
सरल रेखा नहीं है मृत्यु
एक बिंदु है
जिसके बनने की घटना में पूर्णत्व है।
विराम नहीं वह अंत है।
क्योंकि विराम के बाद सम्भावना शेष है। और अंत के बाद –
कुछ नहीं।
 
जैसे जवान फूल
शाम तक खिला रहने की जीवटता से भरा और मुरझाए बिना
 
किसी वानर के हाथों मसल कर खा लिया गया हो।
 
 
२- मयूरी के पंख
 
 
क्षीण हो जाते हैं जब हमारे दृश्य के सहायक स्नायु
तब अनायास कोई स्मृति जागकर
कन्धों को झंकझोरती है।
कि पहचान लो। वह
अपने लिए उचित अनुचित का विवेक त्याग
न्याय की मांग करती है
 
ऐसी एक स्मृति
मुझ में ठीक तीन दशक बाद जाग उठी
जब मैंने जाना कि
सब से प्रथम प्रेम शायद माँ के स्तनों से किया गया था
सब से पहली इत्र दूध की धार से फूटती थी
शैशव के तलवों को धरती पर टिकाए
नन्हीं सहोदरी को
पहली बार निहारती
वह बच्ची याद आई
जो भीड़ में
कैसे न कैसे खो दी गई?
 
उस बच्ची के साथ खोया
वह कटहल वाला बाग
सरकारी जिला हस्पताल
स्प्रिट वाली गंध
गाढ़े हरे परदे
टनटन घण्टी वाला तिपहिया सवारी रिक्शा
चलने वाला कमरे जैसा बिस्तर
अंधेरे में माँ का आंचल का कोना
जहाँ दुबकी हुई वह बच्ची अंतिम बार देखी गई।
 
यह स्मृति अकेले क्यों नहीं जागती?
बहुत मनोमालिन्य साथ लाती है
लौटती क्यों नहीं?
उस ताज़े खौले दूध की याद पर गाढ़ी मलाई-सी जम क्यों जाती है?
 
अथक अनवरत चलती रातों की नींद से सहलाती है
अपने जलते हुए तलवे
 
 
जैसे एक नवजात के पैर होते हैं
छुए भी अनछुए भी
और जैसे तैरती है शिशु-वदन पर मुस्कान
ऐसे उभरती है दशकों की पीड़ाओं की
नीली काली आवाज़
जो लाल हो उठती है आँख के तंतुओं में
 
कहती है –
आदि मानव की-सी खोज करो!
अब तो खोज निकालो उस बच्ची को!
 
क्यों छोटी हथेली को इतना ढीला थामा
कि तुमने उस को खो ही दिया!
 
अब वह कहाँ मिलेगी?
यत्न से खोजो उन तारीख़ों में
दूर तक माला के जंगल में घूमने जाओ
शायद तब
किसी भटकते हुए दिन के इतिहास में देख पाओ
कि
दोपहरें इतनी लपटें क्यों बरसा रही हैं?
क्यों बारिशें लम्बे इन्तज़ार के बाद भी उतना नहीं भिगोतीं?
मयूरी के पंख दिनोंदिन छोटे क्यों हुए जा रहे हैं?
 
 
३- ‘मोह-मोह के धागे’
 
क्यों गा रही है पड़ोस में, तरुणी,
मोनाली ठाकुर का
मोह मोह के धागे …
उसी एक लय के बंधन, उसी ठहराव, उसी स्वर की नकल में !
क्या उसके पास अपनी आवाज़ नहीं है?
कहने के लिए नहीं है क्या उसकी शैली में अपना थोड़ा भी
जीवन अनुभूति और प्रेम!
रटा नहीं क्या चैती, कजरी में मथा हुआ विरह
नैहर में उठाए दोयम दुःख को सुख की तरह
गाने और दुहराने का नहीं मिला अन्यत्र अवसर!
 
क्या वाक़ई इतना विलंबित है जीवन-
-अनुभव में विवेक
कि एक छाया साम्य भर
दे सकता है
क्षण के किसी अंश में घनी
समानुभूति
एक सी भोगी यंत्रणा की
 
कि कहानियों के कथानक में चुपके से
अपने आप को रख कर
फिर से समय को छू सकने तक कुरेदा जाए
 
 
महसूस होने पर कि यहाँ सघन है अंधकार
कि बरसने तक नहीं रख सकेगा धैर्य
फिर भी टाल दिया जाए
और बरसने के लिए किया जाए
इन्तज़ार, चातुर्मास का!
किसी पर्व की तरह!
 
कहीं निगल न जाए यह तरल
हवा में घुल कर जो बढ़ रहा है!
 
सुनाई देता है कि
लभ्य देह में हो चुका है आरम्भ
फफूंद जमने का
प्रकृति को लग चुकी है भनक
श्रेष्ठतम नस्ल की सभ्यता की
परंपरागत और सड़ गल चुकी सोच की!
 
कानाफूसी के माध्यम से जो होती रही
क्रमिक अग्रसारित
इसी से दूर हो कर कमज़ोर पड़ गई अर्थ से अस्ल बात
 
झड़ जाते हैं ज्यों कलाबत्तू के कशीदे के तार
झीना हो जाता शुद्ध रेशम का खानदानी पोशाक और
कुंदन के जेवर, चांदी के पात्र भी
एक से दूसरे के हाथ में देने के बाद तीसरे चौथे तक रहते हैं पवित्र
फिर मलिन पड़ जाते हैं
मुखों से चली जाती है नस्लीय आभा
जबकि एक ही था वह
हर यूनानी का बेटा सिकंदर नहीं होता
न भिखारी के बच्चे के हस्ताक्षर से पहचाना जाता है अतीत
 
अस्ल बात,
पर छुपे छुपे नंग धड़ंग लड़कियाँ अब बेची नहीं, देखी जाती हैं
दास प्रथा के मिटने पर भी बचे रहते हैं कोने में अलग रखे कुछ बरतन
दास बनने और बनाने की आदत नहीं मिटती
 
देख रही है पूरे कपड़ों में एक लड़की
फिर से इस साल एक नया निमंत्रण आएगा
फिर एक लड़की कर लेगी सायास
असंगत लड़के से विवाह
फिर पनपेगा अवसाद
और यह कभी नहीं थमेगा
 
लड़कियाँ इसी तरह गीतों को नकल कर के गाती रहेंगीं
करती रहेंगी अभ्यास
अकेलेपन के दिनों में, इस तरह
कि समबुद्धि वयस्क सुने
और सोचे देर हो चुकी खासी
 
दुःख भरी आवाज़ की चाल धीमी है बड़ी
कान तक आने में!
सो कण्ठ स्वर मधुर है
 
 
४- म्लेच्छ
 
वह शब्द जो मुझसे परिचय करवाया गया
शब्दकोश में खोजने से पहले, जीवन-विस्तार में
शब्दकोश में लिखे अर्थ से दूजे अर्थों में
हाड़ मांस मज्जा और धड़कते जिस्म में
शतरंज के चौखाने का रुमाल लपेटे
 
मेरे भीतर घृणा ठूंसी गई
जैसे मैं पुरानी सूती धोती थी
और गठरी बांधी जा सकती थी
विचार की, धर्म की और समाज की धारणाओं की
 
मुझे इंगित करके बताया कि कौन होते हैं म्लेच्छ?
और कैसे बचना है उनके संसर्ग से?
 
वे उठा ले जाएंगे बहुओं और बेटियों की सूरत वाली चिड़ियों को प्रेम का दाना डाल कर
मानो वे म्लेच्छ से अधिक हों चिड़ीमार
फिर बेच आएंगे नक़ाब ओढ़ा कर पहना कर
 
लेकिन किसी ने नहीं बताया कि उन चिड़ियों के खरीददार कहाँ से आते हैं
और कौन तुम्हें बता जाता है कि वे कब और कितना नहाते हैं?
और अगर नहीं भी नहाते
करते हैं पांचों वक्त नमाज़ से पहले वज़ू
तो तुम आख़िर कौन सा पुण्य कमा कर बचे रह जाते हो
स्त्रियों के प्रति सम्मान रखकर!
तुम उन्हें कितना चाहते हो!
कितना उद्धार करते हो ऐतिहासिक पतिताओं का!
तुम तो अपना शब्दकोश तक नहीं सुधार पाते!
 
सदियों से उन्हें कहते आ रहे हो म्लेच्छ
और वे तुम्हारा लिखा इतिहास कर लेते हैं स्वीकार
वे नहीं रखते ज़िद कि उनके दादे परदादे अरबी घोड़ों पर सवार नंगी तलवारों के साथ नहीं आए थे
वे चुपचाप दुकानें खोलते हैं बावज़ूद इसके कि
तुम्हारे मोहल्लों में उन के ज़मीन खरीदने से
पैदा होती है सनसनाहट
संदेह और हावी होने की हवा
 
वो रेहड़ी गुमटी या पंक्चर की दुकानों के अलावा
मज़ारों पर फूंक डाल तुम्हारे बाल बच्चों
की निगहबानी में नहीं बरतते दुराव
खजूर केवल उनका ही पेटेंट स्वाद नहीं है
 
रमज़ान के दिनों में मद्दा फल बेचते हुए
तुम से नहीं रखते किसी तरह की होड़
दामों की
जो नवरात्रि के आते ही फलों और सब्जियों में तुम आग लगाते हो
 
ये बात और है कि एक दफ़्तर में काम करते हुए
तुम खाने का डब्बा उनसे नहीं बदलते
 
वे ठहरे म्लेच्छ
तुम्हारी दावतों में वही खाएंगे जो तुम्हारी संस्कृति को गवारा होगा
 
आख़िर उन्होंने तो तुम्हें कभी स्वार्थी नहीं कहा
तुम्हीं ‘म्लेच्छ-म्लेच्छ’ कहकर अपने भीतरी समाज में
अभिजात्यता का आवरण ओढ़ाते हो।
 
वही म्लेच्छ जब अस्पताल में देखते हैं मरीज़
तो बिना जात और धर्म की परख किए
बोतल भर खून निचोड़ कर देह में लाली भर आते हैं।
 
तुम उन्हें हरे रंग में पहचानते हो ।यह भूलते हुए
कि सारी पत्तियों का रंग हरा है
 
वही हरा रंग जिससे तुम देह में ठंडी साँस भर पाते हो।
और दुनिया को गर्म बनाते जाते हो।
 
 
५- आलिंगन
 
क्योंकि इस विधा में
सदेह मन रोंपती हूँ मैं
तन की भूमि पर, तुम्हारे
 
इस उम्मीद में कि ऋतु बदले
देर में नहीं, अभी इसी पल
बर्फ़ पिघल जाए; और किसे पता कि
आज अभी में, बसंत आ जाए
 
एक झरोखे से मैं तुम्हारे भीतर
अपनी अनसुनी प्रतिध्वनि सुन सकूँ
क्या पता तुम्हारा एक क्षण मुझे छू जाए!
 
आलिंगनबद्ध
नेत्रों की छांव में नहीं कर पाती भेद
तुम में और शिशु में
नहीं चीन्हती तुम्हारे वक्ष और नदी के वेग में फ़र्क
 
छुपती हूँ यहाँ शैशव में,
अतीत के अघोषित अपराधों में,
कल्पना के मलमल वस्त्र से छान कर
पी लेती वृद्धावस्था की टेक की-सी आश्वस्ति
यहीं।
 
आलिंगन
क्योंकि इससे बेहतर
अन्य कोई भाषा मैं नहीं जानती, जिस में
स्वदेह से पत्र लिख कर कह सकूँ तुम से
कि हूँ मैं तुम्हारे समीप
और स्वयं से अधिक विश्वास है मुझे तुम पर।
 
 
 
 
 
 
 
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