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दृश्य को अनुभूत करते यात्रा संस्मरण : आँख भर उमंग

राजेश कुमार व्यास के यात्रा-संस्मरण पुस्तक ‘आँख भर उमंग’ पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक-कवि चन्द्रकुमार ने-

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जीवन-यापन के लिए रोटी-कपड़ा-मकान का समुच्चय निस्संदेह सर्वाधिक ज़रूरी है लेकिन जीवन ‘जीने’ के लिए इससे कुछ अलग की अभिलाषा भी होती है। कुछ ऐसी वृत्ति या वृत्तियाँ जो हमारे अन्तर्मन को सींचें और हम महसूस कर सकें कि हम जीवित हैं, भरे-पूरे जीवन की ज़रूरी आवश्यकता है। ऐसी अनेक वृत्तियों में यात्रा/ भ्रमण एक ऐसा कर्म माना गया है जो न केवल तब — जब यात्रा कर रहे होते हैं — बल्कि उससे पहले और उसके पश्चात भी हमें ऊर्जा, आनन्द और अप्रतिम प्रेरणा से पूर्ण करता है।

यात्री और सैलानी सामान्यतया एक माने जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे यात्रा-वृतांत और यात्रा संस्मरण लेकिन इनमें एक महीन फ़र्क़ हमेशा मौजूद रहता है। और जब एक ‘यायावर’ किसी स्थान पर रम जाये — भले ही थोड़े समय काल की यात्रा के दौरान हुए अनुभवों में — तब इस यात्रा, या कहें कि वहाँ गुज़ारे समय के आख्यान को क्या कहा जाए? शहर, या कोई खण्डहर ही भले क्यों न हो, वह महज़ कोई भौगोलिक या स्थानिक पहचान मात्र नहीं होता। सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक पहचान के साथ ही सांस्कृतिक पहचान किसी स्थान को वह विराट रूप और आकार देती है जो हमें उन स्थानों की तरफ़ ले जाती है। किसी विशेषता को समेटे कोई शहर-गाँव या उसके खण्डहर आख़िर हमें इसीलिये आकर्षित करते हैं क्योंकि उनके पीछे का समृद्ध इतिहास हमारे सामने समय की एक खिड़की खोलता है।

नक़्शों/ मानचित्रों से आगे जब कोई शहर (या खण्डहर) ज़िन्दा धड़कता भूगोल बन कर आपकी आत्मा में विचरण करने लगे, तब कोई शहर अपने होने (या न होने) का दर्द आपसे साझा करता है। एक यायावर की आँख उसी उमंग की तलाश में शहर-दर-शहर भटकती है। ‘आँख भर उमंग’ वैसे तो प्रतिष्ठ यायावर राजेश कुमार व्यास का नया यात्रा-संस्मरण है लेकिन इसे पढ़ते हुए आप हमेशा की तरह उनके साथ किसी स्थान की संपूर्ण यात्रा पर होते हैं। इस से पहले उनके यात्रा-संस्मरण “कश्मीर से कन्या कुमारी” और “नर्मदे हर” चर्चित रहे हैं। यह पुस्तक भी उनकी विभिन्न यात्राओं के जीवन्त स्मृति-चित्र है जिसमें प्राकृतिक रमणीय स्थलों के साथ ही वहाँ के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व और वहाँ की आत्मीयता को सहेजा गया है। यात्राओं से उनके लेखकीय रूप को अनवरत संपन्नता मिलती रही है क्योंकि यात्राएँ मन को स्पंदित करती है जो वस्तुतः किसी स्थान विशेष की सांस्कृतिक संपन्नता की वजह से ही संभव होता है।

दरअसल कोई शहर (या खंडहर) अपने आप में संस्कृति, इतिहास और स्मृति का संपूर्ण दस्तावेज होता हैं। यही कारण है कि किसी स्थान विशेष के भाषिक संस्कार अपने साथ परिवेश और स्मृतियों का एक साथ संजोते हैं। कालान्तर में  बदलाव के साथ अर्थ तो फिर भी रह जाते हैं, मूल शब्द लुप्त हो जाते हैं। उन मूल शब्दों की गूँज को महसूस करना ही दरअसल किसी स्थान विशेष की सही यात्रा होती है। राजेश कुमार व्यास के यात्रा-संस्मरणों में वह गूँज बड़ी शिद्दत से बरामद होती है। विद्वान कवि और कलाविद् अशोक वाजपेयी का एक कवितांश हैः

हम अकेले नहीं हैं इस यात्रा में

हमारे साथ चल रहे हैं, अँधेरे-उजाले

नक्षत्र-आकाशगंगाएँ, लुप्त नदियाँ

विस्मृति के अनेक उपवन और कई शताब्दियाँ

जो बीच-बीच में कहीं और भटक जाती हैं।

राजेश कुमार व्यास के यात्रा-संस्मरणों में वे विस्मृत हो रही स्मृतियाँ हरी होती जाती हैं। यायावर की आँखें महज आँखें नहीं बल्कि वह चक्षुश्रव्य सरीखा गुण लिये अंग होती हैं। वह देखे गये दृश्य से वह सब सुन सकने में सक्षम होती है जो हम अमूमन लक्षित नहीं कर पाते। दृष्टिगत सुन्दरता के बखानों के साथ ही अदृश्य को सुनने-गुनने में जो आनन्द राजेश कुमार व्यास अपने यात्रा-संस्मरणों में अनुभूत करवाते हैं, वह उनके चक्षुश्रव्य गुण के कारण ही संभव होता होगा। ‘आँख भर उमंग’ महज स्थानों की यात्रा नहीं है। छोटे-छोटे आलेखों में लेखक ने संस्कृति, प्रकृति, सामाजिक, भौगोलिक और पुरातात्विक सूत्रों को लयबद्ध तरीक़ों से पाठकों के सामने रखा है। अतिसूक्ष्म दृष्टि के कारण कहीं-कहीं वे पूरे दृश्य की जगह किसी वस्तु/चित्र/आकृति/ स्थापत्य कला के किसी नमूने मात्र पर ठहर कर उसकी थाह लेते है।

राजेश कुमार व्यास ने घुमक्कड़ी से अपने जीवन को ही नहीं बल्कि अपने रचनाकार रूप को भी संपुष्ट करने का ज़रिया बनाया है। वे जहाँ भी जाते हैं, वहाँ उस स्थान की महज पर्यटन/ यात्रा ही नहीं करते बल्कि वहाँ के लोग, लोक-संस्कृति, विविधता और प्रकृति से सांगोपांग हो चित्रों के साथ अपने अन्तर्मन में भी बहुत कुछ समेट लाते हैं। विविध सांस्कृतिक कलाओं और पुरातात्विक ज्ञान के बूते वे हर उस जगह का एक नया चित्र पाठकों के सामने लाते हैं जो पाठकों के ज्ञान को और पुष्ट करता है। यात्रा के रोमांच और छोटे-छोटे अनुभवों के तारों से बुने उनके यात्रा-संस्मरण इसीलिए पाठकों के लिए रोचक बने रहते हैं। उनकी नयी पुस्तक “आँख भर उमंग” एक चलती रेल है जो बिना किसी निर्धारित पथ के, जगह-जगह रुकती है, वहाँ के पूरे आस्वादन के बाद पुनः किसी नयी ठौर की तरफ़ निकल पड़ती है। इस दौरान पाठक उनके इन स्मृति-चित्रों से सराबोर होता रहता है।

अमेरिकन-रूसी लेखिका वेरा नजारियन के हवाले से कहें तो “आप जब भी कोई अच्छी किताब पढ़ते हैं, दुनिया में कहीं एक दरवाज़ा खुलता है ताकि अधिक रोशनी भीतर आ सके।” यह पुस्तक पढ़ते हुए एक के बाद एक कई दरवाज़े खुलते प्रतीत होते हैं और सतरंगी रोशनी से आपका भीतरी मन समृद्ध होता है। कुछ छिहत्तर छोटे आलेखों का यह दस्ता आपको एक साथ ही सांस्कृतिक, पौराणिक, साहित्यिक और अध्यात्मिक यात्रा का सहचर बनाती है। प्राकृतिक रूपों की सहज उपस्थिति को दृश्य मानें तब स्मृति-चित्र उन दृश्यों की आत्मीय अनुभूति हो जाती है जिसमें दृश्य से परे अनेक अर्थ खुलते हैं जिन्हें हम महज आँखों से अनुभूत नहीं कर पाते। हमारा कला बोध दरअसल किसी दृश्य के ज़ाहिर अर्थ स्वरूप के साथ ही उसके अव्यक्त सौन्दर्य और गरिमा को भी शनै-शनै हमारे जीवनानुभवों में उतार उसकी सार्थकता पूर्ण करता है। “आँख भर उमंग” में पाठक बार-बार यह महसूस करेगा जैसे कि वह स्वयं उस सफ़र में लेखक के साथ है। लेखक यहाँ देखे गये को लिखने की बजाय अनुभूत हुए क्षणों तथा उसके बाद समृद्ध हुए विचार को लिखते हैं।

लेखक ने अपनी आँखों से जो “दृश्य” देखे, उसे अपनी संवेदनात्मक एवं कलात्मक बोध प्रक्रिया से सहेजते हुए हमारे सामने एक वृहद स्मृति-चित्र प्रस्तुत किया है जिसमें उतना ही जीवन है जैसा दृश्य में मौजूद था, बल्कि अपने अनुभवों के बूते वह सजीव चित्रण हमारे लिये “दृश्य” के सन्निकट रहने जैसा लगता है। लेखक ने अपनी अनुभूतियों के चित्रण में अतिरंजना को आसपास ही फटकने नहीं दिया जो कि ऐसे भावनात्मक लेखन में सर्वदा संभव है। मंगलेश डबराल ने कहीं कहा है कि “कभी-कभार मेरी कल्पना में ऐसी जगहें आती हैं जो दरअसल कहीं नहीं हैं या जिनके होने की सिर्फ़ सम्भावना है।” लेखक राजेश कुमार व्यास अपने आसपास की ऐसी जगहों में वह प्राप्त कर लेते हैं जो अमूमन अलक्षित रह जाता है और जिसे इस तरह जान कर हम किसी स्थान विशेष के बारे में अपने विचारों को और संपुष्ट करते हैं।

स्मृति-विहीन भव्यता के दौर में लेखक राजेश कुमार व्यास का वृहद देश की सभी दिशाओं, नदी-नालों, पहाड़-गुफाओं, झरनों, चट्टानों, निस्संग पसरे रेगिस्तान और प्राचीन व प्राकृतिक रमणीय स्थलों की ये यात्राएँ विस्मित करने वाली है। इतिहास, पौराणिक कथाओं – किंवदंतियों, पुरातात्विक तथ्यों, आध्यात्मिक विवेचनों और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को एक साथ समेटे ये संस्मरण न केवल पाठक के मन में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं बल्कि उनकी अनुभूतियों के नये, अनछुए आयामों को भी संपुष्ट करते हैं। मूर्त-अमूर्त के नैसर्गिक सौन्दर्य को जिस तरह लेखक ने छोटे-छोटे वाक्यों और सन्दर्भों-अनुभूतियों के सन्तुलित संयोजन से प्रस्तुत किया है, वह पाठक मन में अनवरत उत्साह का संचार करते हैं।

अपने सूक्ष्म अवलोकनों से विराट और विहंगम दृश्य के भीतर प्रवेश कर लेखक उस अलौकिक सुख में भीतर की यात्रा के प्रवेश द्वार खोलता है। कश्मीर की वादियों की अनुगूँज को, हिमाचल की पहाड़ियों को, राजस्थान के रेगिस्तान को, बिहार की ऐतिहासिक भव्यता को, कुमायूँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को अपनी अनुभूति के आलोक में देखना रुचिकर बन पड़ा है।इसी तरह बनारस, शान्तिनिकेतन, बोधगया, देशनोक, भटनेर, औंकारेश्वर, चंबल-ग्वालियर, भीमबैटका, सिंहगढ, सारनाथ, कालीबंगा, रामदेवरा, लखासर, गजनेर इत्यादि स्थलों की यात्रा के संस्मरण किसी व्यक्ति की यात्रा न हो कर वहाँ होने वाली अनुभूतियों का संसार है जिसमें लेखक के ज़रिये पाठक उन स्थलों पर खुद को उपस्थित पाता है।

इस पुस्तक में शामिल बहुत से आलेख पाठकों ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर पढ़ें हैं। बहुत से नज़दीक के स्थानों पर, जिन पर कुछ आलेख पुस्तक में शामिल है, इन पंक्तियों के लेखक को भी साल में एकाधिक बार जाना होता है। लेकिन उन स्थलों के बारे में आलेख पढ़ने के बाद वहाँ की यात्रा एक नयी यात्रा लगती है जिसे राजेश कुमार व्यास की नज़र से देखा। पुरोवाक् में लेखक ने इन यात्राओं के प्रयोजन और इनसे प्राप्त संपन्नता की बात प्रमुखता से कही है।किसी भी लेखन का मूल उद्देश्य पाठक के अनुभव में कुछ नया जोड़ना होता है, इस लिहाज़ से ये यात्रा-संस्मरण अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त करते है।

 राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली से प्रकाशित 250 पृष्ठों की यह पुस्तक पाँच महीनों में ही अपने दूसरे संस्करण के साथ पाठकों को आह्लादित कर रही है।

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पुस्तकः आँख भर उमंग (2021)

प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली

पृष्ठः 250

मूल्यः ₹ 310

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