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‘देहरी पर ठिठकी धूप’ का एक अंश

हाल में ही युवा लेखक अमित गुप्ता का उपन्यास आया है ‘देहरी पर ठिठकी धूप’। राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास में लेखक ने बहुत साहसिक विषय पर संवेदनशील तरीके से लिखा है। आज उसका एक अंश पढ़िए-

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धूप निकल आई थी। मोनेस्ट्री के गेट के बाहर पिछली रात की बारिश का पानी कहीं-कहीं अब भी जमा हुआ था। कुछ बौद्ध-भिक्षुओं के अलावा सड़क पर और कोई नज़र नहीं आ रहा था। सभी दुकानें बन्द थीं। बस मोनेस्ट्री के गेट के सामने एक तिब्बती औरत चाय बेच रही थी। सामने बेंच पर एक छोटा सा लड़का स्लेट पर कुछ लिख रहा था, शायद वो उस औरत का बेटा था। हवा ठंडी थी, जुलाई की बारिश की नमी अपने संग लिये हुए। सड़क किनारे कुत्ते सोए हुए थे। उन तक धूप अभी पहुँची नहीं थी और वे ठिठुर रहे थे।

   पिछली रात जब वे यहाँ पहुँचे थे, पूरा शहर बारिश में भीग रहा था। गाड़ी पार्क करने के बाद वे दोनों थोड़ी देर गाड़ी के अन्दर ही बैठे रहे थे। ऊपर दोनों ओर चीड़ के पेड़ थे और उसके बीच एक छोटा-सा कॉटेज। बारिश इतनी तेज़ थी कि ऊपर कॉटेज तक जा पाना मुश्किल था। उन्होंने कॉटेज में फ़ोन किया कि अगर कोई छाता लेकर कार पार्किंग तक आ सके तो अच्छा रहेगा। बिजली नहीं थी। रोशनी के नाम पर बस गाड़ी का जलता हुआ हेडलाइट। आवाज़ के नाम पर सिर्फ़ बूँदों की आवाज़। धुंध ने धौलाधार के पहाड़ों को जैसे कहीं छुपा दिया था। कुछ देर बाद, कॉटेज से एक लड़का एक हाथ में छाता और दूसरे में टॉर्च लेकर आ गया था और वो एक ही छतरी में आधे भीगते हुए किसी तरह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर कॉटेज तक पहुँच गए थे। कॉटेज के रिसेप्शन पर एक मोटी सी मोमबत्ती जल रही थी। साँवला-सा एक लड़का रिसेप्शन पर उनके स्वागत में खड़ा हुआ था। उसे देखकर लग रहा था कि उनके आने के पहले वो गहरी नींद में सो रहा था।

   मोनेस्ट्री के अन्दर जगह-जगह छोटे-छोटे चहबच्चों में पानी जमा था। मोनेस्ट्री के परिसर में एक छोटा सा संग्रहालय था—‘The Tibet Museum’, जो इस वक़्त बन्द था। 1998 में स्थापित, तिब्बत संग्रहालय में 30,000 से अधिक तस्वीरें, एक यात्रा प्रदर्शनी, और एक स्थायी प्रदर्शनी थी जो हिमालय पर्वतमाला में निर्वासन की तिब्बती यात्रा का दस्तावेज़ थीं। म्यूज़ियम के नीचे एक किताब की दुकान थी, जिसमें अधिकतर बौद्ध धर्म से जुड़ी और दलाई लामा की किताबें बिकती थीं। सीढ़ियाँ कहीं-कहीं पर गीली थीं, कहीं-कहीं इकहरी सी धूप आकर रेलिंग पर ठहर गई थी। आसमान में बादल के छोटे-छोटे जत्थे धौलाधार के चारों ओर बिखरे हुए थे। सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर प्रेयर हॉल के सामने एक बड़ा सा चबूतरा था जहाँ कई बौद्ध-भिक्षु प्रार्थना कर रहे थे। पेड़-पौधे पिछली रात की बारिश में धुलकर सूरज की पीली रोशनी में चमक रहे थे। चीड़ और देवदार के वृक्ष ऊपर धौलाधार तक एकाग्र होकर ऐसे खड़े थे, जैसे वो किसी प्रार्थना सभा का हिस्सा हों।

   मोनेस्ट्री में एक हॉल हमेशा दीपों से सुसज्जित रहता था; छोटे-बड़े सैकड़ों दीप हमेशा उस हॉल को रोशन रखते थे। बाहर जितनी भी ठंड हो, लेकिन हॉल के अन्दर चारों पहर दीपों के जलते रहने के कारण अन्दर हल्की गर्मी रहती थी। हॉल की पूर्वी दिशा की दीवार में एक बड़ी सी खिड़की थी, जिसमें नीले रंग के काँच लगे हुए थे। काँच पर पिछली रात की बारिश की कुछ बूँदें अभी भी ठहरी हुई थीं जो हॉल के अन्दर जलते हुए दीपों के तेज़ से धीरे-धीरे सूखने लगी थीं। काँच से इकहरी सी धूप हॉल के अन्दर रखी बड़ी सी मेज़ पर आकर ठहर गई थी। इस वक़्त सब कुछ ठहरा हुआ था; बाहर सूरज की चमकीली रोशनी, हॉल के अन्दर दीपों की पीली रोशनी और अनुराग का अधीर मन।

   बौद्ध-भिक्षुओं के अलावा हॉल के अन्दर किसी और को जाने की अनुमति नहीं होती थी। बौद्ध-भिक्षुओं का काम था जैसे ही कोई दीप बुझ जाए, उसे दोबारा जला देना। इन बौद्ध-भिक्षुओं को न हिन्दी आती थी और न ही अंग्रेज़ी। इनमें ज़्यादातर तिब्बत से थे; इसलिए वो तिब्बती भाषा में ही बात करते थे। हाँ, अंग्रेज़ी के दो-चार वाक्य उन्हें ज़रूर आते थे, जैसे, ‘प्लीज़ डोंट कम हियर’, ‘प्लीज़ गो फ़्रॉम हियर’, ‘नो-नो, नॉट अलाउड।’ लेकिन, अनुराग जब भी यहाँ आता था, भिक्षुओं को किसी तरह मनाकर, थोड़ी देर के लिए हॉल के अन्दर जाने की अनुमति ले ही लेता था।

   अक्सर हॉल में एक या दो बौद्ध-भिक्षु होते थे, आज सिर्फ़ एक ही बौद्ध-भिक्षु था। जितने कम लोग होते, उन्हें मनाने में उतनी आसानी होती थी। अनुराग उस बौद्ध-भिक्षु को मनाकर हॉल के अन्दर दाख़िल हुआ। खिड़की के हर काँच से गुनगुनी धूप मेज़ के कोने-कोने में ऐसे विराजमान थी, जैसे किरणों की रेखा खींच दी हो किसी चित्रकार ने। दीप जलाने के पहले वो कुछ देर वहाँ के वातावरण में रम जाना चाहता था; शान्ति और स्थिरता का समंदर बटोर लेना चाहता था। लेकिन वहाँ ज़्यादा देर रुकना सम्भव नहीं था। बौद्ध-भिक्षु आपको दो-चार मिनट ही रुकने की अनुमति देते थे। अनुराग ने कुछ बुझे हुए दीपों को जलाया। कुछ में उसने घी भी डाला। फिर कुछ और वक़्त वहीं बिता पाने के लिए दीपों को जलाने में बौद्ध-भिक्षु की मदद करने लगा। उसका बस चलता तो वो यहाँ सुबह से शाम तक बैठा रहता। लेकिन थोड़ी ही देर में बौद्ध-भिक्षु ने उसे जाने के लिए कह दिया। अनुराग ने उसे नमस्कार किया और हॉल के बाहर आ गया।

   श्लोक प्रार्थना हॉल में बैठा हुआ था, जहाँ बुद्ध की एक बड़ी सी मूर्ति विराजमान थी। वो ध्यानमग्न होकर प्रार्थना में लीन था। हॉल के दाहिनी ओर कुछ बौद्ध-भिक्षु बैठे प्रार्थना कर रहे थे। कुछ टूरिस्ट भी थे, जिनमें से कुछ प्रार्थना कर रहे थे तो कुछ तस्वीरें खींच रहे थे।

अनुराग प्रार्थना हॉल में पहुँचा और श्लोक को ढूँढ़ने लगा। वो हॉल के एक कोने में आँखें मूँदे बैठा था। अनुराग चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया। कुछ जगहों पर ख़ामोशी ज़रूरी होती है। बाहर बाज़ारों में, सड़कों पर, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा, बस स्टॉप पर, दफ़्तरों में और यहाँ तक कि लोगों के घरों में क्या कम शोर है कि मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा-चर्च-मोनेस्ट्री आकर भी लोग बातें करके शोर करें।

   अनुराग ने भी अपनी आँखें बन्द कर लीं और प्रार्थना करने लगा। थोड़ी देर बाद जब श्लोक ने अपनी आँखें खोलीं तो अनुराग को अपने पास बैठा पाया। श्लोक वहीं बैठा रहा, कभी वो बुद्ध की मूर्ति को देखता तो कभी अनुराग को।

   कुछ देर बाद अनुराग ने अपनी आँखें खोलीं, तो पाया श्लोक उसकी ओर देख रहा था। दोनों के मुखमंडल पर पूजा के दीपक जैसा तेज था। प्रेयर हॉल से बाहर आकर वो हॉल के चारों ओर लगे प्रेयर व्हील को घुमाते हुए हॉल की परिक्रमा करने लगे। मोनेस्ट्री में पर्यटकों का आना-जाना अभी शुरू नहीं हुआ था। इतनी सुबह बहुत कम लोग ही यहाँ आते थे। वो दोनों वहीं चबूतरे पर एक बेंच पर थोड़ी देर के लिए बैठ गए। सूरज अचानक ही बादलों के पीछे कहीं खो गया। पहाड़ों पर बारिश के दिनों में पल भर में चारों ओर अँधेरा छा जाता है और फिर पूरा दिन ऐसा लगता है जैसे एक कभी न ख़त्म होने वाली शाम।

   दोनों वहाँ थोड़ी देर बैठने के बाद कॉटेज के लिए निकले। मोनेस्ट्री से निकलकर अनुराग ने सामने टैक्सी स्टैंड से एक टैक्सी बुलाई। वैसे तो मोनेस्ट्री से कॉटेज की दूरी ज़्यादा नहीं थी, लेकिन श्लोक के कमर में दर्द होने की वजह से, उसने टैक्सी लेना उचित समझा। टैक्सी कॉटेज की ओर चल पड़ी। धुंध बहुत थी। दस मीटर तक भी देखना मुश्किल हो रहा था। टैक्सी ड्राइवर ने गाड़ी के दोनों इंडिकेटर जला दिए थे और गाड़ी बहुत धीरे चला रहा था। गाड़ी का वाइपर लगातार चल रहा था, लेकिन धुंध इतनी ज़्यादा थी कि वाइपर से भी कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था। सामने कोहरे के सिवा कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। अनुराग ड्राइवर के बग़ल वाली
सीट पर बैठा था और उसकी नज़रें सामने सड़क पर जमी हुई थीं। अचानक सामने से हॉर्न की कर्णभेदी आवाज़ और फिर एक ज़ोरदार धमाके की गूँज।

   अनुराग की आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया, आसपास के शोर के अलावा उसे और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। वो पीछे मुड़कर श्लोक को देखना चाहता था कि वो ठीक है या नहीं, लेकिन मुड़ नहीं पाया। कुछ दूर पे उसे सड़क दिखाई दे रही थी, और ऊपर सड़क के किनारे एक जीप खड़ी थी। शायद इसी जीप से टकराकर उनकी गाड़ी इस गड्ढे में गिर गई होगी। एक आदमी ने अनुराग को गाड़ी से बाहर निकाला। उसके दाहिने घुटने में और कोहनियों में चोट आई थी। उसने सीट बेल्ट लगा रखा था, इसलिए कोई गम्भीर चोट नहीं आई। आसपास के लोग जमा हो गए थे, कुछ लोगों ने मिलकर श्लोक को गाड़ी से बाहर निकाला। 
उसके सर में गहरी चोट थी, ख़ून बहुत बह रहा था और वो बेहोश हो गया था। एक-दो लोगों ने ड्राइवर को भी गाड़ी से बाहर निकाला, वो भी बेहोश था।

   एम्बुलेंस बुलवा ली गई थी। स्थानीय लोगों ने श्लोक के मुँह पर पानी मारा कि शायद उसे होश आ जाए, पर वो नाकामयाब रहे। अनुराग बस यही दुआ कर रहा था कि श्लोक की हालत कहीं और ज़्यादा गम्भीर न हो जाए। ड्राइवर अब होश में आ चुका था, उसके भी सर पर चोट लगी थी, लेकिन ज़्यादा ख़ून नहीं बहा था। वो अपना दाहिना घुटना पकड़कर ज़मीन पर बैठा हुआ था। होश में आते ही वो अनुराग से माफ़ी माँगने लगा था। लेकिन उसकी कोई ग़लती नहीं थी, इतनी धुंध में ऐक्सिडेंट होना कोई बड़ी बात नहीं थी। वो तो गाड़ी धीरे ही चला रहा था, और वो भी दोनों इंडिकेटर जलाकर।

   अनुराग की नज़रें सड़क पर टिकी हुई थीं कि कब एम्बुलेंस आए और श्लोक को अस्पताल ले जाया जा सके। पन्द्रह मिनट बाद एम्बुलेंस आई, पन्द्रह मिनट तक श्लोक सड़क किनारे बेहोश पड़ा रहा। इन पन्द्रह मिनटों में बेचैनी तूफ़ान की तरह अनुराग पर पूरी तरह से हावी रही। वो बस यही दुआ कर रहा था कि श्लोक को होश आ जाए।

   अस्पताल पहुँचते ही श्लोक को इमरजेंसी में भर्ती किया गया। अनुराग ने अस्पताल की सारी औपचारिकताएँ पूरी की। “आप भी अपनी मरहम-पट्टी तुरन्त करवाइए, आपके घुटने में और कोहनियों में काफ़ी चोट है,” अस्पताल कर्मी ने अनुराग से कहा।

   “जी, मैं घर पर इत्तला करके करवाता हूँ,” अनुराग इतना कहकर इमरजेंसी के बाहर वेटिंग रूम में चला गया। उसे मीरा को तुरन्त इत्तला कर देनी चाहिए। जैसे ही मीरा को इस दुर्घटना के बारे में पता चलेगा, वो उसके सामने सवालों की झड़ी लगा देगी—ये सब कैसे हुआ? श्लोक अभी कैसा है? ज़्यादा चोट तो नहीं आई? डॉक्टर ने क्या कहा? किस अस्पताल में भर्ती है? और आख़िरकार, तुम वहाँ मैक्लॉडगंज में क्या कर रहे हो—श्लोक तो अकेले जाने वाला था वहाँ?

   अनुराग ने अपने को सँभाला—अभी सबसे ज़रूरी चीज़ ये थी कि मीरा को तुरन्त इत्तला की जाए। सवालों के जवाब वो बाद में सोचेगा। उसने मोबाइल निकाला और काँपते हाथों से मीरा का नम्बर डायल किया।

मीरा अपने कैफ़े के किचन में थी और सामान की स्टॉकिंग कर रही थी।

   “हेलो,” अनुराग की आवाज़ में घबराहट थी।

   “तुम इतने घबराए हुए क्यों हो, सब ठीक तो है?” मीरा ने पूछा।

   “कुछ भी ठीक नहीं है। श्लोक का ऐक्सिडेंट हो गया है। वो मैक्लॉडगंज के ज़ोनल अस्पताल में भर्ती है।”

   “क्या? कैसे हुआ ये? कब हुआ? अभी कैसा है श्लोक? और तुम क्या कर रहे हो मैक्लॉडगंज में? कहीं अस्पताल वालों ने तुम्हें पहले कॉल तो…?”

   अनुराग ने उसे बीच में रोकते हुए कहा, “डॉक्टर अभी इमरजेंसी में ले गए हैं उसे। तुम जल्दी यहाँ पहुँचो। जैसे ही डॉक्टर जाँच करके बाहर आएँगे, मैं दोबारा कॉल करूँगा तुम्हें।”

   “लेकिन तुम वहाँ…?”

   “मैं तुम्हें सब बताऊँगा, तुम पहले यहाँ पहुँचो,” अनुराग ने अपनी बात पूरी की।

   “अगर मैं बस से आई तो कल सुबह के पहले नहीं पहुँचूँगी। सो, फ़्लाइट लेना ही ठीक होगा।” मीरा ने अपनी घड़ी की ओर देखते हुए कहा।

   “हाँ, शायद तुम्हें दोपहर वाली कोई फ़्लाइट मिल जाए,” अनुराग की नज़रें वेटिंग रूम की दीवार पर टँगी घड़ी पर ठहरी हुई थीं; एक बज रहा था।

   “ठीक है। मैं महेश को कुछ दिनों के लिए कैफ़े सँभालने को कह देती हूँ और यहाँ से जल्द से जल्द निकलती हूँ,” कहकर मीरा ने फ़ोन रख दिया।

   मीरा ने महेश को आवाज़ लगाई। महेश कैफ़े का मैनेजर था और इस कैफ़े का सबसे पुराना कर्मचारी भी। वो कैफ़े के पास के एक मोहल्ले में रहता था। सुबह कैफ़े खोलना और रात को कैफ़े बन्द करने की ज़िम्मेदारी महेश की ही थी। मीरा ने संक्षेप में महेश को सब कुछ बताया और हवाई अड्डे के लिए निकल गई।

फ़ोन रखने के बाद अनुराग वहीं वेटिंग रूम में बैठा रहा। आसपास के लोग उसकी ओर देख रहे थे, शायद सोच रहे थे कि ये आदमी अपनी मरहम-पट्टी क्यों नहीं करवाता। शरीर के घाव सबको दिखते हैं, मन के नहीं।

   कुछ देर वेटिंग रूम में बैठने के बाद अनुराग इमरजेंसी वार्ड की ओर चला गया। घुटने में चोट होने के कारण वो लँगड़ाकर चल रहा था। नर्स ने पहले उसे टिटनेस का इंजेक्शन दिया, फिर उसकी मरहम-पट्टी की और एक पेन-किलर भी दिया। दवा लेकर अनुराग वापस वेटिंग रूम लौट आया।

मीरा तुरन्त हवाई अड्डे के लिए निकल गई। मीरा को धर्मशाला की अगली फ़्लाइट जो डेढ़ घंटे बाद थी मिल गई। चेक-इन और सुरक्षा-जाँच के बाद वो बोर्डिंग गेट के सामने बैठी हुई थी कि तभी अनुराग का दोबारा फ़ोन आया।

   “हेलो। अब श्लोक की हालत कैसी है?” मीरा ने व्याकुलता से पूछा।

   “डॉक्टर कह रहे हैं कि श्लोक की हालत थोड़ी गम्भीर है। सिर पर चोट लगने की वजह से बहुत ख़ून बह गया है। तुम कहाँ हो?”

   ये सुनकर मीरा का चेहरा पीला पड़ गया। “मैं हवाई अड्डे पर हूँ। पैंतालीस मिनट बाद फ़्लाइट है।”

   “ठीक है। मैं तुम्हें मैसेज करता रहूँगा,” अनुराग ने कहा और फ़ोन रख दिया।

   पौने पाँच बजे मीरा धर्मशाला हवाई अड्डे पहुँची। वहाँ से टैक्सी लेकर वो सीधा अस्पताल पहुँची। अनुराग वेटिंग रूम में बैठा था, उसकी आँखें लाल थीं और चेहरा एकदम ज़र्द।

   “किस कमरे में है श्लोक? मुझे अभी उसके पास ले चलो,” मीरा ने अधीर होते हुए कहा।

   “वो अभी आई.सी.यू. में है। हम उसे नहीं देख सकते अभी। ख़ून काफ़ी बहा है, और डॉक्टर ने अब तक दो बोतल ख़ून चढ़ा दिया है और दो बोतल ख़ून की ज़रूरत है, जो कल सुबह फिर चढ़ाया जाएगा,” अनुराग ने नज़रें नीची करके कहा। वो मीरा से आँखें चुरा रहा था।

   “तुम मुझसे नज़रें क्यों चुरा रहे हो? साफ़-साफ़ बताओ, क्या छुपा रहे हो तुम मुझसे?” मीरा ने झल्लाते हुए कहा।

   “तुम पहले थोड़ा सुस्ता लो।”

   “नहीं, मुझे नहीं सुस्ताना। तुम बताओ आख़िर बात क्या है? तुम यहाँ क्या कर रहे हो—तुमने तो कहा था कि तुम्हारी अगली किताब के सिलसिले में तुम्हें अपने प्रकाशक से मिलना है?”

   “हाँ, मिलना तो था लेकिन मैंने कैंसल कर दिया। परसों रात मैंने एक बहुत बुरा सपना देखा। सुबह उठा तो मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उस दु:स्वप्न से कैसे बाहर निकलूँ तभी श्लोक का कॉल आया और उन्होंने बताया कि वो मैक्लॉडगंज जा रहे हैं। मैंने साथ चलने का आग्रह किया।”

   “तो फिर तुम दोनों में से किसी ने मुझे बताया क्यों नहीं? क्या मैं मना करती?”

   “नहीं।”

   “फिर क्यों नहीं बताया?”

   अनुराग को पसीने आ रहे थे; उसे समझ में नहीं आ रहा था कि बात कहाँ से शुरू करे। जो बात श्लोक और उसने मीरा से इतने सालों तक छुपा रखी थी, वो अकेले कैसे उस बात का ख़ुलासा कर सकता था। अनुराग की सबसे बड़ी दुविधा ये थी कि उसे सब कुछ मीरा को बताना चाहिए भी या नहीं? क्या ये सही समय भी था? क्या उसे श्लोक के होश में आने का इंतज़ार करना चाहिए?

   अनुराग को ऐसे घबराया देखकर मीरा बौखला उठी, “देखो अनुराग, तुम और श्लोक ही मेरा परिवार हो। तुम्हारे हाथ-पैर में चोट है और मेरा पति आई.सी.यू. में है। तुम मेरे सब्र का और इम्तिहान मत लो। साफ़-साफ़ बताओ, आख़िर बात क्या है?” मीरा की आँखों से आँसू छलक आए।

   “मैं तुम्हें सब कुछ बता देना चाहता हूँ मीरा। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि कहाँ से शुरू करूँ। श्लोक ने मुझसे कहा था कि वो सब कुछ तुम्हें ख़ुद ही बताएँगे,” अनुराग की आँखें ज़मीन पर अब भी गड़ी हुई थीं।

   “अब श्लोक तो होश में है नहीं कि वो मुझे कुछ बता पाए। अब पहेलियाँ बुझाना बन्द करो। मेरे सब्र का बाँध अब टूट रहा है,” मीरा की आँखें अनुराग पर टिकी हुई थीं।

   अनुराग ने एक गहरी साँस ली, उसकी आँखें वेटिंग रूम में कुछ तलाश रही थीं, “मीरा—तुम्हारे और श्लोक के अलावा मेरा इस दुनिया में और कोई नहीं है, और मैं तुम दोनों से बहुत प्यार करता हूँ।”

   “ये सब तो मुझे पता है। आख़िर तुम कहना क्या चाहते हो,” मीरा के स्वर में एक घबराहट थी।

   “बात ये है मीरा कि…” अनुराग ने एक गहरी साँस ली, “मैं श्लोक को सिर्फ़ एक जीजा की तरह नहीं बल्कि एक पुरुष के तौर पर भी प्यार करता हूँ। वो भी मुझसे प्यार करते हैं। पिछले पाँच साल से हमने ये रिश्ता तुम्हारी नज़रों से और दुनिया की आँखों से बचाए रखा। यही वजह है कि मैं शादी नहीं करना चाहता।” जैसे-तैसे अपनी आवाज़ की कंपन को सँभालते हुए अनुराग ने कहा।

   मीरा उसकी टोन से समझ गई थी कि उसका जवाब रटा-रटाया नहीं था।

   अनुराग के मुँह से निकला हुआ हर एक शब्द मीरा के मन को छलनी कर गया। उसके सगे भाई ने उसे इतना बड़ा धोखा दिया। क्यों? वो भाई जिसे उसने पाल-पोसकर बड़ा किया, जिसे कभी उसने माँ-बाप की कमी महसूस नहीं होने दी। और उसका पति, जिसे वो इतना प्यार करती थी, ये सब करने से पहले, उसने उसके बारे में एक बार भी नहीं सोचा। वो रोना चाहती थी, चीख़ना चाहती थी। पर उसे इस बात का एहसास था कि वो अभी अस्पताल में है। उसने अनुराग से कुछ नहीं कहा और वहाँ से चली गई। मीरा एकान्त चाहती थी, अस्पताल के बाहर एक पार्क था, वहाँ जाकर बेंच पर बैठ गई।

   पिछले पाँच सालों में मीरा को ज़रा सी भी भनक नहीं पड़ी कि उसकी शादी धीरे-धीरे दम तोड़ रही थी; उसका पति अब किसी और का हो चुका था। कहाँ कमी रह गई? जिस इनसान को उसने एक सरल, संवेदनशील और अच्छा इनसान समझा, वो कैसे उसके साथ इतना बड़ा विश्वासघात कर सकता है? मीरा ने अपने आप से ये सवाल बार-बार पूछे, लेकिन उसे कोई ठोस जवाब नहीं मिला। शायद इन सवालों का कोई जवाब हो ही नहीं सकता, फिर चाहे मीरा जितना सोच ले या श्लोक भी लाख सफ़ाई क्यों न दे दे।

   मीरा ने फ़ैसला किया कि वो रोएगी नहीं। ये वक़्त रोने का नहीं, बल्कि अपने भविष्य के बारे में सोचने का था। हाँ, श्लोक अपनी सफ़ाई में जो कहना चाहे वो सुनेगी, लेकिन उसे माफ़ करने लायक महानता उसमें नहीं थी।

   वो जब पार्क से वापस आई, तो अनुराग हथेलियों से अपना चेहरा ढके वेटिंग रूम में बैठा हुआ था। लेकिन क्या चेहरा छुपा लेने से किसी के गुनाह छुप सकते हैं?

 
      

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