मार्केज़ का आखिरी उपन्यास और कोठा

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20 वीं शताब्दी के महान लेखक गाब्रियल गार्सिया मार्केज़ का आखिरी उपन्यास मेमोरीज ऑफ माई मेलंकली व्होर्स’ 2004 में प्रकाशित हुआ था जिसका अंग्रेजी अनुवाद 2005 में आया था. यह उपन्यास जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है कोठे की एक लड़की के साथ 90 साल के एक वृद्ध के प्रेम की कहानी है. इस उपन्यास में उनका जादुई यथार्थवाद नहीं है लेकिन इस छरहरे से उपन्यास प्रेम, वफ़ा जैसे शब्दों को लेखक एक नई ऊंचाई पर ले गया है- मॉडरेटर 
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2004 में उनका अब तक का आखिरी उपन्यास छपकर आया मेमोरीज ऑफ माई मेलंकली व्होर्स’. यह एक लघु उपन्यास है जिसकी कहानी बड़ी सीधी-सादी है. कहानी एक ऐसे बूढ़े की है जो अपना 90 वां जन्मदिन मनानेवाला है. वह निश्चय करता है कि वह उस दिन एक ऐसी लड़की के साथ हमबिस्तर होगा जो पूरी तरह से कुंवारी हो. वह उस वेश्यालय की अम्मा के पास जाकर इस संबंध में बात करता है और बातचीत तय हो जाने के बाद उसे पैसे भी दे देता है. लेकिन जब उसे 14 साल की वह उस लड़की से मिलता है तो वह उसका शील भंग नहीं करता है, वह धीरे-धीरे उससे प्यार करने लगता है. उसके लिए अपे जीवन भर की कमाई कुर्बान करने के लिए तैयार हो जाता है. जीवन भर साधारण ढंग से जीने वाला वह आदमी 90 साल की उम्र में सच्चा प्यार पा लेता है, जो उसकी साधारणता का अतिक्रमण करती है. उसे एक असाधारण व्यक्तित्व में बदल देता है. वह उसको प्यार करने लगता है और अपनी सारी संपत्ति उसके नाम कर देता है. लेकिन मरता नहीं है जीवन जीने के दुगुने उत्साह से भर जाता है. मार्केज़ के जीवनीकार ने टिप्पणी की है कि नौजवान उनके उपन्यासों में प्यार के लिए मारे जाते हैं लेकिन बूढों को प्यार जीने के नए उत्साह से भर देता है. इसे एक तरह से लोलिता की कथा का पुनर्लेखन भी कहा जा सकता है. 

मार्केज़ ने लिखा है कि इस उपन्यास की प्रेरणा उनको यासुनारी कावाबाता के उपन्यास द हाउस ऑफ स्लीपिंग ब्यूटीज़से मिली, जिसमें बूढ़े लोग एक ऐसी जगह जाते हैं जहाँ वे नशे में डूबी वेश्याओं के बगल में लेटते हैं, लेकिन उनको छूने की इजाज़त नहीं होती है. लेकिन अगर मार्केज़ के लेखन को देखें तो पायेंगे कि इस उपन्यास में भी दरअसल वे अपने पुराने ऑब्सेशंस की ओर ही लौटे हैं. क्रॉनिकल ऑफ अ डेथ फोरटोल्डउपन्यास में कौमार्य के सम्मान की लड़ाई है. लव इन द टाइम ऑफ कॉलरामें भी उसके नायक को बुढापे में एक स्कूल बाला से प्यार हो जाता है. इसी तरह वेश्याओं का जीवन भी उनके आकर्षण का विषय रहा है. अपनी आत्मकथा में उन्होंने वेश्याओं के साथ अपने संबंधों के बारे में विस्तार से लिखा है. अगर आप पहले उनकी आत्मकथा को पढ़ लें और फिर यह उपन्यास तो आपको इस उपन्यास के शीर्षक के अलावा कुछ भी खास रोचक नहीं लगेगा. मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि वेश्याओं की कथाएं उनकी आत्मकथा में अधिक विस्तार से आई है.

बहरहाल, इस उपन्यास को लेकर पाठकों-आलोचकों की दो तरह की प्रतिक्रियाएं रहीं. एक तरह के लोगों को इस उपन्यास की कथा एकरैखीय लगी. जों मार्केज़ की अपनी शैली से नितांत भिन्न लगी. जिस जादुई यथार्थवाद, अविश्वसनीय कथा का विधान उनके उपन्यासों को अविस्मरणीय बना देता है वह इसमें मिसिंग लगा. इसकी कथा जिन संभावनाओं को जगाती है अंत तक उसे पूरा करने में असमर्थ हो जाती है. लेकिन दूसरे तरह के पाठकों को इसीलिए यह उपन्यास उनके बाकी उपन्यासों से काफी अलग लगता है क्योंकि इसमें मार्केज़ का वह फॉर्मूला नहीं जो एक तरह से उनके लेखन की संभावनाओं को कई अर्थों में सीमित भी कर देता है. इसमें वह वर्णनात्मकता नहीं है जों कई बार उनके उपन्यासों को उबाऊ भी बना देता है. उनका माना है कि पहली बार उन्होंने जीवन के शाश्वत विषय पर कलम उठाया है, प्रेम की संभावनाओं, जीवन की सारता-निस्सारता को लेकर बात की है.

जो भी हो यह मार्केज़ का आखिरी ही उपन्यास साबित हुआ. 2005 में जब दुनिया पहले आधुनिक उपन्यास सर्वान्तेस के डॉन क्विग्जोटके प्रकाशन की वीं जयंती मना रही थी लैटिन अमेरिका के सर्वान्तेस कहे जाने वाले इस लेखक ने भविष्य ने उपन्यास न लिखने की घोषणा कर दी. एक शानदार लेखकीय कैरियर पर विराम लग गया.  
    

1 COMMENT

  1. जब 90 वाँ जन्मदिन मनाने वाला कोई आदमी किसी 14 साल की लड़की(वेश्या) को प्यार करने लग जाता है और जीने के उत्साह से भर जाता है तो निश्चित ही यह उपन्यास अश्लील प्रेमालाप से दूर एक रोचक और उद्देश्यपूर्ण उपन्यास होगा,पुस्तक चर्चा के लिये धन्यवाद.

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