जापानी फिल्म ‘इन द रियल्म ऑफ़ द सेन्सेस’ पर श्री का लेख

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मुक्त जुनून कामनाओं के सब द्वार खोलता है या कि शांत और अबोधगम्य आकाश के खालीपन में खुद को रिक्त कर देता है?

– इन द रियल्म ऑफ़ द सेन्सेस

इन द रियल्म ऑफ़ द सेन्सेस नागिसा ओसीमा के निर्देशन में बनी 1976 में प्रदर्शित हुई एक विवादास्पद जापानी फिल्म है. फिल्म एक सत्य घटना पर आधारित है जिसने उस समय पूरे जापान में हड़कंप मचा दिया था.  इसी फिल्म पर श्री का लेख-मौडरेटर __________________________________________

ऐसा नहीं कि ‘सदा’ का “ऑब्सेशन” किसी नयी लकीर पर खड़ा है. और अपनी आत्मा की प्रत्येक रिक्ति पर अपनी दैहिक प्रवृत्ति की केवल छाप छोड़ने को आतुर है. यह मन, देह और आत्मा से भी अलग होकर एक ऐसी “फंतासी की दुनिया” में प्रवेश है जहाँ पहुंचे लोगों को अक्सर “परवर्ट” कहा जाता है.

एक ऐसा सेक्सुअल व्यवहार जिसे समाज स्वीकार नहीं करता. जो इतनी बारीकी से वर्जनाओं को छूता हुआ निकल जाता है कि हम इस व्यवहार के बाहरी आक्रोश को समझ ही नहीं पाते.

फिल्म जब शुरू होती है तो ‘सदा’ की मीठी आवाज़ मोहित करने लगती है. बैकग्राउंड में बजता “मिनोरु मिकी” का “गाढ़े प्रेम की हरी घास” जैसा संगीत एक आवश्यक एकाग्रता प्रदान करता है ताकि आने वाले दृश्यों को अतिरिक्त डूब और बिना जजमेंटल हुए देखा जा सके. सेक्सुअल फेटिश का अपना एक अलग मनोविज्ञान है और इसे समझना आसान भी नहीं. जिन सेक्सुअल एक्ट्स को हम घृणित या अस्वीकार्य मान कर उनका बहिष्कार कर देते हैं वे दरअसल किसी के लिए फंतासी और उन्हें जी लेने जैसी एक इच्छा होती है. यहाँ एक्सट्रीम में जाकर नैतिकता या किसी भी नियम के लिए निर्मित पैरामीटर्स को स्वयं से अलग कर अपना आनंद भोगना सर्वोपरि हो जाता है.

फिल्म में शुरूआती प्रेम दृश्य जिन्हें साफतौर पर कामुक आक्रामकता के साथ दिखाया गया है दरअसल एक तैयारी है हमें उस स्थान पर ले जाने की जहाँ पर पहुँचने का अंदेशा ‘सदा’ और उसके प्रेमी को भी नहीं होता. प्रेम की चाह एक अलग बात है लेकिन प्रेम और दैहिक क्रियाओं के दौरान किया गया प्रत्येक कर्मकांड अनुभूतियों में किस प्रकार का चमत्कार उत्पन्न कर रहा है इसकी कोई तय परिभाषा नहीं. कम से कम ‘सदा’ और उसके प्रेमी के लिए तो बिल्कुल ही नहीं.

फिर मन की एक अन्य स्थिति भयभीत हो जाती है कि यह प्रश्न सीधे मनोवृत्तियों से जुड़ा प्रतीत होने लगता है. जहाँ हम ‘सदा’ और उसके प्रेमी को दोषी करार नहीं कर सकते. हालांकि हम ऐसा करना चाहते हैं क्योंकि वे दोनों कामसुख में पथभ्रष्ट प्रतीत होते हैं. ‘प्रतीत होने’ से अभिप्राय उन्हें देखने का हमारा अपना दृष्टिकोण है जिसके लिए मनोविज्ञान में अलग से टर्म्स हैं लेकिन ‘सदा’ और उसके प्रेमी के लिए नहीं. उनके लिए तो यह प्रेम है और प्रेम को इसी तरह से अर्जित और पोषित किया जाना उसका सबसे बड़ा सम्मान है.

जापान में हुई एक सत्य और दर्दनाक घटना पर आधारित यह फिल्म जो यक़ीनन आपको वितृष्णा से भर देगी, यह सोचने पर मजबूर ज़रूर करती है कि क्या सेक्सुअल फेटिश और सैडोमेसोचिस्म (Sadomasochism)का अस्तित्व मनुष्य के लिए इतना घातक भी हो सकता है? लेकिन यह तथाकथित ‘घातक’ शब्द भी हमारे लिए है क्योंकि हम ‘सदा’ और उसके प्रेमी के स्थान पर नहीं हैं.

‘सदा’ और उसके प्रेमी का खुद ऐसा दैहिक विचलन स्वीकार करना किसी ‘अन्य’ के लिए डीप कोर का केवल बाहरी खोल है. इस अबूझ स्थिति को एक पहेली की तरह छोड़ देना ज्यादा उचित है बजाय कि इस पर कोई निर्णय लिया जाए. अनेक स्तरों से गुजरती हुई यह फिल्म अवचेतन में कई अमूर्त व्याख्याएं निर्मित करती है और एक आत्मघाती प्रेम के सौंदर्य पर आकर रुक जाती है. जहाँ ‘सदा’ सम्भोग के आनंद को चरम तक पाने के लिए अपने प्रेमी को मृत्यु दे देती है और उसका प्रेमी इस आनंद में डूबा हुआ जैसे स्वयं अपनी मृत्यु की ही कामना कर रहा होता है.

लेकिन मृत्यु एक सोचे गये मौन से जल्द ही हमें निष्कासित भी कर देती है और तब अंतिम परिणिति के रूप में हम देखते हैं कि ‘सदा’ अपने प्रेमी के अंग भंग कर अचेत अवस्था में अपने प्रेमी के सीने पर उसी के रक्त से लिख देती है कि अब वे दोनों एक हो गए हैं.

इस विशिष्ट फिल्म में जिन ख़ास फ्रेमों में इस सत्य घटना को ढ़ाला गया है वह एक दुर्लभ कृति के रंग में सर्वप्रथम एक चेतावनी के रूप में सामने आती है फिर एक ग्लानि और अंत में हमें मूक रहने को बाध्य करती हुई अपने विध्वंस में अकेला छोड़ जाती है.

लेकिन ‘सदा’ और उसके प्रेमी के लिए इसी प्रेमावेग में सबसे गर्म और अलौकिक सूर्य उदय होता था.

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