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कश्मीरनामा : इतिहास और समकाल के दूसरे संस्करण का लोकार्पण

अशोक कुमार पाण्डेय की पुस्तक ‘कश्मीरनामा’ ने यह बता दिया है कि अच्छी शोधपूर्ण पुस्तकों के न पाठक कम हुए हैं न बाजार. राजपाल एंड संज से प्रकाशित 650 रुपये की इस पुस्तक के दूसरे संस्करण के लांच के मौके पर 25 अक्टूबर को इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर में अच्छी परिचर्चा का आयोजन हुआ. उस आयोजन की रपट लिखी है अक्षत सेठ ने. आज ‘कश्मीरनामा’ पर पुरानी दिल्ली के ‘वाल्ड सिटी’ में इस पुस्तक पर मैं लेखक अशोक कुमार पाण्डेय से बातचीत करूँगा. पहले यह रपट पढ़िए और मौका मिले तो दोपहर चार बजे पुरानी दिल्ली के ‘वाल्ड सिटी’ आइये- प्रभात रंजन

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राजपाल एंड संज, दिल्ली से प्रकाशित युवा कवि और विचारक अशोक कुमार पाण्डेय की बहुचर्चित पुस्तक “कश्मीरनामा : इतिहास और समकाल” के दूसरे संस्करण के लोकार्पण पर  बोलते हुए जाने माने इतिहासकार प्रो लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि “एक अच्छी रचना की सबसे बड़ी ख़ासियत होती है कि वह पहले अपने रचयिता को बदलती है और फिर अपने पाठक को। हिन्दी समाज मे कश्मीर को लेकर जिस तरह का अज्ञान पसरा हुआ है उसके मद्देनज़र अशोक कुमार पाण्डेय की कश्मीरनामा यह महती भूमिका निभा सकती है। कोई भी भाषा सिर्फ़ कविता-कहानी से प्रभावी भाषा नहीं बनती। आज अंग्रेज़ी अगर विश्वभाषा है तो सिर्फ़ इसलिए नहीं कि कई सदियों तक दुनिया का बड़ा भूभाग अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का ग़ुलाम रहा, बल्कि इसलिए भी कि अंग्रेज़ी में साहित्य के साथ-साथ इतिहास, विज्ञान, दर्शन, तकनीक सहित ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ रची गईं। कश्मीरनामा का महत्त्व इस रूप मे भी है कि वह हिन्दी के वांगमय में अभिवृद्धि करती है। ‘कश्मीरनामा’ को उन्होने वस्तुगत और सेकुलर इतिहासलेखन का उदाहरण बताते हुए कहा कि कश्मीर की समस्या केवल राजनीतिक नहीं बल्कि भारत और कश्मीर के अस्तित्व से जुड़ी हुई है। इस किताब का विभिन्न भाषाओं मे अनुवाद होना चाहिए ताकि लोग कश्मीर के बहुरंगी इतिहास और उस ऐतिहासिक प्रक्रिया से परिचित हो सकें जिसने कश्मीर के मौजूदा हालात को जन्म दिया है।

आयोजन का आरम्भ करते हुए लब्ध प्रतिष्ठ इतिहासकार प्रो हरबंस मुखिया ने किताब की भूमिका में प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा इसे “कश्मीर समस्या पर हिन्दी मे मुकम्मल किताब” कहे जाने को उद्धृत करते हुए कहा कि एक तरफ़ यह परिपूर्ण के अर्थ में मुकम्मल है तो दूसरी तरफ़ क़माल की किताब है। इतने लम्बे इतिहास को इतने विविध स्रोतों से समृद्ध करते हुए अशोक ने जिस रवां भाषा और क़िस्सागोई वाली शैली मे इसे लिखा है वह आपको बाँध कर रखती है। इतिहासलेखन की परम्पराओं का ज़िक्र करते हुए उन्होने कहा कि इस किताब में अशोक ने खुली शैली अपनाई है जिसमें मिथकों, लोक कथाओं, साहित्य सहित हर तरह के स्रोतों का उपयोग करते हुए कश्मीर के इतिहास की परतें खोली गई हैं। किताब के एक अध्याय के शीर्षक “ग़ुलामी की शुरुआत : मुग़लों का शासन” के हवाले से उन्होने बहुत विस्तार से उस प्रक्रिया का ज़िक्र किया जिसमें कश्मीर तीन सौ से भी अधिक सालों तक उपनिवेश जैसी स्थिति मे रहा और कहा कि आज भारत और पाकिस्तान दोनों को कश्मीरी भावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसा हल निकालने की कोशिश करनी चाहिए जिससे कश्मीरी सर उठा कर जी सके।

वरिष्ठ पत्रकार और भारत पाक मामलों के जानकार विनोद शर्मा ने कश्मीरनामा को इतिहास की एक ऐसी पुस्तक बताया जिसमें पत्रकारिता जैसा रस है। उन्होने कहा कि इस किताब मे जो गहन शोध किया गया है वह इसे एक ज़रूरी किताब बनाता है। भारत, पाकिस्तान और कश्मीर के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होने कहा कि बाजपेयी जी के समय ऐसा लगा था कि यह समस्या बस सुलझने ही वाली है लेकिन उनके अपने ही लोगों ने यह संभव नहीं होने दिया।

कश्मीर पर भारत सरकार के वार्ताकार समूह के सदस्य रहे प्रो एम एम अंसारी ने नब्बे के दशक के आतंकवाद सहित अनेक समकालीन मुद्दों पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि अशोक पाण्डेय अपने इस निष्कर्ष मे एकदम सही हैं कि कश्मीर में नियंत्रित लोकतन्त्र ने वहाँ के लोगों मे गुस्सा और अविश्वास दोनों भरा है। अपने कई रोमांचक अनुभव साझा करते हुए उन्होने कहा कि आज कश्मीर एक अंधी गली मे फँस गया है। हथियारों से इस समस्या का समाधान कभी नहीं हो सकता। ज़रूरी है कि लोगों से बातचीत की जाये और कश्मीर को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की जाये। लेकिन वर्तमान हालात मे हो इसका उल्टा रहा है। कश्मीर के भीतर तो सेना तथा सुरक्षा बल हैं ही जब कोई कश्मीरी भारत के किसी हिस्से मे पढ़ने जाता है तो उसके साथ भी दुर्व्यवहार किया जाता है। ऐसे में एक आम कश्मीरी के मन में शक और गुस्सा पैदा होना लाज़िम है। उन्होने कई उदाहरण देते हुए बताया कि सरकारों ने अनेक कमेटियाँ बनाईं लेकिन अक्सर उनकी सिफ़ारिशें आधी-अधूरी ही लागू हो सकीं। पुस्तक के प्रकाशक और लेखक को बधाई देते हुए उन्होने कहा कि बहुत दिनों बाद हिन्दी मे कोई ऐसी किताब मिली जिसे मैंने पूरा पढ़ा।

किताब के लेखक अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि कश्मीर के बारे मे भारतीय समाज में जो जानकारी है वह कम ही नहीं नकारात्मक भी है। मीडिया और व्हाट्सेप तथा दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार फैलाई जा रही अफ़वाहों के मद्देनज़र ज़रूरी है कि हिन्दी मे कश्मीर पर लगातार गंभीर लेखन हो। कार्यक्रम का संचालन करते हुए राजपाल एंड संज की मीरा जौहरी ने प्रकाशन की लंबी परंपरा का ज़िक्र करते हुए मात्र नौ महीनों में कश्मीरनामा का दूसरा संस्करण संभव करने के लिए पाठकों का आभार व्यक्त किया।

आयोजन में प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल, उज्ज्वल भट्टाचार्य, लीलाधर मंडलोई, डॉ जया कक्कड़, विकास नारायण राय, अरुण होता, अरुण त्रिपाठी, मनोहर बाथम, सुमन केशरी सहित वरिष्ठ तथा युवा बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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