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अंजलि देशपांडे का नाटक ‘अंसारी की मौत की अजीब दास्तान’

अंजलि देशपांडे के दो उपन्यास, एक कहानी पढ़कर उनका मुरीद हुआ. उनकी रचनाओं में प्लॉटिंग होती है, सामाजिक सन्दर्भ होता है और गज़ब की रोचकता होती है. उनका यह सम्पूर्ण नाटक पढ़िए- प्रभात रंजन

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                       मौत कहीं दूर से आवाज़ देती है

                                   या

                         अंसारी की मौत की अजीब दास्तान

                               अंजली देशपांडे

तीन अंक, छह दृश्य.

प्रमुख चरित्र:

अंसारी

सुनीता

हवलदार जिले सिंह

महिला हवलदार ज्योति कुमारी

पुलिस इंस्पेक्टर

हवलदार  हरिचरण

जिले सिंह के बापू

जिले सिंह कि बीवी

मुखौटा धारी कमांडो मुकेश

मुखोटा धारी कमांडो धवन

पुलिस आयुक्त

पुलिस के विशेष कोष्ठक के मुखिया

बम निस्तारण दस्ते का प्रमुख

गृह सचिव

डॉक्टर एक

डॉक्टर दो

पुलिस का ए सी पी

धवल श्याम एंकर

विचित्रा वचनी एंकर

 

अंक एक

दृश्य एक

मंच दायें बाएं दो हिस्सों में बंटा है. दोनों हिस्सों का समान होना ज़रूरी नहीं है. बायीं ओर का हिस्सा कुछ ऊपर उठा हुआ है. इस पर बीच में एक मेटल डिटेक्टर चौखट रखा है. इसके पीछे दायीं तरफ एक हिस्सा स्क्रीन से ढंका हुआ है जैसा कि अस्पताल में मरीजों के बिस्तर के चारों तरफ लगा होता है. बायीं तरफ एक टूटीफूटी मेज़ है. इसके पीछे कांच की चमचमाती दीवार सी है जिसमे से पीछे के कमरे की दीवार पर कई मशहूर नाटकों के दृश्यों और गायकों की तस्वीरें पर टंगी हुई दिखाई दे रही हैं.

(वैकल्पिक तौर पर मंच आगे पीछे दो हिस्सों में हो सकता है. ऐसे में अंसारी वाले दृश्य आगे कि तरफ हों तो बेहतर हो.)

पर्दा उठता है.

मेटल डिटेक्टर के सामने छोटी सी पांत है. दो पुरूषों के पीछे सुनीता और उसके पीछे अंसारी खड़े हैं और उनके पीछे एक पैर से दुसरे पैर पर फुदकते हुये कुछ और भी लोग हैं. बायीं तरफ मेज़ के पास महिला हवलदार  ज्योति कुमारी हाथ से चलने वाला डिटेक्टर थामे ऊबी सी खड़ी है. चौखट के दायीं ओर हवलदार जिले सिंह दांत कुरेदते खड़ा है. कुछ खीजी सी बातचीत के अस्फुट से स्वर सुनायी देते हैं. चौखट के निकट खड़ा एक आदमी जल्दी से चौखट पार करके भीतर जाना चाह रहा है. डिटेक्टर छोटी सी ‘टून’ बोलता है. जिले सिंह उस आदमी को पीछे जाने का इशारा करता है और दोबारा चौखट पार करने का इशारा करता है.

आदमी : हद है. कितनी बार पार करें? संगीत सुनने आयें हैं…सरहद पार नहीं कर रहे….

जिले सिंह: शौक ना लाग रहा हमें…

दूसरा आदमी: ज़रा जल्दी करो…घंटे भर से खड़े है……

जिले सिंह: घणी बकवाद न कर…..बुला के ना लाया तेरेको घर से…

अंसारी: अरे, थोडा पेशेंस रखिये. हमारी हिफाज़त के लिए ही कर रहे हैं. काम है उनका, क्या करें…

(सुनीता चौखट पार कर लेती है. थोड़ी लम्बी सी टूँ बजती है. महिला हवलदार उसे अपनी तरफ आने का इशारा करके हाथ में थामा मेटल डिटेक्टर मेज़ पर रख कर उसका बैग खोलती है और सामान इधर उधर करने लगती है.)

सुनीता: ज़रा ध्यान से…

(इस बीच अंसारी चौखट के पार एक कदम रख कर गुजरने को होते हैं. डिटेक्टर से खूब जोर की टूँ की आवाज़ उठती है जैसे कोई हाथी का बच्चा चिंघाड़ रहा हो)

(जिले सिंह बौखला कर अंसारी को देखता है. अंसारी चौखट पार कर चुका है. जिले सिंह जोर से उन्हें धक्का दे कर चौखट के इस तरफ धकेल देता है.)

अंसारी: अरे… (दुबारा चौखट पार करने के लिए कदम उठाता है.)

जिले सिंह: (धीरे से हकलाता सा) बम, बम… (फिर जोर से चिल्लाते हुये) बम सर, मानव बम, इंसानी बम…

(स्क्रीन के पीछे से एक इंस्पेक्टर बाहर निकलता है. अंसारी के पीछे खड़े दो तीन लोग एकदम से पलट कर भागते हैं. सुनीता महिला हवलदार से अपना बैग छीन कर वापस चौखट से बाहर आ जाती है)

सुनीता: (अंसारी कि बांह पकड़ कर) चलो, भागो यहाँ से

अंसारी: (बांह छुडाते हुये) क्यों? छोड़ो.. कुछ गलत थोड़े किया है हमने….

सुनीता: बहस मत करो. चलो… (उन्हें घसीटते हुये मंच के ऊपर उठे हिस्से से नीचे उतरने को होती है)

जिले सिंह: (जहाँ खडा था वहीँ से) भाग रहे हैं…

इंस्पेक्टर (चौखट को लात मर कर) : चेकिंग बंद.

(फुर्ती से इंस्पेक्टर चौखट के पीछे शीशे का दरवाज़ा बंद करता है. महिला हवलदार उसकी मदद करती है. इंस्पेक्टर जिले सिंह को धौल जमाता है.)

इंस्पेक्टर : ले जाओ इनको उधर. (मंच के दायीं ओर इशारा करता है). वहां इनको घेर कर रखो. मैं बम डिस्पोजल स्क्वाड को फ़ोन करता हूँ.

(कुछ पुलिस वाले, महिला हवलदार समेत, सुनीता और अंसारी को घेर कर घसीटते हुये दायीं ओर ले जा रहे हैं.)

इंस्पेक्टर (वापस स्क्रीन के पीछे की ओर जाते हुये): क्या किस्मत है सर, क्या किस्मत है. मंत्रीजी आने वाले हैं इसीलिए तो ऐसा मेटल डिटेक्टर मिला. एक्चुअल में काम करता है सर, पकड़ा गया. देखिये, कितनी हिम्मत. हाँ, हाँ… जल्दी बताईये (वह स्क्रीन के पीछे चला जाता है.)

(मंच का बायां हिस्सा अब अँधेरे में है और दायें हिस्से में रोशनी  हो गयी है. पुलिसवाले अंसारी और सुनीता को यहाँ ले आये हैं और घेर कर खड़े हो गये हैं.)

जिले सिंह: नाम बताओ अपना, नाम जल्दी से

अंसारी: अंसारी, (गहरी सांस लेकर मुस्कुराते हुये कहते हैं) अहमद अंसारी.

ज्योति कुमारी : ज़रूर, ज़रूर बम है यह तो…

जिले सिंह: बम कहाँ है? कहाँ है बम?

अंसारी: क्या?

सुनीता: छोड़ दो उन्हें. यह कोई बम नहीं

जिले सिंह: नाटक मत कर. बम है तेरे पे, बता कहाँ है?

(एक पुलिसवाला अंसारी की पीठ पर लात मर देता है. वह गिर पड़ता है. सुनीता उसकी ओर लपकती है मगर महिला हवलदार उसे जोर से बांह पकड़ कर पीछे खींच लेती है. सुनीता उससे बांह छुड़ा कर उस पुलिसवाले को चांटा लगा देती है जिसने अंसारी को लात मारी थी)

सुनीता: शर्म नहीं आती? बाप के उम्र के आदमी पर हाथ उठाते हो?

वही पुलिसवाला (सुनीता की बांह पीछे की ओर मोड़ कर): तो तू बता बम कहाँ है?

(अंसारी का कुरता अस्त व्यस्त हो कर ऊपर को खिसक आता है. उसके नीचे एक बेल्ट दिखाई देती है जिससे दो उपकरण लटक रहे है. एक चार्जर जैसा दिखता है. दूसरा बैटरी जैसा. कुछ पुलिसवाले इन चीज़ों को देख सन्नाटे में आ जाते हैं.)

दूसरा पुलिसवाला : ओ, माईए देख तो, यह रहा बम…..

अंसारी (ज़मीन पर बैठे बैठे): सुनो, मैं बताता हूँ. सुनो, आपको बड़ी ग़लतफहमी हुयी है. मेरा दिल है न, लोहे का है.

जिले सिंह : वह तो दीख रहा है, भोंसड़ी के.

(इंस्पेक्टर एक हाथ में बन्दूक और दूसरे हाथ में मोबाइल फ़ोन लेकर आ जाता है.)

इंस्पेक्टर: (इशारे से जिले सिंह और कुछ पुलिसवालों को अपनी ओर बुला कर अकेले साइड में बात करते हुये) बताया कुछ इसने?

जिले सिंह: बड़ा ढीठ है सर…..

इंस्पेक्टर: स्क्वाड कह रहा है इससे पूछो, यह बचना चाहता है क्या? मैंने गाडी बुला ली है. सारे गायक, तबलची सबको ले जायेंगे. सारा थिएटर खाली करना होगा. साली ऐसी ऐसी मुसीबतें भी हमारी ही ड्यूटी पर आनी थी. उधर मंत्री का पी ए है कि फ़ोन नहीं उठाएंगे. साले एयर कंडीशन में आराम कर रहें हैं. मंत्री को रोकना होगा कि नहीं? फ़ोन नहीं उठाएंगे तो इनकी माँ रोकेगी उस मोटे भैंसे को? यहाँ आ मरा तो नौकरी और जायेगी.

(इंस्पेक्टर का फ़ोन बजता है.)

इंस्पेक्टर (फ़ोन उठा कर): सर, कब से लगा रहा हूँ मैं फ़ोन आपको. मंत्रीजी निकल तो नहीं लिए? गनीमत है सर, गनीमत …(कुछ पल रुक कर सुनता है)… नहीं, नहीं, मंच वगैरह सब तैयार है, लाइटिंग हो गयी, (फिर कुछ सुनता है)…… हाँ सर, सब आ गए हैं……. आप बात तो सुनिए सर, मंत्रीजी को रोकिये सर. सर, बम है यहाँ…….. हाँ सर, बम, बम, इंसानी बम सर…………क्या बात करते हैं आप….हम किस दिन के लिए हैं. हमारे होते क्या बाल भी बांका हो सकता है उनका, सर, सिन्हा हियर सर, सिन्हा, इनस्पेक्टर सिन्हा सर, मंत्रीजी के लिए ही ना इतनी मेहनत कर रहे हैं. जान दांव पर लगा दी है सर, जान, बस उनको आने न दीजिये …. याद रखे सर, सिन्हा सर…सिन्हा हियर….

(फ़ोन कट जाता है.)

इंस्पेक्टर (बुदबुदाते हुये): मीडिया को ही बताना होगा साले … नहीं तो ऊपर के लोग ले जाते हैं मेडल, काम करें हम और (स्क्रीन के पीछे चला जाता है)

जिले सिंह: (अंसारी से) सुन, मेरे को बता दे चुपचाप. बम किधर है. वह जो तेरे कुरते के नीचे है वही है ना? मैं बचा लूँगा थारे को. आ रहा है न स्क्वाड. बहुत बड़े माहिर लोग हैं. बहुत कुछ जानते हैं. सारे बम के बारे में. आते ही ना तेरा बम कैन्सील कर देंगे. एकदम एक झटके में. बचना है न?

अंसारी: आप समझ नहीं रहे…. आप को जब बात ही समझ में नहीं आ रही तो कौन बचाएगा? आपसे कौन बचाएगा मुझे?

महिला हवलदार ज्योति कुमारी : (सुनीता से) कम से कम यही बता दो कब फटना है बम को. फटेगा तो यह भी तो मरेगा ना, कौन लगता है तुम्हारा? खसम है?

सुनीता: मैं कह रही हूँ यह बम नहीं हैं….इनका दिल लोहे का

जिले सिंह: हमारा दिल भी फौलाद का है. क्या समझी? नहीं तो बैठे होते तेरे धोरे हम? अभी भी कुछ न बिगड़ा. बता दे, बम किसने लगाया. कौन करवा रहा है यह सब तुमसे?

 (नेपथ्य से गाड़ियों/जीपों के चलने की आवाज़ आती है.)

कुछ आवाजें:  ‘क्या हुआ?’ ‘बम?’ ‘कार्यक्रम केन्सील?’ ‘क्या ज़माना आ गया है’….

(फिर गाड़ियों के चलने की आवाज़ आती है. मंच का बायां हिस्सा अँधेरे में गुम हो जाता है.)

(इंस्पेक्टर फिर वहां आ जाता है.)

इंस्पेक्टर: चलो, हॉल तो खाली हुआ. (अंसारी की ओर देख कर) अबे, माँ के…कब फटना है तुझे? बचना है तो बता दे…

अंसारी: आप समझ नहीं रहे, मेरा दिल लोहे का है…

इंस्पेक्टर: (गुस्से में तिलमिला कर) दिखाएँ तेरेको कितने लोहा है हमारे अन्दर? (मुड कर जिले सिंह से) ले जाओ इसको आउटराम लाइन्स. स्क्वाड वहीँ पहुंचेगा.

सुनीता: सुनिए, मेरी बात सुनिए, यह सच कह रहे हैं. इनका दिल, इनका हार्ट लोहे का है. मेरे पास इसका मेडिकल सर्टिफिकेट भी है.

(जिले सिंह अपना मोबाइल फ़ोन जेब से निकलता है. एक नंबर घुमाता है.)

फ़ोन की मशीनी आवाज़: आप जिस सब्सक्राइबर से बात करना चाहते हैं वह इस समय फ़ोन नहीं उठा रहे हैं. कृपया थोड़ी देर बाद…

(जिले सिंह चिडचिडा कर फ़ोन काट देता है. तभी फ़ोन मटक मटक कर बजने लगता है ‘तेरे मस्त मस्त दो नैन’ या कोई और गीत)

जिले सिंह: (कांपते हाथों से फ़ोन उठाता है. लाउडस्पीकर का बटन दब जाता है.)

जिले सिंह कि पत्नी: (मंच पर आगे कि तरफ किसी कोने में प्रकट हो कर): क्या है जी? फ़ोन किया था?

जिले सिंह: तन्ने कभी फुरसत होवे है फ़ोन उठाने की? सुन, मने कह रहे हैं मानव बम को सत्रा किलोमीटर दूर ले जाण वास्ते..

पत्नी: के कह रहे हो. ज़रा सांस लेकर बोलो तो…

जिले सिंह: सांस लेण को बचने न वाला मैं…अरे इंसानी बम आ गया है…मेरे कु कह रहे हैं ले जाओ जीप में बिठा कर. रास्ते में फट गया तो चीथड़े ना मिलने के…

पत्नी: सुनिए जी, नौकरी…

(एक आदमी पत्नी के हाथ से फ़ोन छीन लेता है. वह फौरन साडी का आँचल खींच कर अपने चारों ओर लपेट कर गुडमुड हो कर नीचे बैठ जाती है)

जिले सिंह: बेरा ना के कहने जा रही थी सुसरी, नौकरी बजाने की कह रही थी कि छोडण की, बापू ही पास में डोला करे चौबीस घंटे…

आदमी: के बात से?

जिले सिंह: अरे, मरण जा रहा हूँ बापू. होर के? एक बम आ मरा है. इसको ले जाण कह रहे हैं, इब तो मैं न आता लौट के घर को … भाज के आ जाऊं?

आदमी: होर जो तीन लाख रुपये दिए तेरी नौकरी लगवाने के? एक पैसा न कमाया अभी तक. सालों ने एक दिन टिराफीक की ड्यूटी ना दी कि बन्दा कुछ कमा ही ले….कोई इन्साफ ही न रहा दुनिया में. थू…

जिले सिंह: मेरी जान खतरे में है बापू, पैसे की…

आदमी: मुआवजा तो देंगे? कोई तमगा तो देंगे? कोई इनाम, कोई गैस एजेंसी ही दे दें शायद. जा तेरा भला हो. यह टाइम स्वारथ का है कोई? कुणबे की सोच. शहीद होण जा रहा है….जा तेरा रब राखा…(फ़ोन काट देता है)

एक सब इंस्पेक्टर: जल्दी जीप लगाओ.

(जीप आ लगती है. सुनीता और अंसारी को खींच कर जीप के पीछे की तरफ ले जाया जाता है. उन्हें भीतर ठेल कर हवलदार हरिचरण, जो जीप चला रहा है, ज़ोरों से हॉर्न बजाता है. जिले सिंह अभी भी फ़ोन पर लगा है.)

हरिचरण: अबे, जल्दी कर हरामी के…उड़ जायेगी जीप कभी भी..

जिले सिंह: अबे तेरे को ही मिलना था यह काम भी? धीरे चलना, नहीं तो बम तो बाद में फटे तू पहले मार देगा अपनी स्पीड से

हरिचरण: तब तो बम फटा ही फटा समझ. ठाठ से मरेंगे. दस बीस को साथ ले जायेंगे. यमराज भी देख के खुस हो लेगा कि आये हैं कोई वी आई पी…मौत आये तो जरा शान की आये …. हो हो डरपोक साला….

(जिले सिंह जीप में कूद कर बैठ जाता है. महिला हवलदार ज्योति कुमारी पीछे का पिंजरा बंद करके ताला लगाती है और चाबी ले जा कर हरिचरण को पकडाती है. इंस्पेक्टर सिन्हा दौड़ कर बाहर आता है. जीप चल पड़ती है)

इंस्पेक्टर: जिले सिंह, हरिचरण, देश तुमको याद रखेगा. शाबाश.

(वह पसीना पोंछता हुआ पीछे गुम हो जाता है. अब मंच पर अँधेरा है. सिर्फ आगे कि तरफ जीप दौड़ रही है. पर्दा गिरता है)

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अंक एक

दृश्य दो

(दायाँ हिस्सा रोशनी में है. एकदम दायें हिस्से में बैरक नुमा कुछ कमरे बने हैं जिनमे से एक कमरा दर्शक दीर्घा के सबसे निकट है और साफ़ दिखाई देता है. इसका दरवाज़ा मंच के केंद्र की ओर खुला है और कमरे में सिर्फ एक पंखा और एक पीला बल्ब चमक रहा है. पंखा बंद है. इसके सामने मंच के केंद्र और कमरे के दरवाज़े के बीच मैदान सा है और बाहर की ओर की दीवार दिखाई देती है. पुलिस की गाडी के सायरन की आवाज़ दूर से नज़दीक आती है और बंद हो जाती है. एक काफिला सा कमरों कि ओर बढ़ता है. आगे जिले सिंह है, पीछे सुनीता अंसारी कि बांह थामे हुये और उनके पीछे है हरिचरण एक पिस्तौल ताने. सुनीता धीरे से अपना बैग खोल कर मोबाइल फ़ोन निकाल लेती है.)

हरिचरण: चुपचाप चले चलो. नहीं तो गोली मार दूंगा…

जिले सिंह: (हो हो करके हँसता है) बम पे गोली चलाएगा

(सुनीता एकदम से मुड कर अंसारी के सामने खड़ी हो कर मोबाइल लहराती है).

सुनीता: आगे नहीं बढना…नहीं तो बम फोड़ दूंगी

(हरिचरण और जिले सिंह रुक जाते हैं. सुनीता मोबाइल पर कुछ बटन दबाने लगती है.)

अंसारी: क्या कह रही हो? यह तो मान ही लेंगे कि बम है….

सुनीता: मानने दो, तभी तो मैं कुछ दोस्तों को खबर …. (मोबाइल में) हाँ रूपा, सुनो, रूपा, समथिंग टेरिबल हैस हैपेंड ….. हां धिस इस एन इमरजेंसी…..सुनो, धिस स्टुपिड पुलिस…इन्होने अहमी के हार्ट को बम मान लिया है और हमें पकड़ कर ले आये हैं आउटराम लाइन्स. प्लीज फाइंड हेल्प रूपा, प्लीज हेल्प…….इट इस अ  फैक्ट. नोट अ जोक… नो ऑफ़ कोर्स, नॉट जोकिंग ….यस, यस, आउटराम लाइन्स…

(हरिचरण अब तक घूम कर सुनीता के पीछे आ जाता है और अचानक अपना घुटना उसकी पीठ में धंसा देता है. सुनीता लड़खड़ा जाती है. उसके हाथ से मोबाइल छूट जाता है. उसका बैग गिर जाता है. जिले सिंह लपक कर दोनों उठा लेता है. हरिचरण सुनीता को घसीटता और जिले सिंह अंसारी को धकियाता है. दोनों को कमरे में बंद कर दिया जाता है.)

सुनीता: (गुस्से में) स्टुपिड, स्टुपिड. न कुछ सुनते हैं, न समझते हैं.

(अंसारी थके से ज़मीन पर बैठ जाते हैं, सुनीता उन्हें देख कर खुद पर काबू पाती है)

सुनीता: शायद कोई बड़ा अफसर आ जाए. क्या कह रहे थे? बम डिस्पोजल स्क्वाड आएगा? आने दो. वे तो ट्रेन्ड होते हैं. उनको फौरन पता चल जाएगा सब कुछ. सब जल्दी ही ठीक हो जाएगा. (अंसारी के बगल में बैठ कर ) तुम घबराओ मत…तुम्हारा बी पी

अंसारी: (बांह छुडाते हुये) भाड में जाए बी पी

सुनीता: धीरज रखो…

अंसारी: (सर ऊपर नीचे हिलाते हुये) ज़रूर, कितनी चोइसेस हैं मेरे पास, धीरज रखूँ, या शांत रहूँ, या चुप रहूँ, या बहस न करूँ ….आइ ऍम सो लकी टू बी इन अ डेमोक्रेसी….

(एक गाडी के आने की आवाज़ दूर से नज़दीक आती है और थम जाती है. दीवार के पार से दो आदमी कुछ प्लायर्स, पेंचकस, आदि कुछ उपकरण लेकर कमरे की ओर आते हैं. इनके पीछे खाली हाथ धवन आता है. मैदान में खड़े जिले सिंह और हरिचरण धवन को सलाम करते हैं.)

धवन: कहाँ है तुम्हारा बम?

हरिचरण (छाती फुलाये हुये गर्व से) : ले आये सर, यहाँ ला कर बंद कर दिया……

धवन: वाह क्या कमाल किया….दोनों को एक ही कमरे में रखा होगा, क्यों?

जिले सिंह: जी सर, जी बिलकुल सर

धवन: ताकि दोनों उड़ जाएँ संग संग, और कोई ना बचे देने एक भी सुराग…छांट के भरती करते हैं. (कड़क कर) निकालो एक को बाहर और ले जाओ दूर कमरे में…

(हरिचरण कमरे के अन्दर जाकर सुनीता पर पिस्तौल तान कर उसे बाहर चलने का इशारा करता है.)

सुनीता: नहीं जाऊँगी

धवन: (बाहर से): मैडम इधर आइये, आपसे बात करनी है…..

सुनीता : यहीं से बात करो. मैं अपने पति को छोड़ कर नहीं जाऊंगी. आप लोगों ने ना जाने क्या समझ लिया है हमको. मैं एक प्रोफेसर हूँ, नागरिक हूँ, मेरे हक हैं कुछ…

जिले सिंह : सारे हक तो क्रिनिमिनलों के ही होते हैं…….

धवन: चोप. मैडम, आप आकर समझायेंगी तो ना समझेंगे… बताइये हमारा क्या कसूर है. हम तो अपना काम ही कर रहे हैं. कोई बम होगा तो पूछताछ तो करना ही होगा न…

सुनीता (अंसारी से) : लगता है अब बात सँभलने वाली है. तुम घबराना नहीं.

(सुनीता बाहर आती है.)

धवन: आपका नाम ?

सुनीता: सुनीता. इतिहास पढ़ाती हूँ.

धवन: किस कॉलेज में? (वह पीछे को चलने लगता है. सुनीता उसके पीछे चलती जाती है.)

सुनीता: आपने सुना नहीं? मैं प्रोफेसर हूँ. हम कॉलेज में नहीं विश्वविद्यालय के संकाय में पढ़ते है, माने डिपार्टमेंट में…मेरे पति भी प्रोफेसर थे… रिटायर हो गए अभी डेढ़ साल पहले… वे फलसफा पढ़ते हैं, पढाते थे. आपको लगता है हम टेररिस्ट हैं? हम तो उनके खिलाफ आवाज़ उठाने वालों में हैं….

(धवन पीछे अँधेरे में गुम हो गया है और सुनीता भी धीरे धीरे उसके पीछे चलती हुई आँखों से ओझल हो जाती है. एक दरवाज़े के धडाम से बंद होने की आवाज़ आती है. फिर सुनीता की चीख.)

सुनीता: छोड़ दो मुझे. यहाँ क्यों बंद कर दिया….

(दरवाज़ा पीटने की आवाज़ आती है)

(धवन वापस रोशनी में आता है कमरे के पास जहाँ अब दो आदमी, जिनमे एक मुकेश है, जल्दी जल्दी अपने चेहरों पर मास्क चढ़ा रहे हैं. वह गर्व से जिले सिंह और हरिचरण को देखता है. मुकेश दरवाज़े के भीतर झाँक कर अंसारी को सर से पैर तक गौर से ताड़ता है.)

मुकेश: कैसा बम लगा है? जल्दी बताओ. तभी तो बचा पाएंगे तुम्हे. बचना चाहते हो न?

अंसारी: किससे?

मुकेश (धवन से): सर, यह तो ऐसे बन रहा है जैसे इसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा.

धवन: उलटा टांग के देंगे तलुओं पर चार तो सब समझ आ जाएगा…मैं भी क्या कह रहा हूँ….दिमाग सनक गाया है साला. यह तो सबको साथ ले उड़ेगा……

(दोनों दरवाज़े के पास जा कर अंसारी को गौर से देखते हैं.)

मुकेश: (फुसफुसा कर) सर, इसका कुरता बीच से कुछ उठा उठा सा लग रहा है, बम भी वहीँ होगा

(धवन भौहों से इशारा करता है. मुकेश चुस्ती से अन्दर जाकर अंसारी के कुरते के गिरेबान में हाथ डाल कर खींच लेता है. वैकल्पिक तौर पर वह कुरता ऊपर भी उठा सकता है. अंसारी के पैंट की बेल्ट से दो उपकरण लटक रहे हैं. एक बैटरी जैसा दिखता है, दूसरा चार्जर जैसा. यह चार्जर लम्बी स्टील की टयूब सी दिखनी चाहिए, किसी मोबाइल के चार्जर की तरह नहीं. इसमें से एक मज़बूत और मोटा तार निकल कर अंसारी के कंधे से होती हुये उसके कान के पीछे जा रहा है.)

(मुकेश एक बार को घबरा कर पीछे हो जाता है.)

मुकेश: मिल गया, मिल गया… यह रहा बम

(दरवाज़े के पास खडा धवन पीछे हो जाता है. जिले सिंह और हरिचरण पलट कर भागने को होते हैं फिर धवन को देख कर रुक जाते हैं. मुकेश प्लायर्स लेकर अंसारी कि ओर बढ़ता है और तार को पकड़ कर धीरे धीरे बड़े ध्यान से काटने लगता है.)

अंसारी: (पीछे हटते हुये) क्या करने जा रहे हो? जानते भी हो यह क्या है? जानते हो कितना कीमती है यह.

मुकेश: तो तुम्हे कीमत भी मालूम है इसकी? बताओ, बताओ. क्या कीमत है? और भी सब बताओ.

अंसारी: बताता हूँ. सब बताता हूँ. जार्विक असिस्ट डिवाइस कहते हैं इसको.

मुकेश: फिर से नाम लो. (मुड कर दरवाज़े पर खड़े दूसरे मास्क वाले आदमी से) नाम है बम का. नोट करना.

अंसारी: यह बम नहीं है. नकली दिल है. मेरा दिल बहुत कमज़ोर था. मैंने नकली दिल लगवा लिया है . आर्टिफिशियल हार्ट. मेरे दिल के अन्दर फिट हुआ है यह नकली दिल. टाइटेनियम से बना है. देखो यह चार्जर है, इससे दिल चार्ज होता है. इस बेल्ट में इस दिल की बैटरी है. हाँ, देख रहे हो? यह अन्दर के दिल से जुडा है. देखो मेरे कान के पीछे इसका प्लग भी है.

(अंसारी अपने दायें कान को आगे खींचता है. मुकेश लपक कर पीछे हो लेता है.)

अंसारी (आगे को बढ़ते हुये) : हर चौबीस घंटे में मुझे इसको चार्ज करना पड़ता है. हर चौबीस घंटे में. सुबह से पहले मुझे इसे चार्ज करना ही पडेगा.

(मुकेश फर्राटे से कमरे से बाहर हो जाता है. धवन और दूसरा मास्क धारी भी भागते हैं. जिले सिंह और हरिचरण भी उनके पीछे हो लेते हैं. कुछ दूर जाकर धवन रुकता है)

धवन : अरे, तुम भाग आये. बम निरस्त कौन करेगा?

मुकेश: सर, उसकी ज़रुरत नहीं. उसने कहा ना हर चौबीस घंटे में उसे बम को चार्ज करना पड़ेगा. बस, बिजली काट दो…

धवन: कहाँ है, मेन स्विच कहाँ है?

जिले सिंह: इधर सर….

(सब रोशनी  के दायरे से बाहर हो जाते हैं. पूरे मंच की बिजली गुल हो जाती है. अंसारी एकाएक अँधेरे में डूब कर चीखता है.)

अंसारी: रोशनी क्यों गुल हो गयी……..मुझे रोशनी  चाहिए….

सुनीता की चीख सुनायी देती है….

सुनीता: कोई तो सुनो, सुनो, बत्ती जलाओ कोई, यह अन्धेरा दूर करो…..

 

 

 

 

अंक दो

दृश्य एक

(मंच के बाईं ओर मेज़ के पीछे पुलिस आयुक्त और बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख बैठे है. )

पुलिस आयुक्त: कोई कोई दिन कैसा मनहूस निकलता है. मैंने इंग्लैंड का ट्रिप प्लान किया था…मेरी साली रहती है वहां. शादी है उनके घर…अब देखो कब इस झमेले से फुर्सत मिलेगी…आईये बैठिये.

बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख: होम सेक्रेटरी आ रहे हैं क्या?

पुलिस आयुक्त: यहाँ? आप को आज के दिन भी मजाक सूझ रहा है क्या? वो और यहाँ? बैठे हैं घर पर. हॉटलाइन है न. टेक्नोलॉजी है तो क्या ज़रुरत है…हाँ, स्पेशल सेल…’विशेष कोष्ठक’ के मुखिया आ रहे हैं. पहुँच ही रहे हैं.

(विशेष कोष्ठक के मुखिया का प्रवेश)

कोष्ठक के मुखिया: गुड इवनिंग…हमारे लिए तो ऐसे ही इवनिंग गुड होते हैं…क्यों? क्या कहते हैं आपके बम निस्तारण वाले? बम निरस्त हो गया?

पुलिस आयुक्त: असली काम तो हम कर चुके. हमारे बहादुर सिपाही ले गए बम को उठा के. अब तो फटे भी तो कहीं दूर फटेगा..

बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख: तो सैंड बैग लगवा दें? बस काम ख़तम!

पुलिस आयुक्त (चिढ कर) : इनफ. जेंटलमेन, इनफ. होम सेक्रेट्री इस वेटिंग.

विशेष कोष्ठक के प्रमुख: गृह सचिव, कहिये, जनाब, हिंदी में…..

पुलिस आयुक्त: श्योर. गृह सचिव. मैं अपडेट देता हूँ. (फ़ोन उठा कर मेज़ पर रखते हैं.) सर, आपको मेरी आवाज़ सुनायी दे रही है?

(गृह सचिव एकदम बाएं कोने में एक स्पॉटलाइट में एक सोफे पर बैठे हैं.)

गृह सचिव: हूँ

पुलिस आयुक्त: सर, आप तो जानते ही हैं, सूफी संगीत का कार्यक्रम था. गृह मंत्री, जो कि कला के बड़े माहिर हैं, सूफी संगीत के तो ख़ास तौर से दीवाने हैं, पहुँचाने वाले थे. सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम थे. यह बम वहीँ मेटल डिटेक्टर को पार करने की कोशिश में पकड़ा गया. इसका नाम अहमद अंसारी है. कम से कम कहता तो यही है. बीवी हिन्दू है सर. सुनीता नाम बताती है अपना.

गृह सचिव: हूँ. शक के पुख्ता आधार हैं.

विशेष कोष्ठक के मुखिया: अजीब बात है. बहुत ही अजीब. बम इस तरह खुले आम वहां क्यों गया?

पुलिस आयुक्त: सर, आप ठीक कह रहे हैं. उसकी बीवी ने बम होने की पुष्टि भी कर दी है. उसने हमारे बहादुर सिपाहियों को धमकाया कि बम फोड़ देगी और एक फ़ोन भी कर दिया. लेकिन हमारे मुस्तैद सिपाहियों ने बात पूरी नहीं होने दी, और फ़ोन छीन लिया.

विशेष कोष्ठक के मुखिया: मोबाइल को तो उसी समय छीन लेना चाहिए था जब अंसारी को थिएटर के बाहर पकड़ा गया…

पुलिस आयुक्त (उन्हें अनसुना कर): विशेष कोष्ठक अभी उस नंबर को ट्रेस कर रहा है…. (विशेष कोष्ठक के मुखिया की ओर देख) कब तक हो जाएगा?

विशेष कोष्ठक के मुखिया: (नाराज़ हो कर) हो रहा है.

(तभी बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख के मोबाइल कि घंटी बजती है. वे हाथ उठा कर सबको चुप रहने का इशारा करते हैं. )

पुलिस आयुक्त: सर, एक सेकंड, फ़ोन आ रहा है. रुकना पडेगा.

(फ़ोन पर धवन है. बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख फ़ोन का स्पीकर ऑन करके उसे फ़ोन के चोगे के पास मेज़ पर रखते है.)

बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख: धवन, बोलो.

फ़ोन पर आवाज़ धवन की : सर, यह मामला बहुत गंभीर है. उसके पास जैसा बम है उससे हम परिचित नहीं हैं. वह तो खैर मानने को तैयार नहीं है कि बम है लेकिन कह रहा है जो भी है उसके दिल के अन्दर फिट है. एक बेल्ट भी पहने है. उससे बैटरी और चार्जर लटक रहे हैं. कहता है हर चौबीस घंटे में चार्ज करना ज़रूरी है.

पुलिस आयुक्त: तो? तुम किस तरह के बम निरस्त करते हो? जो बच्चे बनाते हैं, कबाड़ के सामान से?

फ़ोन पर धवन की आवाज़ : सर, हमें सेना की ज़रुरत है. उसने नाम भी बताया है बम का, बताया क्या सर, हमने पूछताछ में उगलवा लिया…क्या नाम बताया था, मुकेश? कुछ अजीब सा नाम था. क्या कहा था किस चीज़ से बना है?

मुकेश की आवाज़: सर, याद नहीं पड़ रहा…

धवन: साफ़ सुनाई नहीं दिया सर, लेकिन उसमे कुछ नियम था

पुलिस आयुक्त (खीझ कर) : नियम? नियम कायदे तो होंगे ही. तुम इस फ़ोर्स में नए तो नहीं हो. जानते हो कितने नियम हैं? नियम ही नियम हैं. लेकिन कोई नियम हमें रोक नहीं सकता. भूल जाओ नियम को. बम निरस्त करो ताकि हम उससे पूछताछ कर सकें.

धवन की आवाज़ : सर, सॉरी सर, मैं उस नियम की बात नहीं कर रहा. जनाब, हिंदी वाला नियम नहीं. बम जिस चीज़ से बना है उस चीज़ के नाम में कोई नियम सा कुछ था. मैंने कहीं पढ़ा भी है हाल ही में. शायद अखबार में. जब परमाणु बम परीक्षण हुआ था तब शायद पढ़ा है….

गृह सचिव: तुम लोग एकदम बेवक़ूफ़ हो. क्या वह यूरेनियम की बात कर रहा था?

धवन: मुकेश जा कर पूछ के आओ…

पुलिस आयुक्त: सर, क्या बात है. आपने फिजिक्स पढ़ा था कॉलेज में, आज देखिये सर देश के कितने काम आ रहा है. वरना हम तो अँधेरे में तीर चलाते रहते…

धवन: सर, कैदी बिलकुल कॉपरेट नहीं कर रहा. बताने से इनकार कर रहा है. कई बार पूछा मगर कहता है कुछ नहीं बताएगा…मगर उसमे कुछ ‘ट’ जैसा अक्षर था.

गृह सचिव: प्लूटोनियम? तुम कह रहे हो कि यह परमाणु बम है?!

(मेज़ के इर्द गिर्द बैठे सब चौंक कर एक दूसरे को देखते हैं. पुलिस आयुक्त बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख को देखते हैं, दोनों के हाथ कांपने लगते हैं, और वे विशेष कोष्ठक के मुखिया को देखते है और फिर तीनो मेज़ पर रखे फ़ोन को.)

पुलिस आयुक्त: सर, क्या करें सर? एटोमिक रीसर्च सेंटर को फ़ोन करें? क्या करें सर? इस बम को तो निरस्त करना ही पडेगा…

विशेष कोष्ठक के मुखिया (मूंछ पर ताव देते हुये और अर्थपूर्ण मुस्कान फेंकते हुये): सर, आप सीधे बम से बात क्यों नहीं करते? आप फिजिक्स जानते हैं. आप जानते हैं कैसे क्या पूछना है. हम उस बम को मोबाइल पकड़ा देंगे….आप सीधे बात करिए सर…

बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख: गुड थोट

पुलिस आयुक्त (उनकी बात में करेक्शन के अंदाज़ में): यू मीन, गुड आईडिया

विशेष कोष्ठक के मुखिया: थैंक यु सर, बोथ सर्स

(मंच के बाईं तरफ झुटपुटा सा होता है ताकि अंसारी दिखाई दे. अंसारी एक कोने में बैठे हैं, दीवार से सर टिकाये. निढाल. एकदम पस्त. धीरे से दरवाज़ा खुलता है और एक मोबाइल फ़ोन नीचे फर्श पर रख कर उनकी ओर खिसका दिया जाता है.)

मुकेश: बात करो. गृह सचिव का फ़ोन है.

(अंसारी चौंक कर जागते से हैं. जल्दी से फ़ोन के पास खिसक कर उठाते हैं.)

अंसारी: हेल्लो, हेल्लो… इस इट ट्रू? इस इट ट्रूली द होम सेक्रेटरी?

गृह सचिव: यस, यस. आप मुझसे तफसील से बात कीजिये. ठीक से बताइये क्या हो रहा है…

अंसारी: थैंक यू सर, थैंक यू. थैंक यू फॉर टाकिंग टू मी, सर, इसी को डेमोक्रेसी कहते हैं. अब सब कुछ साफ़ हो जाएगा सर. देखिये इन लोगों ने मुझे आतंकवादी समझ लिया है. मैं कोई बम नहीं हूँ. कोई बहुत ही बड़ी ग़लतफ़हमी हो गयी है इनको. समझ ही नहीं पा रहे मैं क्या बता रहा हूँ….

गृह सचिव: मुझे बताइये. ब्रीफ में. हाँ, जल्दी

अंसारी: बताता हूँ. मैं एक रिटायर्ड प्रोफेसर हूँ. आप चेक कर सकते हैं. फिलोसोफी पढाता रहा हूँ. मेरा दिल कमज़ोर था. मुझे हार्ट फेल्योर की बीमारी थी. आप समझते हैं ना, हार्ट अटैक नहीं, हार्ट फेल्योर. इसमें दिल की मांसपेशियाँ, मसल्स, मसल्स, सर, धीरे धीरे कमज़ोर पड़ते पड़ते बंद हो जाती हैं. इसका कोई इलाज भी नहीं है. मेरे डॉक्टर ने मुझे बताया कि एक नकली दिल बना है, किसीने बनाया है विदेश में. वे लोग प्रयोग के लिए वॉलंटियर ढूंढ रहे हैं. इसमें खतरा भी था. लेकिन मैं तो यूँ भी मर ही रहा था. मैंने अपना नाम दे दिया कि चाहें तो मुझ पर आज़मा लें. मुझ पर एक्सपेरीमेंट कर लें. बड़ी महंगी चीज़ है. मुझ जैसे गरीब प्रोफेसर की  क्या औकात कि ऐसा महँगा इलाज करा ले. एक्सपेरिमेंट था, सो उन्होंने मुझ पर कर लिया. सारे खर्चे दिए. मुफ्त में यह नया और नकली दिल मुझमें लगा दिया. बहुत ही जानी मानी चीज़ है सर. जार्विक असिस्ट डिवाइस कहते हैं इसे.

गृह सचिव: क्या नाम बताया? जार्विक असिस्ट डिवाइस? स्पेल्लिंग बताएं ज़रा…

अंसारी: जे ए आर वी आई के … ए एस एस आई एस टी…. डी ई वी आई सी ई

(गृह सचिव सामने रखे नोटबुक पर लिखता है.)

अंसारी: किसी भी हार्ट सर्जन को मालूम होगा. एक्सपेरिमेंटल है मगर जाना माना है. पूरे दो महीने मैं अस्पताल में रहा. फिर महीनों घर पर रहा कि कोई इन्फेक्शन न हो. ऑपरेशन के बाद आज पहली बार घर से निकला था सर. मेरी बीवी है, सुनीता. उसके बैग में तो इसका मेडिकल सर्टिफिकेट भी है. इन लोगों ने दिखाने ही नहीं दिया. अनपढ़ हैं सर. इग्नोरेंट हैं. मगर आप समझ सकते हैं. आप अगर सुनीता को घर जाने दें तो वह सारे मेडिकल पेपर्स ले आयेगी. एकाध घंटे में सारी बात साफ़ हो जायेगी. उसको भी इन्होने बंद कर रखा है. उसे जाने दीजिये सर. सारे सबूत मिल जायेंगे आपको कि मैं सच बोल रहा हूँ…

गृह सचिव: हूँ…..सुन ली मैंने बात आपकी… यह बताइये यह जो डिवाइस है, किस चीज़ का बना है?

अंसारी: सर इन्होने या तो बिजली काट दी है. या फिर यहाँ पर लाइट नहीं है सुनिए, मेरा जो दिल है उसको चौबीस घंटे में एक बार चार्ज करना पड़ता है. प्लीज पावर रिस्टोर करा दीजिये या मुझे शिफ्ट कराईये. जल्दी कुछ कीजिये. आप तो कुछ भी कर सकते हैं. अगर मुझे कुछ हो गया तो… अ डेमोक्रेसी मस्ट लिव उप टू इट्स नेम सर, इट्स क्लेम्स. अ डेमोक्रेसी इस फॉर इट्स सिटीजन्स, सर. मुझे पूरा यकीन है कि आप मुझे पूरा मौक़ा देंगे अपनी बात समझाने का…

गृह सचिव: देखते हैं. देखते हैं. किस चीज़ का बना है यह डिवाइस?

अंसारी: टाइटेनियम

गृह सचिव: हूँ…. ओके.

(सचिव फ़ोन काट देते हैं. फिर अपनी हॉट लाइन वाले लैंड लाइन फ़ोन पर कहते हैं )

गृह सचिव: कहता है कि सारे मेडिकल पेपर्स हैं. वह तो होंगे. ज़रूर होंगे. बनवा लिए होंगे. हमें शायद स्वास्थ्य सचिव को भी इस टीम में शामिल कर लेना चाहिए. कॉर्पोरेट होस्पिटलों को बढ़ावा देने की नीति पर कुछ तो लगाम लगानी होगी. कौन जाने कैसे कैसे लोग पैसा लगा रहे हैं और इनके डॉक्टर भी लोगों के भीतर क्या क्या लगा रहे हैं.

(मेज़ के इर्द गिर्द बैठे पुलिस अधिकारी एक दूसरे को देखते हैं.)

विशेष कोष्ठक के मुखिया: सर, यह अंसारी, इसका ऑपरेशन हुआ कहाँ था? यहाँ? या विदेश में?

गृह सचिव (एकदम बिफर कर): अपनी हद में रहो ! यह पता लगाना तुम्हारा काम है ! तुम तो डिवाइस का नाम तो पता नहीं लगा सके….मैंने गूगल किया है … यह जार्विक असिस्ट डिवाइस है ज़रूर.

पुलिस आयुक्त: यह काम तो बम बनाने वाले भी कर सकते हैं… हो सकता है पहले से पता लगा कर उन्होंने इसे यह सब कहने को सिखा दिया हो…

बम निस्तारण दस्ते के प्रमुख : यह भी हो सकता है कि उससे कहा गया है कि यह सब कह कर हमारा ध्यान  भटकाए रखे और हमला कहीं और होने जा रहा हो…क्योंकि यह तो समझ में ना आने वाली बात है कि बम मेटल डिटेक्टर को क्यों पार करके पकड़े जाने का ख़तरा उठा रहा था.

गृह सचिव: हो सकता है. हो कुछ भी सकता है. पता लगाओ, यह सच बोल रहा है या नहीं…एंड नाऊ गिव मी अ ब्रेक. मुझे मिनिस्टर से बात करनी है.

(गृह सचिव फ़ोन रख देते हैं. पुलिस आयुक्त एक फ़ोन उठा कर नम्बर घुमाते हैं)

पुलिस आयुक्त: इस शहर का सबसे बड़ा कार्डियोलॉजिस्ट मेरा दोस्त है….स्कूल में साथ पढ़े थे…(फ़ोन में) हल्लो दिल के दुश्मन, यार एक बात बता…यह कोई जार्विक असिस्ट डिवाइस नाम की चीज़ है क्या? आर्टिफिशियल  हार्ट है.

फ़ोन पर आवाज़ : तुझे लगवाना है क्या? साले दिलफेंक? कितने दिल चाहिए किस किस पर फेंकने के लिए….?

पुलिस आयुक्त: आय ऍम सीरियस. है ऐसी चीज़? गूगल करने से मिल भी जाता है….

फ़ोन पर आवाज़: यार हम तो बस धड़कन ही सुनने के हक़दार रह गए हैं…..यह काट छांट का काम तो सर्जन करते हैं. उन्हीको मालूम होगा. जहां तक गूगल का सवाल है, उस पर तो परी कथायें भी मिल जाती हैं. उस पर भरोसा नहीं कर सकते….(ज़ोर की हंसी)

(पुलिस आयुक्त रिमोट वाली घंटी बजाता है. एक आदमी अन्दर आता है.)

आयुक्त: तीन चार लोग भेजो. फ़ोन करो अस्पतालों के हार्ट सर्जन को

(तीन चार लोग आ कर सारे फ़ोन हथिया कर कंप्यूटर या डायरेक्टरी देख कर फ़ोन करते हैं)

एक मशीनी आवाज़: सारे सर्जन ऑपरेशन में व्यस्त हैं… कृपया अगले हफ्ते फ़ोन करें……

विशेष कोष्ठक के मुखिया: कोई फायदा नहीं. किसी अस्पताल में जा कर ही पूछना पडेगा

(पुलिस आयुक्त एक फॉर्म पर कुछ लिख कर एक भूरे लिफ़ाफ़े में बंद कर ए सी पी को देते हैं )

पुलिस आयुक्त: ले जाओ और ज़रुरत पड़े तो छापा मारने की धमकी से काम चलाओ……

अंक दो

दृश्य दो  

(मोटरसाइकिल के चलने की आवाज़. कुछ देर बाद जहाँ गृह सचिव बैठे थे वहां एक दूसरी कुर्सी रख दी जाती है और उसपर एक नवयुवती आकर बैठ जाती है. ए सी पी वहां पहुंचता है.)

युवती (फ़ोन पर) : गुड इवनिंग, मेंडिंग मेंडीकंट हॉस्पिटल… नहीं सर, सारे सर्जन बिजी हैं…तब तक कुछ टेस्ट करा लेंगे?

(ए सी पी वहां पहुँच जाता है.)

ए सी पी  : मुझे चीफ ऑपरेटिंग सर्जन इन कमांड आफ ऑपरेशन्स से मिलना है. फौरन.

युवती: सर, वे तो असेंबली लाइन पर हैं, ओपेरेशन करा रहे हैं. अभी मिल नहीं…

ए सी पी : तब तो हमें छापा मरना पड़ेगा (जेब से भूरा लिफाफा निकालता है)

युवती (घबरा कर) : आप रुकिए, मैं बुलाती हूँ (फ़ोन उठा कर) सर, पुलिस आयी है, छापा पड़ सकता है……आप को बुला रही है

(सफ़ेद कोट में एक डॉक्टर नमूदार होते हैं.)

डॉक्टर (तर्जनी उठा कर): सिर्फ एक मिनट…इतनी सी देर में एक टेस्ट का घाटा हो जाएगा.

ए सी पी : यह राष्ट्रीय आपातकाल है

डॉक्टर: हँ.. क्या है?

(पीछे से एक दूसरा डॉक्टर निकलता है और बाएं मुड़ कर जाने लगता है. वह पुलिसवाले को देख ठिठक कर सुनने लगता है.)

ए सी पी : नेशनल एमर्जेंसी. एक आदमी गिरफ्तार किया गया है. हमें शक है वह बम है. वह कहता है उसके अन्दर नकली दिल लगा है. आप यह बताईये (जेब से एक कागज़ निकाल कर धीरे धीरे पढ़ते हुये)…यह बताईये  कि क्या जार्विक.. असिस्ट…डी…डिवाइस नाम का कोई नकली दिल होता है?

पहला डॉक्टर: मैने तो ऐसे किसी चीज़ का नाम नहीं सुना….

ए सी पी : ठीक से सोच कर बताईये. या अपने और डॉक्टरों से पूछिए. किसीकी ज़िंदगी और मौत का सवाल है. और सुरक्षा का भी सवाल है…

दूसरा डॉक्टर: सर, एक मिनट, आपसे सोडियम लेवल के बारे में कुछ…एक पेशंट…

(पहला डॉक्टर झुंझला कर सर झटक देता है तो दूसरा डॉक्टर आकर उसकी बांह पर हाथ रख कर उसकी आँखों में देखता है और दोनों एक किनारे हो जाते हैं.)

दूसरा डॉक्टर: है, जार्विक असिस्ट डिवाइस, है. मुझे मालूम है.

पहला डॉक्टर: मुझे भी मालूम है. यह पुलिस केस है. यू वांट टू गेट इन्वोल्वड ? गो अहेड.

(दूसरा डॉक्टर सर हिला कर जल्दी से चला जाता है.)

ए सी पी : वह तो कहता है बड़ी मशहूर चीज़ है. गूगल करने से मिल जाता है.

पहला डॉक्टर: मेरे पास पढने की फुरसत नहीं है. मैं तो हर समय लोगों की चीर फाड़ में लगा रहता हूँ…..वैसे गूगल पर तो भूत प्रेत की कहानियां भी मिल जाती हैं, उस पर भरोसा नहीं कर सकते….

ए सी पी : वह तो कहता है कि उसने अपने को एक्सपेरिमेंट के लिए उनके हवाले कर दिया, उन्होंने सारे खर्चे उठाये, मुफ्त में यह चीज़ भी लगा दी, उसकी जान बचा ली. किस डॉक्टर ने किया, कहाँ किया, यह सब अभी इम्पोर्टेन्ट बात नहीं है….हो सकता है क्या यह सब?

पहला डॉक्टर: अनयुसुअल. मेरा तजुर्बा तो यह है कि हम मरीजों पर प्रयोग करते हैं, उनको बताते भी नहीं कि प्रयोग कर रहे हैं, और उनसे इलाज के नाम पर पैसे भी ले लेते हैं….यह आदमी जो कह रहा है वह मुझे बहुत डाउटफुल लग रहा है.

ए सी पी : यह नेशनल इमरजेंसी है. आप जल्दी पता करके हमें बताईये…

डॉक्टर: अच्छा मान लो कि ऐसा कोई नकली दिल है भी तो भी इस बात की क्या गारंटी है कि वही इस आदमी के अन्दर है? वह झूठ भी तो बोल सकता है. उसे काट कर देखना पडेगा ना…मेरी और मेरी टीम की रक्षा की गारंटी कौन देगा?

ए सी पी : क्यों? एम् आर आई, सी टी स्कैन और क्या क्या स्कैन आप लोग करते रहते हैं. उनसे पता नहीं चलेगा?

डॉक्टर: बहुत पढ़े लिखे हैं आप ! हाँ वह भी इस्तेमाल कर सकते हैं. खैर एम् आर आई तो नहीं, उसमे कोई भी मेटल नहीं डाल सकते, मशीन फट जायेगी, आदमी मर जाएगा, लेकिन पता लगाने के तरीके हैं. उसके लिए मरीज़ को यहाँ लाना पडेगा…हो सकता है वह यही चाहता हो कि इस बहाने अस्पताल में घुस जाए और यहाँ फट जाए. यहाँ कम से कम तीन वी आई पी पेशेंट भरती हैं. एक तो वी वी आई पी है. उनकी सुरक्षा कि गारंटी कौन देगा?

युवती (जो गौर से सब कुछ सुनने के लिए फ़ोन के चोगे उठाकर रख एक तरफ रख चुकी है) : और दूसरे मरीज़ सर…?

डॉक्टर: हाँ देखो, दूसरे मरीज़, उनकी जान को भी तो ख़तरा है. कितना ख़तरा है सोचो..जानते हो इस अस्पताल में कितना पैसा लगा है? अकेले बिल्डिंग ही १०० करोड़ की है …..

(ए सी पी पुलिस आयुक्त को अपने मोबाइल से फ़ोन लगाता है)

ए सी पी : जय हिन्द जनाब. ये डॉक्टर तो तैयार ही नहीं हो रहा कोई भी बात बताने को. या स्कैन या कुछ भी टेस्ट करने को…सर आपका हुक्म हो तो उठवा लें इसको? ले जाते हैं आउटराम लाइन्स.

पुलिस आयुक्त: और टेस्ट की मशीन कहाँ से लाओगे? इम्प्रक्टिकल. (फ़ोन रख कर) जो कुछ करना था कर लिया. अब चलो खाना खाते है. टाईम फॉर अ ब्रेक.

                                      पर्दा गिरता है

 

 

 

 

 

 

 

अंक तीन

दृश्य एक

(मंच का दायाँ कोना नीम अँधेरे या फीकी रोशनी में. बायाँ हिस्सा अँधेरे में और ज़रुरत के हिसाब से इसमें स्पॉटलाइट पड़ेगी. अंसारी दायीं ओर कमरे के बीचोबीच धीरे धीरे हाथ आगे करके टटोलता हुआ सा टहल रहा है.)

अंसारी: जाने और कितना वक़्त लगेगा. होम सेक्रेटरी से कहा है. उनको कितना वक़्त लगना चाहिए? कम से कम आधा घंटा शायद लगे. हो सकता है अभी सुनीता को छोड़ दिया हो…दरवाज़ा किधर है…हाँ हाँ यह रहा शायद, (टटोल कर) यही है….सुनो, कोई है…कोई है…? अरे कोई तो सुनो. एक मोमबत्ती तो देते जाओ. कितना अँधेरा है यहाँ…अपने हाथ तक नही दिखते….सूनी, सूनी, क्या तुम आस पास हो? सूनी, न जाने क्या होगा, न जाने क्या होगा….

(कुछ देर चुप रहने के बाद)

तरह तरह की मौत मैंने ख्यालों में देखी…कितने बरस. याद है सूनी, कहता था आख़िरी वक़्त मुझे अस्पताल में मत छोड़ देना किसी ट्यूब से बंधा हुआ. किसी मशीन को अपनी सांसें सुनाते हुये आखिरी हिचकी नहीं लेनी है मुझे…ज़िन्दगी में मौत हमेशा एक कदम पीछे चलती रही….तुम कहा करती थी, कुछ नहीं होगा… (रुक कर गहरी साँसें लेता है) मैं तुम्हारी गोद में सर रख कर तुम्हारी आँखों में अपनी रोशनी के आखिरी कण छोड़ देना चाहता था…मैं कहता था ना मेरा हाथ थामे रहना…और तुम, तुमने कभी भी वादा नहीं किया कि ऐसा होगा, तुम ही को भरोसा था अस्पतालों पर, डॉक्टरों पर, दवाइयों पर…..और देखो सूनी देखो क्या हो गया आज..

मैं तो सिर्फ एक नॉर्मल दिन बिताने निकला था, तुम्हारे साथ… खुली हवा में. तुमने मना किया था फिर भी, क्यूंकि तुम कहीं जाना नहीं चाहती जहाँ कोई मंत्री आनेवाला हो… मैं ही ज़िद करके निकला था. महीनों दवाओं की गंध सूंघने के बाद अपने फेफड़ों में शिरीष कि महक बसाने निकला था….वहां खिलते हैं शिरीष उस थिएटर के बाहर, वही शिरीष जिनके महकते पीली हरे धागों ने हमें एक सुरों के इस लय में बाँध दिया था…

(हंसता है) याद है, उस दिन ऐसी ही शाम थी जब हम गए थे राजेश्वरी देवी का कबीर सुनने…तब भी तो मंत्री को आना था… और तुम कह रही थी जहाँ मंत्री को आना हो वहां आम लोगों को जाना ही नहीं चाहिए…

(दायाँ हिस्सा अँधेरे में डूब जाता है…मंच के बायीं ओर एक अधेड़ उम्र की गायिका तानपुरा संभाले कुछ वादकों के साथ बैठी आँखें बंद किये ध्यान मग्न है. माइक थामे एक व्यक्ति बेचैनी से आगे पीछे हो रहा है. कुछ सीटियों की आवाजें आती है. हो सके तो अंसारी को सुनीता के साथ इस जगह हाथ पकडे हँसते हुये दिखाया जाए)

आदमी: अब और नहीं रुका जा सकता. लोग बेचैन हो चुके हैं. हंगामा हो जाएगा. डेढ़ घंटा होने को आया…जाने कब आएंगे मंत्रीजी…(माइक पर) श्रोताओ, आपके धीरज को सौ हाथों से सलाम. मंत्रीजी को अभी कुछ देर और लगेगी..(जोर से कुछ सीटियाँ और चीखीं सुनाई देती हैं). शांत, शांत हो जाईये……हम राजेश्वरीजी से गुज़ारिश करते हैं कि वे अपने मधुर बोलों से आपकी बेचैनी ख़त्म करें और ….(तालियों की गडगडाहट)…हाँ हाँ, मैं समझ गया, मुझे अब चुप हो जाना चाहिए……

राजेश्वरीजी: (शास्त्रीय या अर्ध शास्त्रीय गायन) भला हुआ मेरी घघरी फूटी, भला हुआ…. हुआ, भला हुआ मेरी घघरी फूटी,

मैं पनिया भरन से छूटी……..

(बीच में ही मंत्रीजी आ जाते हैं. आदमी दौड़ कर उन्हें हार पहनाता है. दो और लोग भी हार पहनाते हैं. राजेश्वरीजी के सामने से एक माइक हटा लिया जाता है…वे सुर और तानपुरा थामे रहती हैं…बेआवाज़ गाती रहती हैं)

आदमी: माफ़ कीजिये, लोग तोडा ताड़ी पर उतारू होने वाले थे….

मंत्रीजी: जनता भी ना, अहमक ही होती है..(माइक पर) राजेश्वरीजी आपका स्वागत है, सुना है पहली बार आयी हैं आप इस शहर में. वोह क्या है आप समझती होँगी कि यहाँ कला के कोई पारखी नहीं हैं…मगर हैं. देखिये, कितने लोग बैठे हैं. हमारी पार्टी की रैली में नहीं आते इतने लोग (क्यों, क्या बात कही ना हमने? के अंदाज़ में वे मंच के लोगों को देखते हैं. मंच पर ही स्वागत करने वाले खी खी करके हँसते हैं)…. और हम, हम भी इतने बिजी रहे आज… क्या बताएं, कितना काम रहा, फिर भी आपका स्वागत करने को हमने समय निकाला आपके लिए…हाँ हमको बताया संयोजकों ने कि आपको यकीन ही नहीं हुआ अपने भाग्य पर, आपने संदेसा भिजवाया था कि काम छोड़ कर फालतू टाइम बर्बाद करने हम यहाँ नहीं आयें, लेकिन हम कल्चर्ड लोग हैं, हम आये हैं. थोड़ा देर हुई, होती है, बिजी लोगों को टाइम निकालने में भी टाइम लगता ही है.. हा हा……कभी कभी हम भी क्या कमाल की बात कह देते हैं… टाइम लगता है टाइम निकालने में. एकदम कविता ही समझिये …(कुछ शोर सा मचता है, कुछ आवाजें आती हैं….’हो गया, बहुत हो गया’…) ठीक है. आप गाइये. (वे हार संभाल कर नीचे उतरते हैं.)

राजेश्वरीजी: मेरे सर से टली बला, बला, मेरे सर से टली बला..

(दाएं कोने में नीम रोशनी …अंसारी खयालों में डूबा हुआ)

अंसारी: उसी दिन की याद ताज़ा करने गए थे न हम आज…थिएटर के खुरदुरे रेक्सीन की बेआराम सीटें, सामने ढाबे की बेहद मीठी चाय, ब्रेड पकोडा जिससे खूब तेल टपकता था…आज तुमने खाने नहीं दिया मुझे वह पकोड़ा…वह चाय भी बड़ी ज़िद करके पी मैंने…इतना डरती रही तुम मेरे लिए, तुम्हारी मोहब्बत ने कैसी  हिफाज़ती कैद में रखा मुझे हर पल…आज कौन है मेरा हाफ़िज़? हमने तो दोनों ही धर्मों को नाकबूल कर दिया….दोनों ही आज बदला ले कर रहेंगे? वे सिरफिरे जो दुनिया में दीन की हुकूमत फैलाना चाहते हैं…इतना नहीं जानते कि अक्ल की लाशें इन्साफ की बुनियाद नहीं बनती…कितने लेख मैंने लिखे, कितने भाषण हमने दिये अपने स्टूडेंट्स को…….कि हुकूमत नस्ल की नहीं अक्ल की होनी चाहिए, मज़हब की नहीं मोहब्बत की होनी चाहिए…. मगर इन नस्लवादियों, तंग नज़रों, सर काटने, कटाने वालों…इन आतताइयों का बोलबाला है यहाँ, उन्होंने ही ऐसा माहौल बनाया है कि आज किसी को किसी पर भरोसा नहीं रहा….और जिस धर्म के भी हों आपस में हम कितना भी लड़ें….हैं तो सब एक दूसरे के हमशक्ल…इस ख़ूबसूरत दुनिया को कैसे खून से सराबोर कर दिया है भगवान का, खुदा का नाम लेने वालों ने… हम जैसों को लील रहे हैं दोनों धर्मों के ठेकेदार….. यह दुनिया नहीं है हमारे जैसों के लिए फिर भी इसे छोड़ कर जाने से डरता है दिल, और अब लगता है तुमसे कह भी नहीं पाउँगा, नहीं देंगे यह लोग हमें मिलने का मौका, कह नहीं पाउँगा कि इस आख़िरी लम्हे में तुम मेरे साथ होती तो मौत टलती तो नहीं डर टल जाता शायद…

(अंसारी थक कर बैठ जाता है और घुटनों में सर दे कर सिसक उठता है)

एक नार्मल दिन बिताने निकला था मैं….(हंस कर) हाँ हाँ, याद है मुझे, तुम क्या कहती हो.. कभी भूलने दिया है क्या…

(मंच की दायीं ओर स्पॉटलाइट. सुनीता हंसती हुई कहती है)

सुनीता: दुनिया में, कभी भी कोई भी वक़्त नार्मल नहीं होता…इतिहास तो यही बताता है.. मुझसे पूछो, इतिहास पढ़ाती हूँ, मैं बताती हूँ….यह जो लफ्ज़ है ना, नार्मल, उसका कोई मतलब ही नहीं होता. एकदम बेमायने है. हमको जो नार्मल लगता है वह इसलिए कि उसकी आदत डाल लेते हैं और जो भी अलग हो उसे हम असाधारण या एब्नार्मल कहकर उसकी खिल्ली उड़ा देते हैं, उसे ठुकरा देते हैं, उसकी निंदा कर देते हैं…

अंसारी: अरे कब तक भाषण दोगी यार…..

सुनीता: पूरे पचपन मिनट…लेक्चर पूरा न हुआ तो अपनी तनख्वाह कैसे जस्टिफाई होगी?

(स्पॉटलाइट बंद)

अंसारी: आज भी कह सकोगी तुम कि कोई वक़्त नार्मल नहीं होता. क्या कर रहे थे हम? जीने कि ज़िद? अपनी मर्ज़ी से, अपने तरीके से. इसकी सज़ा मिल रही है? (अंसारी खिसकता हुआ दीवार से सट जाता है).

                                      पर्दा गिरता है

अंक तीन

दृश्य दो

(मंच के बायीं ओर टी वी के स्टूडियो बने हैं. या कोई ऐसा बक्से जैसा स्थान जहाँ एक एक कर कई लोगों को प्रकट होना है. अभी धवल श्याम का मेक अप हो रहा है. उसकी एक असिस्टेंट युवा लड़की पास में अपने मोबाइल फ़ोन या टेबलेट पर देख देख कर उससे बात कर रही है.)

लडकी: सर, फेसबुक पर थोड़ी ही देर पहले एक अपडेट आया है…किसी यूनिवर्सिटी के लेक्चरार को गिरफ्तार कर लिया है…

(धवल श्याम हाथ से इशारा करता है कि यह कोई ख़ास बात नहीं)

धवल श्याम: मस्ट बी सम प्रोटेस्ट फॉर फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन…..

(इतने में पीछे लगे टी वी स्क्रीन पर (या किसी बक्से में से झांकती) विचित्रा वचनी बोलने लगती है)

विचित्रा वचनी: यहाँ अभी अभी खबर आ रही है कि थिएटर में घुसने कि कोशिश करते हुये एक मानव बम पकड़ा गया है…अभी ज़्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन हाँ एक मानव बम है. यह धड़ल्ले से सूफी संगीत के एक कार्यक्रम में घुसने की कोशिश में लगा था…जी हाँ, मानव बम. घुस रहा था. सूफी संगीत के कार्यक्रम में…इस कार्यक्रम में खुद गृह मंत्री जाने वाले थे…

धवल श्याम: व्हाट इस धिस? हाउ डिड यू मिस इट?

लडकी: सर वही मैं आपको अभी बता रही थी…..वह लेक्चरार…….

धवल श्याम (इशारे से उसकी बात झटके से काट कर): नेवर माइंड. उसकी टी आर पी इतनी नहीं है….(वह अपने मोबाइल से किसीको फ़ोन लगाता है और बक्से में घुसता है. बक्से में से विचित्रा वचनी गायब हो जाती है और धवल श्याम उसकी जगह ले लेता है)

धवल श्याम: आज के इस शो में मैं धवल श्याम आपका स्वागत करते हुये भी डर रहा हूँ. यह डर आपके लिए है. अपनी तरफ से तो मुझे सिर्फ गुस्सा आ रहा है अपने निज़ाम पर, अपनी सरकार पर…और आपको भी आयेगा जब आप आज की यह खौफनाक खबर सुनेंगे कि इस शहर को इस वक़्त कितना बड़ा ख़तरा है. जी हाँ, एक बम इस वक़्त टिक कर रहा है टिक, टिक….कभी भी फट सकता है. यह है हमारी आज की चौंकानी वाली खबर. एक्सक्लूसिव है. सिर्फ हमारे पास है यह खबर. आज पता चलेगा आपको कि लोकतंत्र के दुश्मन कितने प्रभावशाली, कितने कार्यकुशल हो गए हैं. (धवल श्याम चश्मा ठीक से ऊपर चढ़ाता है और घूर कर सामने देखता है). हमारे दुश्मनों ने, यहाँ, इस देश के दिल में, इस देश की राजधानी में, एक ऐसे आदमी को ला खडा किया है जो बम है. आप पूछेंगे इसमें कौनसी नयी बात है. ठहरिये. यह कोई ऐसा वैसा बम नहीं, परमाणु बम है. जी हाँ…ठीक सुना आपने. परमाणु बम. एटम बम. जी, जी. मेरा दिमाग ख़राब नहीं हुआ है और आपके कान भी ठीक हैं. परमाणु बम. इसके लिए बहुत बड़ा ऑपेरशन करना पड़ता है. इसके लिए ऑपेरशन थिएटर चाहिए, डॉक्टर चाहिए, जो आदमी को चीरे, उसके अन्दर बम रखे और उसको सी दे.

क्या यह काम विदेश में हुआ? अगर हाँ तो यह बम देश में घुसा कैसे? क्या कर रही हैं हमारी सुरक्षा एजेंसियां? क्या यह काम यहाँ हुआ? इस देश में? तो फिर कौन हैं उसके साथी? कहाँ पर, किस अस्पताल में, किन लोगों ने अंजाम दिया इस खतरनाक खेल को?

पूछेंगे, सारे सवाल पूछेंगे हम. सबसे पूछेंगे. मगर पहले चलते हैं अपने जांबाज़ रिपोर्टर के पास जो ग्राउंड जीरो पर हैं, वहां जहाँ बम है. उससे कुछ ही फीट की दूरी पर. कुछ कदमों की दूरी पर. वहां जहाँ हमारे निकम्मे अधिकारियों ने बम को अलग थलग बंद कर रखा है. अपने रिपोर्टर से बात करने के बाद पूछेंगे हम अपनी सरकार से, अपनी सेना से, जो भी सुरक्षा के इंतजामों में ढील देने के ज़िम्मेदार हैं उनसे कि इस बम को शहर में ही क्यों रखा गया है? क्यों इसे एक ड्रोन में लाद कर समुद्र में फ़ेंक नहीं दिया गया? पहले अपने रिपोर्टर से बात करते हैं, हेल्लो, हाँ, हमें बताईये वहां क्या सिचुएशन है. हेल्लो, हेल्लो….

(धवल श्याम इधर उधर देखता है, सामने रखे कुछ पेपर उठाता रखता है. फिर उसके माथे पर बल पड जाते हैं.)

धवल: लगता है कि परमाणु विकीरण हमारे प्रसारण को प्रभावित कर रहा है. हमारा अपने रिपोर्टर से संपर्क नहीं हो पा रहा. जैसे ही होगा हम उनसे बात करेंगे और आपको पूरी जानकारी देंगे. जब तक हम हैं, हमारी बोलती बंद नहीं हुई है, आपको घबराने की ज़रुरत नहीं है….हम हैं आपके लिए….

(धवल श्याम फेड आउट होते हैं, यानी स्पॉटलाइट उनपर से हटाता है. पी आई बी के प्रमुख सूचना अधिकारी प्रकट होते हैं और मोबाइल फ़ोन मिला कर उस पर बोलते हैं.)

सूचना अधिकारी: हाँ हाँ, सचिव से बात कराईये, मैडम….मैं मुख्य सूचना अधिकारी…गुड इवनिंग क्या खाक होगा? आप यह बताईये आज एक मानव बम पकड़ा गया और आपने हमें खबर तक नहीं दी? प्रेस फ्रीडम नाम की चीज़ है या नहीं? कह दीजिये नहीं है, कह दीजिये, आप मालिक हैं, जो कहेंगे वही होगा…अरे कुछ मंत्रियों, अफसरों के भ्रष्टाचार के बारे में लिख दिया तो प्रेस एंटी नेशनल हो गयी…देखिये यह रवैया ठीक नहीं है…अगर आप लोगों ने यह रवैया नहीं बदला तो..तो…

फ़ोन पर आवाज़: ….आप इस्तीफा दे देंगे?

(मुख्य सूचना अधिकारी गुस्से में फ़ोन पटक देते हैं)

एक महिला एंकर (टी वी के बक्से में आ कर): ब्रेक के बाद ‘हर खबर’ में आपका स्वागत है…आज की सबसे बड़ी खबर.. आज क्या यह तो इस सदी की सबसे बड़ी खबर होनी चाहिए..जो मानव बम पकड़ा गया है वह शायद एक परमाणु बम है. जी हाँ, ठीक सुना आपने. परमाणु बम. हमारी निडर एंकर और इस चैनल की सर्वप्रिय संपादक विचित्रा वचनी इस समय उस परमाणु बम के नज़दीक हैं. वे ग्राउंड जीरो पर हैं और हम सीधे  चलते हैं उनके पास…

(बायीं तरफ दीवार के पास विचित्रा वचनी हाथ में माइक लिए खडी है)

विचित्रा वचनी (अपने पीछे के बैरक की ओर इशारा करती हुई) : यह है वह जगह जहाँ किसी भी पल अब एक बम फट सकता है. यह एक परमाणु बम भी हो सकता है.

महिला एंकर: आप बम के इतने नज़दीक खड़ी हैं. आपको डर नहीं लगता?

विचित्रा वचनी: औरों कि मौत रिपोर्टर की ज़िंदगी का हिस्सा होती है…और अपनी मौत दूसरों के लिए खबर…वैसे भी एक परमाणु बम के विस्फोट से बच कर हम कहाँ जा सकते हैं? कहाँ जायेंगे? कहाँ जाकर बचेंगे. मैं किसी भी पल मर सकती हूँ पर मरते दम तक मैं रिपोर्टर रहूंगी और मैं जानना चाहती हूँ कि एक इन्सान के भीतर फिट हो सके ऐसा परमाणू बम कितना छोटा या बड़ा हो सकता है? क्या यह पूरे शहर को तबाह कर सकता है? पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को ख़तम कर सकता है? कितनी दूर तक होगी इसकी पहुँच? कबसे मैं भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में किसीको जगाने की कोशिश कर रही हूँ. मगर हमारे विषेशज्ञ हैं कि सोये ही चले जा रहे हैं. उनकी आँख ही नहीं खुल रही. यहाँ देश की राजधानी कांप रही है उनकी नींद नहीं खुल रही…

(बगल में धवल श्याम आ खड़ा होता है अपनी सहयोगी लड़की के साथ.)

धवल श्याम: मैंने रिपोर्टर को बर्खास्त कर दिया है. एसएम्एस भेज दिया है. यह वहां खडी रिपोर्ट कर रही है और वह पता नहीं कहाँ है…तुम ले लोगी उसकी जगह? तनख्वाह बाद में बढाएंगे…..

(धवल श्याम गायब हो जाते हैं)

(बायीं ओर झुटपुटे में जिले सिंह और अन्य पुलिसवाले आकर रिपोर्टिंग देखने लगते हैं. पीछे से सुनीता की बहुत ही हल्की चीख सुनायी देती है )

सुनीता: कोई है…मुझे बाहर निकालो…प्लीज. वह बम नहीं हैं. छोड़ दो उनको. उनकी जान खतरे में है……

(विचित्रा वचनी मास्क धारी मुकेश से खुसर फुसर करती है)

(अंसारी के चीखने की आवाज़ आती है. वे बेतहाशा दरवाज़ा पीट रहे हैं.)

अंसारी: मेरी तार जोड़ दो…मुझे बैटरी चार्ज करना है…किसी अस्पताल में ही ले चलो…

विचित्रा वचनी (माइक को बैरक की ओर घुमा कर) : श..श…सूना आपने? फिर से सुनिए…

(अंसारी और सुनीता की हल्की चीखें जिसमे सिर्फ कुछ शब्द सुनायी दे रहे हैं. )

चीखें: तार जोड़…छोड़ दो…प्लीज…बात …सुनो..सुनो….

विचित्रा वचनी: सुन सकते हैं आप? दुनिया में आज तक किसीने ऐसी खबर नहीं दी होगी. एक परमाणु बम मांग कर रहा है कि उसे बैटरी चार्ज करने दिया जाए. अपने बम की बैटरी चार्ज करने दिया जाए. सुनिए फिर से सुनिए…

(हलकी सी चीखें सुनायी देती हैं पर कोई शब्द सुनायी नहीं देता)

विचित्रा वचनी: यहाँ अँधेरा है. घुप्प अन्धेरा. इसका मतलब सरकार जाग रही है. उसने एक्सपर्ट से बात की है. और एक्सपर्ट ने कहा है कि बिजली गुल कर दिया जाए. तभी देश बचेगा. एक्सपर्ट ने कहा है अन्धेरा कर दो. तभी देश बचेगा. गज़ब की बात है कि सरकार ने एक्सपर्ट की सुन ली है. अब बम नहीं फटेगा. बम नहीं फटेगा. अन्धेरा होगा तो शहर बचेगा. देश बचेगा. हम बचेंगे.

(अंसारी पर स्पॉटलाइट. वह अब थका हुआ है और उसकी आवाज़ एक जानवर के दर्द भरी रिरियाहट सी है. एक ‘घों…घों..’ सी आवाज़. धीरे धीरे वे हाथ फैला कर पीछे को बढ़ते हैं. दीवार से टकरा कर वे धीरे धीरे नीचे को खिसकते हुये फर्श पर धम से बैठ जाते हैं.)

(बायीं तरफ मंच पर सुनीता रोशनी में आ कर कहती है)

सुनीता: आज तो मंत्री समय पर आ रहे हैं…वह रहा उनकी कार का सायरन

(जोर से कई सायरन बजते हैं..)

अंसारी: यह तो एम्बुलेंस का सायरन है…इतने एम्बुलेंस आ रहे हैं……यह क्या है, (एक हवलदार सामने खड़ा है) यहाँ यह हवलदार क्यों खड़ा है….कैसा शोर है….छोड़ दो मुझे……छोड़ दो……..(एकदम जोर से चीखते हैं) छोड़ दो….!

     (उठने की कोशिश करते हैं मगर फिसल कर गिर पड़ते हैं. वे आँखें बंद कर लेते हैं.)

                                        पर्दा गिरता है

संपर्क

अंजली देशपांडे

192, पॉकेट डी

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3 comments

  1. राम कुमार सोनी

    बहुत खूब…

  2. बहुत ही रोचक नाटक. आज के ज़माने में बहुत ही प्रासंगिक है. आज के सिस्टम पर अच्छी टिप्पणी है. सिस्टम कितना अमानवीय और अकुशल हो सकता है साफ़ पता चलता है. नाटक हंसाते हंसाते आपको ऐसी ट्रेजडी दिखा देता है कि आपको धक्का सा लगता है. बहुत अच्छी कल्पना है.

  3. बहुत ही रोचक नाटक. आज के ज़माने में बहुत ही प्रासंगिक है. आज के सिस्टम पर अच्छी टिप्पणी है. सिस्टम कितना अमानवीय और अकुशल हो सकता है साफ़ पता चलता है. नाटक हंसाते हंसाते आपको ऐसी ट्रेजडी दिखा देता है कि आपको धक्का सा लगता है. बहुत अच्छी कल्पना है.

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