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आश्रम से बाहर जिन्दगी: विजया सती

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज की पूर्व प्राध्यापिका ने विजया सती आजकल संस्मरण लिख रही हैं। उनके संस्मरण का पहला अंश हम जानकी पुल पर पढ़ चुके हैं जो आश्रम के जीवान को लेकर था। इस बार उन्होंने आश्रम के बाहर के जीवन को लेकर लिखा है। तत्कालीन शिक्षा पद्धति को लेकर उन्होंने बहुत अच्छा लिखा है। आप भी पढ़ सकते हैं-

वह पिछली सदी का एक नया दशक था, जब हमने शिक्षा पद्धति के पुराने पैटर्न में हायर सेकेंड्री पास कर कॉलेज की दुनिया में जाने को कदम बढ़ाए.

बिना कुछ सोचे-समझे, जाने-बूझे हिंदी पढ़ने को प्राथमिकता दी.

पिता के सहयोगी जो उनसे कहा करते थे – लड़कियां हैं घर में, आपको नींद कैसे आती है ?

वे ही उनसे कहने लगे  – हिंदी पढ़कर क्या होगा? कॉमर्स नहीं, साइंस नहीं ..कुछ नहीं होने वाला इस पढाई से.

जब शहर के सर्वश्रेष्ठ कॉलेज लेडी श्रीराम में मेरा चयन हो गया, तो मैं केवल खुश थी …कोई निंदो कोई विंदो ! कॉलेज में हिन्दी ऑनर्स की दाखिला सूची की मेरिट लिस्ट में पहले स्थान पर मेरा नाम लिखा था.

घर की सादगी कॉलेज में ज्यों की त्यों गई.. गांधी कुर्ता, कोल्हापुरी चप्पल, मां के हाथ का सिला झोला !

पहले साल कॉलेज में गिरिजा कुमार माथुर की बेटी बीना बंसल ने हमें प्रियप्रवास पढ़ाया, डॉ नगेंद्र की बेटी प्रतिमा कृष्णबल ने जयशंकर प्रसाद की लहर की कविताएं !

डॉ सरोज भारद्वाज, संस्कृत की महारथी जिनसे पढ़े पाणिनी अष्टाध्यायी के सूत्र आज तक स्मृति में कौंध जाते हैं.

विभाग में कृष्ण चंद्र शर्मा भिक्खु जी की पत्नी शकुंतला शर्मा, भारत भूषण अग्रवाल जी की पत्नी बिंदु अग्रवाल और मनोहर श्याम जोशी जी की पत्नी भगवती जोशी भी थी, किंतु हमें न पढ़ाया उन्होंने !

यहीं त्रिमूर्ति नाम से विख्यात सीनियर थी – अचला शर्मा, सुषमा भटनागर और  अर्पिता अग्रवाल.

ये विभाग की सुयोग्य छात्राएं थीं. अचला शर्मा उस समय उभरती हुई कथाकार थीं. कालांतर में तीनों उच्च पदस्थ हुई. अचला शर्मा युवा वाणी, ऑल इंडिया रेडियो से होती हुई बीबीसी लंदन पहुंची, सुषमा जी संसद कार्यालय में उच्च अधिकारी और अर्पिता भाषा विज्ञान विशेषज्ञ बनकर अमेरिका गईं. कम उम्र में अर्पिता कैंसर ग्रस्त हो संसार त्याग गई.

लेडी श्रीराम कॉलेज में मेरी पहली कविता कॉलेज की वार्षिक पत्रिका में छपी. कौन छोड़ कर जाना चाहता था, लाल दीवारों वाली पचपन खंबों की वह नायाब दुनिया ! लेकिन गांधीवादी पिता ने हरिजन सेवक संघ, किंग्सवे में नया कार्यभार सम्भाला तो हम सब दक्षिणी दिल्ली से उत्तरी दिल्ली आ पहुंचे.

यहां हरिजन उद्योगशाला संस्था थी जिसमें देश भर के लड़के व्यावसायिक प्रशिक्षण पाते थे. किंग्सवे में स्थित हरिजन सेवक संघ उस इलाके में गांधी आश्रम नाम से विख्यात था. विस्तृत हरा-भरा परिसर, जिसमें एक सुंदर सर्वधर्म प्रार्थना स्थल था और गुलाबी पत्थर से बना स्तंभ भी जिस पर महत्वपूर्ण ग्रंथों से पंक्तियां उकेरी हुई थी.

यही वह दौर भी था जब महानगरीय बोध प्रकृति की हरियाली के साथ-साथ संबंधों के अपनेपन को भी लीलने लगा था. एक बड़े परिवार में हम खाने-पीने, पढ़ने-लिखने में ऐसे मगन रहते कि मन में इस अनावश्यक दुख को जगह न मिलती.

घर बदला तो कॉलेज में भी तबादला हुआ. लेडी श्रीराम कॉलेज छोड़ अब हम मिरांडा हाउस की लाल ईंटों से बनी भव्य इमारत का हिस्सा हुए.

फिर पिता ने सुना  …अरे कहां डाल दिया लड़कियों को ! बिगड़ा हुआ कॉलेज, हाथ से निकल जाएंगी लड़कियां.

लेकिन मां और पिता सहज विश्वास करते थे .. हम पर, हमारे पढ़ने पर, अब हमांरे कॉलेज पर भी.

सो गाड़ी न केवल चली बल्कि रफ्तार में दौड़ी. आसपास की दुनिया में खलबली थी – लेकिन यहाँ पचास प्रतिशत से अधिक लड़कियां तो हमें अपने जैसी ही दिखी .. हाथ में सिगरेट नहीं, शॉर्ट्स और टीशर्ट की क्रान्ति से बाहर कमीज़-सलवार-चुन्नी वाली. कंधे पर टंगे बैग में कॉपी, किताब पैन और लंच बॉक्स वाली. लाइब्रेरी में किताब के पन्नों में लगभग समा जाने वाली. बहुत जल्दी हम कॉलेज से, कॉलेज हमसे अभिन्न हो गया, उतना ही अपना जैसे हमारा घर हो. यहीं तो मिली हमें प्रिय अध्यापिका मन्नू भंडारी, अर्चना वर्मा और डॉ शैल कुमारी. मन्नू जी ने गोदान पढ़ाते हुए एक बार समझाया –

ज्यों केले के पात पात में पात

त्यों सज्जन की बात बात में बात !

इन पंक्तियों को मैं कभी न भुला पाई.

अर्चना जी के अध्यापन के स्तर से हम काफी नीचे थे उस समय, और शैल मैडम की डांट का टुकड़ा अब तक जबान पर रखा है ..आपने क्या सोचा क्लास में सत्यनारायण की कथा होगी और प्रसाद लेकर घर को जाएंगी आप सब ?

एम ए में हमारा कॉलेज मिरांडा हाउस ही रहा, पर कक्षाएं विश्वविद्यालय के कला संकाय में होती.

यहीं मिले डॉ नगेंद्र, विजयेंद्र स्नातक, डॉ उदयभानु सिंह, भोलानाथ तिवारी, नित्यानंद तिवारी और डॉ निर्मला जैन सरीखे पढ़ावन हार !

एम ए उत्तरार्ध अर्थात फाइनल इयर में विकल्प की कक्षाएं लेने आई अपने कॉलेज से मन्नू भंडारी, उन्होंने  समकालीन हिंदी साहित्य विकल्प कक्षा में ‘एक दुनिया समानांतर’ की कहानियां पढ़ाई. एक नया परिचय अजित कुमार सर से हुआ. वे हमें असाध्य वीणा पढ़ाने लगे …गहरे और गहरे डूब कर !

क्या भूलूं क्या याद करूं ?

दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय में हिन्दी विभाग का कद विशेष ऊंचा ही रहा हमेशा. इसका कारण – हमारे गुरुजनों का रूतबा ! कक्षा के बाहर भी, डॉ नगेन्द्र के व्यक्तित्व की वह गरिमा कौन भूल सकता है जब वे एक हाथ में धोती का सिरा और दूसरे में कामायनी थामे गलियारे में प्रकट होते तो विद्यार्थियों का समूह अनायास ही एक ओर सिमट कर, उनका जाना देखता रह जाता ! सौ से भी अधिक विद्यार्थियों की संख्या वाली कक्षा की पिनड्रॉप साइलेंस में प्रोफ़ेसर नगेन्द्र का धीर-गंभीर स्वर गूंजता…

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह !

एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह !

तुलसी काव्य मर्मज्ञ डॉ उदयभानु सिंह का सधा कड़क स्वर, सूर विशेषज्ञ डॉ विजयेन्द्र स्नातक जी की साहित्यिक चुहल, डॉ भोलानाथ तिवारी जी का भाषावैज्ञानिक संभाषण, नित्यानंद तिवारी जी के ‘लहरों के राजहंस’ और ‘कनुप्रिया’ पर आख्यान …क्या कभी भुलाए जा सकेंगे?

उन्हीं गलियारों में, मैडम निर्मला जैन का कोमल-दृढ़ व्यक्तित्व, हम छात्राओं के लिए हमेशा सौंदर्य की एक नई परिभाषा रचता रहा..हम वह पीढ़ी हैं जिसने मैडम को, उनके जीवन के चौथे दशक से देखा और जब तक देखा, एक समान सुंदर देखा. विश्वविद्यालयी-विभागीय परिचय के दायरे में, मैडम के सन्दर्भ में प्राय: उल्लेख होता रहा है.. उनकी बेबाकी का, दो टूक कथनों का, यहाँ तक की, एक खास अंदाज़ में, अपनी वक्र शब्द भंगिमा से ह्रदय छलनी कर देने का भी !

मेरा विश्वविद्यालय यानी हरियाली और फरफराती हवा, वीसी ऑफिस के ठीक सामने गुलाबों से मुस्कुराती जवाहर वाटिका, छोटी सी बुद्ध प्रतिमा और ऊंचे पाम वृक्षों वाला बड़ा सा पार्क, लाल ईंटों वाली कला संकाय की प्रबुद्ध इमारत, लॉ फैकल्टी, भव्य केन्द्रीय पुस्तकालय, पांच रूपए की कॉफ़ी वाला इन्डियन कॉफ़ी हॉउस और सुबह से शाम तक हिन्दी विभाग के कमरा नंबर ६५ – ६६ के गलियारों की चहल-पहल ! सड़कों पर बेशुमार आवाजाही, वे मेट्रो के दिन नहीं थे. बस की तलाश में विद्यार्थी खूब पैदल मार्च करते.

वे क्रिकेट में सुनील गावस्कर के शतक जड़ने के दिन भी थे जब विश्वविद्यालय अनिश्चित काल के लिए बंद घोषित किया गया….closed sine die यह शब्द हमने पहली बार सुना ! हरिजन सेवक संघ परिसर में मिले घर के खुले प्रांगण में क्रिकेट कमेंटरी सुनते हुए नोट्स पर नोट्स बनाना – दे दनादन ! उस दौर के विद्यार्थी जानते हैं – फोटोकॉपी का प्रचलन कम ही था, कम्प्यूटर का ज़माना था नहीं. जो लिखना है, अपने हाथ से. और नोट्स शब्द उन पढ़ाकू बच्चों का प्रिय, जो लाइब्रेरी छान मारते हैं. एक उपन्यास, एक लम्बी कविता के लिए पूरी कॉपी रंग डालते हैं. स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा वाली गोलाकार घास से होकर केन्द्रीय पुस्तकालय पहुँचने वाली किताबों की इतनी बड़ी दुनिया कितनी जल्दी हमारी हो गई !

यहीं लड़ते-झगड़ते-खीझते-पढ़ते-लिखते हम और हमारे साथी दिल्ली विश्वविद्यालय के कितने ही कॉलेजों में पढ़ाने लगे. कॉलेज के पहले साल की छूटी हुई सखी अर्चना शर्मा, जो तब अर्चना विद्यालंकार हुआ करती थी, आज तक कुछ भी पूछने पर सहर्ष तत्पर मिलती है, वह जीसेज़ एंड मेरी कॉलेज में पहुँची. खूब-खूब मददगार सहपाठी दिनेश पत्राचार विद्यालय में ऐसे सक्रिय हुए कि ढूंढ-ढूंढ कर हम सबसे कुछ अच्छा लिखवा और पढ़वा लेते. सहपाठी सुनीता बुद्धिराजा लम्बे अंतराल के बाद एम एम टी सी में ऊंचे पद पर विराजी. हमारे सीनियर चुस्त और फुर्तीले हरीश खन्ना श्यामलाल कॉलेज में नियुक्त हुए. कई सहपाठी विभिन्न शहरों में पढ़ाने गए और कुछ बैंक में हिन्दी अधिकारी पदों को सुशोभित करने लगे.

हिन्दी विभाग में ही हमने आज के विख्यात प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी, कवि अशोक चक्रधर और डॉ मुकेश गर्ग को जाना और पहचाना. पचौरी जी और मुकेश जी तो शीघ्र अध्यापन में संलग्न हुए, किन्तु एम लिट किए हुए विद्यार्थियों का एक बड़ा समूह उस समय संघर्षरत था. इस संघर्ष समिति के सिरमौर अशोक चक्रधर थे. इन लोगों ने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय देते हुए प्रगति नाम की संस्था बनाई थी, जिसके साहित्यिक आयोजनों के पोस्टर अशोक चक्रधर जी के सुंदर हस्तलेख में बनते. प्रगति संस्था ने ‘बकरी’ नाटक खेला जिसे बहुत प्रशंसा मिली.

कैसे वासंती हवा के झोंकों सरीखे दिन थे वे ! अधिक संघर्ष अपनी जिन्दगी में भी न लिखे थे. जुलाई में परीक्षा परिणाम आया, अगस्त आरभ में मिरांडा हाउस से बुलावा – उषा कस्तूरिया मैडम छुट्टी पर जा रही थी – लीव वैकेंसी पर काम करने को कॉलेज ने मुझे चुना. जब तक यह समय बीतता – उससे पहले ही हिन्दू कॉलेज में

स्थायी नियुक्ति मिल गई. विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर स्नातक ने पूछा – तुमसे हाथ भर लंबे लड़के होंगे, पढ़ा लोगी?

मैंने कहा – सर मिरांडा में जिसने पढ़ा लिया, वह कहीं भी पढ़ा लेगा !

उस जमाने में मुख्य विषय के अलावा एक अमुख्य विषय – सब्सिडीयरी कक्षा भी होती थी. हिन्दी पढ़ने वाले छात्र  इतिहास, राजनीति शास्त्र पढेंगे तो इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र, अर्थ शास्त्र पढ़ने वाले छात्र हिन्दी पढ़ने आएँगे. हिंदी के प्रति एक हंसी का भाव लेकर क्लास में बैठने वाले ये बच्चे क्लास को मज़ाक बना देने में कोई कसर न छोड़ते. डांट-फटकार से तो कहाँ संभलते ये, मेरे सामने एक ही चारा था कि पढ़ाने में जान झोंक दूं ! धीरे-धीरे यह क्लास मित्रता की क्लास बन सकी !

लम्बे अरसे तक – कॉलेज ..लाइब्रेरी.. लंच बॉक्स ..घर ..यही जीवन रहा था हमारा. बहुत बाद में पास के कमला नगर बाज़ार जाना शुरू हुआ था. अब घर के झोले का स्थान पर्स ने ले लिया था.  घर-परिवार और गांधी आश्रम के सुरक्षित वातावरण से बाहर की दुनिया भी तब उतनी खराब कहाँ थी?

फिर हम तो उस पीढ़ी से हैं, शाम होते बाज़ार जाने की बात पर जिन्हें पिता कह सकते थे – यह घर लौटने के समय तुम लोग बाहर जाने की बात क्या करते हो? और कार्यक्रम रद्द रहता !

विजया सती

 
      

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18 comments

  1. Shandar.bilkul jivant kar diya us samay ko.ye hi sach hai.ye hi duniya thi aise yogya aur pratibha sampann shikshak ki jo sahi mayne me shiksha hi deta hai aur bade bade vidvano se shiksha hi leta hai.swabhavik abhivyakti bhavpurn hai.sada unnati Karo ye hi kamna hai

  2. आपका यह संस्मरण उस दौर में होने वाली नियुक्तियों की कहानी भी कहता है। लेडी श्रीराम में पढ़ाने वाली अध्यापिकाएं किसी न किसी की पत्नी, बेटी, बहन थीं। शायद की कोई संस्थान इस पक्षपाती संस्कृति से अछूता रहा हो। बड़ी सादगी से आपने अपनी बात भी रखी और भ्रष्टाचार की पोल भी खोल दी। आपको साधुवाद!

    • विनय जी
      मुझ पर भी तो गौर कीजिए …बिना किसी पक्षपात के मुझे अवसर मिला !

    • Dr Bharti Aggarwal

      यह हिंदी का स्वर्ण युग था जहां हिंदी के पुरोधाओ से आपने शिक्षा हासिल की। आज की स्थिति अत्यंत दयनीय है आपको अतिथि शिक्षक के रूप में भी आसानी से जगह नहीं मिल पाती। आज प्रतिभा पीछे छूट रही है।

  3. Prof Garima Srivastava

    बेहद प्रामाणिक संस्मरण। विजया मैम आप निरंतर लिखें।आपको पढ़ने वाले बहुत हैं।सादर।

  4. बहुत सुंदर लिखा है। मैम एक बात पूछनी है आपके संस्मरण से लग रहा है आपके जीवन में परिवारिक, सामाजिक और आर्थिक तनाव कम था। क्या यह सच है? कम सुविधाओं में अच्छी जिंदगी जी आपने और हमारे समय में जितनी सुविधाएं है उससे कही ज्यादा मुसीबत।

  5. बहुत रोचक प्रसंग है मैम, साथ ही ज्ञानवर्धक भी.

    • नोरिन शर्मा

      प्रणाम दी 🙏… मज़ा आ गया… आर्ट्स फैकल्टी का विवेकानंद का गोल पार्क…C.L. ,65-66 नंबर कमरे…पूरे गलियारे फ्लैश लाइट से कौंध गए…सच दी..डॉक्टर भोलानाथ तिवारी जी,डॉक्टर इन्द्रनाथ चौधरी,डॉक्टर तारकनाथ बाली, डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी …इन सभी पुरोधाओं से पढ़ने का अवसर मिला..डॉक्टर नगेंद्र जी के बाद डॉक्टर निर्मला जी HOD थीं,हमारे समय में।
      किरोड़ीमल तो केवल शगल के लिए जाना हुआ करता था या फिर कमला मार्केट …छात्रावास के बराबर से निकलकर…
      या फिर अजित जी से मिलने…यह पूछने कि “दशद्वार से सोपान तक” कब तक पूरी होगी… तब,अजित जी अक्सर हरिवंशराय बच्चन जी के सोपान जाया करते थे…
      कितना कुछ चित्रपट की रील सा… आँखों के सामने से घूम गया दी..!!!!
      एक दिन आपसे भी मुलाक़ात हुई थी,फैकल्टी के बाहर ,हिंदू के लगभग सामने…याद है..?
      @ आश्रम से बाहर ज़िंदगी: विजया सती

      • विजया सती

        तुमने सही याद दिलाया नॉरिन में डॉ बाली को तो भूल ही गई !
        सुधार करूंगी इसमें
        सुंदर सुहाने दिन थे !

  6. मैम आपने बेहद सारगर्भित और रोचक लिखा है, एक क्षण तो ऐसे लगा कि यह तो वही जीवन शैली है DU के हिंदी विभाग की जिसे आज हम जी रहे हैं।

  7. पांच दशक पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय और हिंदी विभाग के इर्द-गिर्द जो बिना गर्द का साहित्यिक वातावरण था उसकी अच्छी झांकियाँ हैं डॉक्टर विजया सती के आलेख में। इसमें मेरे नाम का भी उल्लेख है जी, थैंकू विजया जी! क्या ही दिन थे!

  8. आपके नाम का उल्लेख कहां नहीं?

    आभार और आदर सहित

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