Home / Featured / हीरो के अलावा बाकी सब ‘जीरो’

हीरो के अलावा बाकी सब ‘जीरो’

शाहरुख़ खान की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘जीरो’ आ गई. इस फिल्म की समीक्षा लिखी है सैयद एस. तौहीद ने- मॉडरेटर
================
ग्यारह महीने पहले ज़ीरो का पहला टीज़र आया था।जनवरी से दिसंबर तक का इंतज़ार कराके साल की सबसे बहुप्रतीक्षित फिल्मों से एक रिलीज़ हुई है। शाहरूख खान की ‘ज़ीरो’ सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है। साल के आखिर में किंग खान ‘ज़ीरो’ लेकर आए हैं। अनुष्का और कटरीना जैसी  नामी अभिनेत्रियां साथ हैं। ज़ीशान व तिग्मांशु धुलिया जैसे सक्षम सह-कलाकार। फ़िल्म का जिम्मा जाने माने निर्देशक आनंद एल राय के कांधे है। शाहरुख खान का किरदार ‘बउआ सिंह’ फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत है। बौने बउआ के रोल में शाहरुख़ इंप्रेस करते हैं। शाहरुख़ ख़ान की फिल्मों से एक उत्सव सा माहौल रच जाता है। चाहने वाले इंतज़ार में रहते हैं।
मेरठ के बउआ सिंह (शाहरुख़ ख़ान) का कद छोटा रह जाने कारण शादी नहीं हो पा रही। वो मैरिज ब्यूरो के चक्कर काट रहा। ऐसे ही किसे मौके पर उसकी मुलाक़ात सेरिब्रल पाल्सी से पीड़ित युवती आफिया से होती है। आफिया (अनुष्का) एक स्पेस साइंटिस्ट है। दसवीं पास बबुआ एवं स्पेस लर्नर आफिया की असंभव जोड़ी को देखना सबसे कमाल अभुभव है। एक फैंटेसी वर्ल्ड की तरह मेक बिलीव अफेयर।
बऊआ सिंह शारीरिक दुर्बलता की वजह से किसी हीन भावना से ग्रस्त नहीं।बल्कि वो उसे सेलिब्रेट करता है। दुनिया को अपने कदमों पर रखने जैसा। बउआ की जादूगरी शख्सियत आफ़िया का दिल जीत लेती है। दोनों के बीच प्यार हो जाता है। मगर जब शादी की बात आने तक बउआ की जिंदगी में फेवरेट हिरोइन बबीता (कैटरीना कैफ) आ जाती है।
ज़ीरो के साथ न सिर्फ़ शाहरुख़ बल्कि आनंद एल राय ने भी बहुत हिम्मत दिखाई है। किरदार एवम कहानी में संभावनाओं  के स्पेस को जगह मिली है। फैंटेसी आधारित कथाएं ‘सब कुछ मुम्किन’ में यकीं रखती हैं। शाहरुख़ की ‘ज़ीरो’ इसी उम्मीद की फ़िल्म है। ऐसी फिल्में हिम्मत से बना करती हैं।  ज़ीरो बनाना आसान काम नहीं रहा होगा। आनंद एल राय अपने एडवेंचर में काफी हद तक सफल हुए हैं। बउआ का दुनिया जीत लेने वाला आत्मविश्वास। आफिया से असम्भव मुहब्बत। बबीता को लेकर दीवानगी । यह तीन तत्व फ़िल्म में अदभुत आकर्षण लाते हैं। यह तत्व तीन किरदारों से आएं हैं। ‘ज़ीरो’ तीन किरदारों की आकर्षक दुनिया से परिचय है। इस दुनिया में जीशान अय्यूब जैसे किरदार थोड़ा और तत्व ला देते हैं।
अनुष्का- शाहरुख खान की केमिस्ट्री एक बार फिर पर्दे पर है।ढाई घंटे से ज्यादा की फिल्म में कैटरीना कैफ सुपरस्टार बबिता कुमारी के रोल में हैं। बबिता का रोल कैमियो जैसा लगता है। निर्देशक आनंद एल राय छोटे शहरों की कहानियों के लिए जाने जाते हैं। जीरो में भी ऐसी ही कोशिश है। आनंद ने शाहरुख के फैन्स का दिल जीतने की भरपूर कोशिश की है। सलमान खान,श्रीदेवी, काजोल, रानी मुखर्जी एवं जूही चावला,आर माधवन समान बॉलीवुड सितारों की झलक से आकर्षण बना है।
सितारों की भीड़ के बावजूद ‘ज़ीरो ‘ शाहरुख खान की भी फिल्म है। दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाने के लिए यह तत्व काफी होते हैं।आकर्षण के मामले में ज़ीरो कहीं कम नहीं। इरशाद कामिल के लिखे गीत गजब का रोमांस तत्व बनाते हैं। इस कड़ी में …जब तक मेरे नाम तू..का यहां जिक्र किया जा सकता है। गीत -संगीत कुल मिलाकर निराश नहीं करते । शाहरूख की फ़िल्म का फर्स्ट हाफ बहुत आकर्षक है। सेकंड हाफ़ कमज़ोर है। फिर भी बउआ सिंह के लिए फ़िल्म जरूर देखी जानी चाहिए। इस शख़्स के हौसले का जवाब नहीं।
  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

मेरी हिम्मत देखना मेरी तबीयत देखना

अग्रज और बाज़ौक शायर पवनजी ने जब ‘पालतू बोहेमियन’ पर मुझे रुक्के में लिखकर भेजा और …

2 comments

  1. आपने कहा बउआ सिंह अपनी शारीरिक दुर्बलता की हीन भावना में न आकर उसे सेलिब्रेट करता है । कैसे सेलिब्रेट करता है ? बाप के पैसों से ? शाहरुख खान अधिकांश फिल्मों में बाप के पैसों से ही सेलिब्रेट करते हैं. आपकी यह फिल्मी समीक्षा शाहरुख खान के प्रति मोह से ग्रस्त हैं . शुक्र है आपने यह तो माना की फिल्म का सेकंड हाफ कमजोर है .

Leave a Reply

Your email address will not be published.