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चीनी लेखक लाओ मा की कहानी ‘मरीज को देखने जाना’

हाल में मैंने जिन किताबों के अनुवाद किये हैं उनमें चीनी लेखक लाओ मा की कहानियों का संग्रह ‘भीड़ में तन्हा’ बहुत अलग है. चीन की राजनीति, समाज पर लगातार एक व्यंग्यात्मक शैली में उन्होंने कहानियां लिखी हैं. बानगी के तौर पर एक कहानी देखिये. यह किताब ‘रॉयल कॉलिन्स पब्लिकेशन’ से आई है- प्रभात रंजन 

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मेरे अध्यापक श्रीमान झाओ की एक ख़ास आदत है- मरीजों को देखने जाना।

एक बार उनके जन्मदिन के दिन मैंने कुछ और विद्यार्थियों के साथ मिलकर उनके लिए जन्मदिन की पार्टी रखी। उस दिन वे बड़े जोश में थे इसलिए उन्होंने कुछ प्याले अधिक पी लिए और यह राज़ की बात बताई।

श्रीमान झाओ ने बताया कि जब उनके विभाग का एक सहकर्मी, जो उनका परिचित भी था, बीमार पड़ा और अस्पताल गया तो वे हमेशा चाहते थे कि अस्पताल जाएँ और रोगी को शुभकामना दें। हमें उनका यह बर्ताव बहुत अच्छा लगा कि वे दूसरों की परवाह करते थे और दोस्ती को महत्व देते थे।

लेकिन श्रीमान झाओ रोगियों से प्रेमवश मिलने नहीं जाते थे, बल्कि दूसरे कारणों से जाते थे। कुछ और प्याले चढाने के बाद वे और भी जोश में आ गए।

उन्होंने कहा कि इस दुनिया में जो प्रतिस्पर्धा होती है वह कुछ लोगों के बीच की होड़ होती है। उन्होंने कहा कि देशों, जिलों, कंपनियों और स्कूलों की प्रतिस्पर्धा से उनका कोई लेना देना नहीं था, और उनमें उतना उत्साह भी नहीं होता है जितना कि दो व्यक्तियों के बीच की प्रतिस्पर्धा में होता है। प्रतिस्पर्धा आमतौर पर जाने पहचाने लोगों के साथ ही होती है, जैसे विद्यार्थियों, सहकर्मियों, यहाँ तक कि भाई-बहनों के बीच प्रतिस्पर्धा बहुत आसानी से विकसित हो जाती है। आप किसी अनजान व्यक्ति के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहते। उन्होंने बड़े संतुष्ट भाव से बताया कि कुल मिलाकर वे एक सफल इंसान थे। वे सफल क्यों थे? इसका सम्बन्ध स्वास्थ्य से था।

उन्होंने बताया कि जब भी उनको यह पता चलता कि उनका कोई सहकर्मी, पुराना सहपाठी, या कोई दोस्त बीमार पड़ गया है तो वे अस्पताल जाते और इससे उनको एक प्रकार की ऊर्जा महसूस होती थी इसलिए वे उनको देखने के लिए अस्पताल जाना चाहते थे।

उनका कहना था कि उनको उससे संतुष्टि का अनुभव होता था। जब वह अस्पताल के बिस्तर पर दूसरे लोगों को कराहते, चिल्लाते, दर्द के मारे छटपटाते देखते तो उनको ख़ुशी महसूस होती थी। कई बार जब वे अजीब अजीब तरह की नलियाँ अपने किसी बीमार सहकर्मी या पुराने सहपाठी के शरीर में घुसे हुए देखते तो खुद को बेहद भाग्यशाली समझते थे कि वे खुद मरीज नहीं होते थे। दर्द सबसे अधिक सहन करने लायक तब होता है जब वह किसी और को हो रहा होता है।

इस बात को समझाने के लिए उन्होंने कई तरह के उदाहरण दिए:

“एक अध्यापक ने अपने नेताओं और साथियों को रपट की चिट्ठी लिखी ताकि उसको प्रोफ़ेसर की उपाधि मिल सके। उस रपट पत्र में उसने लिखा कि मैं जो पढाता हूँ उस सामग्री में दूसरों की अध्यापन सामग्री से चोरी की गई होती थी। उसके इस बर्ताव के कारण तीन साल तक मेरी उपाधि सम्बन्धी मूल्यांकन टल गई। और उसकी ख्वाहिश पूरी हो गई। उसको मुझसे दो साल पहले ही प्रोफ़ेसर की उपाधि मिल गई और कुछ समय के लिए वह खुश हो गया। लेकिन अंत में नतीजा क्या रहा? उसको जिगर के कैंसर के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, उसका कैंसर काफी बढ़ गया था। मैं बारिश में भीगते हुए उसको देखने के लिए गया। उसको इतना दर्द हो रहा था कि वह बोल भी नहीं पा रहा था। लेकिन मैं ख़ुशी ख़ुशी बतियाता रहा।

“एक बार फिर, स्कूल में अध्यापक होने के बाद मेरा एक पुराना सहपाठी मेरे साथ प्रतिस्पर्धा करने लगा। वह उपाध्यक्ष बन गया जो मुझे बनना चाहिए था। लेकिन आखिर में नतीजा क्या रहा? उसको दिल की बीमारी हो गई। उसको बाईपास करवाने में हजारो युआन खर्च करने पड़े।अब उसकी हालत क्या है? अब वह उपाध्यक्ष नहीं है, और कर्ज में डूबा है। मैं अस्पताल में उसको देखने के लिए गया था। वह कुत्ते की तरह दुबला हो गया था। बेचारा लग रहा था!

“और एक श्रीमान कियान थे। उन्होंने और मैंने एक ही साल स्कूल में अध्यापक के रूप में काम करना शुरू किया था। उनको मुझसे एक साल पहले ही घर मिल गया। हम एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते थे। उस समय वह बहुत खुश थे। और ऐसा लगता था जैसे वह पूरी दुनिया को बता देना चाहते हों। दस साल पहले उनको सेरेब्रल थ्रॉम्बोसिस हो गया। वे चलने की बजाय दौड़ने लगते थे, और रुक नहीं पाते थे फिर लड़खड़ाकर गिर जाते थे। अब उनकी मुझसे कोई तुलना नहीं। मैं आधा किलो मसालेदार बीफ मीट खा सकता हूँ और ढाई सौ ग्राम शराब खाने के साथ पी जा सकता हूँ, लेकिन वे किसी मृत के समान हो गए हैं। जब मैं अस्पताल में उनको देखने गया तो वे उनको बैठने में भी मुश्किल हो रही थी, और लगभग बेहोश ही हो गए थे। मैंने वार्ड में उनके सामने 100 बार दंड-बैठक की जिससे वे बेहद गुस्से में आ गए।”

अपने अध्यापक की इन शानदार बातों को सुनने के बाद हमने उनके सुखद औए स्वस्थ जीवन की कामना की और उनकी शिक्षाओं को अपने दिल में संजो लिया।

अधिक समय नहीं हुए जब प्रोस्टेट की बीमारी के कारण उनका ऑपरेशन हुआ और वे अभी अस्पताल में ही हैं। हम उनके विद्यार्थी थे और इस नाते हमें उनके पास रहना चाहिए लेकिन अस्पताल में मरीज को देखने जाने को लेकर उन्होंने जो अनोखी बात बताई थी इसलिए उनको देखने जाने की हमारी हिम्मत नहीं हुई क्योंकि हमें इस बात का डर था कहीं वे हमें गलत न समझ लें। हम आज तक उनसे मिलने नहीं गए हैं। हम उनके लिए बस दुआ कर सकते हैं कि वे जल्दी से जल्दी ठीक हो जाएँ और अपने अपने बीमार विद्यार्थियों, सहकर्मियों और दोस्तों को देखने पहले की तरह जा सकें।

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