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दिल्ली से आयी चिट्ठी का जवाब लाहौर से

कल शायर, कलाकार शुएब शाहिद ने ‘लाहौर की दोशीज़ा के नाम’ एक ख़त लिखा था। आज उसका जवाब आया है। जवाब दिया है लाहौर से राबिया अलरबा ने, जो नौजवान पाकिस्तानी कहानीकार, आलोचक और कॉलम लेखक हैं। साहित्य, समाज और सियासत पर अपने विशेष आलोचनात्मक विचारों के लिए भी जानी जाती हैं। आप उनका जवाब पढ़िए-

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प्यारी दुश्मन!!

सच ही कहते हो ‘प्यारी दुश्मन’!!

दुश्मन बहुत प्यारे होते हैं। और हम उन्हें दुश्मन कहते ही इसलिए हैं कि उन्हें भूलना नहीं चाहते।

तो मेरे प्यारे दुश्मन, मेरा सलाम क़ुबूल करो…

सच कहते हो। आज चौदह अगस्त है और हम जश्न मना रहे हैं। रात से ही जश्न शुरू हो चुका था। और अब, जब ये चिट्ठी पढ़ रही हूं तो शाम होने को है। चंद घंटों के बाद तुम्हारे यहाँ जश्न-ए-आज़ादी शुरू हो जाएगा।

देखो, एक रात की बात है। जश्न ही था। इकट्ठा भी तो हो सकता था।

आज मेरे सफ़र का दिन था। और मैं बॉर्डर पर मौजूद रही। सुबह तोपों की सलामी भी हुई है। और देखो, सलामी, सलामती के घराने से ताल्लुक़ रखती है। मगर बारूद की बू ने उस घराने की पहचान बदल दी है। ये सोचते हुए वहाँ से हम ज़िन्दगी की तरह आगे बढ़े। तुम सच कहते हो, जश्न होगा। ये वो जश्न का दिन है, जिस दिन हमने अपने दादा जी और अब्बा जी की आँखों को हमेशा नम देखा। और उन दिनों इस नमी के इज़्तिराब में कभी घर के किसी कोने में, तो कभी किसी बरामदे में अपनी उंगलियों की पोरों से साफ़ करते थे कि कोई देख ना ले। लेकिन वो जो कहते हैं कि इश्क़ और मुश्क़ छुपाए नहीं छुपते। और दादी जी को हमेशा ये कह कर नम आलूद आंखों से देखा कि “बारह बच्चों में बस ये एक ही काला पैदा हुआ और इसके नसीब भी उस दिये की काली सियाही जैसे निकले। जिसकी रौशनी में इसका जनम हुआ था।” और वो अपने सफ़ेद दुपट्टे से अपनी आँखें पोंछ लेतीं। और उनके गाल लाल हो जाते।

अगरचे तक़सीम से क़ब्ल ही आला सरकारी अफ़सर जो हिजरत करना चाहते थे उनमें से चंद के तबादले हो चुके थे और दादा का भी तबादला बहावल नगर में हो चुका था। मगर तक़सीम का सुर्ख़ रंग दोनों ओर यकसाँ बिखरा था।

ख़ैर छोड़िए, वहाँ से हम सीधा करतारपुर चले गए। रास्ते में शाही मस्जिद के बाहर इक़बाल का मज़ार आता है। उम्मीद करती हूँ कि तुम उनको भी दुश्मन-ए-जान कह कर भूलने की नामुमकिन कोशिश करते होंगे। मज़ार के सामने शाही क़िला भी है। वहाँ से निकल कर हमने वही राह ली, जहाँ सुना है मोहब्बत की कोई यादगार बनी है। हमने सोचा हुआ था कि हालात-ए-वबा से जान छूटते ही उस यादगार के रंग देख कर आएंगे कि वहाँ किन रंगों ने उनमें रंग भरा है। सुना तो है कि सब रंग मिल कर बहुत रोए हैं।

बात कहाँ थी, निकल कहाँ गई। ख़ैर, हम वहाँ पहुंचे तो एक बहुत बड़े हसीन दरवाज़े से अंदर दाख़िल होते ही ज़मान-ओ-मकाँ ने ऐसा रंग बदला कि अजनबी, तुम को क्या बताऊँ! सुनहरी और सफ़ेद रंग का हर सू राज है। हरियाली ना जाने क्यूँ इतराती फिरती है। शायद ख़ुद में नाज़ाँ है कि मैं काली लकीर से आज़ाद हूं। या शायद हम लकीरों के फ़क़ीरों पे हँसती है।

और फिर ज्यों-ज्यों मैं आगे बढ़ती गयी, नई सोचें, नए ख़याल मुझे घेर रहे थे। कि अचानक मेरे क़दमों में एक लिफ़ाफ़ा हवा के किसी झोंके के साथ ठहर सा गया। मैंने सोचा कि शायद दूसरे झोंके से किसी और के पास चला जाएगा मगर उसे ना जाना था, ना गया।

मैंने उसे उठा लिया। ये सोच कर कि शायद मेरे लिए ही आया हो। चूंकि ज़मान-ओ-मकाँ बदला था। सोच भी हवा की तरह हो गई थी।

मैंने उसे अपने बटुए में डाल लिया। कि रास्ते में देखूँ कि उसमें क्या राज़ छुपा बैठा है ?

आज यहाँ मौसम बहुत अच्छा है। बारिश हुई है और हवा की ख़नकी चारों ओर नाचती फिर रही है। जैसे मोर जंगल में रक़्स करता है। ये वस्ल का मौसम होता है।

ऐ अजनबी, वापसी है और हम खानपुर नहर के एक ढाबे पे ठहरे। यहाँ की मछली और नान पकोड़े बहुत मशहूर हैं। यहाँ बड़ी-बड़ी लोहे की कड़ाहों के नीचे लगा अलाव भी यहाँ की ख़नकी को मुतास्सिर नहीं कर सकता। नहर किनारे सादा सी देसी कुर्सियाँ और मेजें हैं और हम जब भी जाते हैं, नहर के बिल्कुल साथ वाली कुर्सी पर बैठते हैं और पानी से दिल की बातें कर लेते हैं। नहर का तो रूमान मत पूछो। हम जैसे हस्सास दिल वालों के लिए तो दुश्मन-ए-जान ही है। हम नहर के जंगले के पास खड़े उससे बातें कर रहे थे कि पानी की किसी लहर ने याद दिलाया कि तुम्हारे पास एक चिट्ठी है। हमने झट से अपने बटुए से चिट्ठी निकाली और पढ़ने लगे।

अरे, ये तो लाहौर की किसी दोशीज़ा के नाम है!

चिट्ठी दिल्ली से वो ख़ुशबू आ रही थी कि जो मेरे दादा-दादी से आती थी। ‘चार आराम बाग़’ मेरे परदादा का घर था। जो उन्होंने अपनी आख़िरी सरकारी पोस्टिंग के बाद बनाया था।  नहीं मालूम कि अब वहाँ कौन रहता है? वो तो तक़सीम की ख़बर से ही अल्लाह को प्यारे हो गए।

ऐ अजनबी, तुमने चिट्ठी में जुदाई का कौन सा रंग भर दिया है? लगता है जैसे ये चिट्ठी पिछले कई बरसों से हर साल कोई लिखता रहा है और काली लकीर के पार नहीं आ रही। यूँ लगता है जैसे ‘चार आराम बाग़’ की किसी शाहराह पे हम मुताज़ाद सड़कों पे किसी जनम में गुज़रे और एक दूजे को देख कर आगे बढ़ गए थे। और इतना आगे बढ़ गए थे कि वापसी मुमकिन ही ना रही।

मुझे चार्ल्स डेक्किंज़ का ‘टेल ऑफ़ टू सिटीज़’ ना जाने क्यूँ याद आ गया।

तुमने जिस काग़ज़ की बात की है, जिस दस्तावेज़ पर आँसू बहाए हैं, यहाँ तारीख़ हमेशा बेबस रही है। दुनिया की हर तरक़्की और हर फ़लसफ़ा इन दस्तावेज़ को नोक-ए-बन्दूक़ पे हार जाता है। कि दिल पे दुनिया की ख़ुदाई नहीं चलती। हमेशा ये काग़ज़ और उन पर किए गए दस्तख़त नक्शों पे लकीरों को बढ़ा देते हैं। मगर याद रखना, नक्शे में जितनी लकीरें बढ़ेंगीं, दिलों से उतनी मिटती जाएँगी। यही दस्तूर-ए-फ़ितरत है।

ये जो शह-ए-रग होता है ना, ये इतना करीब हो जाता है कि ये ताकत माँगने लगता है। इसी को तो सजदे से राम करना पड़ता है। मगर तारीख़ यहाँ सावन से भादों में बदल जाती है।

तुम ज़र्फ़ की बात करते हो। मान लेती हूँ अजनबी! मगर मैंने जिस तरह से तारीख़ के गर्दआलूद की वर्क़-गर्दानी की है। मैं इस लफ़्ज़ के मानी अपनी लुग़त में बदल चुकी हूँ। ऐ अजनबी, एक लुग़त हालात-ओ-वाक़ियात की भी होती है। हम उसके मानी ना तो लिखते हैं, ना ही दूसरों तक पहुँचाते हैं।

देखो अजनबी, मुझे दिल के कुतुब मीनार ने हमेशा अपनी ओर खींचे रखा है। और मुझे दुश्मन-ए-जान के लफ़्ज़ ने हमेशा सरगोशी की है कि मोहब्बत की राहों की कोई मंज़िल नहीं होती। मगर क्या करूँ अजनबी, मैं एक ख़्वाब-ए-वस्ल तो बन सकती हूँ, सो कब से बन रखा है। मुझे बचपन से ‘चार आराम बाग़’ के बरामदे में रखी कुर्सियाँ कहती हैं, कहाँ हो? मगर मुझे उन्हें ये बताते हुए अब हया आती है कि 74 बरस गुज़र चुके हैं।

यूँ लगता है जैसे ये चिट्ठी मेरे लिए ही लिखी गई थी। इसलिए जवाब दे रही हूं।

ऐ अजनबी, मुझे यूँ भी लगता है कि जैसे मैं किसी ऐसी चिट्ठी की मुन्तजिर थी। मगर मुझे ये पता था कि मुझे इस माद्दा-परस्त दौर और माद्दा-परस्त दुनिया में मोहब्बत की चिट्ठी कौन लिखेगा? इसलिए इस दिल को मैंने कहा कि मोहब्बत वाली लुग़त को भी बदलने की कोशिश कर। कम-अज़-कम मतरुक लफ़्ज़ के ही खाते में डाल दे। मगर दिल भी अभी तलक माना नहीं। कि ये मतरुक को भी हिस्सा-ए-जान तसव्वुर करता है। नादान जो ठहरा।

ऐ अजनबी, ऐ दुश्मन-ए-जाँ,

ये चिट्ठी हवा से मोहब्बत के क़दमों में आ ठहरी थी। जिन नहरों में ये पैर रख कर मोहब्बत के ख़यालों के फूल उगाती है, वही आब बादल बन कर आसमानों की ओर जाते हैं। तो हवाओं के संग ये बादल हर उस जा बरसते हैं, जहाँ मोहब्बत प्यास बनी बैठी होती है। काग़जों और उनपे दस्तख़त करने वालों के दिल नहीं होते। मगर फ़ितरत एक हस्सास और कुशादा दिल रखती है।

बस हमें ही इल्म नहीं होता कि आँख उठा कर बादलों में परिवेश का दीदार कर लें। जो बालों के संग किसी आवारा रूह की मानिंद उड़े फिरती है।

अजनबी देखो, सावन आख़िरी साँसे ले रहा है। जिस रोज़ आसमान पे कौस-ए-क़राह मुस्कुराई, समझ लेना परी-पोश उन बूंदों के संग आयी थी। जिन ज़ुल्फों की तुमने बात की है, उन पे मुझे जाँ निसार अख़्तर का शेर याद आया-

महकी महकी तेरी जु़ल्फों की घटा छायी है

तू मुझे कौन सी मंज़िल पे ले आयी है

ज़िन्दगी दूर बहुत शोरिशआलाम से है

आज की रात मंसूब तेरे नाम से है

 

अजनबी मुझे तुम्हारे नाम का इल्म नहीं, ना ही पूछूँगी

मगर मुझे ‘मोहब्बत’ कहते हैं।

(15 अगस्त 2020, लाहौर)

rabiaalraba@gmail.com

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शुएब शाहिद की चिट्ठी का लिंक- https://www.jankipul.com/2020/08/letter-to-lahore-by-shoeb-shahid.html

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