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कनाडा यात्रा की सुखद स्मृतियाँ: अमृता सिन्हा

लेखिका अमृता सिन्हा ने कनाडा यात्रा का संस्मरण लिखा है। आप भी पढ़ सकते हैं। काफ़ी विस्तार से एक अनजाने देश से परिचित करवाया है- मॉडरेटर 

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7 जून 2018

एकरसता और उबाऊ जीवन से परे जाना हो तो यात्राएँ सबसे खूबसूरत माध्यम है जिसमें व्यक्ति के अपने भीतर की लंबी , एकाकीपन की सुरंगों में भी मधुर संगीत की धुनें गूँज जाती हैं और कई घनीभूत कटु सच्चाइयाँ पिघल कर हवाओं में बिखर जाती हैं । यात्राएँ रू-ब-रू कराती हैं नई सच्चाइयों से , जीवन के संगीतमय रागों से ।

         कनाडा – यात्रा का आरम्भ मुंबई एयरपोर्ट से हुआ और महीनों से चले आ रहे ऊहापोह का दौर ख़त्म हुआ । न जाने कितने दिनों से लग रहा था की यात्रा हो पाएगी भी कि नहीं क्योंकि वीज़ा मिलने की परेशानियों के अलावा और भी बहुत सारी बातों का तालमेल नहीं बैठ पा रहा था , फिर सब कुछ ठीक रहा और हम लोगों ने सारी तैयारियां कर ली और यात्रा आरंभ की।

                 रात के 9 बजे हम लोग घर से निकले और मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुँच गए , वहाँ बाहर ही कुछ देर बिताकर ठीक 11 बजे अपने बेटे अश्विन से विदा लिया और अंदर प्रवेश कर , एयर कनाडा काउंटर की ओर  चले गए जहाँ बोर्डिंग-पास देने से पहले सम्बंधित अधिकारी ने कई पूछताछ की मसलन आप कहाँ जा रहे हैं ,आप वहाँ कितने दिन रुकेंगे है और अपने बेटे का भेजा गया इनविटेशन कार्ड दिखाएं वग़ैरह वग़ैरह । ख़ैर , हमारे पास वे सारे दस्तावेज़ थे , सो हमने उन्हें दिखा दिया और अब हम अपना बोर्डिंग पास लेकर निर्धारित गेट की ओर चल दिए।

                  अब, रात के क़रीब डेढ़ बजे रहे हैं, चेक इन और इमिग्रेशन की सारी औपचारिकताएं पूरी कर हम 70 ए गेट पर आ गए हैं। पूरा टर्मिनल यात्रियों से भरा हुआ है सभी यात्री अपनी अपनी कुर्सी में जमे हुए हैं, कुछ इधर-उधर ताकते , कुछ बतियाते , कुछ नींद में झुपते, अपनी – अपनी फ़्लाइट का इंतज़ार करते हुए ।

           मुंबई का इंटरनेशनल एयरपोर्ट अपनी भव्यता में डूबा जाग रहा है ,अपने यात्रियों के साथ।हमारे सामने तीन कुर्सियों वाली सीट पर तीन महिलाएँ विराजमान हैं।और वे लगातार ऊँचे सुर में अपने मोबाइल फ़ोन पर बतिया रही है, तीनों ने अपने पैर ऊपर किए हुए हैं लगभग पाल्थी की स्थिति में,कभी कभार अपने झोले से कुछ निकाल कर खाते हुए, अपने देसी अंदाज़ में ।

                               रात के दो बज गए हैं बोर्डिंग लाउंज में बैठे बैठे थोड़ी ऊब होने लगी है और जम्हाईयाँ भी शुरू हो गई हैं , अब बस बोर्डिंग के इंतज़ार में हैं ।हम अलसा रहे थे , तभी हमारी फ़्लाइट की बोर्डिंग अनाउंसमेंट हुई और बोर्डिंग की क़वायद शुरू हो गई है और हमने चैन की साँस ली। जल्द ही , हम फ़्लाइट के अंदर थे ।हमने अपने सामान को जगह पर रखा और अपनी सीट पर बैठकर उड़ने का इंतज़ार करने लगे।

                     यह लुफ्थांसा फ़्लाइट नौ घंटे में फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे पर पहुँच जाएगी और वहाँ उतर कर दो घंटे बाद हमें एयर कनाडा की कनेक्टिंग फ़्लाइट मिलेगी जो 10 घंटे में वैंकूवर पहुँचाएगी ।

           फ़्लाइट टाइम है , सभी यात्री अपनी अपनी जगह पर बैठ गए हैं,हमें सीट के बीच की सकरी जगह ज़रा परेशान कर रही है इस पर कोई बात नहीं एडजस्ट तो करना ही है। सीट पर रखें और कंबल और तकिये को मैंने अपनी गोद में रखा है और बैठ गई ।रात गहरी हो रही है और नींद भी बोहोत आ रही है फिर भी मैंने के सामने की सीट में लगे स्क्रीन पर कुछ मूवी देखनी चाही पर कोशिश बेकार गई क्योंकि आँखें बंद हो रही थी।सोते जागते नींद पूरी कररही थी और इसी बीच विमान परिचारिका गर्म वेज रोल थमा गयी है,साथ में है ड्रिंक भी । सॉफ़्ट या हार्ड ये आपकी च्वाइस । वैसे तो आधी रात को नींद के बीच खाने की मेरी आदत नहीं है पर कभी कभी कुछ नियम टूटते हुए बड़े भले लगते हैं,फ़िलहाल तो मैं इस गर्मागर्मरोल का भरपूर स्वाद ले रही हूँ साथ में ऑरेंज जूस ।

           विमान की खिड़कियाँ बंद हैं बाहर देखने का सवाल ही नहीं तो सामने वाली सीट पर लगी स्क्रीन पर मूवी या दूसरी चैनल के प्रोग्रामदेख सकते हैं। मैं कब सोई , कब जागी मालूम नहींऔर ना ही समय का अंदाज़ा हो रहा है । इसी बीच सोते – जागते मैं देख रही हूँ कि मेरे सह-यात्री ने खिड़की खोल ली है और बाहर सूरज और बादलों में है अठखेलियां चल रही हैं ।

              ये बादलों के समंदर मुझे बहुत गुदगुदाते हैं, इनकी अर्ध गोलाकार सफ़ेद आकृतियाँ ठहरी हुई नदी सी दिखती है, यहाँ आसमान में बर्फ़ीली नदी।सूरज चढ़ आया है, हमारे सह – यात्री ने फ्रैंकफर्ट के उड़ते बादलों को अपने कैमरे में क़ैद कर लिया है और मैंने भी उनसे आग्रह किया कि मेरे कैमरे में भी कुछ तस्वीरें ले लें। उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया , हमारी आँखें आसमान के नीले सफ़ेद रंगों में उलझी हुई थी तभी हमारा विमान फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे पर उतरने लगा। फ्रैंकफर्ट उतरकर हमारी आंखें ख़ुशी से चमकने लगीं , चारों ओर भीड़ ही भीड़ थी ।ज़बरदस्त सिक्योरिटी चेकिंग हुई इस दौरान मेरा बैग भी रोक लिया गया और उसमें से हर एक सामान निकाल कर देखा तो क्रीम टूथपेस्ट और दवाओं का ट्यूब सब का सब बाहर निकालकर चेक किया गया और अधिकारी ने मुझसे कहा कि यहाँ जर्मनी में जब आप दूसरी बार आएं तो कृपया ध्यान रखें के क्रीम साथ न हो क्योंकि क्रीम को भी लिक्विड माना जाता है और हवाई यात्रा के दौरान लिक्विड लाना सख्त मना है।मैंने नसीहत ली और आगे बढ़ गई।

               सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अब हमारे पास क़रीब डेढ़ घंटे बचे थे। हम फ़्रेश हुए , एक कप कॉफ़ी पी,कुछ तस्वीरें ली और वहीं बैठकर इंतज़ार करने लगे अपनी अगली फ़्लाइट का।

               

    यात्रा- संस्मरण भाग – 2

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एयर कनाडा फ़्लाइट में हूँ और फ्रैंकफर्ट से वैंकूवर जाना है फिर वहाँ से कनेक्टिंग फ़्लाइट पकड़ कर विक्टोरिया । फ़्रैंकफ़र्ट से वैंकूवर तक का सफ़र 9 घंटे का है।समय को समझने में उलझन हो रही है, मेरी घड़ी भारतीय समय बता रही है और मुझे अपनी घड़ी को छेड़ने की इच्छा बिलकुल नहीं । सीट के सामने ही स्क्रीन पर समय और दिन के साथ शहरों के नाम के ऊपर चाँद और सूरज दोनों दिख रहे हैं यानि यह स्पष्ट है कि कहीं दिन है और कहीं रात।हमारा जहाज़ अभी इस वक़्त महासागर पार कर रहा है,ऐसा हमें सामने की स्क्रीन देखकर पता लग रहा है । फ़्लाइट की सारी खिड़कियाँ बंद है, भीतर नीम अंधेरा है और लोग अपनी ज़रूरत के अनुसार लाइट ऑन कर किताब व अख़बार पढ़ रहे हैं , मैंने भी अपनी नोटबुक निकाल ली है ताकि इन बीत रहे शानदार पलों की अनुभूतियों को शब्दों में क़ैद कर सकूँ ।

                   पूरे सफ़र का ख़ूब आनंद ले रही हूँ,खाना पीना भी मस्त है।खाने में इंडियन और वेस्टर्न दोनों तरह के कुज़ीन उपलब्ध हैं और लज़ीज़ भी ।हमने वेस्टर्न खाना ही खाया , एकदम  गर्म और फ़्रेश।समय – समय पर विमान परिचारिकाएँ मुस्कुरा कर पानी के लिए पूछ जाती हैं ,वैसे तो हमें साथ पानी लाने की बीमारी है पर यहाँ फ़्लाइट के नियमों के आगे सारी बीमारियाँ काफ़ूर हो जाती हैं , लिहाज़ा हमें फ़्लाइट के पानी से ही संतोष करना पड़ा ।

                 इस वक़्त हमारी नज़र स्क्रीन पर है जो बता रहा है कि फ़्रांस से वैंकूवर 4317 किलोमीटर की दूरी पर है। अभी इस वक़्त बाहर का तापमान माइनस 46 डिग्री सेल्सियस है और हम समुद्र तल से 10363 मीटर की ऊँचाई पर हैं।

            फ़्रान्स के बाद Glasgow, Angmagssalik आदि को पार करते हुए हमारा विमान अपनी राह पर निरंतर आगे बढ़ रहा है,ये सारी जानकारियाँ हमें सामने लगी स्क्रीन पर उपलब्ध हो रही हैं । सारी रूटों से हर यात्री को अपडेट कराते हुए, इस चैनल के अतिरिक्त और भी कई ऑपशंस उपलब्ध हैं । और , इस बार मैंने मूवी का ऑपशन चुना और Red Sparrow मूवी देखनी शुरू की , थ्रिलर ,सस्पेंस मुझे पसंद है और इस मायने में बहुत सही चुनाव रहा मूवी का । फ़्रांसिस लॉरेंस द्वारा निर्देशित Red Sparrow 2018 के स्पाई थ्रिलर मूवी है जो जेसन मैथ्यू के नॉवेल पर आधारित है ।अपनी माँ के लिए समर्पित एक बेटी की कहानी है ,जो हर क़ीमत पर अपनी माँ की रक्षा करती है। इसमें जेनिफर लॉरेंस ने रशियन स्पाई वुमन का रोल अदा किया है,मुझे मूवी अच्छी लगी।

                  मूवी देखने में मैं इतना  मगन थी कि लंबे समय तक बैठे रहने से न थकान और ना ही किसी प्रकार की नीरसता का आभास  हुआ । पतिदेव अपनी पसंद की मूवी देखने में व्यस्त थे । लगभग सबने कानों में * इयर प्लग *लगा रखा था और कंबल से ख़ुद को गले तक ढक कर बस अपने में मगन थे । सिर्फ, सिर पर टिका नन्हा तकिया फिसल कर जो पीठ पीछे गुम हो जाता तो उसे ढूंढने की कवायद में हम ज़रा हिल – डुल लेते या फिर स्नैक्स , ड्रिंक्स या चाय- कॉफ़ी पीनी होती तब स्क्रीन पर लगी घड़ी की ओर तनिक झाँक लेते । बीच-बीच में कभी कभार  उठ कर कमर सीधी भी कर लेते या फिर आस – पास बैठे यात्रियों को देख लेते है और फिर कभी मूवी में , तो कभी अपने आप को अपनी डायरी में उलझा लेते ।इसी दौरान कप्तान ने सूचित किया कि हमारा विमान 9 घंटे के बजाए दस घंटे कुछ मिनटों में वैंकूवर पहुँचेगा ।यह सुनकर , मैं सोने का उपक्रम करती हूँ पर नींद नहीं आ रही , बाजू वाली सीट पर कनाडा मूल का यात्री है , हल्की – फुल्की बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि उन्हें वैंकूवर जाना है , पर फ़्लाइट की देर से पहुँचने पर उनके चेहरे की ऊब साफ़ झलक रही थी सच पूछिए तो थोड़ी चिंता तो हमें भी थी क्योंकि हमें कनेक्टिंग फ़्लाइट पकड़नी थी।खैर , इसमें तो किसी का वश भी नहीं था।

                       कुछ ही देर तक हमें जानकारी दी गई कि हम वैंकूवर पहुँच रहे हैं।अचानक ही पास की खिड़की से सूरज की रौशनी विमान के अंदर दाख़िल हो जाती है, अहा ! इतना उजाला !!! बाहर का मौसम एकदम साफ़ , शफ्फाक़ ….. और इतने में धड़ाक से हमारा विमान धरती पर , वैंकूवर की धरती पर ……।

          सयास मुस्कुराती हुई विमान परिचारिकाओं का धन्यवाद करते हुए जब हम बाहर निकले तो , हल्की बारिश ने हमारा स्वागत किया, ठंडी हवाओं ने प्यार भरा चुंबन दिया तो अजनबी शहर में भी कोई अपना सा लगा ,जाने इन हवाओं में क्या बात होती है कि हर जगह बड़ी शिद्दत से अपनी हसीन मौजूदगी का अहसास ही नहीं कराती बल्कि अपना दीवाना बनाने से भी बाज़ नहीं आती ।ऐसे भी मन का खिलना तो लाज़िम था ।

                 पर सारी रूमानियत तब हवा हुई जब मालूम हुआ कि हमें कनेक्टिंग फ़्लाइट पकड़ने में शायद देर हो सकती है क्योंकि सिक्योरिटी चेकिंग में भी बहुत भीड़ थी और हमें अभी इमिग्रेशन काउंटर पर भी जाना बाक़ी था । ऐसे में हम लगभग भागते हुए सिक्योरिटी चेकिंग के लिए पहुँचे,लाइन ज़रा लंबी थी इंतज़ार तो करनाहीथा।वहाँ से फ़ारिग़ होकर दौड़ पड़े इमिग्रेशन काउंटर की ओर वहाँ भी बला की भीड़ देख कर हमारे होश फाख़्ता हो गए और फ़्लाइट मिस का पूरा अंदेशा हो गया । किंतु वैंकूवर एयरपोर्ट पर , अधिकारियों की मुस्तैदी से सभी यात्रियों की पूरी मदद हो रही थी जिससे फिर थोड़ी उम्मीद बंधी । कनेक्टिंग फ़्लाइट वाले यात्रियों की विशेष सुविधा के लिए संबंधित अधिकारियों ने ऑटोमेटेड मशीन में इमीग्रेशन की औपचारिकता पूरी करने का सुझाव दिया, जो पलक झपकते ही पूरा हो गया और फिर वहाँ से क्लियरेंस लेकर लगभग भागते हुए लंबी दूरी तय कर उस टर्मिनल  तक पहुँचे जहाँ से हमें विक्टोरिया के लिए फ़्लाइट पकड़नी थी किंतु पता लगा कि हमारी फ़्लाइट मिस हो गई है। हमारी दौड़भाग का कोई परिणाम नहीं निकला , हम थोड़े निराश हुए , पर पूछताछ करने पर पता लगा कि हमें अगली फ़्लाइट मिल सकती है।जल्द ही बिना किसी हील हुज्जत के हमें अगली फ़्लाइट का बोर्डिंग पास मिल गया,हमने चैन की साँस ली और बड़े इत्मिनान से वहाँ लगे सोफ़े में धँस गए और एयरपोर्ट में हो रही गतिविधियों का जायज़ा लेने लगे।

                              करीब दो घंटे इंतज़ार के बाद हमारी बोर्डिंग हुई । इस बार की फ़्लाइट में कम यात्री थे ।मुझे विंडो सीट मिली । मैं ख़ुश थी कि आसमान और बादलों की तस्वीरें लूंगी,मैं अभी बाहर देख ही रही थी कि अचानक मुझे ऐसा एहसास हुआ कि हमारा विमान धरती को छू गया है, ये मेरा भ्रम नहीं था , हमारी फ़्लाइट सचमुच लैंड कर चुकी थी , विक्टोरिया की धरती पर।हम आधे घंटे में ही विक्टोरिया पहुंच जायेंगे इसका अंदाज़ा मुझे बिलकुल नहीं था तो ख़ैर अब हम पहुँच चुके थे , अपने गंतव्य तक ।

               बाहर, बारिश से धुला आकाश और एयरपोर्ट पर , मेरा बेटा आकाश दोनों मुस्कुरा रहे थे हमारे स्वागत में ।ढाई सालों बाद बेटे आकाश से मिलना बेहद सुखद था । उसे सामने देख कर मैं सोचने लगी , समय कैसे पर लगा कर उड़ जाता है , उसे यहाँ आए ढाई साल हो गए , यहाँ विक्टोरिया में आकर उसने अपनी पढ़ाई पूरी की और उसी के कन्वोकेशन के बहाने आज हमारा कनाडा आना हुआ और अब तो वह यहाँ के होटल Marriott में काम भी कर रहा है ,सोचकर बड़ा सूक़ून आ रहा है । मैं सोच में तल्लीन थी तभी वो दोनों सामान कलेक्ट कर हाज़िर हो गए ।

                   हम एयरपोर्ट से बाहर आए , मौसम सुहाना था,बूंदाबांदी अब भी जारी थी । आकाश ने सारा सामान गाड़ी में रखा और हम घर की ओर चल दिए ।

                 घर पहुँचकर बड़ा सुकून मिला ।घर की सुंदरता और रख रखाव ने मन मोह लिया । सामान रख कर हम फ़्रेश हुए और फिर बाहर निकले । रास्ते भरआकाश यहाँ की सड़कों और ट्रैफ़िक के कड़े नियमों के बारे में बताता रहा।गाड़ी 40किलोमीटर की स्पीड से चल रही थी , हमें अजीब लग रहा था , मुझे मुंबई की ट्रैफ़िक की याद आ रही थी। इतनी साफ़ सुथरी सड़कें और नियमों को शिद्दत से पालन करते लोग मुझे चकित कर रहे थे ।

               जल्द ही हम इंडियन रेस्तरां turmeric पहुँचे , वहीं थोड़ा खाया पिया और वापस घर पहुँचे तो वैसे भी बहुत नींद आ रही थी, आंखें नींद से इतनी बोझिल थीं कि बातें करते करते मैं लुढ़क रही थी आख़िर मैंने बिस्तर पकड़ा और मुझे ऐसी घोर नींद आयी कि जब आँखें खुलीं तो देखा कि सुबह के 5 बज रहे हैं।लोगों से बहुत सुन रखा था कि जेट लैग हो जाएगा, पर हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ और हमें यात्रा का बहुत आनंद आया ।

                                                         

कनाडा यात्रा-भाग – 3

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खुला नीला आसमान , तैरते मेघ के टुकड़े….ब्रिटिश कोलंबिया पार्लियामेंट बिल्डिंग के ठीक सामने दूर तक बिछी हरी दूब पर , धूप सेंकते कई प्रेमी जोड़े, दौड़ते भागते खिलखिलाते बच्चे , कुछ बुज़ुर्ग जोडे़ एक दूसरे का हाथ थामे बतियाते आपस में तल्लीन, हवा में प्रेम की सुगंध तिरती हुई ।वातावरण स्वच्छ ,विचारों में खुलापन , न पहनावे की कोई बंदिश ,न कोई ताक-झाँक , कुछ भी अटपटा नहीं , हिपोक्रेसी नहीं । हवा में रूमानियत है , धूप आशिकमिज़ाज़ सा आवारा भटकता हुआ ,एक चिड़िया है , जो अभी-अभी उतर आई है हरी मुलायम दूब पर । अपने सफ़ेद दुधिया डैनों को फड़फड़ाती , जाने क्या ढूँढती , घास में कुछ चुगती फिर उड़ती और फिर कहीं बैठ जाती , बार-बार एक ही प्रक्रिया को दुहराती मुझे आकर्षित कर रही है । बगुले सरीखे दीखती है पर …. नहीं, ज़रा अलग तरह की इस चिड़िया को मैं पहचान नहीं पा रही …उसकी दुधिया सफ़ेदी मेरी आँखों को ठंडक पहुँचा रही है …. मैं उसके करीब जाना चाहती हूँ , उसे पास से देखना चाहती हूँ पर शायद उसे अपनी स्वच्छंदता में किसी तरह का ख़लल पसंद नहीं , तभी वो उड़ कर आँखों से ओझल हो जाती है ।

                                  आज जान- बूझ कर मैंने कार से जाने को मना किया है ताकि पैदल चलते- चलते यूँही बेफ़िक्री से कहीं से कहीं पहुँच जाँऊ और इस अजनबी शहर के मिज़ाज को समझ सकूँ ।घर से निकलते ही आहते में हिरन का बच्चा दिखा जो शायद पास वाले जंगल से आया हो ,मैंने तस्वीर ली और आगे बढ़ गयी ।खूबसूरत घरों के बीच पसरी इन काली साफ सुथरी सड़कों पर चलने का अपना ही आनंद है , इन फूलों से घिरे हसीन घरों को निहारना , और निहारते ही जाना ….बेहद सुखद ।शाम के चार बज रहे हैं, पर सूरज का प्रचंड ताप अपनी सुनहरी रौशनी बिखेर रहा है , दिन अपने पूरे शबाब पर है , जवाँ दिल के साथ । वैसे तो पूरे शहर में उजाले का साथ देर शाम तक रहता है , करीब 8:00 से 8:30 तक । पर , शहर सो जाता है जल्द ही ,तभी कई दुकानें तो 5-6 बजे शाम को ही बंद हो जाती हैं , 9 बजे तक बाज़ार में सन्नाटा और रेस्तराँ भी 10 बजे तक ही खुले मिलते हैं । ऐसे में , मुंबई की हसीन शामों और जगमग रातों की आहटों की सुगबुगाहट सुनती हूँ । मन के कैनवस पर कई रंगों के मिश्रण से एक कोलाज उभरता है , एक आभास ….. जैसे अतीत और वर्तमान के ढेरों बिंब एक – दूसरे में घुलते – मिलते जा रहे हों ……!

                       आख़िर किसी यात्रा में , किसी मुसाफ़िर को इस मिलने और छूटने के बीच क्या तलाश है ? कैसी तलाश ? तलाश जिसका न आदि है ना अंत …..एक अजीब सी बेचैनी , एक अनकही छटपटाहट से गुज़रने से ज़्यादा कुछ नहीं ….. और हर तलाश का अंत सिर्फ और सिर्फ एक ख़ालीपन । शायद तभी मुझे कोई तलाश नहीं , मेरा मक़सद सिर्फ इन खूबसूरत लम्हात् को आँखों से पीना है , मन की तहों में सहेजना है ।

                             सहेजना है मुझे ….शहर की इन धुली-धुली हरी भरी वादियों को , खुले गहरे नीले आसमान को ,लोगों के शालीन अभिवादनों को , अजनबियों की मुस्कुराहटों में घुले अपनेपन को , उन नीली पनीली आँखों के सम्मोहन को , हवा में पसरी रूमानियत को ……

                       पूरा विक्टोरिया किसी कलाकार की सधी हुई कूँची की खूबसूरत लैंडस्केप की मानिंद दिखता है । पूरे शहर में जगह- जगह पेड़ों के अजब रंगों पर मैं फ़िदा हूँ , कहीं गहरा फालसाई रंग , कहीं पाँच रंग के पेड तो कहीं गहरे कथ्थई रंग के पत्तों वाले पेड़ ।कथ्थई रंग के पत्तों वाले पेड़ों से तो जैसे मुझे प्यार हो गया है , जहाँ देखती हूँ इसके पास जाकर उसे छूती हूँ , बातें करती हूँ , कई बार की तरह आज भी इनकी झुकी टहनियों ने हवा के झोंके में झूमते हुए मेरे स्नेह को स्वीकारा ….. लगा जैसे कोई मेरी पेशानी पर प्यार की मुहर लगा गया हो , हौले से …..मैंने अपनी मुंदी आँखों से महसूस किया अपने वर्तमान को , इस क्षण को जहाँ , मुझे आंशिक पूर्णता का अहसास हो रहा है….पास ही बहता पारदर्शी पानी है , सागर की हल्की – हल्की चपल लहरें हैं , ठंडी हवा और दूर खड़े  पर्वत हैं , वो सब कुछ है जो मौसम को आशिक़ाना बना सके ।

            साफ सुथरी सड़कें हैं , सड़कों पर हर चलने वालों की जगह मुकम्मल है । यहाँ, लोग साईकिल के दीवाने हैं तभी सड़कों की कुछ दूरी पर छोटे से बने स्टैंड पर साइकिलें और हेलमेट रखी रहती हैं जिन्हें आप हायर कर चला सकते हैं । मज़े की बात है कि य सेल्फ़ ऑपरेटेड होती हैं ,  तय की गयी दूरी के अनुसार आपको पे करना होता है ।जगह – जगह रखी हरे रंग की साइकिलें बहुत लुभाती हैं ।यहाँ, साइकिल चलाने वालों के लिए भी कड़े नियम है, कार चलाने वालों के लिए भी और पैदल चलने वालों के लिए भी और नियम के उल्लंघन पर पिनाल्टी टिकट इश्यू होती है और दोषी को खासी बड़ी रक़म चुकानी होती है । यहाँ अक्सर , लोग कार और बसों के कैरियर पर साइकिलें रख कर चलते हैं। पैदल चलने वालों के लिए ट्रैफ़िक लाइट में एक अलग ऑप्शन है, लाल हथेली पैदल चलने वालों को रोकने के लिए है , जिसके सफ़ेद रंग की आकृति में तब्दील होते ही एक कू- कू की लुभावनी आवाज़ पैदल चलने वालों को सड़क क्रास करने का संकेत देती है ।

                      रिक्शे भी चलते हैं यहाँ पर ऑटो रिक्शा नहीं।कलकत्ते और मुंबई की तरह घोड़ा गाड़ी भी है जो आपको और शहर की कुछ दूरी के चारों ओर घुमाता है ।अथाह प्रकृतिक सौंदर्य बिखरी है हर तरफ जिसमें एक अपनेपन का एक रिश्ता सा क़ायम हो चला है पर, और गाहे बगाहे और मुंबई की हवा की याद आ ही जाती है, बिंदास बारिश की कविता करती फुहारों को कहाँ भूल पाती हूँ मैं , शायद तभी अतीत और वर्तमान के सारे बिंब घुलते मिलते नज़र आते हैं।

                              हर तरफ़ शान्ति व्याप्त है,ग़ज़ब का सुकून है।हाँ जब तफ़रीह को निकली तो अहाते में दो हिरणों को देखा है जो घूमते घूमते पास की झाड़ी में गुम हो गए ।थोड़ी ही देर बाद एक जंगली खरगोश रास्ता काट गया , मैं हैरान थी कि यहाँ की गिलहरियाँ इतनी तंदुरुस्त है पर बेटे आकाश ने बताया कि आस पास की झाड़ियों में बहुत खरहे हैं , जो अक्सर दिखते हैं । पेड़ों के झुरमुट में कई गौरैय्या भी दिखी , हू-ब-हू अपने देश सी , मैं मुस्कुरायी,मेरी दोस्त तो यहाँ भी उतने ही प्यारी है ,उतनी ही सलोनी।

                    सड़कों के किनारे *साइड पाथ वे” है, सड़कों के किनारे किनारे चलते बहूत दूर निकल आयी हूँ, चारों तरफ़ हरियाली ही हरियाली है । जब भी अपने लगते हैं तो साफ़ सुथरे बेंच पर बैठकर आराम कर लेती हूँ और फिर चल देती हूँ।मैं देखती जाती हूँ कि ज़्यादातर घर एक दूसरे से मिलते जुलते हैं और हर घर के सामने एक छोटा सा बाग़ है जो रंग- बिरंगे फूलों से भरा है । यहाँ लोग बेहद शौक़ीन हैं जिसे घर के बाहरी साजसज्जा देख कर ही पता लगाया जा सकता है।सड़कों पर भी तो पोलों पर फूलों भरे पॉटस लगे हैं जिनकी देखभाल स्थानीय सरकारी कर्मचारी करते हैं।यहाँ फूलों को कोई नहीं छेड़ता वरना हमारे इलाक़े में तो फूल तोड़ना शग़ल है , फूल उगाओ और उसकी रखवाली करो और सरकारी फूल तो हमारे देश में हमारी अपनी ही मिल्कियत है , सुबह हुई नहीं कि झोले भर फूल तोड़ कर बड़े फ़क्र से घर लौटे जैसे क़िला फ़तह कर लौटे हों ।

               यहाँ बने घर भी अद्भुत है सारे लकड़ियों के बने।रास्ते में मैंने बनते हुए कई मकान देखे जो लकड़ियों के पट्टों और मज़बूत लोहे की स्क्रू और लोहे के सरियों की सहायता से बनाए जा रहे थे।यहाँ घर की दीवार से लेकर फ़र्श और छत तक लकड़ियों की होती हैं और इसी सिलसिले में कई घरों के आगे कटे पेड़ों की लकड़ियाँ भी पड़ी मिलीं । वैसे जानकारों से ये मालूम हुआ कि घर बनाने के लिए “कनाडा बाहरी देशों ख़ासकर चीन से लकड़ियाँ आयात करता है किन्तु फिर  भी ये लकड़ियाँ आख़िर पेड़ों की कटाई पर ही तो उपलब्ध होती होंगी, ऐसे ही कई अनुत्तरित प्रश्न मन में हैं ……! कटे पेड़ों के तनों को देखकर मन बहुत दुखता है कैसे इन कटे तनों पर ताज़े लहू के निशान हों, एक तरफ़ पर्यावरण बचाने के लिए इतनी कवायद थे और दूसरी ओर पेड़ों पर आरियाँ चलती ही जाती हैं ,अजीब विरोधाभास है।

                        शाम के छः बचने को है घर लौटने का समय हो गया है, फिर उन्हीं काली ख़ूबसूरत सड़कों के किनारे किनारे वापस लौट चल रही हूँ, रास्ते भर पार्क, लेक, रेस्तरां, ख़ूबसूरत प्यारे घर सब पार करते हुए और अपने कैमरे में हर क्षण को क़ैद करते हुए ,यादों में सहेजते हुए।तभी सामने से आते हुए एक सज्जन ने मुझे *सत् श्री काल* कह कर अभिवादन किया, तो मेरे होठों पर मुस्कुराहट फैल गई और मैंने भी अभिवादन में सर हिला दिया।सड़क पार करने का इंतज़ारकरही रही थी कि सामने देखा एक नौजवान अपने दो बच्चों को छोटी सी लॉरी ही में बिठाकर वहीं पास में खड़ा है,उन्हें भी सड़कपारकरने का इंतज़ार था। पास के पार में पुनः उन्हें देखकर मैंने उनसे उनकी तस्वीर लेने की इजाज़त ली और उनका नाम पूछा, उन्होंने अपना नाम डॉरिस बताया और मुस्कुराते हुए कहा कि यह मेरे बच्चों की ट्रक है ।मैंने उनकी तस्वीरें ली और उनका धन्यवाद किया।

                मैं थोड़ा आगे बढ़ेगी,तो देखा कि राह में एक पेड़ के नीचे एक ख़ूबसूरत लड़की का वायलिन बजा रही है और साथ ही वायलिन की सुरीली तान के साथ पैरों के ताल के साथ जुगलबंदी करती जा रही है ।उसके जूतों की लयात्मक टैपिंग लोगों को बहुत आकर्षित कर रही थीं और, आते जाते लोग ज़मीन पर रखी उसकी उल्टी टोपी में अपनी इच्छानुसार डॉलर डाल रहे थे । लड़की तल्लीन थी अपनी धुन में , अपने काले लिबास में वो ख़ूबसूरत प्यारी सी लड़की बिना किसी प्रतिक्रिया के वायलिन बजाती जा रही थी, लोग खड़े थे और कुछ अपनी राह हो लिये ।

मैं भी थक चली थी , आज की यादों को सहेज कर मैं भी तेज़ी से घर की ओर बढ़ गई ।

   

भाग -4

आइस – हॉकी मुख्यत: कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका में खेला जाता है ये तो मालूम था किंतु यहाँ विक्टोरिया में आकर मुझे ज्ञात हुआ कि यह खेल यहाँ के नागरिकों को अत्यंत प्रिय हैं तो और प्राय: सभी माता- पिता अपने बच्चों को आइस – हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करते हैं और विधिवत ट्रेनिंग भी दिलवाते हैं।

                         इत्तफ़ाक से मुझे भी आइस हॉकी की ट्रेनिंग लेते हुए बच्चों और उनके माता पिता से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ , जब आकाश के मित्र तनजीत सिंह ने मुझे बताया कि उनका छ: वर्षीय पुत्र चन्दज्योत आइस-हॉकी का प्रशिक्षण ले रहा है तो मुझे बड़ा रोमांच हुआ , मैंने उसे खेलते हुए देखने की इच्छा ज़ाहिर की , उन्हें मेरी दिलचस्पी देख कर बड़ी ख़ुशी हुई , वे सहर्ष तैयार हो गए ।तनजीत पंजाब से हैं और यहाँ विक्टोरिया में कई सालों से रहते हैं,वे अपने बेटे का बड़ा ध्यान रखते हैं और उसे स्पोर्ट्स में आगे बढ़ाना चाहते हैं ,उनकी यह सोच मेरे दिल को छू गई वरना आज भी एक औसत भारतीय माँ-बाप अपने बच्चों से सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई में ही अव्वल रहने की उम्मीद करते हैं  और *खेलोगे कूदोगे तो होगे ख़राब* वाली मानसिकता में ही जीते हैं । यदि खुदा की नेमत से स्पोटर्स में अच्छा कर भी गए तब भी उम्मीद यही रहती है कि करियर के लिए पढ़ाई – लिखाई को ही चुना जाये ।

             खैर , 18 जून की शाम चार बजे मैं अपने पति के साथ पहुँची GEORGE R. PEARKES COMMUNITY RECREATION CENTRE जो TILLICUM में है ।हम समय से पहले ही पहुँच गए थे सो वही बैठ कर तनजीत और उनके बेटे का इंतज़ार करने लगे ।पिछले दो- तीन दिनों से यहाँ का तापमान 33 डिग्री सेल्सियस से ऊपर ही है जिसकी वजह से मौसम बेहद गर्म है और धूप की चुभन खलती है , किन्तु गोरे ( स्थानीय भाषा ) धूप के तीख़ेपन का ख़ूब लुत्फ़ उठा रहे हैं । धूप उनपर लालिमा बिखेर रही है और हम इसके तीख़ेपन से जी चुरा रहे हैं …. फ़ितरत अपनी – अपनी । फेयरनेस की क्रीम को बढ़ावा देने वाले देश दुनियाँ के लोग भला अपनी चमड़ी को धूप से क्यों न बचाएँ …..वरना , लालिमा का तो पता नहीं , हाँ कालिमा जरूर छा जायेगी ।

              बच्चो का आगमन शुरू हो गया है छोटे- छोटे बच्चे अपने साथ ख़ुद से दोगुना बड़ा किट- बैग घसीटते हुए,और कुछ पीठ पर लादे हुए आने लगे हैं । काफ़ी बच्चे आ चुके थे, हमारी नज़रें आगंतुकों पर ही टिकी थी, तभी तनजीत सामने से हाथ हिलाते हुए चन्दज्योत के साथ वहाँ आए और भीतर की ओर जाते हुए हमें भी अपने साथ चलने को कहा ।हम भी तेज़ी से उनकी ओर बढ़े और कॉरिडोर में पहुँच कर देखा कि वहाँ सभी बच्चे , किट- बैग से निकाल कर अपने- अपने सेफ़्टी गार्ड पहन रहे हैं , तनजीत भी लग गए अपने सुपुत्र की सेवा में और पहनाने लगे आर्म- गार्ड , नेक- गार्ड , नी- गार्ड , हेलमेट , लोहे के सोल वाले जूते वग़ैरह वग़ैरह ।साथ ही ,वे बीच बीच में अपने बेटे को एनर्जी ड्रिंक भी पिलाना नहीं भूलते।

                   सारे बच्चे तैयार होकर आइस रिंक की ओर बढ़ने लगे , कनाडा के भावी आइस- हॉकी खिलाड़ी ।क़रीब क़रीब 12-15 बच्चे थे।कोच ने सीटी बजाई और सभी बच्चे आईस – रिंक में थिरकने लगे। सभी बच्चों के हाथों में हॉकी स्टिक थी , सब के सब नन्हे फ़रिश्ते दिख रहे थे ।सभी बच्चों के माता पिता तथा परिजन रिंग के बाहर बैठने के स्थान पर बैठे हुए थे और पारदर्शी शीशे से अपने बच्चों का खेल देख रहे थे।  आइस पर उनके जूते कभी किसी मंझे हुए खिलाड़ी से थिरकते तो कभी नौसिखियों की तरह फिसल कर चारों खाने चित भी हो जाते , पर चिंता की कोई बात नहीं थी क्योंकि वे सब सेफ़्टी -गार्ड से लैस थे । यदि कोई नन्हा खिलाड़ी गिर जाता तो उसी क्षण वह उठ जाता और किसी कुशल योद्धा की तरह जुट जाता अपने खेल में ।सभी बच्चे ये प्रयास करते कि अपनी स्टिक से *पक *को लुढ़काते हुए , गोल पोस्ट की तरफ़ ले जाएं । कुछ इसमें सफल होते हैं और कुछ पीछे रह जाते , पर उनका प्रयास लगातार चलता रहता ।*पक* आइस हॉकी बॉल है,जो हार्ड प्लास्टिक का बना होता है और बर्फ़ पर बड़ी तेज़ी से फिसलता है।

                    कोच निरंतर सभी बच्चों पर अपनी नज़र बनाए रखते हैं और सबों को अपने निर्देशन में अभ्यास करवा रहे हैं।मुझे तनजीत ने बताया कि बच्चों को आइस – हॉकी की थ्योरी क्लास भी होती है । उसने यह भी बताया कि कनाडा सरकार बच्चों के स्पोर्ट्स को विशेष रूप से बढ़ावा देती है ताकि भविष्य में खेल के क्षेत्र में उनके खिलाड़ी मज़बूत दावेदार हों । यही कारण है कि यहाँ बच्चों के खेलों पर विशेष ध्यान दिया जाता है और हर प्रशिक्षु हो अनेक प्रकार की सुविधा प्रदान की जाती है। विद्यार्थियों को पढ़ाई में भी इन खेलों का भरपूर फ़ायदा मिलता है।इस रिक्रिएशन सेंटर में और भी कई खेलों के प्रशिक्षण का इंतज़ाम है जहाँ बच्चों को प्रशिक्षित किया जाता है।

                                आइस हॉकी के लिए गैस पाइप लाइन बिछी होती है जो रिंक के न्यूनतम तापमान को बनाए रखने में सहायक होती है। ठीक एक घंटे बाद बच्चों का प्रशिक्षण समाप्त हुआ और अब वे सभी बाहर आए । अब बारी थी और बच्चों के सारे सेफ़्टी गार्ड को उतारने की, जिसमें अच्छी ख़ासी मेहनत लग रही है,सभी माता पिता अपने अपने बच्चों में लगे हुए हैं । मुझे मालूम हुआ कि इनके सेफ़्टी डिवाइस का रखरखाव भी बहुत आवश्यक है,जैसे जूतों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि आइस पर चलने और दौड़ने के कारण इन जूतों के लोहे के सोल में जंग लगने का अंदेशा रहता है तो इसलिए इन्हें सावधानी से पोंछ कर रखना होता है ।

              तनजीत ने भीअपने बेटे का सारा सामान किट बैग में रख दिया है और उसे फिर से एनर्जी ड्रिंक पीने को  दिया है।आइस में खेलने के बावजूद सभी बच्चे पसीने से लथपथ है और उनका चेहरा सुर्ख़ लाल हो गया है, बड़े मासूम लग रहे हैं ये नौनिहाल , हम वापस जाने को मुड़ते हैं । हमें तनजीत की गाड़ी से ही जाना है किन्तु उससे पहले हम उनके परिवार के साथ तस्वीरें लेना न भूले।

             इस अद्भुत स्पोर्ट्स को देखकर मन तो बहुत ख़ुश था पर भीतर कहीं एक कसक भी थी कि हमारे बच्चों को भी खेलों से भी ऐसे ही जोड़ा जाता है जैसे हम हमेशा उनसे पढ़ाई में अव्वल आने की उम्मीद रखते हैं ,काश ! हमारी सोच में भी तब्दीली आती ।

              

कनाडा यात्रा भाग 5

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पिछले एक हफ़्ते से *व्हेल-वॉच* की कवायद चल रही है।किंतु कभी शौपिंग तो कभी किसी अन्य स्थान की यात्रा के कार्यक्रमों के कारण *व्हेल-वॉच* का कार्यक्रम सूची में सर्वोपरि होने के बावजूद नीचे धकेल दिया जा रहा था।पर, आज संयोग बनना था सो बन गया।हालाँकि, कुछ लोगों ने इसे ज़्यादा तवज्जो न देते हुए,नहींजाने कीसलाह दी थी।पर मेरा सागर – मोह मुझे इस ओर खींच ले गया।बेटे आकाश का भी कहना था कि हमें इस यात्रा का अनुभव ज़रूर लेना चाहिए।

         ख़ैर, हमारी सुबह की शुरुआत ग्रीन टी के गर्म प्याले के साथ हुई और हमने पूरे दिन की यात्रा का प्रोग्राम बनाया। फिर नाश्ते में बेटे की फ़रमाइश और उसके पसंदीदा आलू पराँठे और पचरंगे अचार के साथ कॉफ़ी पी और झट पट नहा धोकर तैयार हो गए।बेटे ने हमें बताया कि अपनी बिज़ी शेड्यूल की वजह से वह हमारी इस यात्रा में शामिल नहीं हो पाएगा पर, हमें डेस्टिनेशन तक पहुँचाने और टिकट बुक करने की ज़िम्मेदारी उसने ली थी । विक्टोरिया हारबर पर हमें ड्रॉप कर और व्हेल- वॉच की हमारी आइ डी हमें सौंप कर वो अपने काम पर चला गया।

           इस यात्रा पर जाने के लिए हमारे साथ लगभग 20 -25 यात्री थे , कुछ अलग-अलग देशों के और कुछ कनाडा के ही थे। व्हेल- वॉच करवाने वाली टीम ने सभी यात्रियों को इकट्ठा किया और सबसे पहले अपने क्रू मेंबर और कैप्टन से परिचय करवाया।फिर उनमें से एक लड़की ने यात्रा के सभी डेस्टिनेशन और उससे सम्बंधित सभी नियमों की जानकारी दी।सभी सदस्यों ने अपने अपनेगले में , व्हेल- वॉच के लिए दी गई *आईडी को पहन लिया।समय हो चला था , दोपहर के ठीक तीन बजे थे और हमारी यात्रा आरंभ होने वाली थी। हम सभी यात्री क्रू मेंबर के साथ स्टीमर बोट की ओर निकल पड़े ।सभी क़तार में खड़े हो गए और एक -एक कर बोट में प्रवेश करने लगे। प्रवेश द्वार पर खड़ी लड़की ने सबों का अभिवादन किया और सबको बोट के भीतर भेजने लगी और उसने सबों से आई डी -कार्ड भी वापस ले लिया ।सभी यात्रियों के यथास्थान बैठ जाने के बाद स्टीमर का इंजन स्टार्ट हुआ और हमारी नाव मंथर गति से आगे बढ़ने लगी। भीतर एक हॉलनुमा बड़ा सा कमरा था जहाँ सभी यात्रियों के बैठने की व्यवस्था थी।सबके स्थिर हो जाने के बाद क्रू मेंबर के एक सदस्य ने खड़े होकर सेफ़्टी के सारे नियमों से हमें अवगत कराया मसलन सेफ़्टी जैकेट कहाँ ,कब और कैसे इस्तेमाल करना है, सागर में किसी चीज़ को नहीं फेंकना है , समुद्री जीव को किसी तरह की हानि नहीं पहुँचानी है वग़ैरह- वग़ैरह । जल्द ही उसका लेक्चर ख़त्म हुआ और सभी यात्री स्वच्छंदता से बोट की खुली जगह पर यहाँ-वहाँ विचरने लगे और सागर की तस्वीरें लेने लगे ।

           विशाल सागर को देख कर मैं आसक्त थी , ऊपर नीला आकाश,और नीचे गहरा नीला पानी , सागर की बाँहों में निरंतर समाता हमारा बोट…..अहा ! क्या समां है…..दूर- दूर तक सिर्फ़ पानी ही पानी…… अथाह समंदर , प्रकृति की अक्षुण्ण संपदा अपने गर्भ में सहेजे , लहरों के साथ कैसा चपल हो रहा है।लहरें मदमस्त अपनी मौज में उठती गिरती हैं और उसकी इस मौज में मन भी शामिल होकर यायावर हो चला है। उधर समुद्री पंछी उड़-उड़ कर पूरी छटा के सौंदर्य को दोगुना कर रहे हैं।नीले आकाश में उड़ते सफ़ेद पंछी सागर के पानी को छूकर उड़ जाते हैं,जो शायद मछलियों को ग्रसने के तलाश में हैं ।

              हमारे स्टीमर के अलावा दो चार और भी राफ़्टिंग बोट सागर की लहरों से अठखेलियां कर रहे हैं ।इधर ,हमारे स्टीमर की गति निरंतर तेज़ होती जा रही है, मैं वहीं किनारे पर बैठकर , बोट की रेलिंग थामे , एकटक सागर को निहारती हूँ। व्हेल तो कहीं दीख नहीं रही , बस सहेज रही हूँ समंदर का नीलापन, उसका दार्शनिक भाव जो याद दिला रहा है अनुपम ईश्वरीय सत्ता…..जहाँ मैं भी मछली बन तैरने लगती हूँ बेलौस , पानी के बहाव के विपरीत….अपनी जन्म राशि के अनुरूप , पानी के प्यार में या फिर जन्म जन्मांतर के किसी रिश्ते में …… तू जो नहीं तो मेरा कोई नहीं है- की तर्ज़ पर।

                        मैं ,यूँही ख़्यालों में डुबकी लगा ही रही थी कि अनायास ही लहरों ने इतनी ज़ोर से पानी उछाला कि उसके छींटों से हम सब सराबोर हो गए ……मैंने मुस्कुरा कर स्वागत किया उन बूँदों का , अहा ! बिन माँगे मोती मिले……दो एक बूँद होठों पर भी पड़े जिसका स्वाद जिव्हा तक भी पहुँचा , नमकीन स्वाद ! बूँद-बूँद नमकीन…..!

           तभी मैंने देखा पतिदेव अपने कपड़ों पर पड़े छींटों को बड़े अनमने ढंग से झाड़ कर रहे हैं,उन्हें शायद सागर की ये शोख़ी बेहद नागवार गुज़री थी,उनके चेहरे पर शिकन देखकर मैं अपनी हँसी नहीं रोक सकी और बेसाख़्ता हंस पडी , इतना हँसी कि सागर में सलवटें पड़ गईं , आसमान खिल उठा और धूप छम्म्््् से बिखर गई ।पर पतिदेव अनमने से समंदर की ओर देखते ही रहे ।

          सागर से अपनी बेपनाह मुहब्बत में मैं सोच ही रही थी कि काश ! मैं गोताखोर होती तो कूद पड़ती इस नीले सागर की गहराई में , समा जाती और मछलियों के संग रेस लगाती और देख आती उनका घर- द्वार ।तभी बोट की गति बिलकुल धीमी कर दी जाती है , क्रू मेंबर बताती है कि सभी यात्री अपने कैमरे और दूरबीन को सजग रखें ताकि व्हेल के दिखने पर उसकी तस्वीर ली जा सके ।व्हेल तो अब तक नहीं दिखी , हाँ कुछ दूरी पर एक टापू जरूर दिखा जिस पर अनगिनत समुद्री जीव *सील * अठखेलियाँ कर रहे थे । उनकी तेजआवाज़ें हम तक साफ सुनाई दे रही थीं ।मैंने भी अपनी वीडियो में उन्हें क़ैद किया ।

                 लड़की लगातार *किलर व्हेल * के स्वभाव, रहन सहन  ,खान-पान और उनके प्रजनन संबंधी जानकारी दे रही थी।उस अंग्रेज़ अंग्रेज़ी समझने के लिए ज़रा ज़्यादा ध्यान देना पड़ता था जिससे मेरा ध्यान बँट रहा था और समंदर से तारतम्य बनाये रखने में ख़लल पड़ना मुझे अखर रहा था ,सो मैंने  अपनी नज़रों को सागर की ओर रखते हुए जो सुना , उसका सार ये था कि फ़ीमेल व्हेल , मेल के मुक़ाबले अधिक चतुर होती है और परिवार संबंधित हर निर्णय वह ख़ुद लेती है ,बच्चों को भी ट्रेनिंग देना उसी का काम होता है । व्हेल झुंड में ही चलना पसंद करते हैं वग़ैरह वग़ैरह।

               बोट बढ़ती जा रही है अचानक फिर सभी सजग हो जाते हैं ।सभी एक तरफ देख रहे हैं अचानक व्हेल की पूँछ दीख पड़ती है और अगले ही क्षण तीन – चार काली आकृतियाँ समंदर की सतह पर उभरती हैं और फिर अदृश्य हो जाती हैं , ऐसा कई बार होता है और व्हेल – वाचिंग का मिशन पूरा होता है । पर सच पूछिए तो व्हेल देखना तो एक बहाना था मुझे तो समंदर के साथ वक़्त बिताना था ।चार- पाँच घंटे आसमान और समंदर के बीच अपना यह मौन – संवाद मेरे जीवन की सबसे क़ीमती यादों  का अटूट हिस्सा बन चुका था । मुंबई में भी समंदर को बस किनारे से ही देख कर संतोष करना पड़ता है पर ये सुनहरे पल यादों की मज़बूत कड़ी हैं ।

         सोचती हूँ , क्षीर सागर भी शायद कुछ ऐसा ही होगा जहाँ भगवान विष्णु आँखें मूँद कर शेषनाग की शैय्या पर लेटे होंगे ।इसी संदर्भ में मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है कि – एक बार भगवान विष्णु को यूँ शेषनाग की शैय्या पर निद्रा मग्न देख कर माता लक्ष्मी ने पूछा – भगवान् आपको ऐसी शैय्या पर कैसे नींद आ जाती है ?

भगवान विष्णुदेव उत्तर दिया  – हे सुमुखी ! सुनो ,मैं सो नहीं रहा ,मैं नींद में भी नहीं ,मैं तो अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कर रहा हूँ , जो मेरा आत्मस्वरूप है ।

यह सुनकर सुमुखी आश्चर्य से बोली – हे देव ! क्या आपका और भी कोई रूप है?या आपसे भी कोई बड़ा है?

विष्णु भगवान बोले – सुमुखी ! यह तो मेरा मनुष्य रूप है ।मेरा वास्तविक रूप तो परमानंद है , अखंड है , अनंत है ; जो हर आत्मा में निवास करता है । ज्ञानेन्द्र , मुनीन्द्र मेरे इसी रूप का दर्शन करते हैं , कुरुक्षेत्र में भी अर्जुन को मैंने यही ज्ञान दिया था और उसे मैंने इसी रूप का दर्शन  कराया था ।

                   अर्थात परमानंद, परमसुख का जब भी अनुभव हो ,समझना चाहिए उस विराट के दर्शन हुए , आत्मसाक्षात्कार हुअा , प्रकृति को आत्मसात कर आत्मा तृप्त हुई …..नाव गंतव्य तक पहुँच कर वापसी की तैयारी में थी ।ऊपर आसमान को निहारती हूँ , शून्य में कुछ ना हो कर भी कितना कुछ समाया है । लोग लगातार तस्वीरें लेकर अब थक कर बैठ गए हैं ।सभी अपने साथ लाये पानी व कुछ हल्की – फुल्की खाने की चीज़ों का सेवन कर रहे हैं । तभी वो लड़की फिर से व्हेल के बारे में बताने लगती है  और साथ ही एक अल्बम भी दिखाती है जिसमें तरह- तरह की जातियों की व्हेलों का चित्रण है । बस अब हमलोग पहुँचने ही वाले हैं तट पर ।

           लीजिए , हम आ गए तट पर , हमारी यात्रा संपन्न हुई । क्रू मेंबरों ने सभी यात्रियों काधन्यवाद किया और हमने भी उनका आभार प्रकट किया , अपनी इस सुखद यात्रा के लिए और नाव से उतर कर मुड़ गए रेस्तराँ की ओर क्योंकि भूख तेज़ हो रही थी ।

    एक अनजाना मैक्सिकन डिश ट्राई किया और फिर बढ़ गए डाउन टाउन की ओर |

कनाडा – यात्रा संस्मरण ( भाग-6 )

आसमान में तैरते ये मेघ के टुकड़े पीछा करेंगे मेरा , जब तक मैं इनकी आँखों से ओझल न हो जाऊँ।ये पेड़ ये पौधे,प्यारी ठंडी हवा ढूंढेगी मुझे बहुत, पर क्या करूँ ? बस , अब अपनी यादों की झोली को समेटने का वक़्त हो चला है।अजनबी देश से नेह का रिश्ता क़ायम कर स्वदेश लौटने की कवायद शुरू हो चुकी है।

                   मुझे याद आ रही है जो कवि राजेश जोशी की ये पंक्तियां-

                                 नदियों से बात करना चाहता हूँ इस समय

                                 पर टेलीफ़ोन पर यह मुमकिन नहीं

                                 उन दरख्तों का भी मेरे पास

                                  कोई नंबर नहीं

                                  जो अक्सर रास्तों में मिल जाया करते हैं

                                  परिंदों के पास मोबाइल

                                  होगा इसकी उम्मीद नहीं।

आज 27 जून है और,सिर्फ़ एक दिन बच रहे हैं , यात्रा में । कनाडा से वापस जाने की तैयारी है। 28 जून यानी कल के फ़्लाइट से वापस भारत अपने देश अपने शहर मुंबई को लौट जाना है।

                       पर आज , अभी 24 घंटे बाक़ी है , तो जो पल हासिल हैं इन्हें तो जीना है ….आज को पहले जीना है, कल की फ़िक्र क्यों ? पर जाने क्यूँ कल का ख़याल आते ही मन ज़रा उदास हो जा रहा है कि आख़िर जो कुछ छूट रहा है , सिमट रहा है …. चुभ रहा है शूल सा !!!

               विक्टोरिया भ्रमण में हमने शहर का कोना- कोना छान मारा पर इसके खूबसूरत , मनभावन Buchart garden की सैर पूरा दिन हमने इस बाग में बिताया , यहाँ के रंग बिरंगे फूलों ने हमारा मन मोह लिया।

            मन तो सारे अपनों ने भी मोह लिया, दोस्तों के नेह ने जिस तरह बाँधा कि कई बार भ्रम होता कि हम मुम्बई में ही हैं , कहीं कोई अजनबीपन नहीं । कनाडा की ज़मीन पर पैर धरती पे यहाँ के मित्रों ने कॉल कर महसूस कराया कि हम सचमुच अपनों के बीच आए हैं।आकाश के मित्र तनजीत और हरप्रीत (Harry) ने जिस तरह का अपनापन दर्शाया कि हमें यक़ीन ही नहीं हुआ कि हम उनसे पहली बार मिल रहे हैं ।

       सिर्फ बातें ही हो पाई । खैर , कोई बात नहीं । फिर मिलेंगें , गर खुदा लाया ।

                   आप सबों के स्नेह को सहेजकर साथ लिए जा रही हूँ, ढेरों प्यारी यादों के साथ । शुक्रिया विक्टोरिया ! फ़िदा हूँ तुम्हारी अदाओं पर , हवाओं की शोख़ी पर , सागर की शांत लहरों पर …… पूरे शहर की रूमानियत पर । आसमान के गहरे नीले रंग में घुलते रूई से हल्के आवारा बादलों पर, काली सर्पीली सड़कों पर या कि इन कोमल फ़िज़ा में रंग भरते फूलों पर…… जाने किस – किस पर ……बिछ जाने को जी चाहता है , मोहब्बत में होश खोने सा ….आँखें मूँदें हर पल को मुट्ठियों में क़ैद करने के अहसास सा ……..पलों को रोक लेने को जी करता है । शहर है या आशिक ….. ! माशूक़ सा दिल में समाया जाता है ….. अजब ढंग हैं इस अजनबी शहर के , दामन में बसा जाता है ।

         लौटना सुखद है,पर जो छूट रहा है उसकी भी टीस उतनी ही तीव्र है ।हवाएँ कह रही हैं -आज जाने की ज़िद न करो……..जीवन के कोलाहलों के बीच ,ऐसी आवाज़ें, ऐसे नाद , ऐसी मनुहार आपके क़दम  पीछे तो खींचती हैं …. पर क़दमों का रूकना कहाँ संभव हो पाता है ….. सफ़र तो ज़ारी ही रहता है … सफ़र को ज़ारी रखना ही शाश्वत है , सच है ! विदा ! मेरे दोस्त शहर ….. वैसे , महबूब तो मुंबई है , पर तू उससे भी कहीं बढ़ कर है , आऊँगी फिर तुझसे मिलने  जरूर इसी वादे के साथ , विदा …..!

———— अमृता सिन्हा , मुंबई

     संपर्क –  अमृता सिन्हा, सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन. उदभावना ,चिंतन दिशा, साहित्य- समर्था,कादम्बिनी, स्त्री-काल, प्रभात-ख़बर ,हिन्दुस्तान आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित.साझा कविता संग्रह प्रकाशनार्थ

मोबाइल : 9334017284,  ई मेल- a.sinhamaxlife@gmail.com

पता : एफ-42, सेक्टर – 2, सृष्टि कॉम्पलेक्स, मीरा रोड, मुम्बई, पिन – 401107

           

       

                             

                  

                          

            

             

      

                      

                    

                            

                                     

                       

               

                                

       

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2 comments

  1. पढने आया तो देखा, इतना लम्बा संस्मरण ……….पर पढ़ते चला गया !
    बढ़िया हुआ, हमारे पास तो पासपोर्ट भी नहीं है ………….आपके इस संस्मरण के सहारे यात्रा हो गयी 🙂
    बधाई !

  2. अमृता सिन्हा

    आपका बहुत शुक्रिया मुकेश जी

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