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जनादेश 2019: एक बात जो बार-बार छूट रही है…

कल लोकसभा चुनावों के अभूतपूर्व परिणाम, जीत-हार का बहुत अच्छा विश्लेषण किया है युवा लेखक पंकज कौरव ने। हमेशा की तरह पंकज का एक गम्भीर, चिंतनपरक और बहसतलब लेख- मॉडरेटर

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जनादेश आखिर जनादेश होता है। हां कभी-कभी वह भावावेश में भी आता है लेकिन बावजूद इसके अगर दोहराया जाता है तो इसके मायने कुछ और गहराई में तलाशे जाने चाहिए। एक कारण है जिस पर 2014 के लोकसभा चुनावों के ठीक बाद पहुंचना शायद गलत निष्कर्ष हो सकता था पर अब 2019 की हार के दोहराव में छिपी बैठी  भारतीय जनमानस की वही मनोदशा फिर सतह पर तैर गई है। हालांकि रिजल्ट के बाद दिनभर सोशल मीडिया पर तांकते-झांकते हुए हर तरफ उस कारण की अनदेखी ही नज़र आई। हो सकता है यह आंकलन आपको व्यक्तिगत लगे जो कि है भी। कहना इसलिए ज़रूरी है कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक तो उस कारण की कभी खुलकर चर्चा नहीं ही करेंगे क्योंकि वह उनका ब्रह्मास्त्र है लेकिन मायूसी यह देखकर है कि जिन्हें एक सांप्रदायिक राजनैतिक दल के सत्ता में दोबारा काबिज हो जाने पर असंतोष है वे भी इस कारण की अनदेखी कर रहे हैं और सिर्फ जनता को कोस रहे हैं लेकिन क्या जनता वाकई इतनी नासमझ है जितनी उसे बुद्धिजीवी समझ रहे हैं?

दरअसल जनता को नासमझ समझने के आसपास ही उसकी असली मनोदशा समझने का टूल भी है। यह यूं ही नहीं हुआ होगा कि साम्राज्यवाद और राष्ट्रवाद के वीभत्स प्रदर्शन और प्रभाव के दौर में मोहनदास करमचंद गांधी ने अपना एक दर्शन तलाशा था जबकि उनके सामने रूसी-क्रांति की सफलता के सूत्र बिखरे पड़े थे. महात्मा गांधी इस भारत-भूमि पर पैदा हुए अंतिम मौलिक व्यक्तित्व रहे जिन्होंने शायद यह शिद्दत से महसूस किया कि बहुसंख्यक जनता का मानस कभी धर्म विमुख नहीं हो सकता। इसीलिए एक घनघोर सांप्रदायिक शक्ति के अलावा जनता में उनका स्वीकार्य भी इतना विराट रहा जिसकी कल्पना करना कठिन है। उनके बाद धर्मनिर्पेक्ष सिद्धांत धीरे-धीरे अपने अर्थ खोता चला गया। धर्मनिर्पेक्ष शब्द की अब प्रचलन में जो परिभाषा है वह कहती है – किसी धर्म को न मानने वाला ही धर्मनिर्पेक्ष हो सकता है।

धर्मनिरपेक्षता की ऐसी परिभाषाएं गढ़ने में जितना हाथ सांप्रदायिक शक्तियों का है उससे ज़्यादा खुद बुद्धिजीवियों का भी रहा है। सांप्रदायिक शक्तियों ने सुबह शाम शाखा लगाकर अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाई है तो हमने संयोगवश किसी पूजा अनुष्ठान में बैठे मैनेजर पांडेय की फोटो सोशल मीडिया में घुमाई है या कभी किसी कार्यक्रम में योगी आदित्यनाथ के साथ एक फ्रेम में दिखने पर कहानीकार उदयप्रकाश को नज़र से उतारने का उपक्रम किया है, ऐसे सभी लोगों को लानत-मलानत भेजी हैं। हम बुद्धिजीवियों ने धर्म के प्रति अपने वैचारिक दुराव को इस हद तक महिमामंडित किया है कि अब यही दुराव लोगों को जोड़ने की बजाय उनके खुद छिटक कर दूर हो जाने का सबब बन गया है। अपनी वैचारिक सोच में ठीक वैसी कट्टरता पैदा की है जैसी सांप्रदायिक कट्टरता अब हमें चुभ रही है।

विश्व की महानतम रचनाओं का अनुवाद किया और पढ़ा जा सकता है लेकिन जब हम उन्हें भारतीय जनमानस के सामने परोसते हैं तो उसका भारतीय-करण भी होता है। कहानी, उपन्यास या नाटक उन सभी का भारतीय अडॉप्टेशन क्यों जरूरी है? क्यों नहीं उन्हें जस का तस परोस दिया जाता? क्योंकि भारतीय मानस वैसा नहीं है जैसा अन्य देशों में लोगों का होगा। तो बस इतना समझ लेना जरूरी है कि इस देश के लोगों की वैचारिक प्रक्रिया भी अलग है। लेकिन न जाने क्यों इसी बात की बार बार अनदेखी की जाती रही है। धर्म के मामले में सुधारवादी प्रक्रिया पिछले कई दशकों में लुप्त हो गई है। बुद्धिजीवी अगर खुद को सुधारवादी कहते हैं तो यह उनकी भूल है क्योंकि वे तो धर्म को ख़ारिज करते आए हैं। उन्होंने धार्मिक न होने का लेबल गलत तरीके से लगा लिया है, वह इस तरह लगाया गया है कि अब धार्मिंक आस्था वाला व्यक्ति उस पर विश्वास नहीं करता। ऐसे में अगर इस अविश्वास का कोई और फायदा उठा रहा है तो यह उसकी चतुराई है और यह अविश्वास ढोने वालों की मूर्खता। शायद यही कारण रहा होगा कि राहुल गांधी को मंदिरों के प्रांगण में देखकर जनता में वही अविश्वास और गाढ़ा हुआ।

धर्म और धार्मिक आस्था को लेकर सुधारवादी कोशिशें लगातार होती रहतीं तो शायद कुछ हद तक वर्तमान स्थितियों से पार पाया जा सकता था लेकिन अनजाने या कि अति आत्मविश्वास में लगातार वही भूल होती आई है जिनसे निकले सूत्र लपककर सांप्रदायिक ताकतों ने समाज में अपना वर्चस्व बढ़ा लिया है। दरअसल इस मामले में जितना नुकसान होना था उससे कहीं ज़्यादा हो चुका है इसके बावजूद संभावनाएं अब भी बाकी हैं। बेशक हम-आप नास्तिक रहें लेकिन ये खबर रहे कि बहुसंख्यक हमेशा धार्मिक संवेदना से भरे हुए लोग ही रहेंगे। उनकी औसत बुद्धि का निरादर कोई बड़ा बौद्धिक पराक्रम का काम नहीं है। सनद रहे धर्म के नाम पर पाखंड पर चोट करते करते कहीं धर्म पर ही चोट न पड़ जाए। धार्मिक-सुधार भले न कर सकते हों, पर इतना तो हम आप कर ही सकते हैं, हो सकता है इससे ही अच्छे भविष्य की संभावनाएं बची रहें।

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