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योजना साह जैन की कविताएँ

योजना साह जैन पेशे से एक वैज्ञानिक और शोधकर्ता हैं | बचपन से लेखन में रूचि के चलते कविता, कहानी, यात्रा वृत्तांत, ब्लॉग्स लिखती रहती हैं जो कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।  www.kritiyojna.com वेबसाइट के माध्यम से नए लेखकों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म देने की शुरुआत भी की। अपने लेखन में नए नए प्रयोग करना इनका शौक भी है और विशेषता भी। योजना आजकल अपने परिवार के साथ जर्मनी में रहती हैं। इनके कविता संग्रह ‘काग़ज़ पे फुदकती गिलहरियाँ’ का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ से हुआ है। उसी संग्रह से कुछ कविताएँ-

मौन और अभिव्यक्ति
मैंने सदियों से,
“मौन” लिखा,
तो तुम
मुझ पर “चिल्लाते” रहे !
 
मैं,
चुपचाप नदी के किनारे
चबूतरा बन बैठ गयी,
तो तुमने
घाटों पे महफिलें जमा दीं !
बड़े सुन्दर,
सतरंगी पंख,
कजरारी आँखें हैं मेरी !
 
पर तुमने
बस मेरे वक्ष पे निगाहें जमायीं !
 
बहुत कुछ है मेरे अन्दर,
जो “मुझे”,
मेरे वजूद,
मेरे चरित्र को
बनाता है !
 
पर तुमने
उसे बस
मेरी योनि से जोड़ दिया !
मेरी चोटी में मैंने
दुनिया गूंथ ली थी,
तो तुम बोले कि
खुले बाल मुझे मुक्ति देंगे !
 
मेरी जीभ को तुमने,
अपने दाँतों में दबाए रखा
ताकि मेरी चीख भी
तुम्हारे अन्दर समा जाए !
फिर तुम कहते हो
कि “मैं” धरती हूँ,
इसलिए फसलें उगाती रहूँ !
फिर तुम कहते हो
कि “मैं” देवी हूँ !
इसलिए आशीर्वाद तुम्हारा हक़
और देना मेरा काम है !
फिर तुम कहते हो,
कि मैं चुप रहती हूँ तो
बहुत प्यारी और मासूम लगती हूँ !
 
इसलिए बंद होंठ,
चोटी में,
तुम्हारा संसार सम्भालूँ,
बन के ठूंठ,
किसी चबूतरे पे नदी किनारे !
पर जानते हो ?
मेरी आवाज़ भी बहुत प्यारी है,
और चीख सुरीली…
बस
बस
बस
बहुत हुआ अब छलावा !
मैंने सदियों से मौन लिखा,
तो तुम मुझ पे चिल्लाते रहे…
अब “मैं” तोड़ रही हूँ
ये “मौन”
और लिख रही हूँ
 
“अभिव्यक्ति” नयी कलम से …
लरजता है आँखों से
लरजता है आँखों से, होठों से गरजता नहीं,
ये बादल चुप है तो ये न समझना कि बरसता नहीं!
चूहों की फौज ने लोकतंत्र को जंगल में कैद किया,
बर्फीली वादी के गिद्धों ने मानवता को नोंच नोंच मार दिया,
आपसी सौहाद्र पर धर्मोन्माद ने कातिलाना वार किया,
और फिक्स्ड फिक्सिंग ने क्रिकेट उन्माद को तार तार किया !
पर नहीं, नहीं,
तुम चुप बैठो, अपनी कुर्सियां संभालो,
ये ज्यादा इम्पोर्टेन्ट है!
क्योंकि इस ग्लोबल युग में,
यूनिवर्सल होना ज्यादा शुभ है !
बैंक स्वदेशी हों या स्विस?
क्या फर्क पड़ता है ?
आखिर काजल की कोठरी में भी,
तो दिया ही जलता है !
इस दिए से आग भी लग जाए तो हम संभाल लेंगे
क्योंकि हम वो बादल हैं जो बरसने को तरसते हैं
पर सच तो ये है
कि आप गरजते हर मौसम में हैं,
पर कभी नहीं बरसते हैं !!
सच तो ये है कि
आश्वासनों की आग पे स्वार्थों की चढ़ी पतीली है,
कैसे कह दूँ मैं कि फागुन की धूप नशीली है !
मोम की हैं ये सारी अट्टालिकाएं सजीली,
गाँव की सडकें तो आज भी कागजी और,
रेत के समंदर की बस आँखें ही पनीली हैं !
इस आग में कई घरों की लकडियाँ लगी हैं
उनमें से कोई न कोई लकड़ी तो मेरी,
या तुम्हारी भी सगी !
 
आपकी बेशरम आँखों की लरज तो जाने कब बरसेगी,
सुभाष-गाँधी के लिए हमारी धरती,
जाने कब तक तरसेगी !
क्योंकि आप वो बदल हैं जो गरजते तो सदा हैं
पर कभी नहीं बरसते हैं !
और हम वो मुसाफिर हैं,
जो बादबानी को तरसते हैं !
 
पर याद रखना कि,
लरजता है आँखों से, होठों से गरजता नहीं,
ये बादल चुप है तो ये न समझना कि बरसता नहीं !
एक चित्र
एक चित्र बनाना चाहती हूँ !
नीले आसमाँ के,
बड़े से खाली,
कोरे कैनवस पर !
कल्पना के ब्रश से,
इस दुनिया के रंग,
और उस दूसरी दुनिया से,
उजली सच्ची सफेदी लेकर!
क्या बनाऊँगी?
पता नहीं !
शायद खुद को ?
या शायद तुम्हे ?
या शायद इक आइना ऐसा
जिसमें अक्स सच्चा दिखाई दे!
खुद को बनाना चाहा,
तो नहीं बना पायी !
चेहरा याद ही नहीं था !
कैसा अक्स है मेरा?
और रंग तो बहुत कम पड़ गए,
अधूरा रह जाता चित्र !
तो सोचा,
चलो तुम्हें बना लूं !
और तुमसे सजी
मेरी ये दुनिया !
तो टांगा,
चाँद को एक तरफ,
और सूरज को दूजी ओर,
तारे भी लटकाए कुछ इधर उधर !
हवा में घुमड़ते बादलों का शोर !
माचिस की डिबिया से दिखते हैं न,
ये हमारे ऊँचे ऊँचे घर आसमां से ?
ऐसे ही बना दिए,
चंद माचिस के डिब्बे !!
तुम्हें बनाया जितना जानती थी !
पर मैं तुम्हें पूरा जान ही कब पायी थी ?
और बनाये,
हमारे आस पास की दुनिया का,
वो सब जो हमारा साँझा था…
अभी भी पर अधूरा सा लगता है चित्र !
बहुत बड़ा आसमां हैं,
और बहुत बड़ा कैन्वस !
बहुत बड़े दिन हैं ये आजकल
और जानलेवा लम्बी रातें !
ख़ाली पड़ी है अभी जिंदगी की किताब,
कोरा पड़ा है अभी कैन्वस बहुत सारा
और ये बहुत बड़ा सा ख़ाली मैदान हमारे बीच !
बहुत कुछ है हममें जिससे हैं हम तुम अनजान,
आ जाओ तुम एक बार,
फिर मिल कर इस कैन्वस को रंगते हैं !
आओ ये चित्र पूरा करते हैं !!!
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