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खिड़की के पल्ले के बाहर झींगुरों की आवाज़ अभी भी आ रही है: रस्किन बॉन्ड

19 मई को महान लेखक रस्किन बॉन्ड 86 साल के हो जाएँगे। आज इंडियन एक्सप्रेस में उनसे बातचीत के आधार पर देवयानी ओनियल ने यह लेख लिखा है।  मेरी अंतरात्मा को जगाने वाले के मित्र के अनुरोध-आदेश पर इस लेख का अनुवाद करने बैठ गया। निराशा में आशा की उम्मीद जगाने वाले इस लेखन का आनंद उठाइए और ठहरकर कुछ सोचिए- प्रभात रंजन

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घर में रहने और सामाजिक दूरी के काल में खिड़की के महत्व को लेकर संसार की विकसित हुई इस नई समझ से बहुत पहले से रस्किन बॉन्ड अपनी खिड़की के माध्यम से इस संसार को देखते रहे हैं। एक तरफ़ पहाड़, नीचे घाटी और उसके आगे सड़क, लंडौर के इवी कॉटेज की खिड़की से बहुत कुछ दिखाई देता है, यह कॉटेज पहाड़ के एक सिरे पर है जो कभी भारत में अमेरिकी मिशनरी समुदाय का मुख्यालय होता था। ‘एक माकूल खिड़की की लम्बी और अनथक तलाश। ज़िंदगी को इस तरह से भी देखा जा सकता है’, रस्किन बॉन्ड ने अपनी किताब सिंपल लिविंग(स्पिकिंग टाइगर से प्रकाशित, 2015) में लिखा है: ‘सभी तरह की  खिड़कियों का बहुत महत्व होता है, केवल लेखकों के लिए ही नहीं। सुबह में सबसे पहले मेरे बिस्तर पर सूर्योदय की रोशनी आती है। उसी से जगता हूँ मैं’, उनका कहना है। अपने पिछले घर मेपलवुड लॉज में, जो जंगल के ऐन किनारे था, वह खिड़की के पास अपने एकांत में बैठकर लिखते थे। द नाइट ट्रेन ऐट देवली, टाइम स्टॉप्स ऐट शामली तथा आवर ट्रीज स्टील ग्रो इन देहरा जैसी किताबें इसी एकांत से उपजी थीं।

वैसे वहाँ उतना एकांत भी नहीं था। एक गोल-मटोल गिलहरी हाँफती हुई उनकी खिड़की के पल्ले के पास आती और उनके हाथ से चने का दाना लेकर खाती थी, रात में खिड़की के पल्ले के पास मद्धिम आवाज़ में झींगुरों की आवाज़ आती थी। ‘मैं 1963 में मसूरी आया, तब से लेकर अब तक यहाँ इतनी खामोशी कभी नहीं देखी। उस जमाने में यहाँ केवल दो टैक्सियाँ ही हुआ करती थीं। मेरे ख़याल से इस समय 600 के क़रीब टैक्सियाँ हैं। लेकिन सड़कें पूरी तरह ख़ाली हैं’, उस लेखक ने कहा, जिसका जन्म कसौली में हुआ, जो पले बढ़े जामनगर में, देहरादून, इंग्लैंड और दिल्ली होते हुए मसूरी में आकर बस गए।

अब अपने कमरे से उन्हें सड़क दिखाई देती है लेकिन रोज़मर्रा के जीवन की चहल पहल ग़ायब है। ऐसा लगता है कि चिड़ियों ने अपनी आमदरफ़्त बढ़ाकर इस कमी को दूर करने का फ़ैसला कर लिया है। ‘अहले सुबह मैं पहले से अधिक और बड़ी तादाद में चिड़ियों को देखता हूँ, इनमें से कुछ तो पहले आती भी नहीं थी। कल एक नारंगी रंग की छोटी सी चिड़िया आई थी। यह एक प्रकार की जंगली चिड़िया है, पहले यहाँ कभी नहीं आती थी। सामान्य रूप से तोते मैदानों में दिखाई पड़ते  हैं लेकिन चूँकि आजकल पर्यटक नहीं आ रहे तो वे पहाड़ों पर छुट्टियाँ मनाने आ रहे हैं’, बॉन्ड कहते हैं।

जिस हिल स्टेशन पर गर्मी के मौसम में घंटों ट्रैफ़िक जाम लगा रहता था, अब वहाँ केवल स्थानीय लोग ही रह गए हैं। ‘ज़ाहिर है, मसूरी को पर्यटकों की कमी खलेगी क्योंकि यह शहर पर्यटकों के सहारे चलता रहा है। व्यवसाय करने वाले सभी लोग परेशान हैं’, वे कहते हैं। दिन खामोशी से कट रहे हैं, और बॉन्ड के  कमरे के दरवाज़े पर आशीर्वाद माँगने आने वाले पर्यटक, किताब प्रेमी और यहाँ तक कि हनीमून मनाने वाले जोड़े अब नहीं आ रहे जिनके आने से जीवन भर अकेले रहने वाले लेखक को अक्सर हैरानी-परेशानी होती थी। जिस सहजता से देश के अलग अलग हिस्सों से आए अजनबी इस लेखक से बातचीत करते या बातचीत के बीच से चले जाते थे, वह कोविड-19 के भयभीत इस संसार में बदल रहा है? ‘कई तरह से यह कहा जा सकता है कि भारत एक अनौपचारिक देश है। कई देशों में, आपको ऐसा करने पर संदेह की नज़र से देखा जाएगा, जबकि यहाँ यह बहुत आम है कि अजनबियों से सफ़र के बारे में बात की जाए, शिकवे शिकायत किए जाएँ, और बातचीत में सब लोग शामिल हो जाएँ’, वह कहते हैं। वायरस के डर से लोग एक दूसरे से सावधानी बरत रहे हैं लेकिन बॉन्ड का कहना है, ‘लोग फिर वही सब करेंगे जो वे करते रहे थे। हम अपनी पुरानी आदतों की दिशा में लौट जाते हैं। भारत में परम्पराओं से बाहर निकल पाना मुश्किल होता है।‘

21 साल की उम्र से आजीविका के लिए लिखने वाला यह लेखक मंगलवार को 86 साल का होने वाला है। बॉन्ड अपने लेखन के माध्यम से हम लोगों को प्राकृतिक संसार, छोटे छोटे शहरों से लेकर गहरी निर्जनता में ले जाते रहे हैं। उनका ऐसा मानना है कि यह समय है प्रकृति के साथ अपने रिश्तों को समझने और उसको नया रूप देने का। ‘लोगों को ऐसा महसूस हो रहा है कि यह कुछ हद तक प्रकृति के साथ हमारी छेड़छाड़ का भी नतीजा है। मेरे ख़याल से टॉमस हार्डी ने यह कहा था कि ईश्वर ने एक सुंदर दुनिया का निर्माण करके हम लोगों को उसकी देखभाल के लिए सौंपा, लेकिन हम लोगों ने उसकी देखभाल अच्छी तरह नहीं की। उम्मीद करते हैं कि हम लोग इस सुंदर धरोहर की बेहतर देखभाल करेंगे’, वे कहते हैं।

शायद यह अपने आपसे जुड़ने का भी समय है। ‘शायद इस थोपे गए एकांत में लोगों को अपने आपको बेहतर तरीक़े से समझने का मौक़ा मिलेगा, हम अधिक चिंतनशील हो पाएँगे, क्योंकि हम पहले की तरह भागाभागी नहीं कर सकते, और हम लोगों को यह कोशिश करनी चाहिए कि जिंदगी को जितना आसान बनाया जा सके बनाया जाए और ख़ुश रहते हुए जटिलताओं से बचने की कोशिश करनी चाहिए। सीमित संसाधनों के साथ जीने की कोशिश करनी चाहिए और अति महत्वाकांक्षा नहीं पालनी चाहिए, यह मार्ग अगर खुशी का नहीं तो संतोष का मार्ग तो है ही। यह तो है ही कि कुछ समय तक जीवन मुश्किल हो सकता है’, बॉन्ड कहते हैं।

वह हमेशा घर में रहकर ही काम करते रहे हैं इसलिए उनकी दिनचर्या में अधिक बदलाव नहीं आया है, बल्कि वे और अधिक व्यस्त हो गए हैं। ऑल इंडिया रेडियो के लिए कहानियाँ लिख और पढ़ रहे हैं, अपने समृद्ध अनुभव के ख़ज़ाने से भूतों की कहानियाँ लिख रहे हैं, कई मज़ेदार संस्मरण और जिम कॉर्बेट के ख़ानसामे की लम्बी-लम्बी कहानियाँ। लेखक का यह वादा है कि उनकी नई किताब जल्दी ही पूरी होने वाली है। ‘लॉकडाउन के दौरान अभी तक मैंने 10 हज़ार शब्द लिख लिए हैं। यह कुछ दार्शनिक है, कुछ विचार कुछ अवलोकनपरक। फ़िलहाल उसका शीर्षक है, ‘कहाँ गए सब लोग?’ लेकिन यह कुछ निराशाजनक लग रहा है। शायद इसको बदल कर मैं नाम रखूँ ‘आगे का जीवन सुखी हो’, वह बताते हैं। यह आशावादी औषधि है, इस अनिश्चित समय में हम सब जिसका सेवन कर रहे हैं। उनकी आत्मकथा ‘लोन फ़ॉक्स डान्सिंग(2017) की अंतिम पंक्ति याद आती है, ‘मुझे भय है कि विज्ञान और राजनीति हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। शुक्र है खिड़की के पल्ले के बाहर झींगुरों की आवाज़ अभी भी आ रही है।‘

लेख और चित्र: साभार इंडियन एक्सप्रेस 

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