Home / Featured / त्रिलोकनाथ पांडेय के उपन्यास ‘चाणक्य के जासूस’ का एक अंश

त्रिलोकनाथ पांडेय के उपन्यास ‘चाणक्य के जासूस’ का एक अंश

लेखक त्रिलोकनाथ पांडेय का नया उपन्यास ‘चाणक्य के जासूस’ जासूसी की कला को लेकर लिखा गया एक रोचक उपन्यास है। कथा मगध साम्राज्य के के उस काल की है जब घननंद की शक्तिशाली सत्ता को चाणक्य और चंद्रगुप्त ने बिना किसी रक्तपात के पलट दिया था। आप एक अंश पढ़िए। उपन्यास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है-

==================

चाणक्य के गुप्तचर पूरे पाटलिपुत्र नगर में अफवाह चक्र चला रहे थे. वे चारो ओर फैले हुए थे – सड़कों पर, गलियों में और चौराहों पर. वे सर्वत्र सक्रिय थे – बाजारों, वेश्यालयों, मदिरालयों, जुआघरों, विद्वत्परिषद के सम्मेलनों और यहाँ तक कि राजकर्मचारियों की बैठकों और विचार-विमर्शों में भी. सब जगह एक ही चर्चा. सब जगह एक ही बात वे पूछते थे अपने बगल वाले व्यक्ति से – “सुना है कात्यायन द्वारा नंदवंश का छुपा कर रखा गया राजकोष चाणक्य ने खोज निकाला है. क्या यह सच है?”

एक गुरुकुल में एक बटुक ने अपनी कक्षा में आचार्य से यही प्रश्न पूछ लिया. पूरी कक्षा उस बटुक की बात को बेवकूफी-भरा मान कर हँस पड़ी. आचार्य को इस प्रश्न का उत्तर मालूम न था तो उन्होंने चुप्पी साध लिया. लेकिन, बाद में उन्होंने अपने अन्य सह-आचार्यों से यह प्रश्न पूछा. उत्तर किसी के पास नहीं. आचार्यों ने जिज्ञासावश अन्यों से यही पूछा. घर लौटने पर बटुकों ने अपने परिवार में यह प्रश्न पूछा. उत्तर कहीं न था.

कलावती महालय के रूपजीवा बाजार में एक ग्राहक ने एक गणिका से सम्भोग के चरम पर पहुँचते-पहुँचते अचानक यही बात उसके कान में फुसफुसा कर पूछी. गणिका ने इसे ग्राहक की उत्तेजनावस्था का प्रलाप समझ कर टाल दिया. किन्तु, उसके मन में भी जिज्ञासा जाग चुकी थी. ग्राहक से जान छूटते ही वह अपनी सखी गणिकाओं के पास दौड़ी गयी यह प्रश्न पूछने, पर उत्तर उनके पास भी न था. अपनी-अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए उन सबों ने अपने-अपने ग्राहकों की काम-पिपासा बुझाते समय यह बात पूछ ली. उत्तर उन्हें भी कहाँ पता था! बल्कि, उन्होंने वापस लौटने पर अपने परिचितों से यह बात जाननी चाही. सब एक-दूसरे से पूछ रहे थे. उत्तर किसी के पास न था.

एक मदिरालय में एक मद्यप ने दूसरे मद्यप से यही प्रश्न पूछा तो दूसरे वाले ने पहले वाले को मूर्ख कह कर उपहास करना चाहा. इससे दोनों में कलह शुरू हो गया – एक कात्यायन की ओर से तो दूसरा चाणक्य की ओर से. पूरा मदिरालय वहां इकठ्ठा हो गया और सारे मद्यप मिलकर छुपे राजकोष के बारे में जोर-जोर से बहस करने और झगड़ने लगे.

मधुयामिनी अतिथिगृह में चतुरंग खेल रहे चारों खिलाड़ियों में से एक अचानक पूछ पड़ा, “सुना है कात्यायन द्वारा नंदवंश का छुपा कर रखा गया राजकोष चाणक्य ने खोज निकाला है. क्या यह सच है?” चाल चलने की जिस खिलाड़ी की बारी थी वह मुंह उठाकर प्रश्न सुनने लगा. उसके रुक जाने से दो अन्य खिलाड़ी भी प्रश्न की ओर आकर्षित हुए. प्रश्न इतना रोचक था कि उसका उत्तर खोजने में चारों खिलाड़ी बहस करने लगे. बहस इतनी मजेदार लगी कि उन्होंने चित्रपट (बिसात) और गोटियाँ एक तरफ खिसका दिया और पूरी तरह बहस में लीन हो गये.

इस प्रकार, छुपे राजकोष के पाए जाने की चर्चा चारों तरफ होने लगी. बात कात्यायन तक भी पहुंची – पहले अफवाह के रूप में, बाद में उसके गुप्तचरों ने इस खबर का अनुमोदन भी किया.

***

छुपाये हुए राजकोष की सुरक्षा के बारे में कात्यायन अत्यंत चिंतित हो उठा. वह बहुत व्यथित था कि नंदवंश का विशाल कोश बड़ी आसानी से चाणक्य और चन्द्रगुप्त के हाथ लग गया. उसे गहरा सदमा लगा कि अपने स्वामी की इतनी मेहनत से एकत्र की गयी संपत्ति की वह रक्षा न कर सका.

“लेकिन, ऐसा कैसे हो सकता है!” कात्यायन बड़े आश्चर्य में था. “राजकोष के छिपाने का स्थान तो मात्र दो ही लागों को ज्ञात था – एक तो सम्राट धननन्द और दूसरा वह स्वयं. सम्राट धननन्द तो अब रहे नहीं और स्वयं उसने यह बात किसी को बतायी नहीं. यही नहीं, खजाने को छुपाने की असली जगह किसी को पता न लग जाय इसके लिए उसने बड़ी चतुराई से यह झूठी खबर चारों ओर फैलवा दी थी कि नंदवंश का सारा धन गंगा नदी की तलहटी में रातों-रात बनाये गए गुप्त कोष्ठ में सुरक्षित रख दिया गया है.”

खजाने के खोने का इतना गहरा सदमा कात्यायन को लगा कि उसकी रातों की नींद गायब हो गयी. वह बड़ा असहाय और अकेला महसूस कर रहा था. उसे शक हो रहा था कि खजाना खोज लिए जाने की झूठी खबर जान बूझ कर शत्रु द्वारा फैलाई जा रही थी. उसे डर था कि ऐसे में अगर वह अपनी चिंता किसी के साथ साझा करता है तब तो खजाने की पोल अपने-आप खुल जायेगी. यही उसकी बेचैनी का कारण था. यही सब बातें सोच-सोच कर उसकी नींद गायब थी और वह मलय के शिविर-स्थित अपने आवास में बेचैनी से चहलकदमी कर रहा था.

इस बीच, चाणक्य की ओर से दक्षलोचन और वंशलोचन को गोपनीय निर्देश मिला था कि कात्यायन के कार्यकलापों पर सतत दृष्टि रखी जाय. अगर वह अपना आवास छोड़ कर कहीं बाहर जाता है तो तुरंत गुप्त रूप से उसका पीछा किया जाये और दिन-प्रतिदिन का सारा विवरण चाणक्य के पास सावधानी से भेजा जाय.

लगभग आधी रात हो चली थी. चिंता में डूबा कात्यायन लगातार टहल रहा था. अचानक उसने अपने अश्वपालक को आवाज दी कि शीघ्र उसका अश्व तैयार किया जाय. यह बात चुपके से दक्षलोचन ने सुन ली, जो वहीँ अँधेरे में छुप कर कात्यायन के कार्यकलापों पर नजर रखे हुए था. दक्षलोचन ने तुरंत वंशलोचन को सजग किया कि कात्यायन कहीं बाहर निकलने वाला है.

***

 कात्यायन अपने घोड़े पर पाटलिपुत्र नगर की ओर सरपट भागा जा रहा था. चांदनी खिली हुई थी. रात कोई बाधा न प्रतीत हो रही थी क्योंकि लगता था उसका घोड़ा रात में चलने का अभ्यस्त था.

     वंशलोचन अपने घोड़े पर कात्यायन के पीछे-पीछे चुपके से चला जा रहा था. कात्यायन खोये हुए खजाने के खयालातों में इतना खोया हुआ था कि उसे सुध ही नहीं रही कि कोई उसका पीछा कर रहा है. उसने जासूसी नजर से बचने के उपायों को भी नजर अंदाज कर दिया. उसने यह भी परवाह नहीं किया कि गुप्त रूप से पीछा किये जाने की सम्भावना को जांचने के जो नियम बनाये गए हैं उसका तो पालन करे. बस वह अपनी ही धुन में भागा जा रहा था.

     थोड़ी देर तक पाटलिपुत्र की ओर घोड़ा दौड़ाने के बाद नगर के सिंहद्वार की ओर जाने वाले मार्ग को छोड़ कर कात्यायन अचानक बायीं ओर मुड़ गया. घने जंगल में एक पतली-सी पगडण्डी पकड़ कात्यायन वृक्षों से बचता और लताओं के झुरमुटों को हटाता बड़ी मुश्किल से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था. वंशलोचन के लिए जंगल से बड़ी सुविधा थी. पेड़ों और लताओं की आड़ में उसे पीछा करते देख लिए जाने का डर न था. वह बड़े आराम से छुपते-छुपाते पीछा करते आगे बढ़ रहा था.

     पाटलिपुत्र नगर की सुरक्षा के लिए चारों तरफ खोदी गयी खाई में पानी लबालब भरा था. उसके किनारे-किनारे घने जंगल में घुसता कात्यायन अपनी तलवार से लताओं और झुरमुटों को काटता-हटाता धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था. वह बहुत चौकन्ना होकर दाहिनी ओर बह रही नहर को देखता चल रहा था मानों वह किसी खास जगह को पहचानने की कोशिश कर रहा हो.

     वंशलोचन भी चुपचाप उसके पीछे लगा था. वह बड़ी सावधानी से आगे बढ़ रहा था ताकि कात्यायन को कहीं आभास न हो जाय कि उसका पीछा किया जा रहा है. दो-तीन बार खतरा आ उपस्थित हुआ था जब कात्यायन किसी खास जगह को पहचानने और खोजने के चक्कर में अचानक रुक पड़ा था और वंशलोचन रुकते-रुकते भी उसके एकदम निकट पहुँच गया था. लेकिन, कात्यायन अपनी धुन में इतना खोया हुआ था कि उसे किसी को अपने निकट होने का कोई आभास न हो पा रहा था.

     अन्ततः, कात्यायन को दाहिनी ओर एक ऐसा वृक्ष दिख गया जिसकी एक घुमावदार डाल कई घुमाव के बाद आखिर दक्षिण दिशा में घूम गयी थी. कात्यायन वहीं रुक गया; अपने घोड़े से उतरा और उसी वृक्ष के तने से अपने घोड़े को बाँध दिया. तत्पश्चात, वह उसी डाल की दिशा में लताओं और झुरमुटों को हटाता पैदल आगे बढ़ा और कुछ ही कदम की दूरी पर बह रही नहर पर बने एक पुराने जर्जर लकड़ी के पुल तक पहुँच गया. लगता था कात्यायन को पुल की पहले से जानकारी थी नहीं तो उस घने जंगल में पुल तक किसी अजनबी का पहुंचना असम्भव था. और, पुल का प्रवेश-स्थल भी घने झुरमुट की ओट में था. यद्यपि सामान्यतः देखने पर वह झुरमुट अपने आप उग आया लगता था, लेकिन कात्यायन जानता था कि पुल की पहचान छुपाने के लिए उस झुरमुट को खास तौर पर उगाया गया था.

     झुरमुट की टहनियों और लताओं को अपनी तलवार से काटता-छांटता रास्ता बनाता कात्यायन लकड़ी के पुल पर पहुँच गया और पुल पार कर लकड़ी की शहतीरों से बनी ऊंची चहारदीवारी तक पहुँच गया. चहारदीवारी के पुल के ठीक सामने पड़ने वाले हिस्से में छोटे-छोटे ताखे बनाये गए थे जिन पर अपने पैरों और हाथों को टिकाता कात्यायन फुर्ती से दीवार पर चढ़ गया.

***

     वंशलोचन ने अपना घोड़ा एक झाड़ी के पीछे छुपा दिया और कात्यायन का पीछा करते हुए पुल पर पहुँच गया. ताखों का उपयोग करते हुए वह भी दीवार पर चढ़ गया. लेकिन, उसने देखा चहारदीवारी से लगी हुई एक बहुत बड़ी झील थी और कात्यायन उस झील में एक छोटी सी नौका खेते हुए बड़ी तेजी से झील के उस पार जा रहा था. दीवार से झील तक लटकी हुई एक मजबूत रस्सी भी वहां वंशलोचन को दिखाई पड़ी और उसने अनुमान लगाया कि इसी रस्सी के सहारे कात्यायन झील में उतरा होगा और वहां पहले से रखी हुई नौका लेकर आगे बढ़ गया.

     रस्सी के सहारे झील में उतरना वंशलोचन को खतरे से खाली न लगा. वह समझ रहा था कि ऐसा दुस्साहस उसकी पोल खोल देगा. झील को तैर कर पार करने के अलावा और कोई उपाय न था. ऐसे में वह पीछा करता हुआ पकड़ा जायेगा, जिसमें जान जाने का भी खतरा है. यही सब सोच कर वह दीवार पर चिपक कर लेट गया और वहीं से कात्यायन की गतिविधियाँ देखने लगा.

***

     झील के उस पार पत्थर की सीढियां थीं जहाँ पहुँच कर कात्यायन ने अपनी नाव बाँध दी और सीढ़ियों से चढ़ कर ऊपर तक गया. सीढ़ियों के अंत में ऊपर एक छोटा सा दरवाजा था जो उस समय बंद था. यह दरवाजा राजभवन परिसर की चहारदीवारी में था.

     कात्यायन उस दरवाजे को न खोला, बल्कि वहीँ पहली सीढ़ी पर घुटनों के बल बैठ गया और अपने दोनों हाथों से कुछ टटोलने लगा. अलग-अलग कोणों से बैठकर वह टटोलने का कार्य कुछ देर तक करता रहा. आखिर में, संतुष्ट होकर वह अपनी नाव पर लौट आया. फिर नाव को खेते हुए वापस लौटने लगा.

     वंशलोचन समझ गया कि काम ख़त्म हो गया. वह शीघ्रता से दीवार से उतर कर एक झाड़ी में छुप गया और दम साधे कात्यायन को पुल पार करते और अपने घोड़े पर बैठ कर वापस जाते चुपचाप देखता रहा.

     कात्यायन के काफी दूर चले जाने के बाद ही वंशलोचन झाड़ी में से बाहर निकला. वह समझ गया कि कात्यायन अब अपने आवास वापस लौट रहा था. कात्यायन का पीछा करने की अब उसे जरूरत न थी. वह वहां से अपने घोड़े पर सीधे पाटलिपुत्र नगर में स्थित गुप्तचरों के सुरक्षित गृह पहुँच गया जहाँ उसने चाणक्य को सारा विवरण कह सुनाया. सुनकर चाणक्य के मुंह से एकबारगी निकल गया, “ओह, तो यह महोदधि में है.”

“महोदधि?” वंशलोचन ने आश्चर्य से पूछा.

“महोदधि उस झील का नाम है. तुम्हें आगे समझने की जरूरत नहीं है.” वंशलोचन समझ गया कि आगे की बात चाणक्य उसे नहीं बताना चाहता. उसकी इस आदत से उसके सभी गुप्तचर परिचित थे. अतः कोई भी चाणक्य की इच्छा के बिना कोई अतिरिक्त सूचना जानने की जिद न करता था. इसी बीच चाणक्य फिर बोल पड़ा, “अच्छा, अब तुम जाओ और कात्यायन के आवास पर अपने कार्य-स्थल पर शीघ्र पहुँच जाओ. कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी अनुपस्थिति के कारण कात्यायन को संदेह हो जाय.”

====================================

दुर्लभ किताबों के PDF के लिए जानकी पुल को telegram पर सब्सक्राइब करें

https://t.me/jankipul

  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

आयो गोरखाली और गोरखाओं का इतिहास

गोरखाओं के इतिहास पर एक किताब आई है ‘आयो गोरखाली – अ हिस्ट्री ऑफ द …

One comment

  1. I read the excerpt from the book written by Trilok nath Pande. Will read it again the onl l will write my opinion. Thanks

Leave a Reply

Your email address will not be published.