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साहिर की जन्मशती पर गुलज़ार का लेख

आज उर्दू के बड़े शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी की जन्मशती है। आज टाइम्स आफ इंडिया में गुलज़ार ने उनके बारे में लिखा है। मोहुआ दास के साथ बातचीत पर आधारित इस लेख का हिंदी अनुवाद साभार प्रस्तुत है। अनुवाद मेरा है- प्रभात रंजन

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किसी और कवि ने जुदाई को उस तरह से नहीं लिखा जिस तरह से साहिरसाब ने लिखा

साहिरसाब ने फ़िल्म और साहित्य दोनों में अपनी ज़ोरदार मौजूदगी दर्ज करवाई। उन दिनों जो लोग भी उर्दू कविता पढ़ते या सुनते थे या मुशायरों में  जाते थे वे इस बात को जानते थे कि साहिर लुधियानवी कौन थे। वह लम्बे, गोरे और सुदर्शन इंसान थे और उनके चेहरे पर चेचक के छोटे छोटे दाग थे, उनके बोलने का अपना एक खस अन्दाज़ था। हमेशा बहुत विनम्र रहते थे, कभी बढ़-चढ़ कर बात नहीं करते थे- जबकि कई बार कवि अपने पढ़ने-लिखने को लेकर बहुत बढ़-चढ़ कर बातें करते हैं- लेकिन वे बहुत सादा इंसान थे।

मुझे याद है कि उनको मंच से तब तक उतरने नहीं दिया जाता था जब तक कि वे अपनी प्रसिद्ध कविता ‘ताजमहल’ का पाठ नहीं कर लेते थे- मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे- यह कविता अवाम में बहुत मक़बूल थी। प्रगतिशील लेखक और कवि अक्सर इस बात को लेकर बहस किया करते थे कि ताजमहल को अमीरी गरीबी के नज़रिए से देखना ठीक नहीं था। लेकिन साहिरसाब पक्के कम्युनिस्ट कवि थे, और शैलेंद्र तथा अली सरदार ज़ाफ़री की तरह प्रगतिशील लेखक संघ(पीडबल्यूए) से जुड़े हुए भी थे।

इस आंदोलन से बाद में मैं भी जुड़ा। तब मैं फ़िल्मों में आया नहीं था। मैं एक मोटर गैराज में काम करता था और पीडबल्यूए की बैठकों में आता-जाता था। लेकिन मैं किस्मत वाला था कि मैं उस बंगले के आउटहाउस में रहता था जिसकी पहली मंज़िल पर साहिरसाब रहते थे। सात बंगला, अंधेरी के उस बंगले का नाम था कूवर लौज। बंगले के ग्राउंड फ़्लोर पर उर्दू लेखक कृश्न चंदर रहते थे, वे भी अपने समय के बहुत मशहूर हस्ती थे। और उस बंगले के आउटहाउस में रतन भट्टाचार्य और मेरे जैसे कुछ संघर्षरत लोग रहते थे। वह परिसर तो अभी भी है लेकिन अब वहाँ एक नई इमारत बन गई है।

जब साहिरसाब फ़िल्मों से जुड़े तो उर्दू लफ़्ज़ों के इस्तेमाल का उनका अपना ही ढंग था जो हम लोगों ने पहले नहीं सुना था। उदाहरण के लिए, जाल फ़िल्म का यह गीत ‘ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ। और थोड़ी देर में थक कर लौट जाएगी’ जैसी पंक्तियों में जिस तरह से भाव पिरोए जाते थे वह उस समय बहुत दुर्लभ बात थी। या गुमराह फ़िल्म का यह गाना, ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों’। किसी और शायर ने जुदाई को इस तरह से अभिव्यक्त नहीं किया जिस तरह से उन्होंने किया। आज भी आप उन गीतों को सुनते हैं तो आपके अंदर वह उसी तरह से ठहर जाता है जिस तरह से तब ठहर जाता था जब उस समय जब उनको लिखा गया था। उनके लिखे में उनके व्यक्तित्व की साफ़ झलक दिखाई पड़ती थी।

लेकिन इस सादा और विनम्र इंसान का अपना अहम और अहंकार भी था। वह फ़िल्म के संगीत निर्देशक जितनी फ़ीस माँगते थे। ऐसा नहीं था कि वे केवल बदे नामों के साथ काम करना चाहते थे। वे कहते, ‘आप अगर मेरी फ़ीस दे सकते हैं तो किसी छोटे संगीत निर्देशक के साथ भी काम कर सकता हूँ, कोई मुश्किल नहीं है।‘ इसी वजह से एन दत्ता और रवि उनके गीतों की धुन बनाते रहे। साहिरसाब को अपनी कविता को लेकर बहुत आत्मविश्वास रहता था।

वे ऐसे इंसान थे जिन्होंने लेखकों से हड़ताल करने के लिए कहा और कहा कि वे तब तक विविध भारती को गाने न दें जब तक कि उसके कार्यक्रमों में गीतकारों के नाम का भी उल्लेख न किया जाए। उसके पहले विविध भारती के कार्यक्रमों में गीत के साथ गायक-गायिकाओं तथा संगीतकारों के नाम ही लिए जाते थे। साहिरसाब ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और अंत में विविध भारती तैयार हो गई।

लिखने के अलावा, फ़िल्म इंडस्ट्री में लेखकों और शायरों के सम्मान को लेकर यह उनका बहुत बड़ा योगदान है। यह आज भी प्रासंगिक है और इसी तरह जावेदसाब कोपीराइट के लिए आज भी उसी तरह से संघर्ष करते दिखाई देते हैं जिस तरह साहिरसाब अपने जमाने में संघर्ष करते थे। जावेदसाब को साहिरसाब बहुत मोहब्बत करते थे क्योंकि वे उनके करीबी दोस्त जानिसार अख़्तर के बेटे थे और जावेदसाब एक तरह से उनके घर में बड़े हुए थे।

वे ऐसे पहले गीतकार थे जिनके पास अपनी कार थी। वे नवाब जैसे लगते थे। असल में, वे एक नवाब के बेटे थे। उनके घर में उनके अलावा उनकी माँ(सरदार बेगम) और रामप्रकाश अश्क़ रहते थे, जो उनके बहुत अज़ीज़ दोस्त थे और पाकिस्तान से ही उनके साथ आए थे। उनकी माँ एक सख़्त किस्म की महिला थीं। हमेशा सफ़ेद लखनवी चिकेन की सलवार क़मीज़ में रहती थीं। वह उनको बहुत प्यार करती थीं और उनको बच्चों की तरह डाँट लगाती थीं- बहुत डाँटती थीं, और पूरे बंगले में उनकी आवाज़ गूंजती रहती थी।

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