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प्रियंका ओम की कहानी ‘विष्णु ही शिव है’

युवा लेखिका प्रियंका ओम की कहानी ‘विष्णु ही शिव है’ कथा-मासिक ‘हंस’ में प्रकाशित हुई है। यह संभवतः उनकी पहली लम्बी कहानी है। ‘हंस’ से साभार हम प्रकाशित कर रहे हैं-
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उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या करें? अपना ध्यान कैसे बंटाए ? कहाँ बंटाए । आँगन में खेलते बच्चों पर ध्यान भटकाती किन्तु बेचैन मन तुरंत ही वहां से वापस देह के समक्ष नाग की तरह फन फैलाये  फुफकारते हुए खड़ा हो जाता, पुनः सब्जी के बागीचे में मिर्च की क्यारियों के बीच स्वतः उग आये पपीते के पौध पर ध्यान ले जाती । मिर्चियो के बीच पपीता कितना अकेला है जैसे बच्चे-बुजुर्गों से भरे परिवार में वह अकेली है ।
बस सब्जी का यह बागीचा ही उसका अपना है । वह अपना अधिकाँश समय सब्जियों के बीच व्यतीत करती है, फली हुई सब्जियों को वह ऐसे निहारती है जैसे कोई माँ अपने बच्चे को, वह उनसे मूक संवाद करते हुए उनके मन की बात समझ जाती है कब किसे पानी चाहिए और कब किसे खाद, किसे छाया किसे धूप । बागीचा भी उसके मन को खूब समझता है, जब वह स्नानादि के बाद पूजा पाठ से निवृत हो बागीचे में पहुचती है तब उसके चाव की सब्जी हुलस कर सामने आ जाती हैं ।
घर के पिछवाड़े आधा पौन कट्ठा भर जमीन का टुकड़ा यूँ ही बंजर पड़ा था । उसकी तरह अकारथ । बेमंसूबा, बेकाम, बेधेय्य । कोई खोदे, बोये तो जाने ! उसने वहां सब्जियों के बीज बो दिए, कुछ दिन में ही वे तमाम बीज धरती का सीना चीर पौधे बन निकल आये फिर देखते ही देखते फूलों और फलों से लद गए ।
उसने सब्जियों के साथ साथ एक क्यारी लौंगिया मिर्च भी उगाया है, मिर्च खाने का शौक उसे आजी से मिला है, आजी तो दूध रोटी के कटोरे में भी दो मिर्च तोड़ कर रख लेती थी । आजी को मीठा से बहुत परहेज़ था । उसे मीठा खाने से कोई गुरेज नहीं लेकिन उसकी थाली में भात तरकारी परोसने से पहले दो मिर्च उसी तरह विराजमान होता जैसे पूजा हवन में गणेश जी  । उसके जैसे ही मिर्च खाने का शौक समूचे घर में किसी संक्रमण की तरह फ़ैल रहा था । अम्मा ने बाबू जी की थाली में भी दो हरी मिर्च रख दिया, बाबुजी धीरे से फुसफुसाए “ऊ तीता खट्टा कम खाये तो बढ़िया रहेगा ‘।
ऊ अभागी स्वाद क्या जाने ?, बेस्वाद पीत पर का खाना के साथ दूगो मिर्चा केतना बिगाड़ेगा ?”
अम्मा की इस ममतामयी दलील पर बाबूजी चुपचाप कौड़ निगलते गये, बोले कुछ नहीं ।
अम्मा बाबूजी के वार्तालाप की यह स्मृति पुनः उसके मन को उसकी देह के गिर्द भूंसे की बोरी की तरह पटक गया । मन जितना ही दूर भागने की कोशिश करता, देह उतना ही खींचता लाता है । दरअसल उसका मन देह से दूर जाता ही नहीं है, दूर जाकर भी देह से ही लिपटा रहता है ।
वह बेचैनी में करवट बदलती है, कभी इस पहलु कभी उस पहलु । उसकी रातें अनगिनत करवटों की दास्तान बनती जा रही है । ऐसी दास्ताँ जो कहना और सुनना दोनों ही पाप । बार-बार पहलु बदलने से चद्दर पलंग के किनारे से खिंच उसके मन की तरह उसकी देह के चारो ओर सिमट आई है, तन से लिपटी पतली सूती धोती ऊपर पिंडलियों पर चढ़ आई, उजली अनछुई पिंडली अँधेरे में भी साफ़-साफ़ संगमरमर सी चमक रही है । उसका जी चाहा इन पिंडलियों पर कोई अपने होंठ रख दें । तपते गर्म होंठ । इस खयाल से वह सिहर उठी, देह में नामालूम सा कम्पन हुआ, झुरझुरी की एक लहर समूचे देह में दौड़ गई । उसकी बेचैनी लगातार बढ़ रही थी, कंठ सूख कुवां हो गया, उसे लग रहा था आज उसके प्राण निकल जायेंगे । वह झटके से पलट चित्त लेट गई और सीने से लिपटे आँचल को जोर से खींच कर दूसरी ओर फेंक दिया । उसे हज़ार चीटियों का टखनो से ऊपर चढ़ते हुए जांघों तक रेंगना महसूश हो रहा था, उसे लग रहा था बस अब कुछ ही देर में यह चीटियाँ उसकी देह में भीतर घुस जाएगी । उसका सीना धौंकनी की तरह धड़क रहा था, तीव्रता से ऊपर उठता और फिर धीमे से नीचे बैठ जाता । बेबसी से ब्लाउज का उपरी बटन टूट गया । हाथ देह पर रेंगने लगी और टाँगें स्वतः फ़ैल गई, चीटियाँ भीतर प्रवेश कर चुकी थी । मुह खुल गया जैसे भीतर कोई जल श्रोत फूट पड़ा जो अन्दर की आग का निर्वासन करता हो ।
कुछ छन की ज्ज़द्दोहद के उपरान्त वह निढाल से पड़ी थी, होंठ सूखे हुए और आँखों के कोर गीले । वह अपनी देह से हारी थी । हार के प्रतिफल से देह लिज़-लिज़ और मन स्वयं के लिए वितृष्णा से भरा हुआ ।
नियमतः आँख सूर्योदय से पहले खुल गई, उठते ही आदतन पलंग के नीचे रखी पानी से भरा ताम्बे का लोटा उठाने लगती है जो उसने सोने से पहले रात में रखे थे । फिर कुछ याद आते ही हाथ खींच लेती है । छिः छिः । दुष्कर्म वाले हाथ । वेग से संदूक पर रखी चाकू उठाती है, इस चाकू से वह अपने लिए दान्तुन बनाती है …उसे काटती है छीलती है.. वह अपनी हथेलियों की मैली चमड़ी भी छील कर निकाल देगी ..हथेली को खुरचने का प्रयास …गन्दी चमड़ी उतार देगी । फिर स्वयं हार कर असहाय सी चाकू दूर फेंक देती है । उसे स्वयं से घृणा होने लगी, वह हथेलियों को आँचल से रगड़ – रगड़ कर साफ़ करने की कोशिश करते हुए वह आत्ममंथन में उलझ जाती है, क्यूँ स्वयं को रोक पाना संभव नहीं हुआ क्यूँ देह के समक्ष उसकी तपस्या बौनी हो जाती है । भोर होने से पहले गंगा घाट पर स्नानादि से निवृत हो ठाकुर बाड़ी को बुहारना लीपना, फिर कुएं से पानी खींच ठाकुर जी को नहाना धोना । ताज़े फल काटकर प्रसाद बनाने के उपरान्त कनेर से ठाकुर जी का श्रंगार और अंत में चन्दन निर्मित अगर से अर्चना  ।
“पता नहीं किस जनम का पाप है जो यह जनम भोग रही, सेवा सुश्रुवा से प्रसन्न हो ठाकुर जी अगला जनम सुफल करें “ कहते हुए अम्मा की आत्मा फट जाती, करुण उदगार उलीच आता । यह सुन उसका ह्रदय विह्वल जाता, “हे ठाकुर जी अम्मा की निष्कपट वांछा पूरी करना” वह मन ही मन प्रार्थना में बुदबुदाती ।
उसके हाथ अब भी उतने ही गंदे थे, उसने हथेली को दिवार की खुरदरी जगह पर रगड़ा, कहीं कहीं से छिल कर खून के पतले रेशे निकल आये । उसकी आत्मा को किंचित सा आराम मिला । उसने पलंग के नीचे से लोटा खीच हाथ ऊपर उठाया और पानी गटागट पी गई । लोटा खाली हो चूका था । उसका मन भी पश्चाताप से खाली हो चूका था । उसने सन की तरह बंटी हुई साड़ी को खूंटी से उतार बायीं बांह के बीच दबाया और हाथ में खाली लोटा ले दायें हाथ से बबूल के दातुन को दाँतों पर रगडती गंगा की ओर चल दी । आज लोटा उजले रेत से मंजेगी । उसके हाथ की गंद निकल आएगी, लोटा पहले की तरह पवित्र हो जायेगा ।
गंगा घाट कोश भर की दूरी पर है, घर और घाट के बीच ठाकुर बाड़ी । वह भोरे-भोरे उठकर लोटा कपडा ले नंगे पाँव गंगा की राह लेती, यह नियमन वर्षों से चला आ रहा है । उसे ठीक से याद नहीं कितने वर्षों से । उसे यह भी याद नहीं वह कितने वर्ष की है किन्तु स्मृति का द्वार जहाँ से खुलता है वहां से उसकी जिंदगी नियमो की अधीन है । कुछ वे नियम जो समाज ने उसके लिए बनाये कुछ वे जिसे उसने स्वयं अपना लिया जिसमे ठाकुर जी की सेवा का विशिष्ट स्थान रहा ! ठाकुर बाड़ी न होता तो उसका जीवन अहैतुक होता । वह ठाकुर जी की सेवा बड़े मनोयोग से करती, अंतस में मौन मनोरथ पल बढ़ रहा है “अगला जीवन सुफल हो” संभवतः बीते जीवन में उसने ठाकुर जी की सेवा निष्ठा से न कि हो जिसका कुफल इस जनम भोगना पड़ रहा ।
उसे उसका क्षणिक भी उसका संमरण नहीं जिसे ठाकुर जी ने उसकी किस्मत में लिखा था, लिखकर फिर मिटा दिया । हाँ उसे इतना गुमान अवश्य है कि वह ठीक विष्णु जैसा रहा होगा । निश्छल, निष्कपट निष्कलंक ।
दादा को विष्णु चौक स्थित चाय की थड़ी पर दिखा था, फटे पुराने कपड़ो में सूखी काया, निस्तेज धंसी आँखे और सूखे होंठ । कौन है, कहाँ से आया है कोई नहीं जानता । वहां किसी को नहीं मालूम उसका नाम क्या है वह कहाँ से आया है, उसे स्वयं भी कुछ याद नहीं वह कौन है उसका नाम क्या है । कुछ पूछने पर विष्णु -विष्णु कहता तो सब उसे विष्णुआ पुकारने लगे । दिन भर चाय की थड़ी पर बैठा जूठे ग्लास खंगालता और बदले में बची हुई चाय सुरकता । एक एक घूँट कर दिन में न जाने कितने कप चाय हलक में उतर जाती । अधिक भूख लगने पर पंसारी के यहाँ झाड़ू बुहारू कर बिस्कुट का भागी होता ।
दादा से उसकी यह दुर्दशा देखी नहीं गई, वह उसे घर ले आये और वह पुरे घर का विष्णुआ हो गया । विष्नुआ पानी ला, विष्णुआ दूगो मिर्चा तोड़ ला, विष्णुआ तनी माथा दाब दे, तो तनी पैर मल कर दें ।
“अम्मा कहती भगवान् का नाम है रे, काहे एकार पारते हो, गोर मलवावे से पाप चढ़ेगा ।
“नामे बदल दो, न रहेगा नाम न चढ़ेगा पाप “ छोटका को हंसी ठट्ठा सूझता ।
नाम काहे बदल दें, एकरे बहाना भगवान् का नाम तो जपता है सब ।
वह ऐसा कोई पाप नहीं करना चाहती जिसका फल उसे अगले जनम में भोगना पड़े । वह अगले जनम भी अपने भाग्य में लिखित विष्णु से वंचित नहीं रहना चाहती, अम्मा के जैसे ही विष्णुआ उसके लिए भी विष्णु है किन्तु अभागन देह से हारी है
गंगा जी में डुबकी लगा कर देर तक भीतर बैठी रही, हे गंगा मैय्या या तो लील ले या दावानल को शीतल कर दे । एक के बाद एक अनगिनत डुबकियाँ । गंगा सारे पाप धो देती है, गंगाजल से मांज-मांज आज उसकी देह पवित्र हो गई ।
धवल धोती लपेटते हुए उसका चित्त प्रसन्न  था , मन में लेशमात्र भी निर्वेद नहीं । देह पाप मुक्त था । जहन से ग्लानी का निर्वासन हो चूका था । अब वह मुक्त थी । ग्लानी मुक्त ।
गंगा घाट से ठाकुर बारी पहुचते-पहुचते पांच माला जय शिव- जय शिव का जाप कर लेती, जो राह में कोई परनाम पाती करे तब प्रतिउत्तर में भी वह जय शिव जय शिव कहती । भगवान् विष्णु भी शिव जी को दिशा निर्देशक मानते हैं, फिर आजी कहती थी शिव जी बेहद दयालू है, वह सबकी सुनते हैं, अगर किसी प्रयोजन वह अपनी अपनी आँखे मूंदे रहते है तब माँ गौरा उन्हें संज्ञान में लाती है । यहाँ तक की गौरा के हठ से हार शिवरात्रि व्रत करने वाले निः संतान साहूकार को भी पुत्र रत्न प्राप्ति का वरदान दिया था । आजी उसे शिव रात्रि से जुड़े अनेक किस्से सुनाती थी, वह भी शिव रात्रि व्रत करना चाहती है किन्तु उसका शिवाला जाना निषेध है, एक विधवा स्त्री और लिंग पूजा ? जघन्य अपराध से रत्ती  कम नहीं । कलयुग में भी संभाव्य नहीं, वह मन मसोस रह जाती है ।
शिवरात्रि के दिन बेलपत्र, भंग, धतुरा और सफ़ेद अपराजिता से भरे बांस पात्र और कच्चा दूध ले शिवाला जाती गावं भर की कुवारियों को देख उसका मन कितना तो हुलसता । स्त्रियों का ऐसा त्यौहार जिसमे कुवारियां और सुहागिने दोनों ही सामान रूप से सहभागी होती । आस पास के पचास गावों में भी शिवरात्रि का ऐसा उत्सव नहीं था, दूर दूर के गावों से सगे सम्बन्धी और समीप के गावों से आगुन्तको की ऐसी भीड़ लगती कि स्वयं के परिजनों को खोजना मुश्किल । एक दिन का मेला वर्ष भर संस्मरण में रहता ।
शिवाला की रंगाई पोताई महीने भर पहले से शुरू हो जाती, पखवारा पहले से घर-घर से नवोढ़ा की राता साड़ी इकठ्ठा कर शिवाला को किसी दुल्हिन की तरह सजाया जाता । शिव रात्रि के दिन रात भर भजन कीर्तन चलता, बुजुर्ग सुहागिने शाम से शिवाला पहुच नई दुल्हिन के लिए जगह छेक रखती । अम्मा भी अपनी पोतोहू के लिए ऐसा करती है । शिव गौरा विवाह देखने मंदिर प्रांगन में समूचा गावं उपस्थित होता । घर में रह जाती विधवाएं । अकेली, ढिबरी के प्रकाश में अपने भाग्य के अन्धकार को कोसती ।
उस दयालू कृपालु तक उसकी पुकार भला पहुचे कैसे ?  
मन के भीतर संशय की ऐसी उथल पुथल, प्रेम पाश में बंधी तरुनी के ह्रदय गति सी, रात्रि के तीसरे पहर देखे गए स्वप्न सी विकल वह ठाकुर बाड़ी पहुच गई है। उसके कदम द्वार पर हठात ठिठक गए, वह किस मूह बैकुंठ ताकेगी किस हाथ श्रृंगार साधेगी । कदम दो डेग पीछे हट गये । मन दुश्चिंताओ से घिर गया, जैसे उमस भरी दोपहर की किसी संध्या शुभ्र नभ धूम- मेघ से भर आता है ।
“इश्वर निष्कवच ह्रदय की पुकार सुनते है, देह तो माटी है, माटी निर्मित माटी में मिल जायेगा” अम्मा रामायण जी पढ़कर रखते हुए दोहराती । शुद्ध आत्मा से कलुषित देह भी पुकारे तो अरज पहुच जाता है ।
दिनचर्या से निवृत नित भांति उतरी धोती आँगन में झूलते तार पर फैला चहुँ ओर नज़र घुमाई, ओसारा पर बने मिटटी के चूल्हे पर चाय उबल रही थी, आदि की तीक्ष्ण गंध से घर आँगन महक रहा था रोज की तरह उसका जी भी ललचा गया । इ चाय की बीमारी भौजी अपने नैहर से लेकर आई है, कहती है सुबह सकाल उठकर जब तक चाय न सुरक ले तब तक तबियत से नींद नहीं खुलती और एक गिलास चाय गृहस्थ स्त्रियों को दोपहर  तक थामे रखने के लिए पर्याप्त होता है । लेकिन इ विष्णु तो जैसे चाय का नशेडी है जिसकी लत वह लेकर आया था । दिन से कम से कम चाय बार चाय सुरकता है तब उसकी आत्मा तृप्त होती है ।
वह भी चाय की आदी हो गई है, अपनी पृथक रसोई में चाय चढ़ा बागीचे का रुख किया, मन रुचने वाली सब्जी तोड़ धोया और चाय पीते हुए काटकर छौंक लगा दिया।
उसके कमरे से सटा एक छोटा कमरा उसकी रसोई है, कुछ गिने चुने बर्तन और एक गैस चूल्हा । गैस चूल्हा आने से पहले ओसारे में उसका अपना अलग चूल्हा था, जिसे उसने स्वयं अपने हाथो से बनाया था । गैस चूल्हा दादा ने लाकर दिया था उसकी सुविधा के लिए, प्याज लहसुन के गंध से परहेज़ की खातिर उसने अपना रसोई कमरे में कर लिया । उसका खाना सादा बनता है, सिर्फ हल्दी नमक के साथ, कभी-कभी अम्मा का नेह उलीच आता है “तनी स्वाद चखा दो” तो कभी कभी भावजो का प्रेम उमड़ आता, “आपके हाथ में बड़ा स्वाद है” उसपर विष्णु चिहुंक कर कहता “ प्रसाद जैसन सवाद” ।
तुम कब चखा रे झुट्ठा ? अम्मा दुलार से झिरक दिया ।
“कराही में तनी लगल था तो चाट लिए” फिर खुद ही लजा आँखे झुका लेता ।
उसने देखा विष्णु अब बड़ा होकर हट्टा कट्ठा मरद हो गया है, उसकी देह से मर्दानी महक आती है । उसके उपरी होंठो के कोमल रोयें जी जगह काले घनेरे बालों ने ले ली है, काँखो में  भी घनेरे रोयें उग आयें होंगे जो अभी दादा की पुरानी बुशर्ट में छुपे हैं किन्तु बालपन आज भी मुख से ऐसे चूता है जैसे टूटा छप्पड़ सावन में । सिर्फ उसकी कद काठी खिली है, माथा आज भी बालको जैसा ही है । दरअसल मुर्ख, चपाट । बकलोल । गावं जावर के लोग अर्ध बिक्षिप्त कहते हैं, मने आधा पागल और इसलिए बाबू जी निश्चिंत हो उसे घर के भीतर ले आये और वह गृहणियो के सहायक के साथ साथ मन बहलावन का भी साधन हो गया । भौजी उसे छेड़ने का कोई मौका नहीं गंवाती ।
समय को जैसे किसी ने कटैया बेंत मार दिया हो, कुत्ता जैसन सरपट भागता जा रहा है । जब विष्णु आया था तब वह बालक ही था, लगभग उसकी उम्र का, एक आध साल बड़ा-छोटा । विष्णु की मशे फूट पड़ी थी और उसकी माहवारी शुरू हो गयी थी ।
शुरुआत में विष्णु माथा औ गोर दाबने के आलावा वह घर भर को चाय पानी पहुचाता, बाद में चाय बनाने का काम भी उसी को सौंप दिया गया । जब वह गंगा घाट जाती है तब विष्णु उसके कमरे और रसोई की साफ़ सफाई कर देता है, उसकी उपस्तिथि में विष्णु का उसके कमरे में प्रवेश वर्जित है ।
घर की नीव की उपेक्षा नियम अधिक सख्त हैं, यह नियम पूर्वजो के बनाये हुए है, पीढियां उन नियमों को पालन करती है किन्तु देह इन नियमो को नहीं मानता, कितने तो जतन करती है, ठाकुर पूजना, शिव जाप करना रामायण जी पढना किन्तु बाह्य आडम्बरों से छनिक सा विराम मिलता है एकांत में जोगी सा झोला फैलाये आ खड़ा होता है । कभी कभी मन होता है ठाकुर बारी के कुएं में धौंस दे दे, और अनन्त जल कुंड में विलीन हो जाए, शायद जल कुंड उसकी देह की अग्नि को शांत कर सके ।
छोटका शहर में पढ़ लिख गया तो उसने घर के नियम तोड़ने की कोशिश की, उसके पुनर्विवाह की बात की थी तब आजी ने कितना तो प्रपंच किया था ।
“ गावं भर में दस से कम न है एकरा जैसन, कौनो का भाई दोसर वियाह का नहीं कहा, वुजुर्ग का अवहेलना करन से सत्यानाश होगा, सत्यानाश”।
बाबु जी ने भी लताड़ दिया था “ पढ़े से लोग पगला जातें हैं का ?”
अम्मा का मौन न समर्थन था न विरोध, वह चुपचाप अनन्त में देख रही थी । शायद नियमो में बंधकर काठ हो गई थी लेकिन मझली और छोटका के वखत अम्मा ने खूब उपद्रव किया था । बाबू जी को लगभग चेतावनी देते हुए कहा था  “ अब ई घर मा नुनुआन में कोई के बियाह न होई” फलस्वरूप मझली की शादी महीना होने के साल भर बाद और छोटका का बियाह शहर की पढाई के बाद हुआ ।
अम्मा अक्सर उसको करुण भाव से निहारती, मानो कहती हो “ हमको माफ़ कर दो बिटिया, हम तुमरे खातिर कछु न कर सके “ ।
जब तक आजी जीवित रही उसे अपने साथ गंगा घाट ले जाती, साथ ठाकुर पूजती, साथ खाना पकाती-खाती और साथ सोती । आजी उसका हाथ पकड़ सोती, कहती “आजी पोती का किस्मत एक्के जैसन”, वह आजी की इस बात से सहमत नहीं थी, “ब्रह्मा हमरा जैसन किस्मत कौनो दुश्मन को भी न लिखे । आजी को तो तमाम सांसारिक सुख भोगने के बाद बुढ़ापे में वैधव्य का दुःख मिला । आजी उसके जैसन बाल विधवा नहीं । उसका तो गौना भी नहीं हुआ था, एक दिन जब वह आँगन में कित- कित खेल रही थी तब ससुराल से नौंन दुःख का पहाड़ लाकर उसके उसके जीवन में धर गया । उसका विष्णु टाइफाइड की महामरी में ….. इसके आगे की सोच रास्ता भूल गई । 
वह उसकी सूरत मूरत भी भूल गई है, कमरे के संदूक में अवशेष रखे हैं, लाल राता साड़ी, सितारा जड़ी ओढनी, छोटी छोटी बिछिया और एक जोड़ी पायल जिसे पहनने की जिद्द उसने बालपन में कई बार की । एक बार अम्मा ने उसके गाल पर थप्पड़ ही रशीद दिया और कमरे में बंद कर दिया तब से वही कमरा उसका घर दरवाजा उसका संसार बन गया ! वह अपने संसार में सिमट कर रह गई । धीरे-धीरे वह बाहरी संसार से कटती गई और मिर्ची के बीच पपीते के पेड़ सी अकेली होती गई ।
गोतिया समाज उसकी छाया से भी दूर भागता, घर की सुहागने नहा धो बिना सिन्दूर उसका मूह नहीं देखती, एक बार तो अम्मा ने भी कह दिया था “ सिन्दूर लगावे से पहले तू सामने न आया कर” ।
घर में शादी, गौना ,गोदभराई, छट्ठी मुंडन होता रहा लेकिन वह बंद कमरे से सिर्फ शोर सुनती रही, जो कभी वह किसी शुभ कार्यो में सामने पड़ जाती तो आजी अम्मा को खूब कोसती, “करमजली को सांकल  काहे नहीं चढ़ा रखती, अभगली का नज़र पड़ेगा तो शुभ्हो अशुभ हो जायेगा ‘।
भंगेड़ी मौसम की पदचाप सुनाई देने लगी थी, हवा में महुआ महकने लगा था, जाड़ा धीरे धीरे रजाई से निकल मोटे ओढना में सिमट गया था । शिव रात्रि का दिन समीप है । मझली बाल गोपाल समेत ससुराल से आ गई है, एक दो दिन में पीछे से पाहून भी आ जायेंगे और होली के बाद ही जायेंगे । इस साल शिवाला सजने छोटका की कनिया का राता जायेगा ।
घर में सारा दिन हंसी मजाक चलता रहता है, कभी मझली और पाहून को लेकर तो कभी छोटका और कनिया को लेकर । भौजी को इस सबमे खूब मन लगता, विष्णुआ मौगा औरतन के बीच में घुसा खिखियाता रहता है ।
मौगियों के बीच रखकर विष्णुआ स्वाभाव से मौगा हो गया है, किन्तु कद काठी बेहद कटीली है । उस दिन जब वह बगीचे में नेनूआं तोड़ रही थी तब वह अचानक ही दूर से आता ददृष्टिपात हुआ था, नग्न देह पर कमर से हरे छींट की लुंगी बंधी और कंधे पर गमछा । वह एकटक उसे तब तक देखती रही जब तक आँखों से ओझल न हुआ । उसकी रग – रग से मर्दानगी टपकती है। बड़की भौजी जब तब उखड़ी ओसारे से अंगना और अंगना से ओसारा कराती रहती है । भौजी उसको कभियो चैन से बैठने नहीं देती, कभी इ काम त कभी ऊ काम कुछ नहीं त तरकारिये काट दे । उसका जी बहुत जलता है । मन ही मन वह भौजी को हज़ार उलाहने देती है, तनिक बैठे दो, सुस्ताने दो, बतियाये दो लेकिन नहीं बैल जैसन हांकते रहती है बीच बीच में उसे चिरकाती भी है “कौनो पसंद है तो बोलो ?”
इस बाबत वह क्रोध से भर जाता, हाथ में पकड़ी उखड़ी फेंक देता ।
फिर भौजी कितना तो मनुहार करती तब मानता  ।
“ई बुरबक को कौनो पार्वती का योनी मिले तो तब मगज ठंडा हो” मझली ने उसकी मासूमियत पर कटाक्ष किया जो उस बकलोल के पल्ले नहीं पड़ा ।
आज नहाय खाय है, कल शिवरात्रि की तैय्यारी घमा घम चल रही है, उसके गंगा घाट से लौट आने से पहले कुल घर झाड़ू बुहारू के बाद गोबर से लिपा गया है, चूल्हा चौकी सब चमक रहा है । आज सबका खाना साथ बनेगा बिना प्याज रशुन वाला । उसके आते ही विष्णु ने चाय का गिलास पंहुचा दिया ।
मझली और नईकी हंसी मजाक में लिप्त है, भौजी बीच बीच में आकर छौंका लगा जाती है “ए बबनी नहा लीजिये तब न पाहून भोग लगायेंगे “ ।
वह दूर घर के भीतरी चौखट पर -बैठी अपने भाग्य को कोस रही है। मझली ने पिछला जनम शिव रात्रि खूब मन से किया होगा, शिव लिंग को हाथों से मल मल कर पहले गंगा जल से नहाया होगा फिर दूध, दही और मध से नहा भांग औ धथुरा से सजाया होगा । तब ही ऐसा उज्जल भाग्य है, मांग में दमकता लाल सिन्दूर गोदी में खेलता बालक ।
उसे अपनी ही बहन के भाग्य से इर्ष्या होने लगी, उसका जी चाहा वह उसकी गोदी से उसका बेटा छीन ले उसने वहीँ बैठे बैठे आवाज़ लगाई “ ऐ विष्णु, तनी बबुबा को हमरे गोदी लाना”
“ दिदिया ऐजे आ जो “ मझली ने लाड से पुकारा ।
“ नैय -नैय, ओजा हमरा लेखा बात नैय, हम दुरे ठीक छी” कहते हुए बबुआ को गोदी में लेवे खातिर उसने पालथी मार लिया । बबुआ को गोदी में धरते हुए विष्णु का अंगुली उसकी जांघो को छू गया । उसे जैसे झटका सा लगा, पूरा देह झनझना गया, उसने विष्णुआ को देखा उसके चेहरे पर ठीक वैसी ही मासूमियत चू रही थी जैसी बालपन में और आँखों में नबी का नक्श ।
वह छिनालों की नज़र पहचानती है, भौजी का भाई जब भी आता है उसे लिजलिजा लगता, चापाकल के पास गंदे पानी में टर्र टर्र करते बेंग जैसा । उसे देखते ही पान चबाये पीले दांतों के बीच उसकी लाल जीभ ठीक वैसे ही लपलपाती जैसे कोई फतिंगा देख गिरगिट का । वह उसके के समक्ष पड़ने से परहेज़ करती है ।
भाइयों की कलाई और पिता के पैर स्पर्श के अतिरिक्त उसने किसी अन्य पुरुष का स्पर्श नहीं जाना, पंडित जी प्रसाद देते हुए हाथ ऊँचा रखते । किन्तु आज विष्णु के स्पर्श से बिचित्र सा कंपन अनुभव किया, देह में तरंगे दौड़ने लगी, तलवे में गुदगुदी होने लगी अभी वह इन अबुझो को समझने का प्रयत्न कर ही रही थी कि बबुआ ने गोदी में पेशाव कर उसके चित्त की दशा बदल दी “ ऐ विष्णु ले जा एकरा, गोदी में मूत दिया छौरा  “
“ई छौरा जेकरे गोदी में मूतता है उसका मनोकामना सिद्ध होता है दिदिया “ कहते हुए मझली ने बबुआ को उसकी गोदी से उठा लिया ।
शिवरात्रि के दिन निर्जला उपवास रखने वाली सुहागिने दोपहर तक अलसाई सी थी किन्तु शाम होते ही सक्रीय हो सभी सुहागिने नहा धो श्रृंगार कर तैयार हो गई है, फूल बेलपत्र औ धतुरा से सजा डलिया ले शिवाला जाने को तत्पर ।
वह अपनी अँधेरी कोठरी के निरीह एकांत में खिड़की से सटे पलंग पर सोई सोई आसमान में टंके चाँद को निहार रही थी, आज चाँद का मूह टेढ़ा है, चाँद भी कैसा हरजाई है रोज रूप बदलता है, भाग्वान्तियों को महबूब लगता और मुझ जैसी करमजली को पीतल की थाली किन्तु यह क्या आज चाँद में विष्णु की छवि दिखी । उसने झट से आँखे मूँद ली, उसे तब भी विष्णु की छवि दिखाई दी, विष्णु उसके भीतर बस गया है वह देर तक आँखे मूंदे पड़ी रही, मन के भीतर बसे विष्णु को निहारती रही । उसका भोला मन उसकी कटीली देह, उसके चित्त में बस गया है । उसकी काट के संस्मरण से उसकी देह के तमाम रोम सावधान की अवस्था में खड़े हो गए ठीक उसी वक़्त दूर दूर शिवाला में घंटी की त्वरित और स्वरित ध्वनि उसकी तन्द्रा भंग करती है ।
ओह, पूजा बिधि शुरू गई, व्रती स्त्रियाँ शिव लिंग पर दूध दही मधु मल रही होंगी जो गौरा के योनी मार्ग से निष्काषित हो रहा होगा ।
आजी कहती थी औरत की देह तभी शुद्ध होती है जब उसके भीतर पौरुष का निर्वासन होता है, शिवाला में शिव लिंग और गौरा योनी की प्रस्तर मूर्त है जिसकी पूजा विधवाएं नही कर सकती है । शिव गौरा के संगम की कल्पना उसकी कामनाओं को पृथक संसार रच रहा था । अनदेखा । अनछुआ । अबूझा।
किन्तु अब वह बूझना चाहती है । अपने भीतर तरंगे महसूश करना चाहती है । वह स्त्री होना चाहती है अपने भीतर पुरुष देह को महसूस करना चाहती है । अपनी अनछुई देह का वितान नहीं होना चाहती है । क्युकी उसे विष्णु में अपना शिव मिल गया है। 
और वह उसकी कोठरी की ओर चल दी।
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