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‘जूठन’ की काव्यात्मक समीक्षा

यतीश कुमार ने पुस्तकों पर काव्यात्मक टिप्पणी कर अपनी विशेष पहचान बनाई है। आज पढ़िए उनकी अपनी शैली में ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ पर टिप्पणी-
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डॉक्टर तुलसी राम की लिखी ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ पढ़ने के बाद एक आलेख लिखा था। कई मित्रों ने यह सुझाया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’ दोनों भाग पढिये तो आप बहुत नजदीक से दलित साहित्य या उनसे जुड़े पहलुओं को समझ पायेंगे। मेरा बचपन जहाँ गुजरा है वहाँ कई बातों को बहुत नजदीक से देखा है और मेरे कई संस्मरणों में उन बातों का जिक्र भी है। इसलिए भी और उत्सुकता बढ़ी !
 
बीसवीं सदी के अंत में हिन्दी पट्टी में दलित लेखकों ने अपनी आत्मकथाओं को लिखना शुरू कर दिया था। इस सूची में सबसे पहले भगवानदास की आत्मकथा- ‘मैं भंगी हूँ’ का नाम आता है और इसके बाद मराठी में दया पवार की आत्मकथा ‘बलुत’ (अछूत)। दलित आत्मकथाकारों में ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ काफी प्रसिद्ध है। सच में जब मैंने आत्म कथा पढ़ी तो वाल्मीकि जी ने कई जगह रुला दिया। इस आत्मकथा के माध्यम से उत्तर भारत के वाल्मीकि समाज की सामाजिक स्थिति तथा उनकी दारुण व्यथा-कथा सबके सामने आ चुकी है। यहाँ एक और बात कहनी है कि मुझे पहले ‘जूठन’ और फिर ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ पढ़नी चाहिए थी यह क्रम ज्यादा बेहतर है। कई रहस्यों को डॉक्टर तुलसी राम ने बहुत सुंदर तरीके से उकेरा है ।
 
दोनों आत्मकथा में एक और समानता है कि दोनों कम्युनिस्ट पार्टी के करीब गए पर पार्टी के जातीयता का दृष्टिकोण दोनों लेखकों को एक सा लगा और दोनों इस पार्टी से अलग हो गए।
हालाँकि वाल्मीकि जी ने कभी पार्टी की सदस्यता नहीं ली थी जबकि डॉक्टर तुलसी राम होलटाइमर भी रहें।
 
यह एक पठनीय आत्मकथा है जिसे पढ़ते वक्त कई जगह रोंगटे खड़े हो जाएंगे। जातिवाद का असली असर दिखेगा और समाज का नंगापन भी। कुछ पंक्तियाँ जो पढ़ते वक्त मन में उथल पुथल कर बाहर आ रहीं थीं उन्हें यहाँ काव्यबद्ध किया है । ये मेरी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है जो इस आत्मकथा की देन है- यतीश कुमार
 
1.
 
इन्सान एक जरूरत की वस्तु
इस्तेमाल एक शातिर पेशा
बेगार को समझना आसान कहाँ
और सबकी निगाहें जुबान से तेज नस्तर
 
सवर्ण और अवर्ण के बीच
कोई पुल नहीं होता
भूतकाल से चली आ रही
थप्पड़ और गालियों की लड़ी होती है
 
“अरे चुहड़े” फब्तियाँ से बुझे तीर होते हैं
और तीर चलाने वाले
आडम्बरी धागाओं में खुद
मंत्रमुग्ध-मंत्रसिक्त
 
जब खाने को कुछ नहीं होता
तो जूठन ही समिधा और स्वाद बन जाता है
स्मृति में अनगिन काँटे उग आए हैं
अनुभव नागफनी का विस्तीर्ण जंगल
 
स्वप्न में भी जी मितलाता है
सब अपनी खोल में उलझे पड़े हैं
उतरन और जूठन हमारा यथार्थ है
और घूरती नज़रें पीठ पर चुभते ख़ंजर
 
2.
 
जैसे -जैसे समय ने खाल उतारे
वैसे-वैसे भीतर रक्त जमता गया
त्रासदी का आलम ऐसा
कि संवेदना को लकवा मार जाए
 
प्रहार ऐसा कि पेड़ से पक्षी उड़ जाए
बदन की चोट का असर
स्मृति में तरोताजा सर्प हैं
जो काँच पर खिंची लकीर की तरह यथावत है
 
लोकतंत्र की लौ
दिल्ली, कलकत्ते में ही जल रही है
गाँव के उस कोने में
लोकतंत्र ने अपना नाम हताशा रख लिया है
 
3.
 
गाय हमारी माता है बाद में पढ़ा
हमारे लिए तो सुअर ही माँ-बाप रहा
 
माँ को दुर्गा और चण्डी
दोनों बनते देखा
माँद में सेंध लगते ही
वो बर्दाश्त से शक्ति में बदल जाती
 
आस्था और तर्क की आपस में कभी नहीं बनी
हम हिन्दू होकर भी
पूजा नहीं कर सकते
बस दूसरों के लिए बलि चढ़ा सकते हैं
 
बच्चे तो मासूम होते हैं,चाहे सुअर के ही हों
बलि की व्यवस्था
सभ्यता को एक ठेंगा है
और सभ्यता सदियों से विरासत की लड़ाई में लगी है
 
कहते हैं कि बच्चों की आँखों में ईश्वर दिखते हैं
उन आँखों को बुझा कर ईश्वर को अर्पण करना
ईश्वर के अपने आधार से खुद की लड़ाई है
और यह लड़ाई है कि ख़त्म ही नहीं हो रही
 
4.
 
उसने पूछा! गुमसुम क्यों रहते हो?
उत्तर था! सुनना अच्छा लगता है
वह हँस पड़ी
मुझे लगा मंदिर की घंटियाँ बज उठी हैं
 
बढ़कर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया
झरने की कल-कल सुनाई पड़ने लगी
अवर्ण हूँ बताते ही प्रेम का झरना स्थिर हो गया यकायक
मंदिरों कि घंटियों से संगीत अवरूद्ध हो गया
 
उपनाम एक फाँस की तरह है
न निगला जाता है न उगला
ताउम्र बस टीसता रहता है
सालता रहता है
 
जाति एक फंदा है
मरने तक कसा रहता है
न मरने देता है
न जीने देता है
 
जाति के नाम पर
पीठ पर खरोंचे खिंच गई
युगों की छद्म कोशिशों को
नाकाम ही होना था
 
समय ने अनगिन करवटें ली
पर खरोंचे अब भी ज़िंदा हैं
सदा के लिए अजर-अमर हों जैसे
 
 
5.
 
नैराश्य की अंधी गुफा में
शब्द जूगनू बन रौशन रहा
जबकि मुझे चाँद की तलाश थी
और सूरज से करनी थी दोस्ती
 
किताबें चुप्पी पिघलाती रही हैं
शिक्षा जातिवाद से पनपे
गूँगेपन को शब्द देते हैं
और शब्द दबे आक्रोश को अभिव्यक्ति
 
कविता कि उजास ने
सरनेम की कालिख पर सफ़ेदी लीप दी
और अब मुझे ऋषि वाल्मीकि
और वाल्मीकि सरनेम के बीच फर्क को मिटाना है …
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12 comments

  1. सबर्ण और अबर्न, का सम्बंध सदियों से विकृत रहा है। समिकछा से अंदाजा हो रहा है, लेखन कैसा होगा। किताब पढ़ने की इच्छा हो रही। 💐

  2. Jayshree Purwar

    बहुत ख़ूब यतीश जी ! आप दिल से पढ़ते हैं और मन से लिखते हैं तभी लिखन में गहराई होती है कि छोटी छोटी बातें भी आपसे नहीं छूट पाती । बहुत सुंदर !! शुभकामनाएँ !!

  3. अविनाश श्रीवास्तव

    हमेशा की तरह दिल से लिखी हुई समीक्षा जो आत्मा तक पहुँचती है। प्रकाशक को बधाई, लेखक को बधाई, समीक्षक को बधाई और पाठक को भी बधाई कि वो एक समय में दोहरी यात्राओं का सुख पाते हैं। एक लेखक और दूसरी समीक्षक की यात्रा। यतीश का शुक्रिया की न सिर्फ वो इतनी सुन्दर समीक्षाएं लिख रहें है बल्कि हम हर पल एक नयी किताब के बारे में सीख रहें है। अमेरिका के पुस्तकालय बहुत समृद्ध हैं पर हिन्दी की किताबें उतनी नहीं हैं इसलिए मैं ‘मुर्दहिया’, ‘मणिकर्णिका’ और ‘जूठन’ जैसी किताबों से वंचित रहा। मैं उनकी समीक्षा से ही इन किताबों के बारे में जान पा रहा हूँ तो आत्मिक आभार, यतीश!

    विनम्रता के साथ एक और बात कहना चाहता हूँ। साहित्य कभी “दलित” नहीं होता, लेखक कभी “दलित” नहीं होता। कला और साहित्य पर अधिपत्य रखने वाला सिर्फ साहित्यकार और कलाकार होता, और कुछ नहीं। वो हर जाति, हर धर्म और हर लिंग से परे होता है और उसे होना चाहिए। इसलिए मेरा मानना है की अगर हमें ऋषि वाल्मीकि और वाल्मीकि सरनेम के बीच के फर्क को मिटाना है तो हमें “दलित साहित्य” और “दलित लेखक” जैसे शब्दों का प्रयोग बन्द करना चाहिए।

    यतीश, फिर से बधाई और शुभकामनाएँ की ये समीक्षाएँ समृद्ध और परिपक्व होती रहें!

  4. डॉ विनोद प्रकाश गुप्ता शलभ

    बहुत सशक्त और मार्मिक विवरण – ये व्यथा समय के साथ और भी वीभत्स हो रही है , समाज के लिए ला इलाज नासूर
    यतीश बहुत यकताँ संवेदनशील लेखक हैं , विडम्बनाओं को गहरे से महसूस करतें हैं और अभिव्यक्ति के ख़ंजर से अंध आस्थाओं को तार-तार करने की अथाह क्षमता रखत् हैं । उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएँ 🥰🌹🌹🌹👏

  5. Sandaar

  6. स्वप्न में भी जी मितलाता है
    सब अपनी खोल में उलझे पड़े हैं
    उतरन और जूठन हमारा यथार्थ है
    और घूरती नज़रें पीठ पर चुभते ख़ंजर

    लोकतंत्र की लौ
    दिल्ली, कलकत्ते में ही जल रही है
    गाँव के उस कोने में
    लोकतंत्र ने अपना नाम हताशा रख लिया है

    कहते हैं कि बच्चों की आँखों में ईश्वर दिखते हैं
    उन आँखों को बुझा कर ईश्वर को अर्पण करना
    ईश्वर के अपने आधार से खुद की लड़ाई है
    और यह लड़ाई है कि ख़त्म ही नहीं हो रही

    जाति एक फंदा है
    मरने तक कसा रहता है
    न मरने देता है
    न जीने देता है

     किताबें चुप्पी पिघलाती रही हैं
    शिक्षा जातिवाद से पनपे
    गूँगेपन को शब्द देते हैं
    और शब्द दबे आक्रोश को अभिव्यक्ति

    बहुत ही धारदार और सटीक शब्द और दर्द शब्दो में .. पढ़ते हुए वह दर्द महसूस होता है ..सलाम यतीश भाई

  7. Sundar

  8. ये वर्णन एकदम नग्न सच है जैसे किसी ने सडांध मारती किसी चीज से चादर उघाड दी हो,
    कमाल की बात ये कि कविता जैसी कोमल अभिव्यक्ति में भी आप कठोर यथार्थ कह पाये ,
    जाति व्यवस्था कलंक ही है समाज के लिए..!!

  9. अनिल अनल हातु

    यतीश भाई रचनाओं को पढ़ते ही नहीं हैं, बल्कि उनके साथ जीने लगते हैं ।रचना के कथानक और पात्रों में इस कदर रम जाते हैं कि उनका आत्म विस्मृत हो जाता है और वे कथा-पात्रों की मन:स्थितियों और संवेदना से तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। कहना न होगा कि “जूठन” की इस काव्यात्मक समीक्षा में भी वे ओमप्रकाश वाल्मीकि के व्यक्तित्व से एकाकार होकर उनकी पीड़ा, यंत्रणा और सन्त्रास को समानांतर रूप में भोगते हैं, महसूसते हैं। कथा-पात्रों के साथ यह तदात्मीकरण उनकी चेतना के स्तर पर तो होता ही है साथ ही यह उनके अवचेतन (subconscious) और अचेतन (unconscious) तक भी विस्तार पाता है ।अवचेतन पर पड़े संवेदना के इन तीव्र आघातों के आलोड़न से ही उनकी काव्यात्मक समीक्षा की सरिता निःसृत होती है। प्रस्तुत समीक्षा भी इतनी मार्मिक और संवेदनशील है जो भोगे गए यथार्थ के समानांतर भोगे और महसूसे बगैर संभव नहीं ।
    “जब खाने को कुछ नहीं होता,
    तो जूठन ही समिधा और स्वाद बन जाता है। ” इन पंक्तियों में अनुस्यूत गहरी पीड़ा और संत्रास वही महसूस कर सकता है जिसने भूख देखी हो, भूखे रहने की विवशता से गुजरा हो। यह वह अनुभव संसार है, जिसमें नागफनी के विस्तीर्ण जंगल हैं और स्मृतियों में सिर्फ कांटे ही कांटे हैं। जहाँ स्वप्न में भी (जूठन खाने से) जी मिचलाता है। जहां उतरन और जूठन ही जीवन का यथार्थ है और घृणा से घूरती नजरें ज्यों पीठ पर चुभते खंजर । यतीश जी बहुत सही कहते हैं की “आस्था और तर्क की आपस में कभी नहीं बनी “। यह एक कैसी विवशता है उस दलित समाज की जो हिंदू होकर भी पूजा नहीं कर सकता लेकिन दूसरे सवर्णों की पूजा की सफलता के लिए जानवरों की बलि चढ़ा सकता है। यह कैसी विडंबना और पाखंड है। रचनाकार धर्म के इस घोर पाखंड पर व्यंग्य करता कहता है कि “गाय हमारी माता है बाद में पढ़ा, हमारे लिए तो सूअर ही मां-बाप रहा।” दरअसल जाति एक फंदा है जो मरने तक कसा रहता है ।न मरने देता है, न जीने देता है । यद्यपि यह समीक्षा जीवन के भीतरी अंधेरों ,कोने-अंतरों की बीहड़ यात्रा कराती तो है लेकिन यह यात्रा अंधेरों में ही समाप्त नहीं होती बल्कि नैराश्य की इन अंधी गुफाओं में शब्द ही थे जो जुगनू की तरह रोशनी करते रहे और किताबें थीं, जो चुप्पी को पिघलाती रहीं और शिक्षा से मिले संस्कार थे जो जातिवाद से पनपे गूंगेपन को शब्द देते थे , ऐसे शब्द जिसमें आक्रोश की अभिव्यक्ति थी । यतीश जी की यह काव्यात्मक समीक्षा “जूठन” की बहिर्यात्रा के साथ-साथ अंतर्यात्रा भी है जो जिंदगी के अंधेरों से निकलकर रोशनी में आने की उम्मीद जगाती है । बहुत-बहुत साधुवाद इस बेहतरीन और अद्भुत समीक्षा के लिए ।बधाई और शुभकामनाएं बंधु!

  10. सदियों से चली आ रही इस अंधी विवशता पर सटीक प्रहार सी है समीक्षा स्वरूप लिखी कविताएं। बातें जितनी भी होती रहें किंतु इस भेद को मिटाने के सारे उपक्रम विफल ही दिखे। कितनी पीड़ा है शब्दों में यह पीड़ित मन के आकलन का प्रतिबिंब ही उजागर कर रहा।

  11. कैलाश दहिया

    “मैं भंगी हूँ” आत्मकथा नहीं है।

  12. इन्सान एक जरूरत की वस्तु
    इस्तेमाल एक शातिर पेशा
    बेगार को समझना आसान कहाँ
    और सबकी निगाहें जुबान से तेज नस्तर

    सवर्ण और अवर्ण के बीच
    कोई पुल नहीं होता
    भूतकाल से चली आ रही
    थप्पड़ और गालियों की लड़ी होती है

    “अरे चुहड़े” फब्तियाँ से बुझे तीर होते हैं
    और तीर चलाने वाले
    आडम्बरी धागाओं में खुद
    मंत्रमुग्ध-मंत्रसिक्त

    हमेशा की तरह अपने अंदाज़ में की गई बेहतरीन व नायाब समीक्षा।

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