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‘पितृ-वध’ से निकलता स्त्री-स्वर

आशुतोष भारद्वाज की पुस्तक ‘पितृवध’ हाल के दिनों में प्रकाशित मेरी प्रिय पुस्तकों में एक रही है। इसी पुस्तक पर दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की छात्रा अनुरंजनी ने एक उल्लेखनीय टिप्पणी की है। आप लोगों से साझा कर रहा हूँ-

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‘पितृ-वध’ आशुतोष भारद्वाज की ऐसी पुस्तक है जो एक साथ कई विधाओं को लेकर चलती है। इसमें निबंध भी है,डायरी भी है,और संस्मरण भी है। इस किताब में पांच निबंध ऐसे हैं जो उपन्यास और स्त्री के संबंध में बात करते हैं। अनुपस्थिति के साए, उपन्यास के भारत की स्त्री, स्त्री और राष्ट्रवाद: एक असहज आलिंगन, अनुपस्थिति की कथा, स्त्री का एकांत: अपूर्णता का विधान।

इन सभी निबंधों में लेखक ने बहुत ही नए और वाजिब सवाल उठाए हैं जिस ओर प्रायः हमारा ध्यान नहीं जाता।’अनुपस्थिति के साए’ मुक्तिबोध के साहित्य की ओर ध्यान दिलाता है कि कैसे उनकी रचनाओं में एक सिरे से स्त्री अनुपस्थित है। बस नाम  मात्र को उसकी उपस्थिति मिलती है। यह निबंध इस बात को प्रस्तावित करता है कि किसी भी लेखक/लेखिका के लिए एक-दूसरे के साथ के अनुभव का क्या महत्त्व है?स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरे के विलोम नहीं हैं,बल्कि दोनों का अपना अलग अनुभव संसार है,जो एक-दूसरे के लिए जानना जरूरी है।इसके लिए एक तरफ स्त्री की अनुपस्थिति का प्रभाव और दूसरी ओर स्त्री की उपस्थिति का प्रभाव, इन दोनों संदर्भों से लेखक अपनी बात को रखते हैं।  ‘गोरा’ की स्त्री पात्र ‘सुचरिता’ एक सशक्त स्त्री है जो गोरा जैसे कट्टर हिंदू को अपनी अवधारणा पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है। ‘संस्कार’ की चन्द्री भी, प्राणेशाचार्य, जो कि प्रकांड विद्वान हैं, वेद शिरोमणि की उपाधि से सुशोभित हैं, उनके पूरे जीवन को ही पलट कर रख देती है।

लेखक का जोर इस बात पर है  कि स्त्री-पुरुष दोनों भिन्न सत्ताएं हैं और उनका सामाजिक- सांस्कृतिक परिवेश अलग रहा है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों के अनुभव संसार में गहरा फर्क मिलता है।इस बात को स्पष्ट करने के लिए वे मार्गेट ड्यूरा का उदाहरण देते हैं।इसके साथ ही मार्गेट ड्यूरा के एक साक्षात्कार के उदाहरण से लेखक इस पूर्वाग्रह को तोड़ते हैं कि कला को हम लिंग के घेरे में नहीं बांध सकते हैं। मार्गेट ड्यूरा का यह उद्धरण यहाँ महत्त्वपूर्ण है – “कला को किन्हीं अर्थों में स्त्रैण बनाने का प्रयास स्त्री की बहुत बड़ी भूल है।”अनेक लेखिकाओं में से आशुतोष भारद्वाज, कृष्णा सोबती का जिक्र करते हैं।कृष्णा सोबती स्त्री-लेखन या स्त्री-लेखक को नहीं मानती थी। उन्होंने इसकी संकीर्णता को रेखांकित करते हुए अपने को स्त्री-लेखक कहे जाने की परिधि से बाहर कर लिया था। इस दृष्टि से उनका ‘ऐ लड़की’ उपन्यास बहुत ही महत्त्वपूर्ण बन जाता है। ‘ऐ लड़की’ पढ़ने में तो स्त्रीवादी लेखन ही प्रतीत होता है,लेकिन हम ध्यान दें तो यह बात स्पष्ट होगी कि बहुत ही सूक्ष्मता और संकेत में कृष्णा सोबती यह प्रस्तावित करती हैं कि भले स्त्री की नजर से या उसके जरिए जीवन-दर्शन की बात हो रही है,लेकिन वह केवल स्त्री के जीवन तक ही सीमित नहीं है बल्कि स्त्री और पुरुष दोनों के जीवन से संबंधित है।

इसके साथ ही इस निबंध में लेखक वाल्मीकि रामायण से स्त्री के स्वर को ढूंढ लाते हैं। आमतौर पर हमने रामकथा को टीवी सीरियल के जरिए जाना है। उसमें जैसे दिखाया गया वह मान लिया गया। लेकिन यहाँ लेखक ने सीता के कहे पर ध्यान दिलाया है।राम के मृग के पीछे चले जाने के बाद उनकी पुकार सुनकर सीता लक्ष्मण से वन की ओर जाने को कहती हैं, लक्ष्मण मना करते हैं तो सीता उन पर आरोप लगाती हैं। यह प्रसंग देखते-सुनते हुए यही छाप छोड़ता था कि लक्ष्मण को कितना बुरा लगा होगा? सीता की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता था। लेकिन यह निबंध सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर सीता ने लक्ष्मण से ऐसा क्यों कहा होगा? क्या पूर्व में इस तरह का संकेत उन्हें लक्ष्मण की ओर से मिला था? यदि मिला था तो वे चुप क्यों रहीं? इसके पीछे उनकी मंशा क्या हो सकती है? यह सारे सवाल हम पाठक की कल्पना के सहारे छोड़ दिए गए हैं। लेखक की इस बात पर कि “वाल्मीकि रामायण की सीता अगर लक्ष्मण पर यह आरोप लगा रही है तो इसे अनसुना नहीं किया जा सकता” शायद ही किसी का पहले ध्यान गया हो!यहीं पर लेखक तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ के उदाहरण से यह स्पष्ट करते हैं कि कैसे किसी लेखक का विचार, उसका उद्देश्य, पूरी रचना को प्रभावित करता है।

यह लेख इस्लाम धर्म में भी स्त्री के अस्तित्व की बात करता है।कैसे सूफियों ने स्त्री को अपने हिस्से में शामिल किया और इसका इस्लाम पर क्या प्रभाव पड़ा यह बहुत ही रोचक है।कहाँ परंपरागत इस्लाम पूर्ण कट्टरवादी और ठीक इससे भिन्न सूफ़ी- मत जिसके मूल में ही शांति, प्रेम और सौहार्द है,और उन्होंने ईश्वर से मिलन का रास्ता भी चुना तो स्त्री-पुरुष के संबंध के आधार पर ही चुना। जिसे ‘इश्क-ए-मजाज़ी’ से ‘इश्क-ए-हकीक़ी’ का सफ़र कहा जाता है।

इन सब के बाद पुनः लेखक मुक्तिबोध पर लौटते हैं और उनकी कविता में स्त्री, प्रेम के होने के कारण जो बदला स्वर आया है उसे हमारे सामने लाते हैं।

 इस कड़ी के अगले चार निबंध मुख्यतः भारतीय उपन्यास और स्त्री के संबंध पर केंद्रित है। उपन्यास अपने शुरुआत से ही स्त्री से ‘आत्मीय संबंध’ जोड़ता नजर आया है।भारत में उपन्यास एक ऐसी विधा के रूप में उभरा जिसने स्त्रियों को जबरदस्त तरीके से प्रभावित किया। इसके कई उदाहरण लेखक हमारे सामने रखते हैं। वे लिखते हैं “19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से उपन्यास ने ऐसी (कु) ख़्याति अर्जित कर ली थी कि इस पर स्त्री को बिगाड़ देने के आरोप लगने लगे थे। तत्कालीन भारतीय समाज मानने लगा था कि उपन्यास पढ़कर स्त्री भ्रष्ट हो जाती है। यह मान्यता बेवजह नहीं थी। अब तक स्त्री धार्मिक ग्रंथ ही पढ़ा करती थी,लेकिन उपन्यास राजनीतिक विचारों और सामाजिक मान्यताओं को प्रश्नांकित कर रहा था, स्त्री को समाज के प्रति विद्रोह करना सिखा रहा था। दूसरे, उपन्यास पढ़ने की क्रिया भी बड़ी विध्वंसक थी।रामचरितमानस या सत्यनारायण की कथा समूह में पढ़ी जाती थीं, लेकिन उपन्यास का पाठ नितांत एकाकी कर्म था।” उपन्यास ने स्त्री को उसका एकांत जीना सिखाया।यह सोचकर ही रोमांच होता है कि एक स्त्री अकेले में उपन्यास पढ़ रही है, जो अब तक धार्मिक ग्रंथ और नैतिक उपदेश वाले ग्रंथ पढ़ती आई थी। इस तरह से उपन्यास एक नई स्त्री को जन्म दे रहा था।वे अब सवाल करना जानती हैं। तभी तो ‘झूठा-सच’ की स्त्रियां पूछना चाहती हैं “क्या इस पाशविक  हिंसा के लिए राष्ट्रवाद जिम्मेदार है? आखिर जिन्होंने हमें जानवर की तरह बरता, वे बड़े गर्व से खुद को राष्ट्रवादी कहा करते थे?” युद्ध कहीं भी हो, किसी भी प्रकार की उथल-पुथल हो उनमें सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है स्त्रियों को।भारत विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास इतने मार्मिक तरीके से स्त्रियों पर हुए  शोषण को बताता है जिसे पढ़कर सिर्फ क्रोध और बेबसी का एहसास होता है। ‘झूठा-सच’ में पूछा गया यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है,क्योंकि आज भी जिस राष्ट्रवाद की हवा बहाई जा रही है उसमें सिर्फ पुरुष-ब्राह्मण शामिल हैं, अन्य उच्च जाति के लोग शामिल हैं। बाकी वंचित समूह- दलित, आदिवासी, स्त्री यह सब गायब हैं यहां के तथाकथित राष्ट्रवाद से।

       लेखक उन उपन्यासों पर भी ध्यान दिलाते हैं जिसमें स्त्रियां उपस्थित तो हैं लेकिन उनमें उनका कुछ नहीं है।’घरे बैयरे’ की बिमला के पास दो पुरुषों में चुनाव करने की स्थिति तो है लेकिन उसे मिले हुए विकल्प बहुत सीमित हैं।’गोरा’ में सुचरिता,ललिता और आनन्दमयी ऐसी स्त्रियां हैं जो अपनी बात कहने को मुक्त हैं,सशक्त हैं।अपने तर्क और बुद्धि से पुरुष पात्र को इस हद तक प्रभावित करती हैं कि उन पुरुष पात्रों का पूरा व्यक्तित्व बदल जाता है लेकिन उन स्त्रियों का क्या हुआ उन पुरुषों के संपर्क में आकर?  इसका कोई संकेत हमें उपन्यास में नहीं मिलता।

      यही स्थिति आगे के उपन्यासों में भी बनी रहती हैं मसलन ‘वे दिन’ और ‘संस्कार’।लेखक बहुत विस्तार से बताते हैं कि दोनों उपन्यास की स्त्रियां पारंपरिक स्त्री के ढांचे के बाहर हैं, यौनिक अभिव्यक्ति  में पुरुष से आगे हैं,और यह पुरुष पात्रों को बहुत ज्यादा प्रभावित कर देता है, लेकिन इसका प्रभाव उन स्त्रियों (रायना और चंद्री) पर क्या हुआ? इसका जिक्र उपन्यास में नहीं मिलता है।

लेखक का इस क्रम में यह बताते चलना  कि समय-समय पर उपन्यास ने स्त्रियों को किस तरह बरता है,(‘आनंदमठ’, की कथावस्तु में  स्त्री-मुक्ति की बात  लेकिन उस रचना में एक भी स्त्री पात्र नहीं, ‘घरे-बैयरे’ उपन्यास जहाँ स्त्री पात्र भी है और उसे अपने हित के लिए निर्णय लेने की आजादी भी , लेकिन विकल्पों की बहुत सीमितता,। फिर  ‘गोरा’, ‘वे दिन’, ‘संस्कार’ आदि उपन्यास जिनमें स्त्रियाँ सशक्तता से आ रहीं पर उपन्यास का केन्द्र बिन्दु पुरुष ही है।)यह विश्लेषण उपन्यास के विकास और उसकी विशेषता बताने में एक नया बिंदु जोड़ सकता है।

     ‘अनुपस्थिति की कथा’ में एक महत्त्वपूर्ण सवाल आता है कि यदि चन्द्री बीच उपन्यास से अनुपस्थित न होती तो क्या होता?यहाँ शायद उपन्यासकार का उद्देश्य प्राणेशाचार्य के व्यक्तित्व को परिष्कार करने से रहा हो इसलिए चन्द्री की उपस्थिति उतनी ही दी गई जितनी नायक के व्यक्तित्व को बदलने में सहायता कर सकती थी। इन सारे उदाहरणों से यही बात निकल कर आती है कि इन उपन्यासों में स्त्री का ‘एकायामी चित्रण’ किया गया है जहां वे सिर्फ  पुरुष के जीवन में सहयोगी हैं।

‘संस्कार’ की स्त्रियों पर बात करते हुए निबंधकार ने उपन्यासकार को कटघरे में खड़ा किया है क्योंकि वे उपन्यास की सभी ब्राह्मण स्त्रियों के लिए ‘दुर्गंधभरी, उबाऊ,अपाहिज’ इन आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करते हैं,वहीं चन्द्री का रुप/ शरीर ऐसा है जिसकी कल्पना कर ब्राह्मण लाल टपकाते हैं,उसे पाना चाहते हैं और अपनी लालची और रसहीन पत्नियों को कोसते हैं।लेखक का यह कहना सही हो सकता है कि “इस प्रक्रिया में उपन्यास एक उचित यही और आपत्तिजनक सरलीकरण करता है।” लेकिन यदि हम उन ब्राह्मण स्त्रियों और चन्द्री के व्यक्तित्व का आंकलन करें तो एक बहुत बड़ा अंतर साफ़-साफ़ दिखता है वह है स्वतंत्रता का अंतर।चन्द्री एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है जबकि ब्राह्मण स्त्रियां पितृसत्ता के बंधन में जकड़ी हुई स्त्रियाँ हैं।इसलिए स्वाभाविक है कि उनका अपने ऊपर,अपने शरीर के ऊपर कभी ध्यान जा ही नहीं सकता कि वे उसके लिए कुछ कर सकें।

इसके साथ ही यह भी सवाल आता है कि क्या स्त्री-मुक्ति का तात्पर्य केवल पुरुष को पाना है? यौनिक मसलों पर खुलना है?अब तक के उपन्यासों में अमूमन यही दिखाया गया है। ऐसे उपन्यासों की संख्या बहुत कम है जो स्त्री-मुक्ति का तात्पर्य केवल उनकी यौनिकता में सीमित नहीं कर देता है।इस संदर्भ में सुरेंद्र वर्मा का उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ एक विलक्षण और महत्त्वपूर्ण लगता है।जिस की नायिका है ‘वर्षा वशिष्ठ’। यह उपन्यास एक ऐसी लड़की का संघर्ष हमारे सामने लाता है जिसने अपनी पहचान बनाने के लिए अपने पिता, अपने पूरे परिवार से बगावत की।जीवन की स्वाभाविकता में प्रेम-संबंध भी बने, लेकिन उस संबंध को पहचान बनाने के संघर्ष के आगे कभी भी हावी नहीं होने दिया।

इस पुस्तक का शीर्षक भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है।यह इस रूप में अनूठा है कि यदि किसी ने सिर्फ ‘पितृ-वध ‘का नाम ही सुना हो, उसमें झांकने की कोशिश ना की हो,तो संभव है कि उसके जेहन में स्त्री शब्द ना आया हो,क्योंकि ‘पितृ’ से पुरुष ही सामने उपस्थित हो जाते हैं। लेकिन किताब से पूरी मुलाकात हो जाने के बाद खुशी से यह आश्चर्य होता है कि इतनी स्त्रियों की आवाज इसमें शामिल है।

शायद इसलिए ‘पितृ-वध’ में संकलित इन स्त्री- केंद्रित निबंधों को पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था मानों सदियों से किताबों में दर्ज स्त्रियां एक साथ आकर अपनी कहानी सुना रही हों…

लेखिका

 

 

 

 

 

लेखिका का संपर्क पता-anuranjanee06@gmail.com

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पुस्तक का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन ने किया है।

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3 comments

  1. बहुत सारगर्भित….व ढेर सारी सूचनाओं से वाकिफ कराने वाला…वृहद आलेख….पितृ वध के लेखक….राजकमल, जानकीपुल और अनुरंजनी
    को साधुवाद…. अनेकानेक शुभकामनाएं।

  2. इस लेख में लिखा गया है कि “आनन्द मठ ” में कोई स्त्री पात्र नहीं है जबकि इस उपन्यास में बहुत से स्त्री पात्र हैं जिसमें सबसे प्रमुख महेंद्र की पत्नी कल्याणी है और जीवानन्द की पत्नी शांति जोकि नवीनानंद बन कर क्रांति में भाग लेती है और अंत तक सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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