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एफ आर लीविस का नैतिक बोध और ‘हम दो हमारे दो’ फिल्म

विकास कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए के छात्र हैं। उन्होंने प्रसिद्ध ब्रिटिश साहित्य चिंतक एफ आर लीविस के विचारों तथा अभिषेक जैन निर्देशित फ़िल्म ‘हम दो हमारे दो’ पर बहुत विचारपूर्वक लिखा है। आप भी पढ़ सकते हैं-

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फ्रैंक रेमण्ड लीविस ( 1895-1978) एक श्रेष्ठ पश्चिमी साहित्यशास्त्रीय चिंतक के रूप में विख्यात है। उनका जन्म कैब्रिजशायर, कैंब्रिज में हुआ था। कैंब्रिज में रहकर ही उन्होंने विश्वविद्यालयी शिक्षा प्राप्त किया। शैक्षिक अध्ययन पश्चात लीविस 1925 ई. में कैंब्रिज के इमैनुएल काॅलेज में प्राध्यापक के तौर पर कार्यरत हुए। लीविस जिस समय अध्यापन कार्य में सक्रिय हुए । वह समय प्रथम विश्वयुद्ध का था। स्वंय लीविस भी मानते थे कि उनका समय सांस्कृतिक पतन का दौर है। लीविस का समस्त साहित्य’ चिंतन सांस्कृतिक पतन के बीच मानवीय नैतिक मूल्यों की स्थापना को लेकर था। वह अपनी जीवनसाथी क्वीनी डाॅरोथी के साथ 1932 ई. से एक स्क्रूटनी नामक पत्रिका के द्वारा साहित्य में नैतिक मूल्य की स्थापना को लेकर लगातार लेखकों को लंबे समय तक मार्गदर्शन देने का कार्य करते रहे। “आधुनिक समीक्षकों में अकेले लीविस ही ऐसे हैं जिन्होंने साहित्य की नैतिक प्रकृति और भूमिका पर उचित रीति से विचार किया है।”(१)

विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी साहित्य के पाठ्यक्रम  में युगांतकारी बदलाव लाने में लीविस का महत्वपूर्ण योगदान रहा। “लीविस एक महान आलोचक थे। वे उन गिने चुने आलोचकों में आएंगें जो अंग्रेजी समीक्षा की मूल धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।”(२) उनके द्वारा लिखे गये प्रमुख पुस्तकों में ‘ न्यू बिअरिंग्स इन इंगलिश पोएट्री(1932) ‘ , रिवेलुएशन:ट्रेडिशन एंड डेवलपमेंट इन इंगलिश पोएट्री(1936), द ग्रेड ट्रेडिशन(1948) इत्यादि उल्लेखनीय हैं।

 लीविस का आर्विभाव ऐसे समय में हुआ जब जीवन के क्षेत्र में विज्ञानवाद के सहारे आधुनिकता पैर जमा चुकी थी। विज्ञानवाद के विकास ने परंपरागत उन नैतिक जरूरतों को खारिज किया जो आधुनिक समाज में अवैज्ञानिक होने के साथ साथ आधुनिक समाज को मानवीय समतामूलक समाज के रूप परिभाषित नहीं करते थे। विज्ञानवाद के अनुसार मनुष्य द्वारा मनुष्यता की स्थापना के लिए किये जाने वाला निर्माणात्मक क्रियाविधि ही आधुनिक समाज के लिए सबसे श्रेष्ठ ‘नैतिकता’ है। जबकि मध्यकाल में श्रेष्ठ नैतिक मूल्य वो था जो धार्मिक ग्रंथों में वर्णित था। जो अपने स्वरूप में बहुत ज्यादा अवैज्ञानिक था। मध्यकाल में समाज की नैतिक जरूरत को ‘धर्म’ नियंत्रित करता था तथा मनुष्य के सामाजिक और नैतिक जीवन को अनुशासित करने का कार्य भी धर्म से ही होता था। लोगों को धर्म व्यवस्था द्वारा यह छूट नहीं दिया जाता था कि वे खुद अपनी नियति का निर्माण कर अपनी नैतिक जरूरत को जीवनशैली में सहजता से शामिल कर सकें। विज्ञानवाद के विकास ने लोगों को अपनी नियति का निर्माण करने की शक्ति प्रदान की। आधुनिक काल में प्रत्येक व्यक्ति अपनी नैतिकता खुद से निर्मित करने के लिए स्वतंत्र है। आधुनिक काल में ज्ञान- विज्ञान के विकास ने परंपरागत भ्रम को तोड़ा है कि नियति पहले से निर्धारित होती है। ‘अंधायुग’ नाटक में धर्मवीर भारती लिखते है : –

पता नहीं प्रभु हैं या नहीं

किन्तु, उस दिन यह सिद्ध हुआ

जब कोई भी मनुष्य

अनासक्त होकर चुनौती देता है इतिहास को,

उस दिन नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है।

नियति नहीं है पूर्वनिर्धारित-

उसको हर क्षण मानव-निर्णय बनाता-मिटाता है।

इसप्रकार विज्ञानवाद के विकास ने परंपरागत नैतिक बोध को चुनौती देकर ‘नैतिक बोध’ की दिशा ही बदल दिया। आधुनिक दृष्टि में मूल्यवान नैतिक बोध वह है जो मनुष्य को आध्यात्मिक चेतना अर्थात मानवीय लक्ष्यों में प्रवृत्त करें।

पर विज्ञानवाद से उपजी आधुनिकता की एक विडम्बना यह रही कि एक तरह तो यह मध्यकालीन बंधन को तोड़कर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मानवीय नैतिक मूल्य की स्थापना किया तो दूसरी तरफ विज्ञानवाद के अतिशय आग्रह से यह अपनी चिंतनशीलता को मानवीय की जगह यांत्रिक बनाकर आधुनिक सभ्यता को मध्यकालीन समाज से भी ज्यादा कुरूप बना दिया। एक तरफ फ्रांसीसी क्रांति से विश्व जीवन में आधुनिकता का प्रवेश हुआ तो साथ ही दूसरे तरफ विश्व जीवन में उपनिवेशवाद का क्रूर अत्याचार भी पांव पसारा। फिर 20 वीं सदी में प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध भी विश्व को तिमीर रूप में बदल दिया।

लीविस प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान एंबुलेंस के स्ट्रेचर पर घायलों और शवों को ढ़ोते थे। युद्ध की भयावहता का उनके मन पर गहरा असर पड़ा। परवर्ती समय में लीविस कैम्ब्रिज में अध्यापन कार्य से जुड़े तथा अंग्रेजी साहित्य पर चिंतन करना शुरू किया। लीविस का साहित्य चिंतन ऐसे दौर का है जिस दौर में हमारी समस्त मानवीय सभ्यता गहरे नैतिक संकटों का सामना कर रही थी। वह संकट आधुनिक से उपजे अनेक अभिशाप के रूप में तथा विश्वयुद्धों के परिणामस्वरूप खड़ा हुआ था।

लीविस विज्ञानवाद के अतिशय आग्रह तथा तकनीकी के बढ़ते प्रभाव से ज्यादा चिंतित थे। उनका मानना था कि इन सब के विकास से मनुष्य मानसिक रूप से दरिद्र होता जा रहा है। मशीन के सांस्कृतिक प्रभाव ने सामुदायिक जीवनशैली से परस्पर रूचि, संवेदना, भावात्मक प्रतिक्रिया इत्यादि को नष्ट कर दिया है “अपनी रचना ‘कल्चर तथा एन्वायरनमेंट’ में उन्होंने बड़े विस्तार से मशीन के एक विशेष सांस्कृतिक प्रभाव का विवेचन किया है – सामयिक कथा साहित्य और सामान्य राष्ट्रीय जीवन पर विज्ञापन के प्रभाव का।”(३)

लीविस जब आलोचना क्रम में प्रवृत्त हुए तो उन्होंने पाया कि आधुनिक सभ्यता घोर सांस्कृतिक पतन का दौर है “1930 में उन्होंने घोषणा की मशीन ने परंपरागत जीवन शैली को नष्ट कर दिया है। अपनी नैसर्गिक लय से मानव जीवन की दूरी बढ़ती जा रही है।”(४) लीविस इस सभ्यता संकट से मानवता को निजात पाने के लिए नये ‘ नैतिक मूल्य’ को स्थापित करने का विचार प्रकट किये जिससे आधुनिक बर्बर मानवता ‘सुंदर मनुष्यता’ का रूप ले सकें “लीविस का चिंतन इस प्रश्न पर केंद्रित है कि विज्ञान और तकनीक के बढ़ते वर्चस्व के बीच समाज में मानवीय लक्ष्यों, मूल्यों और महत्व को पूरी तरह समझ कर उसकी हिफाजत और विकास कैसे किया जा सकता है? इसका उत्तर वे 40 वर्ष से भी ज्यादा अधिक समय तक दोहराते रहे – सांस्कृतिक अविछिन्नता को बनाए रखकर।”(५) उनके अनुसार सांस्कृतिक अविच्छिन्न परंपरा के द्वारा अर्जित नैतिक मूल्य ही मानवता को संरक्षित कर सकती है। उनका विचार था कि मानवता को अपनी जड़ से पुन जुड़ने के लिए जीवन में धर्म को स्थान देना पड़ेगा। धर्म से प्रेरित ‘नैतिक मूल्य’ समाज में लंबे समय तक प्रभावी और टिकाऊ होती है “अपनी रचना थाॅट , वर्ड्स एंड क्रिएटिविटी में उन्होंने जीवन के धार्मिक आधार को पहचानने की जरूरत पर जोर दिया और ऐसा न करने पर जिन खतरों की संभावना पैदा होगी उनके बारे में आगाह किया।”(६)  लेकिन यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि लीविस सिर्फ धार्मिक आधार पर नैतिक मूल्य गढ़ने की बात नहीं कर रहे है और न ही परंपरागत धर्म द्वारा निर्देशित नैतिक आग्रह को हूबहू अपनाने पर जोर दे रहे है ” पर उनके धार्मिक  आग्रह की सही समझ के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि उन्होंने बराबर अपने को रूढ़ ईसाई मत से अलगाया।”(७) लीविस के कहने का आशय यह है कि आधुनिक सभ्यता में मानवीय मूल्य का हिफाजत और विकास के लिए जिस नये ‘ नैतिक मूल्य’ की  खोज हो, उसका आकार गढ़ने के लिए सांस्कृतिक परंपरा में धर्म द्वारा प्रस्तावित जो नैतिक मानवीय मूल्य है, उसको प्रेरणास्रोत के रूप में अपनाना  है। “नैतिक विचार से उनका आशय क्या है, यह स्पष्ट करते हुए वह लिखते है : जीवन कैसे जिया जाए, यह प्रश्न स्वयं एक नैतिक विचार है और यह ऐसा प्रश्न है जिसमें हर किसी की गहरी दिलचस्पी है और जिसको लेकर किसी न किसी रूप में वह निरन्तर व्यस्त रहता है।”(८)

                लीविस के अनुसार- कभी कभी हमारा सामना ऐसे नैतिक प्रश्न व जरूरत से होता है जिनका नैतिक हल हमें स्थापित नैतिक मान्यताओं से नहीं मिलता या जिसे समझना स्थापित नैतिक मान्यताओं के तहत संभव नहीं होता। तब एक नयी नैतिकता की संभावना के लिए ‘कला या साहित्य’ एक जीवन अवसर प्रदान करती है ” लीविस की मान्यता का सार यह है कि वर्तमान समाज में जिन मूल्यों का अभाव है, उनका बोध मुख्य रूप से साहित्य के अध्ययन और अतीत की जानकारी के माध्यम से ही हासिल किया जा सकता है।”(९) कला या साहित्य ही उस नैतिक जरूरत को उसकी समग्र जटिलता में आकार देकर संप्रेषणीय बनाती है , उसको एक अनुभूति के रूप में पाठक को ग्रहण करने की एक जीवन अवसर प्रदान करती है। जीवन अवसर इस रूप में प्रदान करती है – जब पाठक उस नैतिक जरूरत को समझने के लिए उस कला या साहित्य का आस्वादन करता है तब उस कला या साहित्य में रचित संसार का वह हिस्सा बनता है  साथ ही उस नैतिक प्रश्न व जरूरत को वह जीता भी है। इसप्रकार वह कला या साहित्य जीवन की एक और रचना व पुनर्रचना हुआ। यहाँ यह रेखांकित करना जरूरी है कि यह नैतिक अभिक्रिया इस अर्थ में हो कि उस नैतिक जरूरत के नैतिक समाधान को हम सामाजिक नैतिकता के जरूरी तत्व के रूप में देख सकें तथा उसे सामाजिकता में स्थान दे सकें।

लीविस मानते थे कि आधुनिक काल में नैतिक मूल्य की स्थापना ‘कला या साहित्य’ द्वारा ही संभव है इसलिए उनका प्रस्तावित विचार था कि नया लेखक अपने साहित्य में आधुनिक सभ्यता के लिए, मानवीय मूल्य की रक्षा के लिए  ‘नये नैतिक मूल्य’ जो मानवता के लिए वांछनीय है,  उसका रचनात्मक सृष्टि करें ” लीविस, साहित्य की व्याख्या जीवन या मूल्यों की गवेषणा के लिए नहीं बल्कि जीवन की संभावनाओं का पोषण करने की दृष्टि से करते है। उनके अनुसार बड़े रचनाकारों का महत्व इस बात में होता है कि वे अपने पाठकों में जीवन की संभावनाओं के प्रति जानकारी बढ़ाते है।”(१०)

लीविस के अनुसार -कला या साहित्य एक प्रकार का नैतिक अभिक्रिया है “लीविस ने काफी जोर देकर कहा कि महान साहित्य केवल तकनीक की चीज नहीं है:जीवन और नैतिकता से इसका गहरा संबंध है। जो साहित्य जीवन का निषेध करता है और जिसका कोई नैतिक उद्देश्य नहीं है वह महान नहीं हो सकता।”(११) कला या साहित्य जीवन की नैतिक जरूरत को  बौद्धिक भावनात्मकता से समझते हुए उसके साथ एक बेहतर मानवीय रिश्ता बनाने का उपक्रम है क्योंकि कला या साहित्य जीवन की नैतिक जरूरत को जीवन के अनुभवों में नये आयाम जोड़कर सुलझाता है। मानवीय जीवन में कुछ नैतिक जरूरत ऐसे होते है जिसे कानून तथा राजनीति न भाप सकता है और न समाधान सुझा सकता है। उस नैतिक जरूरत को सबसे पहले एक साहित्यकार व कलाकार ही अपनी विशिष्ट जीवनानुभूति के द्वारा संप्रेषण का बिषय बनाता है। इसीलिए लीविस आधुनिक काल में नैतिक कला या साहित्य की आवश्यकता पर जोर देते है। वे बराबर यह मानते रहे कि क्योंकि साहित्य का सरोकार जीवन से और मानवीय मूल्यों के सृजन से होता है अत: उसका नैतिक आयाम होना अनिवार्य है।

लीविस के अनुसार कला या साहित्य ऐसा हो जो मानवीय जीवन की नैतिक जरूरत को बौद्धिक भावनात्मकता से समझते हुए उस नैतिक जरूरत के साथ एक बौद्धिक भाव से अभिक्रिया देकर एक ऐसा नैतिक हल प्राप्त करें जो मानवीय जीवन को एक कदम और बेहतर दिशा में आगे ले जाये। जब कोई साहित्यकार या कलाकार जीवन की पुनर्रचना करता है तो एक प्रकार से वह समाज के लिए नया अनुशासन की निर्मिर्ती करता है। इस रूप में वह समाज को नैतिक दृष्टि से पुनर्रचित करता है और साथ ही कला या साहित्य मनुष्य को उस नये समाज के लायक भी गुणात्मक रूप से तैयार करता है “लीविस ने अपनी अंतर्वेधी दृष्टि से यह देखने का प्रयत्न किया कि दैनंदिन जीवन के बीच से लोग अपनी नियति का निर्माण खुद जिस रूप में करते हैं, उसे उपन्यासकार की अंतर्दृष्टि कितने सही रूप में पकड़ पाती है।”(१२)

                           निर्देशक अभिषेक जैन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ हम दो हमारे दो ‘ में अनाथ युवा ‘ध्रुव’ एक  फैमिली की हिस्सा बनने के लिए तथा किसी को अपनी फैमिली का हिस्सा बनाने के लिए अपनी नियति का निर्माण  किस प्रकार की स्वयं की कवायद से करता है, उसको निर्देशक की नजरों ने सही रूप में पकड़ा है।

                                आधुनिक नगर समाज के विकास ने परिवार विच्छेद की समस्या को उत्पन्न किया। इस क्रम में बड़े महानगरों में रहने वाले शिक्षित युवा अपने माँ बाप को पहचानने से इंकार करते चले गये। अधेड़ माँ बाप को वृद्धाश्रम की शरण लेनी पड़ी । दूसरी तरफ ,अनाथों को गोद लेना आधुनिक मानवीय समाज में एक नैतिक मूल्य को स्थापित किया। इन तमाम विडम्बनाओं को अनेक साहित्य और सिनेमा में दिखाया गया। लेकिन ध्यातव्य है कि वर्तमान समाज में बहुत से युवा ऐसे है जिनकी कोई फैमिली नही है, अनाथ है। उसी तरह अनेक स्त्री – पुरूष ऐसे है जो किसी के मां और बाप तो है फिर भी संतान विहीन जीवन बिता रहे है। तो इस प्रकार का जो नैतिक संकट आधुनिक समाज में है, इसके प्रतिक्रिया में ‘ हम दो हमारे दो ‘ फिल्म नये नैतिक मूल्य की खोज करने का एक पहल है ,  जिसे बौद्धिक भावनात्मकता से समझने की जरूरत है ।

प्रत्येक समाज में नैतिक जरूरत का स्थान हमेशा बचा रहता है, उसका बोध सामान्य अनुभूति से नहीं हो पाने के कारण लोग उस नैतिक जरूरत को समझ नहीं पाते है। उस नैतिक जरूरत को सिर्फ दो लोग ही समझ पाते है- एक स्वयं वह व्यक्ति जो उस नैतिक जरूरत की अभाव को भोग रहा है और दूसरा वह जो साहित्यकार या कलाकार है। लीविस के अनुसार- कभी कभी हमारा सामना ऐसे नैतिक प्रश्न/जरूरत से होता है जिनका नैतिक हल हमें स्थापित नैतिक मान्यताओं से नहीं मिलता या जिसे समझना स्थापित नैतिक मान्यताओं के तहत संभव नहीं होता। तब एक नयी नैतिकता की खोज के लिए रचनात्मक ‘कला या साहित्य’ एक जीवन अवसर प्रदान करती है ।

          इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ”हम दो हमारे दो’  संतान विहीन अधेड़ स्त्री-पुरुष तथा मां-बाप विहीन एक युवा अनाथ को परस्पर संगठित होकर आपसी सहमति से एक परिवार बनाने की नैतिक खोज है। अब तक की स्थापित नैतिकता था कि सिर्फ अनाथ बच्चों को ही गोद लिया जा सकता है । तथा  संज्ञा स्वभाव फैमिली (genuine family ) बनाने के लिए ये तत्व जरूरी था कि ‘फैमिली’ विवाह संस्कार अर्जित किया हो, साथ ही पारिवारिक सदस्यों का एक बायोलॉजिकल श्रृंखला हो एवं एक जेनेटिक सिमिलारिटी हो । लेकिन ‘हम दो हमारे दो ‘ मूवी युवा अनाथ को खुद की फैमिली बनाने का मांग करता है तथा यह भी नैतिक मांग करता है कि एक स्त्री –  जो किसी के मां तो है फिर भी संतान विहीन जीवन बिता रही है और एक पुरूष जो अधेड़ है, जिसका कोई फैमिली नहीं है; वह खुद के लिए एक फैमिली चुन सकता है। फिल्म की नयी ‘नैतिक स्थापना’ के अनुसार इन तीनों किरदार क्रमशः ध्रुव, पुरूषोत्तम मिश्रा तथा दीप्ति द्वारा आपसी भावनात्मक जुड़ाव की संस्कार आत्मिक स्तर पर वैध हो जाने के आधार पर स्वयं को एक मुकम्मल फैमिली घोषित कर सकना उपरोक्त आधुनिक ‘नैतिक संकट’ का एक नया “नैतिक समाधान” हो सकता है। विवेच्य नैतिक जरूरत के बीच से एक नैतिक मूल्य की स्थापना ‘हम दो हमारे दो’ में दिखाया गया है, लीविस चाहते थे कि समाज को मानवीय लक्ष्यों से जोड़ कर उसके लिए रचनात्मक सृष्टि की चाहत जो लेखक रखते है वह इसी ‘नैतिक खोज’ करने की मंशा से समाज को देखें तथा नये ‘नैतिक मूल्य’ की संभावनाओं की ‘नये पथ’ का लगातार गवेषणा करें।

 ‘हम दो हमारे दो’ फिल्म काॅमेडी भरे क्लाइमेक्स में एक नये “नैतिक मूल्य” को स्थापित किया है। फिल्म का नायक ‘ध्रुव'( राजकुमार राव) अनाथ है। बचपन से उसके मन में फैमिली का प्यार पाने का एक प्यास है। प्रेमी चाचा ( परेश रावल) से अक्सर फैमिली के बारे में सवाल करता रहता है, अपने कमरे की दीवार पर स्पाइडरमैन, पुलिस इत्यादि का स्टीकर चिपका कर उनसबों को अपनी फैमिली का हिस्सा बनाने की कवायद करता रहता है। प्रेमी चाचा( परेश रावल) उससे कहता है कि फैमिली या तो होती है या नहीं होती। तेरी नही है! पर बाल प्रेमी ( राजकुमार राव) कहता है – मुझे तो फैमिली ही चाहिए। बाल प्रेमी का यह कथन वह नैतिक जरूरत है जिसकी बात आलोचक एफ आर लीविस करते है।

“लीविस मानते थे कि साहित्य का निकट संबंध जीवन की आलोचना से होना चाहिए। इसलिए साहित्य के आलोचक की यह जिम्मेदारी है कि वह लेखक के नैतिक रूझान के आलोक में रचनाओं का मूल्यांकन करें।”(१३) इसी अर्थ में ‘हम दो हमारे दो’ का मूल्यांकन करना अनुचित नहीं है। ‘हम दो हमारे दो’ फिल्म की अर्थवत्ता काॅमेडी के बजाय उसके नैतिक मूल्य की स्थापना में देखना फिल्म के साथ न्याय करना है। फिल्म की संवेदना परिवार पर केंद्रित है – मुख्य किरदार बाल प्रेमी या ध्रुव(राजकुमार राव) हो या प्रेमी चाचा ( परेश रावल) या अन्या ( कृति सेनाॅन) या दीप्ति हो या अन्या के पिता ; सबके मन में फैमिली को लेकर एक खास चाहत है। इसके साथ साथ यह भी उल्लेख करना उपयुक्त है कि फिल्म का देशकाल और वातावरण भी फैमिली से जुड़े कार्य व्यापार के अनुसार ही फिल्माये गये है। उदा. के लिए ध्रुव (राजकुमार राव) का इंटरप्राइजेज और अन्या (कृति सेनाॅन) का बलाॅगर प्रोफेशन उनके ‘फैमिली ऑब्सेशन’ भाव को दर्शाता है।

फिल्म के नायक ध्रुव (राजकुमार राव) को बचपन से अपनी एक फैमिली बनाने की चाहत है लेकिन युवावस्था तक वह अनाथ जीवन गुजार रहा है। जब अन्या (कृति सेनाॅन) से उसे प्यार हो जाता है। तब अन्या (कृति सेनाॅन) के कहे अनुसार कि मैं ऐसे घर में शादी करूंगी जिसकी एक फैमिली हो ; अन्या के लिए ध्रुव एक फैमिली का जुगाड़ करने में जुट जाता है। इसके लिए वह दोस्त शेंटी की मदद लेता है। शेंटी ध्रुव को शादीराम जो कि शादी के लिए भाड़े का रिश्तेदार की व्यवस्था कराने का बिजनेस करता है, उसके पास अपने दोस्त ध्रुव को ले जाता है पर शादीराम के यहाँ ध्रुव के डिमांड अनुसार जेनवीन सीधे साधे टाइप के मां-बाप नहीं मिलते। फिर रात को फ्लैशबैक में ध्रुव को प्रेमी चाचा (परेश रावल) की बात यादे आता है कि तुम्हें कोई अपनी फैमिली का हिस्सा नहीं बनाता तो तुम खुद की एक फैमिली बना लो। प्रेमी चाचा (परेश रावल) का यह डायलॉग आधुनिक जीवन की नयी ‘नैतिक जरूरत’ को सतह पर लाती है। इसके अनन्तर ध्रुव ( राजकुमार राव) प्रेमी चाचा से जाकर मिलता है तथा उनको अपना बाप बनने के लिए आग्रह करता है लेकिन प्रेमी चाचा बाप बनने से मना कर देते है। आगे की कहानी में ध्रुव प्रेमी चाचा के सह साथी के द्वारा उनकी काॅलेज की प्रेमिका दीप्ति जिससे प्रेमी चाचा अब भी प्रेम करते है, उसको माँ बनाने के लिए दिए गये एड्रेस पर निकल पड़ता है। दोस्त शेंटी के बार बार कन्वेंश करने पर ध्रुव जेनवीन फैमिली की ही बात करता है न कि दुबारा शादीराम के पास जाता है। ध्रुव थोड़ी बहुत मशकस्त के बाद दीप्ति और प्रेमी चाचा को मां-बाप के रोल करने के लिए राजी कर लेता है । फिर ध्रुव की एक फैमिली बन जाती है। आगे की स्टोरी में ध्रुव का दोस्त शेंटी ध्रुव के अपार्टमेंट को एक घर में बदल देता है। दीप्ति भी ध्रुव के घर को फैमिलर वातावरण में ढ़ालने का पूरा उपक्रम करती है। दीप्ति माँ वाले इमोशन से ध्रुव को खांसी होने पर पानी के लिए पूछती है, ऑफिस जाते वक्त लंच बाॅक्स भी देती है। ध्रुव अपने तथाकथित माँ- बाप का बहुत रिस्पेक्ट करता है। फिर आगे अन्या के फैमिली से दीप्ति और पुरूषोत्तम मिश्रा(परेश रावल) ध्रुव के मां-बाप बनकर मिलते है । यहाँ फिल्म अपने मैसेज को काॅमेडी में घुलाकर दर्शकों का मनोरंजन करती है। फिर स्टोरी आगे बढ़ती है जिसमें दीप्ति ध्रुव के लिए लंच बाॅक्स लेकर उसके ऑफिस जाती है जहाँ ध्रुव खुश होकर पूरे दिल से कहता है कि आज मेरी माँ आयी है ऑफिस। फिर ध्रुव माँ को ऑफिस घुमाता है । इस टाईम एक सीन ऐसा आता है जब दीप्ति पुत्र-प्रेम से ध्रुव को गले लगाकर भावुक हो जाती है।

आगे कहानी आगे बढ़ती है । ध्रुव और अन्या की सगाई में शादीराम के यहाँ से दोस्त शेंटी ने भाड़े का रिश्तेदार बुलवाता है । इसी बीच फिल्म में दीप्ति और पुरूषोत्तम मिश्रा ( परेश रावल) के बीच रागात्मक लगाव स्थापित होता है लेकिन तभी फिल्म में एक क्लाइमेक्स आता है और शादीराम के द्वारा ध्रुव के फैमिली का पर्दाफाश हो जाता है। इस सीन का एक संवाद बहुत अर्थपूर्ण है। अन्या कहती है आप दोनों हसबैंड – वाईफ नहीं है ना?  तो  ध्रुव कहता है कि क्या फर्क पड़ता है ये हसबैंड – वाईफ है का नहीं , अब ये मेरे माँ बाप है और हमेशा रहेगे। यहाँ पर यह फिल्म ध्रुव के फैमिली को मुक्कमल फैमिली के तौर परिभाषित करता है।

       अन्या के पिता ध्रुव को इस कृत्य के लिए फ्राॅड ठहराते है तब ध्रुव जबाव देता है – आप मुझे फ्राॅड कह रहे, क्या जानते है मेरी लाईफ के बारे में? आपकी सोसाइटी ने हमारे लाईफ के बारे में डिसाइड कर लिया था कि छोटू जिंदगी भर ढ़ावे पर बर्तन घीसेगा। ……. आपकी सोसाइटी में से किसी ने पैदा करके छोड़ दिया था फिर कहते है अपनी फैमिली चूज ( choose) नहीं कर सकते। यह डायलॉग इस नैतिक मांग की तरफ ध्यान खींच रहा है कि कोई अनाथ समाज के बीच से ही उपजता है इसलिए उसे भी अपनी फैमिली चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। जबकि अब तक की स्थापित नैतिकता यह थी कि सिर्फ कोई फैमिली ही किसी अनाथ को अपनी फैमिली का हिस्सा बना सकती है। समाज में रहने वाले सभी लोगों को ‘फैमिलीयर जीवन’ प्राप्त हो, उसके लिए ध्रुव का अन्या के पिता (डाॅक्टर) से यह वाद-विवाद एक नैतिक बहस है ।

 लीविस की विवेच्य नैतिक बोध को आत्मसात करते हुए ध्रुव ( राजकुमार राव) कहता है – मैंने चूज की है अपनी फैमिली। ये पुरूषोत्तम जी है ये मेरे फादर है, ये दीप्ति जी मेरी मदर है और ये बहुत लक्की है कि दे फाउण्ड इच अदर और हम बहुत खुश है साथ में।

लेकिन ध्रुव के इस नैतिक बहस का इस सीन में कोई सार्थक प्रभाव नहीं पड़ता और ध्रुव-अन्या की शादी टूट जाती है। फिर आगे के सीन में दीप्ति-पुरूषोत्तम मिश्रा अपने बेटे ध्रुव की खुशी के खातिर अन्या के घर जाकर उनके माता-पिता से माफी मांगते है। पुरूषोत्तम मिश्रा (परेश रावल) कहता है – हमारी गलती हुई लेकिन हमने गलत नहीं किया है। परेश रावल का यह कथन मनुष्य द्वारा जीने के लिए आवश्यकतानुसार नैतिकता स्वयं बनाने की नियती को सार्थक ठहराता है। आधुनिक समाज में अपनी नैतिकता का स्वयं निर्माण करना गलत नहीं है। हजारीप्रसाद द्विवेदी अशोक के फूल निबंध में लिखते है – शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा , वह गंगा की अबाधित अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है। तात्पर्य है जीने की इच्छा के लिए स्वयं चुनी गई नैतिकता गलत नहीं होता।

फिर आगे की स्टोरी में ध्रुव की माँ दीप्ति अन्या के फैमिली से जो कहती है वह संवाद बहुत मूल्यवान है – अन्या ने घर के हर झूठ को सच बना दिया। प्लीज अन्या के बगैर वह घर घर नहीं लगता.. हमारा ध्रुव ध्रुव नहीं लगता। यह सीन स्पष्ट करता है कि दीप्ति और पुरूषोत्तम मिश्रा ध्रुव को भावनात्मक रूप से अपना बेटा मान लिये है। आगे की सीन में ध्रुव की तरफ से भी स्पष्ट हो जाता है कि वह भी दीप्ति और पुरूषोत्तम मिश्रा को भावनात्मक रूप से अपना माँ-बाप स्वीकार लिया है। जब ध्रुव को पता चलता है कि उसके माता-पिता अन्या के घर रिश्ते को लेकर फिर से गये थे जबकि उसके अनुसार जाना उपयुक्त नहीं था तब ध्रुव का कहना गौर करने लायक है जो काफी अर्थपूर्ण है – किसने बोला था अन्या के घर जाने को, आपलोग मेरे मां-बाप है.. किसी को कोई हक नहीं बनता कि आपकी बेइज्जती करें… अब मुंह क्यों लटकाये हो.. जो होना था हो गया… शादी में बुलाया सब परिवार जायेंगे। ………. मम्मी हम साथ में है.. बहोत है.. मैं पिज्जा बना रहा हूँ साथ में आएंगे। फिल्म की इस सीन में यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही शुरूआत में ध्रुव अन्या से शादी करने के लिए यह फैमिली बनाता है लेकिन उसे हमेशा से एक फैमिली ही चाहिए थी और वह फैमिली आज उसे मिल गया तो वह उसी के साथ होने में खुश है चाहे अन्या मिले या ना मिलें।

फिर स्टोरी आगे बढ़ती है। अन्या की छोटी बहन कनिका का अपने पापा से फैमिली को लेकर तर्क वितर्क होता है फिर जब अन्या को पता चलता है कि ध्रुव के मम्मी पापा घर आये थे। तो वह ध्रुव के बारें में एक बार और सीरीअस होती है। यहाँ छोटी बहन कनिका अन्या से कहती है कि सोच ले तुझे सेम सरनेम, रेडीमेड फैमिली चाहिए कि वह जो ध्रुव ने फैमिली बनायी है तेरे लिए।

आगे अन्या ध्रुव से मिलकर प्यार का इजहार करती है फिर दोनों शादी के लिए विवाह पंडाल में दुल्हन-दुल्हा बनकर पहुंचते है। इस सीन में भी निर्देशक ने ‘नयी नैतिकता’ स्थापित किया है। जहाँ पहले के शादी उत्सव में भाड़े के रिश्तेदार शामिल हुए थे वहीं इस टाईम शादी में रिश्तेदार के तौर पर वे लोग शादी में शामिल हुए है जो लोग ‘सहभागी एवं भावनात्मक रूप’ से ध्रुव तथा दीप्ति-पुरूषोत्तम से जुड़े हुए है। कहने का तात्पर्य है कि ध्रुव जिन बच्चों को पढ़ाता था तथा प्रेमी चाचा जिनके साथ वृद्धाश्रम में रहते थे ; वे ही सभी बाराती बनकर शादी में शरीक  हुए। निर्देशक ने यहाँ सायास प्रयास द्वारा एक नैतिकता की स्थापना किया है कि जिनके पास रिश्तेदार के रूप में परंपरागत नातेदार-संबंधी नहीं है उन लोगों के लिए वहीं लोग रिश्तेदार है जिनके साथ उनकी दिनचर्या गुजरती है। जबकि अब तक की स्थापित नैतिकता था कि जिनलोगों से विवाह संस्कार सम्मत जुड़ाव है वहीं नातेदार कहलायेंगे। इसप्रकार ‘हम दो हमारे दो’  फिल्म रिश्तेदार को लेकर भी एक “नयी नैतिकता” स्थापित करती है।

उक्त विवेचन से देखा जाये तो फिल्म का अनेक संवाद बेहद अर्थव्यजंक है। फिल्म की स्क्रिप्ट की बात करें तो काॅन्टेंट महत्वपूर्ण है लेकिन काॅन्टेंट की कसावट कमजोर तथा फलक सीमित है। नये नैतिक मूल्य की खोज के लिए किरदार के मनोवैज्ञानिक जगत में विचरण करना अपेक्षित था जिसको  स्क्रिप्ट में स्कीप कर दिया गया है। इसमें जीवन के जटिल नैतिक समस्या को काॅमेडी के सहारे सरलता से फिल्मांकित किया गया है। स्क्रिप्ट को काॅमेडी के बजाय औपन्यासिक तनाव’ में फिल्माया जाता तो दर्शकों तक फिल्म का मूल्य कथ्य आसानी से पहुॅंचती। इसके अलावा दीप्ति तथा प्रेमी चाचा के बीच फ्लैशबैक में विकसित प्रेम कहानी की जगह फिल्म में इन दोनों पात्रों के फैमिली ऑब्सेशन वाले मनोवैज्ञानिक अंतर्विरोध को स्क्रिप्ट में शामिल किया जाता तो यह फिल्म नये ‘नैतिक मूल्य’ का खोज करने की दृष्टि से ज्यादा मूल्यवान साबित होता। दर्शकों को मनोरंजन कराने के लिए फिल्म में काॅमेडी का  समावेश होना चाहिए लेकिन काॅमेडी के घलुये में ‘जटिल संवेदना को फिल्माना एक तरह से नये ‘नैतिक मूल्य’ का उपहास उड़ाना है। बहरहाल, इस फिल्म में जिस संवेदना को फिल्माया गया है वह बहुत मूल्यवान और नया है। फिल्म की सफलता इस बात में है कि अपने वांछित अर्थवत्ता को परदे पर उतार सका है। ‘हम दो हमारे दो’ फिल्म संतानविहीन गृहिणी, परिवारविहीन अधेड़ तथा मां-बाप विहीन अनाथ को एक जगह आपस में भावनात्मक रूप से परस्पर संगठित होकर खुद की अपनी एक फैमिली बनाने की नैतिक खोज है।

संदर्भ ग्रंथ :-

  1. राजनाथ- पाश्चात्य काव्यशास्त्र नई प्रवृतियाँ , पृष्ठ सं.-61
  2. वहीं, पृष्ठ सं.- 54
  3. निर्मला जैन – काव्य चिंतन की पश्चिमी परंपरा, पृष्ठ सं. – 141
  4. वहीं, पृष्ठ सं. – 141
  5. वहीं, पृष्ठ सं. – 143
  6. वहीं, पृष्ठ सं.- 142
  7. वहीं, पृष्ठ सं.- 142

8.राजनाथ- पाश्चात्य काव्यशास्त्र नई प्रवृतियाँ , पृष्ठ सं.-59

9.निर्मला जैन – काव्य चिंतन की पश्चिमी परंपरा, पृष्ठ सं. -145

  1. वहीं, पृष्ठ सं. – 149
  2. राजनाथ- पाश्चात्य काव्यशास्त्र नई प्रवृतियाँ , पृष्ठ सं.-61
  3. निर्मला जैन – काव्य चिंतन की पश्चिमी परंपरा, पृष्ठ सं.-148
  4. वहीं, पृष्ठ सं.- 149
विकास कुमार

                               विकास कुमार

                      परास्नातक हिंदी, द्वितीय वर्ष

                       रामजस कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय)

                   ई. मेल- vk908818@gmail.com

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