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अनुकृति उपाध्याय की कहानी ‘हरसिंगार के फूल’

ओर्गैज्म को लेकर चल रही सार्थक बहस के दौरान मुझे लेखिका अनुकृति उपाध्याय की इस कहानी की याद आई। यह कहानी उनके कहानी संग्रह ‘जापानी सराय’ में सम्मिलित है। हिंदी में ओर्गैज्म को लेकर शायद इससे अच्छा कुछ लिखा नहीं गया। समय हो तो पढ़िएगा-

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मौना नहाकर निकली. उसके गीले बालों से बूँदें झर रही थीं. मौना के बाल ख़ूबसूरत थे , लम्बे और मुलायम, और रोशनी पड़ने पर  तांबई ओप वाले. रेशम बाल और उसकी गहरी, तरल आभा वाली आँखें, सुंदरता पर उसके बस यही दो दावे थे. विश्वा ने एक बार कहा था – कैसी हैं तुम्हारी आँखें? तुम से अलग व्यक्तित्व रखती हैं. देखने भर से झनझनाहट… वह मुस्कुरा पड़ी. बालों से झरती बूँदों को तौलिये में समेटती गा उठी –

मैं बूँद बनी सतरंग तुम्हारे संग पिया हो….

मैं राख से बन गई आग तुम्हारे साथ पिया हो…

रंजू कमरे में दाख़िल हुआ. मौना ने उसको कुहासी आँखों से देखा, उसके होंठ इंद्रधनुष होने के सपने में मुस्कुराते रहे.

“मौना” रंजू का स्वर सघन था. उसकी आँखों के गिर्द माथे और कनपटी पर की त्वचा कसी हुई थी. “मौना…पापा की तबियत… देयर्स बिन एन एमरजेंसी…उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा है…”

मौना की गुनगुनाहट रूँध गई. “क्या हुआ उन्हें? किस अस्पताल…” उसने रंजू की ओर ग़ौर से देखा. “क्या हुआ है रंजू?”

रंजू उसके निकट आ गया, ठीक सामने. “मौना,  ही इज नो मोर…पापा नहीं रहे.”

मौना की आँखें चौंधिया गईं. सीला तौलिया हाथों से फिसल गया. उसकी देह रस्सी – सी तनी, ऐंठी और ढलक गई. वह धरती पर गिर पड़ी. रंजू के शब्द उसके कानों के खोखल में ठकठका रहे थे और उनको काटता पापा का कंठ स्वर गूँज रहा है – “मैं ठीक हूँ बच्ची, यह तो तुम्हारी माँ यूँ ही घबराती रहती है. मैं इन दिनों एक नया गीत लिख रहा हूँ – एक डरी हुई स्त्री का गीत! वह कुछ इस तरह है- अगर मैं खाँसा तुम कराही, अगर मैं छींका तुम कंपकंपाई!” पापा हंस रहे हैं. फ़ोन के स्पीकर से सब कुछ सपाट हो जाता है लेकिन पापा की हँसी, लहरती, खीझ और चुहल के बीच डोलती हँसी. आज दोपहर ही सुनी हँसी ठकठकाते शब्दों के बीच बजती है. मौना ने स्वयं को साधना चाहा, स्थिर हो कर ध्यान से सुने तो पापा का स्वर साफ़ सुनाई देगा- ‘बच्ची’… लेकिन उसके कानों में अर्थहीन ठकठकाहट गूँज रही है, सब कुछ हवा में घास-सा लरज रहा है. कोई रो रहा है. उसकी कराहें मौना के कंठ में क्यों हैं? उसके कंधों को किसी ने नरमी से थामा. उसने पूरी शक्ति से उन हाथों को झटका. छुए जाने पर सब कसकता है, दुखता है. उसकी पूरी देह एक फफोला है. मुझे छुओ मत, मुझे छुओ मत, उसने कहना चाहा पर उसके शब्द ठकठकाहट में खो गए. “ही इज़ नो मोर.” वह घुटनों पर उठ आई. देह थरथरा रही थी, छाती में साँस घुट रही थी. लेकिन उसके फेफड़ों की छटपटाहट में साँस फँसी भर, रुकी नहीं. उसके नथुनों से अपनी ही साँस के लिए घृणा-भरी फुत्कार निकली. उसने रंजू के थामते सम्भालते हाथों में अपने देह को झटका. उसका सर पलंग के पैताने रखी मेज़ से जा टकराया. ठकठकाहट कान- फाड़ू गूँज बन गई. उसने अपनी मुट्ठी अपने मुँह में भर ली.

रंजू ने उसे अपनी बांहों में भर कर पलँग पर बैठा दिया. मौना ने अपने गले में आई ऊबकाई को रोका. “मुझे उनके पास जाना है रंजू…’प्लीज़’…”

“हाँ मौना. मैंने फ़्लाइट्स देखी है. पहली फ़्लाइट कल सुबह पाँच बजे की है.”

“सुबह? मैं सुबह तक नहीं रुक सकती…मुझे जाना है…आए हैव टू…”. रंजू की बाँह उसके अकड़े कंधों को घेरे थी. “मैं कोशिश करता हूँ, मौना.”

“व्हाट हैपेंड माँ?” अंशुमाली खेलकर लौटा था. उसके कपड़े पसीने से गीले थे. उसने अपनी आँखें मौना के चेहरे पर गड़ा दीं. “क्या हुआ मम्मी?”

अंशु को उसकी आँखें मिली थीं. उसकी अपनी डरी, घबराई, आँखें उसे ही अकुला कर देख रही थीं. “मैं नीचे गार्डन में जाना चाहती हूँ कुछ देर…” रंजू उठ खड़ा हुआ. “न, मैं अकेले जाऊँगी तुम अंशु को देखो.”

बाग़ में अंधेरा था. रात की मर्मर-ध्वनियाँ और सरसराहटें चारों ओर थीं. लाल ईंटों का पथ उसके नंगे पैरों तले ठंडा था. कितनी बार उसने पापा को इस पथ पर पीठ-पीछे हाथ बाँधें, धीमे क़दमों घूमते देखा था. एक किनारे खड़े बड़े पीपल के पेड़ को हवा में झूमते देख कर अक़्सर कहा करते थे – कैसे दोहरा हो तालियाँ बजा रहा है! आज भी पीपल के पत्ते खड़क रहे थे. लेकिन तालियाँ नहीं. अब पीपल तालियाँ नहीं बजाएगा न बूँदों से झनकेगा. पीपल अब एक मामूली पेड़ है. अंधेरे में अकेला भूत सा खड़ा. मौना की आँखों से धारासार आँसू बहने लगे. उसका कुर्ता भीग उठा, बालों के छल्ले गालों पर चिपक गए. हर रूलाई के साथ उसका शरीर मरोड़ उठता. वह केवड़ा पेड़ तले बैठ गई. रात को ही केवड़ा-गंध आती है, पापा कहते थे. रात पड़े केवड़ा पेड़ के पास कौन जाता है? साँपों का घर होता है रात को केवड़ा, मम्मी कहतीं.  पापा हँसते, कहते – अब हम साँपों से भी कम रसिक रह गए, अगर वे हमारे बावजूद गंध गंध से खिंचे आते हैं तो क्या हम उनके जितना भी साहस नहीं कर सकते? तुम भी आओ, धर्मपत्नी, दरअसल कोई साँप-वाँप केवल सर्पिल, लरजती, सम्मोहक गंध है. मौना ने माथा केवड़े के तने से टिका दिया. एक तीखी आवाज़ गूँजी. प्रेत सी श्वेत एक बिल्ली क्यारी में किसी अनदेखे से लड़ रही थी. रंजू बाग़ की सीढ़ियों पर खड़ा था. “मौना आज रात सम्भव नहीं है. प्राइवेट प्लेन भी नहीं. फ़्लाइट शिडयूल घंटों पहले फ़ाइल करना पड़ता है. सुबह तक रुकना ही होगा.” उसने मौना की बाँह पकड़ी और वे घर की ओर चल पड़े.

“अंशु ने खाना खाया? और तुमने? अंशु हमारे साथ जाएगा.”

“अगर तुम चाहती हो तो. वैसे बच्चे ऐसे समय में…”

“ पापा उसे देखना चाहते रंजू.” मौना ने गला साफ़ किया. “मुझे ऑफ़िस जाना होगा कुछ देर के लिए. अधूरे काम ‘हैंड-ओवर’ करने हैं. पता नहीं कब लौटना होगा मेरा…” रंजू ने बाँह बढ़ा कर उसके कंधे घेर लिए. “तुम ड्राइवर को बुला दोगे? मैं कपड़े बदल कर आती हूँ.”

रंजू ने घर का उढ़का दरवाज़ा खोला. “तुम जानती हो तुम्हें ये सब करने की ज़रूरत नहीं मौना. मैं स्टीव को ईमेल कर दूँगा.”

मौना ने उसकी बाँह हल्के से अलग की. उसकी नाक, आँख और हाथ सूज गये थे. बाईं भौंह के ऊपर नील उभर आई थी. “मुझे ये ख़ुद करना है रंजू. स्टीव हांगकांग से अकेला सब कुछ नहीं सम्भाल सकता. टीम के लोगों को काम सँभलाना होगा. एक-दो दिन की बात नहीं….” उसकी साँस छाती में फँस रही थी. कमरे में अंशु पलँग पर पैर लटकाए बैठा था. उसकी आँख गीली थी, मुँह के कोने झुके हुए. “अंशु गिव मम्मी अ हग”. मौना के स्वर पर अंशु ने सिर उठाया. उसकी दुबली बाँहें मौना के इर्द-गिर्द कस गईं. मौना ने दाँत भींच कर सिसकी रोकी, उसके बाल और कंधे सहलाए. “बेटा, स्टोर में से सूटकेस निकालो. सामान पैक करना है.” अंशु का सिर फिर भी उसके कंधे पर झुका रहा.

“मौना, द कार इज हियर”. रंजू ने कमरे में घुसते हुए कहा.

अंशु को हल्के हाथों से अलग कर मौना ने आलमारी खोली. खिलते ख़ुशनुमा रंगों के कपड़ों को अलग हटा कर फीके सलवार क़मीज़ ढूँढने लगी.

“ऐसे मौक़े पर सफ़ेद रंग पहनना चाहिए. तुम्हारे पास सूटेबल कपड़े न हों तो…”

“अब कुछ भी सूटेबल नहीं है, पापा नहीं हैं….” उसका गला रुँध गया. सामान सूटकेस में सहेज कर उसने हाथ-मुँह धोए और कपड़े बदल डाले. अंशु अब भी पलँग पर बैठा था, घुटनों पर रखी किताब में आँखें गड़ाए. रंजू लैपटॉप पर टाइप कर रहा था. “मैं आती हूँ, तुम अंशु के पास रहो.”

रंजू ने लैपटॉप बंद कर दिया. “मैं तुम्हारे साथ चल रहा हूँ. अंशु गो टू बेड प्लीज़. मैं अभी मम्मी को वापस लेकर आता हूँ.”

गाड़ी में मौना ने अपनी ओर की खिड़की का काँच नीचे उतारा. नवम्बर की रूखी हवा में उसके आँसू नीचे गिरते ही सूख गये. अपने दफ़्तर पहुँच कर मौना ने ज़रूरी कामों की फ़ेहरिस्त बनाई और उन्हें निबटाने-सम्भालने में जुट गई. जब तक वह काम करती रही, उसके कानों में ठकठकाते शब्द मद्धम पड़े रहे. काम निबटा कर वह उठ खड़ी हुई. मेज़ पर एक कोने में पापा की तस्वीर रखी थी. नाक पर सरक आए ऐनक के ऊपर से भौंहों को चढ़ाए पापा देख रहे हैं. दाढ़ी- मूँछों में विलीन महीन हँसी आँखों में झलक रही है. हाथ में थमी किताब के पन्ने पर अंगुली टिकी है, कोई कविता पढ़ कर सुना रहे हैं, मम्मी नहाने के लिए खीझ रही हैं, खिड़की से धूप और हरसिंगार की गंध आ रही है… उसने अपना दफ़्तर बंद किया और चाभी सेक्रेटेरी की मेज़ पर रख दी.

‘बिल्डिंग’ की लॉबी में रंजू फ़ोन पर बात कर रहा था. “हम लोग सुबह आठ बजे तक पहुँच जाएँगे, जीजो सा. मौना ठीक है. शॉक में है. आपको और काको सा को सब सम्भालना है.” गाड़ी में रंजू ने कहा- “मम्मी से बात करोगी मौना?”

मौना ने अपनी रूखी आँखें उसकी ओर घुमाईं – “क्या बात?” क्या बात की जा सकती है अब? बात हमेशा पापा की ही होती थी- समय  से दवाई नहीं लेते, मीठा ज़्यादा खाते हैं, रात-रात भर जागते हैं, तुम ही कहो कुछ मौना. भई अब उसके कहने के लिए बचा क्या? सब तो तुमने ही कह दिया! पापा की हँसी गूँजती है.

घर पर अंशु किताब लिए बैठा मिला. मौना ने उसके हाथों से किताब ले ली, मुड़े-अकड़े हाथ- पाँव हल्के हाथों से सहलाए और उसका सिर-माथा नरम उँगलियों से थपकती रही. अंशु के सोने के बाद मौना रसोई में गई. घर में काम करने वाली रेखा सो चुकी थी. उसने कुछ रुपए घर-ख़र्च वाले डब्बे में रख दिए. दूध, अख़बार और गाड़ी साफ़ करने वाले को पैसे देने होंगे. एक कोने में रखे धनिए, पुदीने और रोज़मरी और बैसिल के गमले एक-एक कर बाहर वाले कमरे की खिड़की के नीचे रख आई. कैलेंडर में वॉटर-फ़िल्टर और फ्रिज की सफ़ाई की तारीखें लाल पेंसिल से चिह्नित की. रात को पापा अनखना कर दूध पीते, भई बच्ची, तुम वापस आ जाओ. तुम्हारी माँ तुम्हारे जाने के बाद से मुझे ही हर वक़्त बच्चा समझने लगी हैं. नहाओ, खाओ, दूध पीओ. कोई भरोसा नहीं कल से यूनिवर्सिटी के बजाए मुझे स्कूल जाने को कहने लगें! मौना ने घर का एक चक्कर लगाया. ज़ाहिर है जो ढूँढ रही हूँ, वह अब नहीं है, उसने अपना गीला चेहरा फड़कती अंगुलियों से छुआ, वह अब कहीं नहीं हैं. रंजू पीठ के बल सीधा सोया था, हल्के खर्राटे ले रहा था. मौना चुपचाप पलंग के दूसरे छोर पर लेट गई.

प्लेन से उतरते ही शुरुआती सर्दी की हवा ने मौना के सुन्न शरीर को जगा दिया. वह भूल गई थी कि पापा के जाने के बावजूद सर्दियाँ आ गई हैं. रंग और गंध मन को कुनकुना रखते हैं, सर्दियों में, बच्ची, ये शॉल, स्वेटर वग़ैरह बेकार की नहूसते हैं. मौना ने हाथ बढ़कर अंशु की जैकेट का ज़िप बंद कर दिया. अंशु ने उसका हाथ पकड़ लिया. “माँ, नानू…” घर का दरवाज़ा खुला था. सीढ़ियों के नीचे जूते-चप्पलों का अंबार लगा था. अगरबत्ती के गुच्छे गमलों में खुँसे सुलग रहे थे. पोर्च में लड़कों की भीड़ थी. पापा के विद्यार्थी. भई धर्मपत्नी, चाय बनवाओ बीस- पच्चीस. इस मौसम में तो गुरु-गृह में ही क्लास लगेगी आज! मौना के बर्फ़ से हाथों से दरवाज़ा फिसल रहा था. आँखों में नम धुँधलका था. पापा फ़र्श पर लेटे थे. इतनी ठण्ड में एक रज़ाई से क्या होगा? उन्हें पलँग पर क्यों नहीं लिटाते? सिर के नीचे तकिया है क्या? कौन कराह रहा है? क्या…? “मौना मौना”, मामी सा उसे हिला रही थी, “ऐसे नहीं करते मौना. उठो देखो, अपनी माँ को सम्भालो, मौना…”

मौना उठकर बैठ गई. पापा रज़ाई के नीचे चुपचाप लेटे थे. दरअसल अब पापा नहीं थे. मौना मामी-सा की बाँहों से निकल गई. “मैं ठीक हूँ, मामी सा. पापा को देखने दीजिए, छोड़िए मुझे.” सूजे होठों के बावजूद उसका स्वर संयत था. उसने पापा के चेहरे पर से रज़ाई हटा दी. बंद आँखें, संपुट होंठ, माथा सहल. जैसे हमेशा सोते थे. गम्भीरता से सपने देखता हूँ बच्ची, सपने हमेशा गंभीरता से देखने चाहिए, बस जीवन को लीला-भाव से लेना चाहिए. मौना ने पापा के नरम अधपके बाल सहलाए, उनकी आँखें, दाढ़ी, कंधे. अब पापा नहीं हैं, यहाँ, इस तरह, मेरे हाथों से छुए जाते हुए भी, मेरी आँखों के सामने होते हुए भी अब वे नहीं हैं. मौना ने धीरे-धीरे पापा का चेहरा ढँक दिया. मम्मी दीवार से लगी कराह रही थीं. नैना जीजी औरतों के जमघट में निशब्द रो रही थी. हॉल में रंजू काको-सा, जीजो-सा और दूसरे रिश्तेदारों के साथ खड़ा था. “अंशु अपनी नानी के पास जाओ बेटा.” अंशु का सिर उसके कंधों के बीच झुका था. मौना उठ खड़ी हुई.

“कम से कम ग्यारह पंडित तो बुलाइये काको-सा. हमारे गुरु जी आकर सब नेम- रीति बता देंगे.”

“जीजो-सा, पापा को कर्मकांड में कभी भरोसा नहीं. जो उन्होंने कभी नहीं किया, वह उनके साथ नहीं करने दूँगी.”

“मौना…” रंजू के भौंहों में बल पड़ गए.

“काको-सा, आर्यसमज से वेदपाठी जी को बुलाइए. वह और उनके साथी आकर सब करवाएँ और शांति वाचन करें.”

“ठीक कहती हो मौना, भाई सा तो पंडों को बंड- भूसंड कहते थे. उनके मन का ही हो, यही ठीक.” काको-सा की आँखें भर आईं.

“देर मत कीजिए प्लीज़. दोपहर पहले पापा को ले चलिए. तेज़ धूप उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं.” भई, इस धूप में तो हिरण भी काले हो जाएँ, इस धूप में कहीं जाने की ज़िद मत करो बच्ची, ज़रा तिपहरी तक रुको. देखो, कैसे धूप छांव की कूची से धीरे-धीरे पूरा बाग़ और चहारदीवारी पोतती है. ज़रा टिक कर बैठो, धूप का बटोना सुनो. घर के भीतर चली गई.

रसोई में शांतिबाई जी और कमला नंगे फ़र्श पर बैठी बिसूर रही थीं. “मौना बेबी- सा, मौना बेबी-सा…” शांति बाई जी उसके गले लिपट गईं. “बेबी-सा क्या हो गया… क्या हो गया” उनके रुदन से रसोई घर की बासी हवा की खटास बढ़ गई. शांतिबाई जी नैना जीजी और मौना की धाय हैं, उन्हें बचपन से सम्भाला है. दोनों की विदा पर सबसे ज़्यादा रोई हैं, तीज-गणगौर के सिंजारे नियम से भेजे हैं, और करवा चौथ पर मीठे करवे और शक्कर के खिलौने. अंशु की पैदाइश पर पीले में लिपटी मौना की नज़र उतारते पापा को कितने ताने दिए थे बेटी को दूर देश ब्याह देने के लिए. अगर तुम कभी चुनाव लड़ने का सोचो, तो अपनी शांतिबाई जी को प्रचार के लिए ज़रूर ले जाना बच्ची, उनसे बड़ा समर्थक तुम्हें नहीं मिलेगा और मेरा भी भला हो जाएगा, दिन में दो चार-बार ज़रूर तुम्हारी तारीफ़ करती हैं और मुझे कटखनी निगाह से देख जाती हैं.

“शांतिबाई जी, आपकी समझ को क्या हो गया है? रात भर के जागों के लिए चाय बनाइए. कमला, पानी गरम करो. नैना बाई-सा को हॉट वॉटर बॉटल दो. कमर अकड़ गई होगी उनकी.” शांतिबाईजी घुटनों पर हाथ रख कर कुरलाती उठीं. “आँसू पोंछिए. अपने आँसू अब हमें ख़ुद ही पोंछने हैं.” मौना का स्वर रूखा-सूखा बना रहा.

मौना बैडरूम से तकिये, मसनद ले आई, नैना जीजी के पीठ पीछे मसनद लगाया और गरम पानी की बोतल कमर के नीचे सरका दी. “चाय लीजिए, जीजी. बहुत कुछ करना है आज.”

“मौना…” जीजी का गला बैठ गया था, “मौना…”

“जीजी प्लीज़ चाय पी लीजिए.” अपनी गोद में ढलकी जीजी को मौना ने पुचकारा. तुम समझती हो कि सब कुछ छाया सा बढ़ता-घटता है लेकिन नैना नहीं, बच्ची, तुम छोटी होकर भी बड़ी रही. मौना ने मनुहारों से नैना जीजी को चाय पिलाई. शांतिबाई जी मम्मी का पैर सहला रही थीं. मौना ने मम्मी के घुटनों पर सिर टिका दिया. मम्मी के निर्जीव हाथ में हरकत हुई. वे मौना का सिर सहलाने लगीं. बड़ी मुश्किलों से मम्मी और नैना जीजी को मौना भीतर ले गई. “थोड़ा आराम कीजिए. जीजी, मामी-सा, मम्मी को देखिए. मैं बाहर देखती हूँ.” बाहर, माने पापा को. लेकिन पापा अब कहाँ? वह अलमारी से पापा के नए कपड़ों का जोड़ा निकाल लाई. बाहर वेदपाठी जी और दूसरे लोग आ चुके थे. पापा को नहलाने के लिए मौना ने गरम पानी की बाल्टी कमला के हाथों से ले ली. “बेटी तुम भीतर जाओ. यह आख़िरी सेवा हमारी है…” काको-सा और वेदपाठी जी दोनों रो पड़े. “रुकिए, पापा का कोलोन लाती हूँ. उसके बिना स्नान…” वह तेज़ी से अंदर चली गई.

बाँस की अर्थी पर लाल दुशाले में लिपटे पापा लाल-पीली मोली की डोरियों से बँधे थे. उनके विद्यार्थियों ने गुलाब और गेंदे के फूलों से लाद दिया था. फूल वहाँ रख दो, मैं छींकने लगूँगा और तुम्हारी माँ झींखने लगेगी. बस हरसिंगार और मोगरा, गंधवान यही दो फूल मेरे भाग्य में लिखे गये हैं, शुक्र है रंगों को देखने से एलर्जी नहीं है वर्ना तुम्हारी मम्मी दुनिया भर को काला-सफ़ेद कर देतीं! कंधा देने वालों की भीड़ थी. उसमें अंशु के दुबले कंधों पर बाँस का डंडा क्षण भर को टिकते देखा. उसके पैर डगमगाए और नैना जीजी के बेटों ने आगे बढ़कर अंशु को अँगोट में ले लिया. मौना पीछे पीछे चली. “न, न मौना बाई- सा” मंगल भाई-सा ने हाथ जोड़े, “श्मशान नहीं, वहाँ औरतें नहीं जाती.”

“पापा मुझे हर जगह साथ ले जाते हैं, भाई-सा.” मौना अर्थी के पीछे वाली गाड़ी में बैठ गई.

“रीति-रिवाज का कुछ तो ख़्याल करना चाहिए मौना. सबकुछ अपने मन से…” मौना ने रंजू को देखा भर, कुछ कहा नहीं. शारदीय धूप में पापा के मुँह में यम के उत्कोच के लिए रखे मोती-मूँगा चमक रहे थे.

आम और चंदन की पीली सुनहरी ओप वाली लकड़ियों में पापा खो गए. मौना ने लंबी डाँड वाली स्रुवा थामी और आग में अभिमंत्रित घी डाला. मंत्र-पाठ लकड़ी की चटचटाहट, रुदन के स्वरों में पापा चुप रहे. घर लौट कर देह पर ठंडा पानी डालने पर मौना ने जाना कि चिता की गर्मी से उसकी बाँह पर फ़फ़ोले पड़ गये थे. शाम को मौना ने सामान खोला, अपने और अंशु के कपड़े पापा की आलमारी में रख दिए. रंजू अपना सामान काको-सा के घर में रख आया था. सभी पुरुष रिश्तेदार कड़वा-ग्रास के बाद वहीं रुक रहे थे. मौना ने अपना फ़ोन निकाला, सहकर्मियों के सांत्वना के मैसेज थे. एकाध पड़ोसियों के भी. और विश्वा का. छोटा सा – इन योर सिटी, लुकिंग फ़ॉर यू इन एवरी कॉर्नर! विश्वा और मौना ने लम्बे समय तक एक ही कम्पनी में काम किया था. मौना ने विश्वा की उपस्थिति में हमेशा एक अंतर्निहित सहानुभूति, एक नामहीन ऊष्मा लक्ष्य की थी. वह सतर्क रहती थी. फिर विश्वा ने इस्तीफ़ा दे दिया. एक कॉन्फ़्रेन्स में अचानक फिर मुलाक़ात हुई. “आए डोंट वॉंट टू लूज़ साइट ऑफ़ यू”, विश्वा ने कहा था. “अब हम सहकर्मी नहीं हैं…” लेकिन क्या हैं यह अनकहा ही रहा. जब-तब मिलने लगे, विश्वा एक प्रतिद्वंदी कम्पनी में करने लगा था लेकिन दोनों जानते थे कि उनकी मुलाक़ातें नेटवर्किंग नहीं हैं. मौना के मन में दुहेलापन था, जान कर अनदेखा करने की ज़िद. लेकिन मिलना छूटा नहीं. उसने फ़ोन रख दिया और बाहर आकर पत्तल लगाने लगी. आज सबको पापा के बिना यह कसैला-फीका भोजन खाना था. अब सब दिन खाना था.

रात को हॉल में गद्दों पर स्त्रियाँ पौढ़ीं थीं. मम्मी की कनपटियों और माथे पर बादाम-रोगन की बूँदें हल्के हाथों मल कर मौना नैना जीजी की बग़ल में आ लेटी. यहीं, सुबह पापा थे, निशब्द, आँखें मूँदें. मौना धीरे से उठी. भीतर जा कर फ़ोन निकाला. कुछ देर दूसरी ओर घंटी बजती रही. “मौना? इस वक़्त कैसे? सब ठीक?” विश्वा का स्वर उनींदा था.

“पापा नहीं रहे विश्वा.”

”गॉड…कब? क्या हुआ?”

“कल शाम. हार्ट अटैक.”

“ओह गॉड…तुम मिल पाई? कहाँ हो? जयपुर में?”

“हाँ.”

“मैंने आज ही तुम्हें मैसेज किया था, मुझे पता नहीं था…”

“हाँ. मैंने देखा.”

“मैं जयपुर में ही हूँ मौना, तीन दिन, कांफ्रेंस के लिए. कुछ कर सकता हूँ तुम्हारे लिए?”

“पता नहीं. करने को कुछ नहीं है. पापा को सुबह विदा दे दी है.”

“बहुत कुछ कहना चाह रहा हूँ मौना, लेकिन तुम कल रात भर की जागी होगी, अब सोने की कोशिश करो. मैं कल फ़ोन कर सकता हूँ?”

“मैं करूँगी.”

“हम अभी भी बात कर सकते हैं अगर तुम चाहो.”

“नहीं, तुम भी आराम करो.”

“कल फ़ोन करना भूलना नहीं. मैं इंतज़ार करूँगा.”

“हाँ.”

“मौना…”

“बाय विश्वा.”

मौना ने सामान में से ढूँढकर चार्जर निकाला. फ़ोन चार्ज करने लगा कर वह बाहर निकल आई. पापा ने पिछले सालों में लॉन में तरह-तरह के पेड़ लगाए थे- आँवला, सीताफल, अमरूद, अनार. घास तो व्यर्थ पानी पीती है और रेगिस्तान में इस क़दर पानी वन्ध्य घास पर पानी बर्बाद करना? अब इन पेड़ों में देखो चिड़ियों की कैसी बस्ती है, बच्ची. ये छोटी मुनियाएँ नैना और तुम्हारी तरह झगड़ती- बतियाती हैं, और बुलबुलें और मैनाएँ तुम्हारी माँ से ज़्यादा उठाया-धरी करती हैं. वह बूढ़ा कौवा एकदम मेरे जैसा है, नीम पर बैठा सबका मुजरा लेता है! पापा के हरसिंगार से सुगंध उड़ रही थी. ओस से शॉल जब एकदम भीग गया तब मौना उठी. आकाश के छोरों पर सुबह के घाव रिस रहे थे. परछाइयाँ फीकी पड़ गई थीं.

सुबह- सुबह काको-सा, जीजो-सा के साथ रंजू और अंशु भी अस्थियाँ चुनने श्मशान गये. मौना ने चुपचाप दिग्देवताओं के लिए मीठे चावल, दही-मिठाई की सौग़ातें और आत्मा के लिए चावल के पिंड दोनों-पत्तलों में सहेज कर दे दिए. आसन, बर्तन, लिहाफ़, जूते महा ब्राह्मण के लिए अलग से. महाब्राह्मण को कुछ भी देने में पापा को एतराज़ नहीं होता. देखो कितना विचित्र विधान है, बच्ची, जिसे सब दिन अस्पृश्य मानते हैं, मरने पर उसी की चिरौरी करते हैं. यूँ यम और महाब्राह्मण को कोई कौड़ी में नहीं पूछता लेकिन अंत में उन्हें दूध-भात, अन्न-वस्त्र! ठीक है, सारे जीवन की अवहेलना का क़र्ज़ एक़बारगी उतर जाता है! शाम को अस्थि चुनने वाले कलश लेकर हरिद्वार चले गये. जाने से पहले कलश को अंतिम प्रणाम करती मम्मी गिर पड़ीं. नैना जीजी ने सिर दीवार में मार लिया. मौना सूखी आँखों सबको सम्भालती रही. उसने हल्दी वाला गरम दूध बनाया और निहोरे करके मम्मी और नैना जीजी को पिलाया. फिर वह मम्मी की रामचरित मानस ले आई और पीठिका पर टिका कर सस्वर पढ़ने लगी. कंठस्थ चौपाइयों पर मम्मी के अभ्य्स्त होंठ अनजाने हिलने लगे. नैना जीजी गरम तेल से उनके पैर मलने लगी.

रात रसोई निबटने पर मौना ने घर व्यवस्थित किया. शांतिबाई जी और कमला के साथ मिलकर कमरों में बिखरे दरी-चादरें, तकिए समेटे. दान के लिए ख़रीदे आसन, वस्त्र, चावल, दाल, शक्कर, घी और बर्तन, पत्तल-दोने-सकोरे, घर के पिछले हिस्से में बने भंडार घर में रखवाए. घर सहेजते देर हो गई. मम्मी और नैना जीजी, मामी-सा, भाभी-सा के साथ हॉल में बिछे गद्दों पर पस्त लेटे थे. मौना ने घर भर की बत्तियाँ बुझा दीं.

बाग़ में कल रात के मुक़ाबले अधिक अंधेरा था. आँवले और अनार की सुबुक छायाएँ अंधेरे में अदृश्य थीं. हरसिंगार के झाड़ पर फूल जुगनू-से झलक रहे थे. हरसिंगार तले पापा की पसंदीदा बैठने की जगह पर शाम को अस्थि-कलश रखा गया था. संगमरमर की बेंच पर राख का धूमिल वर्तुल दिखाई दे रहा था. मौना ने कुर्ते की जेब से फ़ोन निकाला.

“मौना, एट लास्ट… सारे दिन तुम्हारे बारे में सोचता रहा. “हूँ. तुम कैसी हो?”

“मैं हरसिंगार के नीचे खड़ी हूँ विश्वा. फूल झर रहे हैं. उनकी ख़ुशबू से शायद मेरे कपड़ों, बालों, देह में जज़्ब धुएँ की गंध धुल जाए.”

“मौना…”

“फूल मेरे चेहरे पर, बाँहों पर, वक्ष पर गिर रहे हैं. धुएँ की जलाँध के बावजूद मैं इन्हें सूंघ पा रही हूँ, महसूस कर पा रही हूँ. तुम्हें याद है जब हम महीनों बाद अचानक उस कांफ्रेंस में मिले थे?”

“मौना, हनी, आए नो इट इजन्ट द राइट टाइम बट तुम जानती हो कि मैं तुम्हारे बारे में…व्हाट आए फ़ील अबाउट यू…”

“हरसिंगार के फूल रात के रात झर जाते हैं, विश्वा. कल तुमने कहा था कि अगर मेरे लिए कुछ कर सको.”

“ऑफ़ कोर्स.”

“अभी आ सकते हो?”

“अभी?” इस वक़्त?”

“हाँ. सब हरिद्वार गये हैं. बाक़ी घर सोया है. बस हरसिंगार और मैं…” मौना का कंठ भर आया. पेड़ पर ज्यों-त्यों अटके फूल हवा से झरते रहे.

“मौना, आर यू…आर यू श्योर?”

“हाँ. पता मैसेज करती हूँ. सिविल लाइंस में है. सी-यू.”

घर का पता विश्वा को भेजने के बाद वह बाहर के रास्ते से भंडार घर में गई. कमज़ोर बल्ब की रोशनी में भंडार घर छायाओं से भरा था. उसने कुर्सी पर चढ़कर दीवार में बना रोशनदान खोल दिया. हरसिंगार की भीनी महक यहाँ तक आ रही थी. दरियों के ढेर से उसने एक रंग-बिरंगी दरी निकाली और बर्तन वग़ैरह सरका कर एक ओर बिछा दी. दरवाज़े पर आकर वह विश्वा का इंतज़ार करने लगी. गाड़ी रुकने की मद्धिम आवाज़ पर उसने मेनगेट धीरे से खोल दिया. “मौना…” अंधेरे में एक दूसरे को देख पाना कठिन था. मौना ने विश्वा का हाथ पकड़ लिया.

भंडार घर की पीली रोशनी में विश्वा ने मौना को देखा— काजल विहीन सूजी आँखें और पीछे को बांधे बाल. माथे और गाल की नाज़ुक त्वचा पर नील के निशान. कासनी रंग के कुर्ते पर ओस और पराग के दाग़. उसने मौना को निकट खींचकर बाँहों में ले लिया, उसके बाल खोल दिए, होंठ चूम लिए. “मौना…” विश्वा की साँस से मौना के माथे और कनपटियों के पास के रेशमी बाल लरज उठे. विश्वा की अंगुलियाँ उसके कुर्ते के काज-बटनों से उलझने लगीं. मौना ने आँखें बंद कर लीं और धीरे से ज़मीन पर बिछी दरी पर ढलक गई. दरी के लाल-पीले रंग उसकी नग्न देह के गिर्द लपटों से फैल गये. विश्वा उसकी छातियाँ, नाभि, जाँघें चूम रहा था. “मौना…हनी…” मंत्र सा गूँज उठा. आँखें मूँदे-मूँदे मौना ने हाथ से टटोलकर दीवार से सटे कुंडे में अंगुलियाँ डुबोईं और विश्वा और अपनी गुँथी देहों को घी की बूँदों से अभिषिक्त कर दिया…

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One comment

  1. क्यों, पिता के मरने के अत्यंत दुःख में भी शारीरिक ज़रूरत महसूस होती है?  क्यों उस ज़रूरत को पूरा कोई अनजाना, अनकहा रिश्ता ही कर सकता है? पूरा रिश्ता जो अचानक मौत ने अधूरा कर दिया, हमेशा का अधूरा रिश्ता जो मौत ने पूरा कर दिया? बहुत सारे सवाल उठाती कहानी।  सवाल अगर नहीं उठते अपनी समझ पर तो फिर उस समझ पर सोचा भी नहीं जा सकता, और अगर सोचा नहीं जाएगा तो नई  कहानियां भी नहीं पैदा होंगी।  औरतें जब अपनी समझ को झंजोड़ती हैं तो पुरुषों का बिगड़ना तो समझ में आता है, क्योंकि उनकी मुद्दत्तों से संजोई व्यवस्था में दरारें पड़तीं हैं। संभाले हुए आडम्बरों के चरमराकर टूट जाने का खतरा पैदा होता है।  लेकिन महिलाये क्यों इसपर इतनी आहत होती हैं? Female orgasm पर बहुत सार्थक चर्चा हो रही है। शायद यह चर्चा बहुत पहले होनी चाहिए थी। खैर, देर आये दुरुस्त आये।  इसको सिरे से नकारने के बजाये अगर इसके और पहलुओं पर औरतें रौशनी डाले तो बेहतर होगा। 

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