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दुर्गा पूजा की यादें

सुहैब अहमद फ़ारूक़ी पुलिस अधिकारी हैं, जाने माने शायर हैं, साहित्य प्रेमी हैं। आज से दुर्गा पूजा शुरू हुआ है। ज़रा उनकी यह अनुभव कथा पढ़िए-

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पुलिस ड्यूटी की अहमियत  असंगत व ग़ैर-मामूली समय ही में महसूस होती है। आम समय में तो मामूली लोग भी ‘संगत’ कर लेते हैं। अपनी डींग हाँकने का मौक़ा मिल गया है तो हांक लेते हैं। मेरे  कहने का  मतलब यह है कि साधारणत: जब दिल्ली के लोग  भोर के बाद की असाधारण निद्रा में सुखलीन होते हैं, उस समय हम लोग, सुबह छ: से नौ इलाक़े में साईरन और ब्लिंकर के साथ गश्त कर रहे होते हैं।  मगर  यह तारीफ़ ऐसे ही है जैसे कि आदमी ग़लती से तालाब में गिर जाए और झेंप मिटाने की ग़र्ज़ से कहे ‘मैं तो नहा रहा हूँ’। भला कपड़ों में भी कोई तालाब में नहाता है?  यह मॉर्निंग-पेट्रोलिंग तो बहुक्म अफ़सरान-बाला  हो रही है वरना, दिल्लीवासियों के लिए सुबह की नींद के आगे सारे सांसारिक सुख फ़ेल हैं।

तो साथियों! कल सुबह-सुबह चित्तरंजन पार्क के निवासियों की सुरक्षा करते हुए मैं थाना सीआर पार्क के सामने स्थित काली-बाड़ी चला गया। पहला चित्र वहीँ  का है। बंगाली-हिन्दू संस्कृति में काली-बाड़ी का महत्व धार्मिक पहचान के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी है। दुर्गा–पूजा के सम्बन्ध में पुलिस बंदोबस्त के दौरान केज़ुअल-टॉक्स के दौरान पता चला कि दुर्गापूजोत्सव की तैयारी पूरे वर्ष चलती हैं।  बिलकुल ऐसे ही तैयारी  पंजतन-पाक और कर्बला में आस्था रखने वाले मुसलमानों में मुहर्रम को लेकर चलती हैं। किसी इमामबाड़े का दौरा कर आइये। मुआमला दोनों ही जगह आस्था के साथ श्रद्धा का है जिसमें प्रश्न करने का प्रश्न नहीं उठता। सीआर पार्क में बड़ी छोटी कुल मिलकर दस दुर्गा-पूजा समितियां हैं,  जिनमें सर्वोत्तम पुरस्कार प्राप्त करने हेतु  ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा रहती है।

बंगाल मेरे लिए सदैव फंतासी का विषय रहा है। बंगाल से मेरे ज़ेह्न  में जो शब्द सबसे पहले कौंध मारते हैं,  वे हैं  काला जादू और काली माई। माँ बचपन में कहानी सुनाती थीं कि बंगालन जादूगरनी अपने परदेशी प्रियतम को दिन में बकरा बना खूंटे से से बाँध देती थीं और रात को वापिस मानुष बना देती थीं।  परदेशी ही प्रियतम क्यूँ बनता है या प्रियतम  परदेशी क्यूँ हो जाता है । इस पर अलग से शोध हो सकता है। कहानी का क्लाइमेक्स आने से पहले ही मैं डर और नींद के मिले जुले असर के हवाले हो कर सो जाता था। बड़ा होने पर ब्लैक एंड व्हाईट दूरदर्शन पर उन दिनों प्रसारित होते उपन्यास ‘श्रीकांत’ आधारित धारावाहिक ने मेरे किशोर होते हुए मन पर अमिट छाप छोड़ी थी जो अभी तक रोमांचित करती है। उसी वय में मैंने यह उपन्यास पढ़ डाला था। बंगाली साहित्य मेरे निजी संग्रह में अलग मुक़ाम रखता है।  हाँ खेदजनक यह है कि मैं बंगाली साहित्य को हिंदी में पढ़ता हूँ। बिलकुल वैसे ही जैसे हिंदी मीडियम से इंग्लिश में ‘ऐमे’ करना।

मुद्दे को कालीबाड़ी पर ही रखते हैं।  तो साहिबान! सीआर पार्क के शिब मंदिर व कालीबाड़ी पहुंचकर, जुलाई सन दो हज़ार दो में किये कोलकाता-भ्रमण की स्मृति ताज़ा हो गयीं। किसी मुक़दमे की तफ़्तीश  में दो बार जाना हुआ था। मैं अपनी ड्यूटी के ऑड्स को  ‘ग़लती से तालाब में गिरकर नहाना’  के ईवेन्स में बदल लेता हूँ। इन दोनों अवसरों पर मैं ‘कोलकाता एंड अराउंड’  ख़ूब और ख़ूब घूमा। कोलकाता एक समय में लन्दन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का दूसरा बड़ा शहर रहा है। कालीघाट, दक्षिणेश्वर, बेलूड़ घाट का ज़िक्र करना चाहता हूँ । लगभग, हर कालीबाड़ी, दक्षिणेश्वर (कोलकाता के निकट) स्थित काली मंदिर की प्रतिकृति होती है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर का इतिहास भारतीय प्रथम स्वंत्रता संग्राम के इतिहास जितना ही पुराना है। पुराने मन्दिर सदैव से आकर्षित करते  हैं मुझे। मेरी जन्मस्थली व ननिहाल इटावा में भी सैकड़ों साल पुराने कई मंदिर हैं। बहुत बार मंदिर के कार्यक्रमों में शामिल हुआ हूँ। बिना कार्यक्रम के मंदिरों के गर्भगृहों के  सन्नाटों  में एक अजीब सा सम्मोहन होता है।   त्योहारों में भी सतनारायण की कथाओं में  बहुत बार  ‘सियापत रामचन्द्र की जै’ बोली है, राम-लीला लगातार देखी है, रावण लगातार फूँका है। ये सब  बड़ों को बिना बताए किया करता  था। ‘बड़ों’ को बताने में बात ‘छोटी’ क्यूँ हो जाती है ? यह प्रश्न क्यूँ आ जाते हैं? शायद यह जीवन ही एक प्रश्न है। कितना ही बड़े हो जाओ उम्र में या हैसियत में,   इन सवालात की तादाद की लम्बाई  छोटी नहीं होती।

राजेश रेड्डी साहब के भी यही यक्ष प्रश्न हैं :-

मेरे ख़ुदा मैं अपने ख़यालों को क्या करूँ

अंधों के इस नगर में उजालों को क्या करूँ

दिल ही बहुत है मेरा इबादत के वास्ते

मस्जिद को क्या करूँ मैं शिवालों को क्या करूँ

मैं जानता हूँ सोचना अब एक जुर्म है

लेकिन मैं दिल में उठते सवालों को क्या करूँ

कोलकाता-जात्रा में, मैं रामकृष्ण आश्रम, बेलूड़ मठ भी गया। वहाँ अध्यन अध्यापन का कार्य ज़ोर-ओ-शोर परंतु असीम शान्ति से हो रहा था। चहुँदिक् गेरुआ परिवेश नज़र आ रहा था  मगर, साथ ही हुगली नदी मटमैले रंग में लबालब भरी हुई पूरी शान्ति से बह रही थी। जलराशि की प्रचंडता डरा रही थी। एक बार तो लगा कि बंगाल की खाड़ी है। मगर आश्रम के वासियों और धारा का अनुशासन आश्वस्त कर रहे थे कि संख्या एवं परिमाण में अधिक होना ही बलवान होना मात्र नहीं है। इस शे’र में इसकी व्याख्या निहित है :-

कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत

जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है (नातिक़ लखनवी)

इस मठ के स्थापत्य में सभी प्रमुख धर्मों का सम्मिश्रण है। इसके एक कोने में हज़रत बरकन ग़ाज़ीशाह रहमतुल्लाह का मज़ार भी है। दूसरी तस्वीर बेलूर मठ की है।

दक्षिणेश्वर निस्संदेह प्राचीन है मगर, कालीघाट जाए बिना आपकी कोलकाता-जात्रा पूर्ण नहीं मानी जायगी।  मैं भी गया। साथी के रूप में सिपाही जितेन्द्र साथ थे। दर्शन सुविधाजनक करने हेतु दो सौ रुपये बाहर बैठे हुए उप-पंडितजी को दिए गए। हर बड़े धार्मिक केंद्र के बीच भगवान और भक्त के मध्य बाज़ार क्यूँ रहता है?  रास्ते में बकरे और उनके बच्चे बंधे हुए थे जिनको,  भक्त अपनी अपनी हैसियत से क्रय कर रहे थे। उप-पंडितजी हमको क़तार में लगाकर अपना शुल्क जस्टिफाइड करके चले गए। वह तो ‘स्टाफ’ से  होना काम आ गया।  पुलिस के थ्रू, डाइरेक्ट एंट्री मिल गयी। माँ के दर्शनों के किये तीन लाइनें थीं।  आम, ख़ास और ख़ासतरीन। आम रस्सी के बाहर, ख़ास रस्सी के अन्दर और ख़ासतरीन नीचे बिलकुल माँ के पास से दर्शन कर रहे थे।

भीतर भक्तों के समुद्र में हम दोनों  संगी बिछुड़ गए। मैं ‘सिर्फ़ फल खाने वाले’ एक पंडितजी के  भाग्य में आ गया। उन्होनें  मुझसे पाप लगने का भय दिखा-दिखा कर कम से कम तीन सौ रूपए चढ़ावे में चढ़वा दिए। मुझे पाप का तो भय नहीं था व्यर्थ में अपनी जन्मना पहचान खुलने की आशंका थी। उन पंडितजी की ‘सिर्फ़ फल खाने’ की विशिष्टता यह थी कि आम बंगाली पण्डित चावल खाते हैं जो एक सुलभ्य व सस्ता खाद्य है। फल महंगा है, मतलब फल खाने वाले पंडितजी के थ्रू ‘ऊपर के दरबार’ में पुण्य जल्दी और बिना किसी कटौती के पहुंचेगा। उन्हीं पंडितजी ने एक अभिमंत्रित गंडा मेरे हाथ पर सौ रूपए में बंधवाकर साथ साथ एक गुप्त मन्त्र दिया और कहा कि इसको ‘घर’ जाकर ‘मन्त्र’ पढ़ते हुए खोलना,  अभीष्ट फल  प्राप्त होगा। खैर बाहर जितेन्द्र मिल गए। उनके  पैसे ज्यादा तो खर्च नहीं हुए मगर अभीष्ट फल वाला यंत्र उनके भी बंधा था। विचार-विनिमय के उपरान्त गुप्त मन्त्र अगुप्त हो गया। गंडे  खोल कर देखे तो अभीष्ट फल नारियल के टुकड़े मिले।

शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के मंदिर कालीघाट आते हुए मातृ शक्ति के दो अन्य रूपों के भी दर्शन हुए थे।  मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी का मुख्यालय और सोनागाछी भी कालीघाट के आस-पास ही हैं। नो कमेंट करते हुए बताता चलूँ कि इन  दोनों स्थानों को आप गूगल कर अपनी जानकारी अपडेट कर सकते हैं।

जितेन्द्र भाई साहब तो शुद्ध शाकाहारी थे। पूरे भारतवर्ष में मारवाड़ी भोजनालय आपको कनफर्म्ड निरामिष भोजन उपलब्ध करवाते हैं। मैं स्थानीय भोजन की तलाश में एक बंगाली भोजनालय में घुस गया।   फ़िश-करी मंगवाई मगर यह क्या?  मछली तो आँख और पूंछ समेत थी लगा कि फड़फड़ा कर गोद में आ जाएगी। एग-करी से संतोष प्राप्ति कर मैंने शेष दिनों मारवाड़ का ही आश्रय लिया। हां स्ट्रीट फ़ूड में बंगाली मिष्ठान्न का भरपूर आनन्द लिया। तीसरी तस्वीर कोलकाता विचरण की है। यह हावड़ा का एक फ्लाई ओवर है। इसके नीचे मैंने  कार के वज़न और आकार के बराबर मछलियाँ बिकते हुए देखी थीं।

हावड़ा के उपनगर सलकिया में जितेन्द्र के साथ ‘मुझसे शादी करोगी’ फ़िलिम देखी थी। कम से कम बॉलीवुड ने भारत को एक कर रखा है। पिक्चर-हॉल में बैठकर बिलकुल भी नहीं लगा कि आप बंगाल में हो बस,  दर्शक सलमान और अक्षय कुमार में बंटे हुए थे।

सीआर पार्क नवरात्र के दिनों पूरे तौर पर बंगाल हो जाता है। चप्पा चप्पा दुर्गा-मय होर्डिंग्स, बंगाली परिवेश, बंगाली फूड्स से भरपूर। थाना सीआर पार्क का भी यही वार्षिक बड़ा इंतज़ाम है तो दोस्तों लगे हुए हैं इसी बन्दोबस्त में। मातृशक्ति पूजन के इस पावन काल में सभी मानुषों से यही प्रार्थना करता हूँ कि माँ के साथ अपनी माटी और बेटियों की भी क़द्र करें।

शुभो दुर्गा पूजा !

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2 comments

  1. शुक्रिया
    जानकीपुल

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