अनामिका की कविता ‘ब्रेष्ट कैंसर और पवन करण की कविता ‘स्तन’

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अनामिका की यह कविता और पवन करण की कविता ‘स्तन’ प्रस्तुत है जिसको लेकर शालिनी माथुर, दीप्ति वर्मा, उद्भ्रांत के पाठ आ चुके हैं और वाद-विवाद का सिलसिला चल पड़ा है- जानकी पुल.
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ब्रेस्ट कैंसर
(वबिता टोपो की उद्दाम जिजीविषा को निवेदित)
दुनिया की सारी स्मृतियों को
दूध पिलाया मैंने,
हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर
मेरे इन उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुपफाओं में
जाले लगे!
कहते हैं महावैद्य
खा रहे हैं मुझको ये जाले
और मौत की चुहिया
मेरे पहाड़ों में
इस तरह छिपकर बैठी है
कि यह निकलेगी तभी
जब पहाड़ खोदेगा कोई!
निकलेगी चुहिया तो देखूँगी मैं भी,
सर्जरी की प्लेट में रखे
खुदे-पफुदे नन्हे पहाड़ों से
हँसकर कहूँगी-हलो,
कहो, कैसे हो? कैसी रही?
अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी!
दस बरस की उम्र से
तुम मेरे पीछे पड़े थे,
अंग-संग मेरे लगे ऐसे,
दूभर हुआ सड़क पर चलना!
बुल बुले, अच्छा हुआ, पफूटे!
कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम के बाहर।
मेरे ब्लाउज में छिपे, मेरी तकलीपफों के हीरे, हलो।
कहो, कैसे हो?’
जैसे कि स्मगलर के जाल में ही बुढ़ा गई लड़की
करती है कार्यभार पूरा अंतिम वाला-
झट अपने ब्लाउज से बाहर किए
और मेज पर रख दिए अपनी
तकलीपफ के हीरे!
अब मेरी कोई नहीं लगतीं ये तकलीपफें,
तोड़ लिया है उनसे अपना रिश्ता
जैसे कि निर्मूल आशंका के सताए
एक कोख के जाए
तोड़ लेते हैं संबंध
और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है!
जाने दो, जो होता है सो होता है,
मेरे किए जो हो सकता था-मैंने किया,
दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने!
हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुपफाओं में!
लगे तो लगे, उससे क्या!
दूधो नहाएँ
और पूतों फलें
मेरी स्मृतियाँ!



 पवन करण की कविता ‘स्तन’

इच्छा होती तब वह उन के बीच धंसा लेता अपना सिर
और जब भरा हुआ होता तो तो उन में छुपा लेता अपना मुंह  
कर देता उसे अपने आंसुओं से तर 
वह उस से कहता तुम यूं ही बैठी रहो सामने 
मैं इन्हें जी भर के देखना चाहता हूँ 
और  तब तक उन पर आँखें गडाए रहता 
 जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से
या लजा कर अपनी हाथों में छुपा नहीं लेती उन्हें
अन्तरंग क्षणों में उन दोनों को
हाथों में थाम कर वह उस से कहता
ये दोनों तुम्हारे पास अमानत हैं मेरी
मेरी खुशियाँ , इन्हें सम्हाल कर रखना
वह उन दोनों को कभी शहद के छत्ते
तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता
उन के बारे में उसकी बातें सुन सुन कर बौराई — 
वह भी जब कभी खड़ी हो कर आगे आईने के
इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती
वह  कई दफे सोचती इन दोनों को एक साथ 
उसके मुंह में भर दे और मूँद ले अपनी आँखें 
वह जब भी घर से निकलती इन दोनों पर 
दाल ही लेती अपनी निगाह ऐसा करते हुए हमेशा 
उसे कॉलेज में पढ़े बिहारी आते याद 
उस वक्त उस  पर इनके बारे में 
सुने गए का नशा हो जाता दो गुना 
वह उसे कई दफे सब के बीच भी उन की तरफ 
कनखियों से देखता पकड़ लेती 
वह शरारती पूछ भी लेता सब ठीक तो है 
वह कहती  हाँ जी हाँ 
घर पहुँच कर जांच लेना
मगर रोग , ऐसा घुसा उस के भीतर
कि उन में से एक को ले कर ही हटा देह से
कोई उपाय भी न था सिवा इस के
उपचार ने उदास होते हुए समझाया
अब वह इस बचे हुए एक के बारे में
कुछ नहीं कहता उस से, वह उस की तरफ देखता है
और रह जाता है, कसमसा कर  
मगर उसे हर समय महसूस  होता है
उस की देह पर घूमते उस के हाथ
क्या ढूंढ रहे हैं, कि इस वक्त वे
उस के मन से भी अधिक मायूस हैं
उस खो चुके के बारे में भले ही
एक-द्दोसरे से न कहते हों वे कुछ
मागत वह, विवश, जानती है
उसकी देह से उस एक के हट जाने से
कितना कुछ हट गया उन के बीच से

15 COMMENTS

  1. संपादक जी से निवेदन है कि उपरोक्त कविता
    को ब्लॉग मेँ प्रकाशित करने की कृपा करेँ/
    कविता स्वरचित है

  2. जब नौ
    बरस की थी
    मैँ
    तभी मुझे
    एहसास
    हुआ
    कि जरुर कुछ
    खास है
    मेरी इन नन्हीँ
    छातियोँ मेँ
    जिसे अक्सर
    मसल देते थे
    पड़ोस वाले अंकल/
    पंद्रह तक
    होते होते
    मैँ समझ ही गयी
    कि क्योँ हर
    तीसरा आदमी
    घूरता रहता
    है इन्हेँ
    ललचायी नजरोँ से/
    क्योँ कहती है
    माँ
    कि ओढ़ा कर
    दुपट्टा
    बाजार जाते वक्त/
    सच तो ये है
    कि लोगोँ ने
    इस छाती को
    घूर घूर कर
    मुझे पंद्रह मेँ ही
    जवान बना दिया/
    आज ये तब
    कहती हूँ
    जब
    मेरा प्रेमी
    कहता है
    कि
    तू खूबसूरत है
    और ये
    बहुत खूबसूरत हैँ//

  3. सवाल ये है कि कविता क्या है?
    क्या कविता का काम सेक्स के माध्यम से जुगुप्सा पैदा करते हुए व्यक्तिगत कुंठाओं को परोसना है तो ये दोनों कवि शरीर के और भी अंगों को लेकर और भी बहुत कुछ लिख सकते हैं। वो सब लिखा हुआ क्या कविता कहलायेगा? क्या ये कवितायेँ( जो कवितायेँ नहीं हैं।)उस औरत की पीड़ा को दिखाती है या फिर ये इन कवियों की व्यक्तिगत मनोदिशा में हुई पीड़ा और कुंठा को दिखाती हैं? शब्दों के इस चुनाव से किसी पीड़ित या बविता टोपो की जिजीविषा और उसका बीमारी से लड़ने का संघर्ष कहीं पीछे छूट गया।
    उम्मीद है, अनामिकाजी और पवन करणजी को अकविता का दौर तो याद होगा या कम से कम उसके बारे में पढ़ा होगा।

  4. सवाल ये है कि कविता क्या है?
    क्या कविता का काम सेक्स के माध्यम से जुगुप्सा पैदा करते हुए व्यक्तिगत कुंठाओं को परोसना है तो ये दोनों कवि शरीर के और भी अंगों को लेकर और भी बहुत कुछ लिख सकते हैं। वो सब लिखा हुआ क्या कविता कहलायेगा? क्या ये कवितायेँ( जो कवितायेँ नहीं हैं।)उस औरत की पीड़ा को दिखाती है या फिर ये इन कवियों की व्यक्तिगत मनोदिशा में हुई पीड़ा और कुंठा को दिखाती हैं? शब्दों के इस चुनाव से किसी पीड़ित या बविता टोपो की जिजीविषा और उसका बीमारी से लड़ने का संघर्ष कहीं पीछे छूट गया।
    उम्मीद है, अनामिकाजी और पवन करणजी को अकविता का दौर तो याद होगा या कम से कम उसके बारे में पढ़ा होगा।

  5. सवाल ये है कि कविता क्या है?
    क्या कविता का काम सेक्स के माध्यम से जुगुप्सा पैदा करते हुए व्यक्तिगत कुंठाओं को परोसना है तो ये दोनों कवि शरीर के और भी अंगों को लेकर और भी बहुत कुछ लिख सकते हैं। वो सब लिखा हुआ क्या कविता कहलायेगा? क्या ये कवितायेँ(जो कवितायेँ नहीं हैं।)उस औरत की पीड़ा को दिखाती है या फिर ये इन कवियों की व्यक्तिगत मनोदिशा में हुई पीड़ा और कुंठा को दिखाती हैं? शब्दों के इस चुनाव से किसी पीड़ित या बविता टोपो की जिजीविषा और उसका बीमारी से लड़ने का संघर्ष कहीं पीछे छूट गया।
    उम्मीद है, अनामिकाजी और पवन करणजी को अकविता का दौर तो याद होगा या कम से कम उसके बारे में पढ़ा होगा।

  6. 'कथादेश' में इन कविताओं पर विमर्श का चलता दौर अभी थमा नहीं है. इन कविताओं की वहां जमकर आलोचना हो रही है. सचमुच ये कविताएँ अभीष्ट से दूर जा जुगुप्सा जगाती हैं, अश्लीलता और देहदर्शन के गणित में उलझ सन्देश देने में असफल है, कुख्याति इसकी तय है.

    पवन करण तो पुरुष हैं, पर महिला होकर भी अनामिका एक व्यथित नारी के दारुण कष्ट और मनोजगत को सेक्स रंजित कर बड़ा ही आपत्तिजनक कार्य कर जाती हैं. शब्दों से खेलिए, पर भावनाओं से नहीं. अब रीतिकाल में लौटाने और लिपटाने की कोशिश में मत लग जाइये. यह याद रखे कि रीति काल में भी स्त्री की भावनाओं से खिलवाड़ की काव्य-रीति भले ही रही, पर जग-रीति यह नहीं थी. सामंती मिजाज़ राजाओं के भड़वों की तरह भले ही डर-भय-और चापलूसी में तत्कालीन कवियों ने अपनी आत्मा को बेच आत्मा के विरुद्ध भी बांचा-बेचा हो. पर यह तो लोकतान्त्रिक समाज है, इसमें यह सब चलाने की कोशिश मत करिए…

  7. वाह अति सुंदर…..दोनो रचनाओं की उत्क्रष्टता में भेद करना अनावश्यक बुद्धिमत्ता दर्शाना होगा….

  8. anamika ji aur pankaj karan ki kavita ka subject bhale hi ek ho kintu unka treatment alag hai. inheb alag alag hi dekha jana chahiye. dukh me to bhartiye parivar ekatm ho jata hai. meri do sahkarmiyon ko cancer hua , ek ko bonemarrow cancer aur dusari ko breast cancer. dusari bach gai, uske bachche khush huye ki maa bach gai. anamika ji hamare samay ki ek atyant samvedanshil kavyitri hain. unki kavita ko ek brihtar sandarv me samjhe jane ki jarurat hai.

  9. अनामिका की कविता दुखः के उस महासागर तक ले जाती है…जहाँ तक जाते-जाते यह बोध ही नहीं होता कि उस विषय पर पवन की तरह भी सोचा जा सकता है। यह उस कविता का अपना भाव बोध और सफलता है।

  10. हिला देने वाली तकलीफ़ का बयां करती अनामिका जी की कविता निश्चित ही उस जरूरी पहलू को रखती है जिसके मायने मौजूदा समाज में एक स्त्री होने की त्रासदी की कथा हो जाते हैं। एक ही स्थिति पर लिखी ये दोनों कविताएं दो भिन्न द्रष्टियों को रख रही हैं।

  11. अनामिका- एक महिला- जानती है इनके होने, ना होने का दर्द, उदासी, माया, भोग, रोग. पवन- एक पुरुष- वह भी जानता है इसके होने ना होने का रोग, भोग और सोग. एक के बदन में है, एक के भावन मे है- इसलिए अंतर है. स्तन मे नहीं, स्तन और स्त्री के लिए हमारी सोच को लेकर. स्त्री- स्तन, योनि, अधर, नयन से आगे निकली ही नही है. निकलती है तो सीधे मां बन जाती है.हिन्दी का विरले ही कोई कवि होगा, जो स्त्री पर अपनी अक्विता नहीं लिखता और फिर बाद में उसके पहाडों और खाइयों में गुम हो जाता है.

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