रोहज़िन : मुंबई और यथार्थ की कहानी

उर्दू के लेखक रहमान अब्बास का लेटेस्ट नॉवेल रोहज़िन' जल्द ही हिंदी में आने वाला है

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हाल में मैंने उर्दू के लेखक रहमान अब्बास के लेटेस्ट नॉवेल ‘रोहज़िन’ पर लिखा था। जिसे यहाँ पढ़ा जा सकता है। आज ललिता दासगुप्ता (जो डिफ़ेंस रिसर्च एंड डेवलेपमेंट ऑरगेनाइजेशन, दिल्ली में सांइटिस्ट हैं) ने एक टिप्पणी लिख भेजी है। आप भी पढ़िए – त्रिपुरारि
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रोहज़िन उर्दू लेखक रहमान अबबास का एक ऐसा उपन्यास है जो अंतर-आत्मा में चलते हुए निरन्तर द्वंद्व को अत्यन्त भावप्रवण, आध्यात्मिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करता है। यह केवल युवा युगल की प्रणय कथा नहीं, बल्कि व्यक्ति की जीवन यात्रा के अनगिनत अनुभवों को जोड़ती हुई संस्मरण गाथा है।

यह मुंबई की भी कहानी है जो अपने आप में कितने ही रहस्य छुपाये हुए है। मुम्बई एवं कोंकण में बसी यह कहानी वहां के जन्मासन की सुन्दर अभिवक्ति है।  एक ऐसी मुंबई जो सब को अपने अन्दर समेट लेती है। जो यहाँ एक बार आया यहीं का हो जाता है। चाहे कैसी भी परिवेश हो एक छोटा सा कोना यहाँ हर किसी के लिए है। मुंबई  जिसने कई अच्छे बुरे दिनों को देखा है एक मूर्ति की तरह चित्रित की है। मुहम्मद अली रोड की मुंबई से बहुत से लोग अन्जान होंगे लेकिन लेखक का सजीव चित्रण पाठक को उसकी गली गली से परिचित करा देता है।

कथा के नायक असरार की आँखों में बसे सपने मुंबई शहर में कभी तिलिस्म कभी जादू और कभी कठोर यथार्थ बन जाते हैं। स्वप्न ओर यथार्थ का यह ताना बना मन को छू जाता है। असरार का सफ़र सिर्फ़ गाँव से महानगर का सफ़र नहीं बल्कि एक अनगद किशोर का एक ज़िम्मेदार वयस्क में बदलने का सफ़र है जो रिश्तों,वयवहार प्रकुर्ती प्रेम तथा सुप्त इच्छाओं से गुज़र कर अलोकिक प्रेम को पहेचनता है।

रोहज़िन कई धार्मिक एवं आध्यात्मिक मान्यताऔं का गहन अध्यन है जो की अंतत: यह निष्कर्ष देता है की मानव मन एक जटिल रहगुज़र है। जिस पर हर व्यक्ति अपना अपना सत्य खोजता हुआ भटकता है और कभी मरीचिका कभी यथार्थ के बीच उसे अपनी मंजिल मिल भी जाती है, जैसे हिना के पिता युसुफ़ को अंधकार में ही अपना सच मिलता है। लेखक ने इस का अध्ययन किया है और बेहद कुशलता से कहानी में धर्म आस्था, प्रेम को एक सूत्र में बांधा है। धाराप्रवाह बहती रोहज़िन की कहानी एक कविता की तरह मन को भावविभोर कर देती है।

रोहज़िन उर्दू में बहुत लोकप्रिय हुआ है। पाठकों ने इसे बहुत सराहा और पसंद किया है। जल्दी ही हिंदी अनुवाद उपलब्ध होगा।

– ललिता दासगुप्ता

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