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युवा शायर #14 सौरभ शेखर की ग़ज़लें

आज युवा शायर सीरीज में पेश है सौरभ शेखर की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ======================================================

ग़ज़ल-1

भई देखो इस बात में कोई दो मत नईं
प्यार छुपाया जा सकता है, नफ़रत नईं

सच सुनने की हरगिज़ उसकी हसरत नईं
और तकल्लुफ़ करना अपनी आदत नईं

यार कमाया है हमको तो ख़र्च करो
संदूकों में रखने की हम दौलत नईं

घर से बाहर निकले तो मालूम हुआ
एक सड़क है दुनिया, कोई पर्वत नईं

कुछ इच्छा भी तो हो मिलने-जुलने की
वर्ना ऐसा थोड़ी है कि फुर्सत नईं

एक ज़रा सा दम घुटता सा लगता है
बाक़ी इस माहौल से हमको दिक्क़त नईं

सामानों के बीच कहाँ तू आ बैठा
‘सौरभ’ इस बाज़ार में तेरी क़ीमत नईं

ग़ज़ल-2

बहुत चारा है, बेचारे नहीं हम
लड़ाई में अभी हारे नहीं हम

इबारत काग़ज़ों पर है हमारी
हवा में तैरते नारे नहीं हम

नमक तो ज़िन्दगी ने ख़ूब घोला
मगर हैरत है कि खारे नहीं हम

नज़ाकत से बरतना हम गुलों को
ऐ दुनिया ईंट या गारे नहीं हम

यही हासिल है अपनी शायरी का
किसी नक़्क़ाद के प्यारे नहीं हम

बताओ अब कहाँ ढूंढोगे हमको
सरापे में भी तो सारे नहीं हम.

ग़ज़ल-3

जीवन समतल हो, कब ऐसा संभव होता है
पर्वत का, खाई का इसमें अवयव होता है

अच्छा निर्णय अनुभव से ही होता है लेकिन
निर्णय कोई बुरा हो तब ही अनुभव होता है

धरती का संगीत सुनो पौ फटने से पहले
मद्धम रागों का धुन कितना नीरव होता है

घबराहट होती है कुछ लोगों के घर जा कर
इतनी शानो-शौकत, इतना वैभव होता है

प्रीत निभाई है मेरे जैसे मनमौजी से
सच कहता हूँ तुम पर मुझको गौरव होता है.

ग़ज़ल-4

चल पड़ी जब हवा, थोड़ा अच्छा लगा
इक परिंदा उड़ा, थोड़ा अच्छा लगा

एक माली अकेला मिला पार्क में
उससे बोला-सुना थोड़ा, अच्छा लगा

हमको सोचों में डूबा हुआ देख कर
एक बच्चा हँसा, थोड़ा अच्छा लगा

घर में ऐसी ख़मोशी थी छाई हुई
कांच का टूटना, थोड़ा अच्छा लगा

ग़म में इस बार भरपूर ख़ुश्की मिली
ग़म का ये ज़ाइक़ा, थोड़ा अच्छा लगा

बात पहली हमें रास आई नहीं
दूसरा मश्वरा थोड़ा अच्छा लगा.

ग़ज़ल-5

पहन के ख़ामुशी तनहाई ओढ़ ली मैंने
वो क्या सबब था कि रुसवाई ओढ़ ली मैंने

वही जो होता है अक्सर पुराने मर्ज़ों में
ख़ुद एक रोज़ मसीहाई ओढ़ ली मैंने

मैं ऐसी अजनबी दुनिया में और क्या करता
नज़र पे अपनी शनासाई ओढ़ ली मैंने

पहाड़ जैसी अना पहले ही से थी मुझमें
अब उस पे इल्म की इक खाई ओढ़ ली मैंने

जब अपने सपनों को साकार कर नहीं पाया
ग़ज़ल की शाल मिरे भाई ओढ़ ली मैंने

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