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इतिहास पृष्ठभूमि है तो साहित्य उस पर पड़ने वाला प्रकाश है- त्रिलोकनाथ पाण्डेय

‘प्रेम लहरी’ के लेखक त्रिलोकनाथ पाण्डेय से युवा लेखक पीयूष द्विवेदी की बातचीत पढ़िए. यह उपन्यास राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर उपलब्ध है- मॉडरेटर

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सवाल आपने अपनी पहली ही किताब के लिए ऐतिहासिक प्रेम कहानी चुनी, कोई ख़ास कारण?

त्रिलोकजी – इसके कई कारण हैं। पहला, मैं भारत सरकार के गुप्तचर ब्यूरो में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बहुत संवेदनशील मुद्दों को डील करता था। मैं उन विषयों पर सार्वजनिक रूप से कुछ बोल नहीं सकता था। दूसरा, एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते समसामयिक सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर कुछ लिखना भी मेरे लिए संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में ऐतिहासिक कथानक मुझे कुछ सुरक्षित लगे। तीसरा, कुछ ऐतिहासिक व्यक्तित्व, जैसे पंडितराज जगन्नाथ, कूटनीतिज्ञ कौटिल्य, गीतगोविन्द के गीतकार जयदेव, औरंगजेब की बागी बेटी जेबुन्निसा उर्फ़ मक्फी, वगैरह। इनमे पंडितराज जगन्नाथ पर सबसे पहले लिखा क्योंकि मुझे लगता है इतिहास में सबसे ज्यादा अन्याय इन्हीं के साथ हुआ है। आगे अभी हाल में, मैंने जासूसी के जनक चाणक्य पर अंग्रेजी में एक शोधपरक जासूसी उपन्यास लिखा है – Chanakya’s Spies – जो प्रकाशनाधीन है और जिसका हिन्दी रूपान्तरण आजकल मैं ‘चाणक्य का चक्रव्यूह’ नाम से लिख रहा हूँ। मेरी अगली योजना जयदेव के गीतगोविन्द पर आधारित एक ललित उपन्यास लिखने की है जो राध-कृष्ण की कहानी पर एक अभिनव प्रयोग होगा। मुग़ल सम्राट औरंगजेब की बागी बेटी जेबुन्निसा जो मक्फ़ी (=छुपी हुई) उपनाम से फारसी में कविता करती थी, मुझे बहुत आकर्षित करती है, उसकी आह-कराह मैं अपने दिल की गहराइयों में निरन्तर सुनता हूँ। उसके ऊपर एक आत्मकथात्मक उपन्यास लिखे बिना मुझे चैन नहीं। यह सब ऐतिहासिक उपन्यास लिख लूँगा तो तब मैं सामाजिक मुद्दों पर आऊंगा जिसमें प्रमुख है में मौत और मोक्ष से जुड़े व्यवसाय, उसमे संलग्न लोग और पुरोहित वर्ग पर एक शोधपरक उपन्यास। इस बीच, शिव की कथा का एक नवीन विश्लेषण करता मेरा उपन्यास अंग्रेजी में है – Becoming God जो शीघ्र ही आ रहा है। तो, एक तरह से आप कह सकते हैं कि मैं मूलतः ऐतिहासिक विषयों पर उपन्यास लिखना पसंद करता हूँ।

सवाल ‘प्रेम लहरी’ में कितना इतिहास है और कितनी कल्पना?

त्रिलोकजी – इस उपन्यास में इतिहास नींव है और साहित्य उस पर उठी हुई इमारत है। इतिहास पृष्ठभूमि है तो साहित्य उस पर पड़ने वाला प्रकाश है। कल्पना और जनश्रुतियों के धागों से इतिहास की जमीन पर बुनी हुई यह प्रेमकथा है। अगर प्रतिशत में जानना चाहें तो कह सकते हैं की इस कथा में इतिहास और कल्पना का अनुपात 50-50 है।

सवाल क्या कुछ शोध भी करना पड़ा इस कहानी के लिए?

त्रिलोकजी – बहुत शोध करना पड़ा। ऐसे उपन्यास बिना गहन शोध के नहीं लिखे जा सकते। मेरे घर में पड़े संस्कृत के कुछ ग्रन्थों के आलावा दिल्ली के सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी, तीनमूर्ति भवन की लाइब्रेरी, जेएनयू का केन्द्रीय पुस्तकालय बहुत उपयोगी रहे। इसमें मेरी बेटी डॉ संज्ञा और बेटे अनुतोष ने बड़ी सहायता की।

सवाल ‘प्रेम लहरी’ हिन्दू-मुस्लिम प्रेम कहानी पर आधारित है, आज के समय में अक्सर ऐसे संबंधों के त्रासद अंत की ख़बरें आती रहती हैं। क्या राय रखते हैं आप इसपर?

त्रिलोकजी – आपने सुना है न –

“भूख न देखै बासी भात, प्यास न देखै धोबी घाट।

नींद न देखै टूटी खाट, प्रेम न देखै जात कुजात।”

प्रेम किसी जाति धर्म का गुलाम नहीं होता। ऐसे संबंधों के त्रासद अंत के बारे में सचेत होते हुए भी प्रेमीजन प्रेम में अचेत होते हैं। प्रेम करने वाले परिणामों की गणना करके प्रेम नहीं करते। प्रेम की वेदी पर प्रेमीजन सदैव से अपने प्राणों की आहुति देते आये हैं। यह आज भी जारी है। इसमें नया कुछ नहीं है।

सवाल आप भारत सरकार के गुप्तचर विभाग में कार्यरत रहे हैं, सो आपको नहीं लगता कि आप थ्रिलर बेहतर लिख सकते हैं?

त्रिलोकजी – मुझे लगता है थ्रिलर में साहित्यिक उत्कृष्टता कम होती है और हिस्टिरिकल उत्तेजना ज्यादा होती है। यद्यपि मेरे आगामी उपन्यास Chanakya’s Spies और उसका हिन्दी रूपान्तरण ‘चाणक्य का चक्रव्यूह’ थ्रिलर की श्रेणी में रखे जा सकते हैं, फिर मैंने गहन शोध और कठिन परिश्रम से उन्हें थ्रिलर की संकुचित सीमा से निकालकर ठोस ऐतिहासिक धरातल पर स्थापित करने की कोशिश की है। एक बात यहाँ मैं और स्पष्ट कर दूं कि गुप्तचरी का कार्य बहुत धीमा, नीरस और उबाऊ होता है। इसमें मनोरंजक या उत्तेजनात्मक कुछ नहीं होता। असली जासूसी के काम में वैसा कुछ नहीं होता जैसा जासूसी उपन्यासों या फिल्मों में दिखाया जाता है।

सवाल हिंदी साहित्य में इन दिनों भाषा को लेकर बड़ी खींचतान है। अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग के हिमायती लोग बढ़ रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?

त्रिलोकजी – भाषा को लेकर अभिनव प्रयोग होते रहने चाहिए। भाषा कोई स्थैतिक माध्यम नहीं है, यह गतिक है। और, यह गति ही उसमें प्राण फूंकती है। हिन्दी में अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी, देशज, तद्भव वगैरह सभी प्रकार के शब्दों का यथोचित प्रयोग होना चाहिए। हाँ, यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि भाषा भाव की अनुगामिनी हो; पांडित्य प्रदर्शन या बहुज्ञ होने के दंभ में दूसरी भाषा के शब्दों को जानबूझ कर घुसेड़ना भाषा में कृत्रिमता लाती है। जहा तक स्वाभाविक है वहां तक अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं-बोलियों के शब्दों के प्रयोग का स्वागत है।

सवाल – नए-पुराने किन लेखकों-लेखिकाओं को पढ़ते हैं?

त्रिलोकजी – मैं बहुत व्यापक रूप से पढ़ता रहता हूँ। नाम गिना पाना यहाँ संभव नहीं लगता। मैंने ज्यादातर पुरानों को पढ़ा है। नयों को अभी जो पढ़ सका हूँ उनमें बहुत प्रतिभा पाता हूँ, उनमे बहुत संभावनाएं अभी छुपी पड़ी हैं। बस डर है कि बाजारवाद की विवशताओं और लोकप्रियता के दबावों के चलते उनकी प्रतिभा प्रभावित न हो।

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