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स्त्री के सशक्त एकांत और दुरूह आरोहण की कविताएँ

रश्मि भारद्वाज का कविता संग्रह ‘मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है’ जब से प्रकाशित हुआ है चर्चा में है। सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह की कविताओं की एक विस्तृत समीक्षा राजीव कुमार ने लिखी है। आप भी पढ़ सकते हैं।

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रश्मि भारद्वाज का काव्य संग्रह “मैंने अपनी मां को जन्म दिया है”, युवा कवियत्री की सोच की गंभीरता और अभिव्यक्ति की अप्रतिम क्षमता से अचंभित करता है। कवियत्री अपने पहले ही काव्य संग्रह “एक अतिरिक्त अ” से चर्चा में आ गईं थीं और युवा लेखन के लिए पुरस्कृत भी हुईं। वर्तमान काव्य संग्रह, काव्य परिदृश्य में दस्तक नहीं, सधे हुए विराट कदमों का कम्पन है।

काव्य एक अत्यंत जटिल एवं उत्कृष्ट सृजन है जिसका स्वरूप भाषिक होता है।  कोई एक भाव  गहन चिंतन और उसकी काव्य प्रस्तुति के समय विशिष्टता पा सकता है। कोई प्रेम में है, कोई आक्रोश में , कोई विषाद में , कोई मृत्यु की जटिलता में,  समग्रता सबसे मुश्किल लक्ष्य है जो आसानी से हासिल नहीं होती। रश्मि भारद्वाज नए युग को उसकी समग्रता में, विराटता में देखती हैं। विरुद्ध विकल्पों का जो जटिल अंबार  इस नए तकनीकी युग के सामने है वह समग्र  दृष्टि बनने नहीं देता।  इन्हीं विरुद्धों के समाहार और मानवीय मूल्यों के रक्षार्थ उच्च मानकों  की स्थापना की कवियत्री हैं रश्मि भारद्वाज। उनका यही गुण अपने युग के और पूर्ववर्ती युग के कवियों में उन्हें विशिष्ट स्थान दिलाएगा।  हर कविता अपनी इकाई में विलक्षणता और संश्लिष्ट भावों की अभिव्यक्ति लिए हुए है और हर कथ्य  अपने युग का केन्द्रीय संवेदन।  जो कुछ  भी उनके काव्य में है वह स्वानुभूत सत्य से उपजा हुआ है, यह बात दीगर है कि कागद लिखे सत्य से भी कवियत्री उतना ही रू ब रू हैं। काव्य में कवि के वैयक्तिक अनुभव की  ही अभिव्यक्ति होती है रश्मि भारद्वाज में भी है, मगर वह देशकाल की सीमाओं का अतिक्रमण कर  अपने अनुभवों को सार्वभौम अनुभव बनाने में सक्षम हो जाती हैं। “मैंने अपनी मां को जन्म दिया है ” काव्य संग्रह यहीं अपने उद्देश्यों में सफल होता है।

स्त्री के सशक्त एकांत और दुरूह आरोहण की कविताएं काल निरपेक्ष हैं।  स्त्री डर, उम्मीद या किसी तसल्ली के बगैर अपने एकांत को अदम्य निष्ठा से जीना चाहती है। जीने की इस कोशिशों में खड़े हर अवरोधों से वह सवाल करती है। हर युग में स्त्री अपने सनातन प्रश्नों का जवाब मांगेगी ,  प्रश्न जो उसकी अस्मिता और दैहिक स्थितियों से जुड़े होंगे, प्रश्न जो सामाजिक अधोपतन में स्त्री की स्थिति को व्याख्यायित करने के तरीकों से जुड़े होंगे और हर युग हाशिए पर जिन  सवालों को डालने की कोशिश करेगा। इन्हीं अनेक समय की कसौटियों पर खड़ी उतरती रचनाओं से “मैंने अपनी मां को जन्म दिया है” का ताना बाना बुना हुआ है।

युग बोध

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“हम एक अभिशप्त पीढ़ी हैं/ हमारे पास स्वप्न हैं, नींद नहीं/ हमारे पास विकल्प है, प्रेम नहीं/ प्रतिबद्धता हमारे समय का सबसे घिस चुका शब्द है/ हम अक्सर अपनी ऊब में पाए जाते हैं” । ऊब गई अभिशप्त पीढ़ी के हिस्से में जो जीवन है, उसमें भोगा हुआ यथार्थ सपनों पर हावी है, पिछले सच जो जाती हुई पीढ़ी ने सौंपे थे एक शापित जीवन की पहेलियां बनकर रह गए। नए अध्याय जोड़ने के लिए जिस अनुभव, संघर्ष और प्रतिबद्धता की आवश्यकता है वह वर्तमान पीढ़ी के पास नहीं।

“मैं यह भी निश्चित रूप से नहीं कह सकती / कि यह शहर का शव है या हमारे सपनों का / जिसकी असह्य गंध के आदि हो चुके हैं हम” एक उजड़ा हुआ जीवन, एक मरता हुआ शहर, उम्र के सबसे सुंदर साल जो लिख दिए गए एक शहर के नाम, छोड़कर वह शहर जहां हमें होना था,  जहां जन्म लेकर बड़े हुए, जो शहर हक रखता था मेरी परिधि पर, मेरे विस्तार पर और अंततः हासिल कुछ भी नहीं। “मैं दो शहरों में खोजती हूं/ एक बीत गई उम्र/ एक ने मुझे नहीं सहेजा/ दूसरे को मैंने नहीं अपनाया / मैं दोनों की गुनहगार रही”।

प्रत्येक कविता इस संग्रह की, गहन विचारों की संश्लिष्ट अभिव्यक्ति है। विचार अपने उत्स से ही प्रसरण और विपर्यय का तत्त्व समाहित किए होते हैं। सामाजिक घात प्रतिघात से विचार  पुष्ट भी होते हैं और स्थूल विचारों का वटवृक्ष फैलता भी जाता है।  इस संग्रह की कविताएं उन्हें परिधि में लाती है, संक्षिप्त शब्दावली और प्रतीकों और बिम्ब के सहारे उसे पाठक की मानसिक दुनिया में चित्र बनाकर पेश करती है। “दिखाई देती है दूसरी ओर खामोश गुजरती हुई / घर की ओर जाती रेल/ बमुश्किल दफन हो जाती एक इच्छा/ शामिल हुआ जाता है हर रोज़ एक अनचाही यात्रा में/ अब घर ने भी बेवजह बुलाना छोड़ दिया है। ” विस्थापन और उसका दर्द नए विकास और उससे जुड़े जीवन की कहानी का सबसे त्रासद हिस्सा है, जिसे कवियत्री ने बखूबी निभाया है। इस दर्द का  कविता में इतना खामोश बयान दुर्लभ है।  विस्थापन का दर्द शोर नहीं करता यहां बल्कि रिसता है देर तक और स्त्राव का यह उत्कर्ष पाठक को भिगोता है। “जीवन के हर उल्लास पर / भारी हो जाती हैं बाधाएं/ एक मृत्यु है / जिसकी शेष रहती है प्रतीक्षा / हर रोज़ सुनाई देते हैं जिसके पदचाप।”

जो साधारणतया गद्य की विस्तृत बुनावट में अलक्षित रह जाता है, कविता यहां उसे सीधे  पाठक के मस्तिष्क में भेज देती है। इस सबके बीच रश्मि भारद्वाज की कविताएं  मानव हित की व्यापकता से रिश्ता कमजोर नहीं करती हैं। वर्तमान संग्रह ” मैंने अपनी मां को जन्म दिया है” की  रचनाएं काल और वाद की सीमाएं लांघती हैं, अपनी बुनावट में , अपने प्रतीकों में और कथ्य और जीवन के सौन्दर्य विस्तार में ।  अधिकांश कविताएं कालजयी हैं और अपने समष्टि गत दृष्टिकोण से  सुधी पाठक को विस्मय में डालती हैं।

” कई बार घर के बाहर लगी तख्ती तक/ हमारे असल चेहरे से नावाकिफ होती है। दरअसल हम आजकल कहीं नहीं रहते/ अपने ओढ़े गए खोल में भी नहीं” कविता के इस निष्कर्ष तक पहुंचते पहुंचते आप बड़े शहरों में स्वयं को खोजने लगते हैं, ‘मैं कहां रहता हूं’ के भाव के साथ। मेरी पहचान जो सरकारी रिकॉर्डों में है , जो  मेरा पता दर्ज है  तख्ती पर  एक नाम भी लिखकर वह तो एक छलावा है, मेरे होने की मुकम्मल जानकारी है ही नहीं। अभी तो मैं रास्ते से उतरा ही नहीं,  नागरीय सुरंग बहुत दूर तक अंधेरी है, मैं भटक ही रहा।

 

स्त्री चिंतन

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“उन्होंने मिट्टी की दीवारों पर साथ उकेरे अपने स्वप्न/ और उनमें अपनी दमित इच्छाओं का रंग भरा ।”  संग्रह की आधी आबादी को मुखातिब कविताओं के केंद्र में महज स्त्री विमर्श नहीं, सिर्फ आधुनिक स्त्री के उद्गाम साहस का चित्रण नहीं, उसके संशय और असुरक्षित घर की आवृति भी है और पलटकर लड़ने के नए तरीकों से वार करने का मनोयोग भी। सब कुछ चाहिए इस स्त्री को आंख भर की नींद, उम्र भर के सपने, थोड़ी सी आंच और एक मजबूत गर्म हथेली जिसे थाम कर दुखों को पिघलता महसूस किया जा सके। स्त्री का विश्व की  वर्तमान व्यवस्था से विद्रोह रचनात्मक सौन्दर्य लिए हुए है, किसी ध्वंस की कामना नहीं। स्त्री विमर्श के प्रभावोत्पादक स्वरूप का आख्यान है सम्पूर्ण संग्रह।

स्त्री की  पितृसत्तात्मक व्यवस्था  प्रदत्त एक शाश्वत विचारधारा कि भारतीय परंपरा में स्त्री जीवन ही अभिशप्त होता है और देह जिसका महत्त्वपूर्ण शिरा है , विषमता से भरे इस  रूढ़ दर्शन की प्रस्तावना मात्र से ही कविता प्रतिकार करती हुई हर जगह खड़ी हो जाती है। मानव इतिहास में आधुनिक युग ने पहली बार स्त्री को अपनी जगह, अपना एकांत और अपना भाग्य चुनने की जगह दी है । वह इस चुनाव की शक्ति से शाश्वत भय को समाप्त कर सकती है। ‘एक स्त्री का आत्म संवाद ‘ कविता में स्त्री अपने भय को जीती हुई किस तरह अनावृत करती है समाज का पाखंड : ” मेरा भय था कि पुरुष की छत्र छाया से वंचित/ हर स्त्री चरित्रहीन ही कहलाती है/ मैं एक मजबूत स्त्री का आडंबर रचती/ हर दिन एक नए भय से लड़ने को अभिशप्त हूं।”  किसी एकाकी स्त्री का किसी विराट यात्रा पर जाते देखना, या शाप से अकेले लड़ना अभी भी समाज को असहज करता है।  पर स्त्री ने युद्ध विराम की घोषणा नहीं की। न ही उसने आत्म निर्वासन चुना। हर युग के शाप का जवाब देती रही हैं कविता की स्त्रियां। “पक्षपाती है ईश्वर/ जिसकी सृष्टि का सारा करतब/ सिर्फ स्त्रियों की देह से चलता है / दुनिया के समस्त महायुद्ध / हमारी देह पर लड़े गए।”

यहां स्त्री पुरुष के ज्ञान के अहंकार से वितृष्णा रखती है। वह एक स्नेही और उदार हृदय चाहती है जो जानता हो झुकना। स्त्री पुरुष में भी जीवन में सामंजस्य स्थापित कर सकने की क्षमता ढूंढ़ती है। कवि कर्म परवान चढ़ता है। विरुद्धों का दुर्लभ सामंजस्य न सिर्फ शिल्प के स्तर पर, बल्कि स्त्री की इच्छाओं के रूप में। रश्मि भारद्वाज की स्त्री यहां प्रतिशोध लेती हुई या प्रतिकार करती नहीं दिखती बल्कि परिवर्तित पुरुष की कामना करती है, उसका आवाहन करती है। “उस स्त्री का गर्वोन्नत शीश/ नत होगा सिर्फ तुम्हारे लिए/ जब उसे ज्ञात हो जाएगा/ कि उसके प्रेम में/ सीख चुके हो तुम / स्त्री होना”।

प्रतीक्षा शीर्षक से अाई हुई  एक लघु कविता जो कि मूल दीर्घ कविता समूह और उसके शीर्षक “स्त्रियां कहां रहती हैं” में रखी गई है, अपने अर्थ विस्तार में अद्वितीय है। इस संग्रह में इस लघु कविता का अन्य आनुषंगिक कविताओं के साथ गूंथा होना इसे युगों तक के लिए स्थापित करता है। ” बलात प्रेम की दीर्घ यातनाओं के मध्य भी/ शेष रही उस स्पर्श की कामना / जो उसे सदियों के अभिशाप से मुक्त करे/ जो उसे छूते हुए / उसके हृदय की ग्रंथियां भी खोल सके /  जिसके प्रेम में तरल होते हुए/ उसे पाषाण में परिवर्तित कर दिए जाने का भय नहीं हो।”  देवी अहिल्या , पत्थर, उद्धार , प्रेम और पाप का रूढ़ प्रतीक भारतीय लोक मानस में सहस्त्राब्दियों से है। सदियों के एकांत और उच्छिष्ट आत्मा का यह प्रेम, कामना और शाप आत्म निष्काषण नहीं है। अहिल्या की  यह कामना आंतरिक स्तर पर मुक्ति की है और बाह्य स्तर पर ईश्वर के हाथों इस पाप और शाप का शमन। हर युग में भिन्न भाषाओं के बड़े  विद्वान लेखकों ने इस प्रसंग की बड़ी व्याख्याएं की हैं। रश्मि भारद्वाज बहुत कम शब्दों में इस शाश्वत मिथकीय द्वंद्व को जीती हुई उसका नैसर्गिक  समाधान देती हैं। काव्य सिद्धांत की वैचारिक और प्रस्तुति संबंधी सारी कसौटियों पर यह लघु कविता उत्कृष्ट है।

स्त्री जब पुरुष के दिए संताप को अपनी मूल्यवान वस्तु बना ले,  तो यह उसके प्रतिकार का शिखर है। विनम्रता के अक्स में प्रतिशोध का शिखर। तुमने जो दर्द दिए हैं वहीं ताबीज़ है, मुझे उसका स्मरण ही किसी विपदा से निकाल लेगा, यह शक्ति देगा कि मैं तुम्हारे बिना चल सकी : “तुम्हारी दी हुई उदासी को ही/ मैंने किसी ताबीज़ सा बांध लिया है/ यह मुझे हर उस दू:स्वप्न से बचा कर रखेगा / जो तुम्हारे प्रेम ने मुझे दिए हैं”

पति की प्रेमिका के नाम कविता इस संग्रह की उत्कृष्ट कविता है।  स्त्री का संबोधन अपने प्रणय प्रतिद्वंदी के लिए अन्यत्र दुर्लभ है। शिल्प, कथ्य और कविता में  अपनी ताज़गी के कारण यह कविता कालजयी है ” तमाम समय मुझ सा नहीं होने की चेष्टा में/ मैं मौजूद रहती होऊंगी तुम्हारे अंदर/ तुम मुझसे अधिक आकर्षक/ अधिक स्नेहिल/ अधिक गुणवती होने की अघोषित चेष्टा में खुद को खोती गई। ”

दो स्त्रियों के बीच एक पुरुष के तथाकथित प्यार का होना घृणा के जिस रिश्ते को जन्म देता है, और एक दूसरे के अंत की दुआएं मांगी जाती हैं अद्भुत संप्रेषण में कविता ध्वनित करती है यहां आधुनिक शहरी जीवन के इस कलुष सत्य को। आम तौर पर कविताएं इस हिस्से में प्रवेश करने से बचती हैं जबकि इस काव्य संग्रह में इस वर्जित प्रदेश में कविताएं बेबाक बयां करती हैं  अपनी उपस्थिति। स्त्री की अस्मिता, वंचना और देह पर उठे सवाल विद्रोहिणी बनाते हैं काव्य नायिका को और तीक्ष्ण हो उठती है काव्य संवेदना।

प्रेम का रिश्ता भारतीय घर का कितना अव्यक्त होता है कवियत्री बहुत पैनी निगाह रखती हैं। भारतीय संयुक्त परिवारों में प्रेम को अपनी स्थिति प्राप्त करने के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी। या तो वह अव्यक्त ही रहता था या  बहुत परिश्रम से कुछ अवसर बनाए जाते थे । अव्यक्त प्रेम में जीवन रचती हुई पीढ़ियों का भव्य वर्णन हुआ है यहां : “हमारे लिए प्रेम हमेशा अव्यक्त ही रहा / लेकिन हम आज भी जानते हैं यह बात मन ही मन में/ कि जो अव्यक्त है वहीं सबसे सुंदर है”। अव्यक्त की निराकारता और उसका शिव और सुंदर होना बिम्ब और प्रतिवादी शिल्प के गठन का सुंदर उदाहरण है।

“मैंने अपनी मां को जन्म दिया है” में स्त्री के सबसे प्रभावशाली मातृ स्वरूप का सायास प्रकटीकरण चलती हुई कविताओं के अचानक ही बीच में, अप्रतिम प्रभाव छोड़ता है। स्त्रियां यहां जन्म दे रही हैं हर क्षण एक नई पृथ्वी।  सृष्टि में जो भी  कुछ सुंदर है उसे स्त्रियों ने जन्म दिया है। स्त्रियों ने यहां साथ मिलकर कहकहे लगाए और भोजन में घुल आया स्वाद। एक स्त्री अपना आत्म संवाद  लिख पाती की कितनी ही बार कितनी अश्लीलता से याद कराई जाती है उसे उसकी देह। दूसरी कहती कि इस देह ने हमें सुंदर किया है। हम इसी देह से रच सकीं सृष्टि। रचने के इस धर्म ने ही हमें देवत्व दिया है। हर लिपि और भाषा में, आग प्रेम और स्मृतियों के लिए हमारी संवेदनाएं एक सी थीं। हमने पृथ्वी के हर कोने में सुंदर संसार ही रचा ।

देवता, पितर और पुरखे

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पितरों पर, पुरखों पर, अनुष्ठानों के बीच शेष रह गए एकांत पर, मनुष्यता के नैसर्गिक स्वाभिमान पर जो अब तक बड़े और स्वयंभू कवियों के अघोषित एकाधिकार की भावभूमि रही है, रश्मि  भारद्वाज अपने संप्रेषण से उस किले की दीवारें तोड़ती हैं और नए प्रतिमान गढ़ती हैं । गांव की पूजा पद्धति की बाल काल की अनुभूतियों पर अंकित परछाइयां कवियत्री के साथ शहर अाई और कविताओं में निखरकर अद्वितीय स्मृतिजन्य सृजन करने में सहायक हुई। इन कविताओं का कलेवर बिल्कुल स्पष्ट और अन्यत्र दुर्लभ है। आराधना का स्मृति आलाप कविता में ध्वनि पाता है।

पुरखों की धरती पुकारती है। वहां सारे बंधन तोड़ पहुंच जाता है व्यक्ति धरती की छाती पर कान धरते ही पता चलता है धौंकनी सी चल रही हैं पश्चाताप की सांसें। पुरखे ” उस मिट्टी में जहां गिरे हैं उनके स्वेद कण / वहां की हवा में जहां घुली है उनकी देह गंध / वहां के जल में जहां विसर्जित है उनकी राख” आवाहन करते हैं लौट कर आने का। अंत तक कविता जो लय प्राप्त करती है, पुरखों की स्मृति और सम्मान का जो अप्रतिम बिम्ब विधान है वह कविता का हासिल है: “अपनी तमाम शिकायतों को भूल कर लौटना वहां / सिर को नत और होठों को मौन रखना/ जहां एक लंबे शापग्रस्त जीवन के बाद / मुक्ति की नींद तलाशते / प्रार्थनारत हैं पुरखे/ ताकि तुम भी शताब्दियों के शाप से मुक्त हो सको।”

“देवी मंदिर” शीर्षक कविता में स्त्रियों को आराध्या की पूजा करते और मन्नतें मांगते देख सीढ़ियों पर बैठी एक पागल लड़की खिलखिलाकर हंसती है “सोचती है, अच्छा है कि उसका कोई घर नहीं है/ और उसे जी पाने के लिए / किसी और के नाम की प्रार्थना नहीं करनी है ।”  पागल लड़की की हंसी कारुणिक अंत की तरफ लेे जाती है जहां सनातन पूजा पद्धति और निर्णायक रूप से बताए गए उसके परिणामों पर जबरदस्त प्रहार है।

“चंद्रिका स्थान” कविता की भावभूमि दृश्य बिम्ब विधान और कथा प्रारूप में है। गांव की देवता स्त्री, अगर यह रक्षक स्त्री न हो तो गांव सलामत न रहे और  जिसे गांव ने स्वयं गढ़ा था एक धवल मुस्कान के साथ पवित्र ईश्वर में तब्दील होने से पहले, गांव, बरगद और गरीब स्त्री को आंचल की छाया में बचाए रखती थी ” गांव का पतझड़ हर साल बहुत जल्दी हार जाता था/ देवता स्त्री थी सबकी मां/ वह मुस्कुराती और खेतों का बसंत लौट आता”। बरगद का वृक्ष पिता है, सदियों से जहां जगह पाती रही देवता स्त्री और सारे गांव के जन। विकास और शहरीकरण ने ईश्वर का रूप बदला, पूजा पद्धति बदल डाली और बदल डाला उससे जुड़ा जीवन। कविता संग्रह की श्रेष्ठ कविताओं में से है

“वह तुम ही हो पिता”  कविता में अप्रतिम रूप में हैं पिता।  बेटी पिता को इस अनन्य रूप में देख सके यह बहुत कम वर्णित होता है काव्य साहित्य में। बेटी के लिए मां ज़्यादा जगह घेरती है उसके कायनात में। ” लेकिन फिर भी मेरी धमनियों में / जो रक्त बन दौड़ता रहा/ वह तुम ही थे/ मेरे चेहरे की ज़िद में जिसे पढ़ा जाता रहा, वह तुम्हारा ही चेहरा था/ मैं इनसे कभी भाग नहीं सकी/ तुम्हारे चेहरे पर बढ़ अाई कुछ और लकीरों को याद कर / जो मेरी आंखों से बह आता है/ वह तुम ही हो पिता।”

विशिष्ट परिप्रेक्ष्य

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यहां रानू मंडल ध्यान मग्न गाते हुए गीत का उत्सव नहीं, जीवन का शोक मनाती है। कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है की अन्विति, रास्तों का लोकप्रिय गायन और उससे जुड़ा कारुणिक प्रसंग बहुत ही सुन्दर है।  शहर के चौक पर खड़े चार बौद्ध भिक्षुओं के चेहरे शहर के हर नए पाप के बाद थोड़ा और झुक जाते हैं। मूर्तियों का निर्माण मानवता को प्रतिमाओं में बदलने की साजिश है यहां। यहां पुरखे प्रार्थनारत हैं, ताकि तुम शताब्दियों के शाप से मुक्त हो सको।  यहां हाथ कांपते हैं, पुरानी चीजों को कबाड़ी के हाथ सौंपते या नष्ट करते। रूह कांपी थी कभी घर की दरकती दीवारें देखकर।

अपनी प्रेमिका मेरी एन के लिए कोहेन के संगीत की आवाज़ यू आर टू मच इन माई हार्ट आषाढ़ के दिन के रोमानी पार्श्व में समायोजित है। बादल का मेटाफर, ध्वनियां प्रेम कीं और कविता में प्रारंभ और अंत का सामंजस्य विलक्षण भाव उत्पन्न करता है। ऐसी मौन सार्थक कविताएं बिना शोर किए जगह लेती हैं संग्रह में।”वह जो आरंभ ही नहीं हुआ / कभी अंत भी नहीं होगा/ क्योंकि संसार के सभी खूबसूरत प्रारंभ / एक दुखद अंत की भविष्यवाणी साथ लिए आते हैं।”

“अभिशप्त प्रेमिकाएं” में वर्ड्सवर्थ और उसकी बहन के गहन स्नेहिल लेकिन अबूझ रिश्ते पर आधारित कविता का अंत : “वह पगडंडी उसे अब तक याद करती है / जहां उसने एक कवि को सिखाया था/ नवजन्मा दूब को रौंदे बिना / पांव धरने की कला” आप देर तक महसूस करते हैं कविता के पढ़ लेने के बहुत बाद  और सिल्विया प्लाथ के लिए में : “मृत्यु ने उसे मुक्त किया / एक दीर्घ जीवन के बाद भी / उसे ही जीते रहने को/ तुम अभिशप्त हुए” आपको नि:शब्द कर देता है। एक रेखा रेंगती है मस्तिष्क के कहीं अंदर। कोई घूमता रहता है प्रेम को खोजता हुआ आपके अंतस में कई दिनों तक।

‘नदी होना एक यातना है’  कविता अचानक नदी के रूढ़ बिम्ब गति और निष्छलता से कैसे विलग होकर पाठक को अचानक दार्शनिक बिम्ब विधान से रू ब रू करती है नदी के क्रोध और आवेग का परिमाण नापकर और यह कहते हुए कि “कितना कठिन होता है बहते रहना / एक कठिन सदी में/ एक कृतघ्न पीढ़ी के लिए”। नदी अमूमन इस तरह नहीं संजोई जाती है कविताओं में। कवियत्री नदी सूखने नहीं देती, पर्यावरणीय घिसी हुई स्थिति पर बहस लेकर नहीं आती बल्कि उसका  मानवीयकरण कर  नदी के क्रोध और आवेग जैसे संचारी भावों से पाठक को अवगत कराती हैं।

आत्मा के नए दार्शनिक स्वरूप पर नदी के तुरंत बाद आत्मा की रोशनाई कविता है। जो कुछ लिखा नहीं जा सका ” वे किसी अज्ञात ईश्वर को समर्पित/ नि:शब्द प्रार्थनाएं थीं/ जिसमें समाहित थे हमारे सारे भय, संशय और अव्यक्त प्रेम/ उनकी कोई लिपि या ध्वनियां नहीं थीं/ उन्हें आत्मा की रोशनाई से लिखा गया था”। अज्ञेय की उद्घोषणा थी  एक मौन ही है जो कोई भी कहानी कह सकता है, रश्मि भारद्वाज भी मौन को अलग अन्विती देती हैं जो भारतीय वांग्मय में वेदांत दर्शन में व्याख्यायित करने की कोशिश की गई है। कवियत्री कहती हैं ” मौन हो जाना कायरता नहीं/ शब्दों को बेहतर ढंग से बोले जाने की कवायद भर है / सच को बचाने से बेहतर लगा मुझे/ एक इंसान को बचा ले जाना।”

 

शिल्प

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हर सहृदय काव्य से प्रभावित होता है तथा इस प्रभाव का काव्य की समीक्षा में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। यह प्रभाव काव्य के कई केन्द्रीय तत्त्वों में से एक होता है। भाव, वर्णन या शब्दों के चयन का अतिरेक कविता का काव्य सौन्दर्य नष्ट कर देता है। वक्रोक्ति और अतिशयोक्ति

कविता की भाव भूमि पर अपने गुणों को लेकर हावी हो जाते हैं। भाषा और भाव के अतिरेक का सायास निषेध है  “मैंने अपनी मां को जन्म दिया है” में । रश्मि भारद्वाज इस संग्रह में कविता के इन कमजोर पक्षों से बचती हुई चलती हैं। कोई सूत्रात्मक उद्घोषणा के बिना ही कविता अपने को स्वयं खोलती है और अपनी बात कह जाती है। प्रस्तुत विधान , अप्रस्तुत से अधिक प्रभावोत्पादक है इन कविताओं में।

कथ्य से लेकर साहित्य प्रतिष्ठित प्रतीकों और बिम्ब की प्रस्तुति और पंक्तियों का सघन संयोजन, विरोधी आवेगों की एक ही पदबंध में  निर्बाध प्रस्तुति रश्मि भारद्वाज को कविता के क्षेत्र में बिल्कुल अलग और प्रतिष्ठित करती है।

अलग अलग कविताओं में शब्द शक्तियां चमत्कारिक प्रभाव छोड़ती हैं। कविताओं में प्रयुक्त वर्णन अभिधा और लक्षणा शब्द शक्तियों का उत्कृष्ट उदारण हैं। सायाास रस  या चमत्कारिक भाषा द्वारा सौन्दर्य की निष्पति कविता या कवियत्री का उद्देश्य नहीं परन्तु कविताएं पाठ और पुनर्पाठ में अद्वितीय काव्य आनंद देती हैं और जटिल भावों को ग्राहय बनाती है।

” मेरे लिए तय थीं समझौतों की सीमा / हर अभाव के बीच भी” सघन प्रतिगामी बिंबों का समायोजन काव्य प्रस्तुति को उत्कृष्ट बनाता है। “मैंने परिधि चुनी थी/ जबकि मेरे हिस्से लिखी थी असीम पृथ्वी” परिधियों का चयन बंधन है, पृथ्वी का होना विकल्प। कविता निखर कर अाती है। ” हमारे लिए प्रेम हमेशा अव्यक्त ही रहा/ जो अव्यक्त है वहीं सबसे सुंदर है”।  विलोम का भाषिक संरचना में उत्कृष्ट प्रयोग काव्य संग्रह की विशेषता है: “वह इतनी मुक्त है/ कि उसे बांधना / उसे खो देना है/ वह इतनी बंधी हुई है / कि चाहेगी उसके हर श्वास पर/ अंकित हो तुम्हारा नाम।”

शिल्प का चुनाव कविता के कथ्य और जटिल भावों को बरक्स रखने के लिए किया गया है। द्वंद्व हमेशा विकास देता है और उसका गुंफन सात साहित्य का आनंद। “मैंने अपनी मां को जन्म दिया है” शिल्प के उपयोग में भी बेजोड़ काव्य का उदाहरण है।

 

 

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