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आँखों में पानी और होंठो में चिंगारी लिए चले गए राहत इंदौरी: राकेश श्रीमाल

मुशायरों के सबसे जीवंत शायरों में एक राहत इंदौरी का जाना एक बड़ा शून्य पैदा कर गया है। उनको याद करते हुए यह लेख लिखा है कवि-संपादक-कला समीक्षक राकेश श्रीमाल ने। राहत साहब को अंतिम प्रणाम के साथ पढ़िए-

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कितने सारे दृश्य स्मृति में एकाएक चहल-कदमी करने लगते हैं। सभी परस्पर गड्डमड्ड हो समय की ठोस दीवार में सेंध लगाते हुए धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगते हैं। ऐसे में वक़्त केवल ठहरता ही नहीं, बल्कि उन वर्षो की तरफ जाने का संकेत भी करता है, जो हमारे जन्म के पहले ही बीत चुके थे। यानी हमारे वजूद में आने के पूर्व ही इतिहास में बदल गए थे। बीती शताब्दी का वह इंदौर, जो तब ऐसा नहीं था, जैसा कि अब बन गया है। सैफी होटल में सुबह 5 बजे तक लजीज स्वाद से भरपेट हुआ जा सकता था। स्टेशन के बाहर रात के किसी भी पहर गर्म पोहे का नाश्ता किया जा सकता था। सैफी होटल के पास ही झंडा चौक में अब्दुल वहीद (अब कांग्रेस नेता) की टेलरिंग की दुकान थी। यही दुकान राहत भाई के प्रतिदिन बैठने का मनपसन्द ठिया थी। इसके आसपास कबाब और खोपरापाक की कई दुकानें थीं। राहत भाई से मेरी शुरुआती मुलाकात वहीं हुई थी। उस वक़्त मुझे कलाकारों और लिखने-पढ़ने वालों की सोहबत का चस्का लग चुका था। रानीपुरा में ही एक बुजुर्ग शायर हुआ करते थे, जो नए शायरों के कलाम पर इस्लहा किया करते थे। इंदौर की जमीन से काशिफ इंदौरी और नूर इंदौरी भी पाएदार शायर हुए हैं, लेकिन राहत इंदौरी जैसी शोहरत किसी को नहीं मिली।

            झंडा चौक दरअसल इंदौर में शायरों का गढ़ माना जाता है। शाम से शुरू होकर देर रात तक शायरों का जमावड़ा यहाँ लगा रहता। रानीपुरा स्थित यह चौक सामिष खाने और शेरो-शायरी के लिहाज से बड़ा मरकज था।  यह अभी भी बदस्तूर चालू है। लेकिन झंडा चौक का यह दृश्य बदलकर बहुत पीछे दूसरे विश्वयुद्ध पर इतिहास में जाकर स्थिर हो जाता है। इस युध्द के बाद यानी वर्ष 1945 से यूरोप की आर्थिक स्थिति बहुत अस्थिर हो गई थी। भारतीय कपड़ा मिलों में जो उत्पादन होता था, वह यूरोप में निर्यात पर ही निर्भर था। यूरोप के खस्ताहाल होने का असर भारतीय मिलों पर होना ही था। इंदौर उस समय कपड़ा मिलों के लिए जाना जाता था। यहाँ भी कई मिलें बंद हो गईं या बड़ी संख्या में कामगारों की छंटनी हो गई। रिफ़अत उल्लाह ऐसे कामगारों में थे, जिनकी नौकरी भी चली गई। मुफलिसी का दौर उनके जीवन में शुरू हो चुका था। वे ऑटो चलाने लग गए थे। ऐसे में वर्ष 1950 के पहले दिन, एक जनवरी को उनके यहाँ कामिल का जन्म होता है, जिसका नाम बाद में बदलकर राहत कर दिया गया था। इंदौर में उस दिन यह भी हुआ था कि होल्कर रियासत ने भारत में विलय होने की सहमति पर दस्तखत किए थे। उस समय के राहत नयापुरा स्थित सरकारी स्कूल में पढ़ते थे और खर्चा-पानी के लिए मजदूरी किया करते थे। पैसा उनके परिजनों की जरूरत थी और वे कमाने की जुगत में लगे रहते थे। मालवा मिल के पास उन्होंने पेंटिंग की एक दुकान खोल ली और ट्रक के पीछे पेंट कर कमाने का हुनर साधने लगे। मोटरसाइकिल और स्कूटरों के नम्बर प्लेट भी पेंट करने लगे।

         राहत इंदौरी के बचपन के पारिवारिक दृश्य को वरिष्ठ चित्रकार अनीस नियाजी इस तरह व्यक्त करते हैं– “राहत भाई के फानी हो जाने के सदमे ने कुछ कुंद दरवाजो को खोल दिया है। इंदौर में नयापुरा नाम की एक बस्ती है। यहाँ अंसार जमात की बहुतायत है। यह लोग बुनकर हुआ करते हैं। वहाँ मेरी फुफ्फो (बुआ) रहा करती थीं। मैं अक्सर उनके यहाँ खेलने चले जाया करता था। उनके घर के सामने एक नीली रंग की टेम्पो खड़ी रहा करती थी। हम बच्चे दिन भर उस टेम्पो में धमाचौकड़ी मचाए रहा करते थे। वह टेम्पो वाली आपा राहत साहब की वालेदा हुआ करती थीं तथा टेम्पो उनके वालिद की आमदनी का जरिया थी।”

        जब वे नवीं कक्षा में नूतन हायर सेकंडरी स्कूल में पढ़ते थे, तब स्कूल में एक मुशायरा हुआ। राहत की ड्यूटी शायरों की खिदमत करने के लिए लगा दी गई। उस मुशायरे में जाँनिसार  अख्तर भी आए थे। छात्र राहत ने उनका आटोग्राफ लिया और पूछ लिया- ‘मैं भी शेर पढ़ना चाहता हूँ, इसके लिए क्या करना होगा।’ अख्तर साहब बोले, ‘पहले कम से कम एक हजार शेर याद कर लो।’ इस पर राहत बोल पड़े, ‘इतने तो मुझे अभी याद है।’ अख्तर साहब ने जवाब दिया, ‘तो फिर इस शेर को पूरा करो।’ यह कहकर जब उन्होंने लिखा- ‘हमसे भागा न करो, दूर गजालों की तरह’ यह पढ़कर राहत बोल दिए- ‘हमने चाहा है तुम्हें, चाहने वालों की तरह।’ मतलब स्पष्ट है कि अपने स्कूली जीवन से वे शायरी के दीवाने हो गए थे। अब दृश्य इंदौर से भोपाल आ जाता है। बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी से राहत उर्दू में एमए करते हैं और भोज यूनिवर्सिटी से पीएचडी। थोड़े समय इंदौर में अध्यापन करने के साथ ही उनकी शायरी परवान चढ़ने लगी। यह वह दौर था, जब वे शौहरत की सीढ़ियों पर अपने पांव जमाते हुए मशहूर होने की तरफ बढ़ रहे थे। वर्ष 1987 में इंदौर छोड़ने के पहले मैं तमाम तरह की कला-गतिविधियों को अंजाम देने लगा था। उसी दौरान राहत भाई के छोटे भाई रंगकर्मी आदिल कुरेशी और धाकड़ पत्रकार शाहिद मिर्जा के साथ मैंने काफी सारी रचनात्मक आवारगी भी की।

  बीती सदी के अंतिम दशक में कुछ वर्ष वे मुंबई में रहे। राहत भाई फिल्मों के लिए गीत लिख रहे थे। मैं भी उस पूरे अंतिम दशक मुंबई में पत्रकारिता कर रहा था। मुंबई में उनकी जोड़ी अनु मलिक के साथ हिट रही थी। “नींद चुराई मेरी किसने ओ सनम” और “तुमसा कोई प्यारा, कोई मासूम नहीं है” जैसे उनके लिखे अनगिनत गाने अनु मलिक के साथ के ही हैं। उन्होंने मुन्ना भाई एमबीबीएस, सर, मीनाक्षी, जानम, खुद्दार, मिशन कश्मीर, करीब, मर्डर, मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी, हमेशा, हनन, जुर्म इत्यादि कई फिल्मों के लिए गीत लिखे। लेकिन उनका मन बॉलीवुड में रम नहीं पाया। वे अपना सम्पूर्ण वक़्त शायरी को देना चाहते थे। यह उनका सपना नहीं, उनका जीवन था। मुंबई से फिर हमेशा के लिए वे इंदौर आ गए और खालिस शायर का मुकम्मल जीवन जीने लगे।

         “बोतलें खोल कर तो पी ली बरसों / अब दिल खोल कर भी पी जाए” लिखने वाले राहत भाई इस मामले में दुःसाहसी थे। मुशायरे से पहले उनसे मिलने की चाह हम कुछ मित्रों के लिए प्यास को तृप्त करना भी हुआ करती थी। एक बार मुनव्वर राना और राहत भाई को मुशायरे के लिए अम्बाला जाना था। राहत भाई दिल्ली में थे और टैक्सी से अम्बाला जाने वाले थे। मुनव्वर राना ने उनसे पूछा कि दिल्ली से अम्बाला जाने में कितना समय लगता है। तब राहत भाई ने कहा– “एक.. दो..तीन.. चार.. पाँचवा पेग भरते ही अम्बाला आ जाता है।”

            युवा शायर और बॉलीवुड के बेहतरीन फ़िल्म लेखक संजय मासूम के पास भी इस दृश्य-खजाने का एक हिस्सा है। वे कहते हैं- “राहत इंदौरी साहब का जाना, शायरी की एक बेबाक़, बुलंद आवाज़ का ख़ामोश हो जाना है। अपनी शायरी के शुरुआती दिनों में जिन शायरों को सुनकर, पढ़कर ग़ज़लें कहने का हौसला बढ़ा, उनमें राहत साहब भी थे। मुझे याद है इलाहाबाद की एक रात। अखिल भारतीय मुशायरा था। ज़्यादातर शायर तरन्नुम से पढ़ रहे थे और लोगों की तालियाँ बटोर रहे थे। श्रोताओं में बैठा मैं, हतोत्साहित हो रहा था। क्योंकि ग़ज़लें तो मैं कहने लगा था, लेकिन तरन्नुम न मेरे पास था और न ही हो पाने की कोई संभावना थी। तभी मंच पर ग़ज़ल पढ़ने आये राहत इंदौरी साहब। उन्होंने तहत में जिस अंदाज़ में अपनी ग़ज़ल पढ़ी, पूरा माहौल देर तक तालियों से गूंजता रहा। राहत साहब ने मुझे कहीं न कहीं एक राहत दी थी। हालाँकि उनकी तरह शेरों-ग़ज़लों की अदायगी सबके बस की बात नहीं। अपनी तरह से पढ़ने वाले वो अकेले शायर थे। उन्होंने ग़ज़लों को एक नयी धार, एक नयी चमक दी। उनकी रचनाएँ हम सबकी अमूल्य धरोहर हैं। उस रात इलाहाबाद में पढ़ी गयी उनकी ग़ज़ल का एक शेर–

हमसे पूछो कि ग़ज़ल माँगती है कितना लहू,

सब समझते हैं ये धंधा बड़े आराम का है।”

           मुंबई में रह रहे चित्रकार सफदर शामी अपनी दृश्य-छवि को इस तरह शब्दों में पिरोते हैं– “राहत इंदौरी को जानने और चाहने वाला कोई भी व्यक्ति अगर उनके बारे में कुछ कहना चाहे तो बहुत सारी बातें समान होंगी। इस की असल वजह ये है कि उनके शेरों में जो जोश है, तेवर है, बेबाकी है, क़लंदराना अंदाज़ है, दुनिया भर में उनके चाहने वालों में उनकी यही एक ख़ास पहचान है। दरअसल ये उनका स्वभाव और व्यक्तित्व ही था जिस की अक्कासी उनके शेरों में होती थी। मेरी थोड़ी रुचि उर्दू शायरी में और राहत भाई की गहरी रुचि चित्रकला में होने की वजह से इंदौर के ज़माने से ही उन से क़रीबी संबंध थे। मुझे याद है कि 1996 में आशीष बलराम नागपाल द्वारा आयोजित मुंबई की मेरी पहली एकल नुमाइश की ओपनिंग में राकेश श्रीमाल और कमलकांत के साथ राहत भाई आए थे। राहत साहब बहुत व्यस्ततम शायर थे, फिर भी गाहे-बगाहे मुलाक़ात हो जाया करती थी। लेकिन बीच में लंबे अरसे तक मुलाक़ात का संयोग नहीं हुआ था। लिहाज़ा पिछले बरस जब किसी के आग्रह पर मैंने राहत भाई का चारकोल में एक पोर्ट्रेट किया तो उसे देखने के फ़ौरन बाद उनका फ़ोन आया और बजाए किसी रस्मी बातचीत के शायराना अंदाज़ में मोमिन के शेर का मिसरा कहा “कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हें याद हो के न याद हो”

             प्रतिष्ठित चित्रकार अखिलेश राहत भाई को अलहदा अंदाज में याद करते हैं- “जब दुबई जाने का तय हुआ एक सुबह बाबा (एम एफ हुसैन) का फ़ोन आया कि आप आ रहे हैं तो अपनी पसन्द के कुछ कवियों की कविताएँ लेते आयें। बहुत दिनों से हिन्दी कविता की नयी पीढ़ी का कुछ सुना नहीं है। जल्दी में मैंने शिरीष ढोबले, उदयन वाजपेयी, व्योमेश शुक्ल, राकेश श्रीमाल और एकाध और कवि की कविता संग्रह या फ़ोटो कॉपी ली और चला गया। दूसरे दिन उन्हें कविताएँ पढ़कर सुनाई, जिसे सुनकर बाबा का मन प्रसन्न हुआ और वे तारीफ़ करते रहे। फिर उन्होंने आग्रह किया कि मैं दुबई में एक कवि सम्मेलन का आयोजन उनकी गैलरी की मदद से करूँ। जिसमें हिन्दी के पाँच कवि हों और उर्दू में कोई अच्छा शायर है या नहीं। यह पूछा, फिर ख़ुद ही कहा राहत इन्दोरी को ज़रूर बुलाना। अच्छी शायरी कर रहे हैं इन दिनों। पाँच हिन्दी के कवि हों। दो शायर और यहाँ से मैं पाँच अरबी के शायर चुनूँगा। गैलरी वाली भी साथ थी लेकिन उसी की अरुचि के कारण यह आयोजन न हो सका। दूसरा मौक़ा था बाबा के इन्तक़ाल के बाद उनकी स्मृति में इंदौर की गैलरी रिफ़लेक्शन के सुमित भाई ने एक शाम मुझे और राहत भाई को बोलने के लिए आमन्त्रित किया। राहत भाई ने बड़ी संजीदगी और आत्मीयता से बाबा को याद किया और उनसे जुड़े क़िस्सों को सुनाया। जिसमें एक वह भी था जब बाबा ने उनसे अगली फ़िल्म के गीत लिखने को कहा और वह काम पूरा न हो सका।”

            युवा चित्रकार सीरज सक्सेना बाकायदा भूमिका के साथ इस तरह दृश्य रचते हैं– “हर शहर की एक पहचान होती हैं ये पहचान वहां की मिट्टी, व्यवहार, भाषा और उस शहर के चरित्र से बनती हैं। देश विदेश में प्रसिद्ध इंदौर के शायर दिलदार राहत इंदौरी नहीं रहे। उनका पढ़ने का अंदाज़ निराला और आकर्षक था। हम सब इंदौर वाले, उनसे उम्र में छोटे हों या बड़े, उन्हें राहत भाई कह कर ही बुलाते थे। हालाँकि वे थे पिता की उम्र के और उन्हें हम वैसी ही मुहब्बत करते थे और करते रहेंगें। रिफ्लेक्शंस आर्ट गैलरी इंदौर में मेरी एकल छापा कला प्रदर्शनी “इन ब्रीफ़” (वर्ष 2018) का उद्घाटन उन्हीं के हाथों हुआ। ये वही हाथ थे जिन्होंने अपने जीवन सफर की शुरुआत ब्रश  से की थी। पचहत्तर के दौर में शहर के मालवा मिल इलाके में उनकी एक छोटी सी  दुकान हुआ करती थी जहां वे साइन बोर्ड पेंट किया करते थे। वे उस समय राहत पेंटर के नाम से मशहूर थे और उनकी दूकान “पेंटर वाली दुकान” के नाम से उस इलाके में पहचान पाने लगी थी। वस्त्र भण्डार, भोजनालय, किराना स्टोर आदि छोटी बड़ी दुकानों और शोरूम के साइन बोर्ड लिख कर वे अपना जीवन यापन करते थे। रोज़ शाम उस दुकान में अपनी मंडली के साथ (जब पेन्टरी का काम ख़त्म हो जाता था) शेरो-शायरी में  रमे रहते थे। यह वही दौर था जब राहत “इंदौरी” बन रहे थे। प्रदर्शनी में दिखाए गए मेरे ग्राफिक प्रिंट्स को देख उन्होंने देर तक बात की। चित्रों में लकीरों के बारे में बात करते हुए उन्होंने अपनी बात ग़ालिब के एक शेर से की– “देखना तक़रीर की लज्ज़त कि जो उसने कहा / मैंने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में हैं।”

सीरज ने यह भी बताया जो राहत भाई ने कहा– “कार्डियोग्राम लकीरें होती हैं उसे हर आदमी नहीं समझता हैं। दिल का मरीज़, जिसकी लकीरें हैं वह खुद भी नहीं समझता। लेकिन उन लकीरों की अहमियत और कीमत क्या हैं, यह सब को महसूस होता हैं। अगर ये लकीरें इधर उधर हो  जाए तो शायद हम भी इधर उधर हो जाएंगें। सीरज भाई से मेरी कोई ज्यादा मुलाक़ातें नहीं हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे एक या दो दफे मुलाक़ात हो जाए तो वे जिंदगी के लिए विरासत बन जाते हैं। मैं शब्द, अर्थ और अक्षरों की दुनिया का इंसान हूँ  जिस तरह एक शब्द भी अपने आप में एक ग्रन्थ की हैसियत रखता हैं या एक महाकाव्य हो सकता है या इतिहासखण्ड हो सकता हैं उसी तरह लकीरें और रंग भी जुबान रखतीं हैं, भाषा रखतीं हैं और अपनी कहानी अपना इतिहास रखतीं हैं। चूँकि सीरज शब्दों और रंगों के भी धनी हैं। ये दोनों की भाषाएं जानते हैं। अक्षर की भाषा रंगों तक पहुँचाना और रंगों की कहानी अक्षर तक पहुँचाना। इन दोनों को मिलाकर सीरज की शख्सियत बनती हैं।”

     सीरज आगे कहते हैं–  “जब भी इंदौर जाना होता और अगर वे शहर में होते तो उनके घर जरूर जाता। इस लॉकडाउन में भी जब मैंने अपने मित्र शुभाशीष चक्रबर्ती के साथ झारखंड के बच्चों के लिए “रंग जोहार” नामक एक चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की। तब भी हमारे आग्रह पर उन्होंने इस आयोजन  व बच्चों की हौसला अफजाई करते हुए एक वीडियो बना कर खुद को हम सभी के पास भेजा था। बच्चों को उन्होनें अपने विडियों संदेश में  रंगों की सोहबत के महत्व के बारे में आसान और  प्रभावी भाषा में  बताया। भाषा में व्यक्त उनका सम्प्रेषण सहज और सरलता से अपनाने की ताक़त रखता है। मेरी पहली किताब “सिमिट सिमिट जल” (कवि पीयूष दईया के साथ एक संवाद) के लोकार्पण के समय भी उन्होंने अपनी उपस्थिति को एक वीडियो के ज़रिए साझा किया था। हुसैन साहब और उनकी दोस्ती गहरी थी। राहत भाई जब मुंबई पहुंचे तो हुसैन साहब ने ही उनके रहने का बंदोबस्त किया और राहत भाई के यह कहने पर कि घर तो ठीक है। फर्नीचर भी पर्याप्त हैं। बस दीवारें सूनी हैं। जल्द ही हुसैन साहब ने अपना एक चित्र राहत भाई को उस दीवार के लिए दिया, जो आज भी राहत भाई के इंदौर के घर की दीवार पर है। हुसैन साहब और उनकी दोस्ती उन्हें केरल भी ले गई, जहाँ दोनों ने खूब रचनात्मक समय  बिताया।”

         शायरी के भारतीय परिदृश्य में निदा फाजली के बाद राहत इंदौरी का नहीं रहना एक ऐसे शून्य की निर्मिति कर गया है, जिसे भरने के लिए ना मालूम कितने लंबे वक़्त की जरूरत होगी। वे किसी विचारधारा के नहीं, बल्कि जन-शायर थे। अपनी आँखों में नमी और होंठो पर चिंगारियों को लिए यह शायर अपनी तरह के अलग और विशिष्ट कहन के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। उन्होंने एक अखबार से पिछले वर्ष कहा था– “मैं सोचता हूँ कि ऐसी दो लाइनें नहीं लिख पाया, जो मुझे 100 साल बाद भी जिंदा रख सकें। जिस दिन मेरी रुखसत की खबर आए, आप देखिएगा मेरी जेब, मैं वादा करता हूँ कि वो दो मुकम्मल लाइनें आपको मिल जाएंगी।”

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