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राजीव कुमार की कहानी ‘वंचना’

राजीव कुमार समीक्षाएँ लिखते हैं, कविताएँ लिखते हैं। यह उनकी पहली कहानी है। एक अलग मिज़ाज, अलग तरह की भाषा में लिखी कहानी-

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जुले खान आप बहार की तरह आयी थी और पतझड़ में गुम हो गई। पतझड़ में  महज पत्ते नहीं झरते, वृक्ष के सपने भी। किताबों ने इसे मौसमों से जोड़ा है, जबकि ये सपनों के दरकने के नज़्म है।  ऊंचाइयां शहर में किसी की बहुत होती कहां है। बुलंदी महज आभास है। सीधी खड़ी इमारतें बुलंदी का भ्रम हैं जुले खान। कम ज़मीन और ख्वाब ज़्यादा।  ज़मीन खिसक जाती है ख्वाब अधूरे रह जाते हैं। आप समय रहते ज़िन्दगी के भ्रम और तपिश काश समझ पातीं। जीवन में सब कुछ मशवरा है और फिसल जाने पर फिर समझौता है।

आप पराई पीर को अपने मरहम देना चाहती थी। नजदीक आ चुके लोगों को दिल में जगह देती रहीं। आपने उन रिश्तों को भी ढोया जिसमें जंग लग गई थी, उन पहचान को मुकम्मल समय दिया जो समय किसी और के हिस्से का था। बच्चे घर में ज़िद की तरह बड़े हो रहे थे, जो मुकम्मल नहीं हुए। उन पर पड़नेवाले सायों में गहरी दरारें थीं।  उन्हीं दिनों नवाज़ आपको भूलने की कोशिश में सहारे ढूंढ़ा किए। आपने कई ज़िंदगियां एक साथ जी लीं। नवाज़ कई खुशियों के हकदार होते हुए भी अपने को उनसे महरूम रख पाए। नवाज़ वक्त को ओढ़े अपनी पहचान ढूंढते रहे।

यह एक मानसिक अवसाद की स्थिति है  जुले खान। जो प्यार आपका बहुत पहले खत्म हो चुका है, जो रिश्ता अब कहीं नहीं, एक छत के नीचे रहते हुए भी आवाज़ें देने से आत्मा को सुला चुकनेवाला आपकी सदाएं नहीं सुन रहा हो तो अपने बीते दिनों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। जली ठूंठ में कोपलें  नहीं आतीं। सरगोशियां मनहूसियत की जानिब नहीं जातीं।  कोई रास्ते पर तो था, मंजिलों से पहले हाथ छोड़ गया, दोष रास्तों का है नहीं। उसे शायद देर से पता चला हो, जिस पर चलता रहा वह रास्ता कोई और है। जुले खान भूलें आप दोनों से होती रही हैं। हमने वो तस्वीर पलट दी जो आइने की तरह आपका चेहरा दिखाती रही। हमने कूचियां सही नहीं उठाई, रंग वहीं नहीं लगे जहां उनकी ज़रूरत थी।

नवाज़ मशहूर शायर थे। अपनी दीवानगी में दिन रात  गुजारने वाले। नवाज़ के लिए उनकी शायरी, मुशायरे, वाह वाह करते आशिक, कुछ कांच के अक्सर टूटते हुए सामान और एक बोतल पहला प्यार था। जुले खान आपकी कहानियां और आपके सपने उस प्यार का हिस्सा नहीं थे। नवाज़ की दीवानगी से निकलते चले गए आपके अफसाने। आपके किरदार आपकी ही दुनिया के लोग थे। नवाज़ का दावा था कि वे उन किरदारों के असली चेहरे पहचानते थे। इन चेहरों का ज़िक्र नवाज़ करते, और उन्हें आपकी खामोशी बता जाती कि  ये दरख़्त हो चुके आपकी दुनिया में। आप खुले मिज़ाज की थीं, नवाज़ के महल के सभी दरवाज़े बंद थे। एक आध दरवाज़ा तभी खुलता जब कोई वज़न वाला अशआर ज़ोर से दस्तकें देता।

नवाज़ अनचाहे ही अपनी शिकस्त को अपनी बुलंदियां बना चुके थे। वे उन सरहदों के पार चले गए थे जहां पूरी कायनात उन्हें उनके लिए सजी हुई लगती।  उनका दिल चाहता कि सब कुछ उन्हीं के लिए हो, उन्हीं के इर्द गिर्द हो। हवाएं उनके लिए बहे, फूल उनके लिए खिलें। जुले खान आपका खुलापन उन्हें अपने साम्राज्य से वंचित करता हुए दिखता। आप दोनों की मरिचिकाएं अलहदा थीं। आप दोनों अलग अलग ख्वाबों का पीछा कर रहे थे। आप समझ ही नहीं पातीं कि नवाज़ जो दरवाजों में छिपते जा रहे वे आपके खुले में बिंदास होते जाने की वजह से। हवा का तेज़ झोंका खिड़कियों के बाहर समझ में जैसे ही आता है चिराग जो घर के अंदर  महफूज़ हैं, खौफजदा हो जाते हैं। नवाज़ वंचित महसूस कर रहे थे। लौ पर अपने अचानक बुझ जाने का खतरा मंडराने   लगता। अल्फा मेल जो बयान नहीं कर पाते करीब से देखो तो यह उनका भयानक सच होता है।  शायरी उन्हें मशहूर कर रही थी पर एक ठसक उन्हें छोड़ती नहीं थी कि ज़िन्दगी पर वे  ही काबिज हैं। जुले खान उनकी इस दबंग दुनिया  से उन्हें आपकी आजाद खयाली ने वंचित कर दिया। आप को जो दोस्त सुकून दे रहे थे, उनके अहसास मात्र से खंडित होने लगते नवाज़। नवाज़ ने सेल्फ डिनायल को ख्वाब बना लिया।

अखबार के दफ्तर से जब तक आप लौटती नवाज़ शाम ढलते ही दूसरी दुनिया में प्रवेश कर चुके होते।   दूसरी तरफ आप दफ्तर से लौटते हुए कुछ दोस्तों को थकान और अजनबी रास्तों से  विदा कर रही होतीं। आप इन बातों से अक्सर परेशान रहती, जिसका ज़िक्र तो नहीं होता  कभी परन्तु उलझनें ऐलान होती हैं छीजते रिश्तों का । आप के कुछ दोस्त निकल जाते अचानक आपकी ज़िन्दगी से और कुछ ज़िन्दगी में बहुत दूर तक दाखिल हो जाते  ।  घर तक आते आते आपको दूसरी चिंता घेर लेती। आपको एक ऐसे व्यक्ति की दुनिया में प्रवेश करना होता जहां आपका खुलापन बहुत सिकुड़कर छोटे दरवाज़े से अंदर घुसता और मोडे हुए छाते की तरह घर में कहीं भी रख दिया गया हो जैसे। आपका  नवाज़ जो सुबह आपके साथ नाश्ते पर था वही नवाज़ शाम में नहीं मिलता आपको। सिकुड़ा हुआ छाता,  फर्श पर पड़े गीले मोटे कपड़े से संवाद कैसे करे, यह एक बड़ी समस्या थी। फिर  ढलती हुई रातों में भी आपकी आपसी मुलाकातें  भी तो मुद्दतों पहले सिर्फ जिस्मानी हो चली थी, एक रूह की तरह के शुरुआती सपनों के बावजूद। देह और हृदय में ताल मेल नहीं हो और मशीनी हो जाए सब कुछ तो समझ लेना कि रिश्ते को रीते हुए अरसा हुआ।

जुले खान कुछ हदें आपके खुद की घोषित मासूमियत ने भी तोडी थीं। आपकी दुनिया में कुछ लोग थे जो नवाज़ को नापसंद थे। नवाज़ की नाराज़गी व्यक्ति से उठकर रस्मो रिवाज तक जाते। परछाइयां घेरने लगतीं दायरों को। दायरे शक के कनवास होते गए समय बीतते।  उधर उन लोगों का होना आपको यह विश्वास दिलाता कि एक अलग समाज जो बिल्कुल आपका है, आपके साथ खड़ा है। यह भी यूटोपिया ही है जुले खान।  और धीरे धीरे नवाज़ का हुनर अहंकार में बदल गया। अहंकार विशेषकर पुरुष का, त्वरित प्रतिक्रिया देता है। प्रतिक्रियाएं अमूमन अपनी तासीर में हिंसा लिए होती हैं। उसने तुरंत अपनी प्राथमिकताएं तय कर ली। उसमें कितनी हिंसा थी और खुद को खत्म करने की चाहत, नवाज़ समझ भी नहीं पाते।

जुले खान कभी गोवा गईं आप साथ, जब आपका वक्त ढहने लगा था।  रेत , सेहरा, समंदर, नशा कुछ तो आप दोनों को खींचता अपनी ओर। कभी श्रीनगर के बागों में घूमते हुए हाथ थामा एक दूसरे का यह कहते हुए कि यहां जहांगीर और नूरजहां की दास्तां चप्पे चप्पे पर है।  कभी रेस्त्रां में तीसरी कॉफी पीते हुए कहा कि हम बहुत देर से यहां बैठे हैं अब चलें। नवाज़ एक बेनाम वीरानी हमारी आंखों में सफर करने लगी है। हमें सूनेपन से बचना चाहिए। कभी कहने की कोशिश की नवाज़ हम एक ही रास्ते पर चलते हुए खो गए हैं और एक दूसरे को ढूंढ भी नहीं रहे हैं। जुले खान पहाड़ों में ठंड के लिए नहीं जाते जोड़े, ऊंचाइयां और दरख़्त ऊपर उठने का अहसास भर देते हैं। मांडू जाकर कुछ वक्त गुजारते दोनों। जल महल में आज भी संगीत है। रूपमती के महल से नर्मदा आज भी हहराती  तेज़ बहती हुई दिखती है। आंखें हर्षित हो जाएंगी। बाजबहादुर आज भी प्रेम की धुन और जीवन राग गा रहे हैं वादियों में। जीवन में प्रेम भरने के ये आजमाए हुए नुस्खे हैं लुकमान के बताए हुए।

आपने पूरी कायनात को अपने वश में करना चाहा।  अपने प्यार और घर के साथ बहुत कुछ संभाल सक रही थीं आप। आप में यह हुनर भी था और अंदर से चाहत भी।  आपकी बुलंदी भी यही होती। पर नवाज़ को अपनी परवाज़ समझा नहीं सकीं आप। नवाज़ आपकी हदें तय करते थे। आप विस्तृत होना चाहती थीं । आप अपने सपनों और अपने विस्तार की ज़रूरतें और उसका महत्त्व समझा नहीं पातीं कभी। खुलकर आपको भी आना चाहिए था। नवाज़ भी बता न पाए कि एक विदुषी स्त्री के विस्तार को वो क्यूं कुछ स्वघोषित सरहदों में रखना चाहते हैं  । कुफ्र दोनों ने ही किया। घर दीवारों में खो जाते हैं।  घर आखरी बार किसके हाथ से फिसला था, दोनों को पता नहीं चला। वजह अपने रिश्ते और घर के दरकने की आप दोनों ने अलग अलग दलीलों में ढाला।

एक सांस में जुले खान को इतनी  सारी बातें कह गईं  डॉक्टर याजदा।  याज़दा साइकियाट्रिस्ट थीं। जुले खान उनसे लगातार सेशन पर मिलती रहीं। रिश्तों के टूटने की वजह का इल्म था उन्हें। याज़दा झुलस गई बूंदों और पहली फुहार का मर्म जानती थीं । याज़दा ने ऐसे जोड़े देखे थे जो घाटी के अंतिम पत्थर से गिर जाने से पहले लौट गए,  ऐसे भी जो फिसले तो फिर कभी ज़िन्दगी से मिले नहीं। उन्होंने रेशा रेशा समझा था जुले खान को और नवाज़ को।  जुले खान निकल गईं थीं वापस, अजीब चुप्पी लिए थोड़ी देर तक कुछ और  इधर उधर की बातें करके।

याज़दा जाती हुई जुले खान को देखती रहीं । वो जानती थीं जुले खान लौटकर अब उनके पास नहीं आएगी। उनके दरम्यान यह अंतिम अंतरंग बैठक थी। सच में एक ज़हर होता है जो घुलने में वक्त तो लेता है पर निगल जाता है आपका आदिम सोंधापन। सच का सामना दरवेशों से ही संभव है ।  जो आंधियों में नहीं पला, जिसने तेज़ बारिश में एक अदद ठौर की तलाश में एक उम्र नहीं गुजारी  सच उसे उठने नहीं देता । याज़दा  यह भी जानती थीं जुले खान अपने को बदल भी नहीं पाएंगी। खून का स्वाद कहते हैं विचित्र होता है। आप  जब डूबते जाते हैं  दुनिया के बदलने तक का हौसला लिए फिर आप नहीं होते अपनी ही दुनिया में। रस, गंध, चाहत, स्मृति खून की शक्ल में आपकी जीभ पर होते हैं।  जीभ हिंसक बनाती है। नवाज़ की ज़िद बढ़ती जाएगी। नवाज़ ने भी अपने घर, रिश्ते और खुद को खत्म करने का जैसे वादा कर रखा हो। वह व्यक्ति समझौता सीख नहीं पाया।

याज़दा ने अपनी आंखें ऐसे पोंछी जैसे आंसू ढलक आए हों। आखरी बार जाते हुए  एक ऐसे रोगी को देख रही थीं, जिसे संभाला जा सकता था। बस तो उजड़ी हुई दुनिया भी जाती है, यहां तो दीवारों का टूटना बाकी था।   उसे  मरीज़ से इतने लंबे रिश्ते के बाद  लगता रहा है कि  चारागर की संवेदना मर्ज संभाल नहीं पाने की वजह से आहत हुई है। मरीज़ चाहता  ही नहीं था कि वो ठीक हो जाय। चारागर चाहता था मरीज़ बेशकीमती ज़िन्दगी की डोर को जोर लगाकर थाम ले। इस रिश्ते में रिश्ते निभाने की चाहत ढूंढती रह गईं याज़दा , वो कहीं मिली नहीं। अलबत्ता अपनी अपनी खुदकुशी को तैयार दी ज़िद्दी लोग मिले। उंगलियां लौट गईं बिना आंसू पकड़े। सच तो यह है कि चिकित्सक की आंखें नम नहीं होती। ऐसे कई और लम्हे हैं अतीत के जो खुशी नहीं दे सके। थोड़ी देर बाद ही आंखें दूसरे किसी नए रोगी का अक्स टटोलने लगती हैं।

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One comment

  1. अरसे बाद एक अच्छी कहानी पढ़ी। कथ्य, शिल्प और भाषा हर कसौटी पर खरी।राजीव जी की यह पहली कहानी है,ये विश्वास करना मुश्किल है। फिर भी अगर आगाज़ ये है तो …. हार्दिक बधाई राजीव जी को।

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