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‘ठाकरे भाऊ’ पुस्तक का एक अंश

आज भारतीय राजनीति के सबसे रहस्यमय नेताओं में एक बाल ठाकरे की 95 वीं जन्मतिथि है। वे कभी किसी पद पर नहीं रहे लेकिन मुंबई के सबसे शक्तिशाली नेता बने रहे। हिंदुत्ववादी राजनीति की एक मज़बूत धुरी रहे। उनके परिवार और विशेषकर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की राजनीतिक यात्रा को लेकर धवल कुलकर्णी की किताब आई है ‘ठाकरे भाऊ’राजकमल से प्रकाशित इस किताब का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद मैंने किया है। उसका एक अंश पढ़िए- प्रभात रंजन

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राज के एक निजी दोस्त और बाद में उनके साथ मनसे में शामिल होने वाले व्यक्ति ने बताया कि शिवसेना छोड़ने के बाद राज बहुत भावुक हो गए थे, यहाँ तक कि बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली बैठकों में वे रोने भी लगते थे। उनका कहना था कि राज ने पिछले सालों में मतभेदों को दूर करने की जितनी कोशिशें की थीं सब बेअसर रहीं। ‘राज के लिए वह दौर बहुत दुखदायी था, उसके दुख का एक प्रतिशत कारण शिवसेना से उनका अलग होना था लेकिन 99 प्रतिशत कारण अपने चाचा से हुई अनबन थी’, राज के क़रीबी एक वरिष्ठ संपादक ने बताया।

कहा जाता है कि राज का इस्तीफ़ा पत्र संजय राउत ने तैयार किया था। ‘पत्र की भाषा संतुलित थी और उसने पार्टी छोड़ने संबंधी कारणों को बताया था। बालासाहेब ने पत्र पर एक नज़र डाली और संजय राउत से बोले कि यह तुम्हारा काम है!’ शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता ने बताया।58 संजय राउत 1990 में सामना से कार्यकारी संपादक के रूप में जुड़े थे, सेना प्रमुख के पसंदीदा लोगों में थे और अख़बार में आक्रामक संपादकीय और लेख लिखने के कारण उनको एक तरह से बाल ठाकरे का दूसरा रूप कहा जाता था। राउत, राज के पिताजी श्रीकांत के करीबी थे। राज और राउत में दोस्ती बरकरार थी।

दुर्भाग्य से, जब संजय राउत और मनोहर जोशी को बाल ठाकरे ने अपना दूत बनाकर राज के पास भेजा तो राज के समर्थकों ने उनकी कार तोड़ दी। जिस दिन राज ने पार्टी छोड़ने के बारे में औपचारिक घोषणा की उस दिन टाइम्स समूह के मराठी दैनिक महाराष्ट्र टाइम्स में पहले पन्ने पर यह ख़बर छपी थी कि राज शिवसेना छोड़ना चाहते थे।

‘मैं पार्टी दफ़्तर में शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता से मिला था जो राज के क़रीबी थे। बातचीत के दौरान वह उद्धव के क़रीबी सुभाष देसाई के बारे में बहुत भला-बुरा कहते रहे। इससे मुझे लगा कि राज की नाराज़गी बहुत ज़ाहिर थी तो क्या ऐसे में वह राणे के रास्ते जाने वाले थे? बाद में, मैंने राज को फ़ोन किया और सीधे पूछ लिया कि क्या वह शिवसेना छोड़ने वाले थे? उन्होंने जिस तरह से गोलमोल जवाब दिया उससे बहुत कुछ समझ में आ जाता था। राज ने इस बात का खंडन नहीं किया, बस यही कहा कि इस विषय में बाद में बात करते हैं’, सचिन परब ने बताया। उसने अपने स्रोतों से बात करके स्टोरी लिखी। उसके स्रोतों ने भी यही कहा कि उसका अनुमान सही था।

जब महाराष्ट्र टाइम्स और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ख़बर छपी तो ग़ुस्साए शिव सैनिकों ने उसकी प्रतियाँ जला दीं। जबकि राज के समर्थक उनके दादर स्थित घर के बाहर जमा होने लगे।

बहुत बाद में, 2018 में अपने दोस्त और अभिनेता अतुल पारचूरे से बात करते हुए राज ने अपने प्रिय पटकथा लेखकों सलीम-जावेद से जुड़ा एक वाक़या याद किया। ‘मैंने सलीम साहेब से एक बार पूछा कि आपकी जोड़ी किस तरह टूट गई? तो उन्होंने कहा, हर उत्पाद की एक एक्सपायरी डेट भी होती है’, राज ने कहा।

शायद सलीम-जावेद की जोड़ी की तरह ही शिवसेना के साथ राज के रिश्तों की भी मियाद पूरी हो गई थी।

निखिल वागले ने पहले कहा था कि उनके मामा चंद्रकांत वैद्य, इतिहासकार बाबासाहेब पुरंदरे तथा ज्योतिषी और व्यवसायी जयंत सालगाँवकर दोनों भाइयों में मेलमिलाप की कोशिश करते रहे, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ।

इन दुखी करने वाली ख़बरों के बीच छगन भुजबल भी व्यथित थे। इसके बावजूद कि उनको काफ़ी कड़वाहट के साथ शिवसेना से अलग होना पड़ा था उनका शिवसेना के साथ भावनात्मक रिश्ता था। ‘मैंने सेना छोड़ने के बाद सेना प्रमुख, उद्धव या राज से कभी बात नहीं की थी। लेकिन उनके बीच झगड़े की ख़बरें आईं तो मैंने राज और उद्धव दोनों को फ़ोन किया और अपने-अपने फ़ैसले के ऊपर फिर से विचार करने के लिए कहा। लेकिन जो होना था वही हुआ’, वह बोले।65 आज भी भुजबल को ऐसा लगता है कि दोनों भाई अगर साथ रहे होते तो अपने बूते पर पूरे महाराष्ट्र पर राज करते। ‘राज बालासाहेब की तरह आक्रामक वक्ता हैं जबकि उद्धव हालात को समझते हुए बहुत अच्छी तरह से योजनाएँ बनाते हैं।’

राज के एक पूर्व सहयोगी ने बताया कि उसके नेता इस बात के ऊपर भी विचार कर रहे थे कि राजनीति छोड़कर व्यवसाय किया जाए और कार्टून बनाकर अपने प्रिय शौक़ को पूरा किया जाए। कॉलेज के दिनों से राज के मन में यह सपना था कि वह वाल्ट डिज़्नी के स्टूडियो में काम करें। उन्होंने अपने समर्थकों के कहने पर राजनीति में बने रहने का फ़ैसला किया। उनके समर्थक भी शिवसेना से निकलना चाहते थे।

उद्धव और राज दोनों के क़रीबी एक वरिष्ठ शिवसेना नेता ने बताया कि ठाकरे बंधुओं में जो छोटा था वह अक्सर अपने चाचा से राजनीति छोड़ने के बारे में कहता रहता था। ‘राज ने इसके बारे में विचार करके कम से कम दो या तीन बार बालासाहेब से कहा कि अगर वह पार्टी और घर में कलह का कारण बन गया है तो वह इसे छोड़ना चाहेगा’, उन्होंने आगे बताया।

उनके पुराने व्यवसायी सहयोगी ने यह बताया कि ‘राज के पास पार्टी छोड़ने के अलावा उस समय कोई विकल्प नहीं रह गया था। एक तो इसलिए कि शिवसेना कमज़ोर होती जा रही थी और राज ने सोचा कि इससे पहले पार्टी और नीचे जाए अपने समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ देनी चाहिए।69 ‘कुछ फ़ैसले सही समय पर ले लेने चाहिए। राज के पक्ष में उसकी आयु थी और वह इस लाभ को गँवाना नहीं चाहता था। उसने बालासाहेब को पार्टी छोड़ने के अपने फ़ैसले के बारे में बता दिया था। बालासाहेब को शायद यह पता था कि इस तरह के हालात आने वाले थे लेकिन शायद अपना ख़ून ज़्यादा प्यारा होता है।’

राज पार्टी संगठन में बड़े बदलावों के लिए कह रहे थे, और उनका ग़ुस्सा सुभाष देसाई पर था जिनके बारे में उनको लगता था कि वह उसके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचता रहता था। जनवरी 2006 में सामना को दिए एक इंटरव्यू में बाल ठाकरे ने इसे स्वीकार किया था। बाद में सेना प्रमुख ने आरोप लगाया कि आज के आसपास के लोगों ने उसके कान भर दिए थे।

देसाई फडणवीस सरकार में उद्योग मंत्री थे और बाल ठाकरे के ज़माने के एकमात्र नेता हैं जो उद्धव ठाकरे के अंदरूनी दायरे में शामिल हैं। देसाई उद्धव ठाकरे सरकार में भी मंत्री हैं। ‘पहले राज शायद ही कभी पार्टी छोड़ने की बात करते थे या जब उनके सहयोगी उनको ऐसा करने के लिए कहते थे तो वे शायद ही कोई जवाब देते थे। लेकिन जब मालवन उप चुनाव में आधे रास्ते से लौटकर आने के बाद उन्होंने अपने कुछ बेहद क़रीबियों के साथ बैठक की, उसमें उन्होंने कहा कि अब सब ख़त्म हो गया। वह सही समय आने पर शिवसेना छोड़ देंगे’, एक पत्रकार ने दावा किया, जो राज के अंदरूनी दायरे के आदमी रहे हैं।

सचिन परब ने दर्ज किया है कि राणे शिवसेना के पहले ऐसे बाग़ी थे जिन्होंने शिवसेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। उन्होंने ऐसा माहौल बना दिया था कि जिसमें पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। ‘सेना के लिए हालात इतने बुरे हो गए थे कि कई बार मुंबई में राणे के लोगों का मुक़ाबला करने के लिए इनको ठाणे से आदमी बुलाने पड़ते थे। इस तरह की चर्चाएँ थीं कि राणे विलासराव देशमुख के स्थान पर मुख्यमंत्री बनाए जा सकते थे’, उन्होंने कहा।

राज के खेमे में केवल एक ही सवाल था कि पार्टी छोड़ी कब जाए। ‘कुछ लोग तो तत्काल छोड़ देना चाहते थे, जबकि कुछ लोगों का यह मत था कि जब तक बाल ठाकरे ज़िंदा थे तब तक उनको इंतज़ार करना चाहिए। अंत में, पहली तरह के सोच वाले हावी हो गए’, परब ने बताया।

लोकसत्ता अख़बार के साथ बातचीत में 2012 में राज ने कहा कि शिवसेना छोड़ने का ख़याल लगभग एक दशक से था। उन्होंने यह माना कि उनके पास दो विकल्प थे कि या तो राजनीति ही छोड़ दें या अपना राजनीतिक दल बना लें।

वागीश सारस्वत की पैदाइश उत्तर प्रदेश की थी और उन्होंने बाद में मनसे की सदस्यता ली। उन्होंने याद करते हुए बताया कि उन्होंने 21 जुलाई 2005 को राज को अपने कविता संग्रह एकलव्य का अँगूठा का लोकार्पण करने के लिए आईएमसी ऑडिटोरियम में आमंत्रित किया।

इसकी शीर्षक कविता महाभारत की एक कहानी से ली गई थी। एकलव्य एक आदिवासी राजकुमार था जिसने स्वाध्याय से धनुष चलाना सीखा था लेकिन वह कौरव-पांडवों के गुरु द्रोण को अपना गुरु मानता था, जबकि उस ब्राह्मण योद्धा ने उसके कुल के कारण उसको सिखाने से इनकार कर दिया था। लेकिन इस कविता में एकलव्य अपने गुरु के यह कहने पर कि वह अपना दाहिना अँगूठा गुरुदक्षिणा में दे दे, विद्रोह कर देता है।

‘राज साहेब ने किताब माँगी और कविता पढ़ी। बाद में पुस्तक के लोकार्पण में वे आए और उन्होंने हिंदी में बोलते हुए कहा कि उनको भाषा से कोई दिक्कत नहीं थी। शिवसेना छोड़ने के बाद राज ने कहा कि मेरी कविता में एकलव्य ने जिस तरह से विद्रोह किया था उसने उनके निर्णय को प्रभावित किया था’, सारस्वत ने कहा।

‘बालासाहेब को अंत तक ऐसा लगता रहा, चाहे यह उनका भोलापन रहा हो या चालाकी कि उद्धव और राज एक होकर उनके उत्तराधिकार को सँभालेंगे, आधुनिक लव-कुश की तरह’, एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना था, ‘उनको शायद ऐसा नहीं लगता था कि दोनों के बीच का झगड़ा इस हद तक बढ़ जाएगा।’ उनका कहना था कि बाल ठाकरे शायद चाहते थे कि राज का करिश्मा तो रहे लेकिन सेना का अगला प्रमुख उद्धव ही बने।

‘बालासाहेब उद्धव के ऊपर बहुत अधिक निर्भर करते थे और यह ज़ाहिर बात थी कि राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में वह उनकी पसंद थे। शायद बालासाहेब को ऐसा लगता था कि जिस तरह से उनके छोटे भाई श्रीकांत बेहद प्रतिभाशाली होने के बावजूद हमेशा उनकी छाया में रहे, उसी तरह से राज भी रहेंगे’, राज के एक दोस्त का कहना था।

बाल ठाकरे के नज़दीकी बताते हैं कि जब राज ने पार्टी छोड़ने का फ़ैसला किया था तो बाल ठाकरे को कितनी तकलीफ़ पहुँची थी। 2012 में आईबीएन लोकमत के लिए निखिल वागले से बात करते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैं उसको कैसे भूल सकता हूँ कि वह हमारे परिवार का है। वह इसी मातोश्री में पला-बढ़ा। मीनाताई उसको अपने हाथ से खाना खिलाती थी। वह मेरे साथ खेलता था, मैं उसको मातोश्री की छत से हवाई जहाज़ की बत्ती दिखाता था। रिश्ते की बात तो एक तरफ़ रहने दो, वह जो कर रहा था मैं तो इस बात से हैरान था कि उसने ऐसा किया क्यों?’

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