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मिट्टी में काम करते हुए समय जैसे स्थिर हो जाता है: सीरज सक्सेना

चित्रकार, सेरेमिक कलाकार सीरज सक्सेना के साथ कवि-संपादक राकेश श्रीमाल की बातचीत की किताब आई है ‘मिट्टी की तरह मिट्टी’सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का एक अंश प्रस्तुत है-

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मिट्टी में काम शुरू करने के बहुत पहले, यानी बचपन में मिट्टी से खेलते हुए, मिट्टी को भूमि समझते हुए, आख़िर कैसे आपका शुरुआती अबोध लगाव मिट्टी के साथ हुआ? और उस नासमझ उम्र में मिट्टी के मायने आपके लिए क्या थे?

हर बचपन की तरह मेरा बचपन भी सामान्य था। हर माता-पिता की तरह मेरे माता-पिता ने भी हम दोनों, लगभग समान उम्र के भाइयों, को उनकी क्षमताओं के अनुसार बहुत लाड-प्यार और पढ़ाई के लिए अनुशासन की छाया के साथ बड़ा किया। बचपन निमाड़ के खरगोन में बीता। पिता उस वक्त राज्य परिवहन में मैनेजर थे। उस वक्त तक वे (उनके पिता जिन्हें हम बाबा कहते थे) के दबाववश भारतीय सेना छोड़ चुके थे। खरगोन के आसपास के गाँवों में उनके मित्रों के घर हम जाया करते थे। निमाड़ की काली मिट्टी के खेतों से भुट्टे कपास तथा अन्य खेतों में उगने वाली फसलों को करीब से देखा करते थे। काली मिट्टी में कई बार जूते धँस जाते थे और फिर हमें उठाकर वहाँ से सूखी ज़मीन पर खड़ा किया जाता था। जूते से खेत की काली गीली मिट्टी का एक टुकड़ा मैं देर तक अपने हाथ में रखता था। कुछ देर में वह सूखकर एक छोटी गोली में बदल जाता था। वह गोली मेरी छोटी सी जेब जिसमें गोली ही रखी जा सकती थी खरगोन तक आती और खिलौनों के बीच गुम हो जाती थी। यह अनायास ही होता था। उस वक्त मुझे मिट्टी की कोमलता और उसमें स्पर्श के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। गॢमयों की छुट्टियों में जब हम अपने नाना के घर एक माह के लिए जाते तो मामा जी के खेत, जो अभी बुआई के लिए तैयार हो रहे होते थे, हम भाइयों के लिए बड़ा खेल का मैदान होते और ट्यूबवेल की बड़ी और छोटी दो हौदियों से होता हुआ क्यारियों में बहता पानी खेतों की ओर जाता। एक खेत में जब पानी भर चुका होता तो उन्हीं क्यारियों को बन्द कर दूसरे खेत की ओर पानी को छोड़ा जाता। मिट्टी, जो पानी में घुल जाती है, वह पानी रोक भी लेती है यह सब खेतों के क्रियाकलाप रोमांचित करते। हम भी ट्यूबवेल के बहते पानी से खेलते मिट्टी से उन्हें बीच में रोकते तो कभी मिट्टी हटाकर बहते पानी में उठतीं छोटी-छोटी भँवरों को देख उनमें तिनके तैराते। दूर बहते पानी के पास बहुत से सफेद बगुले भी आते और खेतों में कुछ चुगते हमें लगता कि वे भी हमारी तरह पानी और मिट्टी से ही खेलने आए हैं। जब बहुत छोटा था तो मुझे याद है कि मैं हर बच्चों की तरह थोड़ी मिट्टी चाट भी लिया करता था तो कभी चॉक। मुँह सफेद होता तो मम्मी समझ जातीं। पर यह सामान्य ही था। अब लगता है कि बचपन में जब मिट्टी छूती है उँगलियाँ या शायद स्पर्श ढूँढ़ती हो। खेत में ट्रेक्टर की जुताई से उभरती मिट्टी में मिट्टी की लकीरें भी मुझे तब भी और आज भी बहुत आकर्षित करती हैं। एक तमन्ना है कि खेतों को अपने रेखा संयोजन से जोतूँ और फिर उनमें गेहूँ बोऊँ। फिर अपने लहलहाते हरे रेखांकन को बढ़ते हुए, और कटते हुए देखूँ। किसान अपने खेत में कितने तरह के रूपों और रंगों के साथ वर्षभर रमा रहता है, यह भी देखा है अपने बालपन में। मिट्टी के घरौंदें भी खूब बनायें हैं और मिट्टी के खिलौने (जो उस वक्त सहज ही मिल जाया करते थे) से भी खूब खेला हूँ। मिट्टी को कई बार खेल-खेल में चखा भी है। मिट्टी में लकड़ी से रेखांकन करने में भी बहुत आनन्द आता था। आज की तरह हमारे बचपन में अधिक रोका-टोकी (प्रतिबन्ध) नहीं थी और न ही माता-पिता को बच्चों के लिए किसी भी प्रकार का भय था। पर उस वक्त बिल्कुल भान नहीं था कि बड़े होकर यही मिट्टी मेरे लिए सम्प्रेषण का माध्यम होगी।

ऐसा कब और कैसे हुआ कि मिट्टी से खेलते हुए, उसकी नमी या गीलेपन ने आकार लेना शुरू किया और वह एक अघोषित तालीम की तरह आप के जीवन में उतरता गया?

बचपन में मम्मी के आसपास ही मैं घूमता रहता था;  उनके बिना मेरा मन नहीं लगता था। वे जब रसोई में खाना बना रही होती थीं तब भी मैं उनकी साड़ी के पल्लू से चिपका रहता था। आटा गूँधने के बाद वे रोटी बनातीं और मुझे आटे का एक टुकड़ा दे दिया करतीं जिससे मैं उनके पास ही बैठा उस आटे से खेलता रहता। यह खेल उनके लिए भी सुविधाजनक था क्योंकि इस खेल के बहाने मैं भी उनके करीब ही रहता था। आटे में भी मिट्टी की तरह ही लोच होती है। मैं आटे से चिडिय़ा या छोटी रोटी या कोई अन्य आकार बनाता था और मम्मी के साथ देर तक रसोई में रहता था। रसोई मेरे लिए एक खेल की जगह थी। यहाँ मेरा खूब मन लगता था। मैं आटे से और भी तरह-तरह के आकार बनाता था जिसे मम्मी तवे या कढ़ाई में पकाती और जब वह पका हुआ आकार भोजन की थाली में आता तो मैं बहुत खुश होता था। यह सिलसिला कुछ साल चला और जल्द ही मैंने चकले पर बेलन से रोटी और पराठा बनाना भी सीख लिया। जब मम्मी का उपवास होता तो मैं उनके लिए पराँठें बनाता। जिसे वे उसके अनगढ़ आकार की परवाह किये बगैर चाव से ग्रहण करतीं। यहाँ मिट्टी नहीं थी पर यह अनुभव मेरे ज़हन में गहरे से घर कर गया। आज भी मेरे मिट्टी में काम करने के औज़ारों में बेलन विशेष रूप से अनिवार्य है। बेलन के बिना मेरा काम थोड़ा मुश्किल है। बेलन एक ऐसा टूल है जो हर देश में व्याप्त है। मैं जहाँ भी गया हूँ वहाँ सिरेमिक स्टूडियो में मुझे भाग्यवश बेलन मिला है जिसकी वजह से ही मैं देश-विदेश में अपने शिल्प गढ़ पाया हूँ। रसोई में आटे के रूप में मैं कई आकारों को बनते और उन्हें पकते देखता था। हर आकार की $खुशबू और स्वाद भिन्न होता है। होली के पहले गुजिया बनने का रिवाज़ घर में रहा है और मेरे पिता भी बड़े उत्साह से मम्मी का हाथ बटाँते हैं। मुझे कभी रसोई में यह नहीं लगा कि यह काम लड़कियों का है जिसमें मैं रुचि लेता हूँ। हालाँकि मेरे भाई की रुचि अन्य खेलों में थी और वे घर के बाहर अपने खेल में व्यस्त रहते थे। कभी गोल फूली हुई कचोरी कढ़ाई से निकलती तो कभी चिप्स या पापड़, कभी पूरन पोली बनती तो कभी आलू के पराँठें, कभी अनरसे बनते तो कभी बेसन गट्टे, कभी दाल बाफले बनते तो कभी लड्डू। हर दिन रसोई में एक नया आकार बनता और शायद इसी वजह से मेरे मन में रसोई के प्रति कभी ऊब नहीं रही। आज भी मुझे रसोई में प्रयोग करते रहने में आनन्द आता है। विदेश में भी मुझे किसी भी रसोई में जाने में कभी हिचक नहीं हुई। जब आर्ट कॉलेज पहुँचा तब वहाँ पास ही की बस्ती की महिलाएँ कोयले के पाउडर से छोटे-छोटे गोले बनाती और उन्हें धूप में सुखाती जब वे सूख जाते तो वे इससे अपना चूल्हा जलातीं। जब वे काले गोले ज़मीन पर सूख रहे होते थे तब आकर्षक लगते थे। मेरे शुरुआती सिरेमिक के कामों में उससे सम्बन्ध सा$फ देखा जा सकता हैं। बल्कि आज भी मेरे नये सिरेमिक संस्थापनों में वह असर दिखता है। आटे में लोच और तरह-तरह के आकार गढऩे का मेरा अभ्यास मेरे लिए सिरेमिक स्टूडियो में आज भी काम आ रहा हैं। पर बचपन में यह कल्पना कभी नहीं की थी कि यह माध्यम मेरे जीवन में अन्त तक साथ रहेगा।

खेल-खेल में आटा गूँथने की शुरुआत ने रूप-आकार गढऩे के लिए कैसे उम्र भर प्रेरित किया?

खेल की बात बचपन तक साथ रही। बचपन बीता और वे सब बातें भी उम्र के साथ दब गयीं। खिलौने भी घर पर अब यहाँ-वहाँ बिखरे हुए नहीं होते। स्कूल गये और एक-दो-तीन-चार रटने में लग गये। घर में अब कॉपी, किताबें, पेन्सिल, पेन आदि बिखरे रहने लगे। पेन-पेन्सिल और अन्य पठन सामग्री से भी घर में बच्चों की उपस्थिति दर्ज होती है। स्कूली शिक्षा के अपने चैलेंजेज होते हैं। जो स्कूल में सीखते हैं, समाज में सीखते हैं, बड़ों और अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से सीखते हैं। फिर पैसे की अहमियत और उससे व्यक्ति की जाँच-परख होते देखते हैं। पर मिट्टी से समाज का सम्बन्ध क्षीण ही देखा। स्कूल की देहरी बस अब लाँघने का समय आया और अब जीवन में विषय क्या हो यह प्रश्न आँखों के सामने तैरने लगा। खुद को इस प्रश्न में डूबा देखा कोई विषय मुझे जँचा नहीं। कि सौभाग्य से ललित कला संस्थान के युवा कलाकारों की एक समूह प्रदर्शनी में जाने का मौ$का मिला। आर्ट गैलरी मुझे स्वप्नलोक सी लगी और युवा खुश और जीवन्त लगे, उनके चेहरे पर युवा मुस्कान उन्हें और आकर्षक बना रही थी। फिर इस विषय के बारे में विस्तार से पता किया और तैयारी के बाद कला महाविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठा। इस तरह चित्र के प्रति आकर्षित होकर मैंने ललित कला संस्थान में दाख़िला लिया। आम कक्षाओं की तरह यहाँ बैठने के लिए पंक्तिबद्ध टेबल और कुर्सियों की जमावट नहीं होती है, कक्षा का भीतरी माहौल भी खुला हुआ होता है। हमारी मिट्टी की क्लास कॉलेज की दूसरी इमारत में नीचे लगती थी। यहाँ कुछ ग्राफिक प्रेस रखीं हैं। उनकी खामोशी से लगता था कि कई सालों से किसी कलाकार ने उन्हें छुआ नहीं है। इन्हीं खामोश और अपने उपयोग की प्रतीक्षा में रखी इन प्रेसों के आसपास ही हम मिट्टी में आकार गढ़ते थे। सिलेबस के अलावा भी हम मन से कुछ आकृतियाँ मिट्टी में बनाते थे।

पाँच वर्षीय इस स्नातक कोर्स में शुरुआती दो वर्षों में मिट्टी में भी काम करवाया जाता है और इससे सम्बन्धित कुछ पढ़ाया भी जाता है। मिट्टी की क्लास में रिलीफ आकार और छोटे शिल्प भी बनाये। चूँकि कॉलेज में भट्टी नहीं थी अत: मेरे सहपाठी नवनीत म्हात्रे के घर के आँगन में हम एक छोटी भट्टी बनाते और अपने शिल्प पकाते। नवनीत के दादा जी मिट्टी के गणेश बनाने के लिए प्रख्यात थे। उन्हें करीब से बारीक काम करते हुए देखते थे। मिट्टी में उनके टूल के उपयोग को भी गौर से देखते थे। नवनीत का मन भी मिट्टी के काम करने में रमता था और उसे घर से ही अनजाने ही अपने दादा जी को काम करते देखते एक ट्रेनिंग मिली हुई थी। उसके घरवाले भी उसके मिट्टी में काम करने को पसन्द करते थे। हम दोनों ने अपने सिलेबस के अतिरिक्त भी मिट्टी में खूब काम किया। पर मिट्टी से यह रिश्ता दो साल बाद अधिक नहीं रह पाया। अन्तिम तीन वर्षों में आर्ट कॉलेज में सिर्फ चित्रकला पर ही केन्द्रित पढ़ाई हुई। फिर जब भारत भवन में काम करने का विचार बनाया तब वहाँ सिर्फ दो ही स्टूडियो थे। ग्राफिक और सिरेमिक। मैंने सिरेमिक में काम करना चुना। इस तरह मैं पुन: मिट्टी के करीब आया और इस बार यह रिश्ता गहराया। मैंने डूब कर मिट्टी में खुद के लिए कलात्मक सम्भावनाएँ तलाशना शुरू किया। मिट्टी शिल्प को बड़ी भट्टी में पकाया। अपने लिए एक राह खोजी। मिट्टी अब मेरे लिए कला का एक स्थायी भाव है। जब दिल्ली आना हुआ तब चित्रकारी करना पुन: शुरू हुआ। मेरे पास खुद के रहने की ही जगह संकुचित थी ऐसी हालत में मिट्टी में काम करने की जगह बनाना कठिन था। इस समय का उपयोग मैंने चित्र बनाने में किया। दिन में चित्र बनाते और रात में उन्हें पलंग के नीचे रखकर सुखाते। तीन सालों बाद खुर्जा में मैंने मिट्टी में काम करने की जगह तलाशी और आज बीस सालों से वहीं मैं अपना मिट्टी में सृजन कर रहा हूँ।

मिट्टी की लोच, रूप और गति के अनुभव। सन्दर्भ-भिन्न माध्यम, देश-विदेश, तरीका।

मिट्टी मन की तरह मुलायम है। यह इसका गुण भी है और व्यवहार भी। मिट्टी में अधिक पानी हो जाए तो वह पानी के साथ बह जाती है। पानी का सही अनुपात बहुत ज़रूरी होता है। अलग-अलग कलाकार अपने शिल्प और पात्रों की ज़रूरत के अनुसार पानी के इस अनुपात को तय करते हैं। इसे ध्यान में रखकर ही अपनी मिट्टी तैयार करते हैं। एक बार सूखने के बाद मिट्टी में कुछ बदलाव करना कठिन होता है और अक्सर असम्भव; पकने के बाद मिट्टी जड़ हो जाती है और इस पकने को एक हद तक ही कलाकार काबू में कर सकता है। अगर पकते शिल्प में कुछ दरार आ गयी तो उसे सिर्फ पैबन्द लगाकर ही भरा जा सकता है। पैबन्द छुपाये नहीं छुपता। यह पैबन्द मिट्टी में काम करने वाले हर कलाकार को मुँह चिढ़ाता है,यह कहता है कि मिट्टी ही स्वयं को पूर्ण करती है। कलाकार मिट्टी में बने अपने शिल्प को मिट्टी को ही सौंपता है, पूर्णता के अनुरोध के साथ। एक जापानी कलाकार से मैं ताइवान में मिला था। उनका शिल्प गढऩे का तरीका बहुत रोचक है। वे अपने शिल्प को पकाते हैं फिर उसे बहुत ही जतन से तोड़ते हैं; कुछ क्रेक उनके शिल्प में महीन रेखाओं के रूप में प्रकट होते हैं। कुछ रेखाओं को वे रहने देते हैं और शिल्प के कुछ हिस्से को वे अन्य पके हुए मिट्टी के टुकड़ों से जोड़ते हैं। उनके शिल्प में यह दरार और टूटन दोष नहीं लगते बल्कि इसी से वे अपने शिल्पों को खास बनाते हैं।

रूप मिट्टी में छुपे होते हैं जिन्हें आँखें तलाशती, देखती हैं और उँगलियाँ अपने कौशल से उस रूप को अवतरित होने में मदद करती हैं। रूप के प्रकटन से ही छाया का भी आगमन होता है। प्रकाश शिल्प को छूता है और छाया भी तरह-तरह से शिल्प रूप के साथ लिपटी रहती है। शिल्प सृजन में छाया की निर्मिति भी होती है पर छाया को प्रकट करने का श्रेय प्रकाश को है। छाया भी शिल्प को गौरव और आकर्षण प्रदान करती है। छाया शिल्प को रहस्यमयी और गम्भीर भी बनाती है। छाया शिल्प के साथ मिली एक सुन्दर भेंट है जो शिल्प के सौन्दर्य को बढ़ाती है।

अमूमन मैं अपना काम मिट्टी की लोच के सहारे ही शुरू और खत्म करता हूँ। मिट्टी को छूते ही उसमें स्पर्श ठहर जाता है, मिट्टी को बेल कर, उसे दबाकर, भिन्न-भिन्न टूल्स से कभी टेक्स्चर देकर मैं अपना काम बिना किसी पूर्व योजना के आरम्भ करता हूँ। मिट्टी को तरह-तरह से मोड़कर देखता हूँ। इसी प्रक्रिया में अचानक किसी मोड़ पर रुककर हाथ में या सामने टेबल पर प्रकट हुए अपने आकार को मैं देखता हूँ। फिर उसे अपनी तरह से दोहरा कर उसका आनन्द लेता हूँ, उसे गुनगुनाता हूँ। कुछ समय बाद टेबल पर एक बड़े या कई छोटे-छोटे आकार बन जाते हैं। जब कहीं नयी जगह एक नये स्टूडियो में काम करता हूँ तो वहाँ उपलब्ध मिट्टियों में से किसी एक मिट्टी को चुनने का भी एक रचनात्मक तरीका मेरे पास है। मैं उपलब्ध हर तरह की मिट्टी के कुछ टुकड़े अपनी टेबल पर रखता हूँ और हर मिट्टी से छोटे-छोटे कई गणेश रूप बनाता हूँ। उन्हें अलग-अलग ग्लेज़ में रंग कर पकाता हूँ। इस तरह मुझे मिट्टी के साथ-साथ ग्लेज़ के भी सेम्पल चुनने में बहुत मदद मिलती है। जो लघु गणेश बनते हैं उन्हें मैं साथी कलाकारों और स्थानीय कला प्रेमियों को भेंट कर देता हूँ।

मिट्टी में भी मेरे काम करने की गति कुछ तेज़ है। एक शिल्प की बढ़त में मिट्टी के कुछ कठोर होने की प्रतीक्षा करना होती है ताकि उसपर कुछ कठोर होने के बाद बढ़त बनायी जा सके। इस प्रतीक्षा काल में मैं एक अन्य शिल्प भी साथ ही साथ शुरू करता हूँ। काम करते हुए आसपास होती हलचल पर मेरा ध्यान रहता है। कभी-कभी आसपास से ही काम के लिए कुछ संकेत मिल जाते हैं। स्टूडियो के आसपास फुदकती चिडिय़ा अक्सर ध्यान आकर्षित करती है और मैं भी अपना काम छोड़कर स्टूडियो से बाहर जाकर उसे देर तक देखता रहता हूँ। विदेशी स्टूडियो में टूल्स भिन्न तरह के, मिट्टी भी कई प्रकार की होती है। साथी कलाकार मित्रों को भी काम करते हुए देखना, उनसे उन काम के बारे में बातें करना मुझे पसन्द है।

विदेश में (जैसे पोलैण्ड, लिथुआनिया, यूक्रेन और जापान में अपने अनुभव के आधार पर) अपनी मिट्टी के साथ सम्बन्ध अधिक एकाग्र होता है। इसका कारण है कि एक तो वहाँ जब कोई कलाकार काम कर रहा होता है तो साथी कलाकार और वहाँ काम करने वाले कर्मचारी भी कलाकार की एकाग्रता का ध्यान रखते हैं और अपनी उपस्थिति भी जब तक ज़रूरी न हो तब तक छुपाकर ही रखते हैं। न ही आसपास कोई शोर करता है न ही ज़रूरी न होने पर कोई बात ही करता है। अलग-अलग देशों के कलाकार जो अपने देश में अपने देश की भाषा बोलते हैं, और यहाँ सभी स्थानीय कलाकार भी अँग्रेज़ी में ही बोलते हैं। अपनी भाषा के दायरे में न होने से भी एक गहरी चुप्पी रहती है। अगर हिन्दी बोलने वाले सभी लोग होते तो शायद इतनी एकाग्रता न बन पाती। अपने खाली समय का इस्तेमाल मैं साइकिल से या दोस्तों के साथ शहर को देखने उसे जानने, उसकी भाषा के स्वाद को पकडऩे की कोशिश करता हूँ। अपनी भाषा, हिन्दी, की कमी को मैं अपनी डायरी में रोज़नामचा, कभी कविताएँ या मित्रों और परिवार के करीबी लोगों को पत्र लिखकर पूरा करता हूँ। चूँकि मैं सपने भी हिन्दी में ही देखता हूँ अत: विदेश प्रवास के अपने अनुभवों को खुद के लिए दर्ज करना मुझे खुशी और संतुष्टि देता है।

अपने शिल्पों में रूप कभी अपने आसपास के दृश्य अनुभवों से भी आते हैं और कल्पना उसे अपने अनूठे ढंग से कलाकर्म में प्रकट करती है। बस्तर और झाबुआ के लकड़ी और पत्थर में बने आदिवासी शिल्प भी मुझे बहुत आकर्षित करते हैं। वन भ्रमण के दौरान टूटी हुई लकड़ी, बिखरे पत्ते, तरह-तरह के पक्षी और उनकी आवाज़ें। नदियों के बहुल रूप, तरह-तरह के पहाड़ और भिन्न-भिन्न मौसमों में बदलते उनके रंग और उन पर खिलती वनस्पतियाँ और वृक्ष, तरह-तरह की पोशाकें, स्त्रियों के पहनावे, शृंगार के असीमित ढंग आदि मैं उत्सुकता से देखता हूँ। प्रकृति में इतनी बहुलता देख मैं रोमांचित होता हूँ। मुझे लगता है कि यही बहुलता मनुष्य देह में भी है। इसीलिए शायद एक चित्रकार की शिक्षा पाने के बाद मिट्टी को चुनना मुझे आसान लगा। दृष्टि परिपक्व होने के बाद भिन्न माध्यमों में काम करने की अगर उत्सुकता है तब सिर्फ नये माध्यम का तकनीकी ज्ञान हासिल करने के बाद उस माध्यम में काम करना कठिन नहीं होता। चित्र बनाने और मिट्टी में काम करने के बाद मैंने कपड़े को भी अपना माध्यम बनाया। इस माध्यम में काम करना भी अद्भुत अनुभव है। मैं अपने को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूँ कि जिस देश का मैं निवासी हूँ वहाँ कला और कौशल की एक लम्बी परम्परा है। हमारी संस्कृति में वस्त्र (कपड़े) एक बहुत ही वृहद् और महत्त्वपूर्ण अंग है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक लाखों लोग अपने गाँवों और कस्बों में हथकरघे से सुन्दर कपड़े बनाते हैं। मैं अपने काम के लिए खादी या सिल्क के कपड़े चुनता हूँ; ये कपड़े मैं देश के विभिन्न स्थानों की अपनी यात्राओं से एकत्र करता हूँ। कपड़े में आकार कैंची से काटकर उसे अन्य कपड़े पर सिलता हूँ। कपड़े के अलावा मैंने लकड़ी के भी शिल्प बनाये हैं। ये शिल्प मैंने अपनी दो पोलैण्ड यात्राओं में अन्तरराष्ट्रीय कला शिविर में बनाये हैं। हाल ही में सूरत (गुजरात) में भी एक मेटल आर्ट शिविर में मुझे बुलाया गया था जहाँ मैंने पहली बार लोहे के बड़े शिल्पों की रचना की है। जो वहाँ, शहर के किसी पार्क में, स्थापित किये गए हैं।

2014 में अपनी दो एकल कला प्रदर्शनियों के लिए मैं सर्बिया गया था। वहाँ नोविसाद शहर की ग्राफिक कलाकार येलेना के स्टूडियो में उनके ही मार्गदर्शन में मैंने ग्राफिक आर्ट करना भी शुरू किया है जो अब भी निरन्तर जारी है। का$गज़ के अलावा मैंने कपड़े पर भी अपने ग्राफिक ङ्क्षप्रट लिये हैं। 2018 में मेरे ग्राफिक प्रिंट्स की एकल प्रदर्शनी इन्दौर में हो चुकी है। यह एक रोचक माध्यम है। हैरानी की बात है कि इस माध्यम में काम करने वाले कलाकार अब चित्र बनाने लगे हैं। इस माध्यम में काम करने वाले कलाकारों की संख्या और इस माध्यम में काम करने के लिए स्टूडियो देश में कम हो रहे हैं। यह देश की ग्राफिक कला के लिए चिन्तनीय है।

इतने माध्यमों में काम करने का मौका मुझे मिला इसका संतोष है। माध्यम की बाध्यता न होना एक शुभ स्थिति है। विभिन्न माध्यमों में काम करने के अपने जोिखम और व्यवहार हैं। इसमें रमे रहने का आनन्द ही अलग है।

मिट्टी में काम करने के लिए पिछले बीस सालों से मेरा स्टूडियो खुर्जा में है। यह दिल्ली से 90 किलोमीटर दूर स्थित पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक छोटा-सा नगर है। उपयोग में आने वाले सिरेमिक पात्रों को बनाने की यहाँ कई छोटी-बड़ी फैक्ट्रियाँ हैं। यहाँ कुछ हुनरमन्द पोटर्स भी हैं। इन्हीं में से एक हैं जहिर अहमद, इन्हीं की फैक्ट्री में मैं अपना काम करता हूँ। यहाँ काम के माहौल का असर मेरी कार्य-पद्धति पर भी पड़ा। इस वातावरण में मेरी कार्य गति को अच्छी बढ़त मिली है। यहाँ अपने काम के करने के लिए सभी सामग्री, दोस्ताना माहौल और समय-समय पर तकनीकी सहयोग भी मिलता रहता है। किसी स्टूडियो में काम करने और किसी फैक्ट्री में काम करने के अनुभवों में काफी भिन्नता होती है। दिल्ली के किसी भी सिरेमिक स्टूडियो में मुझे काम करने का कभी मन नहीं हुआ। खुर्जा में ही काम करते हुए मैं अपना काम देश-विदेश में दिखाता हूँ।

भारतीय विचार-तत्त्व में मिट्टी को जीवन के समतुल्य माना गया है। मानवीय देह को भी मिट्टी ही कहा जाता है, जो एक दिन मिट्टी में ही विलीन हो जाती है। ऐसे में मिट्टी को नये रूपाकारों में रचते हुए उसे एक बिल्कुल दूसरे जीवन की तरह आप कैसे देखते हैं?

मिट्टी अध्यात्म का प्रिय विषय है और कला का भी। मिट्टी के इस अध्यात्म को बचपन से ही आकाशवाणी पर सुना है। लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में यह बचपन से ही एक गीत सुनता रहा हूँ। आज जब भी कबीर की इस कविता को सुनता हूँ, जीवन के अर्थ खुलते हैं और इसकी क्षणभंगुरता भी:

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंधे मोहे

एक दिन ऐसा आएगा मैं रोंधुँगी तोय।

आए हैं सो जाएँगे राजा रंक फकीर

एक ङ्क्षसघासन चढ़ी चले एक बन्धे जंजीर।

दुर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय

बिना जीव के श्वास को लोह भस्म होइ जाए।

चलती चाकी देखि के दिया कबीरा रोय

दो पाटन के बीच में बाकी बचा न कोय।

दु:ख में सिमरन सब करें सुख में करे न कोय

जो सुख में सुमिरन करें तो दु:ख काहे होय।

पत्ता टूटा डाल से लगाई पवन उड़ाय

अबके बिछड़े कब मिलें दूर पड़ेंगे जाय।

यह भजन सुबह और शाम जिस वक्त रेडियो से प्रसारित होता था उस व$क्त बाहर अधिक शोर नहीं होता था। इस भजन की मधुर धुन की वजह से मुझे ये भजन याद हो गया। ये और बात है कि उस वक्त भजन में गायी गयी इस कविता का गहरा अर्थ समझ नहीं आता था। पर यह भजन मेरे मन में बस गया था। अब

धीरे-धीरे फिर उसी भजन का अर्थ अपनी मिट्टी (देह और माध्यम) में ढूँढ़कर जब भी उसे स्पर्श करता हूँ एक सुखद सिहरन होती है।

मगर यहाँ एक बात रोचक है जो मैंने अपने अनुभव से महसूस की है कि एक ओर हमारे लोक के अन्तस् में माटी से सम्बन्धित गहरी और आध्यात्मिक बातें लगभग हर भाषा बोलने वाले समाज में प्रचलित हैं। कई दोहे, कविताएँ, मुहावरे लोग बातों में इस्तेमाल करते हैं और अपनी बातों को प्रभावी ढंग से कहने की कोशिश करते हैं वहीं दूसरी ओर हमारे मिट्टी में काम करने वाले कुम्हार आदि साल दर साल अपने रोज़गार से चिन्तित हो रहे हैं। यह वही समाज है जिसके भूगोल में कुम्हार के कौशल की जगह अब प्लास्टिक या अन्य बर्तनों ने जगह ले ली है। हमारी बातों में ही अब कुम्हार या मिट्टी से जुड़ी बातों के लिए जगह बची है। वहीं पूरब के ही अन्य छोटे देशों में जहाँ भारत की तरह मिट्टी की प्राचीन परमरा नहीं रही पर फिर भी जापान, चीन, कोरिया, ताईवान आदि देशों ने अपनी मिट्टी की कला को न सिर्फ अपने दैनिक जीवन में अपनाया है बल्कि उसे प्रमुखता से पोसा भी है। आज अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इन देशों की मिट्टी की कला और मिट्टी में काम करने के उनके तरीके प्रचलित हैं। भारत के कुम्हार कुम्हला रहे हैं। यह एक चिन्तनीय बात है। जिस देश में मिट्टी की एक लम्बी परम्परा है वहाँ कुम्हारों को अपना कौशल छोड़ कुछ और अन्य काम करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। मिट्टी से सम्बन्धित अध्यात्म की शिक्षा आज भी हमारे बच्चे स्कूलों में ले रहे हैं और वहीं इस प्रायोगिक माध्यम में काम करने वाले लोगों और उनके उपयोग में आने वाले पात्रों के लिए हमारे विकसित होते समाज में जगह कम ही बची है। मिट्टी के अध्यात्म के बारे में बात शुरू करने के पहले मेरे मन में कंटक की तरह अटका यह तथ्य यहाँ बताना मुझे अनिवार्य लगा।

मिट्टी के बारे में पूरब और पश्चिम की दृष्टि में भिन्नताएँ हैं। पूरब में भी जापानी दृष्टि की बात ही कुछ और है। वहाँ मिट्टी के पात्रों और पात्र बनाने वाले लोगों के लिए वहाँ के समाज में बहुत आदर व सम्मान है। जापानी कला सौन्दर्य बहुत आध्यात्मिक लगता है, उनके मिट्टी के पात्रों में सरलता और तकनीकी का मेल अद्भुत है। वहाँ मिट्टी के पात्रों की सराहना के लिए टी सेरेमनी जैसी कुछ सामाजिक परम्पराएँ भी हैं जो अब तो दुनिया में मशहूर हैं। वहाँ स्थानीय कुम्हारों को उसी स्थान के लोगों का प्रश्रय खूब मिलता है तथा मिट्टी में काम करने वालों की जीवनशैली भी किसी दूसरे व्यवसाय में लिप्त लोगों की तुलना में कतई कम नहीं है। उनका नाम शहर के गिने-चुने लोगों में शुमार होता है। 1997 में हुई मेरी पहली लम्बी विदेश यात्रा में मैंने यह सब बहुत करीब से देखा है।

ताईवान का शहर ईंग सिरेमिक सिटी है। यहाँ एक विश्व प्रसिद्ध समकालीन सिरेमिक कला संग्रहालय है जहाँ मैं 2011 में तीन माह रहा था। इस संग्रहालय में ताईवानी माटी कला के अलावा विश्व के अनेकों देशों की माटी कला व पात्र संग्रहित हैं। स्थानीय स्कूल के बच्चे यहाँ बहुत संख्या में आते हैं। युवा भी और अधेड़ भी। अपनी संस्कृति को बखान करते इस संग्रहालय में उन सभी का मन रमता है। संग्रहालय ने भी बच्चों के लिए, विशेषरूप से मिट्टी में कुछ सीखने-खेलने के लिए, विभिन्न रोचक कार्यक्रम बनाये हैं। संग्रहालय के स्टाफ भी इन बच्चों के साथ मन से काम करते हैं। इस संग्रहालय में कुछ बड़े मिट्टी के शिल्प विशेष रूप से बच्चों की रुचि और दृष्टि को ध्यान में रखकर ही विभिन्न देशी-विदेशी कलाकारों द्वारा रचे गये हैं। शहर में कई आधुनिक तकनीकों से सुसज्जित बड़ी सिरेमिक $फैक्ट्रियाँ भी हैं जो ताईवान में ही नहीं विदेशों में भी अपने यहाँ निर्मित चीनी मिट्टी के पात्र भेजते हैं। शहर में कुछ बहुत अच्छी दुकानें हैं जो सिर्फ मिट्टी में काम करने के औज़ार, रंग और अन्य सामग्रियाँ बेचती हैं। इन दुकानों के वैभवशाली प्रदर्शन से अंदाज़ा यहाँ जाकर लगाया जा सकता है। हमारे भी देश में उत्तर प्रदेश के खुर्जा के अलावा जयपुर और गुजरात में भी कुछ शहर हैं जो चीनी मिट्टी के काम के लिए ही व्यावसायिक रूप से प्रसिद्ध हैं पर इन शहरों के ही कुम्हार व मिट्टी में काम करने वाले लोग हाशिये पर हैं। न वहाँ स्थानीय कला के प्रोत्साहन के लिए कोई संग्रहालय है न कोई संस्था है जो मिट्टी में काम करने वाले लोगों के लिए कोई बेहतर काम कर रही हो। खैर! यह सब सिर्फ मंशा और कला-दृष्टि पर निर्भर करता है।

मिट्टी के लिए पश्चिम की दृष्टि भिन्न है पर आज वहाँ की समकालीन माटी कला बहुत सृजनात्मक व नवोन्मुखी है। कहीं मिट्टी सिर्फ एक जड़ माध्यम है पर पश्चिम के देशों के कलाकार मिट्टी में बहुत महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं। पश्चिम के छोटे-छोटे देशों (जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध की त्रासदी देखी है) में भी मिट्टी की कला के लिए उनके प्रशासन की भागीदारी अनुकरणीय है। वहाँ नगर पालिका स्तर पर अन्तरराष्ट्रीय माटी कला आयोजन होते हैं और केन्द्र उनका भरपूर और खुले दिल से साथ देता है। जब अपने देश की मिट्टी में काम करने वाले कलाकारों की समाज में उनकी स्थिति के बारे में सोचता हूँ तो मुझे ऊपर व्यक्त की गयी बातें अनायास ही याद आ जाती हैं।

यह सही है कि यह देह भी माटी ही है। यह जगत् क्षणभंगुर है पर इस क्षणभंगुरता में भी मिले हुए अपने समय को अगर कुछ लोग मिट्टी में काम करने को ही अपनी जीवनशैली के रूप में सहर्ष स्वीकारते हैं तो प्रशासन को कुछ तो उन्हें सम्माननीय स्थिति में लाने के लिए जतन करना चाहिए। आज जब हम सब पर्यावरण के विषय में चिन्ता करने लगे हैं तो ऐसे वक्त में लाजि़म है कि इस मिट्टी में काम करने वाले कलाकारों को एक बेहतर जीवन के साथ अपना काम करते रहने का मौका मिलना चाहिए।

मिट्टी में काम करते हुए समय जैसे स्थिर हो जाता है। हमारे पास निश्चित सीमित समय है पर मिट्टी की आयु मनुष्य से कई अधिक गुना विस्तारित है। आज भी खुदाई में हमें मिट्टी से बनी हुईं सैकड़ों वर्ष पहले हाथ से बने पात्र, मुद्राएँ व अन्य वस्तुएँ मिलती हैं जिसे देखकर हम उस समय की सभ्यता और संस्कृति, जीवनशैली के बारे में $कयास लगाते हैं। इसका मतलब यह है कि मिट्टी बहुत हद तक हमारे समय और इस समय में बन रही, पनप रही सभ्यता, संस्कृति, परम्परा को अपने भीतर छुपाकर ज़मीन में जज़्ब कर सुरक्षित कर लेती है। अमूमन यह भरम होता है कि मिट्टी एक नाज़ुक व जल्द नष्ट होने वाला माध्यम है पर यह हकीकत नहीं है। इस तथ्य पर अगर यकीन करें तो हम मिट्टी में काम करते हुए अपनी उम्र भी बढ़ाते हैं। अपने पात्रों या शिल्पों में हम आज के समय और परिस्थितियों को भी कुछ हद तक सँभालते हैं। यह भी माटी कला का एक महत्त्वपूर्ण गुण है और इसे ध्यान में रखकर हमें नये सिरे से इस आदिम कला के प्रसार के लिए कुछ सृजनात्मक योजनाएँ बनाने की ज़रूरत है।

मिट्टी के प्रति हमारे अद्भुत विचारों को अब मिट्टी के काम को बचाने के लिए कथनी को छोड़ कुछ सकारात्मक करने की बेहद ज़रूरत है।

पर चूँकि मैं एक समकालीन कलाकार हूँ अत: मिट्टी के बारे में भारतीय दर्शन टेबल पर रखी मिट्टी के दाहिने ओर खड़ा रहता हूँ उसकी खुशबू काम करने के दौरान हर वक्त मेरे साथ रहती है। पर मेरी दृष्टि खोजती है एक सहज रूपाकार जो आज के समय और उससे मिले दृश्य अनुभवों से उपजता है। जैसे किसान अच्छी फसल के लिए हल से मिट्टी को उलीचता है वैसी ही मेहनत मुझे अपने दृश्य अनुभवों को खँगालने में करनी होती है। और इस तरह शुरू होती है मिट्टी से मेरे संवाद की यात्रा जो रूप में बिखरती है और पकने के बाद दीवार या ज़मीन पर शोभायमान होती है। अपने पके शिल्प देखकर यह बात मेरे मन में बनी रहती है कि जब मनुष्य इस धरती से विदा ले चुका होगा तब सदियों बाद मिट्टी में दबे मिट्टी के शिल्प हमारे होने की सूचना उन मनुष्यों को देंगे जिनके लिए हम तब तक आदिम मनुष्य हो चुके होंगे।

मिट्टी या अन्य माध्यम में आप जो रूप गढऩा चाह रहे होते हैं, उससे भिन्न रूप अचानक ही कभी बिना पूर्व विचार के बन जाता है, तब आपकी अनुभूति क्या होती है?

राकेश जी मैं भी मानता हूँ कि यह देह मिट्टी का एक पुतला है। इस मिट्टी से बनी असंख्य और भिन्न-भिन्न प्रकार की मानवीय देह हैं। मेरा यह मानना है कि मिट्टी अपने आप में एक पूर्ण माध्यम है। मिट्टी के ही एक उदाहरण से बात करता हूँ कि हमारी परम्परा में घटाकाश और महाकाश की बातें कही गयी हैं। मिट्टी के घड़े में जो स्पेस (अवकाश) होती है वह घड़े के बाहर फैले विराट और अन्तहीन अवकाश का ही एक रूप है जो हमें घड़े के आकार के माध्यम से समझ आता है। अन्यथा बिना रूप (घड़े) के उस महाकाश को, जो हमारे भीतर भी विद्यमान है, हम नहीं समझ पाते। कबीर ने मिट्टी को जिस तरह देखा वह देखना उनकी कविता में आकर हमारे भारतीय दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण अंग बना है। मुझे तो लगता है कि अगर कबीर न होते तो मिट्टी को देखने की हमारी दृष्टि वह न होती जो आज है।

मिट्टी अपने आप में सम्पूर्ण नैरन्तर्य है भले ही उसका इस्तेमाल हम अपनी ज़रूरतों के अनुसार करते हैं और मिट्टी से साधारण पर अनूठे, रंगीन और आकर्षक छोटे-बड़े पात्र बनाते हैं। मिट्टी जब शिल्पकार (मूर्तिकार) के हाथ में आती है तो वह (कलाकार) अपनी दृष्टि से मिट्टी में छुपे आकार को देखता है और उसे अपने हुनर से प्रकट करता है। कलाकार की नज़र मिट्टी के लौंदे में कोई पात्र, कोई अमूर्त आकार या कोई चिरपरिचित रूप गढ़ती है और कलाकार के हाथ उसे अपने कौशल से प्रकट करते हैं। जैसे रंगमंच का कोई नायक पर्दा उठाता है। मिट्टी सदियों से वैसी ही है। उसकी नरमी, उसकी नमी, उसकी लोच वैसी ही है जैसे कभी मुअनजोदड़ो या हड़प्पा काल में रही होगी। पर फिर भी हर काल में मिट्टी में काम करने वाले कलाकार कुछ नया सृजन करते रहते हैं। क्षणभंगुर लगने वाला कोई पात्र सदियों बाद किसी खुदाई में किसी नयी सभ्यता में मिलता है। मिट्टी के इस पात्र के रूप और आकार से उस वक्त की मानवीय संस्कृति की खोज शुरू होती है। मानव के दो दिन के इस जग में, इस चला-चली के फेरे में यही मिट्टी ही मानव के पदचिह्न की तरह धरती में स्वयं को सदियों तक सुरक्षित रखती है और इस तरह मानव का यह दो दिन का जीवन सदियों बाद भी स्पन्दित रहता है।

आज के मनुष्य को यह माध्यम नाज़ुक और कच्चा लगता है जबकि मिट्टी, मिट्टी में मिलकर भी बची रहती है और उत्खनन में हमें मिट्टी की मुद्रा, पात्र, शिल्प आदि आज भी यहाँ-वहाँ मिलते हैं। अपने सामने रखी मिट्टी को मैं अपनी आँखों से देख उँगलियों से स्पर्श कर कुछ रूप और उसकी परछाईं ढूँढ़ लेता हूँ। मिट्टी हो या कोई अन्य माध्यम मेरे शिल्पों की निर्मिति के पूर्व कोई पूर्व योजना नहीं होती। मिट्टी के एक छोटे टुकड़े को मैं हाथ में लेकर देर तक तरह-तरह से मोड़ता-घुमाता रहता हूँ और इसी प्रक्रिया में मेरी आँख मेरी उँगलियों को खामोश इशारा करती है और यही मेरे रचना का आरम्भ बिन्दु है। यह स्वत:स्फूर्त घटता है। मिट्टी में काम करते हुए मेरे दृश्य अनुभव की स्मृति सक्रिय रहती है। इसे मैं अपनी दृश्य भाषा का व्याकरण या पैमाना कह सकता हूँ। हालाँकि मैं तथाकथित व्याकरण का दृश्यकला में होना ज़रूरी नहीं मानता हूँ। स्वत:स्फूर्त हलचल को मैं गम्भीरता से सुनता हूँ और यही मेरे शिल्पों की ठनक है, उसकी परिपक्वता है, सम्पूर्णता है। काल के किसी हद तक ठहर जाने का भी आभास मिट्टी में काम करते हुए बना रहता है। शिल्प की निर्मिति का काल शिल्प के अन्त तक बना रहता है। कलाकार के लिए काल बाध्यता है, कला के लिए नहीं। कलाकार के पास एक निर्धारित समय है पर अपनी सक्रियता के दौरान, जीते जी उसे यह काल अनिश्चित और विराट लगता है। पर असल जीवन तो मात्र दो दिन का ही है। जीवन को कलाकार अपने काम से अर्थवान् और बहुमूल्य भी इन दो दिनों में ही बना पाता है। कलाकार सौभाग्यशाली है कि उसे कुछ रचने का अवसर मिलता है और माटी के पुतले की तरह देह से रचा गया मिट्टी का शिल्प ही कलाकार को कालजयी बनाता है और काल की इस बाध्यता से मुक्त करता है। इस दो दिन के जीवन में कलाकार अपनी रचना में भविष्य को भी इस मायने में रच रहा होता है। एक ही शिल्प या पात्र को दो या तीन अलग-अलग पीढिय़ाँ अलग-अलग दृष्टि से देखती, बूझती हैं। इस प्रकार एक ही शिल्प की एकाधिक व्याख्या या परिभाषाएँ भी हो सकती हैं। शिल्प जड़ होता है पर उसे जीवित और तरल यही (दृष्टि) परिभाषाएँ बनाती हैं। जैसे कबीर आज भी उनकी कविता के माध्यम से हमारे साथ हैं।

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