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वसुधैव कुटुंबकम का नारा लगाना आसान है पालन करना मुश्किल!

प्रज्ञा मिश्रा ब्रिटेन में रहती हैं और समसामयिक मुद्दों पर जानकी पुल पर नियमित रूप से लिखती रहती हैं। इस बार उन्होंने अमेरिका की कैपिटल हिल की घटना से लेकर भारत के किसान आंदोलन तक को लेकर एक विचारपूर्ण लेख लिखा है-

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एक बात पहले ही साफ़ करना जरूरी है कि भारत के  किसान जिन तीन क़ानून का विरोध कर रहे हैं उनके बारे में मेरी जानकारी बेहद सतही है। लेकिन यहाँ बात उन क़ानून की नहीं है। बात है जो छब्बीस जनवरी के दिन दिल्ली में हुआ उस बात की। और उसके बाद से हो रहे हंगामे की  छब्बीस जनवरी का दिन था, यह पता था कि सरकारी परेड के साथ साथ ट्रैक्टर की रैली निकलने वाली है, सुबह घर से निकलने तक यही खबर थी की ट्रैक्टर दिल्ली की तरफ चारों तरफ से बढ़ रहे हैं। पर शाम घर लौटने पर नज़ारा कुछ और ही था, जिस तरह से खबरें सुनायी दे रही थीं उनमें चीख और गुस्सा ज्यादा था। इस ख़ास दिन इस कदर हंगामा होगा कोई सोच भी नहीं सकता था।

बीस दिन पहले की ही बात है, वाशिंगटन डी सी की कैपिटल हिल पर भी लोगों की भीड़ कुछ इसी तरह चढ़ आयी थी और जो हुआ उसका लाइव दुनिया ने देखा क्योंकि वही वक़्त था जब नए राष्ट्रपति की जीत की आधिकारिक तौर पर घोषणा होनी थी। दोनों घटनाओं को एक ही ढंग से देखने की जरूरत है।

क्या अमेरिकी सरकार को पता था कि इस तरह का कोई हमला हो सकता है इसकी जांच चल रही है। क्योंकि उस इलाके में बम भी मिले और कुछ लोग एक दिन पहले गलियारों का जायजा लेते हुए भी पाए गए। अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प के भाषण साफ़ साफ़ तौर से लोगों को उकसाने वाले हैं जिसमें वो लोगों को कैपिटल हिल जाने को कह रहे हैं। और यह भी कि उन्होंने दो  घंटों तक इस मुद्दे पर कोई बयान या कोई आदेश जारी नहीं किया।

जब यह सब हो रहा था तब भी गलत था लेकिन धीरे धीरे जब इसके डिटेल्स सामने आने लगे तो पता चला कि गलतियाँ कहीं ज्यादा बड़ी हैं, और उनकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।

पिछले साल जब ब्लैक लाइव्स मैटर का आंदोलन चल रहा था तो इसी जगह मौजूद भीड़ को पुलिस और सुरक्षा बलों ने इस कदर ताकत दिखा कर रोका था जैसे वो हिल पर कब्ज़ा करने आ रहे थे, लेकिन उस छह जनवरी को प्रेसिडेंट ट्रम्प की समर्थक भीड़ को आखिर क्यों नहीं रोका गया? क्या  यह वजह नहीं थी कि वो प्रेसिडेंट के समर्थक थे और कुछ सेनेटर इस भीड़ के साथ थे?

FBI की जांच और ट्रम्प के महाभियोग के बाद ही सामने आएगी।

अब देखें छब्बीस जनवरी की घटना को। क्या सरकार को नहीं पता था कि उसके खिलाफ भीड़ अगर इस कदर जमा होगी तो हंगामा होना मुमकिन है? दिल्ली में प्रोटेस्ट मार्च कोई नयी बात नहीं है लेकिन कुछ रैलियों में ज्यादा हंगामा बर्दाश्त कर लिया जाता है और कहीं भीड़ जमा भी करने की इज़ाज़त नहीं मिलती।

वैसे भी भारत में जो सरकार मौजूद है उसका चुनाव जीतने के लिए साम दाम दंड भेद वाली नीति अपनाना कोई नयी बात नहीं है, और चुनाव के ठीक पहले  पुलवामा हमले और उसके बाद का रिएक्शन कोई भूला नहीं है । क्या ऐसा मुमकिन नहीं है कि यह हुड़दंग उन बाहरी तत्वों की साजिश नहीं है जो सभी जानते हैं है कि अंदर वाले ही हैं। क्या ऐसा मुमकिन नहीं है कि जिस तरह से सरकारें बनाई और गिरायी जाती हैं उसी तरह से यह आंदोलन धराशयी करने का प्लान हो?

चलिए यह भी मान लें कि इस भगदड़ और हंगामे में सरकार का कोई हाथ नहीं था। तो जरा इस तरह से सोचें कि कुम्भ के मेले में भगदड़ जब मचती है तो क्या लोग भगवान् को मानना छोड़ देते हैं?  और अगर ऐसा होने लगे तो जितनी मौतें किसी धार्मिक यात्रा को जाते समय या वहां से लौटते समय होती हैं उनको देखें तो इस देश में कोई धर्म का नाम लेवा न बचे। लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है, बल्कि इसके उलट है। धर्मप्राण जनता बढ़ती ही जा रही है। माना कि सरकार और धर्म को बिलकुल अलग अलग रखना चाहिए लेकिन जो सरकार और सरकारी तंत्र धर्म के पाले में खड़े हों तो उनसे क्या भेद भाव। जहाँ एक स्टैंड अप कॉमेडियन को महीने भर से इसलिए जमानत नहीं मिलती क्योंकि उसने कभी कोई एक जोक सुनाया था जिससे किसी एक को बुरा लग गया था। जहाँ की कोर्ट वेब सीरीज बनाने वालों को यह सीख देने में चूकती नहीं कि ऐसे काम ही क्यों करते हो जो किसी को बुरा लगे।

किसानों ने जब यह आंदोलन शुरू किया था तब भी उन्होंने किसी से मदद नहीं मांगी थी, और आज भी उन्हें किसी मदद की दरकार नहीं है। जब से यह आंदोलन शुरू हुआ कई लोगों ने कहा कि इनके पास इतनी सुविधा कहाँ  से आ गयी? किसान को तो गरीब होना चाहिए यह इतने सुकून से कैसे खा पी रहे हैं। और यही लोग थे जिन्होंने सबसे पहले देश और गणतंत्र की चिंता जाहिर की। जो उस दिन हुआ नहीं होना चाहिए था, लेकिन जब बात सफ़ेद और काली न रह कर भदेस रंगों में होने लगती है तो धूल के गुबार के बैठने पर ही साफ़ बात हो सकेगी। रही बात उस moral support की जो हर उस इंसान को मिलना चाहिए जो सताए हुए हैं, किसी मुश्किल हालात में हों, जो अपनी लड़ाई अपने से ताकतवर से लड़ने को निकल पड़े हैं, तो उस सपोर्ट को कोई हटा नहीं सकता। आप पहले भी अपने घरों में थे और अभी भी सोफे पर स्थापित हैं तो किस बात का इतना हंगामा?

लेकिन जब अमेरिका से रिहाना ट्वीट करती हैं, स्वीडन से ग्रेटा थुनबर्ग ट्वीट करती हैं तो कुछ लोगों को और सरकार को बहुत बुरा लगता है। कहा जाता है कि यह हमारा निजी मामला है इसमें दखल न दो। जब कैपिटल हिल पर हंगामा होता है तो हमें दखल देने का हक़ है, जब वहां जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या होती है तब हमें दखल देने का हक़ है, लेकिन हमारे यहाँ के मामले में किसी को कुछ बोलने का हक़ नहीं है।

जब देश यूनाइटेड नेशंस का हिस्सा हैं, जब देशों की सरकारें एक दूसरे की शिकायतें यूनाइटेड नेशंस के फोरम में करती रही हैं तब क्या कहा जा सकता है कि यह हमारा मामला है इसमें कोई कुछ नहीं बोलेगा…

अगर सीरिया में जनता पर केमिकल हमला होता है और दुनिया उस सरकार को गलत कहती है तो वो इंसानी हक़ की बात करती है। …अगर ब्राज़ील में अमेज़न जंगल की आग की अनदेखी होती है और दुनिया उस सरकार को झिड़की देती है तो वो भी इंसानों के हक़ की बात के लिए ही है। इतनी सी बात है, भारत में किसान अपनी सरकार के कुछ फैसलों से नाखुश हैं, उनका हक़ है अपनी नाराजगी जताना, छब्बीस जनवरी को जो हुआ नहीं होना चाहिए था लेकिन न तो सरकार को और न ही किसी और को यह हक़ बनता है कि किसानों को या किसी और को  भी अपनी बात कहने के लिए रोकें ….. वसुधैव कुटुंबकम का नारा लगाना आसान है उसका पालन करना मुश्किल है। कुटुंब में सब एक सा ही बोलें और सोचें मुमकिन नहीं है। लेकिन सभी को सुनना उतना ही जरूरी है।

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