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मृत्यु कथा की उत्तर कथा: द डेथ स्क्रिप्ट’ की समीक्षा

प्रसिद्ध पत्रकार-लेखक आशुतोष भारद्वाज ने बस्तर पर अंग्रेज़ी में किताब लिखी है ‘द डेथ स्क्रिप्ट’, जो बस्तर पर लिखी एक बेहतरीन किताब है। हार्पर कोलिंस से प्रकाशित इस किताब की समीक्षा लिखी है दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गया के छात्र महेश कुमार ने। महेश कुमार वहाँ से हिंदी में एमए की पढ़ाई कर रहे हैं। आप भी पढ़िए-

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‘डेथ स्क्रिप्ट’ एक पत्रकार की निष्पक्षता का सार्थक उदाहरण है। इस किताब में मौजूद पत्रकार किसी भी गुट के प्रति अतिरिक्त झुकाव नहीं रखते। उन्हें पता है कि उन्हें ‘हाल-ए-दिल’ नहीं ‘हाल-ए-जंगल’ को जनता के सामने रखना है। इसके लिए जरूरी है कि वे अपने भावुकता पर नियंत्रण रखें। यही कारण है कि पत्रकार बिल्कुल स्पष्ट लिखते हैं कि ‘बस्तर मौत का संग्रहालय है(Bastar is a museum of death)’। यहाँ हर पक्ष का चरित्र ‘ग्रे’ है। पुलिस,नक्सल और सरकार सबके अपने पक्ष हैं जो सुनने में न्यायसंगत लगता है। पत्रकार सही-गलत का निर्णय नहीं करता वह बस तथ्य और घटनाओं का सबूत सामने रखकर जनता को ‘ग्रे’ कहानियों की रिपोर्टिंग बताता है। वह बताता है कि कैसे पुलिस फेक एनकाउंटर में निर्दोष की हत्या करता है,कैसे नक्सल आम आदिवासी को पुलिस का मुखबिर बताकर मार देता है। आम आदिवासी किसकी सुने,किसपर भरोसा करके अपना जीवन जिए? वह मजबूरी में मुखबिर बनता है,कभी नक्सल का तो कभी पुलिस का। मरना उसे दोनों ही स्थितियों में है। मानो मौत ही उसका पुरस्कार हो। नक्सल जन अदालत लगाकर मार देते हैं और पुलिस जेल में डालकर,एनकाउंटर करके मार देते हैं। लाश प्रायः सड़ते हुए, जले हुए,बदबू देते हुए पाए जाते हैं।

बस्तर मानो एक कैनवास हो जिसपर वीभत्सता का रंग ही उसका स्थायी भाव बन गया हो। लेखक लिखते हैं “दंडकारण्य में मौत मेडल है और लाशें व्यसन।” इस मृत्युकथा को लिखने वाले सारे पात्र अपने पक्ष और तर्क के साथ संघर्षरत है। एक पक्ष आदिवासियों को उसके जल-जंगल-जमीन को वापस दिलाने की बात कहकर उसे अपना कैडर बना रहा है। दूसरा पक्ष उसे लोकतांत्रिक अधिकार,विकास की परियोजनाओं का हवाला देकर, कानून का डर दिखाकर अपना मुखबिर बना रहा है। दोनों पक्षों के वैचारिक और सैनिक संघर्ष में आदिवासी अबतक न्याय की उम्मीद में मारे जा रहे हैं। दोनों अपने-अपने लोगों के शहादतों को ‘ग्लोरीफाई’ करके इस संघर्ष को ऊँचाई दे रहे हैं। नक्सल इन शहादतों का उपयोग अपने कैडर बनाने में करते हैं और भारतीय नेता जवानों के शहादतों पर अपनी राजनीति चमकाते हुए वोट बैंक बनाते हैं। बीच में कहीं आम आदिवासियों की चीखें, मौतें और मांगें दबी रह जाती हैं।” बस्तर में क्रान्ति और राजनीति, वाम और दक्षिण प्रायः धुँधले हैं जो भ्रम पैदा करते हैं।” बस्तर में राजनीतिक पार्टियों और नक्सल नेताओं में कभी समझौते होते हैं तो कभी टूटते हैं। जब भी समझौते टूटते हैं तो फिर मौतें होती हैं।”बस्तर,वह जगह है जहाँ  आदमी को लाश में बदला जाता है।”

यहाँ हर कोई इस युद्ध को अपनी आँखों में कैद कर रहा है जिसमें गुरिल्ला लड़ाके, सेना,आम आदिवासी,पत्रकार, माइनिंग उद्योग के मालिक शामिल है। यहाँ नक्सल मूवमेंट चलता रहे इसके लिए अलग-अलग पंचों द्वारा सलाना 100 करोड़ तक की राशि उनतक पहुँचती है।सरकार स्पॉन्सर्ड लड़ाके ग्रुप भी बनाये जाते हैं जिसकी फंडिंग सरकार और माइनिंग उद्योग के मालिक करते हैं।समस्या का समाधान संविधान ने दे रखा है।वह है पेशा एक्ट के तहत छठी अनुसूची को लागू करके और ग्राम सभा को कार्यान्वित कर दिया जाए।पर इसमें न सरकार को रुचि है न नक्सल नेताओं को।इफ्फको के खिलाफ जब ग्राम सभाओं ने विरोध किया तो उसे नगर पंचायत में बदलकर पूंजीपतियों के लिए रास्ते बनाये गए।दरअसल यहाँ आदिवासियों को धोखा देने का अंतहीन सिलसिला बना हुआ है।लेखक इस प्रवृत्ति को महाभारत से जोड़कर दंडकारण्य को कुरुक्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

मूल बात पर ध्यान न देकर महेंद्र कर्मा जैसे नेताओं ने भी सलवा जुडुम को समर्थन किया जिसकी परिणति उनकी हत्या हुई।आम आदिवासी भारी मात्रा में मारे गए जिससे नक्सल आन्दोलन को नैतिक बल ही मिला।नक्सल लोकल भाषा में अपने विचार,टेक्स्टबुक,वीडियो और नेटवर्क के जरिए अपनी पकड़ बना रहे हैं।न वहाँ स्कूल है न रोजगार।ऐसे में उनके लिए रास्ता आसान है।लेखक इस तरह के तमाम पक्ष रखने के लिए नक्सल आंदोलन में शामिल पद्मा, पोडियामी माडा, जयलाल,रजनु,सेना के जवानों की पत्नियों, आम आदिवासी के मारे गए परिजनों सबके जीवन को जनता के सामने रखते हैं।रिपोर्टिंग की यही शैली भी है और ईमानदारी का सबूत भी।रजनु बताती है कि नक्सलियों का जीवन कैसा है।वह बताती है कि महिलाओं का यौनिक उत्पीड़न की कहानी झूठी है।जहां नक्सल का वैचारिक आधार मजबूत है वहाँ इस तरह की चीजें नहीं होतीं।जहाँ विचार ही न हो वह नक्सल हो ही नहीं सकता ,उसके लिए नक्सलियों को बदनाम करना ठीक नहीं है।वह धोनी की प्रशंसक है।भारत के मैच जीतने को क्रांति को सफल होने से जोड़ती है।ये सब तमाम अफवाहों पर विचार करने पर मजबूर करती हैं।सेना की पत्नियों की पीड़ा है कि कैसे एक महिला अपने पति का इंतजार कर रही है,उसे बच्चे से मिलवाना चाहती है।पर अफवाह कर कारण पति शक कर बैठता है।पत्नी आत्महत्या कर लेती है बाद में सच्चाई पता चलने पर जवान भी आत्महत्या कर लेता है।जंगल में बात करते करते गोली लगती है और पत्नी फोन पर आवाज सुनती है।आम आदिवासी कैसे अपने परिजनों के लाश को सड़ता,गलता, कीड़े चलते हुए देखते हैं,उनके सामने पोस्टमार्टम होता है।ये सब वास्तविक घटनाओं का वर्णन मानवीयता के हत्या की मार्मिक प्रस्तुति है जो इसे रिपोर्टिंग से रिपोर्ताज बनाती है।वह ‘life of reporter is greater than reporting’ से आगे बढ़कर reporting is essential than life of reporter की प्रस्तावना अपनी इस किताब में रखते हैं।दानिश सिद्दकी,मशरत ज़हरा, मनदीप पुनिया और तमाम युवा पत्रकार याद आते हैं जो ये जोखिम ले चुके हैं।दानिश तो शहीद भी हुए। यहाँ शैली की चर्चा उचित है।आशुतोष जी को पढ़ते हुए अनिल यादव की याद आती है।दोनों का वर्णन शैली मिलती है।दोनों पत्रकार हैं इस कारण भी यह समानता हो सकती है।दोनों न्यूज़ छपने के दांव पेंच को जानते हैं।’नगर वधुएँ अखबार नहीं पढ़तीं’ में अनिल जी ने विस्तार से लिखा है इसपर।आशुतोष जी भी बताते हैं कि कैसे न्यूज़ सब बड़े अख़बरों में एक तरह के आते हैं और बस्तर जैसा क्षेत्र अछूता रहा जाता है।न्यूज़ की मैनुफैक्चरिंग होती है।

                          चूँकि, लेखक एक उपन्यासकार, आलोचक भी हैं तो उनकी इस किताब में वह झलक भी सामने आती है।दंडकारण्य का मिथकीय पाठ की आधुनिक,जनपक्षधर प्रस्तुति नवीनता लाती है।सीता का कहना कि ‘हथियार का गलत प्रयोग न हो,निर्दोष न मारे जाएँ।बिना कारण जाने हथियार न उठाए जाएं।’ यह सीता के वैचारिक क्षमता का प्रस्तुति तो है कि आधुनिक लोकतंत्र के न्याय के सिद्धांत से सीधा जुड़ता है।इसी तरह मोचा जो कुत्ता है उसे बर्बरीक के रूप में प्रस्तुत करना बिल्कुल नए आयाम खोलता है।महाभारत और बस्तर के संबंधों को जिस तरह दिखाया है वह इस किताब की साहित्यिक ऊँचाई का बेजोड़ प्रस्तुति है।रामनामी समुदाय, डंकिनी नदी, असुर और जंगल के सांस्कृतिक विश्लेषण की चर्चा पूरा बस्तर को मिथकीय विश्लेषण से राजनीतिक और सांस्कृतिक विश्लेषण तक ले जाते हैं।जिसको एक वाक्य में कहते हैं ‘जंगल को कभी किसी की जरूरत नहीं पड़ती,ये आप हैं जिनको अपनी कहानी कहने के लिए जंगल की जरूरत पड़ती है।’

             हथियार और कविता पर जो विश्लेषण है विशेषकर कलाश्निकोव को लेकर वह जरूरी तथ्य और विश्लेषण है जिसपर लेखक समुदाय को विचार करना चाहिए।नक्सल साहित्य,एजुकेशनल डिबेट,नक्सलियों के अंतर्विरोधों ख़ासकर बस्तर और झारखंड के तुलना के संदर्भ में ये सब ठहर कर विचार करने पर मजबूर करते हैं।उपन्यास और पत्रकारिता पर भी छोटी परंतु महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ हैं।अच्छे उपन्याकर और महान उपन्याकर का अंतर बताते हुए जरूरी बात कही गयी कि ‘अच्छा उपन्याकर अपने पात्रों के में समान मात्रा में सहानुभूति प्रकट करता है जबकि महान उपन्याकर उस सहानुभूति के खिलाफ संघर्ष करता है।

             बस्तर का आदिवासी उसी महान उपन्याकर की तरह सहानुभूति के खिलाफ संघर्ष करते हुए ‘इतिहास में अपनी स्थायी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।’

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