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‘अंतस की खुरचन’ पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी

कवि यतीश कुमार का कविता संग्रह ‘अंतस की खुरचन’ जब से प्रकाशित हुआ है लगातार चर्चा में बना हुआ है। उसकी समीक्षा लिखी है मृत्युंजय ने। आप भी पढ़ सकते हैं-
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किसका हाथ पहले पकड़ें
 
 
यतीश की कविता जीवन के सूक्ष्मतर अनुभव और अनुभावों का छायाचित्र आंकती चलती है। ‘ख़ून में मेरे नमक-भात है / और सत्तू में मिला अपरिष्कृत पानी’ से प्रेमचंद के ‘बासी भात में ख़ुदा का साझा ‘ की कल्पना झांकने लगती है, तो अन्यत्र ‘ओसारा’ में ‘… ज़ीरो काटा, पोशम्पा का गीत / या ज़मीन पर स्तूप का गणित / पिट्ठू फोड़ हो या विष-अमृत की होड़… ‘ में मुक्तिबोधीय अतियथार्थ की झांकियों की गति। कभी सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की सरलता जैसे ‘पिता! मेरे कंधे की / एक टहनी टूट गयी है…(पिता – २)’, तो कभी अरुण कमल की साफ़गोई जैसे ‘ईश्वर मिथक नहीं सच है / और आपके इर्द-गिर्द हाथ थामे / यक़ीन दिलाता है कि /ईश्वर कोई पुरुष नहीं होता।’ ((स्त्री)
 
आधुनिकता और भोग की लिप्सा से मर्दित गाँवों के संघर्ष की पीड़ा और संघर्षरत रहने के संकल्प के एक अद्भुत जक्सटापोज़ की ‘शिनाख़्त’ करते हुए कवि विकास के भोग की मज़बूरी भी समझता है, और समझौते की वह वेदना भी, जिससे भर कर वह कहता है -‘यह सब / शहर से मैं / चुपचाप देख रहा था।” रंगों के अपना चेहरा बदल लेने की प्रवृत्ति से परिचित, लेकिन उतना ही सशंकित कवि कुछ भी बदरंग होने से डरता है (रंग-वार्ता)। गाँव और क़स्बों की मिट्टी कविताओं में, कभी अपने शब्द-स्वर से, तो कभी भावों की त्वरा से, ‘दर्द का एक सामूहिक वक्तव्य’ गाती फिरती हैं।
“बूंदों को / आवाज़ उधर लेने की आदत है / जिससे टकराती हैं / उसी की आवाज़ बन जाती हैं। …” इस बिम्ब में कवि के उस गूढ़ अवलोकन की मेधा दिखती है जो प्रकारांतर से हमारे वर्त्तमान समाज के क्षरण का दुःख भी दर्शाता है। ‘मकई के भुये-सा मुलायम समय’ (पुआल) – एक अतियथार्थवादी प्रयोग का नमूना है जो मुझे बरबस केदारनाथ सिंह के ‘हाथ’ कविता की याद दिला गया। दोनों ही कवि उस मुलायमियत के संधान में लगे हैं जो परस्पर महसूस तो होता है, लेकिन नमूदार नहीं होता। ‘मुर्दा सीधा सोते हैं / आदमी नींद में भी टेढ़ा रहता है…’ – गतिमान जीवन से जूझते मनुष्य का टेढ़ापन, अब ज़रुरत नहीं, एक आदत बन गयी है। कवि क्रमशः ‘अनिश्चय और भय के बीच की सहजता से’ परेशान तो है, लेकिन ‘किसका हाथ पहले पकड़ें’ की अनिवार्यता भी उसे साफ़ दिखती है। उसे यह साफ़ दिखता है कि ‘सारी जीवंत उत्पत्ति / दवाब में आकर उभरती है’ (दवाब और सृजन)। ‘दो और दो को / बस चार ही गिन सकूं’ (इतना ही सीखता हूँ) की सरलता का अनुगामी कवि ‘मुझे इंक़लाब नहीं / बस, अपना जवाब चाहिए’ के कोमल स्वर में ‘धूल-धूसरित स्वतंत्रता की लालिमा में’ अभी भी एक स्वतंत्रता-दिवस की उम्मीद लिए लिख रहा है।
 
पर्यावरण और परिवेश की चिंता (‘शहर का नदी हो जाना’, ‘फैलाव’ आदि) कवि की संवेदना को उतनी ही शिद्दत से हिलोरती है जितनी कि कायिक सम्बंधों का दूबिया एहसास (‘स्त्री’, ‘बनना चाहता हूँ’,’सबसे प्यारी हंसी’,’दस्तक’,’तुम्हार पास आऊंगा’,’आदतन’, ‘मेरी बच्ची’ आदि)। ‘हम-तुम’ (१ और २) में ‘हम दोनों’ के ‘असंख्य या फिर / सिर्फ़ शून्य’ की कल्पना, प्रेम के उस परा-वायवीय अनुभाव का आह्वान है जिस स्नेह की अगाधता से भर कर जॉन कीट्स भी ’till love and fame to nothingness do sink (When I Have fears) कहने को विवश हुए थे। पिता के ‘अबोले शब्दों’ को समझते हुए, और माँ की जो ‘आँखें बोलती हैं’ उसे भी आत्मसात करते हुए, कवि यतीश ने संग्रह के दूसरे भाग ‘साझा-धागा’ में, पिता और माँ के बहुप्रचलित बिम्बों के माध्यम से धारावाहिक हमारे जीवन में उनकी उपस्थिति को दर्ज़ किया है – ”और ख़ुद में तुम्हारी उपस्थिति / छानता और पृथक करता रहता हूँ / न्यूनतम तुम / अब मेरी पहचान है (पिता – 1)।’
 
कवि यतीश की भाषा सहज संवाद की भाषा है जिसमें बड़ी ख़ूबसूरती से तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों को आपस में मिलाया गया है। एक ही कुम्हार की एक ही चाक पर जैसे ढाल लिए जाते हैं कई तरह के पात्र, गढ़ लिए जाते भिन्न-भिन्न प्रकार, इनके शब्द भी कभी ज्ञान-सूत्र, कभी स्व की आभ्यंतरीन खोज, कभी ‘ढलते शाम की पेशानी’, कभी ‘उगते सूरज की ताबानी’, तो कभी गुदाज़ सम्भाषण का रूप ले लेते हैं। डॉ. श्री प्रकाश शुक्ल जी (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) ने ‘अंतस की खुरचन’ पर अपनी टिप्पणी में ठीक ही कहा है – “यहाँ शब्द एक आवर्त में आगे बढ़ते हैं और आसपास की स्थितियों को समेटते चलते हैं।”
 
मुझे यतीश कुमार में कविताई का वह तेवर नज़र आ रहा है जो देर तक कविता की ड्योढ़ी को प्रकशित रखने की क्षमता रखता है। मेरे लिए उनके इस काव्य-संग्रह को पढ़ना एक सुखद अनुभव था और उम्मीद करता हूँ कि आगे भी उनके काव्य-वैविध्य का सुख हमें मिलेगा। अजस्र शुभकामनायें ‘अंतस की खुरचन’ और उसके रचयिता यतीश कुमार को!…
 
-मृत्युंजय-
mrityunjay.61@gmail.com
phone: 9830647777
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किताब : अंतस की खुरचन (काव्य-संग्रह)
कवि    : यतीश कुमार
राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य: २५० रुपए 
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