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मियाँ मक़सूद अली ‘ख़ुशदिल’ की कहानी

आज पढ़िए वसी हैदर एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं और जाने-माने ऑनलाइन बुक्स मार्केट्प्लेस उर्दू बाज़ार के संस्थापक हैं। वसी पिछले 4 सालों से दास्तानगोई कलेक्टिव से भी जुड़े हुए हैं और कई दास्तान सुना चुके हैं। उर्दू अदब से ख़ास जुड़ाव और किताबें पढ़ने का शौक़ इनको लिखने की तरफ़ बनाए रखता है। उनकी एक दिलचस्प दास्तान पढ़िए-

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मक़सूद अली का मुस्तक़िल पेशा क्या था ये तो मैं सही सही नहीं जानता पर वो कभी कभी बतौर अनाउन्सर इश्तहारों के लिए रिकॉर्डिंग किया करते थे।

50 बरस का सिन, गोरा रंग और तलवार नुमा तरशी हुई मूँछें। सर के बाल एकदम स्याह, दाढ़ी में यहाँ वहाँ सफ़ेद बाल थे पर हमने अक्सर औक़ात उसको एकदम सफ़ा चट ही पाया।

आवाज़ एकदम करारी और शफ़्फ़ाफ़, जैसे अल्फ़ाज़ एकदम रग ए दिल से आ रहे हों। सिगरेट का एक पैकेट हमेशा उनके कुर्ते की ऊपर की जेब में होता।

मोहर्रम की मजलिसों में अक्सर मौलाना की पेशख़्वानी का ज़िम्मा वो ही लेते और जब परदादा मरहूम की लिखी हुई रुबाइयाँ सुनाते तो सुनने वाले अश अश करने लगते।

जिना से रुतबा ए फ़र्श ए अज़ा बढ़कर समझता हूँ
हर इक शादी से अफ़ज़ल मैं ग़म ए सरवर समझता हूँ
तलब जन्नत की ना दौज़ख़ का मैं कुछ डर समझता हूँ
सलाम ए ज़िक्र शय और उल्फ़त ए हैदर समझता हूँ

अक्सर गलियों में किसी रेड़े पर कोई स्पीकर बज रहा होता जो या तो फ़ारूख़ ठेकेदार के तरबूज़ों की तारीफ़ में होता या मंगल बाज़ार में आए अलीगढ़ी तालों का कोई क़सीदा।

अक्सर आए बगाए झील वाली मस्जिद से किसी की नमाज़ ए जनाज़ा का अनाउन्स भी ऐसे करते की सुनने वाले पर रिक़्क़त तारी हो जाती।

मक़सूद अली के वालिद का नाम तो अब याद नहीं पड़ता के हमारे बचपन ही में वो इंतेक़ाल कर गये थे पर कुछ धुन्दली सी याद बाक़ी है के ख़ां साहब उनको कहते थे अलबत्ता अम्मी उनकी कुछ ही साल हुए के अल्लाह को प्यारी हुई। बी हज्जन उनको कहते थे, ख़ुदा बख़्शे बड़ी नेक औरत थीं।

बी हज्जन ने दो ही बच्चे जने एक मक़सूद अली और दूसरे थे साजिद अली, साजिद अली तो हज्जन बी के दौर ए हयात ही में दिल्ली को चले गये।

छरेरा जिस्म जिसपर बिस्कुटी रंग का कुर्ता पहनते, गर्मी जाड़ा बरसात उनका लिबास कम ओ बेश एक ही सा रहता।

वही बिस्कुटी कुर्ता उसपर वही चोड़ी मोरी का पजामा और वही शकरपारों वाली कोटी।

टोपी भी कम ओ बेश एक ही सी रहती अलबत्ता वक़्त माहौल के मुताबिक़ सर पर अपनी पौज़िशन बदलती रहती।

मसअलन कभी सीधी सर पर रखी है तो कभी इस क़दर तिरछी के कान को छू रही है।

कुछ दिन हुए के उनको शायरी की धुन सवार है, बग़ल में दीवान ए ग़ालिब लिए फिरा करते हैं और इल्म ए अरूज़ पर ज़ेर ए बहस रहते हैं, सुबह सुबह फ़ा ई लुन फ़ा ई लुन फ़ा ई लुन की आवाज़ों से घर गूंजा करता है।

शहर में एक और शायर होते हैं तख़ल्लुस ‘कामिल’ लिखते हैं और इस्मे गिरामी आस मोहम्मद बताते हैं। जोश की तर्ज़ पर मश्क़ ए सुख़न करते हैं।

कामिल साहब ही का तजवीज़ करदा तख़ल्लुस मियाँ मक़सूद को भा गया। ‘ख़ुशदिल’।

तो यहाँ हम कहानी मियाँ ख़ुशदिल की बयान करते हैं।

हमारा घर लखोरी ईंटों से बना है तीन कमरे हैं। कमरे तो क्या कहें की एक कमरे को तो हम घर कहते हैं जिसमें ही हमारा सब माल ओ असबाब है। माल ओ असबाब हमने वैसे कभी देखा नहीं पर एक मचान उसी कमरे के एक हिस्से में है जिसपर कहते हैं पाक जिन रहते हैं और उन्ही के क़ब्ज़े में वो अशर्फ़ियों की देग़ है के जिसके सरकने की आवाज़ हम कभी कभी देर रात सुना करते हैं।

इस कमरे के बिलकुल सामने ही दूसरा कमरा है जिसे कच्चा कोठा कहते हैं, कच्चा लफ़्ज़ से आप समझ सकते हैं के कमरा कच्चा है, और तीसरे हुजरे का तो क्या कहें के उसका नाम ही कोठड़ी है।

कोठड़ी बिलकुल घर यानी पक्के कमरे से मिली हुई है और इसी के सामने है एक लहीम शहीम नीम का पेड़ जिसपर आठों पहर परिंदों का ताँता लगा रहता है।

इस पेड़ की भी अपनी कहानी है पर लीजिए इस तरफ़ निकल गया तो वापस आना मुहाल हो जाएगा, तो नीम को छोड़ते हैं मियाँ मिट्ठु के पास और आगे चलते हैं।

नीम से थोड़ी आगे एक और कच्चा कमरा है जो बैठक कहलाता है। बैठक की छत पर कड़ियों का जाल है और एक छोटा था टांड है जिसपर वो सारा सामान रखा है जो शायद ही आजतक नीचे उतरा हो।

आप सोच रहे होंगे के मियाँ ख़ुशदिल की कहानी में ये मैंने अपनी कहानी क्यूँ उड़ेल दी?

दर असल ये ही वो बैठक है जिसपर हर रात मुफ़्तनोशों का ताँता बंधता है।

वालिद साहब हमारे दिन भर दौड़ धूप करते हैं तो शाम को गप्पें लगाने के लिए कोई चाहिए होता है सो ये वो मक़ाम है के शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के वालिद साहब के पास आ जाते हैं।

कामिल साहब, मियाँ ख़ुशदिल, गौहर साहब, मिर्ज़ा जी, सईद मियाँ, ग़ाज़ी साहब, खां साहब, वकील साहब, फ़लाँ साहब और फ़लाँ साहब।

यहाँ कई मसअलों या यूँ कहें के सारे बेकार के मसअलों पर बहस होती है और चाय की प्यालियाँ कत्थई की जाती हैं।

तक़रीबन पैंतीस बरसों से ये कार ए ख़ेर बा दस्तूर जारी है। एक धुन्दली सी याद है के मंडली में तय हुआ के इस बार मिलाद उल नबी को सामने वाले सरकारी स्कूल में मुनक़क़िद कराएँगे। शोरा की लम्बी फ़ेहरिस्त तैयार की गयी। गुलाब अर्क़ से भरी गुलाब दानियाँ, फूलों की मालाएं, सफ़ेद चाँदनी, लंगड़े अताउल्लाह के हाँ से गद्दे और पप्पू भाई के यहाँ से माइक का इंतेज़ाम तय हुआ।

ऐन स्टेज के सामने एक फव्वारा लगवाया गया जो रंग बेरंगा पानी ऊपर फेंकता।

अम्मी ने पान दान तैयार किए, ख़ानपोश से कपड़ा काटकर पानदान का ग़िलाफ़ बनाया गया।

और ख़ुशदिल साहब को निज़ामत की ज़िम्मेंदारी दी गयी। क़रीब एक हफ़्ता वो बैठक में ना आए के इस ज़िम्मेदारी की तैयारी में मश्ग़ूल हैं।

कुछ वक़्त बीता और फ़िक्र-ए-माश ने वतन से दूर कर दिया, अब घर भी कम आना होता। शुरू शुरू में तो जब भी आता तो सब से मिल ही लेता था या वो सब बैठक ही में मिल जाते थे। पर धीरे धीरे ये आमद ओ रफ़्त भी कम हुई और मुलाक़ातें भी।

अलबत्ता मुहर्रम में 10 दिन तो सबसे ख़ूब मिलना होता, इस बार अल्लाह का करना कुछ ऐसा हुआ के चाँद रात को न आ सका था और किसी तरह ज़ुल्जना के जुलूस में भागता दौड़ता 7वीं तारीख़ को पहुंचा, वो भी सीधा कर्बला।

8वीं का दिन था और में सक़्क़ाई के इंतेज़ाम में सुबह से ही मशग़ूल था के किसी काम से बाज़ार का गुज़र हुआ। ईश्वर के यहाँ से मुहर्रम का सब सामान आता था पर उसके इंतेक़ाल के बाद उसके दोनों बेटों मनोज और विकास ने अपनी अपनी दुकान अलग कर ली थीं। दुकान आमने सामने थी तो किसी एक का इन्तेख़ाब करना बड़ा मुश्किल होता था लिहाज़ा मैं सामान अबुपुरिया के यहाँ से लेने लगा था।

उसका नाम तो नहीं पता अलबत्ता अबुपुर उस का गाँव था लिहाज़ा सारा क़स्बा उसको अबुपुरिया ही कहता था।

अबुपुरिया के यहाँ पहुंचा और लिस्ट उसको थमा दी।

अज़ीज़ उसके यहाँ काम करता था जो मियां ख़ुशदिल का पड़ोसी था उसी से पता चला के किडनी में स्टोन निकला है और फ़िलहाल डॉक्टर ने आराम के लिए कहा है।

सामान पैक होने में भी अभी वक़्त था तो सोचा चच्चा से मिलकर ही आ जाता हूँ। जब वहां पहुंचा तो बिस्तर पर पड़े बिरयानी खा रहे थे, मैंने कहा चच्चा क्या ग़ज़ब कर रहे हैं इससे तो और पथरी पढ़ जाएगी।

बोले: मियाँ गुनाह गार हूँ अल्लाह अंदर से संगसार कर रहा है। मैंने कहा चच्चा अल्लाह अल्लाह करो नमाज़ पढ़ो अब ये सब बातें न करो।

बोले: भैय्या रोज़ नमाज़ पढता हूँ।

मैंने कहा किसी ने मस्जिद में तो देखा नहीं आपको।

बोले: मस्जिद में नहीं जाता।

मैंने कहा क्यों?

कहने लगे: “भई वहां तो मौला अली धोका खा गया था, अगर मस्जिद से बाहर होता तो किसी में हिम्मत नहीं थी उसे मारने की।”

मैंने कहा चच्चा तौबा करो।

और दोनों हंसने लगे।

9वीं को हज़रत क़ासिम की मेहंदी का जुलूस था चच्चा की तबियत ख़राब थी फिर भी जो मेहँदी पढ़ी तो लोगों की हिटकियाँ लग गयी।

तलवारों का है सर पर सांया किसी शान से मेहँदी आती है
हर सम्त सदा है वा-वैला किस शान से मेहँदी आती है

रोज़-ए-आशूर को तोशे की रोटी और शाम ए ग़रीबां की मजलिस थी पूरा दिन सुकून न रहा। उस रोज़ वैसे भी किसी से मिलने को जी नहीं चाहता। 11वीं को सुबह ही रवाना हो गया फ़र्क़ इतना था के मेरे हाथों में बज़ाहिर बेड़ियाँ न थीं।

पर जैसे ही काम में थोड़ा दिल लगने लगा दफ़्तर सारे बंद हो गए और एक वबा ने अपने हाथ खोल दिए और हर शय का ज़ायक़ा चखने को

यहाँ वहां मंडलाने लगी। कुछ वक़्त तो छिप छिपकर काट दिया पर जब कोई इमकान नज़र न आया तो चंद ही दिनों में घर का रुख़ किया।

पर घर आया तो हवा ही बदली हुई थी। वो बैठक जो पहले ही ख़्वाब बन चुकी थी अब ला शऊर का हिस्सा होने वाली थी के उसकी छत से कुछ कड़ियाँ ख़ुद को जुदा कर चली थीं। उसपर लेंटर डालने की बात हो रही थी और मियां ख़ुशदिल बुझे बुझे से राज मिस्त्री अकरम से बात कर रहे थे।

बैठक नयी होने वाली थी पर सबके चेहरे पर दुःख था। ये बात मुझे समझ नहीं आती के हम कभी कभी किसी याद को जीते वक़्त ही उसकी नास्टैल्जिया में क्यों गिरफ़्तार हो जाते हैं?

अब शायद बोहोत दिन घर ही पर रहना होगा ये एहसास ख़ुशगवार था पर इसको सोचने से कुछ क़ैद का तसव्वुर भी दिमाग़ पर तारी होता रहा, पता नहीं किस सोच में देर तक जागता रहा और कब सुबह की अज़ान हो गयी, जो ग़ालिबन आधी सुन पाया था के किसी और ख़्वाब में मुब्तला हो गया।

सुबह किसी ख़्वाब से जो अब याद नहीं पड़ता, हड़बड़ा कर उठा तो घर पर अम्मी के अलावा कोई नहीं था, पूछने पर अम्मी ने बताया के मक़सूद भाई का इंतेक़ाल हो गया है। रात को पता नहीं किस घड़ी दिल का दौरा पड़ा के सुबह का सूरज न देख सके और नीम के पेड़ के नीचे खेस ओढ़े पड़े रहे।

मैं जब उनके घर की तरफ़ गया तो देखा उनको नमाज़-ए-जनाज़ा के लिए मस्जिद ले जा रहे हैं।

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