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बिजली भगवान का क्रोध नहीं है और बच्चे पेड़ से नहीं गिरते हैं!

नए संपादक की नई रचना. अमृत रंजन में जो बात मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है कि वह झटपट कुछ लिखकर लोकप्रिय नहीं हो जाना चाहता है बल्कि वह  लेखक के माध्यम से वैचारिक कगारों को छूना चाहता है, उनका अन्वेषण करना चाहता है. इसलिए उसकी कविताओं में और उसके गद्य में भी एक सहज प्रश्नाकुलता है और एक गहरा वैचारिक बोध. यह उसकी नई रचना है- मॉडरेटर


क़सद का मामला कभी समझ नहीं आया। आख़िर लोग क्यों मानते हैं कि किसी वजह से उनका जन्म हुआ है? किसी ताक़त को मानते हैं। मानते हैं कि कुछ बस केवल होने के लिए नहीं होता है। सब चाहते हैं कि तारा बनेंगे, जहाँ कुछ नहीं है उस जगह को भरेंगे। ऐसा सोचना कहाँ से शुरू हुआ?

अगर ब्रह्मांड के जीवन की शुरुआत में दो चीज़ें न टकरातीं, तो मैं यहाँ नहीं होता! अगर तारों से ज़रा सी चूक हो जाती तो न जाने मैं कहाँ होता। क्या मैं ज़िन्दा भी होता? होता तो किस जीव के रूप में? क्या मैं होता? अगर एक बार सूरज की साँस चूक जाती, तो क्या धरती होती? केवल मेरे पैदा होने की संभावना तीन खरब में से एक थी, तो क्या सच है? कितने लोग मरे हैं मुझे ज़िन्दा रखने के लिए। इतना ख़ून मैं अपने हाथों पर रखकर कैसे जीऊँ? वही संभावना माँ और पापा के आने की थी। वही संभावना दादा-दादी और नाना-नानी की थी। अनगिनत लोग मेरी जगह हो सकते थे। शायद किसी समानान्तर ब्रह्मांड यानी पैरेलल यूनीवर्स में हों भी! डर लगता है सोचकर कि मैं कहीं हूँ ही नहीं और कही हूँ भी। मर जाना बेहतर है न होने से।

अगर मैं इधर क़दम लूँ तो उधर उस जगह कितने लोग पैदा होंगे या मरेंगे। अगर मैं अपनी कुर्सी दो इंच खिसका लूँ तो क्या बदलेगा? उथल-पुथल का चादर हमारे चारो ओर बंधा हुआ है। हमारा हर क़दम मायने रखता है कि आगे क्या होगा। एक नई दुनिया को जीवन दे सकता है, बनी-बनाई दुनिया का विनाश कर सकता है। हर किसी की एक-एक सांस से हमारा-आपका-सबका भविष्य बनता-बिगड़ता है। हर साँस एक नए अगर को जन्म देती है। यह अगर परमाणु तक खिंचा चला जाता है। हमारी हर आहट, हमारा हर अहसास हमारा अगला बनाती है। लेकिन सबसे डरावनी बात क्या है — पता है? हम कभी नहीं जान पाते हैं कि क्या क्यों हुआ। शायद एक और दुनिया है जहाँ आपका ही लिया दूसरा ऐसा निर्णय पैदा हो चुका होता है जो आपने लिया ही नहीं। हम कुछ कर नहीं सकते। जब तक हम ज़िन्दा हैं कुछ कॉन्सटेंट नहीं रहेगा। मरने के बाद का तो कुछ कहना मुश्किल ही है।

तो कविता क्यों लिखी जाती है — एक बुरा सवाल है! हम सबके लिए कुछ भी बस होने के लिए नहीं होता है। हर चीज़ की वजह होनी ज़रूरी है। यह जवाब मैं बिना सोचे नहीं लिख रहा हूँ और यह बुरी बात है। क्योंकि कविता वह चीज़ है जो बिना सोचे लिखी जाती है। जो कविता सोचकर लिखी जाए वह काग़ज़ पर चंद खरोंचों के ज़्यादा कुछ नहीं है।

कविता लिखने के लिए एक कगार पर पहुँचना पड़ता है और यह कगार ज़्यादातर मेरे लिए तो डर होती है। कगार से यहाँ मेरा मतलब है किसी खाई का किनारा। मरने के बहुत ही ज़्यादा क़रीब। वह महसूस करना होगा जिसे लोग पागलपन कहते हैं। वैसा पागलपन जैसे कि ख़ुशी के समय मरने की इच्छा। या फिर भूख लगने पर न खाने का मन। वैसा पागलपन। जो हमारे पढ़े-लिखे वकील समझा न पाएँ। जिस चीज़ को मनुष्य का दिमाग समझने के काबिल नहीं है। पागलपन प्यार जितना आसान भाव नहीं है। जिस चीज़ की वजह हो वह कविता नहीं है। तो इसलिए जब भी कोई मुझसे पूछता है कि तुम कविता क्यों लिखते हो, तो मेरा जवाब होता है मुझे नहीं पता। और यह मैं इस ढंग से नहीं कहता कि “अभी ढूँढ रहा हूँ” बल्कि “और कभी पता नहीं चलेगा” के ढंग से।

तो पागलपन के तट पर कैसे पहुँचा जाए? बहुत आसान है। कितनी दूर तक सोच सकते हैं हम…। जैसे सूरज की साँस एक बार चूक जाए तो? और कितने लोग जिन्दा हो सकते थे एक इंसान की जगह? लेकिन फिर वही क्यों? क्या ख़ास है उसमें? और यहीं पैदा होने की संभावना से एक नया शब्द जन्म लेता है, मक़सद। यहीं दिमाग खुद को वजह देता है। यही जानने के बाद कि इस मन की जगह तीन खरब और लोग हो सकते थे। इसी जगह से वजह ढूँढना शुरू होता है।और हर चीज़ की वजह जाने बिना पागलपन का डर होता है। जो भी आजतक खोजा गया है वह असल में नहीं होता है। बस माना गया है। वजह ढूँढ़ने में सिर्फ समय बीतेगा। लेकिन पागलपन जाएगा नहीं।

रसल-आइंस्टीन मेनिफ़ेस्टो में लिखा है कि मनुष्य का अंत दुखद तो होगा लेकिन बड़ी बात नहीं होगी। हमारे पास किसी भी जीवित जानवर से ज़्यादा इतिहास हो लेकिन हमारे अंत का शोक कोई नहीं मनाएगा। हम खुद को राजा मानते हैं इस धरती का और हम सोचते हैं कि घरों में रहने से हम सभ्य कहलाएँगे। मक़सद जैसी क्या चीज़ होती है? तारे गिने जा सकते हैं पर सवालों के जवाब नहीं ढूँढ़े जा सकते हैं।

लेकिन हमारा वजह ढूँढ़ना भी ग़लत नहीं है। धीरे-धीरे भगवान भी मरे जा रहे हैं और यह बहुत अच्छी बात है। बिजली भगवान का क्रोध नहीं है और बच्चे पेड़ से नहीं गिरते हैं। स्त्रियों की लड़का न पाने के वज़ह उनकी ग़लती नहीं है और मंगलवार को चिकन खाने से कुछ नहीं बिगड़ता। देखा जाए तो अनगिनत झूठ बोले गए हैं हमसे। तो क्या हम खुद की वजह जानना छोड़ दें। दिमाग कहता है कि नहीं ऐसी बात को कैसे छोड़ा जा सकता है। इसी वजह से हम कुछ करने की कोशिश करते हैं ताकि खुद को सांत्वना दे सकें कि हम बेवजह नहीं हैं। और इस शहर में, इस देश में, इस धरती पर, इस गैलेक्सी में, इस ब्रह्नांड में — अनगिनत — हम छोटे से आटे का दाना भर हैं और इसकी कोई वजह है। कोई नहीं चाहता है कि वह इस संसार में एक ग़लती हो। लेकिन दिक़्क़त की बात है कि कविता एक “ग़लती” है जिसकी आशा ग्रैंड डिज़ाइन ने नहीं की थी। और इसलिए शायद कविता ही हमारे अंत का शोक मनाने के लिए बची रहे।

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