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हम क्या से क्या नहीं कर गुजरते हैं अपने प्रॉमिस लैंड की तलाश में!

पूनम दुबे के यात्रा-संस्मरणों का अपना ही मज़ा है। हर बार उनके लिखे में एक न एक कहानी होती है। इस बार बेल्जियम है और एक कहानी-मॉडरेटर

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बेल्जियम के एक छोटे से शहर घेंट के बस डिपो पर बैठे हम इंतजार कर रहे थे अपनी बस के आने का. करीब बीस मिनट से भी ज्यादा समय बीत गया लेकिन अब तक एक भी बस नहीं आई थी. मेरा मन अब भी ब्रूज़ की दिलकश फेरी लैंड सी गलियों में उलझा था. अगर पहले से टिकट न बुक होती तो शायद एक दिन और रुक जाती वहीं ब्रूज़ में. खैर ट्रेन की टिकट को तो कैंसल भी किया जा सकता था. ज्यादा महँगी भी नहीं थी लेकिन यहाँ रात जिसके यहाँ हम रुकने वाले थे उसे मना करना सही नहीं लगा. इसलिए ब्रूज़ से एक बार फिर आने का वादा करके और अपने चॉकलेट में लिपटी आखिरी वाफ़ल की प्लेट लेकर दौड़ते हुए हमने अपनी ट्रेन पकड़ी थी. बेल्जियम छोटा देश जरूर है लेकिन खूबसूरती से मालामाल है. कुछ डेढ़ घंटे की ट्रेन यात्रा करते ही हम एक शहर से दूसरे शहर में आ गए थे. इससे ज्यादा समय तो मुझे मुंबई में अपने घर से ऑफिस पहुँचने में लगता था मन ही मन सोचा.

खैर आधा घंटे से ज्यादा समय बीत गया एक बार फिर घड़ी पर नज़र गई. कहीं आज कोई स्ट्राइक तो नहीं या फिर कोई हॉलिडे हो. क्या माजरा है. “पता नहीं था यूरोप में भी बस लेट होती है, ऐसा तो पहले नहीं हुआ” यही बातें मन में बुदबुदा रही थी कि न जाने कब हमसे कुछ दूरी पर दो नौजवान आकर बैठ गए. वह भी शायद बस का ही इंतजार कर रहे थे मैंने अंदाजा लगाया. हाथ में उनके बियर की बोतल थी. अपने देश में चाहे कितनी ही अंग्रेजी टीप लूँ लेकिन विदेश में मुंह से हिंदी ही फूटती है. उसके कई वजह है. सबसे पहली वजह यह कि विदेशियों को हमारी भाषा समझ नहीं आती. मतलब की भीड़ में भी प्राइवसी जैसा फील आता है. किसी भी चीज की चर्चा कर सकते हो खुलकर. समझ रहें हैं न, एकाध गाली-वाली भी मुंह से निकल गई तो कोई बुरा नहीं मानेगा क्योंकि समझ तो आनी नहीं है बात.

ख़ैर मैं बड़बड़ा रही थी, “यार यह लोग कितने बेवकूफ है इन्होंने कोई नोटिस बोर्ड वगैरह भी नहीं लगाया है. बस आएगी कि, नहीं आएगी! कब आएगी कुछ नहीं पता किसी से पूछना चाहिए न?”

“अच्छा एक काम करते हैं इन दोनों से पूछते हैं कि माजरा क्या है?”

 “धीरे से बोलो सुन लेंगे वह!”

 “सुन लेंगे.. झुंझलाहट मेरे शब्दों में से निकलकर पूरे बस स्टॉप के आस पास फैल गई.”

 “बस यही शब्द मेरे मुंह से फूटे ही थे कि उनमें से एक लड़का पास आकर बोला, “बस तो आज नहीं आएगी! आप  लोग बस का वेट कर रहे है?”

कद में छोटा, साँवला रंग, टी शर्ट और जीन्स पहनी थी उसने. मैंने सरसरी नजर डाली उस पर.

मेरे कान खड़े हो गए! ओह इसे हिंदी आती है. तो इसने सब सुन लिया. मैं मन ही मन सकुचा गई.

हम दोनों झट से पूछ बैठे, “आप हिंदुस्तान से हैं?”

वह मुसकुराया बोला, “जी नहीं मैं पाकिस्तान से हूँ. आप लोग कहाँ जाना चाहते है किस बस का इंतजार कर रहे है?”

हम जवाब देने ही वाले थे कि दूसरा बंदा हाथ में बियर की बोतल लिए अचानक ही सामने आ गया कहा, आप लोग इंडिया से है! मुझे इंडियन बहुत पसंद है. यह बंदा कद में काफ़ी लंबा था रंग में थोड़ा गोरा आँखें हल्के भूरे रंग की नाक थोड़ी लम्बी और शार्प लगी मुझे उसकी। कुछ हाई (नशे में) था इसका अंदाजा हमें हो गया उसके बोलने के अंदाज से. वैसे भी शनिवार की शाम थी. लोग एन्जॉय कर रहे थे.

“जी हम हिंदुस्तानी है! हम दोनों मुसकुरा दिए!”

“माशाअल्लाह! मैं अफ़ग़ान से हूँ.”

“इसलिए इसकी हिंदी इतनी साफ़ नहीं है.” मन ही मैंने सोचा.

चेहरे और रंग-रूप से यह कहना मुश्किल नहीं था कि वह यहाँ के मूल निवासी नहीं थे. “आपकी हिंदी तो अच्छी है!”

“हम पाकिस्तान में भी था दो साल इसलिए उर्दू सीख ली वहां। आप लोग हिंदी बोलते हैं इसे?”

“आप लोग भी घूमने आये हैं.” यह हमारा अगला सवाल था!

“नहीं नहीं! हम इधर एक फैक्ट्री में काम करता है आज छुट्टी है तो सोचा एन्जॉय करें, उसने अब अपने पाकिस्तानी दोस्त की तरफ़ देखा.” यह बहुत कम बोलता है यह कहकर वह अपनी आँखें बड़ी-बड़ी कर हंसने लगा. जैसे उसे ताना मार रहा हो.

“पाकिस्तानी लड़के ने सिर्फ एक हल्की मुस्कान दी.”

“अभी हम इधर सात साल से है. हमको हमारी बेटी की याद आती है. बिलकुल इधर के लोगों जैसी उसकी भी नीली आँखें है भूरे बाल, बिलकुल डॉल के जैसा!”

“वह पाकिस्तान में है क्या?”

“नहीं दोस्त! वो इधर की है. अभी पैरिस में है. तीन साल से अलग हो गए हम. हमारा डिवोर्स हो गया. गलती मेरी ही है. उसकी आवाज़ में अफ़सोस था. मैंने उसपर जोर दिया कि शादी के बाद तुमको हमारे मम्मी जैसे हिज़ाब पहनना चाहिए. उलटे वो बोली तुमको चर्च जाना चाहिए अभी तुम अफगान में नहीं रहता. इधर के जैसे रहो. हम कोई गोरा थोड़े ही है जो अपना मज़हब बदलेगा. उसके लिए मैंने फ्रेंच सीखा, खाना भी बनाता था लेकिन वह मेरी बात ही नहीं सुनती थी दोस्त.

कई जगह वह अंग्रेजी में बोले जा रहा था. नशे में लोग अकसर भावुक होकर ज्यादा बातें करते हैं.वह बिना रुके बोले जा रहा था.

“हम उसको बोला अब तो बेटी हो गई कम से कम उसको को सिखाओ हमारे मज़हब के बारे में लेकिन उसके रिश्तेदार सब मेरे ख़िलाफ़. एकदम ख़िलाफ़! हमसे वो आठ साल उम्र में बड़ा है फिर भी हम शादी बनाया उससे, तुम को तो मालूम है मजबूरी थी अपनी. अकेली रहती थी वह! उसको हमसे प्यार था. नया-नया आया था इधर हम! वरना एक से एक खूबसूरत लड़की होती है अफगान में! इतना कहते ही न जाने क्या सोचने लगा कुछ मिनटों के लिए.

“आपको उससे प्यार नहीं था क्या?” मैं फिर बोल पड़ी!

“अब कुछ कह नहीं सकता! हम अगर उससे शादी नहीं करता तो शायद हमको इधर के लोग वापस भेज देते. इतना मुश्किल से आया था इधर. हमें असाइलम में नहीं जाने था. इधर जो इल्लीगल होता है न उसको ये लोग वापस भेज देते है लेकिन अफ़गानी था इसलिए यह नहीं भेज सकते मुझे, नहीं तो”..

फिर न जाने क्या सोचने लगा. एक घूँट बियर की ली कुछ पल हमारे चेहरे को देखा. फिर निकाली गांजे की कश. (जहाँ तक मेरा अंदाजा था). उसे जलाया और एक लम्बी कश ली. आँखें उसकी लाल-लाल.

हम मुंह खोले उसके बोलने का इंतजार कर रहे थे. मैं भूल ही गई कि कुछ देर पहले मैं झल्लाई हुई थी और बस का इंतजार कर रही थी. आखिरकार कितनी बार जिंदगी में ऐसा मौका आता है कि इस तरह एक अनजान देश में इतनी दिलचस्प कहानी सुनने को मिले.

तुम को एक बात बोलूं दोस्त हम मौत से बचते-बचते आया इधर. दो दिन तो हम लोगों को ट्रक में रखा स्मगल करके. दस लोग थे उसके बाद तुर्की से बोट लेकर पहले ग्रीस पहुंचा। कुछ महीने उधर काम लिया लेकिन उधर भी गरीबी उससे ज्यादा आराम तो हमको पाकिस्तान में था. फिर हम कैसे-कैसे मुश्किल से पैरिस आया. हमने अपना पासपोर्ट फेंक दिया था मेरे साथ के अफगानी ने असाइलम ले लिया।

उधर ही मिला मैं ऐलिस से! हमको शादी करना था. उसको हमसे प्यार हो गया और हम भी उसको प्यार करता था. मेरी माँ नाराज़ हुई लेकिन हम माँ को समझाया। सब कुछ ठीक था लेकिन बच्ची हुआ तो  मेरा दिमाग घूम गया. और मैं उसको बोला तुमको मुस्लिम जैसे रहना चाहिए, लेकिन वह बहुत नाराज हुई. फिर एक दिन बेटी को लेकर चली गई. अगर अफ़ग़ान में होता न तो मेरी बेटी मेरे पास होती. अब मेरे पास डॉक्यूमेंट है. बेटी के जाने के बाद फ्रांस में रहने का मन नहीं किया तो इसलिए इधर ज्यादा पैसे मिलते है तो इधर की ही एक चिकेन की फैक्ट्री में काम कर लिया. हमारे दोस्त लोगों ने बोला जर्मनी आने का कोशिश कर, इंशाअल्लाह एक बार बस…

इसी बीच पाकिस्तानी बोला, “अब बस कर दोस्त! इसने खूब वीड मार ली है. हमें देखकर उसने अपनी दाईं आँख दबाई इशारा करके बोला, ज्यादा ही इमोशनल हो जाता है यह पीने के बाद! तुझे इतना याद आती है अपनी बच्ची की तो इतनी लड़कियों से बात क्यों करता है.” पाकिस्तानी लड़का ऐंठ कर बोला.

“अरे तो क्या कुंवारा बैठेगा क्या तेरे जैसा.” यह बोलकर खी-खी करके हंसने लगा. सोचता हूँ कभी कभी पाकिस्तान चला जाऊं लेकिन अब हमको उधर का जिंदगी नहीं अच्छा लगता। नहीं जमता उधर रहने में. इसलिए हम कब से इंतजार में है जर्मनी जाने के. एक बार हम बस उधर चला जाए.. हमारे पेपर में थोड़ा सा प्रॉब्लम है.

‘पेपर वाली बात मुझे’ तब समझ आई जब कुछ दिनों बाद हम बस की यात्रा करते हुए बेल्जियम से जर्मनी पहुंचे. उस रात करीब तीन बजे अचानक बस रुक गई. जर्मनी के बॉर्डर पर सभी यात्रियों के पासपोर्ट और ट्रैवल डॉक्यूमेंट की जांच होने लगी. ठीक-ठाक कागज़ात न होने बस में से क़रीब तीन लोगों को नीचे उतार दिया गया.

“जर्मनी ही क्यों?”

“क्यों कि दोस्त उधर ज्यादा कमाई है. उधर का डेली का पैसा इधर से ज्यादा है.”

मैंने मन ही मन सोचा हर कोई कहीं न कहीं पहुँचाना चाहता है. हर किसी को अपने प्रॉमिस लैंड की तलाश है.

हमारे लिए तो उसकी बाते किसी रोमांचक फ़िल्म सी थी. उसकी बातों ने मेरे मन में अमेरिकन नॉवलिस्ट की लिखी किताब “नॉट विथाउट माय डॉटर” की यादें मन में ताजा कर दी. कई साल पहले पढ़ी थी किताब मैंने।

करीब पचास मिनट हो गए थे. बोलने वाला बस वही अफगानी था और हम दोनों सुनने वाले. पाकिस्तानी उसे बीच-बीच में शांत कराता लेकिन नशे में वह भी था.

बाते चल ही रही थीं. बाकी तो कुछ ख़ासा याद नहीं क्योंकि वह सब बगराउण्ड नॉइस बन गया. लेकिन उसकी यह कहानी मेरे ज़ेहन में हमेशा के लिए कैद हो गई. पता नहीं कितना सच था कितना झूठ लेकिन बातें बेहद दिलचस्प थी.

“आप लोग किधर रुका है. आज इधर बस नहीं आएगा।“

“आप कहाँ जाने वाले हैं? हमने पुछा.

हम लोग तो बस इधर ही घूमेगा आज छुट्टी है न.”

“अच्छा.”

“चलो हमारे साथ बियर पीयेंगे, वीड मारेंगे बाते करेंगे।“

हम दोनों ने एक दूसरे को देखा. मन तो हम दोनों का था कि चले थोड़ी और गपशप मारे लेकिन फिर रिस्की भी लगा. पूरे सामान के साथ इस तरह किसी के साथ चले जाना कहीं पासपोर्ट न हथिया ले. ट्रैवेलिंग के समय के ऐसे किस्से बहुत सुने थे हमने जब यात्रियों के पासपोर्ट को छू मंतर कर दिया जाता है.

“जी नहीं, माफ़ कीजिये हमें जाना होगा. हमारी होस्ट हमारा इंतजार कर रही है. यह कहकर हमने उन्हें मना कर दिया और अलविदा कहते हुए पदयात्रा के लिए निकल पड़े. करीब एक घंटे चलकर हमने अपने होस्ट के घर पहुंचे। हैना नाम था उसका, वह म्यूजिशियन थी. उसका एक म्युज़िक बैंड भी था. जर्मनी से कई साल पहले आकर यहीं बस गई थी भीड़-भाड़ से दूर शांति की तलाश में!

उस अफ़गानी से मिली मुलाकात मुझे हमेशा याद रहेगी। कई दिनों तक मन में यह बात कौंधती रही कि हम क्या से क्या नहीं कर गुजरते हैं अपने प्रॉमिस लैंड की तलाश में !

खूब कहा है लियो टोलस्टोय ने वार एंड पीस में “चलने की ताकत रखने के लिए प्रॉमिस लैंड की दूरदर्शिता का होना जरूरी है”!

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