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स्पीति में बारिश-कृष्णनाथ को पढ़ते हुए

 
कृष्णनाथ के यात्रा वृत्तांतों का अलग महत्व रहा है। उनके यात्रा-वृत्त ‘स्पीति में बारिश’ को पढ़ते हुए यतीश कुमार ने यह काव्यात्मक समीक्षा लिखी है। किताबों पर काव्यात्मक टिप्पणी करने की यतीश जी की अपनी शैली है। उस शैली में किसी किताब पर लिखे को पढ़ने का अपना सुख है- 
===================
 
1)
सदैव यात्री रहा हूँ
रंग-वेश-भूषा बदलती रही है
 
शब्दों की यात्रा अर्थों तक
 
जीवन की यात्रा पड़ावों तक
 
चलना यायावरी की प्रथम क्रिया है
और चलते हुए
बहते जीवन को देखना दूसरी
 
यात्रा के इस पड़ाव पर
अभी मैं हिमाचली हूँ
 
ठहर-ठहर कर
चलने और देखने के बीच निहारता हूँ
निहारना स्मृति के टंकण की भाषा है
 
हिमालय को कौन जान सकता है!
आँख-आँख को देख सकती है भला
हिमालय का कोई एक प्रतिबिंब नहीं
 
जानना उसे, जैसे
अलंघ्य भूगोल को जानना है
इतिहास की भवें कुरेदनी है
 
पुरानी दुनिया मिली नहीं
नई दुनिया बनी नहीं
बीच की सांस्कृतिक शून्यता में
टहलने निकल पड़ा हूँ
 
2)
भाषा की अपनी ही जादूगरी है
राजनीति,सत्ता और समाज की
खोखली भित्तियों के पार
वह ज़्यादा व्यापक और पायेदार है
 
बुद्ध ,चीन ,तिब्बत और लाहुल- स्पीति
एक बदलती दुनिया में ठहरी हुई संस्कृति है
 
यात्राएं, संवेदनाओं को
भीतर से धीरे-धीरे पकाना है
इतिहास बनने में
अनुभव और बेचैनी का योग भी है
 
इंद्र ने पाषाण के पर काटे
कीलबद्ध कर दिया और कहा-इन्द्रकील
कलयुग ने उन कीलों को
ढीला करना शुरू कर दिया
 
अब पत्थरों के भी पंख आने लगे
वो उड़ने-ढलकने लगे
और एक दिन गोनपा में दरार बन गई
गोनपा* में दरार भरोसे में दरार है
 
दरार के ऊपर अतुल्य भारत हिंदी में लिखा है
लोग भोटी* में इसे समझ लेते हैं
 
3)
सब कुछ प्रशांत है
पर अन्तर अशांत
 
जहाँ-जहाँ से गुज़रे
दरारों के निशान दिखाई पड़े
पृथ्वी के तनाव को
हरी-हरी छोटी-छोटी घास
और उस पर खिले सुंदर फूलों ने ढंक दिया है
 
वनस्पति की शेष
भागवत कथा कहते प्रतीत होते हैं
 
ग्रंथावली को
कारिकाओं की तरह पढ़ रहा हूँ
उत्पाद और निरोध को एक साथ गढ़ रहा हूँ
उच्छेद और प्रतिरोपण को एक साथ समझ रहा हूँ
 
स्वतः,परतः और उभयतः
अहेतुक* ,सब एक दीख रहे हैं
 
 
उच्छेद और शाश्वत दोनों अंत हैं
दोनों के बीच निष्कृति में टहल रहा हूँ
अनुभूतियाँ रह-रह कर टुकड़ों में आती हैं
 
खुद को उलीच कर
बस ग्रहण करना चाहता हूँ
क्षण भर का निर्वाण चाहता हूँ
 
4)
अनछुआ है
ऊबड़-खाबड़ है
अभी मँजा हुआ नहीं है
 
जबकि मुझे पता है
दुर्गम रास्ते भी बार-बार
आने- जाने से मँज जाते हैं
 
जहाँ प्रकृति है
वहाँ जीवन है
फिर वहाँ कुलान्त कैसे हो सकता है
कुल्लू कुलान्त कैसे हो सकता है?
 
परशुराम का क्षेत्र है
सीमांतों में वे अक्सर मिलते हैं
 
सीमा का अपना रस,रहस्य और रोमांस है
या तो तीर्थ बन जाते हैं या युद्धस्थल
अन्यथा दोनों
 
5)
विपाशा* किनारे
अपने पाश गिन रहा हूँ
कि अचानक मेरी डायरी गिर गई
और मैं पाशमुक्त हुआ
 
अब सिर्फ देखना है
देखते हुए लिखना
न देखने के समान ही होता है
 
अनाम ,अकालमूरत, अजूनी
स्मृतियों के अवशेष
शिनाख्त सबकी मौजूद हैं
 
अनुभूतियों की स्मृति रेखाएं बनानी हैं
 
वह कोई पाश नहीं बनातीं
 
उल्टा मुक्त करती हैं रेशा दर रेशा
 
मरणस्मृति मुक्ति की पहली रस्सी है
तब एक ही सत्य याद रहता है – कि मरना तय है
 
यहाँ संकरी गली जिंदगी की ओर
और चौड़ा रास्ता मौत की ओर चलता है
 
यह भी देवभूमि ही है
 
 
6)
 
सामने विराट सच्चाई है
दिव्य ज्योति है
जहाँ आँखों की ज्योति नहीं ठहरती
बस झुक जाती है ,नमन है
 
तलुए से शीर्ष तक
चौरासी अंगुल शरीर में
रक्त अपनी गर्मी से उबल रहा है
 
बाहर लहर हिम की है
भीतर लहर रक्त की है
त्वचा इन दोनों के संतुलन में व्यस्त है
 
लहू रक्त वर्ण है
हिम नील वर्ण है
मिलकर नील-लोहित रंग बनता है
 
रोहतांग शव-स्थान था
कब्र की उठी हुई मिट्टी
अब मोक्ष और भोग दोनों का स्थल है
 
प्रेम की ऊँचाई में लंबा विस्तार है
चंद्र* और भागा* की उल्टी दिशा में भागते हैं
कि कोई न देखे, न जाने-समझे
फिर दोनों प्रेमी उत्कंठित होकर एक हो जाते हैं
 
देह-देह
मन-मन
प्राण-प्राण
तंतु-तंतु
मिलकर जीवन-नदी हो जाते हैं
दोनों नाम खो देते हैं
केवल रूप रह जाता है
 
जिसका आचमन तक वैध्य हो
और संगम हो जाए
चन्द्रभागा* बन जाये
तब डूबना भी स्वर्ग का द्वार
 
 
 
7)
लाहुल एक विशाल फ़्रिज है
जहाँ कुछ भी नष्ट नहीं होता
(स्मृतियों का अवशेष भी )
 
झुटपुटे में सोया झुरमुट है
हृदय की गांठ की तरह
कहीं-कहीं कोई गाँव है
 
वे दो नामों के साथ जीते हैं
एक से धर्म
दूसरे से संसार चलाते हैं
 
मिशनरियां आईं और बौद्धों से हार गईं
बस खिड़की पर शीशे
चिमनी और मोजे चढ़ा गई
 
रानी सुबक रही है
आंखों से हृदय को काढ़ कर
आँसू टपक रहे हैं
कि मैदान ने बेटों को मंत्रमुग्ध कर दिया है
 
चारों ओर बर्फ की सफेदी है
सारा रंग शाल,गोनचा,टोपी,जूते में सिमट आया है
रंगों की भरपाई हो रही है
 
मैदान की हवा पहुँच रही है
सुरक्षा की बर्फ पिघल रही है
 
खिड़कियाँ खुली रखो
हवा चारो ओर से आए और निकल जाए
सामंजस्य बना रहे
 
छम् -छेशु* देखने आया हूँ
नृत्य अब सिर्फ़ स्फुरण और दृश्य रह गया है
धर्म-दर्शन और अर्थ विलुप्त हो रहे हैं
फिर भी निरासक्त,निरवलम्ब देखता हूँ
 
संस्कृति अबोध सौंदर्य लिए है
और उसका ऐश्वर्य सुरक्षित है
 
 
8)
हिमगंध है अशरीरी गंध
कोई काया नहीं
आकाश और चित्त में निलाभगंध है
 
जैसे आग जलाती है
वैसे ही शीत भी जलाती है
शीत गति से टकराते महसूसता हूँ
भीतर एक सूरज कहीं से उग आता है
दोनों की टकराहट तेज हो जाती है
जीवन में पसीना यूँ भी जरूरी होता है
 
आनापान करता हूँ
साँसों की हरकत निहारता हूँ
चित्त देखता हूँ शांत है
काया में सूर्य तप रहा है
आँखे खोलता हूँ
सूर्य भागा के स्रोत पर टंगा है
 
लाल बिम्ब अब कपिशा हो चला है
स्वर्ण किरण चारों ओर बरस रही है
भागा के जल में गिरकर टूट रही है
आर्तता कम हो रही है
उषा में विचरता हूँ
नदी में उतरता हूँ
 
अंदर बाहर अब फिर से
संतुलन की वापसी हो रही है
 
9)
जहाँ जहाँ हिम है
बौद्ध और सनातन
दोनों के पदचिन्ह एक साथ दीखते हैं
 
धर्म ,सौंदर्य,शान्ति सब समरस है
चित्त में उल्लास है उद्वेग नहीं
सामरस्य देखता हूँ उमगता हूँ
मैं हिमालय देखता हूँ
 
उसकी भाषा की कुंजी खो गई है
ढूंढने निकला हूँ
 
इतिहास रहस्य ,भोटी में छुपे हैं
जिसे हिंदी और अंग्रेजी ने निगल लिया
निगले हुए को कैसे जिलाऊँ
 
नहीं जानता क्या मैं
प्रवचन से प्रिय मनोरंजन होता है
 
मेरा संवाद टूट रहा है
चाभी सपनों में दीख रही है बस
 
हर किसी को अपना क्रॉस खुद लेकर चलना है
उस क्रॉस में भी ताला है
मन के भीतर चाभी है
 
या सबकुछ विपरीत है
ताला मन में है
और चाभी क्रॉस में
 
संभवतः अन्तर और बहिरयात्रा
इन दोनों के बीच ही है
 
10)
श्रमण और ब्राह्मण में
कशमकश जारी है
 
समरसता और एकरसता
किसे चुने?
 
किसी को वहाँ स्तूप दीखता है
किसी को शिवलिंग
 
शिव और बुद्ध भी
नज़र का फेर है?
या फिर वही नजरों से दूर है
 
ऊपर त्रिलोकनाथ हैं
जहाँ दोनो पूजा करते हैं
नीचे बौद्ध मैदान में उतर
ब्राह्मण बन जा रहे हैं
 
दरअसल नीचे उतर
वो कहीं बीच में ठहर जाते हैं
 
मछली जल में बिसर जाए तो अच्छा है
धर्म की छटपटाहट कम हो जाएगी
 
या तो बौद्ध हो जायें
या फिर ब्राह्मण
शून्यता भर जाये
स्वांग्ला* करुणा मुक्त हो जाए
 
 
11)
बौद्ध जन्म से नहीं आचरण से होता है
आचरण व्रत है -शील होने का
पंचशील होने का
 
बोधि चित्त हिमालय की तरह आकर्षक है
उसे छूना चाहता हूँ
जितना आगे बढ़ता हूँ
अपना क्षितिज
वो उतना ही आगे बढ़ा लेता है
 
अब उछल कर छूना चाहता हूँ
तदाकार होना चाहता हूँ
 
कोई अकारण मेरा अपमान करता है
मुझे क्रोध आ जाता है
मैं धम्म से गिर पड़ता हूँ
 
बोधि चित्त मेरा आसमान बन
फिर से मुस्काता है
 
धूसर बादल बीच में आ जा रहे हैं
मुझे दिख रहा है
बहुत दूर आकाश-धरा से मिल रहे हैं
 
 
12)
निरखने का अपना सुख है
खुले अनंत क्षितिज को निरखता हूँ
 
पहाड़ से मैदान जैसे-जैसे उतरता हूँ
दृष्टि और क्षितिज दोनों ही
सिकुड़ते नज़र जाते हैं
 
आरम्भ से क्षोभ होता है
अनारम्भ से शांति
अवलम्बित करुणा राग है
नीरवलम्ब करुणा की तलाश में हूँ
 
खड़े रहने के लिए चलना है
सृष्टि चलती रहती है
हमें भी चलना है
और धर्म संस्कृति को भी
 
अकेला छिद्र
पूरे पात्र को खाली करने के लिए काफी है
यहाँ तो दो हैं
जातिवाद और सुरापान
 
दोनों बौद्ध चित्त में सेंध हैं
शील ढील पर है
 
13)
धर्म की प्रत्यंचा तनी रहे
प्रार्थना करता हूँ
तभी एक धमाका होता है
डायनामाइट का
फिर धूसर धूल
हिमालय को नहीं
आँखों को ढाँपते हैं
 
चित्त पर कषाय परत फिसलती है
कपिशा किरणें थर-थरा उठतीं हैं
 
सुरा का जाल पहाड़ों को बरजना है
सुरा तो अन्न का मल है
चित्त में मल की छाया
विकट स्थिति है यह
शील ही बचाये
और निर्मल करे
 
14)
प्रतीति है
बिछुड़ना थोड़ा-थोड़ा मरना है
मिल कर भी मिलने से बचता हूँ
 
स्पीति की ओर मुड़ता हूँ
लाहुल को मुड़कर ताकता हूँ
भागा पीछे छूट गई है
सामने ग्लेशियर है
रुद्र भी,रूपवान भी
 
हिमनदी है
स्लेटी मिट्टी और चट्टान
धूसर हिमखंड तैरते हैं
जैसे ठंडी कॉफी में आइसक्रीम
 
बर्फ की मोटी दीवार है
टकटकी लगाता हूँ सतह पर
अंदर हरा-नीला हिमानी प्रवाह दीखता है
 
सुनना चाहता हूँ उसकी व्यथा
मापना चाहता हूँ
चौड़ाई नहीं गहराई
सुन्न हृदय में बहने वाले रस की ,रहस्य की
 
15)
देर रात अचानक उठ गया हूँ
स्पीति शायद आवाज दे रही है
खुद को बरजता हूँ
 
आवाज फिर आती है
कहती है कमरे में
क्या बनारस,क्या स्पीति
 
रोक नहीं पाता
निकल पड़ता हूँ आधी रात
सब मन के पीछे
जैसे घोड़े के पीछे रथ
कवि-मन अभी बावरा हो गया है
 
अनंत,अप्रमाण और अपरिमेय आकाश को निरख रहा हूँ
किसी के सहारे नहीं लटका यह
विभु है अखंड
धन यौवन इतना खुला हो
तो लूट मच जाए
 
खैर मुझे लोशर के अलिप्त आकाश के नीचे आनंद आ रहा है
रात की आँखों में जोत है
तारों ने जोत चुराई या दी
पता नहीं चल रहा
अजीब दृश्य है
अंधेरों को बरज दिया है
उषा को हकाल दिया है
कृष्ण और अरुण का खेल होने वाला है
 
नज़र घूम कर फिर हिमालय पर आ टिकती है
कोई तृण नहीं
कोई बीज नहीं जमता
कोई लता नहीं लिपटती
पृथ्वी की कोख में तप कर
जैसे बस उठ आया है
 
नदियाँ अंतरिक्ष से हिम शिखर पर अवतरित हो रही हैं
असंख्य सोते फूट रहे हैं
उनमें से एक स्पीति से सतलज
सतलज से सिंधु
और फिर समुद्र में बह रही है
 
मेरे चित्त में भी जिज्ञासा की नदी फूट रही है
श्रद्धा और प्रज्ञा से मिल रही है
 
भीतर भी एक समंदर है
जिसका सीधा संपर्क अंतरिक्ष के प्रतिबिम्ब से है
 
आवाज आती है अचानक
बरजती है,हद हो गई
सब आज ही जान जाओगे
चलो भागो सो जाओ
मैं सीधे बिस्तर पर आ गिरता हूँ
हिमालय की तरह बाहों पर सिर रखकर सो जाता हूँ
 
 
16)
तृष्णा की आग जलाती है
और संकोच का बर्फ भी
 
संतुलन की अपनी दुनिया है
हिमालय संतुलित है
संतुलन में शीर्ष पर जमी हिम
त्रियम्बक की हँसी जैसी है
 
स्पीति मुझे खींच रही है
अनायास बात करता हूँ
क्या चाहिए पूछती है
कुछ नहीं बस ताकता हूँ
 
जो हिमशिखर चढ़ने से ज्यादा कठिन
जो आकाश की तरह अलिप्त,अलेप
जो वायु की तरह प्रवाह लिए
पृथ्वी की तरह सबका आधार बने
पूछती है वही निर्वाण चाहिए न?
 
पा सकते हो क्या इसे ?
नचिकेता की तरह बालक भी नहीं हो
चुपचाप बस निहारता हूँ
 
आशाएँ जागती हैं लेकिन
पराक्रम अँखुआता है
कहीं से आवाज जरूर आती है
रास्ता जानते हो
बस चलना नहीं
जितना बाहर देखते हो
उतना ही भीतर देखो
 
दृष्टि सूक्ष्मबीन में बदल जाएगी
जो नहीं दिख रहा वो दिख जाएगा
 
नदी को क्या पता
समस्यों की जड़ का नाम दुविधा है
आरम्भ-अनारम्भ ,राग-विराग,भोग-मोक्ष….
 
दुविधा कषाय है
दुविधाओं की माला पहने
इन सबों के बीच
स्वयं को देखने की दृष्टि
सूक्ष्मबीन नहीं
क्षीण हो रही है
 
आविष्ट* हूँ कुछ नहीं सूझता
जबकि मुझे तदाकारता साधनी है ….
 
17)
खिड़की के सामने पहाड़ है
जिसके पीछे स्पीति की खोई हुई दुनिया- तिब्बत
 
इतिहास पर
अलंघ्य भूगोल का असर है
 
स्पीति की स्वायत्तता
भूगोल ने सिरजी है
यही इसकी रक्षा भी करता है
और संहार भी
हंसता –खेलता जीवन कभी महामौन भी धारण कर लेता
 
हिमालय के मध्य खड़ा हूँ
बौद्ध शिष्टता के शीर्ष संग मिलते हैं
पर दर्शन और साधना
दोनों पद्धतियों में थकान दीख रही है
 
धार्मिक वृत्ति वाले
थके और निरर्थक लग रहे हैं
ऊब रहे हैं
 
इस ऊब को भी
सिरजनहार का इंतजार है
 
कृष्णा के मुख में ब्रह्मांड दिखा था
और आज
खुद में इतिहास ,सरकार,सिस्टम,भाषा
नदी,हिम,और वो सारे अनाम असंख्य फूल
सबकी सांसे मद्धम महसूसता हूँ
 
सभी जुले-जुले लौटा रहे हैं
पर मैं कुछ भी लौटा नहीं पा रहा ………
 
तभी एक
चिड़िया का बच्चा घोंसले के द्वार पर आकर
कौतुक भरे जगत को देखता है
पंख खुलते हैं आकाश की नीलिमा में खो जाना चाहता है
धरती वारी जाती है
कोई ऋषि गा उठता है
“अदीना: स्याम शरद् शतम”
 
(श्लोक – हम सौ वर्षों तक दीनतारहित जिएं)
(गोनपा-बौद्ध मंदिर
भोटी-हिमालय की भाषा है)
(लाहुल-हिमाचल का जिला रोहतांग घाटी से जुड़ा )
(छम् -छेशु सांस्कृतिक नृत्य नाट्य साल में दो बार होता है)
(अहेतुक – अकारण)
(विपाशा -चेनाब नदी का ऐतिहासिक नाम)
(चन्द्र और भागा दोनो नदियां हैं जिनका संगम चन्द्रभागा,
जिसका अपभ्रंश चेनाब है)
(लोशर स्पीति का गाँव )
(स्वांग्ला जाति जो बौद्ध हैं मैदान की ओर उतर आए हैं और अपने आपको ब्राह्मण समझते हैं)
(आविष्ट–आवेशयुक्त।)
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5 comments

  1. Shahanshah Alam

    कविता का विराट दिखाती है भाई की ये कविताएँ।

  2. अद्भुत काव्यात्मक शैली में मूल रचना के साथ यात्रा करना अनोखा अनुभव है
    बधाई एवं शुभकामनाएं ।

  3. उमा झुनझुनवाला

    अद्भुत रचा है आपने यतीश…
    आप पाठक नहीं हैं, अध्येता हैं…
    गहन विचारों का मंथन है आपकी रचनात्मक समीक्षा में…
    आज आपको प्रणाम कहती हूँ 🙏🌿

  4. Amitabh Ranjan Kanu

    It’s really great to read your poems which walk with the original text where from they shoot forth.

  5. Jayshree Purwar

    पुस्तक के पठन के साथ विचारों की काव्यात्मक यात्रा – अद्भुत और गहन । शैली भी रोचक ।

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