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स्त्रीवाद और आलोचना का संबंध

स्त्री विमर्श पर युवा लेखिका सुजाता की एक ज़रूरी किताब आई है ‘आलोचना का स्त्री पक्ष’। इस किताब की समीक्षा लिखी है दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के विद्यार्थी महेश कुमार ने। पुस्तक का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन ने किया है-

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‘आलोचना का स्त्री पक्ष’ सुजाता जी द्वारा लिखित हिंदी आलोचना के क्षेत्र में एक अत्यावश्यक हस्तक्षेप है।यह कृति 2021 में पिछले ही महीने राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।किताब पढ़ने के बाद पहली प्रतिक्रिया मन में यही आया कि हिंदी आलोचना में स्त्री विमर्श पर आलोचनात्मक पुस्तक की जो कमी थी वह पूरी हुई।यदि अब भी ‘अस्मितामूलक साहित्य’ के स्त्रीवादी अध्ययन में यह किताब संदर्भ ग्रंथ और सहायक ग्रंथ में शामिल नहीं होगा तो एक तरह से हिंदी  स्त्रीवादी आलोचनात्मक अध्ययन के साथ धोखा होगा,अपराध होगा।

                       यह तीन खंडों में क्रमशः आठ,सात और पाँच अध्यायों में विभाजित है।तीनों खंडों का नाम क्रमशः पद्धति, परंपरा और पाठ है।बिना पद्धति के परंपरा का विकास नहीं हो सकता है और परंपरा न हो तो पाठ किसका होगा?इसलिए लेखिका ने एक क्रमिक विकास के तहत हिंदी आलोचना और साहित्येतिहास का स्त्री पाठ प्रस्तुत कर रही हैं।’पद्धति’ को केवल वैचारिकी समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।’पद्धति’ में दृष्टिकोण, प्रविधि और मूल्यांकन तीनों शामिल होते हैं।

पहला खण्ड (पद्धति)इसी की समझ विकसित करने का प्रयास है।इसमें स्त्रीवाद की अवधारणा,आलोचना और इतिहास,चुनौतियाँ ,उद्देश्य सब शामिल करके हिंदी आलोचना में ‘स्त्रीवाद’ की सैद्धांतिकी प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है।लेखिका को ‘पद्धति’ की स्थापना की जरूरत इसलिए पड़ी ताकि इस प्रवृत्ति को चुनौती दी जा सके कि फलाना कविता ‘स्त्रीवाद या स्त्री विमर्श से बच पाई है’।लेखिका का मानना है कि हिंदी आलोचकों, इतिहासकारों ने प्रायः यह दिखाने की कोशिश किया है कि अमुक रचना स्त्री द्वारा लिखे जाने के बावजूद ‘स्त्रीवादी’ नहीं है।मतलब जो स्त्रीवादी है मानो संकीर्ण है!इसके लिए आलोचकों ने ‘क्लीशे’ का शोर मचाया।निर्मला जैन जैसी लेखिका भी खुद को स्त्रीवादी लेखन से अलग होकर पुरुष बौद्धिकता के खेमे में रहना पसंद की।स्त्रियों पर अबौद्धिक का टैग लगा रहा।इन्हीं वजहों से लेखिका ने ‘पद्धति’ पर लिखने की प्रेरणा पायी।

     लेखिका आलोचना लेखन की प्रक्रिया में सुधार की बात करती हैं।दृष्टांतों के माध्यम से यह बताने की कोशिश करती हैं कि स्त्रीवादी लेखन में केवल स्त्रियों के निजी दुख-सुख ही स्त्री विषय नहीं है।श्रम का शोषण,सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के बदलते परिवेश के साथ बदलती हुई चुनौतियाँ, मनोवैज्ञानिक समस्याएँ, यौनिकता आदि से जुड़े तमाम प्रश्न स्त्री विमर्श और स्त्री लेखन के दायरे में आते हैं।इसके लिए आलोचकों को अपना कैनवास बड़ा करना होगा।स्त्री आंदोलन के विभिन्न चरणों की तथ्यात्मक जानकारी के साथ इससे निकले सैद्धांतिकी का भी अध्ययन करना होगा।उदाहरण के लिए सिमोन की किताब ‘सेकंड सेक्स’ उपर्युक्त सभी विषयों की जानकारी की माँग आलोचक से करती है।इसके बिना न सिमोन के विचार को समझा जा सकता है और न ही स्त्रीवादी चिंतन को।इसलिए लेखिका उद्धरण के माध्यम से यह प्रस्ताव रखती हैं कि स्त्रियों के लिखने का अर्थ है खुद लिखने के साथ-साथ अन्य स्त्रियों को भी साथ लाना।मतलब ‘स्त्रियों का पाठक वर्ग’ तैयार करना।

                           ‘स्त्रियों का पाठक वर्ग’ इसलिए भी जरूरी है ताकि जब लेखन, बहस,पुरस्कार की बात हो तो ‘किसलिए मिला है’, ‘सब पता है’, ‘उसने अपनी सुंदरता का प्रयोग किया है’ जैसे मर्दवादी कुंठा का मुँहतोड़ जवाब दिया जा सके।जनता के बीच यह संप्रेषित किया जा सके कि ‘देह पर सबसे ज्यादा हमले स्त्रियों ने सहे हैं तो उससे मुक्ति का रास्ता उन्हें पता है’।स्त्रियों की सामूहिकता पाठकत्व स्त्रीवादी बौद्धिक औजार का निर्माण करेंगी/कर रही हैं जिसका पहला लक्ष्य है ‘स्त्री लेखन’ को स्वीकार करने की साहस।खुद को स्त्रीवादी कहने का साहस।इसका अगला चरण होगा ‘ स्त्री लेखन और स्त्रीवादी लेखन की सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणा की स्थापना’।इसके लिए  स्त्री पाठक वर्ग का होना जरूरी है।दलित साहित्य,आदिवासी साहित्य को नकार झेलना पड़ा।लेकिन उनके पाठक वर्ग ने उन्हें संबल दिया।इसलिए लेखिका की नजर ‘स्त्री पाठक वर्ग’ पर जाता है।यह बेहद जरूरी और सजग विचार है।

                                     ‘स्त्रीवाद और आलोचना का संबंध’ के प्रसंग में लेखिका का सुझाव है कि ‘कवियों से पहले इतिहासकारों को पढ़िए’।इस सुझाव को और विस्तार देकर कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र, दर्शन, कामशास्त्र, काव्यशास्त्र, राजनीतिक नीतियों और अर्थशास्त्र को भी पढ़िए।इसलिए पढ़िए ताकि यह पता चले कि इन अनुशासनों में स्त्रियाँ कितनी शामिल रही हैं और उसका स्वरूप,चित्रण किस रूप में हुआ है।इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए ताकि स्त्रीवाद के संबंध में जो दुष्प्रचार किया गया है उसका खंडन किया जा सके।यह बताया जा सके कि फेमिनिस्ट होना पुरुष विरोधी होना नहीं है,पितृसत्ता विरोधी होना है।स्त्रीवाद प्रेम की आलोचना नहीं करता,वह ‘रोमांटिक प्रेम’ की आलोचना करता है।स्त्रीवादी लेखिकाएँ ‘मातृत्व’ का विरोध नहीं करतीं ,’मातृत्व के महिमामंडन और उसके बहाने          पितृसत्तात्मक मूल्यों के प्रशिक्षण’ का विरोध करती हैं।

                                     ‘पितृसत्ता लिंगों की गैरबराबरी की यौनिक राजनीति है’ तो स्त्रीवाद उसकी आलोचना है,उससे मुक्ति का रास्ता है।यौनिकता पर जब स्त्रियाँ लिखती हैं तो उनपर अश्लीलता का हमला किया जाता है।वही जब यौनिकता पर पुरुष लिखते हैं तो वह रचनात्मकता मान ली जाती है।ये सब होता है ‘उत्थित लिंग’ (phallocentric) वाली मानसिकता के कारण।इसी प्रतिबंध की आलोचना है स्त्रीवाद।यह बात खूब प्रचारित है कि ‘ताकत की कामुकता पौरुष है और समर्पण की कामुकता स्त्रैण है।’ यही कारण है कि हर छोटे शहरों में गुप्त रोग,मर्दाना कमजोरी को दूर करने वाले वैद्य और हाकिम का विज्ञापन दीवारों पर दिख जाता है।लेकिन अफसोस की बात है कि छोटे शहर तो छोड़िए प्रायः बड़े शहरों में अच्छे स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं मिल पाते।माहवारी की समस्या,हार्मोनल असंतुलन आदि की विशेषज्ञ नहीं मिलते।बहुत हुआ तो डिलीवरी से संबंधित डॉक्टर होंगे।छोटे शहरों की लड़कियों में एक डर है जो इस तरह की समस्याओं पर बात करने से उन्हें रोकती हैं जिसका परिणाम अवसाद और आत्महत्या के ख्याल तक जाता है।किसी के चेहरे,हाथ,पैर पर ज्यादा बाल हों तो वह स्त्री इतने ताने सुनती है कि उसे अपने होने पर शर्मिंदगी होने लगता है।यह मामला यौनिकता पर प्रतिबंध का ही तो है।

सेक्सुअल प्लेजर केवल पुरुषों का मुद्दा है ,स्त्रियों के लिए इसपर बात करना भी पाप का भागीदार होने जैसा है।स्त्रीवाद इसी की आलोचना प्रस्तुत करता है,इसपर खुलकर बात करता है।आनंदातिरेक की प्राप्ति के लिए स्त्रियों को भी अड़ना चाहिए यह साहस स्त्रीवाद ने ही विकसित किया है। कहने का अर्थ है कि जिस तरह पूँजीवाद को समझने के लिए मार्क्सवाद का अध्ययन जरूरी है उसी तरह पितृसत्ता के दाँव-पेंच की बारीक समझ के लिए स्त्रीवाद अनिर्वाय अध्ययन प्रणाली है।

                          इस प्रणाली के अध्ययन की अपनी चुनौतियाँ भी हैं।स्त्री अगर घर के काम में व्यस्त रहे तो अच्छा।वही अध्ययन में व्यस्त रहे तो घर तोड़नेवाली कही जाती है,अति महत्वाकांक्षी हो जाती है।इन्हीं कारणों से रचनात्मक स्त्रियों के लिए उनकी रचनात्मकता स्नायविक तनाव देती है।इसका परिणाम कई बार आत्महत्या होता(वर्जिनिया वुल्फ) तो कई बार गुमनामी(राश्सुन्दरी देवी)।इतना होने के बावजूद भी स्त्रियों ने लिखे और जमकर लिखे।इस लेखन के इतिहास की खोज एक अनिर्वाय दायित्व समझा है लेखिका ने।इसका एक कारण तो यही है कि स्वयं लेखिका को भी वही चुनौतियाँ झेलनी पड़ी हैं जो उनकी पुरखिनों(कायदे से हम सब की पुरखिनों)ने झेली हैं।इसकी झलक किताब के समपर्ण वाले हिस्से को पढ़कर ही मिल जाती है।दूसरा कारण यह है कि प्रायः स्त्रीवाद को पश्चिम से आयातित विचारधारा कहने का चलन है।बिल्कुल स्त्रीवाद पश्चिम का एक शानदार और संघर्षों से भरी विचारधारा रही है।अगर भारतीय स्त्रियों ने वहाँ से प्रेरणा ग्रहण किया तो क्या बुरा किया!लेखिका ने बड़ी सहजता परन्तु तथ्यात्मक तरीके से स्त्रीवाद का भारतीय परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करती हुई ताराबाई शिंदे,रमाबाई,महादेवी वर्मा,शिवरानी देवी से होते हुए आधुनिक स्त्री रचनाकारों तक आती हैं और स्त्रीवाद की लोकल से ग्लोबल यात्रा के बारे में पाठक को रूबरू करवाती हैं।

                इस आलोचनात्मक कृति की सफलता है स्त्री भाषा का समाजशास्त्रीय प्रस्तुति।लेखिका भाषा को अबूझ और गूढ़ बनाने की तुलना में स्त्री अनुभवों की ओर वापस लौटना अनिवार्य मानते हैं।भाषा और जगत-जीवन में द्वंद्वात्मक संबंध के जरिए जब स्त्रियाँ अपने अनुभव को सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक और सभी तरह के यथार्थ को लिखेंगी तो अबतक चली आ रही शिश्नकेन्द्रित भाषा को चुनौती मिलेगी।भाषा एक लिंगी है जो शिश्न केंद्रित है।बाकी भाषाएँ संदर्भ बिंदु की तरह हैं जिसका उपयोग व्याख्या के लिए और मर्दवादी नजरिए को पुष्ट करने के लिए होता रहा है।इसलिए ईश्वर भी परम पुरूष है जिसके लिए कवियों को लघु(स्त्री,प्रेमिका)होना पड़ता है।जिस समाज में स्त्रियाँ नरक की खान हों, नाक न होने पर मल भी खा जाने वाली हों, गाय का मरना दुर्भाग्य हो और पत्नी का मरना सौभाग्य हो वहाँ सशक्त स्त्री भाषा के जरिए ही उपर्युक्त चुनौती का सामना किया जा सकता है।साहित्य में स्त्री भाषा के प्रयोग का जोखिम तो लेना ही होगा।इस्मत चुगताई ने उर्दू में इसका प्रयोग किया जेल गईं।मृदुला गर्ग,मैत्रयी पुष्पा,कमला दास, सरोजिनी साहू का उदाहरण तो लेखिका ने दिया ही है।स्त्रियों का लिखना भाषा से परे जाकर उसके व्यक्तिगत जीवन की खोजबीन पर खत्म होती है।महुआ माजी ने जब ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ उपन्यास लिखा तो साहित्यिक ईर्ष्या के कारण कहा गया कि उसने अपनी सुंदरता का इस्तेमाल किया है।रचना से ज्यादा उनके पहनावे और रूप-रंग पर बात हुई।अभी अनामिका जी को साहित्य अकादमी मिलने पर भद्दी-भद्दी टिप्पणियाँ और कविताएँ पढ़ने को मिली ही।यह सब होगा ही जब स्त्री भाषा अपना रूप ग्रहण करेगी।लेखिकाएँ खूब अच्छे से डटकर इन हमलों को स्वीकार करते हुए अपनी उपस्थिति लगातर दर्ज कर रही हैं और एड-फेमिनाम को धत्ता बताते हुए नई भाषा बना रही हैं।

               नामवर सिंह के बारे में जो टिप्पणी है उसको पढ़कर यह लग सकता है कि वे कैसे यह बात भूल गए कि खण्ड-खण्ड मिलकर ही अखण्ड या पूर्णता का निर्माण करता है।नामवर सिंह अपने ही एक भाषण में कहते हैं कि आलोचना को नई भाषा की जरूरत है जो रचनाकारों द्वारा ही आएगी।स्त्री लेखन वह भाषा दे तो रही है।फिर आरक्षण का मुद्दा क्यों लाया गया?क्या पुरुष रचनाकारों से नई भाषा, नए प्रतिमान की उम्मीद कर रहे थे नामवर सिंह जी।रही बात आरक्षण की तो यह बहस ही बेकार है।नौकरियों में बढ़ती जनसंख्या के अनुसार सीट बढ़ाइए आरक्षण की लड़ाई नहीं होगी।टिकट की खिड़की का संख्या मत बढ़ाइए और कहिये कि अब भीड़ बहुत रहती है।उसी तरह हिंदी संसार अपना पाठक वर्ग बड़ा नहीं कर रहा और कह रहे हैं कि स्त्रियाँ साहित्य में आरक्षण माँग रही हैं।साहित्य का दायरा बड़ा कीजिये ये अब कुतर्क नहीं चलेगा।लेखिका ने साफ तौर पर लिखा है कि स्त्रीवादी लेखन समावेश चाहता है,पार्थक्य नहीं।वह किसी में हिस्सा नहीं माँग रहा बल्कि अपनी जगह बना रहा है।स्त्रीवादी रचनाकारों से यह पूछिये की वो लेखन से क्या करना चाहती हैं।लेखिका ने इसका जवाब संदर्भों के माध्यम से कई जगहों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दिया ही है।

                जब वो लिखती हैं कि ‘भक्ति आंदोलन के कवियों में स्त्री छवि भक्ति करने का एक टेक्निक है न कि कोई स्त्रीवादी चिंतन’।यही वह विश्लेषण है जहाँ से लेखिका शोध के नए आयाम पाठक के सामने रखती हैं।उनके इस विश्लेषण से ‘सूफी और भक्ति कविताओं में स्त्रियों की निर्मिति और उसकी भाषा’ पर एक पूरा शोध हो सकता है।लेखिका अपने लेखन से यही चाहती भी हैं।यही कारण है कि वो ‘साधारणीकरण’ जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांत का स्त्री पाठ करती हैं तो ‘बोध’ को आधार बनाकर आलम्बन पर विचार करती हैं।यह बहस के लिए एक जरुरी दृष्टि है।स्त्री जब सवाल करती है तो उसे बहकाया हुआ,भड़काया हुआ कहने का जो चलन है वह बन्द हो यह चाहता है स्त्रीवादी लेखन।सुनीता जैन जैसी तमाम लेखिकाओं को किसी संपादक की घटिया बात न सुननी पड़े यह उद्देश्य है स्त्रीवाद का।

                                   अपने लेखन के उद्देश्य को मजबूत आधार देने के लिए जरूरी है इतिहास और परंपरा का ज्ञान होना।लेखिका ने ‘परंपरा’ खंड में इसी का अध्ययन प्रस्तुत किया है।चूँकि,’अपने-अपने परिवेश के स्त्री अनुभव  स्त्री लेखन बनाती है।’ इसलिए जरूरी है कि परिवेश के परम्परा का विश्लेषण किया जाए।इतिहास में होने के लिए इतिहास से लड़ते हुए ‘वैकल्पिक इतिहास’ की बात हो।लेखिका ने इसका केंद्रबिंदु मध्यकाल और आधुनिक काल को बनाया है।इसमें थेरियाँ, मीरा,ललद्यद, मुद्दुपलानी,मोल,शेख,खगनिया,राधिका सात्वनम,महादेवी वर्मा और सुभद्राकुमारी चौहान शामिल हैं।इनके माध्यम से लेखिका ने जो सबसे जरूरी बात कही हैं वह है ‘स्त्रीवादी साहित्येतिहास बिना लोकगीतों के संभव नहीं है।’ सबाल्टर्न इतिहास लेखन ने वाचिक अभिव्यक्ति को ऐतिहासिक स्रोत मानने पर बार-बार जोर दिया है।क्योंकि यही वह तरीका है जहाँ से उत्पीड़तों के स्वर का दस्तावेजीकरण हो सकता है। ‘लोकगीतों में बसी स्त्री कविताएँ स्त्री जीवन की जड़ें हैं।’  पितृसत्ता ने स्त्रियों के देह पर नियंत्रण किया,उनकी सोच पर नियंत्रण किया ऐसे में लेखनी कहाँ तक संभव था।भावातिरेक की अभिव्यक्ति फिर लोकगीतों में हुई। जो लेखनी प्रतिबंधित थी वह गीत बनकर पीढ़ी दर पीढ़ी चली जो कभी मोल्ल रामायण में घेरलू प्रसंग के जरिए आयी तो कभी खगनिया की पहेली के रूप में।

                                      आधुनिक काल में जब स्त्रियों को मौका मिला तो उनकी प्रतिभा पर हमेशा शक किया गया।फिर भी सुभद्राकुमारी और महादेवी जैसी लेखिकाएँ आ ही गईं।न केवल आईं बल्कि अपनी दो धारा बनायीं।यही दो धारा स्त्री साहित्येतिहास की आधारभूमि भी हो सकती है ऐसा लेखिका का प्रस्ताव है।लेकिन यह भी ध्यान देना होगा कि जब भी इस तरह का प्रयास होगा तो कोई न कोई तिलक आएंगे जो ज्योतिबा फूले और रमाबाई जैसे लोगों को किसी न किसी का एजेंट घोषित करेंगे। विश्लेषण के दौरान तिलक द्वारा रमाबाई,सावित्री बाई को जिस तरह प्रस्तुत किया गया वह स्वतंत्रता आंदोलन के वैचारिक अंतर्विरोधों को नए सिरे से समझने में मदद कर सकता है। ‘रस्साकशी’ में भारतेंदु को लेकर यही प्रयास वीरभारती तलवार ने किया है।इस तरह के अंतर्विरोधों को समझने में लेखिका द्वारा प्रस्तुत ये प्रसंग साहित्येतिहास को नई दिशा दिखा रही है।इससे निपटने के लिए जरूरत होगी रचनात्मक भाषा और पाठ की।

                          तीसरा खण्ड इसी ‘पाठ’ पर केंद्रित है।इसमें बाहरी और आंतरिक दोनों तरह के संघर्ष का विश्लेषण है।आंतरिक संघर्ष है लेखन का पाठ कैसे हो,पाठक कैसे स्त्रीवादी लेखन की समझ विकसित करें ताकि कुपाठ करने से बचें।इसके लिए प्रचलित मुहावरों,घरेलू विम्बों का नया पाठ, नया अर्थ समझने की समझ विकसित करना जरूरी है जो अनामिका की कविताओं में खूब है।उनका लिखना जगह बनाना है,इतिहास से बाहर हो गयी स्त्रियों को जगह देना है।लेखिका इसे फ्रेंच और अमेरिकी स्त्रीवादी आलोचना के मतों के संदर्भों के समानांतर प्रस्तुत करती हैं।इसी तरह नीलेश रघुवंशी की कविताएँ कोख के अनुभव संसार के बहाने मातृत्व के महिमामंडन का खण्डन करके पुरुषवादी चेतना को झटका देती हैं।सुमन केसरी के बहाने लेखिका ने जरूरी बात कही है कि ‘माँ को चाहते हुए भी बेटियाँ माँ का जीवन जीना नहीं चाहतीं।’ क्यों नहीं जीना चाहतीं?इसलिए क्योंकि पितृसत्ता की शिकार ये महिलाएँ ही अपनी बेटियों को पितृसत्तात्मक ढाँचे में प्रशिक्षित करती हैं जिनका उन्हें खुद एहसास नहीं होता।वो ये काम नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी के भाव और आदर्श के साथ करती हैं। इसलिए आदिवासी स्त्री कविताओं के संदर्भ में लेखिका सेक्सुअल टेक्स्टुअल पॉलिटिक्स की बात करती हैं।

इसलिए पितृसत्ता से चुनौती के लिए स्त्रीवादी लेखन का मूल्यांकन या पाठ पर्सनल इज पॉलिटिक्स के तहत करना जरूरी है।

आदिवासी स्त्री कविताओं को देखने के लिए अलग नजरिया विकसित करना होगा जो आदिवासी लेखिकाओं की तरफ से आए तो ज्यादा अच्छा होगा।वंदना टेटे ने उचित कहा है कि जो पितृसत्तात्मक स्थिति अभी आदिवासी समाज में आ रही है वह मुख्यधारा की देन है।लेकिन ऐसा कहकर टालने से भी काम नहीं चलेगा क्योंकि बाहरी हस्तक्षेप ही सही उनका समाज प्रभावित तो हो रहा है।इससे निपटने के लिए उनकीक्या रणनीति होगी इसका खाका तो तैयार करना होगा वह विचार चाहे उनके वाचिकता की परम्परा से आए या नए आयातित विचार से आए।मुख्य बात यह है कि जल्द ही उनको अपना पक्ष रखना होगा।

                                   निष्कर्ष में अंतिम बात कहनी हो तो यह कहा जा सकता है कि जिस तरह हिंदी आलोचना समीक्षात्मक लेखन में सिमटती जा रही है,वैसे समय में इतना समृद्ध,रेफ्रेंस से लैस आलोचना ग्रंथ का आना उत्साहित करने वाला है।इसमें विषय की ताजगी भी है और वैचारिक गम्भीरता भी है।लेखिका ने सुमन राजे की बात को नए तरीके से बिल्कुल उचित कहा है कि ‘आधा इतिहास वह है जो अबतक पढ़ रहे थे,जिसमें स्त्रियाँ गायब थीं।’यह किताब इसी आधे इतिहास में स्त्रियों के योगदान को रेखांकित करने के साथ-साथ उनके वैचारिक हस्तक्षेप को स्थापित करने का सार्थक प्रयास है।

                         महेश कुमार

   दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया,बिहार

ईमेल:-manishpratima2599@gmail.com

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