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Tag Archives: प्रभात रंजन

जानकी पुल के पाठकों के लिए प्रेम भारद्वाज का सम्पादकीय

इस होली पर हम आभारी हैं यशस्वी संपादक प्रेम भारद्वाज जी के कि उन्होंने आज जानकी पुल के पाठकों के लिए सम्पादकीय लिखा है. हालाँकि होली का सुरूर ऐसा चढ़ा है कि ठीक ठीक कह नहीं सकता कि यह सम्पादकीय उन्होंने ही लिखा है. बहरहाल, उनको भी होली मुबारक, उनकी …

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बुरा न मानो होली है

चनका के रंग में होली की भंग आज कल हिंदी में युवा काल चल रहा है. जाने किसकी पंक्ति याद आ रही है- उस दौर में होना तो बड़ी बात थी लेकिन युवा होना तो स्वर्गिक था. मेरे एक अग्रज मित्र मुझे ‘वरिष्ठ युवा’ कहते हैं. अब वरिष्ठ युवा होने …

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‘आजादी’ के दौर में ‘आजादी मेरा ब्रांड’

‘आजादी मेरा ब्रांड’– कायदे से मुझे इस किताब पर जनवरी में ही लिखना चाहिए था. जनवरी में विश्व पुस्तक मेले में जब इस किताब का विमोचन हुआ था तब मैं उस कार्यक्रम में गया था. संपादक सत्यानंद निरुपम जी ने आदरपूर्वक बुलाया था. कार्यक्रम में इस किताब पर रवीश कुमार …

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‘पापा, डायवोर्स क्या होता है?’

यह मेरी नई लिखी जा रही किताब का एक अंश है. पढ़कर राय दीजियेगा- प्रभात रंजन  ============================================================ डायवोर्स ‘पापा, डायवोर्स क्या होता है?’ किसने बताया? मम्मा ने?’ ‘हाँ, लेकिन क्या होता है?’ ‘जब दो लोग साथ नहीं रहते हैं!’ ‘डायवोर्स क्या इंसानों में ही होता है?’ ‘हूँ…’ ‘जैसे रात आने …

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‘हिंदी महोत्सव’ ने कई मिथ तोड़े हैं

पिछले रविवार की बात है. आज सुबह सुबह याद आ रही है. ‘वाणी फाउंडेशन’ और ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर ने पिछले रविवार 6 मार्च को ‘हिंदी महोत्सव’ का आयोजन किया था, जो कई मायनों में ऐतिहासिक रहा. अब तक हिंदी के लिए इस तरह के विशिष्ट आयोजन दिल्ली में अकादमियों, कॉलेजों, …

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प्रेम बिना हिंदी सूना

कल प्रभात खबर में मेरी एक छोटी-सी टिप्पणी आई थी. पढ़कर बताइयेगा- प्रभात रंजन  ======================================================= आज ही एक अखबार के लिए साल भर की किताबों का लेखा-जोखा लिख रहे मित्र ने फोन पर पूछा कि इस साल कोई बढ़िया प्रेम-उपन्यास आया है? ‘हाँ, ओरहान पामुक का उपन्यास ‘ए स्ट्रेंजनेस इन …

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अनुवादक का कोई चेहरा नहीं

हिंदी में अनुवाद और अनुवादक की स्थिति पर यह एक छोटा-सा लेख आज ‘प्रभात खबर’ में आया है- प्रभात रंजन  ========= अनुवाद तो बिकता है अनुवादक का कोई चेहरा नहीं होता- एक पुराने अनुवादक के इस दर्द को समझना आसान नहीं है. यह सच्चाई है कि हिंदी में चाहे साहित्य …

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स्त्री-लेखन में नयापन नहीं है?

आज ‘प्रभात खबर’ में मेरा एक छोटा-सा लेख आया है. उसका थोड़ा सा बदला हुआ रूप- प्रभात रंजन  ================================================================= अभी हाल में एक वरिष्ठ आलोचक महोदय से बात हो रही थी तो कहने लगे कि स्त्री लेखन में कोई नयापन नहीं दिखाई दे रहा है. इस समय हिंदी में युवा …

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‘पाप के दस्तावेज’ बनाम ‘पुण्य का साहित्य’

‘कादम्बिनी’ पत्रिका के दिसंबर अंक में गंभीर साहित्य बनाम लोकप्रिय साहित्य पर मेरा लेख प्रकाशित हुआ है. आपके लिए- प्रभात रंजन  ============================= हिंदी में सौभाग्य या दुर्भाग्य से गंभीरता को ही मूल्य मान लिया गया है. जबकि आरम्भ में यह मुद्रा थी. हिंदी गद्य के विकास में दोनों की समान …

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या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता!

विजयादशमी के बहाने एक लेख लिखा है- प्रभात रंजन  ===================================== ब्रिटिश लेखिका एलिस एल्बिनिया ने कुछ साल पहले महाभारत की कथा को आधुनिक सन्दर्भ देते हुए एक उपन्यास लिखा था ‘द लीलाज बुक’, इसमें समकालीन जीवन सन्दर्भों में संस्कृति-परम्परा की छवियों को देखने की एक मजेदार कोशिश की गई है. …

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