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Tag Archives: प्रभात रंजन

आज उसी जॉर्ज पंचम का जन्मदिन है जिनको ‘भाग्यविधाता’ कहा गया था!

आज जॉर्ज पंचम की जयंती है. 1911 में वे भारत के सम्राट बने थे और उनके स्वागत में देश भर ने जैसे पलक पांवड़े बिछा दिए थे. कहा जाता है कि ‘जन गण मन’ की रचना रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उनके ही स्वागत में की थी. यह जरूर विवाद का विषय …

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अपूर्णता के सबसे पूर्ण लेखक के बारे में कुछ अधूरी पंक्तियाँ

लेखक ब्रजेश्वर मदान की मृत्यु की खबर आने के बाद ‘कथादेश’ पत्रिका के जून अंक में उनके ऊपर कई सामग्री दी गई, उनको याद किया गया है. इसी अंक में मैंने भी ब्रजेश्वर मदान साहब को याद करते हुए कुछ लिखा है- प्रभात रंजन  =================================================== मेरी जानकारी में ब्रजेश्वर मदान …

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हिंदी में राजनीतिक उपन्यास क्यों नहीं लिखे जाते?

यह एक अजीब विरोधाभास है. हिंदी पट्टी भारत में राजनीतिक रूप से सबसे जाग्रत मानी जाती है. माना जाता है कि देश में राजनीतिक बदलावों की भूमिका इन्हीं क्षेत्रों में लिखी जाती रही है. लेकिन सबसे कम राजनीतिक उपन्यास हिंदी में लिखे गए हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश में इतने तरह …

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राजीव गांधी ने देश के लिए जो भी किया उनको उसका जस नहीं मिला

राजीव गांधी को गए 27 साल हो गए. 80 के दशक में जब हम बड़े हो रहे थे तो हम देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री से बेपनाह मोहब्बत और नफरत दोनों करते थे. 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री की नृशंस हत्या के बाद टीवी पर हम ने अगले 12 दिनों …

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अब पुस्तक समीक्षा लिखते हुए डर लगने लगा है

मैंने अपने लेखन की शुरुआत पुस्तक समीक्षा से की थी. विद्यार्थी जीवन में लिखने से पत्र-पत्रिकाओं से कुछ मानदेय मिल जाता था. ‘जनसत्ता’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक, साहित्य संपादक बहुत उदारता से किताबें दिया करते थे. एक तो पढने के लिए किताबें मिल जाती थीं, दूसरे, कम शब्दों में …

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नया लेखन तो ठीक है लेकिन नया पाठक कहाँ है?

  कभी-कभी ऐसा होता है कि अचानक आपको कोई मिल जाता है, अचानक किसी से फोन पर ही सही बात हो जाती है और आप कभी पुराने दिनों में लौट जाते हैं या किसी नई सोच में पड़ जाते हैं. सीतामढ़ी के मास्साब शास्त्री जी ने न जाने कहाँ से …

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याक और बच्चे की दोस्ती की कहानी ‘हिमस्खलन’

चीनी बाल एवं किशोर कथाओं में प्रकृति, मिथकों के साथ इंसान के आदिम संबंधों की कथा होती है. ‘हिमस्खलन’ ऐसी ही किताब है, जिसमें एक बच्चे और एक याक की दोस्ती की कहानी है. जांग पिंचेंग की इस किताब का अंग्रेजी से अनुवाद मैंने किया था. जिसका प्रकाशन रॉयल कॉलिन्स …

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बज्जिका मेरा देस है हिंदी परदेस!

आज मातृभाषा दिवस है. समझ में नहीं आ रहा है कि किस भाषा को मातृभाषा कहूं- बज्जिका को, जिसमें आज भी मैं अपनी माँ से बात करता हूँ. नेपाली को, नेपाल के सीमावर्ती इलाके में रहने के कारण जो भाषा हम जैसों की जुबान परअपने आप चढ़ गई. भोजपुरी को, बचपन …

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उन्होंने ‘लुगदी’ परम्परा को ग्लैमर की ‘वर्दी’ पहनाई

मुझे याद है जब आमिर खान ने अपनी फिल्म ‘तलाश’ का प्रोमोशन शुरू किया था तो वे मेरठ में सबसे पहले वेद प्रकाश शर्मा के घर गए थे. यह हिंदी की लोकप्रिय धारा के लेखन को मिलने वाला विरल सम्मान था. 80 और 90 के दशक में उनके उपन्यासों ने …

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नाटक क्या सिनेमा का फाटक होता है?

  आज ‘प्रभात खबर’ अखबार में भारंगम के बहाने मैंने नाटक-नाटककारों पर लिखा है. आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं- प्रभात रंजन  ================ ‘अपने यहाँ, विशेष रूप से हिन्दी में, उस तरह का संगठित रंगमंच है ही नहीं जिसमें नाटककार के एक निश्चित अवयव होने की कल्पना की जा सके’- …

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