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व्यंग्य

राष्ट्रवाद के भारी बारिश की उम्मीद है

आज यह व्यंग्य पढ़िए। लिखा है सेंट स्टीफेंस कॉलेज में इतिहास के विद्यार्थी उन्नयन चंद्र ने- मॉडरेटर ============================================== भारत की लगभग 44 फ़ीसदी आबादी जल संकट से जूझ रही है. गर्मी में चापाकल सूख रहे है. टुल्लू पम्प में पानी ऐसे आ रहा है जैसे मोपेड एवरेस्ट पर चढ़ रहा हो. महाराष्ट्र …

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 इरशाद ख़ान सिकन्दर की व्यंग्य कहानी ‘सिलवट भोजपुरिया’

इरशाद खान सिकंदर मूलतः शायर हैं। लेकिन लेकिन वे उन दुर्लभ शायरों में हैं जो गद्य भी बाकमाल लिखते हैं। अब यह व्यंग्य ही पढ़िए- मॉडरेटर ============                                         बात पुरानी है मगर …

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भारत में शादी विषय पर 1500-2000 शब्दों में निबंध लिखें

अभी दो दिन पहले नोएडा जाते वक्त जाम में फंस गया. कारण था शादियाँ ही शादियाँ. तब मुझे इस व्यंग्य की याद आई. सदफ़ नाज़ ने लिखा था शादियों के इसी मौसम में- मॉडरेटर =============================================== भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकतर देशों में शादी एक सामाजिक और नैतिक ज़िम्मेदारी मानी जाती है। …

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फांकी युग है और सब फांकीबाज़ हैं!

बहुत दिनों बाद प्रवीण झा अपने व्यंग्यावतार में प्रकट हुए हैं. इस बार एक नए युग की घोषणा कर रहे हैं- फांकी युग की. आइये पढ़िए- मॉडरेटर ================= फेसबुक के एक पोस्ट पर ‘लाइक’ गिन रहा था कि कवि कक्का का मेसैज आ गया। “आज फिर फांकिए?” गाँव गया था तो कक्का को ‘स्मार्ट-फ़ोन’ दे आया था। अब कक्का ‘व्हाट्स-ऐप्प’ करते हैं। मैनें फ़ोन घुमाया। “प्रणाम कक्का! कुछ गलती हो गयी?” “जीते रहो! लेकिन कुछ लिखो, तो पढ़ कर लिखो। आंकड़े लिखो। रिफ़रेंस दो। गप्प ही देना है तो आओ साथ भांग घोटते गप्प देंगें।” “कक्का! एक पत्रकार मित्र ने कहा लेख लिखो, तो लिख दिया।” “राम मिलाए जोड़ी। एक पत्रकार और एक फंटूसी डॉक्टर मिलकर अर्थव्यवस्था समझा रहे हैं। यहाँ भी वही, टी.वी. पर भी वही। सड़क सेपकड़ पैनल में बिठा लेते हैं। सब बेसिरपैर गप्प मारते हैं फांकीबाज!” “कक्का! अब मैं कौन सा टी.वी. पर बोल रहा हूँ? फ़ेसबुक पर ही तो…” “अच्छा! तो फ़ेसबुक है कि फांकीबुक?  तुम्हारी कोई गलती नहीं। यह युग ही ‘फांकी-युग’ है।।” “फांकी-युग? कक्का! यह ज्यादा हो गया। यह तो तकनीकी युग है। डिजिटल युग।” “तकनीकी युग तो बना ही फाँ…रने के लिए है।” कक्का की पीक थूकने की आवाज आई। “क्यों कक्का? तकनीक से सब आसान हो गया।” “तकनीक का आविष्कार ही हुआ कि मनुष्य फांकी मार सके। सब काम कम्पूटर करे, आदमी फूटानी मारे। टॉफ्लर का किताब सब पढ़ो।बूझाएगा। फ्यूचर शॉक पढ़ो फ्यूचर शॉक।” “अच्छा कक्का! अब ये भी बता दें कि आपका ये युग शुरू कब हुआ?” “1984 ई. में।” “अब यह क्या है कक्का?” “चौरासी! अड़तालीस का उल्टा चौरासी। ऐप्पल का कम्प्यूटर आया। ऐड्स का वायरस आया। नया वाला गाँधी आया। रूस में गोर्बाचोव चमका,अमरीका में रीगन। और वो गाना आया, प्यार प्यार प्यार, तोहफा तोहफा तोहफा….” “अाप और आपके तर्क। सब भांग का असर है कक्का। यह प्रगतिवादी युग है।” “किसका? हिंदी का? साठ में साफ हो गया।” “तो क्या 84 के बाद कुछ लिखा नहीं गया?” “लिखा तो गया, पर पढ़ा नहीं गया। सब फांकीबाज!” “ऐसे न कहिए कक्का। हाँ! हिंदुस्तान में अंग्रेजी का जमाना आया।” …

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सालाना त्यौहार बन गया है आईपीएल!

कल रामनवमी का पावन पर्व था. लेकिन कल रात में एक ऐसा त्यौहार शुरू हुआ है जो दो महीने तक अपना रंग जमायेगा- आईपीएल. मेरा एक छोटा सा व्यंग्य इसी त्यौहार पर- दिव्या विजय  ================================ कल से भारत का एक नया पर्व शुरू हो गया, नाम है आई पी एल। …

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अपने राम नायक हैं, अधिनायक हैं, दाता हैं, भारत भाग्य विधाता हैं!

आज रामनवमी है. भगवान राम का जन्मदिन. हमारे शहर सीतामढ़ी में आज के दिन से रामनवमी का मेला शुरू होता है एक महीने का. खैर, आज दिल्ली विश्वविद्यालय में सीआईसी के विद्यार्थी नन्दलाल मिश्र ने यह व्यंग्य लिखा है राम नाम की महिमा पर- मॉडरेटर ================= राम नाम की महिमा …

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भगवा जीता इस फगवा में, गावे गाम भदेस। जोगीरा सा रा रा रा।”

होली पर स्पेशल चिट्ठी नॉर्वे से डॉ. व्यंग्यकार प्रवीण कुमार झा की आई है. भगवा के फगवा की चर्चा वहां भी है. कवि कक्का पूरे रंग में हैं- मॉडरेटर ==================== कवि कक्का आज रंग में हैं। पिछले महिने ही अपना वामपंथी लाल जनेऊ बदल कर केसरिया जनेऊ किया, और होली …

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वैलेंटाइन पर परदेशी बाबू की देसी चिट्ठी

प्रवीण कुमार झा रहते नॉर्वे में हैं लेकिन ठेठ देशी किस्सा-कहानी लिखते हैं. वामा गांधी के नाम से ‘चमनलाल की डायरी’ नामक एक व्यंग्य-किताब लिख चुके हैं. आज वैलेंटाइन चिट्ठी लिखे हैं. परदेस से लिखे है आने में देरी हो गई है. मौका मिले तो पढियेगा- मॉडरेटर ============ लुबना चमार …

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 आप सब को हैप्पी यौम-ए-मोहब्बत डे!

आज वैलेंटाइन डे है. सदफ़ नाज़ अपने पुराने चुटीले अंदाज़ में लौटी हैं. कुछ मोहब्बत की बातों के साथ, कुछ तहजीब-संस्कृति की बातों के साथ-मॉडरेटर ================== 14 फ़रवरी के दिन डंडे वाले बिग्रेड के नुमाइंदे मोहब्बत के मारों पर यूं पिल पड़ते हैं मानों ये जोड़े शीरीं फ़रहाद के नक्शे-ए-क़दम …

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