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ख़ुसरौ रैन सुहाग की जागी पी के संग, तन मेरो मन पियो को दूधिए एक रंग 

जब इतिहास के किसी किरदार, किसी प्रसंग पर इतिहासकार लिखता है तो उससे विश्वसनीयता आती है और आजकल इतिहास के विश्वसनीय पाठ पढना जरूरी लगने लगा है. हज़रत अमीर ख़ुसरौ देहलवी (१२५३ – १३२५) पर जाने-माने इतिहासकार रज़ीउद्दीन अक़ील का लिखा पढ़िए. हिंदी और उर्दू के इस आरंभिक शायर पर रज़ी साहब …

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किताबों का साल अनुवाद का हाल

हिंदी में अनुवाद के पाठक बढ़ रहे हैं और चुपचाप उसका बाजार भी तेजी से बढ़ता जा रहा है. इसी विषय पर मेरा यह लेख ‘कादम्बिनी’ के दिसंबर अंक में प्रकाशित हुआ है. जिन्होंने न पढ़ा हो उनके लिए- प्रभात रंजन ================= कुछ महीने पहले यात्रा बुक्स की निदेशिका नीता …

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‘इमा’ तुझे रोके है , रोके है मुझे ‘बेटी’

मणिपुर की राजधानी इम्फाल का इमा बाजार, जहाँ सिर्फ महिलायें बाजार लगाती हैं. उसके बारे में एक जीवंत टेक्स्ट लिखा है गीताश्री ने. वह अभी हाल में मणिपुर यात्रा पर गई थीं. बहुत साधा हुआ गद्य, न्यू जर्नलिज्म की तरह यानी ऐसा रिपोर्ताज जो पढने में साहित्य सा आनंद दे- …

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भारतीय भाषाओं में इतिहास-लेखन की परम्पराएँ और चुनौतियाँ (हिंदी के विशेष सन्दर्भ में)

मध्यकालीन इतिहास के विद्वान रज़ीउद्दीन अक़ील ने भारतीय भाषाओं में इतिहास लेखन को लेकर एक गंभीर सवाल उठाया है. आजकल रज़ी साहब की चिंता के केंद्र में यह बात है कि हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में इतिहास की किताबें आनी चाहिए ताकि देश के आम जन तक इतिहास की …

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सुरेंद्र मोहन पाठक की नजर से हिन्द पॉकेट बुक्स का इतिहास

हाल में हिंदी प्रकाशन जगत में एक बड़ी घटना बड़ी खामोशी से हुई. पेंगुइन रैंडम हाउस और हिन्द पॉकेट बुक्स प्रकाशन एक हो गई. हिंदी में पॉकेट बुक्स क्रांति लाने में हिन्द पॉकेट बुक्स की बड़ी भूमिका रही है. हिंदी के सबसे लोकप्रिय लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने हिन्द पॉकेट …

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कोई इच्छा अधूरी रह जाये, तो जिंदगी में आस्था बनी रहती है!

सुरेंद्र वर्मा का उपन्यास ‘मुझे चाँद चाहिए’ वह उपन्यास है जिसकी समीक्षा लिखते हुए उत्तर आधुनिक आलोचक सुधीश पचौरी ने लिखा था ‘यही है राईट चॉइस बेबी’. आज इस उपन्यास पर पूनम दुबे की टिप्पणी प्रस्तुत है.  पूनम पेशे से मार्केट रिसर्चर हैं. बहुराष्ट्रीय रिसर्च फर्म नील्सन में सेवा के पश्चात फ़िलवक्त …

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तथ्य और सत्य के बीच फेक न्यूज

युवा पत्रकार अरविन्द दास का यह लेख फेक न्यूज को लेकर चल रही बहस को कई एंगल से देखता है. उसके इतिहास में भी जाता है और वर्तमान पेचीदिगियों से भी उलझता है. अरविन्द दास पत्रकार हैं, पत्रकारिता पर शोध कर चुके हैं और हाल में ही उनके लेखों का …

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रेंगने वाली हिंदी अब उड़ रही है!

हिंदी की स्थिति पर मेरा यह लेख ‘नवभारत टाइम्स’ मुम्बई के दीवाली अंक में प्रकाशित हुआ है- प्रभात रंजन =========================== मेरी बेटी नई किताबों को खरीदने के लिए सबसे पहले किंडल स्टोर देखती है, जहाँ अनेक भाषाओं में लाखों ईबुक मौजूद हैं जिनमें से वह अपनी पसंद की किताब खरीद …

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यह सामा-चकेवा का मौसम है

कार्तिक मास के बढ़ते चाँद के साथ मिथिला-तिरहुत के लोगों की स्मृतियों में सामा चकेवा आ जाता है. भाई-बहन के प्रेम के इस पर्व पर यह लेख लिखा है मुकुल कुमारी अलमास ने- मॉडरेटर ============ कार्तिक माह का शुक्लपक्ष जब भी आता है और मैं दिन-दिन बढ़ते चाँद को देखती …

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दरवेश सोई जो दर की जानें

रज़ीउद्दीन अक़ील दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में असोसियेट प्रोफ़ेसर हैं. मध्यकालीन इतिहास के वे उन चंद विद्वानों में हैं जिन्होंने अकादमिक दायरे से बाहर निकलकर आम पाठकों से संवाद करने की कोशिश की है, किताबें लिखी हैं. वे किताबें जरूर अंग्रेजी में लिखते हैं लेकिन बहुत अच्छी हिंदी भी …

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