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रामविलास पासवान की जीवनी का प्रकाशन

रामविलास पासवान की जीवनी वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव लिख रहे थे। यह जानकारी मुझे थी। अब वह जीवनी प्रकाशित होकर सामने आ गई है। पेंगुइन से प्रकाशित इस जीवनी में रामविलास पासवान के जीवन संघर्ष, लगभग पाँच दशकों के राजनीतिक जीवन के बारे में विस्तार से लिखा ही गया है। …

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कैंजा, साबुली कैंजा और मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कसप’

कुछ उपन्यासों के प्रमुख किरदार इतने हावी हो जाते हैं कि कई संगी किरदारों पर ध्यान ही नहीं जाता। मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कसप’ की साबुली कैंजा ऐसी ही एक किरदार हैं। मुदित विकल ने उस किरदार पर, कैंजा शब्द पर बहुत सुंदर लिखा है। साजा कर रहा हूँ …

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कोरोना काल में सोशल बिहेवियर को रेखांकित करने वाली किताब

वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की किताब प्रकाशित हुई है ‘कोरोना काल की दंश कथाएँ’। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब की समीक्षा की है हेमंत पाल ने। आप भी पढ़ सकते हैं-  ==============   इक्कीसवीं सदी का बीसवां साल सदियों का दस्तावेज बन गया है। कोविड 19 के रूप में …

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दुर्गा पूजा की यादें

सुहैब अहमद फ़ारूक़ी पुलिस अधिकारी हैं, जाने माने शायर हैं, साहित्य प्रेमी हैं। आज से दुर्गा पूजा शुरू हुआ है। ज़रा उनकी यह अनुभव कथा पढ़िए- =========================== पुलिस ड्यूटी की अहमियत  असंगत व ग़ैर-मामूली समय ही में महसूस होती है। आम समय में तो मामूली लोग भी ‘संगत’ कर लेते …

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गांधीजी गेहूं की खेत की तरह हैं तो टैगोर गुलाब बाग की तरह

संजय कृष्ण पेशे से पत्रकार हैं और चित्त से शोधार्थी। उन्होंने कई दुर्लभ किताबों की खोज की है और उनका प्रकाशन भी करवाया है। उनका यह लेख चरखे को लेकर गांधी-टैगोर बहस के बहाने कई बड़े मुद्दों को लेकर है- ======================= सन् 1915 से लेकर 1947 तक के कालखंड को …

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टीआरपी के बलवे में जिम्मेदार पत्रकारिता की हत्या

इस लेख के लेखक अजय बोकिल नईदुनिया सहित कई प्रमुख समाचार पत्रों में जुड़े रहे हैं। उनका एक कहानी संग्रह ‘पास पड़ोस’ के अलावा शोध ग्रन्थ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित हैं। फिलहाल वे ‘सुबह सबेरे’ (भोपाल) के वरिष्ठ संपादक हैं- ============== एक संदिग्ध मौत कितने चेहरे बेनकाब कर …

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आप ‘वेबिनार कल्चर’ से बचे रहें, यही काफी है!

अजय बोकिल भोपाल में रहते हैं, संपादक हैं। उनका यह छोटा सा लेख पढ़िए- ================          हालत कुछ ऐसी ही है, आप ‘कोरोना’ से बच सकते हैं, लेकिन वेबीनार से नहीं। एक से पल्ला छुड़ाएंगे तो दूसरा जकड़ लेगा और चाहे-अनचाहे आपके वाॅ्टस एप पर लिंक डाल …

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  श्रीमती हेमन्त कुमारी देवी: उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध का स्त्री पक्ष

क्या उन्नीसवीं सदी को लेकर हिंदी साहित्य का जो विमर्श है वह इतना अधिक भारतेंदु हरिश्चन्द्र केंद्रित है कि अनेक लेखकों की उपेक्षा हुई? ख़ासकर लेखिकाओं की? युवा अध्येता सुरेश कुमार के इस शोधपरक लेख में पढ़िए- =====================  हिन्दी साहित्य में विमर्श के बिंदु भारतेन्दु की आभा के इर्द गिर्द …

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महात्मा गांधी के विचारों के आलोक में राजभाषा कार्यान्वयन

डॉ. बी. बालाजी मिश्र धातु निगम लिमिटेड में उप प्रबंधक (हिंदी अनुभाग एवं निगम संचार) हैं। राजभाषा कार्यान्वयन के संदर्भ में उनका यह लेख पढ़िए- ==================== 15 अगस्त 1947 को बीबीसी के पत्रकार से  बातचीत के दौरान महात्मा गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “पूरी दुनिया से कह …

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हमें अपनी भाषाओं की ओर लौटना ही पड़ेगा

आत्मनिर्भरता का संबंध मातृभाषा से भी है। अशोक महेश्वरी ने अपने इस लेख में यह बताने की कोशिश की है कि जब काम करने वाले और काम कराने वाले एक ही भाषा भाषी होंगे तो उससे आत्मनिर्भरता का द्वारा खुलेगा। भारत में शिक्षा के विस्तार के लिए भी ज़रूरी है …

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