Saturday, October 25, 2014

महाभूत चन्दन राय की कविताएं

इधर महाभूत चन्दन राय की कवितायेँ पढ़ी. पेशे से इंजीनियर चन्दन की कविताओं में समकालीनता का दबाव तो बहुत दिखता है लेकिन उनकी कविताओं में एक नया, अपना मुहावरा गढ़ने की जद्दोजहद भी दिखाई देती है. उम्मीद करता हूँ भविष्य में इनकी और बेहतर कवितायेँ पढने को मिलेंगी. फिलहाल इनकी कुछ कवितायेँ पढ़िए और राय दीजिए- प्रभात रंजन 
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1.
अच्छे दिनों की परिकल्पना

यह चोर उचक्कों हत्यारों लुटेरों ठगों और डकैतों के बीच 
एक सामूहिक चोर समझौता था
बुरे दिनों की असफलताओं से हताश एक आपात आयोजन
जो विकसित करना चाहते थे एक नई अचिह्नित चोर-पद्धति
जिससे दुनिया के उत्साह जिन्दापन और समृद्धता को फिर से लूटा जा सके !

यह पहला नाजियों का समूह चीखा - दोस्तों !
हमने नाजियों के भेष में जर्मनी में हिटलर को स्थापित किया था
हमने एक राष्ट्रिए समाजवादी कामगार सेना की आड़ में
जर्मनी में साम्राज्यवादी सोच को किया था स्थापित
और बेकसूर यहूदियों का गैस चैंबरों में किया था नृशंस नरसंहार
हमने राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को बरगला युद्ध में झोंक दिया
हम एक सफल तानाशाह थे किन्तु हम अब पहचाने जा चुके है !
यह कहते हुए यह पहला हिटलर के अनुनायियों का समूह निराश होकर बैठ गया !

इसके बाद ही यह दूसरा फासिस्टों का समूह जो मुसोलिनी भक्त था चीखा
मित्रों हम इटली में महान फासीवादी नेता मुसोलिनी के साथ थे
हमने इटली की गरीब बेरोजगार भुखमरी से त्रस्त जनता के बीच
पैदा किया एक खतरनाक मर्दाना राष्ट्रवाद का जहर
उम्मीदों से भरे एक नए इटली के स्वप्नलोक के निर्माण
के लिए युद्ध ही अंतिम विकल्प हैका सुनियोजित भ्रम
हम अपने अवसरवाद को फासीवाद के चरम तक ले गए थे
किन्तु बदलती दुनिया के बदलते विचारों का कत्ल नहीं कर पाये
अंतत हम भी मारे गए.. हमे भी पहचान लिया जाएगा !

यह तीसरा दल क्रूरता और धर्मयुद्धों का प्रतिपक्षी बनकर बोला
हमने ईराक में प्रतिक्रियावादी दुराग्रहों को पुनर्जीवित किया
हमने अनिश्चय और अराजक परिस्थितियां पैदा कर
ईराक पर कायम करवाया था क्रूरता का सद्दाम- राज
हाँ हमने ही रोम में स्थापित की थी सम्राट-पूजा की वृति
हम लीबिया में मुअम्मर अल गद्दाफी के साथ थे !

हम ही इजराइल में है, फलिस्तीन में,सीरिया में भी   
यूक्रेन में, नाइजीरिया में और सोमालिया में भी हम ही हैं
हमने दुनिया में धार्मिक अस्थिरता पैदा कर
विश्व-शांति की परिकल्पना को झोंक दिया धर्मयुद्धों की आग में
हमने पुनर्स्थापित किया है धार्मिक शीतयुद्धों का वातावरण
पर अफ़सोस यह आग भी धीरे-धीरे बुझ रही है
माओ और नक्सली भी लड़ रहे केवल छापामार युद्ध
हम कमजोर हो रहे हैं प्रतिपल  प्रतिदिन..

तभी वह ठगों का एक छोटा समूह आत्मविश्वास भरे स्वर में चिल्लाया -
यह दुनिया प्रतिदिन अपने अस्तित्व के सरक्षण के संघर्ष से गुजर रही है
उसके पास भूख रोटी रोजगार परिवार के संघर्ष और जीवन की प्रतिस्पर्धाएं है
उसके पास लगातार जटिल होते जीवन की कठिनाइयाँ और ऊब है
हम इस स्वप्नरहित हो चुकी नीरस दुनिया को  उम्मीदों भरे रंगीले स्वप्न बेचेंगे
क्योंकि बे-उम्मीद हो चुके लोगों के बीच अच्छे दिनों की परिकल्पना बेचना
भूखे को अन्न के एक दाने के लिए बदहवास कर पाने जितना मारक है
हम दुनिया का विशवास जीतेंगे
क्योंकि विश्वास की लूट दुनिया की सबसे घातक और आसान लूट है !
हम नयी सामाजिक व्यवस्था के प्रारूपों तहत
लोगों के बीच अपने-अपने वर्ग के संघर्ष का स्वार्थ पैदा करेंगे
किसी भी समाज को ख़त्म करने का सबसे कारगर  तरीका है
उसे संवेदनाहीन बना देना
हम इस हद तक अच्छे दिनों की परिकल्पना बांटेंगे !

इधर मेरे कानों में जैसे ही गूंजता है दूरदर्शन पर
बजते एक लोकप्रिय गीत का कर्णप्रिय संगीत
अच्छे दिन आने वाले है”….
मेरा दुःस्वप्न टूटता है !

 2.
मेरी लिखित कवितायेँ दरअसल  मेरी नहीं हैं

मेरी लिखित कवितायेँ दरअसल मेरी नहीं हैं
मै आपके क्लांत काव्यभिषेक का किंचित भी श्रेयधिकारी नहीं
अपने राजमुकुटों को इस कलंक से बचा कर रखिए
मैने अब तक जो भी नाशुक्राना कहा-सुना-लिखा
निस्संदेह सिर्फ कविताओं ने कहा था
कविताओं के शब्द थे,कविताओं ने लिखा था !
मेरी कवितायेँ कविताओं की स्वत: गढ़ी  अमूर्त पांडुलिपियाँ हैं
मै केवल इन अनजानी आत्माओं की हूक का सूत्रधार हूँ

संसार की हर कविता एक अमर कवि होती है
कवितायें दरअसल कालजयी कवियत्रियों की काया है     
मै केवल और केवल उनकी रतजगों का रूपांतरण हूँ
मै एक बिचौलिया भाषा हूँ
उनकी निरावयव लिपियों के सावयव लेखन का लिपिक-दूत
कविता की कलम से पोषित एक अबोध पौधा हूँ
मेरे भीतर बैठी अनगिनत कवितायेँ लिखती है
मै कहाँ कुछ भी लिखता हूँ !

मेरे भीतर आठवीं शताब्दी से समाधि लिए सिद्धो-नाथों 
मेरी आत्मा में वीरता के अभिलेख लिखते हैं
अन्याय के खिलाफ मेरा शब्द-विद्रोह उन्ही की प्रदिक्षणा हैं
एक कुरुक्षेत्र की रणभूमि
मैने तैयार की है अपनी कविताओं में
एक महायुद्ध का शंखनाद बजाती मेरी कविताओं में 
बीसलदेव रासों पृथ्वीराज रासों तीर-कमान लिए खड़े हैं
हम्मीर रासो,परमाल रासो मेरे भीतर गढ़ते हैं
एक मध्यकालीन युग का संती उपसंहार

मेरे भीतर एक भक्तिकाल घुमड़ रहा है बरसने को
और विद्यापति मुझमे कर रहे स्थापित भक्ति और श्रृंगार रस
पदावली, के सुवासित कल्पवृक्ष से झरते
सम्मोहन ने एक पनघट निर्मित किया है मेरे भीतर
के आप घट-घट भर-भर खूब पिए कवितायें
कीर्तिलता,कीर्तिपताका मेरे भीतर के दो राग हैं
मेरे भीतर खालिकबारी ,पहेलियों से रची एक वृहत्तर दुनिया है

मेरे कविताओं में बैठे आदिकवि अमीर खुसरों लिखते है
" ये अंत नहीं आरम्भ है " !
मेरे भीतर खुसरों की कव्वालियाँ रचती हैं
मेरी बेसुरी कठोरता में अपनी सुर-ताल-लयकारियाँ
मेरा गूंगापन उनकी खड़ी बोलियों का शागिर्द है
मुकरियोँ की तहजीभी में
मेरी कविताओं ने जो भी लिखा
वो खुसरों के महा-शिल्प का तरन्नुम दो सुखन है !
मै मीर की अनकही नज्म हूँ..
मेरा कवित्व ग़ालिब का पुनर्लेखन है !

मेरे भीतर कुलबुलाती है
बेनाम कलमों की गुमनामियाँ
मेरा अंतस अमूक रचनाकारों का बेचैन दोहाकोश है
मै कबीर की निर्गुण सधुक्कड़ी हूँ
मेरे भीतर कहीं बैठे कबीर
रात-दिन लिखते हैं अपनी चौपाइयाँ !
मेरे भीतर मिर्जा खां रहीम की भटकती रूह है
मै सूरदास के भ्रमरगीत की चरण धूलि हूँ
गोस्वामी तुलसीदास ने जना है
मेरी कविताओं में रामचरित का संस्कार !
मेरे भीतर कृष्ण-प्रेम में  बावरी मीराबाई
विरह की सारंगी लिए प्रेम के अनंत धुनें गढ़ती है
मेरा अंतरघट जायसी के पद्मावत की प्रेम कहन हैं

मेरे अन्दर की ख़ुशी अपनी अठखेलियाँ लिखती है
मेरा भीतर बरसो से जमा दुःख लिखता है
मेरी नाकामयाबी अपनी कुढन लिखती है
मेरे आंसू लिखते है अपने पश्चाताप
और संताप अपने प्रायश्चित लिखता है
मै मुफलिसों का छटपटाता कथ्य हूँ
मेरे लहू अपने हिस्से की आग लिखता है
कभी-कभी आत्मा लिखती है मेरे भीतर

मै कविता का दत्तक पुत्र हूँ
सारे कवि सहोदर होते हैं
मेरे भीतर बैठे हजार कवि लिखते हैं
पोलिश-रशियन-जर्मन-अरबी
रोमन-आयरिश-ग्रीक-इन्डियन….. अपरिमित !
आपकी प्रशंशा और गालियाँ दोनों शिरोधार्य मुझे
आपके तमाचों और पुरस्कारों का समवेदक हूँ
हाँ ये ये मेरे भीतर का ब्रह्मसत्य है
मेरे भीतर एक महाभूत अपने विद्रोह लिखता है
मै केवल साहित्योंपासन का माध्यम हूँ
मेरी लिखित कवितायेँ दरअसल मेरी नहीं हैं !


3.
अतिरिक्त दुखों का शोर

बाहर बहुत शोर हैं
असहनीय मार-काट के निरंकुश होते कठोर स्वर,
विनाश का अट्टाहास करती क्रूर ध्वनियाँ
विलाप की करुणोत्पादक आवाजें
और अतिरिक्त दुखों के इस विप्लव कोलाहल में
गाड़ियों ,मशीनों, रैलियों, हंगामों, आंदोलनों की घुलती मिलती आवाजें
जैसे मेरे सोचने-समझने की शक्ति झीण कर रही है

मैं सावधानी बरतता हूँ और अपने घर के भीतर आकर दुबक जाता हूँ
की बच सकूँ..
किन्तु ये खौफनाक आर्तनाद बंद किवाड़ों से
बेतरतीब दाखिल होता हुआ मेरे कानों में पारे की तरह ढुलक रहा है !
मैं भरसक अपनी उँगलियों के पोरों को अपने कानों में ठूँसता
हुआ शोर के इस कोहराम को बाहर ठेलने की कोशिश कर रहा हूँ की
तभी अचानक इजराइल की तोपों से दागा बम्ब का एक गोला 
मेरे ह्रदय पर धड़ाम से आकर फट गया है
मैं अपने कंपकपाते हाथों से हाँफते हुए अपनी छाती टटोलता हूँ
और यह जानकर संतुष्ट होता हूँ की
आह ! आखिर बच ही गया..!
मगर कब तक….??

मेरे हाथ जाने किसके खून से लथपथ हैं...
मैं छटपटाते हुए एक अनाम हत्या-बोध की आत्म-घृणा से ग्रस्त
बाथरूम की नलकियों के नीचे रगड़-रगड़ हाथ धोता हूँ
पर कितना जिद्दी है ये रक्त की छूटता ही नहीं..
अवसाद और आशंकाओं का एक  हतप्रभ अश्रु जैसे ही  मेरी आँख से  ढुलकता है
मैं देखता हूँ मलेशिया का लापता विमान मेरी उसी आँख में आकर धँस गया है
और यह आँख पत्थर की हो गयी है !

वेदना की इस अप्रत्याशित गलघोंटू ध्वंस-प्रक्रिया से  गुजरता हुआ
 मैं ये निर्णय लेता की कोई ऐसी मधुर लय छेड़ूँ ,कोई ऐसा सुरीला तान पकडूँ
जैसे कोई ठुमरी कोई  ध्रुपद  भीमपलासी या  राग-मल्हार
कोई ऐसा संगीत की जो  भर दे मुझमे असीम शांति 
इसी उपक्रम में मैं ऑन  करता हूँ  घर में पड़ा पुराना ट्रांजिस्टर

अद्भुत शुभ  संयोग है की बिस्मिल्ला खां शहनाई बजा रहे हैं और
 उनकी शहनाई की मंगलध्वनियों से खुदा की नेमतें मेरे भीतर बरस रही हैं
मेरा रोम-रोम इस दिलनवाज पाकीजगी से भीग रहा है
की अचानक  शहनाई की मीठी धुनें कर्कशतर और तीखी हो गई है
जैसे मुहर्रम की आठवी तारीख को अमीरुद्दीन नौहा बजाते हुए 
पेश कर रहे हों हजरत इमाम हुसैन को अजादारी
और इस गमजदा शोकधुनों में घुलने लगी है
गाजा के बच्चों की दिवगंत किलकारियाँ
मैं घबराकर ट्रांजिस्टर बंद कर देता हूँ !

पुनः मैं देखता हूँ दूरदर्शन पर आता हुआ रंगारंग-कार्यक्रम
अहा कितना सुन्दर और निर्दोष परिदृश्य है की
कत्थक-कवि बिरजू महराज रच रहे लय-ताल-सुर की कविता
दिग दिग थेई ता थेई
पांवों की  थिरकन जैसे पृथ्वी की गति
हाथों की मुद्रा जैसे नव-नव रूप धर रहा समय
नाच रहे बिरजू महाराज  जैसे श्याम मोरी अँखियन में !

यह क्या बिरजू महाराज की लोच काया हो रही परिवर्धित
काल रूप गढ़ रहा महाकाल के भेष में विनाश रूप
नाच रहे हैं मल्लिकार्जुन सृष्टि के संहार का तांडव
प्रलय का संकेत देता शेषनाग फुँकार रहा विष
खुलती है तीसरी आँख जैसे आज फूँक कर रहेंगे महाकाल यह कलयुग
मैं गहन मूक की स्थिति में बदहवास पर मृत्यु से भयभीत नहीं
सोचता हूँ की कैसे हर चीज हो रही क्रूर ,अमानवीय हर परिदृश्य !

तभी गिरता है मेरी गोद में कर्ण का कटा हुआ सर
और मुझसे मेरी जात पूछता है
और प्रकट होता शापित अश्वत्थामा घनघोर अट्टहास करता कहता है
मुक्ति मरणासन्न तुम्हारी
अंत सुनिश्चित है भागो कहाँ भागोगे
मैं बदहवास तभी से भाग रहा हूँ
अथक अनवरत गिरता पड़ता भाग रहा हूँ !
मैं नस्लीय हिंसाओं जेहादों धर्मयुद्धों
दंगो युद्धों सरहदों पर मारी गयी मृत देहों को कुचलता लांघता हुआ
महाद्वीपों महासागरों को पार करता भाग रहा हूँ..
बाहर का शोर मेरे गहरे भीतर तक उतर आया है !

4.
विद्रोह है कि भूमिगत होता ही नहीं है

विद्रोह है की भूमिगत होता ही नहीं है
और घर है की जला जाता है
मैं जितनी देर में तय करता हूँ चूल्हे और मशाल के बीच
अपने भीतर खौलते आग की प्राथिमकताएं
उतनी देर में झुलस जाता है नाइजीरिया
ह्रदय में ज्वालामुखी सा सुलगता है सीरिया
किसी एक नस में टीस मारता है उत्तर प्रदेश
मैं दिल में घाव लिए ईराक की जमीन पर जलता हूँ
मेरे ह्रदय में गहरे तक चाक है जाने कितनी ही गजापट्टियां

मैं एक मध्यवर्गीय आदमी हूँ
मेरे भीतर काबिज है मध्यवर्गीय विद्रोह की प्रवृत्तियाँ
और यही  मध्यवर्गीय प्रवृति तय नहीं कर पाती
की रोटी-रिश्तों और देश में सबसे जरुरी चीज क्या है
मैं रोज लड़ता हूँ अपने भीतर भीतरघात करती
इस मध्यवर्गीय जुर्रत और भगोड़ेपन से

कभी कभी सूझता ही नहीं की
माँ के आँचल के उस फ़टे कोने और
पिता की बल खा चुकी पीठ पर लदे दुखों के बीच
मैं अपने ह्रदय में आहत भारत नाम के घाव का स्थानांतरण कर
कहीं अपनी जिम्मेदारियों की उपेक्षा तो नहीं कर रहा है
और ऐसे कर्म-संकट में मैं किंकर्तव्यविमूढ़ इस अंतर्द्वंद से जूझता हूँ
की वैश्विक जिम्मेदारियां निभाना भी तो एक किस्म की पारिवारिकता है !

ऐसे भयंकर लावाई उहापोह के बीच
मैं अपने रक्त में नामजद रखता हूँ अपने पीडक असंतोष 
मैं कविता में असंतोष लिखकर मशाल चलाता हूँ
मेरी कवितायें मेरे उसी अ-भूमिगत विद्रोह की एफ. आई. आर है !

5.
संवाद का जूता

व्यवस्था परिवर्तन मुर्गे की गर्दन मरोड़ना नहीं है
की आप उतारे अपने पैरों में पहना राष्ट्र-भक्त जूता
और उस लोक-खलनायक के माथे पर
अपने मक्खी-मार प्रतिरोध का टुनटुना चमका दें
यह बेहद सरल है की
आप हर दफे उनके घिनौने चेहरे पर थूक कर ही बताएं
उनके काले कुकर्मों का चिट्ठा

पर यह गूंगा अर्थहीन प्रतिरोध
तुम्हारी बुद्धिहीनता ही प्रदर्शित करेगा
की जब सरेआम लड़ा जा सकता हो विचारों का मल्ल्युद्ध
आप भांजे अपनी विचारहीन लाठियाँ
और चिल्लाएं आपने हक़-ए-फर्ज अदा किया
बदलाव कोई मच्छरमार-संघर्ष नहीं है की
आप चमकाए अपने बंदर-छाप पराक्रम का जूता
और सशब्द अपने मौनस्थलों पर लौट जाएँ

यह तुम्हारी प्रतिद्वंदिता नहीं शौर्यहीनता है
की आप अपने भीतर भरे असंतोष से खुद ही हो जाएँ विष-संक्रमित
और जब बोले तो उगले केवल विष
परिवर्तन रावण-वध के लिए रावण हो जाना नहीं है
हत्या के लिए की  हत्या मनुष्यहीनता है
और हिंसा के लिए की हिंसा विचारहीनता है
बदलाव तो वह राम-वादी संवाद की कला है
जो कुचक्रों में फंसे कितने ही बिभीषणों को कर सकती है मुक्त 

आपके पास भाषा का समार्थ्य है
और विचारों का कौशल है
तो इस दफे मारिये उन्हें
आपकी विचारधारा से मढ़े
संवाद का जूता
क्योंकि दर्ज होता है वही हस्तक्षेप 

जो शालीनता से किया जाए !