Friday, October 31, 2014

रॉबिन शॉ पुष्प के साथ एक युग का अवसान हो गया!

कल हिंदी के वरिष्ठ लेखक रॉबिन शॉ पुष्प का निधन हो गया. आजीवन मसिजीवी रहे इस लेखक ने बिहार की कई पीढ़ी के रचनाकारों को प्रभावित किया. उनको याद करते हुए आज प्रसिद्ध लेखक हृषिकेश सुलभ ने अच्छा लिखा है. 'दैनिक हिन्दुस्तान' से साभार यह लेख आपके लिए- मॉडरेटर 
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हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, कथाकार और उपन्यासकार रॉबिन शॉ पुष्प का अवसान साहित्य कीएक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। वह उस पीढ़ी के लेखक थेजिसने साहित्य को मनसावाचा कर्मणा जिया। उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, रेडियो नाटक, बाल साहित्य, संस्मण से लेकर साहित्य की लगभग तमाम विधाओं में लिखा। वह पूर्णकालिक लेखक थे। उनकी पहली कहानी 1957 में धर्मयुग में छपी। तब से वह अनवरत लिखते रहे। लेकिन आज उनकी यात्रा सदा के लिए थम गई।

पटना से बाहर हूं। मोतीहारी के पास एक गांव में। कुआं के जगत की मुंड़ेर पर बैठा एक युवा सेमल के कांटेदार तने को एकटक निहार रहा हूं। सामने कई तरह के वृक्षों का सघन विस्तार है। सूर्य अस्ताचल को जा रहे हैं। कल सांझ असंख्य लोगों ने विदा और आज सुबह ही स्वागत किया है जिनका, वे विदा हो रहे हैं। खिन्न, उदास मन जाते सूर्य को निहार रहा हूं। भीतर कुछ टूट रहा है। जलते बांस की तरह चटख रहा है कुछ मेरी आत्मा के अतल में! कि अचानक एक मित्र का फोन आता है। पुष्पजी नहीं रहे।

बहुत दिनों से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी। हां, फोन पर कभी-कभार बातें होती रहीं, पर यह सिलसिला भी इन दिनों बन्द ही था। अपने को कोस रहा हूं। स्वार्थी..कृतघ्न! आज का काम कल पर टालकर समय से मुंह चुरा कर जीने की अपनी आदत पर स्यापा कर रहा हूं! अचानक उनकी छवि कौंधती है। अंगुलियों में फंसी सिगरेट ,मुट्ठी बांध कर लम्बा कश और बेफिक्री के आलम में सिगरेट का धुआं। वे सन् 1976 के दिन थे। प्रेमचंद के बड़े सुपुत्र श्रीपत राय की पत्रिका ‘‘कहानी‘‘ में मेरी एक छोटी-सी कहानी छपी थी और उनसे आकाशवाणी पटना में मुलाकात हो गई। यह पता चलते कि उस कहानी का लेखक मैं हूं, उन्होंने मेरे कांधे पर अपना हाथ रखा था। उनकी हथेली का वो स्पर्श आज तक जिन्दा है, एक भरोसे की तरह। वे मुझसे मेरे बारे में पूछते रहे थे। मैं प्रतीक्षा में था कि शायद कहानी के बारे में कुछ कहें, पर ऐसा कुछ नहीं कहा उन्होंने। हमने साथ चाय पी। वे मुझे दुनिया की श्रेष्ठ कहानियों के बारे में बताते रहे। मैंने अब तक क्या-क्या पढ़ा है और अब मुझे क्या-क्या पढ़ना चाहिए पूछते और बताते रहे। मैं उन्हें निहारता रहा़..उनकी लम्बी ज़ुल्फों को अपनी उत्सुक नजरों से टेरता रहा। उनकी सिगरेट पीने की अदा और आत्मीयता भरी बातों पर मुग्ध होता रहा। विदा के समय़..चलते हुए उन्होंने शायद मात्र एक छोटे से वाक्य में मेरी कहानी की प्रशंसा की और घर आने का निमंत्रण दिया। अगले ही दिन मैं सब्जीबाग स्थित उनके घर पर था। मैं एक लेखक के घर में था, जिसकी कई कहानियां पढ़ चुका था़...रेडियों पर जिसके नाटक सुन चुका था, धर्मयुग और सारिका जैसी ख्यात पत्रिकाओं में जिसकी तस्वीरें और कहानियां लगातार देखता-पढ़ता रहता था,....जिसकी आंखों पर चढ़े काले चश्में के भीतर छुपी अनन्त कथाओं की दुनिया मेरे लिए कौतूहल का विषय थी! ...चाय आई। बेहद सुघड़ ढंग से व्यवस्थित कमरे में बैठे थे हमदोनों। कहीं कोई अतिरेक नहीं,...प्रदर्शनप्रियता नहीं। मेरी हर उत्सुकता के प्रति सम्मान-भाव और मेरी हर जिज्ञासा के लिए आत्मीय लहजे में समाधान।

वह जो थोड़ी देर पहले मेरी आत्मा के अतल में जो चटख रहा था, अब भी चटख रहा है।.... यादों की कौंध के साथ। ....अमली के प्रकाशित होते ही एक पोस्टकार्ड, जिसमें आशीष और शुभकामनाएँ और जल्दी मिलने का निमंत्रण था, मिला। ....मैं पहुँचा। मैंने कहा, मैं आपकी तरह आत्मीय कथाएँ लिखना चाहता हूँ। उन्होंने कहा, अपनी तरह लिखो। ज्यादा से ज्यादा पाठकों का भरोसा अर्जित करो।....वे जीवन भर अपनी तरह ही लिखते रहे। उन्होंने बदलते दौर के ट्रेंड की फिक्र किए बग़ैर अपनी भाषा की संवेदना, शिल्प के हुनर और कथ्य की बहुस्तरीयता को बरक़रार रखा। वे अपनी कथाओं को रचते हुए एक छोर पर कथ्य के अंतर्द्वंद्वों के लिए बेहद निर्मम होते थे तो दूसरे छोर पर इतने आत्मीय कि पाठक उनकी बाँह पकड़ चलता था।.... वे पाठकों के सहचर बने रहे। उन्होंने कभी आलोचना की दुरभिसंधियों की चिन्ता नहीं की और न ही उसका मुखापेक्षी बने।
    

....सूरज जा चुका है। क्षितिज की गोद में।.... मैं वसंत की उस दोपहर को याद कर रहा हूँ....सन् 1985 की दोपहर को, जब अपने द्वारा सम्पादित बिहार के युवा हिन्दी कथाकारपुस्तक की प्रति मुझे देते हुए उन्होंने कहा था कि ‘‘लेखक का काम केवल लिखना नहीं, अपने समय की युवा पगघ्वनियों की आहट को सुनना भी होता है!‘‘....मेरी यादें आत्मीयता के इस दुर्भिक्ष-काल में जीते हुए आदमी की यादें हैं। ....मैं जल्दी से जल्दी उन्हें एक बार फिर से पूरा का पूरा पढ़ना चाहता हूँ। नमन!

Thursday, October 30, 2014

खतरनाक सच का सामना है 'एक भाई का क़त्ल'

‘एक भाई का क़त्ल’ शीर्षक से ही लगता है खूनखराबे वाला उपन्यास होगा, जिसमें रहस्य-रोमांच की गुत्थियाँ होंगी. लेकिन तुर्की के युवा लेखक बारिश एम. के इस उपन्यास में अपराध कथा के साथ एक बड़ी सामाजिक समस्या का ऐसा तड़का लगाया गया है कि तुर्की के इस्ताम्बुल की यह कहानी तीसरी दुनिया के हर उस बड़े शहर की कहानी लगने लगती है जहाँ अंधाधुंध ‘विकास’ ने हजारों बच्चों को सड़कों पर आवारा बना दिया है. इस साल हिंदी में इतने बोरिंग उपन्यास छपे हैं कि यह अनूदित उपन्यास उन सबसे अच्छा लगा मुझे. उस उपन्यास को पढ़कर मैंने कुछ लिखने की कोशिश की है- प्रभात रंजन
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कहते हैं किसी समाज की जटिलताओं को समझना है, उसकी स्याह गलियों से गुजरना हो तो वहां की अपराध कथाओं को पढना चाहिए. क्या यह सच है कि जिस समाज में तहें अधिक होती हैं वहां अपराध कथाओं की लोकप्रियता अधिक होती है. तुर्की के बारे में कहते हैं कि उस देश के पास जितना दिखाने को है उससे अधिक छिपाने को है. एक इस्ताम्बुल सैलानियों का है, एक इस्ताम्बुल अपराध कतः लेखकों का है. फिलहाल मुझे थ्रिलर लिखने वाले बड़े लेखकों में एक नाम एरिक ऐम्बलर का याद आ रहा है जिन्होंने कई उपन्यासों में इस्ताम्बुल की भूलभुलैया की सैर करवाई थी. बहरहाल, आज चर्चा बारिश एम के उपन्यास ‘एक भाई का क़त्ल’ का. बारिश एम तुर्की के युवा लेखक हैं. वे ऐसे लेखक हैं जो महज मनोरंजन के लिए 200-250 पृष्ठों के उपन्यास नहीं लिखते हैं, जिनको आप हवाई जहाज, ट्रेन की यात्रा के दौरान अपन साथ लेकर चढ़ें और सफ़र की बोरियत को दूर करने के लिए उसके पन्ने पलटते जाएँ. लेकिन इसकी कहानी ऐसी नहीं है. आप पन्ने पलटते पलटते ठहर जायेंगे. यकीन मानिए. एक लोमहर्षक कहानी जिसमें अपराध कथाओं की परंपरा का रोमांच भी है और हमारे समकालीन जीवन की चुनौतियों की कथा भी.

कहानी बस इतनी सी है कि कमाल नामक एक पत्रकार का क़त्ल होता है, जिसकी बहन यास्मीन तमर सेज्गिन नामक सबसे बड़े सुपारी किलर के पास जाती है ताकि उसके माध्यम से अपने भाई के क़त्ल का बदला ले सके. यास्मीन खुद भी किसी का अकूत काला धन धोखे से अपने नाम करवा चुकी है और थोड़ी बहुत जेल की सजा भी काट आई है. तमर वह इंसान है जिसे नौ जिंदगियां मिल चुकी हैं, उम्र ढल चुकी है लेकिन अब भी उसका नाम बड़ों बड़ों के हाड़ कंपा देता है. जब यह लगने लगता है कि सब कुछ बड़ी आसानी से हो जायेगा. यास्मीन को अपने भाई का कातिल मिल जायेगा, तमर को उसकी कीमत मिल जाएगी और कहानी ख़तम. लेकिन यह ऐसा सस्पेंस थ्रिलर नहीं है जिसमें सारा किस्सा गुत्थियों को सुलझाने का है.

असल में यह उपन्यास ऐसा नहीं है जैसा आरम्भ में लगता है. बल्कि उपन्यास एक बड़े संगठित अपराध का चेहरा दिखाता है जिसमें बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है. उपन्यास की कहानी के केंद्र में तुर्की का इस्ताम्बुल शहर है, वह इस्ताम्बुल जहाँ 40 हजार से अधिक बच्चे सड़क पर आवारा हैं, यानी स्ट्रीट किड्स. आंकड़े बताते हैं कि उन हजारों बच्चों में करीब 16 हजार बच्चे ऐसे हैं जिनका सम्बन्ध कम से कम एक अपराध से रहा है. आखिर वे लोग कौन हैं जो बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेलते हैं- उपन्यास की कहानी इसी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करती दिखाई देती है. उपन्यास एक बड़ा सवाल उठाती है कि जब राज्य अपने मासूम बच्चों के जीवन में बदलाव नहीं ला पाती है तो अपराध उनके जीवन में बदलाव लाने की दिशा में सक्रिय हो जाता है. बिना किसी लोड के उपन्यास अपनी पूरी कथात्मकता के साथ इस हौलनाक पहलू की तरफ इशारा करता है.

उपन्यास में जब मैं यह पढ़ रहा था कि कि स्ट्रीट चिल्ड्रेन थिनर का नशा करते हैं तो मुझे याद आया कि दिल्ली के स्ट्रीट चिल्ड्रेन्स में भी रुमाल में थिनर डालकर उसे सूंघने का नशा आम है. हमारे शहरों में भी हर साल हजारों बच्चे गायब हो जाते हैं, जिनका कुछ पता नहीं चलता. वे कहाँ जाते हैं? बारिश एम का यह उपन्यास ऐसे सवालों की तरफ हमारा ध्यान जाने अनजाने ले जाता है. उपन्यास में यह बताया गया है कि बड़े शहर लावारिस बच्चों के लिए सबसे खतरनाक है. इसमें एक रिपोर्ट के हवाले से यह कहा गया है कि तुर्की में हर सातवें बच्चे के सड़क पर आने की सम्भावना रहती है.

एक ज़माना था जब इस तरह की कहानियां, फ़िल्में सामने आती थी जिनमें लावारिस बच्चों के प्रति करुणा दिखाई जाती थी और यह दिखाया जाता था कि उनके जीवन में सुधार की उम्मीद थी, बदलाव की गुंजाइश थी. अब वह गुंजाइश भी जाती रही. पूंजीवादी खेल अपने चरम पर है. हर वह चीज जायज है जिससे पूँजी का निर्माण होता हो. मुझे याद आता है बरसों पहले अमेरिकी लेखक इ. एल. डॉक्ट्रो का उपन्यास आया था ‘बिली बाथगेट’, जिसमें एक लावारिस को अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बनते दिखाया गया था, अपने बिग बी. की फिल्म ‘दीवार’ की भी यही कहानी थी.

‘एक भाई का क़त्ल’ एक ऐसा उपन्यास है जिसे आप साँसें थामकर पढेंगे और और आखिर तक आते-आते कह उठेंगे- हैं! ऐसा भी होता है. हत्या, अपराध और बदले की कहानी से शुरू हुआ इस उपन्यास का कथानक एक बड़े सामाजिक घाव की सीयन को जैसे उघाड़ कर रख देता है. बड़ी देर तक दर्द टभकता रहता है!

और हाँ, पहले पढने में, और फिर लिखने में इतना बह गया कि यह भूल ही गया कि अनुवाद किसने किया है- शुचिता मीतल ने. अच्छा अनुवाद अक्सर अनुवादक के नाम को भुला देता है. मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि जब मैं कोई खराब अनुवाद पढता हूँ तो उसके अनुवादक का नाम याद रह जाता है! अच्छे अनुवादकों के नहीं. धन्यवाद शुचिता मीतल, हमारी भाषा को समृद्ध करने के लिए.
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उपन्यास- एक भाई का क़त्ल; लेखक- बारिश एम., प्रकाशक- यात्रा बुक्स- भारतीय अनुवाद परिषद्; मूल्य- 250 रुपये. 

Wednesday, October 29, 2014

महाकरोड़ क्लब की फिल्मों की कंटेट पर चर्चा करना बेमानी है!

शाहरुख़ खान की फिल्म 'हैप्पी न्यू ईयर' सैकड़ों करोड़ कमाकर सुपर डुपर हिट हो चुकी है. ऐसे में उस फिल्म की प्रशंसा या आलोचना करना बेमानी सा लगता है. फिर भी, एक दर्शक की नजर से सैयद एस. तौहीद ने इस फिल्म के जरिये कुछ मौजू सवाल उठाए हैं- मॉडरेटर.
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जिंदगी व किस्मत को कोसने का नया चलन इधर की फिल्मों में निकला है। दुनिया को सिर्फ दो किस्म के लोगों में वर्गीकृत करने वाले चार्ली उर्फ शाहरूख खान हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते आए हैं। बाजीगर क्या किस्मत को कोसा भी करते हैं? चार्ली वो आदमी नहीं जो किस्मत को लेकर जोखिम उठाए। पराजित होने का भय उसे यह सब विचार दे रहा था?  

दुनिया समाज के विस्तार को नजरअंदाज करने वाला चार्ली को पिता के साथ हुए अन्याय का हिसाब चुकाना है। जिंदगी से एक सपना पूरा करने वाले की मांग रखने वाले लोगों से वो एक टीम बना लेता है। फराह खान की हैप्पी न्यू ईयर चार्ली के इंतकाम की कहानी है। हिन्दी फिल्मों में पुत्र द्वारा पिता का बदला लेने की कहानी पोपुलर फार्मुला रहा है। हीरों की तिजोरियां बनाने वाले ईमानदार पिता मनोहर को जैकी श्राफ के चरण ग्रोवर ने दुष्टता के साथ फंसा कर जेल भेज दिया। ईमानदार मनोहर ने अपने पर लगे दाग के कारण आत्महत्या कर ली। चार्ली को ग्रोवर से पिता का इंतक़ाम लेना है । 

डायमंडस को चरण की नाक के नीचे से लूट ले जाने की योजना में टीम को शामिल कर वो ऐसा कर सकता था। पिता के साथ काम कर चुके दो लोगों को इसका एक हिस्सा बनाया गया। अभी टीम पूरी नहीं थी तीन और लोगों को तलाश कर इसे पूरा किया गया। बेशक चार्ली कप्तान था। वर्ल्ड डांस प्रतियोगिता नाम का रियलिटी शो योजना को अंजाम देने का वंस इन ए लाईफटाइम अवसर था। मंजिल भी वहीं थी जहां रियलिटी शो होना था। टीम की मोहिनी ने सदस्यों को डांस की स्टेस्प बताकर डांस शो तक पहुंचा दिया। दर्शकों का समर्थन जुटा कर टीम प्रतियोगिता के स्टेज़ तक  पहुंच गई। दुनिया के नाइन नायाब डायमंडस की हिफाजत के लिए उन्हें चरण ग्रोवर के पास लाया जा रहा था। चार्ली को पांच नायब हीरोज की टीम के साथ डायमंडस उड़ा ले जाना है। 

कहानी में राष्ट्रवाद तत्व लाने के लिए इत्तेफाक रचा गया कि तिजोरी व डांस प्रतियोगिता एक जगह होनी है। नायाब हीरे उड़ा ले जाने का मकसद रखने वाले चार्ली देश का नाम भी ऊंचा रखने की भावना रखते हैं । वर्ल्ड डांस प्रतियोगिता में जीतना एक लक्ष्य था?  टीम प्रतियोगिता में शामिल हुई क्योंकि ग्रोवर को सबक सिखाना था। रियलिटी शो की माया दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच ला रही। फराह खान की Happy New Year  को टीवी रियालिटी शो की तरह देखकर मजा लिया जा सकता है। शाहरूख खान के दीवाने इसे मिस नहीं करेंगे क्योंकि फिल्म में हिन्दी सिनेमा का बादशाह है। शाहरूख ने किसी साक्षात्कार मे कहा था कि वे गरीबी से डरते हैं। संयोग से चार्ली भी अमीर बनने का सपना रखने वाले लोगों की टीम का कप्तान है। दुनिया को विजेता व पराजित में बांट कर वो उनका किसी एक तरफ होना आसान कर देता है। 

किस्मत से किसी रोज बहुत हासिल करने की चाहत रखने वाले लोगों को जमा करना आसान था। किस्मत पर भरोसा नहीं करने वाले चार्ली की किस्मत बुरी नहीं थी। हार व जीत के बीच हमेशा तक़दीर खडी नहीं मिलती। शातिर को न्याय तक पहुंचाने के लिए उसी की चाल से मात देना जरूरी होता है। चार्ली ने पिता का बदला इसी अंदाज में लिया। बदले की कहानी को राष्ट्रवाद का टैग लगाकर महिमांडित करने में फराह सफल रही। चार्ली की टीम कंपीटिशन अपने नाम कर खुद के लिए समर्थन जुटाने में कामयाब हुई है। बाक्स आफिस पर फिल्म की रिकार्ड सफलता से यही समझ आता है। दरअसल बड़े नामों को लेकर चलने वाला सिनेमा फिल्म को कारोबार से अधिक नहीं मान रहा।

बडे नामों के कांधे उतरी हालिया साधारण फिल्मों की कमाई करोड़ों में थी। बेहतरीन फिल्मों को लोग इस स्तर तक नहीं सराह रहे। सिनेमा को खांचे में बांटना ठीक नहींलेकिन अनायास व प्रायोजित तरीके से यही चला आ रहा। अब की कमाई के हिसाब से बीते जमाने के क्लासिक फिल्में निर्धन कही जानी चाहिए। पुराने जमाने के सितारे आज को देखकर हैरत करते होंगे। बदले हुए नजरिए में फिल्में चंद घंटो का मनोरंजन है। मनोरंजन का स्तर किसी समय को क्लासिक बना देता है। 

कारोबार से परहेज ठीक नहीं लेकिन क्या महा करोड़ क्लब की फिल्में क्लासिक कही जाएंगी? बहस बेमानी होगी क्योंकि दर्शक भी कमाई को लेकर बडे जागरूक से हैं। क्लासिक की नयी परिभाषा? अपराधिक परिवेश की फिल्मों का इधर चलन तेज हो रहा। सलमान खान से लेकर आमिर खान फिर रितिक भी अपराध आधारित फिल्में कर रहे। ग्रोवर तथा चार्ली  दोनों मंजिल पाने को गलत रास्ते अपनाने वाले लोग हैं । दर्शकों की सहानुभूति चार्ली के हांथ इसलिए होगी क्योंकि वो पिता का बदला ले रहा। इंतक़ाम में रास्ता मायने नहीं रखता? अपराध का रास्ता मायने नहीं रखता? फराह खान की फिल्म ने साबित किया कि Everything is fare in Love and war ।  राष्ट्रवाद से जोड़ देने बाद मिशन अत्यधिक रोचक हो जाता है। चोरी कर वहां से निकलने की बजाए इंडिया की इज्जत बचाने के लिए टीम का वापस कंपीटिशन में आने का जोखिम उठाना यही था। डांस कंपीटिशन के हिसाब से फराह खान फिल्म में जबरदस्त डांस सिक्वेंस नहीं बना सकी हैं। कहानी अभिनय एवं संगीत के मामले भी शाहरूख की फिल्म महान नहीं बन सकी फिर भी हैप्पी न्यू ईयर  गजब की सफल हो रही। मार्केटिंग के रास्ते पाई लोकप्रियता का अंदाजा आप भी लगाएं क्योंकि दीवाली के मौसम में Happy New Year  कहना आम हो रहा है। मनोरंजन से कारोबार के मामले में यह फिल्म reference point  बनेगी । चमक धमक रखने वाली फिल्मों का वितान hypnotize करने में कामयाब हो रहा? महाकरोड़ क्लब की फिल्मों की कंटेट पर चर्चा करना बेमानी है! 

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