Monday, October 20, 2014

सिनेमा में वीर रस क्या होता है?

युवा लेखकों की एक बात मुझे प्रभावित करती है- वे बड़े फोकस्ड हैं. अपने धुन में काम करते रहते हैं. अब प्रचण्ड प्रवीर को ही लीजिये रस-सिद्धांत के आधार पर विश्व सिनेमा के विश्लेषण में लगे तो लगता है उसे पूरा किये बिना नहीं मानेंगे. आज वीर रस की फिल्मों पर उनके लेख का दूसरा खंड. अंतराल हो गया है, लेकिन पिछले लेखों के लिंक दिए गए हैं- प्रभात रंजन 
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इस लेखमाला में अब तक आपने पढ़ा:
1. हिन्दी फिल्मों का सौंदर्यशास्त्र - http://www.jankipul.com/2014/06/blog-post_7.html
2.भारतीय दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र - http://www.jankipul.com/2014/07/blog-post_89.html
3.भयावह फिल्मों का अनूठा संसार - http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_8.html
4.वीभत्स रस और विश्व सिनेमा - http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_20.html
5. विस्मय और चमत्कार : विश्व सिनेमा में अद्भुत रस की फिल्में - http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_29.html
6.  विश्व सिनेमा में वीर रस की फिल्में - (भाग- ) - http://www.jankipul.com/2014/09/blog-post_24.html

भारतीय शास्त्रीय सौंदर्यशास्त्र के दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का परिचय कराती इस लेखमाला की छठी कड़ी में वीर रस की विश्व की महान फिल्में - भाग २ :-
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विश्व सिनेमा में वीर रस की फिल्में (भाग- २)


(...पिछले अंक से आगे)
शत्रु से लड़ाई को दर्शाती वीर रस की फिल्में
अब चर्चा करते हैं उन फिल्मों का जिसमें उत्साह का साधारण अर्थ लिया जाता है, मतलब शत्रु से युद्ध।  इस अर्थ में वीरता के लिये आवश्यक है कि कोई शत्रु हो। कई परिस्थितियों में यह व्यक्तिगत शत्रु होता है, कई बार जोखिम भरे कामों में हर तरह की बाधा को शत्रु समझा जाता है, बहुधा शत्रु समाज का शत्रु होता है, या उसे समाज का शत्रु की तरह पेश किया जाता है। सेना में परीक्षण के दौरान यह सिखाया जाता है कि जिसपे निशाना चलाया जा रहा है वह शत्रु है। सैनिक का काम शत्रु की पहचान करना नहीं, बल्कि उससे हट कर मात्र शत्रु को समाप्त करना हो जाता है। लेकिन उत्तम कोटि के वीर अपने शत्रु की पात्रता देखते हैं। जितना बड़ा वीर, उतना बड़ा शत्रु। वीरों को अपने बराबर के शत्रु से लड़ना चाहिये. अगर शेर चूहे शिकार करे तो क्या कहा जा सकता है? इसलिये महावीर, महानायक या सुपरहीरो के फिल्मों के कथानक में शत्रु या बाधा या दुर्घटना का अर्थ भी बहुत बड़ा करना पड़ता है। मिसाल के तौर पर Superman (1978) फिल्म में अंत में नायक की असीम क्षमता को दिखाने के लिये वह असंभव कार्य करते, यहाँ तक कि समय का चक्र बदलता नजर आ जाता है। Spiderman(2002, 2004, 2007, 2012, 2014) फिल्मों में हर बार बेहद ताकतवार खलनायक नजर आते हैं। बैटमैन फिल्में Batman Series (The Dark Knight वगैरह) जिनमें बैटमैन केवल अपने बुद्धि और शक्ति से दुश्मनों को पराजित करता है वे परालौकिक न हो कर बैटमैन की तरह ही बुद्धिमान और शक्तिशाली नजर आते हैं।
भारतीय दृष्टिकोण से वीरों के चिंतन पर कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान लिखती हैं कि वीरों का कैसा हो वसंत’ :-

गलबाँहें हों या हो कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण
अब यही समस्या है दुरंत -
वीरों का कैसा हो वसंत

भारत में शूरवीरता का पारंपरिक चित्रण करना हो तो तत्क्षण शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह जैसे नायकों का ध्यान आता है जिनके पास तलवार, कटार, खंजर, ढाल जैसे अस्त्र होंगे, भाला जैसा शस्त्र होगा, और एक मजबूत कद काठी का घोड़ा वाहन होगा। लेकिन अब औद्योगिक क्रांति के बाद घोड़े, तलवार, खंजर पुरानी बातें हो गयीं। यहाँ वीरता का अर्थ एक पुरुष कर एक या दो-तीन लोगों से युद्ध हो जाता है। कभी किसी कथानक में कोई नायक एटम बम ले कर एक साथ सब कुछ समाप्त करने के लिए उद्धत नहीं दिखायी देता, बल्कि ऐसा करने वाला खलनायक दिखलाये जाते हैं। सिनेमा में शूरवीर हमेशा किसी किस्म की बन्दूक ले कर चलेंगे।

वीर रस की फिल्मों में वेस्टर्न फिल्में अक्सर सराही जाती हैं। वेस्टर्न मूवीज उन फिल्मों को कहते हैं जो उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में (पश्चिम में - अत: वेस्ट में) स्थित वहाँ के मूल निवासियों से युद्ध करता निशानेबाज नायक घोड़े पर चलता हो, और बन्दूक से लोगों मुकाबला करता नज़र आता हो। यह फार्मूला बहुत चला और अभी तक चलता ही आ रहा है। लेकिन इसको कला के रूप में स्थापित करने वाले थे महान आयरिश मूल के अमेरिकी निर्देशक जॉन फोर्ड John Ford (1894 – 1973), जिन्हें कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया। उनकी फिल्म Stage Coach (1939) को ऑर्सन वेल्स ने Citizen Kane (1940) बनाने से पहले चालीस बार देखी थी। अकिरा कुरोसावा अपनी फिल्मों पर उनकी वेस्टर्न फिल्मों का गहरा प्रभाव मानते थे। सत्यजित राय, फेडेरिको फेलिनी, इंगमार बर्गमन, मार्टिन स्कोरसीज, झों लुक गोडार्ड, अल्फ्रेड हिचकॉक, क्लाइंट ईस्टवुड जैसे निर्देशक उनका लोहा मानते थे। जॉन फोर्ड की The Informer (1935), Stage Coach (1939), The Grapes of Wrath (1940), How Green Was My Valley (1941), The Searchers (1956), The Man Who Shot Liberty Valance  (1962) विश्व सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। वीरता को दर्शाने के लिए उन्होंने नायकों में मति, गर्व, क्रोध जैसे भावों को दर्शाया। कई बार उनका नायक उदार, दयालु, किन्तु जिद्दी और अदम्य शारीरिक क्षमता रखने वाला हुआ करता। जमीन से जुड़ा उनका नायक रेगिस्तान को पार करता, बड़े पहाड़ों पर चढ़ता, बरसती गोलियों से जूझता निर्बल लोगों की रक्षा करता।
ऑस्ट्रिया में जन्मे अमेरिकी फिल्मों के निर्देशक Fred Zinnemann (1907- 1997) की कई फिल्में वीर रस पर आधारित थी। इसमें High Noon (1952) वास्तविक समय सीमा में दिखायी गयी शानदार फिल्म है, जिसमें नायक गैरी कूपर अपनी शादी के दिन ही टाउन मार्शल होने के नाते शहर में आये गुंडों के गिरोह से जान हथेली पर लिए अकेला ही भिड़ जाता है। उनकी From Here to Eternity (1953) में पर्ल हार्बर से ठीक पहले सैनिकों का जीवन दिखाते कर्तव्य प्रतिबद्धता, और फिल्म A Man For All Seasons (1966) में मध्यकालीन इंग्लैंड में एक मंत्री का अपने विचारों और कर्तव्यों से प्रतिबद्धता बहुत सुन्दर रूप से दिखायी गयी हैं। फिल्म The Day of the Jackal (1973) में फ्रांस के राष्ट्रपति के हत्या का षड़यंत्र को विफल करने में लगे नौकरशाह की वीरता का वर्णन है।

अगर हम हिन्दी फिल्मों की तरफ नज़र दौड़ाये तो यहाँ सर्वशक्तिमान, बुद्धिमान, बलवान, निशानेबाज, भरोसेमंद नायकों का दौर अमिताभ बच्चन के उदय के साथ होता है। फिल्म शोले (1975) कई वेस्टर्न फिल्मों जैसे अकिरा कुरोसावा की महान फिल्म Seven Samurai (1954) पर आधारित The Magnificent Seven (1960), इटालियन निर्देशक सेर्जो लिओने Sergio Leone (1929 – 1989) की बिना नाम वाले नायक की तीन फिल्में- For A Few Dollars More (1965) (अकिरा कुरोसावा की  Yojimbo (1961) पर आधारित),  The Good, The Bad and the Ugly (1966), और Once Upon A Time in The West (1968);  Sam Peckinpah (1925 –1984) की The Wild Bunch (1969) और  दो बैंक डकैतों की सच्ची कहानी पर आधारित The Butch Cassidy and Sundance Kid (1969) जैसी बहुचर्चित फिल्मों से प्रेरित थी। क्या किसी प्रबुद्ध दर्शक को इन फिल्मों को नहीं देखना चाहिये, जब कि आज के दौर में ऐसी फिल्में इंटरनेट पर सुलभ हो गयी हैं।


अमेरिकी निर्देशक Sam Peckinpah (1925 –1984) आजीवन वीर और वीभत्स रस से जुड़ी फिल्में बनाते रहे। द्वितीय विश्वयुद्ध की घटनों पर आधारित Cross of Iron (1977) में वीरता, कर्त्तव्य और पुरस्कार की अच्छी विवेचना की गयी है। उपरोक्त वेस्टर्न फिल्मों में वीरता दर्शाने के लिए बदले की भावना, बदला लेने के लिए हिंसा, निशानेबाजी, सुन्दर स्त्रियों के द्वारा नायक का अभीष्ट होना दिखाया जाता है। यहाँ सुभद्रा कुमारी चौहान में वीरता के मानक को छिन्न-भिन्न करते गलबाँहें, कृपाण, चलचितवन, धनुषबाण, रसविलास, दलितत्राण, सारे चीजें वीरों के वसंत में दिखायी जाती हैं। यह भी स्मरणीय है कि ये कोई जरुरी नहीं है कि वीरता के ऐसे पश्चिमी मानक श्रेष्ठ हों। लेकिन आम दर्शक अक्सर ऐसी गलती कर बैठते हैं।

इस तरह से जॉन फोर्ड से प्रभावित हो कर, वीर रस की महान फिल्म बनाने वालों में सर्वेश्रेष्ठ जापानी निर्देशक अकिरा कुरोसावा को कहा जा सकता है, जिनकी  Seven Samurai (1954),  The Hidden Fortress (1958), Yojimbo (1961), और High and Low (1963) में उत्साह भाव के कई अनछुये एवं शाश्वत आयाम जुड़े हैं। इन फिल्मों पर चर्चा करने से ठीक पहले हमें कायरता और वीरता पर चर्चा करनी चाहिये। आमतौर पर कायर उसे कहा जाता है जो कि ज़ोखिम भरे कामों से डरता हो, जहाँ पर कार्य सिद्धि होनी चाहिये, वहाँ बहाना बना कर कन्नी काट लेता हो। कायरता की परिभाषा ऐसे भी दी जाती है कि यह एक ऐसा भाव है जहाँ पर मानव की आकांक्षा किसी डर से अवरुद्ध हो जाती है जिससे उसके बराबरी के लोग करने का साहस रखते हैं। किसी कमजोर, जीर्ण-शीर्ण, वृद्ध आदमी से शारीरिक वीरता अपेक्षित नहीं होती। यदि हमारे सामने कोई ऐसा लक्ष्य रख दिया जाए जहाँ पर हमारी हार सुनिश्चित हो, तो क्या उसे नकारना कायरता माना जाएगा? उदहारण के तौर पर, अगर हमें किसी पहाड़ से खाई में सकुशल कूदने को कहा जाये, निश्चय ही हमारा डर कायरता में नहीं माना जायेगा। अगर हमारे सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम हो, फिर कुछ जोखिम हो, जैसे कि पैराशूट लगा कर ऊँचाई से हवा में कूदना, काफी ऊँचाई से एक रस्सी किसी बाँस के सहारे चलना, ऐसे करतब करने के लिए हमारे कायरता का पैमाना एक वर्ग विशेष से सम्बंधित हो जाएगा, जो ऐसे काम करने में सिद्धहस्त हो। फ्रेंच निर्देशक Henri-Georges Clouzot की The Wages of Fear (1953) में वीरता और कायरता के बहस के दौरान एक पात्र कहता है कि युवा लोग जोखिम उठा लेते हैं क्योंकि उनके पास पर्याप्त अनुभव नहीं होता, और चालीस के उम्र का आदमी बहादुरी का सही मतलब समझता है।

कुरोसावा की फिल्मों में वीरता को हमेशा कायरता के वैषम्य में दिखाया जाता रहा है। फिल्म Seven Samurai (1954) के निर्माण के दौरान कई लोगों को गाँव वालों के विशिष्ट चरित्रों में ढाला गया, इसके बाद शूटिंग शुरू की गयी। फिर सात समुराई योद्धाओं द्वारा कमजोर गाँव वालों को आत्म रक्षा के लिए तैयार करना, फिल्म का बड़ा हिस्सा है। इस फिल्म की शुरुआत में यह डायलॉग है- घाटी के एक छोटे से गाँव में चार समुराई योद्धा की कब्रें हैं। जब जापान महत्वकांक्षी समुराई से टूटा फूटा था, ये कहानी है सात समुराई योद्धाओं की, जिन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए नहीं बल्कि गरीब किसानों के रक्षा के लिए युद्ध किया। इनमें तीन जो नहीं मरे, उन्होंने गाँव छोड़ दिया और फिर कभी उनके बारे में कभी सुना नहीं। लेकिन जिस बहादुर और आत्म बलिदान की भावना से उन्होंने लड़ाई लड़ी, वह आज भी बड़े सम्मान के साथ याद की जाती है। वे समुराई थे.दलितत्राण और यश की अनिच्छा, न्याय की प्रति निष्ठा, दया और शौर्य जैसे मूल्यों से सजी यह फिल्म विश्व सिनेमा की व्यवसायिक रूप से सफलतम और आलोचकों द्वारा सर्वाधिक सराही फिल्मों में से एक गिनी जाती है। निर्देशक जौर्ज़ लुकास George Lucas (जन्म 1944) की सफल फिल्म Star Wars Episode IV: A New Hope (1977) कुरोसावा की The Hidden Fortress (1958) से बहुत प्रभावित थी, जिसमें एक सेनापति अपनी राज्य की राजकुमारी की रक्षा में एक गुप्त किले में रह रहा होता है। दो गरीब, लालची और डरपोक किसान सोने की लालच में सेनापति और राजकुमारी को एक पड़ोसी देश तक ले जाने के सफ़र में उनके सहयात्री बन जाते हैं। इस श्वेत श्याम फिल्म में घाटी में छुपा गुप्त किला, एक राज्य का जल में छुपा गुप्त धन, खूबसूरत राजकुमारी की चपलता और न्याय प्रियता, प्रसिद्ध और महान तलवारबाज सेनापति का शौर्य जैसे तत्व इसके कथानक और दृश्य को अनुपम बना देते हैं। इस फिल्म को देख कर हमें अफसोस होता है कि आज तक हिन्दी फिल्म सिनेमा उद्योग चंद्रकांता’, ‘चंद्रकांता संततिऔर भूतनाथजैसे महान रोमांचक कहानियों पर एक भी फिल्म न बना सका। क्या हमारे पास अच्छे संवाद लेखक नहीं हैं, या निर्माताओं के पास पैसे नहीं, या अच्छे निर्देशकों का सर्वथा आभाव है?
कुरोसावा की Yojimbo (1961) में महान अभिनेता तोशिरो मिफ्यून ने एक समुराई का किरदार निभाया है जो एक छोटे से शहर में दो गैंग की लड़ाई के बीच अपने बुद्धि और शौर्य से बदमाशों का अकेले ही खात्मा कर देता है। फिल्म के क्लाइमेक्स में अकेला समुराई बहुत सारे गुंडों पर भारी पड़ता है और सब का वध कर डालता है। इस फिल्म में गुण्डे मंदबुद्धि और कायर दिखाये गये हैं। फिल्म High and Low (1963) एक पुलिस ड्रामा है, जिसमें एक अमीर आदमी के ड्राईवर के बेटे का अपहरण हो जाता है। जबकि अपहरण अमीर आदमी के बेटे का करना होता है, पर अपहरणकर्ता उस अमीर आदमी को फिर भी उतनी ही रकम देने के लिए बाध्य करता है। चूँकि अमीर आदमी के ड्राईवर का एक ही बेटा होता है, अपनी पत्नी के दवाब में आ कर फिरौती चुकता कर के बच्चे को छुड़ा लेता है। इसके बाद पुलिस उस बदमाश का पता लगाती है। यह उदहारण है कि रहस्य-रोमांच की फिल्में कई बार उत्साह और भय भाव के बीच झूलती रहती हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिये कि रस कुछ दृश्यों में कुछ क्षणों में होता है। कोई भी स्थायीभाव हमेशा नहीं रह सकता। 
कुरोसावा की उपरोक्त फिल्में संवाद से ज्यादा कलाकारों के अभिनय, सातिव्क भाव, अंग प्रत्यंग की गतियों से सुशोभित रहीं। इन फिल्मों के दृश्य भी यादगार रहे। कुछ फिल्म विशारद- जैसे कि कुरोसावा, ऑर्सन वेल्स, बर्गमैन, तारकोवस्की, अल्फ्रेड हिचकॉक दृश्यों की परिकल्पना, शूटिंग का कोण, सेट पर कथानक से कहीं ज्यादा ध्यान देते रहे। उनकी तकनीकें कथानक, अभिनय, पार्श्व संगीत पर कई बार हावी पड़ती रही। इसलिए कई बार फिल्म विशारदों की फिल्म कई कई बार देखना भी रुचिकर अनुभव होता है।


सेर्जो लिओने की डॉलर ट्रायोलॉजी से मशहूर हुये क्लाइंट इस्टवुड ने Dirty Harry फिल्म सीरिज  (1971, 1973, 1976, 1983, 1986) में एक इंस्पेक्टर को अपराध से लड़ते हुये दिखाया और बेहद लोकप्रियता पायी। उनकी निर्देशित Unforgiven (1992) औऱ Million Dollar Baby (2004) ने ऑस्कर सम्मान पाया। फिल्म Unforgiven (1992) में एक बूढ़ा निशानेबाज पैसों के लिये कुछ बदमाश लोगों का कत्ल करने निकलता है और इस यात्रा में वीरता के साथ सहृदयता, कर्त्तव्यबोध, समझ, और हत्यारे की नृशंसता का अद्भुत चित्रण है।

नायकों का चरित्र सुदृढ हो यह आवश्यक नहीं। चिड़चिड़ा, रूखा, वक्री स्वाभाव का नायक किसी अपराध में लिप्त या उसको सुलझाता, कत्ल की वारदात, जिसमें अपूर्व खतरनाक सुंदरियों का छल कपट हो, ऐसे फार्मूलों से भरी श्वेत श्याम न्वायर फिल्में (film noir) चालीस औऱ पचास के दशक में काफी चलती थी। फिल्मों के इतिहास के अध्ययन में यह याद रखना चाहिये कि अधिकांश फिल्में काफी लागत से बनती थी। कई अच्छे निर्देशक केवल फिल्में बनाने अमेरिका बस गये (जैसे चार्ली चैप्लिन, अल्फ्रेड हिचकॉक आदि)। अमेरिकी फिल्मों ने दुनिया भर की फिल्मों को प्रभावित किया। कई बार इस वजह से कि फिल्में तकनीक से अलग नहीं रही, और तकनीक को ले कर नवीनतम प्रयोग (जैसे बोलती फिल्में, रंगीन फिल्में, त्रिआयामी फिल्में) हॉलीवुड में होते रहे। फिल्म न्वायर अपनी श्वेत श्याम की सिनेमेटोग्राफी की खूबसूरती के लिये जाना जाता है। इन फिल्मों के नायक की वीरता सफल कम ही रहती है। लेकिन वीर हमेशा अच्छे औऱ विजयी हों, यह किसी भी तरह आवश्यक नहीं।

अमेरिकी निर्देशक John Houston (1906- 1987) की दो फिल्में जिसमें हम्फ्रे बोगार्ट Humphrey Bogart (1899- 1957) ने अभिनय किया - The Maltese Falcon (1941), The Treasure of Sierre Madre (1948) इन दोनों में नायक रूखा और चिड़चिड़ा रहता है। The Treasure of Sierre Madre में नायक पर लालच का बुरा प्रभाव नायक की दुखद मौत के रूप में नजर आता है। हॉलीवुड में कई कम बजट की न्वायर फिल्में बनी, जिनमें Out of Past (1947) उल्लेखनीय है।  Billy Wilder की न्वायर फिल्म Double Indeminity (1944) का हिन्दी संस्करण जॉन अब्राहम और बिपाशा बसु की जिस्म (2003) के रूप में हिन्दी फिल्म प्रेमियों के सामने आया था। ऑर्सन वेल्स की न्वायर Lady from Shanghai (1947) को स्टूडियो ने निर्ममता से काट-पीट कर दर्शकों के सामने पेश किया। यह फिल्म भले ही पिट गयी, पर इसको देख कर समझा जा सकता है कि जीनियस और साधारण निर्देशक की दृष्टि में कितना फासला हो सकता है। ऑर्सन वेल्स की अभिनीत, कॉरल रीड द्वारा निर्देशित न्वायर फिल्म The Third Man (1949) को दुनिया की महानतम फिल्मों में गिनी जाती है।
 कई फिल्मों में नायक राज्य का प्रतिनिधि होता है या राज्य के विरूद्ध राजनैतिक कारणों से खड़ा होता है। जेम्स बॉण्ड फिल्म सीरिज का नायक इंगलैण्ड की महारानी की सेवा में रत है। स्टैनले क्यूब्रिक की ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित Spartacus (1960) में नायक दासों के अधिकारों के लिये लड़ने को खड़ा होता है। मेल गिब्सन की Braveheart (1995) में नायक स्कॉटलैण्ड की आजादी के लिये लड़ रहा होता है। रिडली स्कॉट की Gladiator (2000) में एक पूर्व सैन्य अधिकारी दुर्भाग्य से बंदी बन जाता है और शेर से युद्ध करता है।
चीनी मार्शल आर्ट फिल्मों में ब्रुस ली की आखिरी फिल्म Enter The Dragon (1973) के पहले ही दृश्य में ब्रुस ली का गुरू उसे वीरता की दार्शनिकता का पाठ पढ़ाता है। हर महान वीर को अपने युद्ध कौशल का प्रयोग नीति और न्याय के लिये करना चाहिये। वैसे उदाहरण जिसमें नायक केवल अपने कौशल से बुद्धिमान पर कमजोर वैज्ञानिक की रक्षा करता है, कथानक की दृष्टि से कमजोर और शाश्वत मानदंडों मे कमजोर आँके जाते हैं। इस फिल्म में बदले की आग में जलता नायक एक हथियार प्रतिबंधित द्वीप में निहत्थे दुश्मनों को धूल चटा देता है। हाल की मार्शल आर्ट फिल्में Crouching Tiger, Hidden Dragon (2000), Hero (2002), और House of Flying Daggers (2004) में तकनीक, दृश्य की भव्यता, वीरता की विडम्बना का सुंदर चित्रण है।  Crouching Tiger, Hidden Dragon में महान योद्धा एक बदमिजाज राजकुमारी को दण्ड के बजाये युद्ध कौशल की शिक्षा देना चाहते हैं। Hero (2002) फिल्म में नायक राजनैतिक एकीकरण के लिये अपने मिशन में हार जान ठीक समझता है।  House of Flying Daggers में नायक प्रेम और कर्त्तव्य में फँस जाता है। युद्ध कौशल की दृष्टि से उत्साह के सुंदर वर्णन के लिये फिल्मों का यह आरूप वीभत्स, भयानक रस को कई बार छूता नजर आता है।
अब  चर्चा करते हैं खलनायकों के महिमा मंडन या उनकी वीरता की। ऐसी एंटी हीरो वाली कई फिल्मों में नायक चोर, लुटेरा, या गुण्डो को सरगना होता है। अमेरिकी निर्देशक Francis Ford Coppola ( 1939) की Godfather फिल्म सीरिज में एक माफिया का सरगना के अहं और गर्व को उत्साह का स्वरूप दिखाया गया है। चोरी करने वाली फिल्में जैसे Ocean's 11 (1960) और The Italian Job (1967, दोबारा बनायी गयी और लोकप्रिय भी हुयी। लेकिन डकैती के सच्चे मामले पर आधारित ऑर्थर पेन की बनायी विख्यात Bonnie & Clyde (1967) में अपने बचाव के लिये कविता लिखती लुटेरी नायिका का अभिव्यक्ति जताना दर्शकों के दिल को छू जाता है। पुलिस ऑफिसर की काम पर बनी विलियम फ्रेडकिन की The French Connection (1971) का पीछा करने वाला दृश्य बहुत ही उत्साहजनक बन पड़ा है।

अगले अंक में चर्चा करते हैं कारूण्य रस की।

Sunday, October 19, 2014

जिसे दुनिया मनमोहन देसाई कहती थी!

महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में ड्रामा से अधिक मेलोड्रामा का तत्त्व हावी रहा, मेलोड्रामा बढ़ते ही मनमोहन देसाई की याद आती है. मुझे याद आता है कमलेश्वर जी कहते थे कि हिंदी का लेखक फ़िल्मी दुनिया में सफल इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि वह अपने फ़िल्मी लेखन को मजबूरी का लेखक मानता है, वह उसमें विश्वास नहीं करता है. जबकि मनमोहन देसाई जब यह दिखाते हैं कि शिर्डी के साईं बाबा की पूजा करने से आँखों की रौशनी वापस आ जाती है, तो लोग उसमें इसलिए विश्वास कर लेते हैं क्योंकि मनमोहन देसाई खुद उसमें विश्वास करते हैं. बहरहाल, आज न मनमोहन देसाई का जन्मदिन है न उनकी पुण्यतिथि. बस, त्रिपुरारि कुमार शर्मा का यह लेखा पढ़ा तो साझा करने का मन हुआ- प्रभात रंजन 
किसे ख़बर थी कि हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में 70 और 80 के दशक का सबसे चमकता हुआ चेहरा—जो हमेशा परदे के पीछे अपना वक़्त बुनता रहा—इस तरह ज़िंदगी से उकता जाएगा? हज़ारों नामों को ज़िंदगी और हज़ारों ज़िंदगियों को नाम बख़्शने वाला शख़्स—एक दिन ख़ुद गुमनामी के गंदे पानी में गर्क़ हो जाएगा? जिसकी सुलगती हुई साँसें महज मज़ाक बन कर रह जाएंगी और जिसके कारनामे लोगों के ज़ेहन में कतराती हुई कतरनें पैदा करती रहेंगी। वो कहते है न! कि कामयाबी अपना क़ीमत वसूल करती है। सच ही कहते हैं। 1 मार्च 1994 को उसकी ज़िंदगी ने इस बात पर मुहर लगा दी। सिनेमा, जिसे लार्जर देन लाइफ़ की वजह से हम अक्सर सफ़ेद झूठ भी कहते हैं—का दूसरा पहलू यानि सिनेमा का सियाह सच! जहाँ एक ओर कैमरे के आगे मुस्कुराते हुए चेहरे मैग्नेटिक जान पड़ते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं चेहरों का टूटता हुआ क्वाँरापन हमारी नींदें धज्जियाँ करने के लिए काफी होता है। मैं बात कर रहा हूँ उस शख़्स की, जिसे दुनिया मनमोहन देसाई कहती है।
...लेकिन मैं आपको थोड़ा पीछे लिए चलता हूँ। जहाँ से सफ़र की शुरुआत हुई थी।
याद कीजिए...हिंदी सिनेमा का वो दौर जब चारों तरफ राजकपूर का जलवा था। न सिर्फ़ देश में बल्कि विदेशों में भी राजकपूर की फ़िल्में कामयाब थीं। एक दिन महज 21 साल का एक लड़का राजकपूर के ऑफ़िस में आता है और कहता है
“मैं आपको अपनी फ़िल्म में कास्ट करना चाहता हूँ।”
राजकपूर ये सुनकर चौंक जाते हैं। टेबल के दूसरी तरफ वो 21 साल का लड़का अब भी अपनी कुर्सी में बेख़ौफ़ बैठा हुआ है। साथ में बैठा हुआ प्रोड्युसर कहता है
“राज...मत भूलो कि जब तुमने बरसात बनाई थी, तुम 24 साल के थे।”
राजकपूर अपनी कुर्सी से उठ खड़े होते हैं। इधर-उधर टहलने लगते हैं। अचानक खिड़की के पास रुक जाते हैं। बाहर देखने लगते हैं। कुछ देर बाद बस इतना कह पाते हैं
“मैं एक सिड्युल शूट करुंगा, अगर इस लड़के में कोई बात नज़र आई तो ठीक वरना मेरी तरफ से ना।”
ख़ैर, वो दिन भी आया जब शूटिंग हुई और रसेस देखकर राजकपूर बोले—
“ये लड़का बहुत दूर तक जाएगा।”
वो 21 साल का लड़का और कोई नहीं, मनमोहन देसाई था।
फ़िल्म थी—छलिया।
गाना था—डम डम डिगा डिगा मौसम भीगा भीगा।
ये गाना कितना मशहूर है, मुझे कहने की ज़रूरत नहीं। 
मशहूर फ़िल्मकार मनमोहन देसाईजिसकी दिमाग़ी उपज को फ़िल्म समीक्षकों ने महज मसाला फ़िल्म कहकर पुकारा—कहना ग़लत न होगा कि वह समय और समाज की नीली नसों में अपनी रचनात्मकता का लहू भर कर हिंदी फ़िल्मों के दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर देता था। वह जानता था कि लोग क्या चाहते हैं? उसे मालूम था कि आम आदमी की मानसिकता किस मुहाने पर आकर नाच उठती है? उसे पता था कि चीज़ों का इस्तेमाल कैसे किया जाता है? चीज़ें, चाहे फिर लोगों की सेंटीमेंट से ही जुड़ी हुई क्यों न हो? यही वजह है कि उसकी फ़िल्मों के दीवानों में हर वर्ग के लोग शामिल हैं—क्या ख़ास, क्या आम! हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा को नई दिशा दिखाने वाले मनमोहन देसाई की सबसे चर्चित फ़िल्म अमर, अकबर, एंथनी की बात करें, तो बिछड़ने और दोबारा मिलने के फॉर्मूले पर बनी यह फ़िल्म बेहद कामयाब हुई। यह बात ग़ौर करने जैसी है कि अपने दर्शकों के सामने सिनेमा स्क्रीन पर एक पूरी दुनिया रचने वाले मनमोहन देसाई की फ़िल्म के इस फॉर्मूले से प्रेरित होकर अन्य फ़िल्मकारों ने भी कई फ़िल्में बनाईं।
बताता चलूँ कि 1943 में प्रदर्शित फ़िल्म किस्मत’, जिसमें अशोक कुमार हीरो थे और बाद में राज कपूर स्टारर आवारा में बिछुड़ने-मिलने के थीम को भूनाने की कोशिश की गई थी। कोशिश तो कामयाब नहीं हुई, मगर मनमोहन देसाई ने इसी थीम का उपयोग अपनी फ़िल्मों के लिए किया। 40 के दशक की अंधी थीम, 70 और 80 के दशक में आँख बनकर उभरी। मनमोहन देसाई ने अपने तीस साल लंबे फिल्मी करियर में 20 फिल्में बनार्ईं, जिनमें से 13 फिल्में सफल रहीं। फ़िल्म समीक्षकों का मानना है कि इतनी सफलता हिंदी फ़िल्मों के किसी दूसरे फ़िल्मकार को नहीं मिली। जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 70 के दशक में मनमोहन देसाई की फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रखा था। फ़िल्मों के लिए सबसे कामयाब साल 1977 रहा। उस साल उनकी चार फिल्में परवरिश’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘चाचा भतीजा और धरम-वीर प्रदर्शित हुईं और सारी सुपर हिट रहीं। पहली दो फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन हीरो थे, जबकि बाद की दो फ़िल्मों में धर्मेद्र ने काम किया था।
मनमोहन देसाई, सच्चे मायनों में अपने समय के सम्पूर्ण और शुद्ध मनोरंजन परोसने वाले ऐसे फ़िल्मकार थे—जिन्होंने व्यावसायिकता को सामाजिकता के साथ घोल दिया--जिनकी फिल्मों में व्यावसायिकता को विस्तार मिला, तो हीरो की इमेज को भी नया आयाम मिला। देसाई अपनी फ़िल्मों को लेकर काफी उत्साहित और सकारात्मक रहते थे। अमिताभ बच्चन ने एक दफ़ा अपने ब्लॉग पर लिखा भी था, “मनमोहन देसाई कलाकारों की ओर दर्शकों का ध्यान न होने पर बेहद नाराज हो जाते थे। वे, उस थिएटर में कभी नहीं जाते, जिसमें उनकी फिल्में चल रही हों। ऐसा नहीं था कि वे वहां जाना नहीं चाहते। दरअसल, उनके सहयोगी और स्टाफ वहां नहीं जाने देते। इसकी एक खास वजह थी। उनकी आदत थी कि उनकी फ़िल्मों की स्क्रीनिंग के दौरान कोई बात करे या हॉल के बाहर जाए, तो वे बेहद गुस्से के साथ या तो उसे चुप करा देते या फिर बिठा देते और बाहर नहीं जाने देते।"
कॉमर्शियल सिनेमा को नई रवानी और बुलंदी देने वाले मनमोहन देसाई को फ़िल्मी माहौल विरासत में मिला था। उनका जन्म 26 फरवरी 1936 को गुजरात के वलसाड शहर में हुआ था। पिता किक्कू देसाई फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े थे। वे पारामाउंट स्टूडियो के मालिक भी थे। घर में फिल्मी माहौल रहने के कारण मनमोहन देसाई का रूझान बचपन के दिनों से ही फ़िल्मों में था। बतौर निर्देशक मनमोहन देसाई की पहली फ़िल्म छलिया 1960 में रिलीज हुई। यह बात और है कि राजकपूर और नूतन जैसे कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर रंग नहीं जमा सकी। हाँ, इतना ज़रूर हुआ कि फ़िल्म के गीत काफी लोकप्रिय हुए। इसके बाद मनमोहन देसाई ने अभिनेता शम्मी कपूर की ब्लफ मास्टर और बदतमीज को निर्देशित किया, लेकिन इस बार भी देसाई के हाथों में निराशा ही आई। यह असफलता तो महज भूमिका थी उस फ़िल्मकार के पैदा होने की, जिसे कामयाबी के नए-नए मुकाम हासिल करने थे।
हुआ यूँ कि 1964 में मनमोहन देसाई को फ़िल्म राजकुमार निर्देशित करने का मौक़ा मिला। हीरो थे—शम्मी कपूर। इस बार मेहनत ने अपना रंग जमा ही लिया और फ़िल्म की सफलता ने देसाई को बतौर निर्देशक एक पहचान दी। फिर मनमोहन देसाई निर्देशित और 1970 में प्रदर्शित सच्चा झूठा भी करियर के लिए अहम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म के हीरो थे—उस जमाने के सुपर स्टार राजेश खन्ना। सच्चा झूठा बॉक्स आफिस पर सुपरहिट रही। इसी बीच मनमोहन देसाई ने भाई हो तो ऐसा (1972), ‘रामपुर का लक्ष्मण (1972), आ गले लग जा (1973), औररोटी जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया, जिसे दर्शको ने ख़ूब सराहा। 1977 में बनी फ़िल्म अमर अकबर एंथनी मनमोहन देसाई के करियर में न सिर्फ सबसे सफल फिल्म साबित हुई, बल्कि उसने अभिनेता अमिताभ बच्चन को वन मैन इंडस्ट्री के रूप में भी स्थापित कर दिया।
इसी फ़िल्म के बारे में ज़िक्र करते हुए अमिताभ बच्चन ने एक दफ़ा कहा था कि संयोगों और अतार्किकताओं से भरी ये कहानी सिर्फ मनमोहन देसाई के दिमाग़ का फितूर है। आज भी हम उस फिल्म के पहले दृश्य को देखकर हँसते हैं। एक नली से तीनों भाइयों का खून सीधा माँ को चढ़ता हुआ दिखाया जाना एक मेडीकल जोक है। इन सबके बावजूद कुछ है, जिसने देखने वाले से सीधा नाता जोड़ लिया। सारी अतार्किकतायें पीछे छूट गईं और कहानी अपना काम कर गई। एक बात याद दिलाने जैसी है कि मनमोहन देसाई की फ़िल्मों के गाने हमेशा से अच्छे होते हैं। इसी सिलसिले में फ़िल्म अमर अकबर एंथनी के सभी गाने सुपरहिट हुए, लेकिन फिल्म का एक गीत हमको तुमसे हो गया है प्यार... कई मायनों में ख़ास है। एक तो यह कि इस गीत में पहली और आख़िरी दफ़ा लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मुकेश, और किशोर कुमार ने एक साथ गाया था।
कुछ और बातें बताता चलूँ। राजकुमार (1964) और क़िस्मत (1968) की कहानी लिखने वाले मनमोहन देसाई ने 1981 में निर्मित फ़िल्म नसीब जिसके एक गाने जॉन जॉनी जर्नादन... में सितारों का जमघट लगा दिया था। यह अपनी तरह का पहला मौक़ा था, जब एक गाने में फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े कलाकार मौजूद थे। इसी गाने के तर्ज़ पर शाहरुख ख़ान की फ़िल्म ओम शांति ओम में एक गाना फ़िल्माया गया है। मनमोहन देसाई के निर्देशन में बनी फ़िल्म क़िस्मतका एक गाना है—कजरा मोहब्बत वाला, अंखियों में ऐसा डाला, कजरे ने ले ली मेरी जान, हाय! मैं तेरे क़ुर्बान। कहा जाता है कि वे अभिनेता विश्वजीत की सुन्दरता से प्रभावित होकर उन्हें अपनी फ़िल्म के इस गीत में एक महिला किरदार के रूप में पेश किया था और गीत के बोलों को आवाज़ दी थी शमशाद बेगम ने। इस गीत को विश्वजीत के साथ नायिका बबीता के ऊपर फिल्माया गया था। बबीता के लिए आशा भोंसले की आवाज़ का इस्तेमाल किया गया था।
एक और क़िस्सा याद आता है। किसी पत्रिका में पढ़ी थी यह बात। बात 1963 की है। एक दफ़ा मनमोहन देसाई किसी सड़क से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने कुछ लोगों को दही-हांडी करते देखा। सन्योगवश उन्हीं दिनों ब्लफमास्टर’—जिसका स्क्रीनप्ले भी उन्होंने ही लिखा था—की शूटिंग चल रही थी। उन्होंने सोचा कि क्यों न फ़िल्म में इस तरह का कोई गीत डाला जाए? फिर क्या था, सारी कहानी ही बदल गई। बदलाव यह हुआ कि शम्मी कपूर को शायरा बानो के लिए कोई तोहफा खरीदना है। पास पैसे नहीं हैं। किसी से उन्होंने सुना कि ऊपर लटकी मटकी में 100 रुपए का नोट है। जो वहाँ तक पहुंचेगा और मटकी फोड़ लेगा, नोट उसी का। और इस तरह हिंदी फ़िल्मों में पहली बार दही-हांडी दर्शाई गई। इसके बाद तो कई फ़िल्मों में दही-हांडी की मस्ती दिखाई गई।
याद दिलाने की ज़रूरत नहीं कि 1983 में मनमोहन देसाई निर्देशित फ़िल्म कुली प्रदर्शित हुई थी, जो हिंदी सिनेमा जगत के इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करा गई। शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को लगी चोट और उसके बाद देश के हर एक पूजा स्थलों में अमिताभ के ठीक होने की दुआएँ मांगना एक अजीब-ओ-ग़रीब बात लगती है, मगर सच यही है। पूरी तरह से स्वस्थ होने के बाद अमिताभ ने कुली की शूटिग शुरू की और कहने की ज़रूरत नहीं कि फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई। कहा जाता है कि फ़िल्म-निर्माण के पहले फ़िल्म के अंत में अमिताभ बच्चन को मरना था, लेकिन बाद में फिल्म का अंत बदल दिया गया। 1985 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म मर्द जो देसाई के करियर की अंतिम हिट फ़िल्म थी। फ़िल्म का एक डॉयलाग मर्द को दर्द नही होता... उन दिनो सभी दर्शको की ज़ुबान पर चढ़ गया था। 1988 में गंगा जमुना सरस्वती देसाई द्वारा निर्देशित आख़िरी फ़िल्म थी, जो कमजोर पटकथा के कारण बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट गई। इसके बाद भी उन्होंने ने अपने चहेते अभिनेता अमिताभ बच्चन को लेकर फ़िल्म तूफ़ान का निर्माण किया, लेकिन इस बार भी फ़िल्म तूफ़ान बॉक्स ऑफिस पर कोई तूफ़ान नहीं ला सकी। फिर उसके बाद मनमोहन देसाई ने किसी फ़िल्म का निर्माण या निर्देशन नहीं किया। और इस तरह एक फ़िल्मकार ने अपने करियर का द एंड लिखा।
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Saturday, October 18, 2014

पड़ोसी की इमारत और कल्लन ख़ालू का दुख

सदफ नाज़ के व्यंग्य की अपनी ख़ास शैली है. व्यंग्य चाहे सियासी हो, चाहे इस तरह का सामाजिक- उनकी भाषा, उनकी शैली अलग से ही नजर आ जाती है. आप भी पढ़िए और बताइए- मॉडरेटर 
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हमारी मुंह-भोली पड़ोसन पिछले दिनों हमारे घर आईं तो काफी दुखी लग रही थीं। मुंह भी सूजा हुआ था। मालूम हुआ कि बिचारी हल्के डिप्रेशन और मौसमी तबियत की नासाजी से गुजर रही हैं। लेकिन दो समोसे एक पेस्ट्री और चाय के साथ जल्द ही उन्होंने दिल का असली अहवाल सुना डाला। पड़ोसन के दुख और तबियत की नासाजी की वजह उनकी फेवरेट ननद का सरप्राईज था। हुआ यूं कि पड़ोसन ने एक फैमिली फंक्शन के लिए लेटेस्ट डिजाइन वाले गोल्ड के नेकलेस और झुमके खरीदे थे। बिचारी मन ही मन खुश थीं कि फंक्शन के दिन पूरा इंप्रेशन जमेगा। कई तो जल-जल मरेंगी। लेकिन उनकी खुशी पर उस वक्त पानी फिर गया जब उन्हें मालूम हुआ कि उनकी फेवरेट ननद ने भी उसी फंक्शन के लिए डाइमंड के झुमके और नेकलेस खरीदे हैं। अब बिचारी पड़ोसन का ग़मज़दा होना लाज़िमी है क्योंकि कमबख़्त डायमंड के आगे उनके गोल्ड ज्वेलरी से कौन इंप्रेस होगा?

हमें दुखी करने के लिए हमारी सोसायटी में ऐसे हादसात होते ही रहते हैं। बात ऐसी है कि हम इंसान इतने रहमदिल हैं कि हमेशा ही दूसरों की ख़ातिर ग़मज़दा रहते हैं। हम अपने बैंक बैलेंस-आमदनी और जिंदगी से तब तक खुश नहीं होते जब तक कि यह साबित न हो जाए कि हमारे कलिग-पड़ोसी-रिश्तेदार के मुकाबले हमारा पलड़ा भारी है। ख़ुदा ना ख़ास्ता पड़ला हल्का हो गया तो दिल का दर्द बढ़ जाता है। साइंसदान भी मानते हैं कि ये हम इंसानों की पुश्तैनी(जैविक) आदत है कि हम हर चीज को दूसरों से मुआज़नह (तुलना) करने के बाद ही खुद की हैसियत-पैसे-हालात की सही-सही कीमत आंक पाते हैं। हमारी जुब्बा ख़ाला भी कहती हैं कि  इंसान अजीबुल फितरत (अलग प्रकृति)होता है, इसे अपने दुख और कमियां तो बर्दाश्त होती हैं, लेकिन दूसरों की ख़ूबीयां और खूशी बिलकुल भी नहीं!’

अगर जुब्बा ख़ाला पर आपको शक है तो आप खुद ही इसकी बानगी देखिए कि अक्सर बरसों तक बिना तरक्की के भी खुश-ख़र्गोश के मज़े लूटने वाले लोगों को जैसे ही पता चलता है कि उनके कलिग की तरक्की हुई है; बिचारों की सारी खुशी छू हो जाती है। और दुखी दिल से कैलकुलेशन करने लगते हैं, कि ओ....... फलां तो बॉस का चमचा रहा है, ढिमका ने जरूर तरक्की के लिए कोई जुगत लगाई होगी वगैरह-वगैरह! वैसे इस मामले में हमारी सोसायटी की मोहतरमाओं का हाल तो आप पूछिए ही मत! ये बिचारियां तो अपने नाज़ुक कांधो पर दूसरों के ही दुख उठाए फिरती हैं। इनकी पंसदीदा बीमारियां मसलन हल्का डिप्रेशन, हेडेक, मौसमी तबियत की नासाजी, मूड में फ़्लक्चुएशन और इस किस्म की जितनी भी बीमारियां हैं. अक्सर ननद, भाभी, देवरानी, जिठानी, सास, पड़ोसिन यहां तक कि दिलअज़ीज़ सहेलियों के दुख में ही वारिद होती हैं।यूं भी आप माने या ना माने दर्द भरे दिल से हमारा माशरा(समाज) भरा पड़ा है। किसी को इसकी खुशी से दुख है तो किसी को उसकी खुशी से दुख है!

 आप खुद ही देखें कि किसी का बच्चा अगर अपने हालात और सिचुएशन के मुताबिक जिंदगी में ठीक-ठाक जा रहा है, तो उनके मां-बाप इसकी खुशी मनाने की जगह, पड़ोसी-रिश्तेदार के बच्चों की कामयाबी का दुख मनाने में बिज़ी रहते हैं। आप कल्लन खालू का ही किस्सा लें बिचारे खालू ने बड़े चाव से बरसों की जमापुंजी लगा कर शानदार घर तैयार करवाया था। लेकिन उनके पड़ोसी ने उनसे भी ऊंची और शानदार इमारत तैयार करवाई। अब अपने घर की खुशी मनाने की बजाए बिचारे कल्लन खालू सुबह शाम अपनी बॉलकनी में लटके पड़ोसी की इमारत देख-देख चाय के साथ दुख के घूंट पीते रहते हैं। उनकी मिसेज ने इस साखिए को दिल और रेपोटेशन पर इतना ले लिया कि उन्हें मूड डिसआर्डर का मर्ज़ हो गया है। बिचारी दुखी रहती हैं कि निगोड़ी पड़ोसन ने उनके घर में ताक-झांक कर उनके जतन से मंगवाए यूनीक स्वीच बोर्ड और टाईल्स के डिज़ाइन का आइडिया चोरी कर हूबहू अपने घऱ में लगवा लिया है। ख़ाला का बस नही चलता है कि वो अपनी कमबख़्त पड़ोसन पर कॉपीराईट-पेटेंट जैसे जो भी कानून हैं, उनके वाएलेशन का दो-चार मुकदमा ठोंक दें। बिचारी अपने घर की शान और यूनिकनेस ख़त्म होने के ग़म से उबर ही नहीं पा रही हैं। वैसे कहीं आप भी तो उन लोगों में शामिल नहीं जो कलिग के प्रोमोशन देख ट्रेजडी किंग की तरह एक्ट करते हैं और पड़ोसी नए मॉडल की कार खरीदे तो इनकम टैक्स ऑफिसर की तरह रिएक्ट करते हैं ?
खुशबाश!