Wednesday, May 30, 2012

क्या 'पुंडलीक' भारत की पहली फीचर फिल्म थी?


१९१२ में बनी फिल्म 'पुंडलीक' क्या भारत की पहली फीचर फिल्म थी? दिलनवाज का यह दिलचस्प लेख उसी फिल्म को लेकर है- जानकी पुल.
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इस महीने में भारत की पहली फीचर फिल्म ‘पुंडलीक’ निर्माण का शतक पूरा कर रही है.
  
अमीर हो या गरीब... बंबई ने इस ऐतिहासिक घटना का दिल से स्वागत किया उस शाम ‘ओलंपिया थियेटर’ में मौजूद हर वह शख्स जानता था कि कुछ बेहद रोचक होने वाला है हुआ भी दादा साहेब द्वारा एक फिल्म की स्क्रीनिंग की गईपहली संपूर्ण भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ के प्रदर्शन ने हज़ारों भारतीय लोगों के ख्वाब को पूरा किया तात्पर्य यह कि भारतीय सिनेमा सौवें साल में दाखिल हो गयाजोकि एक उत्सव का विषय है

धुंधीराज गोविंद फालके (दादा साहेब फालकेहांलाकि इस मामले में पहले भारतीय नहीं थे। उनकी फिल्म से एक वर्ष पूर्व रिलीज़ ‘पुंडलीक’ बहुत मामलों में पहली भारतीय फिल्म कही जा सकती हैलेकिन कुछ विदेशी तकनीशयन होने की वजह से इतिहासकार इसे पहली संपूर्ण भारतीय फिल्म नहीं मानते। फालके ने अपनी फिल्म को स्वदेश में ही पूरा किया जबकि तोरणे ने ‘पुंडलीक’ को प्रोसेसिंग के लिए विदेश भेजा,फिर फिल्म रील मामले में भी फालके की ‘राजा हरिश्चंद्र’ तोरणे की फिल्म से अधिक बडी थी।

पुंडलीक के विषय में फिरोज रंगूनवाला लिखते हैं…  
दादा साहेब तोरणे की ‘पुंडलीक’ 18 मई,1912 को बंबई के कोरोनेशन थियेटर में रिलीज़ हुई महाराष्ट्र के जाने-माने संत की कथा पर आधारित यह फिल्मभारत की प्रथम कथा फिल्म बन गई। पहले हफ्ते में ही इसके रिलीज़ को लेकर जन प्रतिक्रिया अपने आप में बेमिसाल घटना थीजो बेहतरीन विदेशी फिल्म के मामले में भी शायद ही हुई हो  वह आगे कहते हैं ‘पुंडलीक को भारत की पहली रूपक फिल्म माना जाना चाहिएजो कि फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ से एक वर्ष पूर्व बनी फिल्म थी

बहुत से पैमाने पर पुंडलीक को ‘फीचर फिल्म’ कहा जा सकता है :
1)कथा पर आधारित अथवा प्रेरित प्रयास 2) अभिनय पक्ष 3) पात्रों की संकल्पना 4)कलाकारों की उपस्थिति 5) कलाकारों के एक्शन को कैमरे पर रिकार्ड किया गया

टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित समीक्षा में लिखा गया ‘पुंडलीक में हिन्दू दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता है। यह एक महान धार्मिक कथा हैइसके समान और कोई धार्मिक नाटक नहीं है पुणे के ‘दादा साहेब तोरणे’(रामचंद्र गोपाल तोरणे)में धुंधीराज गोविंद फालके(दादा साहेब फालकेजैसी सिनेमाई दीवानगी थी। उनकी फिल्म ‘पुंडलीक’ फालके की फिल्म से पूर्व रिलीज़ हुईफिर भी तकनीकी वजह से ‘राजा हरिश्चंद्र’ की पहचान पहली संपूर्ण भारतीय फिल्म रूप है तोरणे की फिल्म को ‘भारत की पहली’ फ़ीचर फिल्म होने का गौरव नहीं मिलापुंडलीक के रिलीज़ वक्त तोरणे ने एक विज्ञापन भी जारी कियाजिसमें इसे एक भारतीय की ओर से पहला प्रयास कहा गया बंबई की लगभग आधी हिन्दू आबादी ने विज्ञापन को देखा लेकिन यह उन्हें देर से मालूम हुआ कि ‘कोरोनेशन’ में एक शानदार फिल्म रिलीज हुई है पुंडलीक को तकरीबन दो हफ्ते के प्रदर्शन बाद  ‘वित्तीय घाटे’ कारण हटा लिया गया

तोरणे को फिल्मों में आने से पहले एक तकनीकशयन का काम किया एक ‘बिजली कंपनी’ में पहला काम मिला। पर यह उनकी तकदीर नहीं थी। कंपनी में रहते हुए ‘श्रीपद थियेटर मंडली’ के संपर्क में आए  वह कंपनी के नाट्य-मंडली एवं नाटकों से बेहद प्रभावित हुएफिर तत्कालीन सिने हलचल ने कला के प्रति उनके रूझान को आगे बढाया। बिजली कंपनी में कुछ वर्षों तक काम करने बाद मित्र ‘एन चित्रे’ के वित्तीय सहयोग से कलाक्षेत्र में किस्मत आजमाने का बडा निर्णय लिया मित्र के सहयोग से विदेश से एक फिल्म कैमरा मंगवा कर ‘पुंडलीक’ का निर्माण किया पुंडलीक निर्माण एक संयुक्त उपक्रम थाजिसमें दादा साहेब तोरणे एवं एन चित्रे(कोरोनेशन सिनेमा के स्वामीएवं प्रसिध फिल्म वितरक पीआर टीपनीस की कडी मेहनत थी  तोरणे ने फिल्म को रचनात्मक उतकृष्टता प्रदान की जबकि चित्रे एवं टीपनीस ने वित्तीय  वितरण की जिम्मेवारी निभाई। तोरणे ने शूटिंग लोकेशन रूप में बंबई के ‘मंगलवाडी परिसर’ को चुनाजहां श्रीपद मंडली के मराठी नाटक का सफल फिल्मांतरण किया

तोरणे द्वारा स्थापित ‘सरस्वती’ फिल्म प्रोडक्शन(सरस्वती सिनेटोनके तहत अनेक उल्लेखनीय फिल्मों का निर्माण हुआ जिसमें : श्यामसुंदरभक्त प्रहलादछ्त्रपति शम्भाजीराजा गोपीचंददेवयानी जैसी फिल्मों का नाम लिया जा सकता है रामगोपाल तोरणे सिनेमा कला में दक्ष रहेमाना जाता है कि सरस्वती बैनर की ज्यादातर फिल्मों की कथा पटकथा,संपादन,निर्माण,निर्देशन जैसे महत्त्वपूर्ण पक्षों को तोरणे ही देखते थे। पुंडलीक के निर्माण समय मोबाइल कैमरा की तकनीक नहीं थीइसके माध्यम से फिल्म को केवल एक कोण पर ही रिकार्ड करना संभव था रिकार्डिंग से तोरणे संतुष्ट नहीं हुएइसलिए पूरी फिल्म अलगअलग हिस्सोंमें रिकार्ड कर जोडने का निर्णय लिया आजकल यह काम ‘संपादक’ करता है… तोरणे सिनेमा से जुडे  महत्त्वपूर्ण तकनीकी पहलूओं के दक्ष जानकार थे दुख की बात है कि इस सब के बावजूद रामगोपाल तोरणे को बडे अर्से तक गुमनामी में जीना पडा  वित्तीय संकट की वजह से ‘सरस्वती सिनेटोन’ सन 1944 में तोरणे के हाथों से निकल गईकंपनी को श्री अहमद ने खरीदा

राजा हरिश्चंद्र’ के निर्माता दादा साहेब फालके ने अपनी फिल्म को ‘संपूर्ण स्वदेशी’ कहकर संबोधित किया स्वदेशी अवधारणा से ‘पुंडलीक’ की दावेदारी को क्षति हुई तत्कालीन भारतीय परिदृश्य में ‘स्वदेशी’ का उपयोग देशभक्ति संदर्भ से अभिभूत थाविगत 150 वर्षों से परतंत्रता झेल रहे भारतीयों के लिए ‘स्वदेशी’ फिल्म परतंत्रता  से ‘मुक्तिगान’ थी लेकिन आज के वैश्विक ग्लोबल ‘वैश्वीकरण’ परिदृश्य में जबकि विदेशी तकनीशयनों और कलाकारों का जोरदार स्वागत हैदादा साहेब फालके की ‘स्वदेशी’ अवधारणा को समझना थोडा मुश्किल है पुंडलीक के संदर्भ में कहा जा सकता है कि फिल्म एवं निर्माताओं को वह सम्मान नहीं मिला,जो मिलना चाहिए था। आज दादा साहेब तोरणे की विरासत को पुनर्जीवित करने की जरूरत है।

इस वजह से भारत में सिनेमा आरंभिक समय से ही कथाओं में ‘फैंटेसी’ और ‘पलायनवाद’ से का प्रयोग देखा गया। सिनेमा ने कथावस्तु से सामाजिक एवं राजनीतिक जागरण का दायित्त्व निभाया बालकानी एवं फ्रंटस्टाल की वंशानुगत विभाजन के बाद भी सिनेमा ने मनोरंजन का लोकतांत्रिक स्वरूप सुदृढ कियासिनेमा हाल के अंधेरे आडिटोरियम धर्म और जाति की दीवारें ढह जाती हैं |
इस में शक नहीं कि अधिकांश संचालकों के लिए ‘भारतीय सिनेमा’ व्यवसाय का विषय रहालेकिन सुधी फिल्मकारों की कोई कमी  थी सिनेमा को समाज सुधार एवं राष्ट्र निर्माण का उपकरण मानने वाले फिल्मकारों में वी शांताराममहबूब खान,बिमल राय और ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम लिया जा सकता है इन्होने सिनेमा को महज मनोरंजन की सीमा से बाहर रखकर ‘सामाजिक यथार्थ’ का तत्त्व जोडा। फिल्मों कोसामाजिक दर्पण’ की सत्ता मानकर इनके माध्यम से ‘परिवर्तन’ की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया सामाजिक बदलाव का स्वर लेकर असमानताजातिवाद,सामुदायिक सदभावना के प्रश्नों पर आमजन को शिक्षित किया। उच्चस्तरीय सिनेमा शीघ्र ही ‘राष्ट्रीय गौरव’ का प्रतीक बन गया सत्यजीत राय की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ ने कान फिल्म सामारोहफ्रांस(1956) में धूम मचाते हूए श्रेष्ठ फिल्म’ का पुरस्कार जीता गौरव का यह सिलसिला  एक वर्ष बाद ‘कारलोवी वेरी’ फिल्म सामारोह में शंभू मित्रा की फिल्म ‘जागते रहो’ ने जारी रखा
भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो’(1962) रिलीज़ के तीन वर्ष बाद एक महत्त्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुआ जिसमे लिखा गया,  “ फिल्म की बाक्स आफिस कामयाबी ने ‘भोजपुरी’ की प्रासंगिकता में योगदान दिया है सिनेमा की वजह से सम्मानजनक भाषाओं की तरह ‘भोजपुरी’ भी ‘सम्मान’ की भाषा हो गई हैखासकर भोजपुर वासियों को अपनी भाषा पर गर्व महसूस हो रहा है आज जब किसी अनजान’ भाषा की फिल्म को प्रमाणन संस्था प्रमाण देता है तो  ‘भारतीय अस्मिता’ का आंदोलन फिर से जीवित हो जाता है

सिनेमा माध्यम ने पूर्व एवं दक्षिणी सिनेमा को परस्पर संवाद का अवसर दिया। सिनेमा ने दक्षिण एवं पूर्व की दूरियां पाट कर प्रेरणाप्रोत्साहन  सहयोग से सकारात्मक प्रतिस्पर्धा  प्रोत्साहना युग की शुरूआत की। दक्षिण क्षेत्र के एस एस वासान द्वारा स्थापित ‘जेमिनी फिल्मस’ ने यादगार हिन्दी फिल्मों का निर्माण कियाइस परंपरा  को ‘एवीएम’ एवं ‘प्रसाद प्रोडक्शन’ ने जारी रखा। हिन्दी फिल्मों  गीतों की ‘राष्ट्रीय लोकप्रियतायह बताती है कि सिनेमा देश को एक सूत्र में बांध सकता है सीमाओं के बावजूद आज सिनेमा क्रिकेट तरह का मजहब हो गया है

आज हमारा देश विश्व का सबसे बडा फिल्म निर्माता देश है पचास के दशक में हमने सोवियत संघ एवं  मध्य पूर्व एशिया का दिल जीतने भारतीय सिनेमा ‘वैश्विक परिदृश्य’ में ‘वैश्विक’ अवधारणा बनने को प्रयासरत है। राजकुमार हिरानी की ‘थ्री इडियट्स’ ने विदेश में अधिक कमायाइसी तरह करन जोहर की ‘माई नेम इज खानने भी बडी कमाई की मुख्यधारा सिनेमा में समय के साथ ‘संरचना’ एवं ‘विषय वस्तु’ बहुत अधिक बदलाव हुए हैं आज एक फिल्म की औसतन लम्बाई पहले की अपेक्षा कम हो चुकी है एक समय में ‘युगल गीतों’ का चलन हुआ करता था लेकिन आज यह यदा-कदा ही नजर आते हैं। वर्त्तमान को यदि भविष्य का संकेत माने तो वह दिन दूर नहीं जब ‘युगल गीत’ खत्म होगा यह सिनेमा में सामाजिक संबंधों में एकांत का दौर है।
कुल मिलाकर 100 वर्षों का यह सफर एक जादुई सफर रहा —भारतीय सिनेमा में हर अंदाज़ के ‘सुपरस्टार’ सितारे हुए हैं | सपनों के इन सौदागरों ने सिनेमा माध्यम से आमजन  को उनके स्वाद के मुताबिक ‘निर्वाण’ एवंपलायनवाद’ का मार्ग दिया है  आज का दर्शक निर्णय लेकर चयन कर सकता है सिनेमा को याद करना स्वयं को याद करना जैसा हैवह दरअसल हमारी जिंदगियों का अक्स ही तो है लेकिन आज सिनेमा का उददेश्य तेजी से बदल रहा है.

Tuesday, May 29, 2012

मुक्तिबोध की एक आरंभिक कहानी 'सौन्‍दर्य के उपासक'


मगहिवि के वेबसाईट हिंदी समय को देख रहा था तो अचानक मुक्तिबोध की १९३५ में प्रकाशित इस कहानी पर ध्यान चला गया. कहानी को पढते ही आपसे साझा करने का मन हुआ- जानकी पुल. 
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कोमल तृणों के उरस्‍थल पर मेघों के प्रेमाश्रु बिखरे पड़े थे। रवि की सांध्‍य किरणें उन मृदुल-स्‍पन्दित तृणों के उरों में न मालूम किसे खोज रही थी। मैं चुपचाप खड़ा था। बायाँ हाथ 'उसके' बाएँ कन्‍धे पर। कभी निसर्ग-देवता की इस रम्‍य कल्‍पना की ओर तो कभी मेरी प्रणयिनी के श्रम-जल-सिक्‍त सुन्‍दर मुख पर दृष्टिक्षेप करता हुआ न मालूम किस उत्‍ताल-तरंगित जलधि में गोते खा रहा था। सहसा मेरी स्थिति पर मेरा ध्‍यान गया। आसपास देखा कोई नहीं था। चिडि़याँ वृक्षों पर 'किल बिल' 'किल बिल' कर रही थी। मैंने उसकी पीठ पर कोमल थपकी देकर उसका ध्‍यान अपनी ओर खींचा। वह शुचि स्मिता रमणी मेरी ओर किंचित हँस दी।
मैंने मौन तोड़ने के लिए कहा, 'देखो, अनिल, कैसी मनोहर है प्रकृति की शोभा।'
वह 'हूँ' कहकर मुसकुरा दी। 'अनिल, क्‍या तुम सौन्‍दर्य की उपासिका नहीं! अनिल, बोलो न !' मैंने विव्‍हल होकर पूछा। 'क्‍यों नहीं ! प्रमोद, मैं सौन्‍दर्य की उपासिका तो हूँ पर उसी सौन्‍दर्य के हृदय की भी। प्रमोद, घबराओ ना। मैं सोच रही थी कि यह निसर्ग देवी किसके लिए इतना रम्‍य, पवित्र, श्रृंगार किए बैठी हैं ! कौन है वह सौभाग्‍यशाली पुरूष ! प्रमोद, मैं सौन्‍दर्य की उपासिका हूँ, मैं प्रेम की उपासिका हूँ।'
1. 'तो क्‍या मैं तुमसे प्रेम नहीं करता ! तुम मुझे समझती क्‍या हो। सच-सच बतला दो, अनिल।'
'मैं ! तुम्‍हें ! मेरे देवता, मेरे ध्‍येय, मेरी मुक्ति। मैं तुम्‍हें मेरा सब कुछ समझती हूँ प्रमोद।'
मैं खिल गया, मैंने उत्‍साहित होकर पूछा, 'तो क्‍या मैं सौन्‍दर्य का उपासक नहीं?'
वह मेरे उरस्‍थल पर नशीली आँखें गड़ाती हुई समीपस्‍थ वृक्ष पर टिक गयी। अँधेरा हो चुका था।
2. मैं दूसरे मंजिल पर था, और वह मेरे पीछे-एक हाथ मेरे कन्‍धे पर और दूसरा सिर पर। सिर के बालों को सहलाती हुई, कुछ गुनगुनाती हुई खड़ी थी। मैं तन्‍मय होकर 'हैपिनेस इन मैरिज' नामक पुस्‍तक पढ़ रहा था। सहसा उसका हाथ मेरी आँखों पर से फिर गया। मैंने उसे पकड़ लिया। अपनी नशीली आँखें मुख पर दौड़ाती हुई अस्‍तव्‍यस्‍त हो अपना सारा भार मेरी कुर्सी के हत्‍थों पर डाल दिया। मैं कुर्सी को टेकता सीधा हो गया। साहसा घर डोल गया और एक...
3. उसका हृदय मेरे हृदय से मिल गया था।
4. भूकम्‍प क्‍या था - प्रलय का दूसरा रूप। भाग्‍य से ही हम बचे। हम अच्‍छे हो चुके थे। वैसी ही सन्‍ध्‍या थी। वह मेरे पास आयी। सामने की कुर्सी पर बैठ गयी। उसकी आँखों में प्रेम था, पवित्रता थी। बोली- 'प्रमोद, मैं एक बात तुम से पूछूँ?' मैंने उसका कोमल हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, 'मेरे लिए इससे अधिक प्रसन्‍नता की बात और क्‍या हो सकती है, अनिल।' वह बोली, 'प्रमोद, तुम जानते हो देश कैसा दुखी है, त्रस्‍त है। हम अच्‍छे हो गये हैं। हमारा उपयोग होना चाहिए, प्रमोद।' मैं फूट पड़ा।
'तुम्‍हारा हृदय कितना उच्‍च है, कितनी सहानुभति से भरा है अनिल। हम कवि लोग अपनी भावनाओं को ही घूमाने-फिराने में लगे रहते हैं। क्‍या किसी कवि को तुमने कार्य-कवि होते भी देखा है। होते भी होंगे पर बहुत कम। हमारी कल्‍पनाएँ क्‍या भूकम्‍प त्रस्‍त लोगों को कुछ भी सुख पहुँचा सकती हैं। नहीं, अनिल, नहीं।'
'प्रमोद, शान्‍त हो। तुम नहीं, मैं तो हूँ। मुझे आज्ञा दो प्रमोद, कि मैं विश्‍व-सेवा में उपस्थित होऊँ।'
वह एकदम खड़ी हो गयी। मैं भी एकदम खड़ा हो गया। मैंने आवेश से कहा- 'अनिल जाओ। मैं नहीं आ सकता - तुम जाओ। मेरी हृदय-कामने, तुम जाओ।'
'जाती हूँ, प्रमोद। तुम सच्‍चे कवि हो। तुम मेरे सच्‍चे हृदयेश्‍वर हो। और हो तुम सौन्‍दर्य के सच्‍चे उपासक-प्रमोद यही सौन्‍दर्य है।'
उस दिन की स्‍मृति दौड़ती हुई आयी। मैंने अपने को स्‍वर्ग में पाया। पुलकित हो गया। समय और स्थिति की परवाह न कर मैंने उसे हृदय से चिपका लिया। ऑंखों में अश्रु थे और अधरों पर सुधा।
यह था मेरा प्रथम प्रणय-चुम्‍बन।

(माधव कॉलेज मैगजीन में 1935 में तथा 27 दिसंबर  1992 के दैनिक भास्कर में पुनः प्रकाशित)