Monday, September 1, 2014

इतिहास की सही समझ के सिद्धांतकार

आज प्रसिद्ध इतिहासकार बिपिन चन्द्रा को श्रद्धांजलि देते हुए प्रोफ़ेसर राजीव लोचन ने 'दैनिक हिन्दुस्तान' में बहुत अच्छा लेख लिखा है. जिन्होंने न पढ़ा हो उनके लिए- मॉडरेटर 
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पिछले 50 साल में शायद ही इतिहास का कोई ऐसा छात्र होगा, जिसने बिपिन चंद्रा द्वारा लिखी हुई किताबें न पढ़ी हों। बिपिन चंद्रा के लिए किताबें लिखना महज बौद्धिक शगल नहीं था, वह अपने लेखन से समाज को बदलने का काम भी कर रहे थे। एक शिक्षक, वह भी कम्युनिस्ट विचारधारा वाले, बिपिन चंद्रा छात्रों को देश में फैली समस्याओं से जूझने की एक समझ देते थे। स्थिति यह थी कि उनके लेक्चर सुनने के लिए दूसरे विभागों तक के छात्र आ जाते थे। कुछ  उनकी आज्ञा लेकर वहां बैठते, तो बाकी बस चुपके से इतिहास के छात्रों में घुल-मिलकर बैठ जाते थे। उनकी कक्षाओं में एक अनौपचारिक-सा माहौल रहता। भारत में राष्ट्रवाद किस तरह पला-बढ़ा, वह इसके बारे में बताना शुरू करते और पता नहीं कहां से देश के वर्तमान की समस्याओं पर चर्चा शुरू हो जाती। हर चीज की समझ के लिए, प्रोफेसर साहब के अनुसार, बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के विस्तार और उसकी समस्याओं को समझना जरूरी था। इससे छात्रों में इतिहास की समझ भी बढ़ती, और देश के मौजूदा हालात की भी।

बिपिन चंद्रा खुद द्वितीय विश्व-युद्ध के समय के छात्र थे। यह वह पीढ़ी थी, जिसने भारतीय कम्युनिस्टों को बरतानिया सरकार से हाथ मिलाते देखा था। जिसने देश का विभाजन देखा था। और यह भी देखा था कि किस तरह लोग हालात के शिकार बन जाते हैं। उनके लिए इस तरह कि दुविधाओं से बचने का एक ही रास्ता था कि लोग इतिहास की बेहतर समझ रख सकें। वह खुद बताते थे कि किस तरह कम्युनिस्ट नेता पीसी जोशी के कहने पर उन्होंने गांधी के चंपारण सत्याग्रह के बारे में जानकारी हासिल की। बिपिन चंद्रा ने जाना कि यदि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समझना है, यह समझना है कि लोग किस तरह से इस संग्राम के साथ जुड़े, तो गांधी को समझना जरूरी है। गांधी चंपारण के किसानों की समस्याओं को लेकर किस तरह सरकार से जूङो, यह समझना जरूरी है। आगे जाकर देश के इतिहास ज्ञान में उनका एक बड़ा योगदान शायद इस अनुभव से ही निकला। उन्होंने भारतीय इतिहास को फॉल्स कॉन्शसनेसयानी मिथक चेतना का सिद्धांत दिया। यह सिद्धांत कहता है कि लोगों की ऐतिहासिक समझ गलत होगी, तो उनकी वर्तमान के बारे में भी समझ गलत ही होगी। बिपिन चंद्रा का अधिकांश लेखन सही समझ प्रेषित करने में लगा रहा, ताकि लोग गलत समझ से बच सकें।

इस सिलसिले में एनसीईआरटी की स्कूली पाठ्य-पुस्तकों के जरिये बिपिन चंद्रा ने सीधे सरल तरीके से यह समझाने का प्रयास किया कि जब लोग राष्ट्रवाद की मुख्यधारा को छोड़कर संप्रदायवाद की तरफ बढ़ते थे, तो वे किस तरह ऐतिहासिक गलतफहमियों का शिकार हो जाते थे। इन गलतफहमियों को फैलाने में सांप्रदायिक राजनेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। बिपिन चंद्रा मानते थे कि ऐसे हालात में यह इतिहासकार का जिम्मा है कि वह लोगों को यह समझा सके कि उनकी समस्याओं की जड़ देश की औपनिवेशिक गुलामी थी और समस्याओं का समाधान देश को मजबूत बनाने में है। 1973 में लिखी गई उनकी यह किताब आज भी लोग पढ़ रहे हैं। यह जरूर है कि सांप्रदायिक राजनीति करने वाले आज भी इन किताबों की आलोचना करते हैं, पर पढ़े-लिखे लोगों के लिए आज भी यह सबसे जरूरी पढ़ने लायक किताबों की सूची में शामिल है।

इन किताबों के जरिये वह लोगों तक सुदृढ़ भारत की एक ऐसी तस्वीर पेश करना कहते थे, जो लोकतांत्रिक हो, जो सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर टिका हो, जहां रूढ़िवादिता के लिए कोई स्थान न हो और जो भारतीय संस्कृति की नैसर्गिक धारा से जुड़ा हो। स्वतंत्र भारत को सांप्रदायिकता के जहर से बचाने के लिए बिपिन चंद्रा को इतिहास की सही समझ ही एकमात्र साधन जान पड़ती थी। इसलिए वह अपनी पूरी जिंदगी, जो भी लिखते रहे, जो भी कहते रहे, हर जगह लोगों को सही समझ बनाने के लिए प्रेरित करते रहे। उनके छात्रों में न केवल वे थे, जो उनके लेक्चर सुनते, बल्कि वे भी थे, जो उनके विचारों से प्रेरित होकर उनकी किताबें पढ़ते थे। पढ़ाई का सिलसिला क्लास रूम में ही खत्म नहीं होता था। अपने छात्रों को वह कहते कि केवल पुस्तकालय में बैठकर इतिहास लेखन न करो। जहां मौका मिलता, आगे बढ़कर छात्रों को बाहर भेजने की कोशिश करते।

जाओ, फील्ड ट्रिप करो, लोगों से मिलो, उनकी बातें सुनो, समझो कि उनके अनुभव क्या थे।कई छात्रों को उनके साथ फील्ड ट्रिप पर जाने का मौका मिला। बिपिन चंद्रा बीसवीं सदी के इतिहास की प्रमुख हस्तियों का इंटरव्यू करते, जहां जाते अपने विद्यार्थियों को भी ले जाते, खुद सारा काम करते और नौजवानों से कहते: देखो, ऐसे काम किया जाता है। मजाल है कि कभी उन्होंने किसी विद्यार्थी से अपना कोई काम करने को कहा हो। कहां तो देश की पुरानी परंपरा थी कि विद्यार्थी गुरुजी की सेवा करता फिरता, कहां बिपिन चंद्रा थे कि अपने छात्रों की सेवा करते। इनमें से अनेक खुद आगे बढ़कर देश में बड़े काम कर रहे हैं।

मृदुला मुखर्जी, माजिद सिद्दीकी, भगवान जोश, आदित्य मुखर्जी, सलिल मिश्र, विशालाक्षी मेनन वगैरह उनके अनेक छात्र आज देश के जाने-माने इतिहासकार हैं। हफ्ते में एक दिन बिपिन चंद्रा के घर सभी छात्र इकट्ठा होते और रिसर्च के बारे में चर्चा होती। कोई दो दशकों तक, जब तक बिपिन साहब जेएनयू परिसर में रहे, तो चर्चा का यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहा। छह दशक के अपने सार्वजनिक जीवन में बिपिन चंद्रा ने इतिहास लेखन के अलावा लोगों तक बेहतर साहित्य पहुंचाने में बड़ा योगदान दिया। अनेक भारतीय प्रकाशकों को उन्होंने इतिहास की बेहतरीन किताबें छापने के लिए प्रेरित किया। नेशनल बुक ट्रस्ट की अगुआई की। इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में आगे बढ़कर हिस्सा लिया। पर उनका सबसे बड़ा योगदान तो समर्थ नागरिक बनाने में रहा।

बिपिन चंद्रा एक महान राष्ट्रवादी तो थे ही, भारतीय साम्यवाद में सन 1964 में हुए दो फाड़ से वह नाखुश थे। 1979 में उन्होंने आग्रह किया था कि भारत में साम्यवाद की दोनों धाराएं जुड़ जाएं, तो सभी के लिए अच्छा रहेगा। पर ऐसा हुआ नहीं। साल 2009 में भी उन्होंने यह आग्रह दोहराया। देश को संप्रदायवादी और उपनिवेशवादी शक्तियों से बचने के लिए जो सही समझ चाहिए, उनके अनुसार, यह केवल एक साम्यवादी समझ ही हो सकती थी। आज जब देश पुन: सांप्रदायिकता में उभार देख रहा है, तो लगता है कि बिपिन चंद्रा का बताया रास्ता ही शायद ठीक था।

Sunday, August 31, 2014

बादल रोता है बिजली शरमा रही

जब सीतामढ़ी में था तो नवगीत दशक-1 को साहित्य की बहुत बड़ी पुस्तक मानता था. एक तो इस कारण से कि हमारे शहर के कवि/गीतकार रामचंद्र 'चंद्रभूषण' के गीत उसमें शामिल थे, दूसरे देवेन्द्र कुमार के गीतों के कारण. नवगीत के प्रतिनिधि संकलन 'पांच जोड़ बांसुरी' में उनका मशहूर गीत 'एक पेड़ चांदनी लगाया है आंगने...' पढ़ा था. आज 'हिंदी समय' पर देवेन्द्र कुमार बंगाली नाम से उनके गीत पढ़े तो वह दौर याद आ गया, और वह बिछड़ा दोस्त श्रीप्रकाश, जो मेरे पढने के लिए डाक से ये किताबें मंगवाता था. आप भी पढ़िए- जानकी पुल. 
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1.
एक पेड़ चाँदनी

एक पेड़ चाँदनी
लगाया है
      आँगने,
फूले तो
आ जाना एक फूल
माँगने।

ढिबरी की लौ
जैसे लीक चली आ रही
बादल रोता है
बिजली शरमा रही
      मेरा घर
छाया है
तेरे सुहाग ने।

तन कातिक, मन अगहन
बार-बार हो रहा
मुझमें तेरा कुआर
जैसे कुछ बो रहा
रहने दो,
यह हिसाब
कर लेना बाद में।

नदी, झील, सागर के
रिश्‍ते मत जोड़ना
लहरों को आता है
यहाँ-वहाँ छोड़ना
      मुझको
पहुँचाया है
तुम तक अनुराग ने।

एक पेड़ चाँदनी
लगाया है
      आँगने।
फूले तो
आ जाना एक फूल
माँगने।

2.
मेघ आए, निकट कानों के

मेघ आए, निकट कानों के
फूल काले खिले धानों के

दूब की छिकुनी सरीखे
हवा का चलना
दूर तक बीते क्षणों में
घूमना-फिरना
सिलसिले ऊँचे मकानों के।

रंग की चर्चा तितलियों में
मेह भीगी शाम
       बिल्‍ली-सी
नदी की पहुँच गलियों में
खिड़कियों का इस तरह गिरना
गीत ज्‍यों उठते पियानों के।

मेघ आए निकट कानों के
फूल काले खिले धानों के।

3.
हमको भी आता है
पर्वत के सीने से झरता है
              झरना...
हमको भी आता है
भीड़ से गुजरना।

कुछ पत्‍थर
कुछ रोड़े
कुद हंसों के जोड़े
नींदों के घाट लगे
कब दरियाई घोड़े
       मैना की पाँखें हैं
       बच्‍चों की आँखें हैं
       प्‍यार है नींद, मगर शर्त
              है, उबरना।

गूँगी है
बहरी है
काठ की गिलहरी है
आड़ में मदरसे हैं
सामने कचहरी है
बँधे खुले अंगों से
भर पाया रंगों से
डालों के सेव हैं, सँभाल के
कुतरना।

4.
मन न हुए मन से
मन न हुए मन से
हर क्षण कटते रहे किसी छन से।

तुमसे-उनसे
मेरी निस्बत
क्या-क्या बात हुई।
अगर नहीं, तो
फिर यह ऐसा क्यों?
दिन की गरमी
रातों की ठंडक
चायों की तासीर
समाप्त हुई
एक रोज पूछा निज दर्पन से।

मन न हुए मन से
हर क्षण कटते रहे किसी छन से।

5.
सोच रहा हूँ
सोच रहा हूँ
लगता है जैसे साये में अपना ही
गला दबोच रहा हूँ।

एक नदी
उठते सवाल-सी
कंधों पर
है झुकी डाल-सी
अपने ही नाखूनों से अपनी ही
देह खरोंच रहा हूँ।

दूर दरख्तों का
छा जाना
अपने में कुआँ
हो जाना
मुँह पर घिरे अँधेरे को
बंदर-हाथों से नोच रहा हूँ।

6.
हम ठहरे गाँव के

हम ठहरे गाँव के
बोझ हुए रिश्‍ते सब
कंधों के, पाँव के।
भेद-भाव सन्‍नाटा
ये साही का काँटा
सीने के घाव हुए
सिलसिले अभाव के!

सुनती हो तुम रूबी
एक नाव फिर डूबी
ढूँढ़ लिए नदियों ने
रास्‍ते बचाव के।

सीना, गोड़ी, टाँगें
माँगें तो क्‍या माँगें
बकरी के मोल बिके
बच्‍चे उमराव के।




Friday, August 29, 2014

विस्मय और चमत्कार : विश्व सिनेमा में अद्भुत रस की फिल्में

आइआइटी पलट युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर को कुछ लोग 'अल्पाहारी गृहत्यागी'(हार्पर कॉलिन्स) उपन्यास के कारण जानते हैं, आजकल मैं उनको विश्व सिनेमा पर लिखी इस लेखमाला के कारण जान रहा हूँ, जिसमें उन्होंने रसों के आधार पर विश्व सिनेमा की विशेषताओं को रेखांकित करने का काम किया है. आज अद्भुत रस के आधार पर विश्व सिनेमा का एक मूल्यांकन प्रस्तुत है. पढ़िए बड़ा रोचक है- प्रभात रंजन 
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इस लेखमाला में अब तक आपने पढ़ा:
1.                  भारतीय दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र - http://www.jankipul.com/2014/07/blog-post_89.html  
2.                  भयावह फिल्मों का अनूठा संसार - http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_8.html  
3.                  वीभत्स रस और विश्व सिनेमा - http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_20.html   
भारतीय शास्त्रीय सौंदर्यशास्त्र के दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का परिचय कराती इस लेखमाला की चौथी कड़ी है अद्भुत रस की विश्व की महान फिल्में :-
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विस्मय और चमत्कार : विश्व सिनेमा में अद्भुत रस की फिल्में 

प्राचीन शास्त्रीय सिद्धान्त को पढ़ने और समझाने में कई दिक्कतें आती हैं। एक तो, इतने तरह के विचार-परिवार और विशिष्ट परंपरा हैं और उनके आपस के विचित्र मतभेद कि समझ नहीं आता कि सारांश में किस शब्द का क्या अर्थ निकाला जाये। सांख्य - योग में जिसको मन, अंतःकरण, चित्त, बुद्धि, अहंकार कहते हैं, वैशेषिक-न्याय में इन्हीं शब्दों कुछ और मतलब निकलता है। बौद्ध धर्म की शाखाओं - माध्यमिका और योगाचार दर्शन में बुद्धि अलग ही तरह से परिभाषित है।  प्राचीन वैशेषिक और वृहत प्राचीन साँख्य ईश्वर शब्द को भी अलग-अलग तरह से देखते हैं। कभी-कभी सोचता हूँ कि अपनी छाती फुलायें, अपनी संस्कृति का झंडा और हाथों में डंडा उठाये जो लोग हर बात पे कहते हैं कि तू क्या है, उनसे पूछा जाए कि आपके अपने अंदाज़-ए-गुफ्तगु में शामिल उन नायब लफ़्ज़ों के मायने भी पता हैं?

अद्भुत रस के लिए विस्मय भाव, और विस्मय भाव के लिए अद्भुत रस का होना आवश्यक है। कई मूर्धन्य विद्वानों का मानना है कि सामान्य की परिस्थिति से बढ़ कर चित्त की चमत्कृत अवस्था ही विस्मय है। मेरा मानना है कि ऐसी परिभाषा मिथ्या नहीं है, पर अपूर्ण है। यह अविद्या है चूँकि अविद्या मिथ्या न हो कर भ्रम की स्थिति होती है, और अविद्या को दूर करना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

विश्व सिनेमा और अद्भुत रस की चर्चा करने से पहले दो फिल्मों का पुनरावलोकन करते हैं.

कुछ साल पहले आयी Martin Scorsese की  Hugo (2011) में सन 1902 में बनी A Trip to the Moon या Le Voyage dans la Lune के निर्देशक के बारे में बताया गया था था। चाँद पर मानव के कदम से 67 साल पहले, जुल वर्न के उपन्यास से प्रभावित इस अठारह मिनट की फिल्म में कुछ लोगों का चाँद पर जाना दिखाया गया है, और चन्द्रवासियों का इन पर्यटकों का विरोध भी चित्रित किया गया है। कपोल कल्पना पर बनी विशिष्ट सेटों पर बनी यह फिल्म कुछ हिस्सों में रंगी हुई थी।

बारह मिनट की अमेरिकी फ़िल्म The Great Train Robbery (1903) में लुटेरे ट्रेन लूट लेते हैं, बाद में उसका पीछा करते हुए कुछ लोग लुटेरों की हत्या कर देते हैं। इस फिल्म में चलती ट्रेन से एक आदमी को फेंक दिया जाता है। वस्तुतः यह पहली बार डमी का इस्तेमाल था। अपनी मौलिक तकनीक और कथानक से यह फिल्म बड़ी हिट साबित हुयी थी।

इन दोनों फिल्मों में दर्शक विस्मित रह गये थे। यह ठीक ठीक कहा जा सकता है कि उस समय की तकनीक आज की तुलना में पिछड़ी हुई थी, और आज ऐसी फिल्मों को कोई न पूछेगा। चकित और चमत्कृत होने के लिए दर्शकों में वैसा चमत्कार की भावना आनी चाहिये। इसी तरह Martin Scorsese की  Hugo (2011) अपने अपूर्व त्रिआयामी (3-D) प्रभाव से दर्शकों को ऐसी विस्मित कर देती है।

नाट्यशास्त्र के अनुसार अद्भुत रस की उत्पत्ति के लिए आवश्यक विस्मय के विभाव कुछ इस तरह से हैं : भव्य महल, अट्टालिका, सभा में प्रवेश करना, अलौकिक दृश्यों या घटना, और जादू के करतब देखना। अद्भुत रस दो तरह के होते हैं : अलौकिक और हर्षजन्य। अलौकिक अद्भुत रस में अपूर्व दृश्य या घटना की अनुभूति होती है। हर्षजन्य अद्भुत रस उस तरह के हर्ष के लिए हैं जिस के होने की संभावना नगण्य हो अथवा बिलकुल ही असंभव हो।
 
फिल्मों के इतिहास में अधिकतर बड़े बजट की फिल्में, और व्यवसायिक रूप से बहुत सफल फिल्में अद्भुत रस से जुडी हुयी हैं। 

यह बहुत मुश्किल नहीं होगा बहुत बड़े बजट वाली हॉलीवुड की कमाऊ फिल्में (जैसे कि Pirates of the Caribbean, Spider Man, Harry Potter, The Dark Knight, Star Wars,  Superman, James Bond movies, X-Men,  Lord of the Rings Trilogy, Matrix Trilogy, Transformers) का मुख्य भाव अलौकिक अद्भुत रस से सम्बंधित है।

कई महान फिल्म निर्देशकों ने फिल्म सेटों की भव्यता, विशालता से विस्मय पैदा करनी कोशिश रही है। ऐसा कई प्रयोग व्यावसायिक दृष्टि से काफी सफल रहा है।

मूक फिल्मों के सबसे प्रमुख निर्देशक D W Griffith ने अपनी नस्लवादी फिल्म The Birth of a Nation (1915) पर आलोचकों को जवाब देने के लिए उस समय तक की सबसे महँगी फ़िल्म Intolerance (1916) बनायीं। यह फिल्म युद्ध के दृश्यों, बेबीलोन के राजदरबार के भव्य सेटों से सजी उम्दा बनी। लेकिन फिल्म के पिट जाने के बाद ग्रिफिथ के दोस्तों को अपनी फिल्म कम्पनी बंद करनी पड़ी। फिल्म में बेबीलोन का भव्य सेट जो तीन साल बाद नष्ट किया गया, अपने समय में अच्छा खासा आकर्षण केंद्र बन गया था। तीन हज़ार एक्स्ट्रा कलाकारों को सहेजे, यह फिल्म आज भी विश्व सिनेमा की कलात्मक उपलब्धि है.

Dr. Mabuse the Gambler (1922) और M (1931) जैसी अविस्मरणीय जर्मन फिल्मों के फिल्म निर्देशक Fritz Lang (1890- 1976) ने सन 1927 में दुनिया की सबसे महँगी मूक फिल्म Metropolis बनायीं थी। विस्मय के लिए भव्य सेट, बड़े कारखाने, हजारों एक्स्ट्रा कलाकारों की भीड़, पागल वैज्ञानिक का एक हाथ में काला दस्ताना पहनना (Stanley Kubrick की Dr Strangelove (1964) में इसका प्रभाव साफ़ दीखता है) और एक अद्भुत महिला रोबोट भी थी। फिल्म की शूटिंग में भी कई दिक्कतें थी, मिसाल के तौर पर पांच सौ छोटे बच्चों को पंद्रह दिन तक ठण्डे पानी में शूटिंग कराना, आदि। वैश्विक समाजवादी आंदोलनों के दौर में निर्देशक ने यह सन्देश देने की कोशिश की थी कि हाथ और दिमाग के मिलन के बीच में दिल का होना चाहिये।

अमेरिकी निर्देशक Victor Flemming (1875- 1948) दो महान फिल्मों The Wizard of Oz (1939) और Gone with the Wind (1939) के लिए प्रसिद्ध रहे। ये दोनों ही फिल्में अद्भुत रस की हैं। पहली फिल्म में, जो प्यारे प्यारे गीतों से भरी है, डोरोथी नाम की बच्ची सपने में विचित्र प्राणियों और जादूगरों से मिलती है। जब कि इस जादू भरी फिल्म ने बहुत पैसे नहीं कमाये, लेकिन सन 1956 में टीवी प्रसारण के बाद इस फिल्म को महान फिल्मों में गिना जाने लगा। साल 1939 के अंत आयी गोन विद द विंडमुद्रास्फीति के संतुलन के बाद दुनिया के सबसे कमाऊ फिल्म मानी जाती है। इसमें आगजनी का बड़ा विस्मयकारी दृश्य है।

मूक फिल्मों के महान निर्देशकों में प्रमुख Cecil B. DeMille (1881- 1959) ने अपने महान कैरियर में आखिरी फिल्म The Ten Commandments (1956) बना कर भव्यता, कला, और पुरजोर कमाई के लिए नए मानक बना दिए। मूसा और मिस्र के फैरो की बाइबिल की कहानी पर आधारित फिल्म बनाने के लिए मिस्र के इतिहास, नयी तकनीक, आज से साधे तीन हज़ार साल पहले की वेश भूषा का गहरा अध्ययन और प्रयोग है- जैसे कि पिरामिड का निर्माण, मिस्र की औरतों का चेहरा देखने के लिए धातु की चमकती चादर का प्रयोग करना (शीशे का आईना ग्यारहवी सदी के बाद प्रचलन में आया, और चाँदी की परत वाला शीशे का आईना सन 1835 में आया)। फिल्म के प्रसिद्द दृश्य में मूसा नदी को दो हिस्सों में काट कर पानी में लोगो के जाने का रास्ता बना देते हैं। इस अद्भुत कथा का फिल्मांकन फिल्म इतिहास में अमर है।

महान अमेरिकी निर्देशक William Wyler (1902- 1981) जो अपनी रोमांटिक और ड्रामा फिल्मों के लिए जाने जाते थे, ईसा मसीह के समकालीन यहूदी व्यापारी के जीवन पर विशाल फिल्म Ben Hur (1959) ने ग्यारह अकादेमी अवार्ड जीत कर नया कीर्तिमान बनाया था। इस फिल्म में रथों की दौड़ का एक अद्भुत दृश्य है। इसने भी कमाई के नए कीर्तिमान बना दिए थे।

Great Expectations (1946), Oliver Twist (1948), और Brief Encounter (1946) जैसी ड्रामा फिल्मों के लिए प्रसिद्द ब्रिटिश निर्देशक David Lean (1908- 1991) ने दो महान फिल्में बनायीं, जो कि भव्य होने के साथ साथ, फिल्म कला के लिए बड़ी महत्वपूर्ण रहीं- Lawrence of Arabia (1962) और Doctor Zhivago (1965)! विभिन्न देशों और उनकी विषम परिस्थियों, जैसे एक जोशीले आदमी का लंबा रेगिस्तान पार कर जाना, एक युद्ध की अगुवाई करना, कई सालों के बाद बिछड़े प्रेमी-प्रेमिका का मिलना, साइबेरिया का बर्फीला मैदान, ये बृहद फिल्में कई तकनीकी कारणों से भी अद्भुत बन पड़ी हैं, जिसके केवल देख कर अनुभव किया जा सकता है।

मशहूर ड्रामा फिल्म All about eve(1950) के लिए जाने जाने वाले फिल्म निर्देशक Joseph L. Mankiewicz (1909- 1993) ने जब बेहद ही महँगी Cleopetra (1963) बनायी, तब छः घंटे की फिल्मों को काट छांट कर दो भागों में दिखने के बजाये एक ही भाग की तीन घंटे की फिल्म बना दी गयी। उस साल सबसे ज्यादा कमाई करने के बावजूद इस फिल्म ने अपने बड़े बजट के कारण तत्कालीन ४४ मिलियन डॉलर का नुक्सान उठाया था। इस फिल्म में एलिज़ाबेथ टेलर ने पैंसठ बार कपड़े बदल कर नया रिकॉर्ड बनाया था।

बड़ी फिल्मों के बनाने के लिए ढेर सारा पैसा और जोखिम उठाने का कलेजा होना चाहिये। कुरोसावा बहुत दिनों से एक बड़े पैमाने पर फिल्म बनाना चाहते थे। Red Beard (1965) के उपरांत अभिनेता Toshiro Mifune (1920-1997) और Akira Kurosawa (1910- 1998) की महान जोड़ी टूटी, तब से कुरोसावा के हालात बिगड़ते गए। नौबत यहाँ तक आयी कि उन्होंने आत्महत्या का प्रयत्न तक किया। उनकी फिल्मों से प्रभावित Star Wars के निर्देशक George Lucas और Godfather के निर्देशक Francis Ford Coppola की मदद के कारण उन्हें बुढ़ापे में फिल्मों के लिए निवेशक मिल पाया। एक फ्रेंच निर्माता ने उनकी Ran (1985) बनाने के लिये राजी हो गया। कुरोसावा इस फिल्म के लिए हर छोटे-छोटे दृश्य के चित्र अपने स्टोरीबोर्ड पर कुछ दर साल पहले से बना रखे थे। इस कहानी में एक बूढ़े राजा के तीन किले दर्शाए गए हैं। दो किले तो पुरानी जापानी किलों में शूट कर लिए गए। पर तीसरा किला, जहाँ भीषण आक्रमण और आगजनी होती है, उसे पचहत्तर साल के कुरोसावा ने बड़ी मेहनत से बनवाया। ऐसी कड़ी मेहनत और विशाल बजट का भव्य परिणाम Ran उनके पूर्ववर्ती महान फिल्मों के समकक्ष हो पाया ।

अब बात करते हैं दो अमेरिकी निर्देशकों की, जो अद्भुत रस से अभिभूत रहते हैं, जिनके चर्चा के बिना विश्व सिनेमा में अद्भुत रस के विशालता और वैभवता का अनुमान लगाना अधूरा रह जाएगा। James Cameron (जन्म 1954), जिन्होंने Aliens (1986), Titanic (1997) और Avatar (2009) जैसे बड़े बजट की भव्य फिल्में बनायीं, अपने समय की सबसे महँगी फिल्म Titanic के लिए उन्होंने ठीक वैसा ही जहाज़ (कालीन, क्रॉकरी, फर्नीचर समेत) बनवाया, और वैसी ही विभीषिका दर्शाने के लिए नवीनतम तकनीकों का प्रयोग किया। ऐसे विशिष्ट साम्य का चित्रण ही अपने आप में अद्भुत है।

Steven Spielberg  (जन्म 1946) की कृतियों में अद्भुत की अपनी विशिष्ट शैली रही है। उनकी विख्यात फिल्मों में  ET (1982),  Jurassic Park (1993), Indiana Jones Series (1984, 1989, 2008), The Adventures of Tintin (2011) दौड़ भाग के दौरान विचित्र संयोग (जैसी खोयी चीज फिर से मिल जाना, भागते हुए वाहन का सही सलामत खतरों से बच निकलना) विस्मय के रूप में हमेशा प्रस्तुत होते हैं। फिल्म E.T. the Extra-Terrestrial में अंतरिक्षवासी के चित्रण के माध्यम से उन्होंने दर्शकों को विस्मय से आनंदित करते रहे। फिल्म जुरासिक पार्क में उन्होंने विस्मय भाव पैदा करने के लिए मॉडल और कम्प्यूटर जनित चित्रों की मदद से करोड़ो साल पहले लुप्त हुए डायनासोर को परदे पर जिन्दा कर दिया। वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के शोध के विषय को सर्वसाधारण की चेतना में मनोरंजन और कला के स्तर पर ले जाने के लिए हम उनके ऋणी हैं।

जादू पर आधारित अफ़्रीकी देश माली के एक बहुत अच्छी फ़िल्म आयी थी – Yeelen (1987) । निर्देशक Souleymane Cissé ने तेरहवीं सदी के जादूगर और उसके बेटे की कहानी दिखायी है जिसमें बदमाश बाप अपने बेटे को मारने के लिए एक पवित्र लकड़ी को कंधे पर रखे लम्बी यात्रा कर रहा है । जादूगर का बेटा अपने जादू से लोगों की मदद करता है । राष्ट्रीयता और इतिहास के प्रति दृष्टि, मानवता के प्रति कर्त्तव्य, और अद्भुत का साधारणीकरण के फिल्मांकन के लिए इसे कान फिल्म समारोह में जूरी का पुरस्कार भी मिला था । 
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उपरोक्त फिल्में अपने भव्यता और तकनीक के नयेपन से लोगों को अद्भुत रस से विभोर किया। किन्ही हद तक ये सारी फिल्में अलौकिक अद्भुत रस जैसी थी।

जिस तरह घृणा और जुगुप्सा में अंतर है, उसी तरह आश्चर्य और विस्मय में अंतर है। समझने के लिये ऐसे समझें - जिसकी हमें आशा नहीं है, पर वैसा आचरण, घटना हमें आश्चर्य में डाल देती हैं। जैसे किसी फिल्म में कोई पात्र मर चुका हो, वह अगर फिर कहानी में वापस आ जाये तो आश्चर्य होगा। जिस विचार हमारे अवधारणा से बहुत हट कर हो, वह हमें अचंभे में डाल सकता है, आश्चर्य पैदा कर सकता है। लेकिन जिस अवधारणा में किसी दूसरी अवधारणा का कोई संभावना न हो, उसका हो जाना विस्मय कहलाता है। अधिकतर इसका अर्थ सुखद रूप में लिया जाता है। अब कोई गरीब आदमी जिसने कभी महल-अट्टालिका न देखा, वह उसकी भव्यता देख कर विस्मित हो जायेगा। जैसे मैंने कभी राजस्थान के किले नहीं देखे। अत: यह संभव है प्रत्यक्ष दर्शन में किले की विलक्षणता से मुझे विस्मय में डाल दे। अब दूसरे तरह का विस्मय हुआ अनपेक्षित हर्ष, जिसकी संभावना नगण्य हो वैसा विलक्षण कुछ हो जाना।

बहुधा हर्ष का कारण ज्ञानेन्द्रियाँ के मन से सन्निकर्ष से होने वाला सुख से होता है। इस तरह अनपेक्षित हर्ष के उदाहरण कुछ इस तरह से हैं।

दृष्टि के लिये तारकोवस्की The Mirror (Zerkalo – 1975) में साधारण दृश्य असाधारण रूप से लिये हुये हैं। इसी तरह Kurosawa की सन 1990 में आयी जादुई यथार्थ वाली Dreams, जो संवाद की अपेक्षा दृश्य पर निर्भर है विशेष उल्लेखनीय है। इसके पहले दो अध्याय बड़े मनोरम हैं। कहते हैं बारिश में लोमड़ियों की शादी होती है। ऐसे में एक बालक चुपके से लोमड़ियों की शादी का नृत्य देख लेता है। जिसके कारण उसे उसकी माँ आत्महत्या करने के लिये कहती है। बच्चा लोमड़ियों से माफी माँगने के लिये घर से निकलता और एक इंद्रधनुष देखता है। दूसरे अध्याय में आड़ू के बगीचे का प्रतीकात्मक नृत्य कथानक और दृष्टि दोनो ही रूप से अद्भुत बनी हैं।  अमेरीकी निर्देशक Peter Jackson (b 1961) की  लॉर्ड अॉफ द रिंग्स की तीनों फिल्में (LOTR – 2001, 2002, 2003) अपनी अद्भुत दृश्य के लिये ही जानी जाती है। Stanley Kubrick की सन 1968में आयी 2001 A Space Odyssey अंतरिक्ष औऱ  अंतरिक्ष यानों के सुंदर दृश्यों के कारण अविस्मरणीय है। सन 2011 में बनी पोलिश -स्वीडिश फिल्म The Mill and the Cross, एक पेंटिग में दर्शाये 500 चरित्रों में कुछ दर्जन पात्रों को दर्शाती है। इसका एक-एक फ्रेम ऐसा लगता है जैसे किसी ने सुंदर पेंटिग बना रखी है।

जिसने भी विजय भट्ट द्वारा निर्देशित, मीना कुमारी और भारत भूषण द्वारा अभिनीत बैजू बावरा (1952) या कुंदन लाल सहगल की तानसेन (1943) देखी हो, यह समझ सकता है कि संगीत का जादू पानी में आग लगा सकता है, बुझे दीपक जला सकता है, या सोयी कली को खिला कर उस में छुपे भँवर को आजाद कर सकता है। सुनने के आधार पर संगीत का अद्भुत चित्रण महान संगीतकार मोजार्ट की जिंदगी पर बनी Milos Forman की 1984 में बनी Amadeus, जिसमें बीमार मोजार्ट की अंतिम और महानतम रचना 'रिक्विम' की कहानी फिल्म के कथानक का अद्भुत हिस्सा हैं। बहुत कम लोग जानते होंगे कि मोजार्ट और लगभग बहरे हो चुके बीथोफेन ने अपनी कई महान संगीत रचना जनता को प्रस्तुत करने से पहले बिना किसी तोड़ मरोड़ के मन मे रच कर एक ही बार में कागज में संगीत के संकेतों में उतार लिया करते थे। म्यूजिकल फिल्मों में The Sound of Music (1965), Singin' in the Rain (1952), My Fair Lady (1964) फिल्में अद्भुत की श्रेणी में इसलिये आती हैं कि ये अनजाने में कहीं मन में बैठ जाती हैं कि अच्छा सुनने के लिये अच्छी तरह से बोलना और शुद्ध उच्चारण करना बेहद आवश्यक है।

डेनमार्क में बनी कैरिन ब्लिक्सन की कहानी पर बनी Babett's Feast (1987) एक अच्छा भोजन और उसकी लगभग चमत्कारी प्रभाव को दर्शाती महान फिल्म हैं- इसे विदेशी फिल्म के लिये अॉस्कर अवार्ड भी मिला था। बैबेट के बनाये भोजन का ये आलम था कि कुछ रेस्तराँ बैबेट के बनाये खाने का मेनू विशेष रूप से चलाने लगे थे।

जर्मन निर्देशक की फिल्म Perfume - the story of a murder (2006) पैट्रिक सस्किंड के उपन्यास परफ्यूम पर आधारित थी। इस फिल्म में एक अनाथ लड़के को गंध पहचानने औऱ इस तरह नये तरह के इत्र बनाने की कुदरती देन होती है। एक महान गंध बनाने के लिये वह कई खूबसूरत लड़कियों की हत्यायें करने लगता है, अंतत: एक विश्वविजयी इत्र बनाने में वह कामयाब भी हो जाता है]

Bonnie & Clyde और The Chase के लिये मशहूर निर्देशक Arthur Penn (1922- 2010) ने कैरियर के शुरुआत में हेलेन कीलर की आत्मकथा पर आधारित The Miracle Worker (1962) में एक गूँगी बहरी बच्ची को स्पर्श की मदद से सिखाने की कोशिश करती अद्भुत फिल्म बनायी। जब उसकी शिक्षिका और माँ-पिता सब निराश हो चुके होते हैं, तब जिस तरह पानी को छू कर बच्ची उसका नाम पुकारती है, वह अद्भुत है।

इस तरह से सिनेमा हो या कोई भी कला का माध्यम, सबसे पहले ये एक तरह के चमत्कार हैं। एक अच्छी कविता, एक मधुर गीत, मनोहर संगीत रचना, एक मनोरम चित्र सब कुछ अजूबा है। फ़ूलों में जो खुशबू आये अजूबा है, तितली जो सारे रंग लाये अजूबा है, बांसुरी का ये संगीत अजूबा है, कोयल जो गाती है गीत अजूबा है। जो भी इस अजूबे को महसूस कर सकता है, वह कभी बूढ़ा नहीं हो सकता है। यह किसी तरह से वृद्धों का उपहास नहीं है, क्योंकि पारंपरिक रूप से वृद्धावस्था में ज्ञान, और शुद्ध ज्ञान में समस्त विश्व से अरूचि या वैराग्य शोभित माना जाता है।

कई दार्शनिकों के अनुसार भ्रान्ति, मरीचिका, भ्रम ही मनोरंजन की साधारण शुरुआत है। कला बहुत से भ्रमों का सहारा ले कर मन में ओढ़ लिए भ्रम से मानव को सत्य की तरफ ले जाने का संघर्ष है।

महान जर्मन दार्शनिक कांट मनोरंजन और सौंदर्य अनुभूति में फ़र्क करने के लिए एक उदहारण देते हैं - अगर आप किसी भोजन समारोह में शामिल होते हैं, जहाँ पार्श्व संगीत बज रहा हो। वहाँ पर उस मनोरंजक संगीत की उपलब्धि बस इतनी सी है कि आपका समय व्यतीत हो जाये और आपको उसका पता भी न चले। वह सौंदर्य की अनुभूति से हट कर केवल समय व्यतीत करने का साधन है।

केवल मन के रंगे रहने से बढ़ कर उसके मंदिर में स्थायी भावों की घंटियों का आन्दोलन कला की उपलब्धि और सार्थकता है। उत्तम कला की सामर्थ्य प्रवृत्ति भावों का रसास्वादन और मानस में सत्य की स्थापना है। सत्य जटिल है, कठिन है, अतः कला भी उतनी ही अंतहीन संभावनायें लिए युग-युगान्तर तक हमें विस्मित करती रहेंगी।

अगले लेख में हम वीर रस पर नजर डालेंगे।