Tuesday, September 16, 2014

जहाँ 'अलग दिखना और अलग होने में फर्क था'

इन दिनों अल्पना मिश्र के उपन्यास 'अन्हियारे में तलछट चमका' की बड़ी चर्चा है. आम तौर पर किसी साहित्यिक कृति की ज्यादा चर्चा होती है तो संदेह होने लगता है कि मामला प्रायोजित तो नहीं. वैसे भी अल्पना जी 'फील गुड टाइप लेखिका हैं. इससे ज्यादा उनके लेखन को मैंने कभी नहीं समझा. लेकिन अभी हाल में ही युवा आलोचक सुदीप्ति का यह लेख पढ़ा, जो उनके इसी उपन्यास पर है तो लगा कि उपन्यास अब तक नहीं पढ़ कर गलती की है. अब समय मिलते ही इस गलती को सुधारने का प्रयास करूँगा. बहरहाल, यह लेख पढ़िए, जो मेरे जानते अब तक 'अन्हियारे में तलछट चमका' उपन्यास की सबसे विस्तृत और सम्यक समीक्षा है- प्रभात रंजन 


उपन्यास का कलेवर वृहद हो या लघु, पाठक को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. फर्क तो पड़ता है कथावस्तु के कसाव और उसकी कहन-शैली की रोचकता से. जो उपन्यास अपने भीतर कथा की ऐसी  सम्पन्नता लिए होते हैं, जिससे कि पाठक की कल्पना का विस्तार हो, उसके अनुभव-संसार से कुछ घटित या अघटित रूप से जुड़ता हुआ महसूस हो रहा हो और जो उसके भाव-जगत का स्पर्श करता हो, वह पाठक-प्रिय बन जाता है. ऐसा उपन्यास अगर सात सौ पन्नों का भी हो तो पाठक उसे पढ़ते हुए मानो उससे चिपक जाते हैं, और ऐसा न हो तो दो-चार पन्ने पढ़ कर ही ऊबने लगते हैं और उसको अनंत अवकाश के किसी काल खंड के लिए रख देते हैं. ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ हमारे समय की सशक्त कहानीकार अल्पना मिश्र का पहला उपन्यास है. उन्होंने इसमें औपन्यासिक विस्तार को जिस संतुलित अंदाज में साधा है, वह कथा कहने-बुनने की उनकी परिपक्वता को दर्शाता है. कथा-प्रसंगों की कसावट ऐसी है कि उपन्यास अनावश्यक विस्तार में शुरू से अंत तक कहीं भटकता नहीं.

‘अन्हियारे तलछट में चमका’ पूर्वांचल के लगभग समकालीन कालखंड का जीवंत महाख्यान है. उपन्यास को समझने के लिए पहला उपशीर्षक ‘चिंदी चिंदी : रंग रंग (आत्मकथा-1)’ के दो छोटे-छोटे वाक्य सूत्र की तरह काम करते हैं: “अलग दिखना और अलग होने में फर्क था” और “छोटे-छोटे टुकड़े ही जहाँ-तहां से हाथ आते थे”. नायिका या कि नैरेटर या बिट्टो अपने जिए हुए और देखे-समझे जीवन के छोटे-छोटे टुकड़े हमारे सामने रखती है जिनसे समाज का समग्र चित्र उपस्थित हो जाता है. अल्पना जी की शैली की विशिष्टता शब्दों की मितव्ययिता के साथ थोड़ा कह बहुत समझा देने की है. एक छोटे से प्रसंग से वो कई बार एक पूरी कहानी कह डालती हैं. ये छोटे-छोटे प्रसंग ही दरअसल जहाँ- तहां से हाथ आए छोटे-छोटे टुकड़े हैं. बिट्टो अपनी और मौसी के संयुक्त परिवार की कहानी अलग-अलग कहती है. दूसरी कहानी से वह अलग दिखती है, पर क्या वाकई वह है? उसका जीवन-संघर्ष जरुर अलग है. और शचीन्द्र, जो अलग दिखने का भ्रम पैदा करता है, पर है तो नहीं! इसीलिए “अलग दिखना और अलग होने में फर्क था”

‘अन्हियारे तलछट में चमका’ तीन स्त्रियों के माध्यम से एक पतनशील समाज के सबसे अँधेरे समय का महाख्यान है. इस आख्यान को हम रिपोर्ताजों में नहीं पा सकते. यह इतिहास में भी दर्ज नहीं होता. यह सच का वह चेहरा है जो साहित्य की बुनियाद बने तो उसमें मानवीय आस्था बनी रहती है. उपन्यास में समय और स्थान को स्पष्ट रूप से रेखांकित नहीं किया गया है, लेकिन परिवेश, घटनाएं, स्थितियां, पात्र, भाषा आदि यह स्पष्ट कर देते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का कोई भी क़स्बा या छोटा शहर इसकी कथाभूमि हो सकता है. लोकेल का एक नाम के रूप में चिन्हित न किया जाना सायास है. यह उपन्यास की ताकत है क्योंकि इससे कथाभूमि पूर्वांचल के किसी भी कस्बे की हो सकती है. इससे यह उपन्यास कथाकार की कोरी कल्पना नहीं, नब्बे के दशक के बाद के पूर्वांचल का संवेदनात्मक इतिहास हो जाता है. समाज के समकालीन जीवन-चित्रों की कथात्मक प्रस्तुति— जिसमें असंभव समय के गाढ़े अँधेरे में जीवन की संभावना की तमाम बारीक रेखाएं चमकती हुई दिख रही हों— जोखिम से भरा कार्य है, जिसे प्रभावी रूप से अल्पना जी ने संपन्न किया है.

यह उपन्यास मुझे मेरे किशोर वय के हाई स्कूल वाले दिनों में ले जाता है. तब हाईकोर्ट ने बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा संचालित मैट्रिक परीक्षा की निगरानी का दायित्व अपने जिम्मे नहीं लिया था और मजाक में यह भी कहा जाने लगा था कि ‘कुर्सी, टेबल, भैंस तक बिहार से मैट्रिक पास कर सकते हैं’. उस समय यूपी वाले पास होने बिहार में आने लगे थे, जबकि उसके पहले और बाद के दिनों में भी जो बिहार में असफल रहते, उनका फॉर्म यू.पी. (सीमांत भाटपार रानी, देवरिया आदि) से भरा जाता था. इस मामले में वह बिहार का अभूतपूर्व पतनशील दौर था जिसमें कॉपियां घर आ जाती थीं, स्पेशल फ़ीस देकर अलग कमरे में कॉपी लिखवाई जाती थी, परीक्षा से पहले ही हल किए हुए पर्चे बिकते थे और लोग सामूहिक रूप से खरीद कर अपने बच्चों को उपलब्ध करवाते थे. सब तरह की सलाहियतों के अलग-अलग रेट थे. और तुर्रा यह कि उसमें भी रिजल्ट आने पर लोग सगर्व बताते थे. अब कहना यह भी जरुरी है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की स्थिति भी इससे बेहतर शायद ही कभी रही. एक बेशर्म समय की  ऐसी मूल्यहीन शिक्षा प्रणाली का यथार्थ चित्र है ‘विद्या का मंदिर उर्फ लिखा जाना एक निबंध का’. कुछ लोगों को वह वर्णन सुर्रिअल लग सकता है, लेकिन विद्या के मंदिरों की सच्चाई पिटते हुए रिक्शेवाले के इस कथन से स्वतः स्पष्ट है, “कुल मिलकर जुआरी-कबाड़ी है. पढ़े-लिखे से कौनो मतलब नाहीं, खाली झगड़ा-फसाद-गुंडागर्दी में नंबर-वन. विद्या का मंदिर कहात है साला...”  

‘अन्हियारे तलछट में चमका’ मुख्यत: दो पीढ़ियों की चार औरतों— माँ, बिट्टो, मुन्ना बो, ननकी— के सहारे एक जबदे हुए समय में ठिठके हुए समाज से भागने की जुगत में लगे लोगों और संघर्षरत औरतों की कहानी है. ‘ख़ामोशी थी, आवाज़ का किरदार था (आत्मकथा- 2)’ उपशीर्षक में माँ कहती है, “भागकर आदमी कहाँ तक जा सकता है?” बंधे हुए समाज के लोग घर, परिवार, समाज के सर्वव्यापी घुटन से भागना चाहते हैं, लेकिन क्या संभव हो पाता है? बेटी ससुराल से भाग आई है और माँ जिंदगी भर का जाना-सुना डर सामने रखती है कि औरतों के लिए भीतर-बाहर दोनों जगह— यानी घर और घर के बाहर—  नरक है. आखिर लड़कियां भागें भी तो कहाँ? मुन्ना बो (बहू) यानी सुमन प्रेम करके भागी तो ससुराल, मायके हर जगह नौकरानी से भी बदतर जिंदगी मिली. मुन्ना सउदी के सपनीले रास्ते से अमीर बनने के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले महत्वाकांक्षी युवकों का प्रतिनिधि चरित्र है. जो घर में ही फरेब कर अमीर बनने के छोटे रास्तों की तलाश में भाग गया और दो वक़्त की रोटी के लिए पत्नी को परिवार के भीतर ही मजूरी करनी पड़ी.

ऐसे में माँ कहती है कि, “अंदर के नरक में एक की मार है, बाहर के नरक में मार ही मार है”. बेटी इस भाषण से चिढ़कर उस पर तंज कसती है, “कमाता हुआ आदमी भागे तो बात कुछ और होगी?” माँ कमाऊ है, पर उसके पैसे पर उसका हक नहीं. उसके अनुभव में, “कमाओ या न कमाओ, पैसा तो वही लोग रख लेंगे, जिसके कब्जे में पहुंच जाओ. धन पर औरत का अधिकार कहाँ रहने देते हैं?”. इसका अनुभव स्वयं नायिका को भी बाद में हो जाता है जब शचीन्द्र उसके पैसों से अपना ख्याल रखता है और उससे कुछ पूछता तक नहीं. पिछली पीढ़ी से आज की पीढ़ी तक औरतों को संपत्ति पर अधिकार कहाँ मिल पाया है?  

अब माँ की नज़र से मुन्ना बो के जीवन को देखिए. उसके जीवन की धुरी है दुकान. दुकान की वजह से मुन्ना को उससे प्रेम हुआ. दुकान के लिए ससुराल वाले मुन्ना की अनुपस्थिति में भी उसे अपने पास रखे हुए हैं. दुकान के लिए मायके वाले उससे चिपके हुए हैं और दुकान तो उससे इसलिए चलवाई जाती है ताकि आमदनी हो, लेकिन उसी आमदनी पर उसका हक नहीं. जो दुकान मुन्ना के हाथों नहीं चली वही मुन्ना बो के हाथ से चकाचक हो गयी. वास्तव में, घर परिवार के लोग विज्ञापन की सैद्धांतिकी से भले ही परिचित न हों पर व्यावहारिक रूप से जानते हैं कि स्त्रियाँ किसी वस्तु को बेचें तो ग्राहक ज्यादा आकर्षित होता है. कोई डियोड्रेन्ट और बाईक बेचने के लिए स्त्री की सेक्सुअलिटी को भुनाता है तो वैसे विज्ञापनों के समय में जीनेवाला कस्बाई आम आदमी भी स्त्री देह को व्यापारिक टूल बनाने से अनभिज्ञ नहीं है. 

स्त्रियों के लिए दुनिया आज भी नहीं बदली है. हमारे देश में ही लाखों स्त्रियां अगर अपनी कमाई अपने हाथ में ही रखना चाहें तो हिंसा, प्रताड़ना और विवाह-विच्छेद जैसी चीजें झेलती हैं. बंधुआ मजदूरों सी होती हैं अधिकांश कमाऊं बहुएं जो अपनी कमाई लाकर मालिक के हाथ में दे घर पर मजदूरी में जुट जाती हैं. हल्का विरोध जताया नहीं कि मार-पीट शुरू. इस उपन्यास के द्वारा हम स्त्रियों की इस समस्या पर फिर से विचार करने को प्रस्तुत होते हैं कि मात्र आर्थिक स्वावलंबन ही उनकी मुक्ति का हथियार नहीं बन सकता है, जब तक आर्थिक स्वतंत्रता नहीं प्राप्त होगी. यह उपन्यास हमारे सामाजिक सन्दर्भ में एक बड़ा सवाल उठाता है कि क्या आर्थिक स्वावलंबन हासिल कर लेने भर से औरतों को बराबरी मिल जायेगी? माँ अपने ही कमाए पैसों से चोरी करके मौसी को भेजती है और सुमन अपनी ही आमदनी से छिपाकर दामोदर को देती है.

आज घर-घर में घुस आए टी.वी. का उपन्यास में कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं, लेकिन ननकी और मनोहर जैसे चरित्रों की बुनावट में टी.वी. और फिल्मों का प्रभाव हम देख सकते हैं. उपन्यास में ननकी बाद में समाज के बंधन को काटने को उत्सुक एक युवती के रूप में सामने आती है. परन्तु आरम्भ में ‘बॉयफ्रेंड’ से मिलने के लिए सज-संवर कर इठलाते हुए जाती किशोरी पर फिल्मों/धारवाहिकों में दिखायी जा रही डेटिंग की प्रेरणा लक्षित की जा सकती है. वह बॉयफ्रेंड की ललक में बड़ी उम्र के एक ऐसे व्यक्ति के चक्कर में फंस जाती है जो प्रेम के नाम पर देह को भोग, गर्भबीज बोकर भाग जाता है. ननकी अपनी संतान को जन्म देने पर अड़ जाती है. पिता अपनी इज्जत बचाने की फेर में उसकी शादी एक बूढ़े से करवा कर छुट्टी पाना चाहता है, पर वह उस बूढ़े को अपनी हकीकत बता आती है. शादी होते-होते टूटने की ओर है और पिता अपनी झूठी इज्जत बचाने के लिए उसकी हत्या को आत्महत्या की शक्ल दे देता है. ननकी का विवाहपूर्व गर्भधारण और बच्चे को जन्म देने की जिद्द उसकी हत्या का कारण बनता है. उस बच्चे को वह झूठे विवाह द्वारा पिता का एक छद्म दे देती तो समाज को स्वीकार्य हो जाता, लेकिन उसकी ईमानदारी समाज को बर्दाश्त नहीं. जिस परिवार ने बेटे का अपने से नीची जाति की स्त्री को भगाकर विवाह कर लेना स्वीकार कर लिया था, उसी ने बेटी को प्रेम की सजा के रूप में मौत की नींद सुला दिया. यह पूर्वांचल के समाज का थोड़ा ढंका हुआ सच है. यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब की ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं की तरह सुर्ख़ियों में नहीं आता. लेकिन पूर्वांचल की स्थिति भी यही है कि लड़कों के मामले में सवर्ण जिस सम्बन्ध को स्वीकार कर लेते हैं, लड़कियों के मामले में उनका नपुंसक क्रोध हत्या को आत्महत्या की शक्ल देने में जुट जाता है. पुलिस हत्या-आत्महत्या के द्वंद्व से उबारने के पैसे लेकर शांत हो जाती है, ठीक वैसे ही जैसा उपन्यास में वर्णित है.   
 
मौसी के परिवार की कथा के द्वारा एक वृहत्तर समाज का चित्रांकन हुआ है. एक बार पाठक को लग सकता है कि मुन्ना, दामोदर, कान्हा तिवारी, मनोहर के रूप में अवसर-लोलुप, पलायनवादी, दिवा-स्वप्नदर्शी, कायर कस्बाई, धर्मभीरू बेरोजगार, अवसर और रोजगार के अभाव में अपराध की तरफ बढ़ता गुंडानुमा युवक और एक आवारा, नाकारा, फिस्सड्डी किशोर सब एक ही घर में कैसे? वास्तव में, ये सब सड़ांध से भरे हुए समाज के प्रतिनिधि चेहरे हैं, जिन्हें एक साथ लाकर लेखिका ने सम्पूर्ण समाज को पुनर्रचित किया है. लेखिका ने उपन्यास के कलेवर को संक्षिप्त रखने के लिए प्रयत्नपूर्वक इन सबको एक ही घर में दिखाया है. जैसे आजकल के धारावाहिकों में एक-दो परिवारों में ही सभी प्रकार के पात्र होते हैं और सारी अच्छी-बुरी घटनाएँ वहीँ घटित होती हैं. अगर इन प्रतिनिधि चरित्रों को लेखिका विस्तृत समाज में ले जातीं तो उपन्यास में कथा को अपेक्षाकृत व्यापक विस्तार मिलता, लेकिन जो नहीं है वह खटकता भी नहीं.

इनसे अलग और आज का तथाकथित प्रगतिशील चरित्र है शचीन्द्र. खास प्रजाति है ऐसे पुरुषों की. ये प्रगतिशील, नारीवादी, उदार सब होते हैं, लेकिन सूडो, फेक या नकली. विडम्बना यह है कि स्त्रियां इनकी प्रशंसा करते नहीं थकतीं और पुरुषों में ऐसे लोग अग्रणी माने जाते हैं. जब बिट्टो ने नौकरी मिलने की सूचना दी, तब जाकर शचीन्द्र का असली उछाह दिखा, तब जाकर उसके शब्दों और हाव-भाव में सम्बन्ध की स्वीकारोक्ति जैसी हो आई. उसी के साथ यह संवाद भी, “मैं यौन शुचिता को नहीं मानता. तू पवित्र है मेरे लिए. उतनी ही जितनी हमेशा से थी.” मैं भी सोचती थी कि दिन-ब-दिन हमारे देश में प्रगतिशील-पुरुषों की संख्या तो बढ़ती ही जा रही है, पर ये कौन से सत्तर-पचहत्तर प्रतिशत पुरुष हैं जो ‘इण्डिया टुडे’ के सेक्स सर्वे में वर्जिन बीवी ही चाहते हैं? अब पता चला. पवित्रता या कि यौन शुचिता भी पुरुषों के लिए सापेक्षिक ही है.

बिट्टो और शचीन्द्र की कथा हमें कुछ सवालों पर लाकर छोडती है. बिट्टो ने ससुराल तो तभी छोड़ा जबकि पति से कुछ दिक्कतें थीं. संकेत में आया भी है— मारना-पीटना जैसा कुछ. शचींद्र से सम्बन्ध उसने स्वयं चुना है, लेकिन अपनी कुंठा में शचीन्द्र कहाँ पहुँच गया? क्या वह एक पारंपरिक पति की तरह व्यवहार नहीं करता है? अपनी नपुंसकता का इलाज बिट्टो को शराब पिलाकर करना चाहता है, डॉक्टर की बात सुनकर झुंझला उठता है, सलाह दिए जाने पर झापड़, लात-जूतों की बौछार कर डालता है. कितना सच है नायिका का सोचना, “नर्क! जिसके लिए मेरी माँ हर वक़्त चेताती रहती थी! जिसका एक हिस्सा झेलकर मैं भाग आयी थी. जिसका दूसरा हिस्सा झेलती मैं यहाँ बैठी हूँ! जिसका कोई तीसरा, चौथा हिस्सा भी होगा!” क्या प्रेम के बाद मित्रता का तंतु समाप्त हो जाता है? क्या स्त्री-पुरुष सम्बन्ध में बराबरी केवल हवाई बातें है? क्या वाकई स्त्री जिसके कब्जे में होती है उसका अधिकार उसके पैसे पर हो जाता है? जीवन के ऐसे सामान्य से प्रश्न हमें झकझोर देते हैं. लेकिन ये प्रश्न सामंती समाज के खदबदाते सच हैं.

शचीन्द्र की मुख्य समस्या उसकी यौन अक्षमता नहीं, बल्कि उस अक्षमता का अस्वीकार और तरह-तरह के उपायों-टोटकों से बिट्टो की देह को बार-बार गींजना और लांछित करना है. नायिका सोचती है, “देह के छोटे से सुख के लिए आदमी का इतना बड़ा प्रेम ठुकराया नहीं जा सकता.” लेकिन अगर वह आदमी ही वही न रहे जिससे प्रेम हुआ हो तब? एक औरत पुरुष साथी से दैहिक संतुष्टि मात्र तो नहीं चाहती. देह की अतृप्ति सही जा सकती है, पर मन की पाशविकता का क्या उपाय? अपने पति से मिले दुखों को बांटने की इच्छा रखती बिट्टो से शचीन्द्र उसके शारीरिक अनुभवों की बात पूछता है ताकि उससे लाभ ले सके. इससे अधिक घृणित पुरुष मानसिकता क्या होगी? पुरुष स्त्री को ‘भोगने’ के लिए नहीं, उसको अपने पुरुषत्व के धाक में लाने के लिए, उसको आक्रांत करने के लिए प्रयत्नशील रहता है लेकिन वह नहीं समझता कि मैत्री-भाव की कोमल संवेदनशीलता से  स्त्री-मन को सदा के लिए विजित किया जा सकता है. उसके दुर्दमनीय पौरुष का बल उसी के झूठे अहम् की तृप्ति करता है. पितृसत्तमक समाज में पुरुष अपने पौरुष के मानक स्वयं गढ़ता है और स्त्री तो मात्र उन प्रयोगों की भूमि होती है.

सामंती परिवार में स्त्री भोग की वस्तु मात्र होती है. मुन्ना बो यानी सुमन सबकी लोलुपता के केंद्र में है. भले दामोदर से लेकर गुंडई पर उतर आये कान्हा तिवारी तक उसके इर्द-गिर्द मंडराते हैं. वह मुन्ना के पाशविक व्यवहार से लेकर चचियाससुर गिरधारी तिवारी के स्पर्श-युक्त प्रेम-निवेदन तक को झेलती है. सुमन की कथा संस्कारी, इज्जत के नाम पर बेटी का गला घोंटने वाले परिवार में एक स्त्री की सुरक्षा का पोल खोलती है. जिस स्त्री-शरीर से इज्जत का छद्म जोड़ा जाता है उसी के लिए प्रेम के खेल से लेकर षडयंत्र का जाल तक बुना जाना एक अँधेरे समाज की वह हकीकत है जिसे आप अनदेखा नहीं कर सकते.

सुमन उस जीवन से निकलने और भागने के लिए दामोदर के भावुक प्रेम पर यकीन करती है. निर्णय तो बिट्टो भी लेती है. जिस राह को कहीं नहीं जाना था, जिस सम्बन्ध में अब जीवंतता नहीं बची थी, उसके अंत का. पूरा उपन्यास चाहे जितनी समस्याओं और अँधेरे से घिरा है, पर अंत की तरफ आते-आते रोशनी की किरण चमकती हैं इन तीन औरतों के फैसलों से. सुमन का घर और झूठे वैवाहिक संबंध को छोड़ दामोदर के साथ नया जीवन शुरू करने का फैसला, बिट्टो का शचीन्द्र को और नहीं झेलने का फैसला और माँ का बिट्टो के आगे पढ़ने के लिए फॉर्म लेकर आना. माँ का अप्रत्याशित निर्णय हमें चौंकानेवाला है. लेकिन माँ जिसने हमेशा नियति का स्वीकार किया उसका फैसला बड़ा और उम्मीदों से भरा है.  

अल्पना जी के इस उपन्यास में दो तरह की भाषा साथ-साथ चलती है. एक वह जिसमें बिट्टो अपनी कथा कहती है. यानी ‘आत्मकथा’ 1 से 4 तक. इसकी शैली ऐसी है मानो कोई डायरी लिख रहा हो. आत्मीयता और निजता से भरी इस शैली में पाठक संवेदना को अपनी कहानी से जोड़ लेने की क्षमता है. वहीँ मौसी के परिवार की कथा चित्रण की शैली में है. वहाँ भाषा यथार्थ-चित्रण के अनुकूल तटस्थ है, जिसके साथ पाठक समाज पर आलोचनात्मक चिंतन कर सकता है. इन दोनों शैलियों से भिन्न विशुद्ध काव्यात्मक गद्य के उदहारण हैं इस उपन्यास के उपशीर्षक. ‘ख़ामोशी थी, आवाज़ का किरदार था’, ‘स्वर्ण-मृग और झील मन की हलचल’, ‘मनसेधू, तोरा नगर बासंती’, ‘बेचैन सहस्त्रधाराओं के राग-रंग थे’- जैसे काव्यात्मक उपशीर्षक इस उपन्यास के नायाब नगीने हैं.
न्हियारे तलछट में चमका (उपन्यास) | अल्पना मिश्र
प्रकाशक : आधार प्रकाशन प्रा. लिमिटेड, पंचकूला (हरियाणा) | मूल्य : 80 रु


सुदीप्ति | singhsudipti@gmail.com
मेयो कॉलेज गर्ल्स स्कूल | मेयो लिंक रोड | अजमेर | राजस्थान | पिन- 305008   

'नया ज्ञानोदय' से साभार 


Monday, September 15, 2014

मैं साहित्य की एक्स्ट्रा कैरीक्यूलर एक्टीविटीज़ में बहुत कमजोर रहा

13 सितम्बर को दिवंगत कवि भगवत रावत की जयंती थी. जीवन की आपाधापी में हम इतने उलझ गए हैं कि सही समय पर हम अपने वरिष्ठों को याद भी नहीं कर पाते. बहरहाल, आज उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए उनके एक पुराने साक्षात्कार का सम्पादित रूप दे रहे हैं जो नरेश चन्द्रकर ने लिया था- जानकी पुल.
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प्रश्न- आप इन दिनों गम्भीर रूप से अस्वस्थ हैं। अपने शारीरिक कष्टों से तटस्थ रहने की ताकत कहाँ से मिलती है? कविता सँभालती है या आप कविता को?

मेरा अपना अनुभव यह है कि जब-जब मुझे शारीरिक व्याधियों ने सताया, उन्हें सहन करने की ताकत भी कहीं उन व्याधियों में ही छिपी मिली। दरअसल तकलीफों से भागा तो जा नहीं सकता, तो सिर्फ़ एक ही रास्ता बचता है कि उनसे दोस्ती कर ली जाए। उनमें ही से ऐसे कुछ रास्ते या जगहें निकल आती हैं जो आपको जीने का वक्त मुहैया कराती रहती हैं। शारीरिक या मानसिक किसी तरह के कष्टों से कोई भी तटस्थ नहीं रह सकता। सिद्ध योगियों की तरह के लोग रह लेते होंगे। मनुष्य तो तटस्थ रह नहीं सकता। तो सिर्फ़ यही रास्ता बचता है कि उस तकलीफ के साथ जीना सीख लिया जाए। ऐसे में कविता आपके जीने का मनोबल बढ़ाती हैं। आपको लगता रहता है कि आप निरर्थक नहीं हुए हैं। आपका जीवन निरर्थक नहीं हुआ है। इस अर्थ में कविता मुझे बहुत बल देती है। मैं कविता को कितना क्या दे पाता हूँ, पता नहीं। वैसे भी आग, हवा, पानी, नदी, तालाब, पेड़-पौधों से आप लेते ही लेते हैं- उन्हें देते क्या हैं। कविता इसी तरह है।

प्रश्न- आज आप सत्तर के करीब हैं। प्रत्येक कवि किसी समय में अपनी कलम से जोर और जादू पैदा करता है। आपके जीवन में वह समय कब था? कुछ याद करेंगे?

मुझे नहीं पता कि मेरी कलम ने कब जोर और जादू पैदा किया या किसी भी कि नहीं। पता होगा तो पाठकों को होगा। पर मैं जोर और जादू जैसी कविता के लिए उपयोग की जाने वाली शब्दावली से सहमत हूँ और न अवधारणा से। कविता कोई चमत्कार पैदा करने के लिए नहीं लिखता- कम से कम मैं तो कतई नहीं। जो ऐसा करते भी हैं वे कुछ दिन आतिशबाजी करके रह जाते हैं। कविता न तो कोई उत्सव है, न जीवन का विलाप। वह तो जीवन के साथ-साथ चलती रहने वाली, उसके संघर्ष में साथ-साथ नदी के प्रवाह की तरह सतत बहने वाली चीज़ है। उसकी निरन्तरता में ही उसकी सार्थकता है। सो पिछले पचास से अधिक वर्षों से जिस तरह लिखता रहा, उसी तरह आज तक लिख रहा हूँ। यह खुली हुई किताब की तरह सबके सामने है। इन वर्षों में कब मेरी कविता ने पाठकों को लुभाया ये तो वही जानते हैं। मैं इतना भर जानता हूँ कि मेरे पाठक बहुत हैं- इतने कि मैंने कल्पना नहीं की थी। मैं उन कवियों की तरह नहीं हूँ जो इने-गिने आलोचकों के लिए लिखते हैं और सौ-डेढ़ सौ तथाकथित बौद्धिकों के बीच ऊपर-नीचे होते रहते हैं। समकालीन कविता की इस तरह की प्रायोजित दौड़ में मैंने कभी हिस्सा ही नहीं लिया। शायद यही कारण है कि अब इस उम्र तक आते-आते मुझे महत्त्वपूर्ण कवि तो माना जा रहा है पर कहा यह जा रहा है कि मैं मुख्यधारा से बाहर का हूँ। ये वही लोग कह रहे हैं जो अब मुझ पर कुछ कहने को विवश हुए हैं। पर मुख्यधारा का अर्थ क्या है- यह कोई बताता नहीं। न तो उसके मानकों का पता है, न जीवन-दृष्टि और मूल्यों का। कोई कहीं भी रहकर यदि अपने समय की विसंगतियों, जटिलताओं और विरोधाभासों को पहचान रहा है और उनसे गुज़रते हुए मनुष्य की जिजीविषा और उसके संघर्ष के अनुभवों को अपनी कविता में चरितार्थ कर रहा है तो वह कौन-सी बोली-बानी बोलता है, कौन-सी भाषा का प्रयोग कर रहा है- इससे क्या फ़र्क पड़ता है- अगर वह सच्चे अर्थों में कविता की सभी शर्तों के साथ लोगों तक पहुँच रहा है। क्या इतना काफी नहीं है। फिर वह मुख्यधारा और गौणधारा क्या होती है।

साहित्य में इस तरह के विभाजन न सिर्फ़ घातक है, उसको सम्पूर्णता में न देखने की एक नकली बौद्धिक परिकल्पना है। जो राजनेता अपने ही स्वार्थ में डूबे हुए केवल सत्ता की राजनीति करते हैं- क्या आप उन्हें ही सामाजिक संघर्ष की मुख्यधारा में मानेंगे? और मेधा पाटकर और अरुन्धती राय जैसी प्रतिभा सम्पन्न, साहसी और निर्भीक लोगों के सामाजिक संघर्ष को गौणधारा में डाल देंगे। क्योंकि वे ज़्यादातर समाचार पत्रों की हेडलाइन नहीं बनतीं। क्योंकि वे देश के कोनों-अँतरों में चुपचाप अपना काम करती हैं। अफसोस तो ये है कि इस शब्दावली का प्रयोग ज़्यादातर हमारे वामपंथी आलोचक करते हैं- और कोई उनसे पूछता नहीं कि वर्गीकरण का यह विचार किस अर्थ में वामपंथी दृष्टि का परिचय देता है।

प्रश्न- आपसे जब भी मुलाकात की, आपमें आत्मग्रस्तता नहीं दिखी। कुछ शिकायतें दिखीं, पर आत्म-संयम जबरदस्त लगा। जीवन की पाठशाला की ये सिखावनें कहाँ प्राप्त हुईं? कुछ बताएँ।

अगर आपको मुझमें किसी भी तरह की आत्मग्रस्तता नहीं दिखाई दी तो मुझे प्रसन्नता है कि आपने एक-दो ही मुलाकातों (वे भी बहुत संक्षिप्त) में मुझे ठीक से पहचाना। मैं जिस परिवार में पैदा हुआ, वह बेहद छोटा था। अर्थात् मेरी माँ और पिता के अलावा आगे-पीछे कोई न था। पिता की केवल एक बड़ी बहन थी जिनके घर-टेहेरका गाँव में मैं सिर्फ़ पैदा हुआ। उधर माँ की तरफ से केवल मेरे मामा और नानी ही थे। मामा ने ब्याह नहीं किया था और वे बुन्देलखण्ड के ठेठ डंगासरे (घोर जंगल में घिरा) के एक गाँव कँदवा में रहते थे।

मेरे पिता ने ईंट-गारा ढोया, मजदूरी की और इसके बाद रेल्वे में प्वाइन्ट्समैन (रेलगाड़ी के डिब्बों को जोड़ने-काटने वाले) की नौकरी की और अन्त में सबसे छोटी नौकरी से ऊपर उठते-उठते पैसेन्जर ट्रेन के गार्ड के रूप में रिटायर हुए। उनका जीवन मेरे सामने हमेशा आदर्श रहा है। उन्होंने किसी काम को हेय नहीं समझा। आप तो जानते ही हैं, मैंने भी इसी तरह इसी भोपाल में प्राइमरी स्कूल टीचर से लेकर रीजनल कालेज में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष तक का सफर तय किया।

जीवन संघर्ष, गरीबी, मारकाट और गलकाट लड़ाई को मैंने दूर से नहीं देखा, उससे गुज़रा हूँ। फिर एक भाई, तीन बहिनों, चार बेटियों और एक बेटे की जिम्मेदारियों से घिरा हुआ आदमी आत्मग्रस्त कैसे हो सकता है। उसे अपने बारे में, अपनी महत्ता के बारे में सोचने की फुर्सत ही कहाँ होती है। फुर्सत तो उनको होती है जो सारी सुख-सुविधाओं के बीच पैदा होते हैं और अचानक उन्हें अपनी प्रतिभा का, अपनी महानता का भान होता है और वे घर छोड़कर ड्राप-आउट का नाटक करते हुए खुद को महान मानते लगते हैं। ऐसा जीवन मुझे नहीं मिला। मेरे बचपन के मोहल्ले में नाई, दर्जी, कुंजड़े, तमोली, कुम्हार, ताँगा हाँकने वाले और हस्सन की माँ जैसी अकेली विधवा मुस्लिम महिला रहती थी। अब इन सबके लड़ाई-झगड़ों, और प्यार और मोहब्बत, और एक दूसरे के लिए जान दे देने वाले, गप्पे कक्का जैसे चाट बेचने वालों के बीच जो जी लिया हो, वह आत्मग्रस्त कैसे हो सकता है। यही मेरे जीवन की पाठशाला थी। क्योंकि इस मुहल्ले में तब तक रहा जब तक मेरी शादी नहीं हो गई। इसी मोहल्ले में मेरी पत्नी बहू बनकर आयी, तब मेरी उम्र 18 वर्ष की थी और मेरी पत्नी की 15 वर्ष की रही।

ऐसी ज़िन्दगी से निकलकर आने वाले के पास आत्मसंयम के अलावा और चारा भी क्या है। और जहाँ तक शिकायतों की ओर आपने इशारा किया, तो मैं शिकायत तो किसी से करता ही नहीं हूँ। दो टूक बोलने का आदी हूँ। आपसे कभी लम्बी बात नहीं हुई, वरना मेरे इस स्वभाव को आप जान जाते। मेरे भीतर एक क्रोध है, जो हमारे एक मित्र उसे होली ऐंगर कहकर टाल जाते हैं।

प्रश्न- प्रथम संग्रह समुद्र के बारे में लगभग चालीस वर्ष की उम्र में आपने दिया। इतने लम्बे समय तक कैसे आपने स्वयं पर यकीन बनाये रखा। आसपास का वातावरण तो उतावलेपन से लबरेज था। सामान्यतः कविता के प्रकाशन के विषय में इतनी आत्म-चौकसी दिखाई नहीं देती है।

मेरा पहला कविता संग्रह समुद्र के बारे में 1977 में मध्यप्रदेष साहित्य परिषद द्वारा प्रकाशित किया गया। उस समय ‘शानी’ जी परिषद के सचिव थे। उन्होंने यह योजना बनायी कि युवा साहित्यकारों की पहली पुस्तक का प्रकाशन परिषद करेगी। इसी योजना के अन्तर्गत मुझको चुना गया। समय बहुत कम था। दो-तीन दिन में किसी भी तरह तीस-पैंतीस कविताएँ चुनकर देनी थीं। छोटा-सा संग्रह निकालने की ही योजना थी। तो यह काम कुछ मित्रों के बीच किया गया था। इस कारण बहुत सारी कविताएँ, जो 1960 के पहले की थीं, इसमें आ ही नहीं पायीं। 1960 के बाद से 1972 तक की कविताओं में से ही उनको चुना गया। वह भी कुछ पैंतीस। जो भी कोई थोड़ी लम्बी कविता दिखी, उसे छोड़ दिया गया। उस समय तक मेरी कविताएँ धर्मयुग (जब धर्मवीर भारती सम्पादक नहीं थे), लहर”, ज्ञानोदय’, कल्पना’, वातायन’, माध्यम आदि पत्रिकाओं में छप चुकी थीं। इनमें प्रकाशित कोई भी कविता इस संग्रह में नहीं है। क्योंकि मैसूर से 1975 में वापस आते समय मेरी पत्रिकाओं, किताबों और डायरियों से भरा खोखा, जो रेलवे पार्सल से अन्य सामान के साथ बुक किया गया था, आज तक भोपाल नहीं पहुँचा। जो भी बच गया और पास में रहा, उसी से काम चलाया। इस तरह यह पहला संग्रह प्रकाशित हुआ जिसका विमोचन रघुवीर सहाय ने किया।

रही देर से संग्रह प्रकाशित होने की बात, तो उन दिनों आज की तरह किताब छपवाना आसान नहीं था और मेरे सामने शमशेर और त्रिलोचन जैसे लोग थे, जिनके कविता संग्रह बहुत मुश्किलों से बड़ी देर-देर से आये। मुक्तिबोध जैसे कवियों को मैं करीब से देख चुका था, जो अपना पहला संग्रह होश में ही नहीं देख पाये। उन दिनों अशोक वाजपेयी की ‘पहचान सीरीज़’ जैसी लघु पुस्तिकाओं में छप जाना ही बड़ी बात थी। वह तो शानी जी मुझे सन् 1960 से जानते थे। धनंजय वर्मा जी के मित्र थे और मैं धनंजय वर्मा का एम.ए. का विद्यार्थी था और वे मुझे चाहते भी बहुत थे। शानी जी जगदलपुर से आये थे और उन्हीं के घर रुके थे, वहीं उन्होंने मेरी कविताएँ सुनी थीं। तो मैं उनके दिमाग में तभी से था।

वह तो सन् 1960 के आसपास जब मध्यप्रदेश की स्कूली शिक्षा के संचालक अशोक वाजपेयी हुए तो उन्होंने पुस्तक खरीद की ऐसी योजना बनाई जिसमें चयनित किसी भी लेखक की पुस्तक की कम से कम ग्यारह सौ प्रतियाँ खरीदी जानी थी। इससे पूरे हिन्दी जगत में तहलका मच गया और हिन्दी के प्रकाशक मध्यप्रदेश के लेखकों को गली-कूचों में खोजने लगे। और पहली बार कविता की पुस्तकों की किस्मत चमकी। जहाँ कभी प्रदेश में दस-ग्यारह महत्त्वपूर्ण लेखकों के नाम मुश्किल से दिखाई देते थे, वहाँ ग्यारह सौ से ज़्यादा अचानक (अधिकतर कवि) उदित हो गये। अब इसी को कविता की वापसी कहा गया। मेरी पहली पुस्तक समुद्र के बारे में तो 1977 में ही छप चुकी थी, जो इस आन्दोलन की देन नहीं थी। इस बात का पता लगाना चाहिए कि 1980 के बाद देश भर के कितने कवियों के पहले कविता संग्रह प्रकाशित हुए। मध्यप्रदेश में तो इस कविता की वापसी से कवियों की बाढ़ आ गई। इसका उज्जवल पक्ष यह भी था कि तब तक भारत भवन नहीं बना और मध्यप्रदेश कला परिषद का भवन काव्य-पाठ के लिए जाना जाने लगा था। इस दौरान यहाँ हिन्दी के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण कवियों ने कविता पाठ किया। शमषेर, त्रिलोचन, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, मलयज से लेकर उस समय तक के सभी युवा कवियों ने कविता पाठ किया जिसमें प्रगतिशील, जनवादी और गैरजनवादी सब शामिल थे। कविता पाठ के इन आयोजनों को कविता की सुबह नाम दिया गया।

प्रश्न- आपके प्रथम संग्रह में कटोरदान जैसी कविता दृश्य के स्थूल विवरण वाली कविता है, जिसमें जीवन की लय को समझने की कोशिश है और दूसरी ओर संग्रह की शीर्षक कविता समुद्र के बारे में है, जिसमें यथार्थ की जादुई प्रस्तुति मुखर हुई है। कविताओं में इतने ध्रुवीय अन्तर की वजह क्या रही है?

आपने कहा कि कटोरदान कविता दृश्य के स्थूल विवरण वाली कविता है। लगता है कभी आपने ऐसा दृश्य देखा ही नहीं। बीच सड़क पर जब किसी का कोई खाने से भरा कटोरदान धोखे से, किसी के हाथ से या साइकिल के कैरियर से गिर जाता है - और जब उसके अन्दर की दाल-सब्जी, रोटी या पूरी या पराठे, अचार या पापड़ सब बाहर आकर फैल जाता है - इस दृश्य को आप क्या मात्र एक स्थूल दृश्य कहेंगे। क्या ये चीज़ें सड़क पर फैलकर सारे घर और परिवार को लाचार-सा लाकर खड़ा नहीं कर देतीं। और फिर यह तो एक बच्चे के हाथ से छूट कर गिरा दो डिब्बों वाला अलमुनियम का कटोरदान है। वह पीतल का भी हो सकता था, स्टील का भी। कहीं-कहीं तो चाँदी का भी। मगर यह अलमुनियम का मटमैला-सा दो डिब्बों वाला कटोरदान है। जब तक सड़क पर गिरा नहीं था, तब तक उसकी दयनीयता और उसकी हैसियत अन्दर छिपी हुई थी, पर जब उसके अन्दर की भाषा सड़क पर फूटकर फैल जाती है, तब पता चलता है कि नमक शायद रोटियों के अन्दर रहा होगा। पर स्वाद किन्हीं आँखों और किन्हीं हाथों में ज़रूर रहा होगा तो कवि उन चार सूखी रोटियों, प्याज की एक गाँठ और दो हरी मिर्चों के साथ-साथ उन आँखों और हाथों को भी देख लेता है जिन्होंने मनोयोग में उन रोटियों को सेंका है और अपनी आत्मा का स्वाद उन रोटियों से भरा है।

कविता जीवन से बड़ी नहीं होती। वह उसके संघर्ष त्रासदियों और दुर्घटनाओं को, उसकी विसंगतियों को जोड़-जोड़कर अपनी तरह से रचकर उन्हें जीवित रखने का काम करती है। यह दृश्य अपने आपमें किस तरह तमाम संकेतों को अपने में समेटकर एक कविता में रूपान्तरित होता है- उसे मात्र स्थूल दृश्य तो नहीं ही कहा जा सकता। फिर तो निराला की वह तोड़ती पत्थर भी मात्र स्थूल ही रह जाएगी।

‘कटोरदान कविता बाल मजदूर को ध्यान में रखकर लिखी गई है। बच्चा कविता भी बाल मजदूरी पर 1975 के पहले की कविता है।
अलख सुबह काम पर जाता हुआ बच्चा
कोहरे में डूबी हुई सड़क पार कर रहा है
सड़क जितनी लम्बी है
उतनी चौड़ी भी है
सड़क जितनी सूनी है
उतनी दूनी भी है
सड़क को यह सब नहीं पता
और बच्चा
उसे भी कहाँ पता कि वह सड़क पार कर रहा है।

प्रश्न- डायरी के अंश, ब्लर्ब, समीक्षाएँ, कविता पर टिप्पणी, आलोचना, आलेख, संस्मरण आदि कवि के गद्य आपने कम लिखे हैं, इसकी कोई विषेष वजह?

मेरी एक पुस्तक कविता का दूसरा पाठ आपने नहीं देखी। उसका प्रकाशन 1993 में हुआ था। इसके बाद दूसरी किताब 2004 में कविता का दूसरा पाठ और प्रसंग नाम से प्रकाशित हुई, जो पहली ही पुस्तक का अपडेट संस्करण है। उसमें मेरे लेख, टिप्पणियाँ और कविता सम्बन्धी मेरी दृष्टि और विचारों को देखा जा सकता है। असल में मैं एक बात स्वीकार करता हूँ कि मैं साहित्य की एक्स्ट्रा कैरीक्यूलर एक्टीविटीज़ में बहुत कमजोर रहा। मैंने नौकरी पूरी जिम्मेदारी से की, परिवार की जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दी और साहित्य की रचना भी की, पर जिसे आजकल पी.आर. कहा जाता है, अर्थात् पब्लिक रिलेशन बनाने मैं बहुत पीछे रहा। न किसी की झूठी तारीफ की, न किसी की चापलूसी। साहित्य में आजकल जो लेन-देन चला हुआ है। उससे में कोसों दूर रहा, इसलिए मेरी रचनाओं को कभी इस दृष्टि से देखने की कोशिश ही नहीं हुई। वह तो आज जब इक्कीसवीं सदीं में जो युवा उभर कर आये हैं, जो अपने से पहले के साहित्यकार को केवल उनकी रचनाओं से परख रहे हैं उनके अन्य क्रियाकलापों से नहीं, उन्होंने मुझे नये सिरे से नहीं पहचाना होता तो मुझे तो यारों ने घूरे पर फेंकने का पूरा इन्तज़ाम कर ही दिया था।

प्रश्न- कविता का भविष्य किन-किन कवियों में दिखाई दे रहा है?

किसी भी चीज़ का भविष्य आने वाले लोगों के हाथों में ही होता है। मैंने पहले ही कहा था कि 2000 के बाद इक्कीसवीं शताब्दी में जो युवा रचनाकार आ रहे हैं, उनमें बहुत सारे ऐसे नाम हैं जिनमें लड़कियाँ और महिलाएँ भी शामिल हैं, जो आज की समकालीन कविता के दृश्य को अपने समय की चुनौतियों का सामना करते हुए बदलने में लगे हुए हैं। भूमण्डलीकरण और बाज़ारवाद के कारण तेजी से बदलते मानवीय मूल्यों का जो भीषण संकट इनके सामने है, ऐसा पहले कभी नहीं था। इसी कारण इस सबसे निबटते हुए अच्छी कविता, कहानी और आलोचना लिख पाना और बाज़ारवाद के द्वारा नष्ट की जा रही भाषा में अपनी रचनात्मकता को बचाकर रख पाना सचमुच बड़ी चुनौती है। रचनाकारों के नाम गिनाते में यह खतरा बराबर बना रहता है कि आपकी नज़र से कुछ नाम छूट ही जाते हैं। फिर भी आलोचना के बने-बनाये ढाँचे को तोड़कर जो कुछ युवा आलोचना को पठनीय और विश्लेषणपरक  बनाने की कोषिष में लगे हुए हैं, उनमें आषीष त्रिपाठी, सुशील सिद्धार्थ और भरत प्रसाद, व्योमेष शुक्ल आदि उल्लेखनीय हैं। कवियों में शिरीष कुमार मौर्य, आषीष त्रिपाठी, राजीव रंजन, जसवीर चावला, गीत चतुर्वेदी, हरेप्रकाश उपाध्याय, पंकज राग, अरुण शीतांश, अशोक सिंह, कुमार अनुपम, भरत प्रसाद, कुमार वीरेन्द्र, रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति, तुषार धवल जैसे अनेक युवा कवि हैं जिसमें उम्मीद बँधती है। ये कवि कविता को बौद्धिकता के आतंक और तथाकथित मुख्यधारा की एकरसता से मुक्त कर उसे अपनी विविधवर्णी स्वरूप को पूरी क्षमता के साथ बचाने में लगे हुए हैं।

प्रश्न- इस समय पिछले समय से अधिक कवयित्रियाँ सक्रिय हैं। अब पूरे समय में पहले की तरह सुभ्रदाकुमारी चौहान, महादेवी वर्मा जैसी इक्की-दुक्की कवयित्रियाँ नहीं हैं। पूरे परिदृष्य में स्त्री कवि मौजूद हैं। इस पर कुछ कहेंगे? अपनी पसन्द व्यक्त करेंगे?


कवयित्रियों में अनीता वर्मा, कात्यायनी, अनामिका और नीलेश रघुवंषी के बाद जो कवयित्रियाँ सामने आ रही हैं, उनमें अलग तरह की ऊर्जा है। इनमें रंजना जायसवाल, रंजना श्रीवास्तव, ज्योति चावला, संवेदना, प्रज्ञा रावत जैसे कई नाम उल्लेखनीय हैं। नया ज्ञानोदय और परिकथा के अंकों में नये कवियों को सामने लाने का जो काम किया है, वह महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ ही यह कहना चाहता हूँ कि पहली बार इतनी संख्या में कवयित्रियों की जो उपस्थिति दिखाई दे रही है, वह स्त्री-विमर्श जैसे घिसे-पिटे संसार से बाहर आकर अपनी पहचान स्त्री समानधर्मा स्त्री कवि के रूप में बना रही है। ये लड़कियाँ और महिलाएँ केवल पुरुष विरोध और केवल अपने स्त्री होने के हाहाकार से भी मुक्त होकर अपने स्त्री होने की शक्ति और सामर्थ्य को पहचान रही हैं।