Wednesday, November 26, 2014

मुम्बई, 26/11 और एक किताब 'हेडली और मैं'

आज 26 नवम्बर है. 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद से 26/11 को स्याह दिन की तरह याद किया जाता है. बहुत लोगों को याद होगा कि इस घटना के मुख्य आरोपी डेविड हेडली के साथ अनजाने में जुड़े होने के कारण राहुल भट्ट का नाम शक के घेरे में आया था. राहुल भट्ट फिल्मकार महेश भट्ट के बेटे हैं. बाद में अपने उन अनुभवों को आधार बनाकर उन्होंने अपराध-कथा लेखक एस. हुसैन जैदी के साथ अंग्रेजी में एक किताब लिखी थी. जिसका हिंदी अनुवाद 'हेडली और मैं' हार्पर हिंदी से छपकर आया है. प्रस्तुत है आज के दिन उस किताब की भूमिका जिसे महेश भट्ट ने लिखा है. अनुवाद मेरा ही है- प्रभात रंजन 
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‘तुम्हारे पास एक विकल्प है, बेटे. या तो तुम अपनी जिंदगी एक पीड़ित की तरह जियो, अपने खराब बचपन को अपनी बाँह पर तमगे की तरह पहनो, उन लोगों से सहानुभूति पाते रहो जो तुम्हारे लिए कुछ नहीं हैं, या फिर इन सबसे निकल जाओ. अपने दर्द और अपने गुस्से का रचनात्मक इस्तेमाल करो और आगे बढ़ जाओ. मैंने बाद वाला किया. इसीलिए मैं वहां हूँ जहाँ आज हूँ. क्या तुम जानते हो, तुममें और मुझमें एक बात सामान्य है. एक ऐसा बचपन जिसमें पिता नहीं थे...’

मैं राहुल से बात कर रहा था जब मैं स्पीति के विशाल, भव्य मैदानों से गुजर रहा था. वह सचमुच ईश्वर की भूमि थी. शुक्रगुजार हूँ अपनी बेटी पूजा का, जो अपने निर्देशन में बनने वाली पहली फिल्म की शूटिंग कर रही थी, और हम किब्बर में थे, जो दुनिया का सबसे ऊंचा गाँव है जहाँ गाड़ी से जा पाना संभव है. यह राहुल और मेरे लिए बहुत दुर्लभ अवसर था जब हम दोनों कई सालों बाद साथ साथ थे. वास्तव में, १९८५ की उस दर्द भरी रात के बाद जब मैं उसके घर से बाहर निकल गया था, जब वह मुश्किल से तीन साल का था. तब मैं कहाँ जानता था कि जीवन उसकी परीक्षा लेगा और उसको मजबूर होकर उस विकल्प को चुनना पड़ेगा.

‘तुम उसे मोहम्मद क्यों कहना चाहते हो, बेटा?’ मेरी माँ ने पूछा, जिसने सारा जीवन अपनी मुस्लिम पहचान को छिपाने में लगाया था. उसको डर था कि इस तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश में भी मुसलमानों को ‘अन्य’ के रूप में देखा जाता था.

‘क्योंकि मैं चाहता हूँ कि आपकी मुसलमान विरासत मेरे बेटे के माध्यम से किसी रूप में चलती रहे’, मैंने जवाब दिया.

मेरी माँ की बात आखिरकार चल निकली जब उन्होंने मेरी एंग्लो-इन्डियन पत्नी और मेरे बेहद तर्कशील संत सरीखे महाराष्ट्रियन ब्राह्मण पड़ोसी के साथ मिलकर दबाव बनाया तो मेरे बेटे का नाम राहुल उर्फ़ सनी रखा गया.

पीछे मुड़कर देखने पर डर लगता है कि २००९ में मेरे बेटे के साथ क्या हुआ होता अगर उसका नाम मोहम्मद भट्ट रखा गया होता. राहुल का जन्म बचपन की मेरी प्रेमिका लौरेन ब्राईट(किरण भट्ट) के साथ मेरे रिश्तों को रफू करने के क्रम में हुई थी, जो तब तक तार-तार हो गया था. और मुझे याद है कि मैंने एक बार फिर पितृत्व को पूरे दिल और दिमाग से अपनाया था.

सन्नी और मेरे साथ होने की दुर्लभ और आरंभिक यादें उभर पड़ीं. पाली हिल पर भोर फूट रही है. मैं एक बेरोजगार, और संघर्षरत फ़िल्मकार हूँ. मैं सन्नी को सम्भ्रान्त पाली हिल में प्रैम पर लेकर घूमा रहा हूँ, उसे सुबह की सैर के लिए ले जा रहा हूँ. एक थोडा प्रसिद्ध अभिनेता जो अच्छी तरह नशे में है, देर रात की पार्टी से लौट रहा है, जब वह मुझे अप्रत्याशित रूप से पिता के अवतार में अपने छोटे बच्चे के साथ देखता है तो उसका दिल पिघल जाता है. वह सन्नी के ऊपर झुकता है और उसके चारों तरफ अल्कोहल की गंध आ रही है, वह फुसफुसाता है, ‘क्या तुमको यह याद रहेगा कि तुम्हारे पिता तुमको उस समय सुबह की सैर पर ले जा रहे हैं? या सभी बेटों की तरह तुम भी इस बात को भूल जाओगे?’ यह कहते हुए वह मेरा चुम्बन लेता है और अपनी कार की तरफ बढ़ जाता है. पता नहीं क्यों, लेकिन वह मजेदार स्मृति अज मुझे द्रवित कर देता है.

स्मृतियाँ... स्मृतियाँ मेरे जीवन की सामग्री रही हैं. इंसान आख़िरकार स्मृति ही तो है. जब मैं अपने अन्दर देखता हूँ तो पाता हूँ कि मेरे अन्दर मेरे बेटे के साथ मेरी स्मृतियाँ नहीं हैं. एक फलता-फूलता कैरियर, दूसरी शादी, सत्य की मेरी तलाश, इन सबने एक तरह से मेरे जीवन को जकड लिया, और मेरे पास अपने बेटे के साथ बिताने के लिए समय कम से कम होता गया(मैंने अपनी दूसरी शादी से हुई अपनी दो बेटियों के साथ भी इस दौरान शायद ही कोई समय बिताया) हालाँकि मैं हर तरह से उनके लिए प्रबंध करता रहा, और एक ऐसे पिता की तरह से उनके हर बुरे दौर में उपस्थित रहा, मुझे लगता है कि छोटी-छोटी बातों को नजअंदाज कर दिया जाता है. मैं रोज-रोज के कामों में उसको समय नहीं दे पाया, वह सामान्य जीवन जो पिता और बीटा साथ-साथ बिताते हैं. उस तरह से समय जब मैं असफल और बेरोजगार था. कड़वा सच यह है कि मैं वह हो गया जो मैं नहीं बनना चाहता था. पूरे जीवन मैं अपने पिता के ऊपर इन्हों बातों के लिए इल्जाम लगाता रहा. और अब मैं वही कर रहा था. मैं यह चाहता था कि इसको ठीक कर पाऊं. लेकिन नहीं जानता था कि कैसे.

और एक दिन भाग्य ने मुझे उसका मौका दे दिया जो मैं चाहता था. असल में, ऐसा लगा कि पूरी दुनिया ने ऐसा माहौल बनाया कि मुझे मनमाफिक मौका मिलने का समय आ गया.

‘मुझे लगता है कि यह डेविड हेडली जिसके बारे में गुप्तचर एजेंसियां बात कर रही हैं वही आदमी है जिससे मैं अपने फिटनेस ट्रेनर साथी विलास वराक के माध्यम से जानता था.और मैं पक्का हूँ कि जिस राहुल के बारे में वे लगातार सन्दर्भ दे रहे हैं वह मैं ही हूँ’, मेरे बेटे ने मुझसे फोन पर कहा.
यह एक और दिन था, लेकिन मेरे जीवन के सबसे कठिन दिन के परदे खुल गए. दुनिया के लिए यह मनोरंजन था. मेरे लिए, यह किसी प्रलय से कम नहीं था.

‘मुझे क्या करना चाहिए? पूजा और मम्मी कह रही थी कि मुझे आपसे सलाह करके पुलिस के पास जाना चाहिए. मुझे क्या करना चाहिए, पापा?’ उसने पूछा, सामान्य दिखने की कोशिश करता हुआ, लेकिन मैं उसकी आवाज में डर को महसूस कर रहा था.

यह अजीब था. दुनिया के सभी शहरों को छोड़कर ऐसा लगता था कि डेविड हेडली ने ने इस शहर को चुना. और उससे भी बढ़कर, इस शहर के लाखों लोगों को छोड़कर मेरे बेटे को दोस्ती के लिए चुना! मैं अपने जीवन की सबसे बड़ी दुविधा में था. दुनिया में, जहाँ हम सहस, और कर्त्तव्य को लेकर बात करते रहते हैं, अभिभावकों को इस तरह से इस तरह से तैयार किया जाता है कि वे खतरों से बच्चों को दूर रख सकें. क्या हम अपने बच्चों को इसके लिए तैयार नहीं करते हैं कि वे अपनी सुरक्षा का ध्यान रखें, अजनबियों से बचकर रहें, अपने सीट बेल्ट बांधकर रखें, तथा सड़क पार करते समय चारों तरफ देख लिया करें?

लेकिन आप जो करते हैं, वही आप होते हैं, वह नहीं होते जो आप कहते हैं कि आपको करना चाहिए. हमारे पूरे परिवार की परीक्षा की घड़ी थी. क्या हमें चुपचाप बैठकर देखते रहना था, या जनता की नजरों में आने का खतरा उठाकर वह भूमिका निभानी थी जो भाग्य ने हमारे लिए चुना था?

पहली प्रतिक्रिया तो यह थी कि इस सुनामी को दूर भगाना जो धीरे-धीरे हमारी तरफ बढती आ रही थी. हमने ऐसे कई उदाहरण देखे थे कि जिसमें २६/११ के बाद जनता की भावनाओं ने जांच एजेंसियों को अनेक मासूम, तथा खास तौर पर अनेक मुसलमान लड़कों को के खिलाफ अकारण अमानवीय तथा अन्यायपूर्ण ढंग से काम किया था. साथ ही, यह ख़याल भी आ रहा था कि दक्षिणपंथी ताकतें जिनके साथ मैंने अनेक कटु लड़ाइयाँ लड़ी हैं, इस मौके का फायद उठाकर मुझे चीर डालेंगे तथा मेरे बेटे को नुक्सान पहुंचा सकते थे. मैं यह समझ गया था कि यह किसी दुर्भाग्यपूर्ण आदमी के बारे में कोई टेलीविजन शो नहीं था कि मैं एक बटन दबाकर अपने टेलीविजन सेट को बंद कर देता. यह वास्तविक जीवन था, और यह मेरा लड़का था, और वह टेलीफोन की दूसरी तरफ था, उस जवाब के इंतज़ार में जो उसके जीवन को बदल सकता था.

मैंने उससे एक सवाल पूछा, ‘क्या तुमने ऐसा कुछ किया है जो तुम मुझे नहीं बता रहे हो? क्योंकि अगर तुमने किया है तो तुमको अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ेगा, बेटे. लेकिन अगर नहीं किया है तो तुमको डरने की कोई जरुरत नहीं है. अपना सर ऊंचा करके पुलिस के पास जाओ.’

रखने से पहले उसने हँसते हुए कहा, ‘पापा, मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है. मेरा भरोसा कीजिये.’

उसके बाद जो हुआ वह अच्छा भी था और बुरा भी. बुरा इसलिए क्योंकि वही संस्कृति जो उन लोगों के प्रति श्रद्धांजलि देने का नाटक कर रही थी जिन्होंने २६/११ के कत्लेआम में अपने जान की कुराब्नी दी, वही लोग वापस मुड़कर इन दो लोगों के ऊपर सवाल उठा रहे थे. राहुल, विलास, हमारा परिवार और मैं उस रात के बाद समाचार के भूखों के लिए खाद्य पदार्थ हो चुके थे. दक्षिणपंथी ताकतें समाचार चैनलों के साथ मिलकर जान बूझकर मेरे बेटे के इर्द गिर्द संदेह पैदा करने का काम कर रहे थे और उनको बौना बनाने के काम में लगे थे. जो बात मैं कभी नहीं समझ सका वह यह कि किस तरह से बजाय इसके कि इन दो साहसी युवकों की तारीफ की जाये कि उन्होंने सूत्रविहीन जांच एजेंसियों की इसके लिए मदद की कि वे इस केस के भीतर जाकर इस डबल एजेंट की कारगुजारियों की जांच कर सकें, सभी इसी नतीजे पर पहुँच गए कि वे देशद्रोह के दोषी हैं. असल में, तो वे नायक थे. विलास को तो अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा और आजतक उसे वापस नहीं मिला है.

यह कहना उचित होगा कि एनआईए, मुंबई पुलिस तथा गुप्तचर शाखा के अधिकारियों ने इन लड़कों के साथ बहुत सम्मानपूर्वक व्यवहार किया तथा सार्वजनिक रूप से न सही तो निजी तौर पर उनकी पीठ थपथपाई. लेकिन मेरे तथाकथित दोस्त और रिश्तेदार अचानक कहीं पृष्ठभूमि में छिप गए, उनको डर था कि शायद कहीं कोई भयानक अपराध का पर्दाफाश होने वाला था. मैं, जो किसी के लिए भी खड़ा हो जाता था, अचानक खुद को अकेला महसूस करने लगा. मैं और मेरी बहादुर बेटी पूजा ने सनी के इर्द-गिर्द एक दीवार बना ली और रोज-रोज के आधार पर लड़ाई लड़ी, इस बात का इन्तजार करते हुए कि धारा हमारी तारफ मुड़ जाए.

लेकिन वे हमारे लिए बहुत अच्छा दौर भी था. क्योंकि मेरा बेटा और मैं जीवन में पहली बार इतनी नजदीक आये. उसे यह समझ में आने लगा कि वह आदमी जो १९८५ की मध्यरात्रि में दूर चला गया था असल में कहीं गया नहीं था. अजीब विडम्बना की बात थी, मैंने जो साल दूर रहकर बिठाये, अपने लिए नाम बनाने के लिए, उसने उसे बचाने में मेरी मदद की. क्योंकि अगर मैं प्रसिद्ध नहीं होता , कोई नहीं होता जिसका सच बोलने के लिए सम्मान किया जाता था तो मुझे नहीं लगता कि मेरा बेटा सही-सलामत बाहर निकल पाया होता. अगर वह किसी गुमनाम आदमी का बेटा होता तो क्या वे उसे उसी तरह से देख पाते? जब मैं यह लिख रहा हूँ तो मेरा दिल उन अनेक निर्दोष लोगों के लिए धड़क रहा है जो जो इतने भाग्यशाली नहीं रहे.

कुछ प्राचीन जनजातियों में, जब बेटा बड़ा होता है तो वह किसी जंगली जानवर को मार देता है अपने पिता को दिखाने के लिए कि वह बड़ा हो चुका है. मेरे लिए, अपने आपको खोल देने की राहुल की तत्परता, तथा जिस सम्मान और निडरता से उसने उन भयानक दिनों का सामना किया जब उसके ऊपर कुछ लोग देशद्रोही होने के आरोप लगा रहे थे, और इस पूरी कहानी को खोलकर रख देने की उसकी इच्छा इस बात के संकेत हैं कि जिस लड़के को मैं कई गर्मियों पहले सुबह की सैर के लिए ले जाता था वह अब बड़ा हो चुका था.

और उस आदमी की यात्रा अभी शुरू ही हुई है.

महेश भट्ट
मुंबई

अक्टूबर २०१२ 

Monday, November 24, 2014

डीयू का बिहार कनेक्शन और अंग्रेजी उपन्यास

लोकप्रिय अंग्रेजी उपन्यासों का यह साल दिल्ली विश्वविद्यालय के नाम रहा. दिल्ली विश्वविद्यालय का बिहार कनेक्शन इस साल अंग्रेजी के लोकप्रिय उपन्यासों का सबसे कारगर मुहावरा रहा. रविंदर सिंह का उपन्यास ‘Your Dreams are Mine Now’(हिंदी अनुवाद: तुम्हारे सपने हुए अपने) इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी है.

सबसे पहले आया था पंकज दुबे का उपन्यास, जो अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में था. अंग्रेजी में ‘what a looser’ जबकि हिंदी में ‘लूजर कहीं का’. यह अकेला ऐसा उपन्यास था जो एक इनसाइडर का लिखा हुआ था. इसके लेखक पंकज दुबे दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि यह उपन्यास उन लोगों को स्मृतियों के गलियारे में ले जाने में पूरी तरह सक्षम रहा जो डीयू के छात्र रहे हैं, यहाँ के होस्टल्स में रहे हैं. लेकिन जो डीयू के बाहर के लोग हैं, जो इस तरह के साहित्य का बड़ा पाठक वर्ग है शायद यह उपन्यास उनके साथ उतना कनेक्ट नहीं हो पाया. लेकिन जिस तरह से बिहार के विद्यार्थी, डीयू की पढ़ाई, प्यार-मोहब्बत का चक्कर इस उपन्यास से शुरू हुआ वह आगे इस साल की सबसे बड़ी परंपरा साबित हुई. अफ़सोस की बात है कि इस उपन्यास से डीयू कथा का एक नया दौर शुरू तो हुआ लेकिन इस उपन्यास को उस तरह ट्रेंडसेटर का दर्जा नहीं मिल पाया जिसका यह हकदार था.

बहरहाल, दिल्ली विश्वविद्यालय अपन इनसाइडर के लिए जिस तरह की है उसके बाहर वालों के लिए उसकी छवि कुछ और तरह की है. चेतन भगत ने जब बिहार से दिल्ली पढने आने वाले लड़के की कहानी को आधार बनाकर ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ उपन्यास लिखा तो मुझे लगा जैसे यह उपन्यास ‘लूजर कहीं का’ के आइडिया का ही विस्तार है. लेकिन डीयू, बिहार के बाद न्युयोर्क का एंगल जोड़कर चेतन भगत ने इस उपन्यास को 100 करोड़ क्लब की फिल्मों की तरह भरपूर मसालेदार बना दिया ताकि इसके सुपर डुपर हित होने में कोई कसर न रह जाए. इसमें कोई शक नहीं कि यह उपन्यास उन स्टीरियोटाइप्स को ही पुष्ट करता है जो डीयू न आने वाले, यहाँ न पढने वाले विद्यार्थियों के मन-मिजाज में बनी हुई है.

बाकी चेतन भगत के उपन्यास मौसमी सब्जी की तरह होते हैं खूब बिकती है, और सीजन के हिसाब से कीमत भी कम रहती है. यह उपन्यास इतना बिक चुका है कि इसके आगे पीछे के सारे फ़साने बेकार हो जाते हैं. चेतन भगत जिस विषय को उठाते हैं वह विषय बाद में उनके नाम हो जाता है. चाहे उससे पहले उस विषय को लेकर कितना ही लिखा गया हो, कहा गया हो.

इस कड़ी का तीसरा उपन्यास है ‘तुम्हारे सपने हुए अपने’. रविंदर सिंह चेतन भगत के सामने ब्रांड के रूप में बौने नजर आ सकते हैं. लेकिन अपने चौथे उपन्यास के साथ बाजार में आने वाला यह लेखक एक टिकाऊ ब्रांड है, इसमें कोई शक नहीं. नई पीढ़ी की जद्दोजहद को लेकर, उनके जीवन के तनावों को लेकर लिखे गए उनके उपन्यासों ने अपना बड़ा पाठक वर्ग बनाया है. उनके इस उपन्यास में भी बिहार-डीयू कनेक्शन है. फर्क इतना है कि इसमें पटना की एक लड़की डीयू के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढने आती है. वह बहुत आदर्शवादी है, सही को सही और गलत को गलत कहना चाहती है. बदलाव की लड़ाई लड़ना चाहती है, लड़ती है और अचानक....

यह उपन्यास समर्पित है देश की निर्भायाओं के नाम. जाहिर है इस उपन्यास में लड़कियों के होस्टल, प्यार मोहब्बत की कहानी को यह सोशल एंगल का नया आयाम देता है. महानगरों में अकेली रहती लड़की के जीवन-संघर्ष की तरफ इशारा करता है. यही रविंदर सिंह की ताकत भी है कि उनके उपन्यासों में मनोरंजन के साथ-साथ उचित उपदेश का मर्म भी होता है. अधिक न सही लेकिन जरुरत भर तो होता ही है.

साल भर में भले डीयू के विद्यार्थी दो सेमेस्टर की पढ़ाई करते हों लेकिन उपन्यास तीन आये. हालाँकि यह सवाल तब भी रह ही जाता है कि क्या डीयू की कोई मुकम्मल कहानी आ पाई? वहां बाहर से पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के जीवन की कश्मकश, उनके संघर्ष में आ पाए? उपन्यास से इतनी उम्मीदें पालने का मौसम नहीं रहा. फिलहाल आप रविंदर सिंह के इस मूल अंग्रेजी उपन्यास का हिंदी अनुवाद पढ़िए. अनुवाद मेरा ही है और प्रकाशक पेंगुइन. कीमत 150 रुपये है.


प्रभात रंजन  

Sunday, November 23, 2014

रणदीप और नंदना की अधिक रवि वर्मा की कम बनी 'रंगरसिया'

100 करोड़ के टारगेट की वजह से आजकल ऐसी फ़िल्में कम आ पाती हैं जिनमें कंटेंट के स्तर पर कुछ कहने सुनने को हो. 'रंगरसिया' एक अलग फिल्म फिल्म साबित हुई. जब से आई है चर्चा में बनी हुई है. रंजीत देसाई के उपन्यास पर बनी केतन मेहता की इस फिल्म पर यह समीक्षा लिखी है युवा फिल्म लेखक सैयद एस. तौहीद ने. एक पढने लायक समीक्षा, फिल्म को समझने का एक और एंगल देती हुई- मॉडरेटर 
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राजा रवि वर्मा पर केतन मेहता की रंगरसिया आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हुई। मुख्यधारा से व्यस्क कहानियां आने का चलन सतही बातों से बच कर ही विमर्श का विषय बन सकता है। केतन की फिल्म सतही व कला में फर्क कर सकी? सिनेमाघर में जाकर महसूस हुआ कि फिल्मकार ने अधिक बेहतर लक्ष्य का अवसर खो दिया। केतन की यह परियोजना आरंभ से विवाद का विषय बनीफ्लोर पर जाने व अंतत: पूरा बनने दरम्यान सेंसरशिप सहन करना पडा। कभी कभार moral policing अधिक रिएक्ट कर विवाद खडा कर देती है? कंटेंट के हिसाब से केतन ने आजादी जरुर ली है। लेकिन कहना होगा कि महिला व कला दोनों समाज के सताए लोग हैं। रंगरसिया के साथ हुआ बर्ताव सही था? सवाल का जवाब फिल्म बेहतर दे सकेगी। राजा रवि वर्मा पर रंजीत देसाई की लिखी किताब फिल्म का आधार बनी। आधुनिक कला के पितामह कहे जाने वाले राजा रवि वर्मा की यह कहानी अतीत-वर्त्तमान के सर्कल से गुजरती है। एक जीवन यात्रा किस्म कीलेकिन बाजार की ओर झुकी प्रस्तुति। सत्यजित राय व श्याम बेनेगल राजा रवि वर्मा पर इस तरह फिल्म नहीं बनाते। कोशिशों के बावजूद रंगरसिया रणदीप व नंदना की होकर रहीराजा रवि की वर्मा कम।

केतन की फिल्म को नजर चाहिए क्योंकि नजरिया ही वस्तु का मूल्यांकन कर सकता है। रंगरसिया में अभिवयक्ति के एक से अधिक नजरिए नजर हैं। रणदीप का राजा रवि वर्मा की शक्ल में कला की खातिर संघर्ष एवं सामाजिक बदलाव का नजरिया।  कला की खातिर संघर्ष का नजरिया। किसी कलाकार की जीवनी का अनुभव रवि वर्मा की जीवन यात्रा में महसूस होगा। कहानी में इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया गया है। राजाओं के दरबार में कलाकार का ऊंचा मुकाम हुआ करता था। दक्ष कलाकारों की पहचान की एक नजर हुआ करती थी। चित्रकला को आवरण बना लेने वाले बालक रवि वर्मा की काबिलियत को राजा ने पहचाना था। रवि वर्मा को राजा की उपाधि से नवाजा गया। राजा ने रवि वर्मा को पुत्री का हांथ देकर घर का सदस्य बना लिया। महाराज के निधन उपरांत राजपाठ का अधिकारी राजकुमार हुआनए राजा के आ जाने से रवि वर्मा को पुराना तोहफा भूल जाना पडा। राजकुमारी को पति के चित्रकार किरदार से लगाव नहीं था। 

रवि वर्मा कलात्मक अभिवयक्ति के लिए मानव व समाज द्वारा निर्धारित बातों की परवाह नहीं किया करते थे। पत्नी की नाराजगी की वजह से उनमें बसा कलाकार कला की खोज के लिए बंबई चला आया। नंदना सेन की सुगंधा से चित्रकार की यहीं मुलाकात हुई। फिल्म राजा रवि वर्मा के सामानांतर उनकी कला प्रेरणा स्त्रियों की कहानी है  राजा रवि वर्मा ने कला को अभिव्यक्ति की बंदिशों से मुक्त करने की पहल ली थी। कला की साधना में कलाकार खुद को फना करने का फन जानता है। अनावश्यक अथवा अनचाही moral policing कलाकार की प्रतिभा को हताश कर दिया करती है। राजा रवि वर्मा पर फिल्म बनाने का निर्णय केतन को हताश कर गया ? काफी हद तक। लेकिन निराश नहीं हुए व संघर्ष जारी रखा। काफी अरसे से रूकी रंगरसिया के रिलीज में वो संघर्ष विजयी हुआ।

राजा रवि सरीखे फनकारों को समाज से बहुत अधिक सहयोग नहीं मिल सका। रवि वर्मा ने परवाह नहीं किया कि लोग क्या कहेंगे। सहयोग के रूप में प्रोत्साहन व संरक्षण की आशा फिर भी हर कलाकार रखता है। किसी न किसी वजह से आदमी जिंदगी से ज्यादा की उम्मीद रखता है। समय से आगे की सोंच को नजरिए में कमी वजह से हमेशा उचित स्वीकृति नहीं मिलती। राजा रवि वर्मा कला को अपने समय से आगे ले गए। उस जमाने में चित्रकारी के लिए आयल कलर का इस्तेमाल चलन से जुदा था। आपकी कला में ग्लोबल तत्व समाहित थे। कलाकार कृति का सृजन उसे महान बनाने के उददेश्य से नहीं करता। काम को जुनूं  से आगे ले जाने फन लेकिन उसे खूब आता है। महान रचनाएं महान समर्पण की चाह रखती हैं। कलाकार समाज से लिया हुआ हर कीमती लम्हा दूसरे अंदाज में वापस कर देने में सक्षम होता है। राजा रवि वर्मा को समाज से इस मायने में सहयोग नहीं मिला कि धर्म का नुकसान किया था। धर्म व आस्था का दामन पर कूची से चित्र उकेरने लिए आप पर मुकदमा चला। पूज्य देवियों की तस्वीर बनाने के लिए आपने जिसका सहयोग लियावो समाज के अछुत तबके की थी। धर्म वालों की नजर में एक नाकाबिले कुबूल अभिव्यक्ति रही होगी। चित्रकार को यदि यह प्रेरणाएं नहीं मिली होती वो औरतों को खोया सम्मान लौटा पाता? महिलाओं के देवी तस्व्वुर करने की एक उदाहरण यह था। 

देवदासी प्रथा से दलित महिलाओं का नुकसान हुआ। देवदासियों के हितों की दृष्टि से रवि वर्मा का साहस सराहनीय था। कला समाज द्वारा बनाए गए अस्वीकार्य बातों के विरुध अधिक मुखर बन गयी।  रचना की प्रेरणा कलाकार को किसी भी सामान्य अथवा असामान्य बात से मिल सकती है। अभिव्यक्ति कलात्मक नजरिया तलाश लिया करती है। साधना उपरांत कला कलात्मकता का मुकाम पा लेती है। राजा रवि वर्मा ने साधना के माध्यम से सुगंधा में आदर्श देवियों का रूप देख लिया। रंगरसिया की नग्नता फूहडता को स्पर्श कर जाती तो आज की शक्ल नहीं अख्तियार कर पाती। एक चित्रकार रंगों से अधिक प्रेरणाओं से इश्क होना चाहिए। रंगरसिया में कलाकार की रचनात्मक एवं प्राकृतिक स्थिति बयान हुई है। समाज संस्कृति एवं अभिव्यक्ति बीच संवाद की स्थिति हमेशा तालमेल तक ही सीमित नहीं रहती। कला में vulgar की परिभाषा क्या?  प्रकृति व संस्कृति बीच मतभेद अथवा कुछ दूसरा?  राजा रवि वर्मा ने जवाब दिया तस्वीरों में।

राजा रवि वर्मा ने समय एवं समाज से संघर्ष करते हुए मिथक चरित्रों को चित्र में ढाला। वेद पुराण में उपस्थित प्रेरणाओं को लोगों के सामने लाया। देवियों की गाथाओं ने आपको रचना के लिए प्रोत्साहित किया। सुगंधा के संपर्क में आने उपरांत उन रचनाओं के जीवंत होने का समय था। सुगंधा की सुदरता से गुजर कर चित्रकार सौंदर्यबोध तक पहुंच सका। कला की मंशा वही थीराजा रवि वर्मा ने सुगंधा के जरिए समाज के एक तबके को इज्जत भी दी। आपके विरुद्ध चलाया गया मुकदमा तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। मुकदमे में कला की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर जोरदार बहस चलीसमाज को ऊंच नीच में बांटने से नुकसान ज्यादा होता है। कला को नुकसान होता है। एक पीरियड फिल्म के रूप में रंगरसिया इतिहास का कोना है। राजा रवि वर्मा ने जिस शिद्दत से चित्रकारी जरिए पुराण व मिथक कहानियों को जिंदा कियाउसी तर्ज पर केतन मेहता ने अतीत को परदे पर उतारा। बढिया पीरियड फिल्म दरअसल इतिहास व संस्कृति का पुनर्सृजन लगनी चाहिए। फील के हिसाब से रंगरसिया इसमें सफल नजर आईचित्रकार के जीवन से प्रेरित कर्म रंगों से भरी दुनिया की कामना रखता है। सवाल में घिरा हुआ हूं कि सचमुच रंगरसिया एक ईमानदार प्रयास थीरंगों के सामयिक इस्तेमाल में फिल्मकार हद तक कामयाब रहे हैं। रंगरसिया वो बहुरंगी पिचकारीजिसमें कामना रखने वाले को हर रंग मिलेगा। मर्यादा तय आप को करनी है। राजा रवि वर्मा की उत्सुकता अथवा कंटेंट की उत्सुकता में सिनेमाघर जा रहे हैं?
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