Wednesday, July 23, 2014

राहुल सिंह का 'लंचबॉक्स'

युवा आलोचक राहुल सिंह कई विधाओं में अच्छी दखल रखते हैं, सिनेमा भी उनमें एक है. कुछ अरसे पहले आई फिल्म 'लंचबॉक्स' पर उन्होंने कुछ ठहरकर जरूर लिखा है लेकिन बड़े विस्तार से और बड़ी बारीकी से लिखा है. फिल्म तब अच्छी लगी, अब पढ़ा तो उनका यह विश्लेषण एक बार फिर उस फिल्म की याद दिला गया. आप भी पढ़िए- जानकी पुल.
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कुछ फिल्में होती हैं, जो खत्म होने के बाद भी जारी रहती हैं। दिलो-दिमाग पर उनका असर इस कदर होता है कि एक अंतराल के बाद मौके-बेमौके आप उस तक लौट आते हैं। यह लौटना कुछ छूट चूके को समेटने के लिए होता है और समेटने की उस कोशिश में हर दफा कुछ अलहदा-सा हाथ लगता चलता है।लंच बाॅक्सऐसी ही फिल्म है। जैसे पूर्ण विराम के अभाव में कई दफा एक खूबसूरत वाक्य भी कुछ अधूरा-सा रह जाता है, ‘ओपेन एंडेडफिल्में एक हद तक वैसे ही पूर्णविराम विहीन खूबसूरत वाक्यों की तरह होती है, जिस खालीपन को अपने तसव्वुराना पूर्णविराम के जरिये हम खूबसूरती प्रदान करते हैं। पर जब तक उसके एक संभावित अंत, जिसकी संगति पूरी कथा के साथ न बैठती हो, की तलाश न कर ली जाये, मन किसी अभिशप्त बैताल की तरह उस डाल पर बारहा लौटता रहता है। आवाजाही के इस सिलसिले मेंलंच बाॅक्सकी सतह पर तिरते आशयों को एकसूत्र में पिरोने का जो अवसर मिला तो उसके कुछ दिलचस्प नतीजे उभर कर सामने आये। यहाँ उन्हीं नतीजों को साझा करने की कोशिश भर है।

फिल्म में कंट्रास्ट के दो युग्म हैं। एक जोड़ा जो बहुत आसानी से पहचान में आता है, वह तो साजन फर्नांडिस (इरफान खान) और असलम शेख (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) का है। एक की मितव्ययिता और दूसरे की वाचालता का कंट्रास्ट फिल्म की सतह पर पसरा है। पर असल कंट्रास्ट इला (निम्रत कौर) और साजन फर्नांडिस के बीच का है। साजन फर्नांडिस दुनिया से बेजार एक ऐसा जीव है, जिसने जीवन की एकरसता को अपने जीवन का स्थायी भाव स्वीकार कर लिया है। उसकी संवेदनायें छीज गई हैं (बच्चों के द्वारा गेंद मांगे जाने पर उसकी प्रतिक्रिया या फिर उसके सहकर्मियों के उसके बारे में व्यक्त की गई राय से इस बात की पुष्टि होती है)। वह एक स्तर पर लगभग यांत्रिक हो चुका है। अपने आत्मनिर्वासित एकाकीपन को उसने स्वीकार लिया है। इसके उलट इला के जीवन की पूरी जद्दोजहद उन संवेदनाओं को बचाये रखने की है। ऐन फिल्म की शुरुआत में ही जब कैमरा माँ-बेटी के एक जोड़े को अपनी जद में लेता है, जिसमें एक माँ अपनी बच्ची को स्कूल भेजते हुए उसको कुछ सावधानियाँ बरतने की हिदायत दे रही है। और उसके बाद के दृश्यों में गृहस्थन और पत्नी की भूमिका का जिस संजीदगी से निर्वाह कर रही है, या पति के संवेदना तन्तुओं में मौजूदगी दर्ज कराने की अपनी इकहरी कोशिशों में वह जिस कदर दुहरी हुई जा रही है, उन दृश्यों में उसके सांवलेपन के गहराने को आप महसूस कर सकें तो घर की चैखट के भीतर अपने संवेदनाओं को बचाये रखने की उसकी अकुलाहट को महसूसा जा सकता है। इला और साजन व्यक्तित्व के दो विपरीत छोरों पर हैं। इसे उस बिलकुल पहले मौके पर देखा जा सकता है, जब इला साजन को टिफिन के डब्बे में पहला खत भेजती है। उसके अल्फाज हैं-“कल खाली डब्बा भेजने के लिए आपका शुक्रिया, वैसे वह खाना मैंने अपने हसबेंड के लिए बनाकर भेजा था। और जब डब्बा वापस आया तो ऐसा लगा कि घर आकर आज वह मुझसे कुछ कहेंगे। कुछ घंटों के लिए सोचने लगी कि दिल का रास्ता वाकई पेट से होकर जाता है, उन घंटों के बदले आज भेज रही हूँ पनीर मेरे हसबेंड का फेवरेट-इला।”  क्या कोई संवेदनशील व्यक्ति इसके जवाब में यह लिख सकता है किडियर इला, द फूड वाॅज वेरी साल्टी टूडे।इसके बाद रोज के लंचबाॅक्स में खतों के आने-जाने का जो सिलसिला है, उसमें भी अपनी निजता को साझा करने का साहस इला ही दिखलाती है, साजन की संवेदनागत शुष्कता बनी रहती है। साजन के आत्मनिर्वासनगत सूखे को अपनी निजता से सींचने का काम यों तो इला करती है, पर इला से भी पहले उसके एकांत में शुरुआती सेंधमारी करने का काम असलम शेख करता है। लेकिन जिन क्षणों में साजन के मन में नमी घर करने लगती है, उन क्षणों से पूर्व फिल्म की कहानी में कुछ ऐसी चीजें गुंथी हुई हैं, जो इस फिल्म की भारतीयता को पुष्ट करती है। विवाहेतर संबंधों को लेकर भारतीय मन अब भी सहज नहीं हो सका है। इसलिए इला के जीवन में विकसित होनेवाले इस विवाहेतर सम्बन्ध को वैधता प्रदान करने के लिए इला के पति केअफेयरऔर गृहस्थ जीवन के प्रति गैर-जिम्मेदार होने की बात, फिल्म पहलेइश्टेब्लिशकरती है, उसके बाद इला के जीवन में साजन एक विकल्प के बतौर दाखिल होता है। फिल्म की बुनियादी फांस इसविकल्प की विकल्पहीनतामें निहित है। आमतौर पर कलायें असंभव कल्पनाओं को साकार किया करती हैं। इस लिहाज से फिल्म भी असंभव कल्पनाओं को साकार करनेवाली एक आधुनिक कला विधा है। आमतौर पर इला और साजन के बीच का उम्रगत फासला इतना है कि सामान्य स्थितियों में उनके बीच किसी किस्म के सम्बन्ध की संभाव्यता को सहजता से अस्वीकार किया जा सकता था। पर फिल्म अपनी कलागत-विधागत अहर्ता को पूरा करती है।

पर यह फिल्म भारतीय सन्दर्भों में स्त्रीत्व के कुछ ऐसे पहलुओं को उजागर करती है, जिसकी ओर एकबारगी हमारा ध्यान नहीं जाता है। ज्याँ पाल सार्त्रमानते थे कि किसी भी देश को समझने के लिए वहाँ की स्त्रियों को समझना जरुरी है। संयोग से इला, इला की अनदेखी पड़ोसन और इला की माँ की भूमिकाओं को गौर से देखें तो उनका समुच्चय भारतीय महिलाओं की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करती जान पड़ती हैं। यह सब भारतीय औरतों की उस जमात का नुमाइंदगी करती जान पड़ती हैं, जो बहुत महŸवाकांक्षी कभी नहीं रहीं, जिनके लिए उनका घर-आँगन ही सर्वोच्च प्राथमिकता पर रहता आया है। विवाह, परिवार और संतति से बाहर उनकी दुनिया कभी फैली ही नहीं है। सात्र्र की सहचर सिमोन द बोउवा स्त्रियों की इस कैटेगरी के बारे में कुछ ऐसा सोचती थी किएक साफ-सुथरी चैकोर (स्क्वायर) पारिवारिक जीवन जीने वाली स्त्री कहीं भी स्वतंत्र नहीं है और न उसका कोई निजी अस्तित्व है। दरअसल सदियों से कंडीशंड होकर (जिसे भारत में संस्कार कहा जाता है) स्त्री के मन में एकबैड फेथके रुप में यह विश्वास बद्धमूल हो गया है कि पुरुष की छत्रछाया में रहकर भी वह स्वतंत्र है और उसका कोई निजी जीवन है। इसके बाद बच्चे पैदा होते हैं औरपरिवारबनता है तो स्त्री की स्वतंत्रता और सिकुड़ने लगती है और वे पति के साथ ही बच्चों की परवरिश में अपने को होम कर देती हैं।विवाह ऐसी स्त्रियों के लिए जीवन का सर्वाधिक निर्णायक पहलू होता है। उसमें ठगे जाने पर, संस्कार और नैतिकता की ओढ़ाई गई चादर, उन्हें धार्मिक और कर्मकाण्डी बनने की दिशा में ढकेलता है या फिर सर्वाधिक सहजता से उपलब्ध विकल्प को संबल के तौर पर स्वीकार करने की दिशा में, जो जीवन से पलायन भी हो सकता है। इला के लिए साजन वही सर्वाधिक सहजता से उपलब्ध संबल या विकल्प है। लेकिन सहजता से उपलब्ध यह संबल या विकल्प क्या वाकई में संबल और विकल्प होते हैं? मुझे लगता है कि यह सवाल हीलंचबाॅक्सको देखने का एक बेहतर प्रस्थान बिन्दु हो सकता है, जहाँ से फिल्म की सतह के नीचे उतर कर उसके उत्स तक पहुँचा जा सकता है।

कागज पर कोई इबारत कलम और स्याही के बगैर नहीं लिखी जा सकती है, सिनेमाई संदर्भ में यह काम कैमरे और निगाह के बगैर नहीं किया जा सकता है। कैमरे और निगाह की अर्थपूर्ण युगलबंदी सेलंचबाॅक्सलबरेज है। (उन दृश्यों पर बात करने लगूं तो रस्ता भटक जाऊंगा, यथाप्रसंग उनको पिरोने की कोशिश करुंगा। अभी पहला नमूना।) फिल्म की शुरुआती चंद मिनटों के बाद एक दृश्य में गृहस्थी की जिम्मेदारियों के निभाने के क्रम में इला एक बेमतलब-सी हरकत करती नजर आती है। कपड़ों को धोने से पहले वह उन्हें सूंघ-सूंघ कर वाशिंग मशीन में डाल रही है। दूसरी बार जब वह इस बेमतलब-सी लगनेवाली हरकत को दुहरा रही होती है और कपड़ों से जब वह अपने पति के अफेयर को सूंघ लेती है। तब इस बात का भान होता है कि स्त्रियों की छठी इंद्रिय कितनी असाधारण और नायाब तरीके से काम करती है। यह इसका एक बेजोड़ नमूना है। यह फिल्म का टर्निंग प्वाइंट है। ससुराल में बिगाड़ होने परबैक-अपमायके का रहता है। वैवाहिक जीवन में हुए इस सेंधमारी पर, कपार पर हाथ धरे जब वह अपने माय-के पहुँचती है, गजब की त्रासदी वहाँ घटित होते हुए पाते हैं। जर्जर मायका और ध्वस्त होती गृहस्थी के बीच इला के लिए क्रमिक आत्महत्या का ही संभावित विकल्प बचता है। (या तो वहधोबी घाटकीयास्मीनकी तरह आत्महत्या कर ले या ‘15 पार्क एवेन्यू कीमीठीकी तरह विक्षिप्त हो जाये।) इससे उबरने की इला की कोशिशों में असल त्रासदी निहित है। वह अपने दुख-दर्द को साजन से साझा करते हुए लिखती है - “हलो, मुझे आपको कुछ बताना है, मेरे हसबेंड का अफेयर चल रहा है, बहुत सोचा उनसे बात करुंगी पर हिम्मत नहीं जुटा पाई। बात करके जाती भी कहाँ? एक जगह है, यश्वी ने स्कूल में सीखा है, भूटान में सब खुश रहते हैं। वहाँ ग्राॅस डोमेस्टिक प्रोडक्ट नहीं है, ग्राॅस डोमेस्टिक हैप्पीनेस है, यहाँ भी ऐसा होता तो।इस पर साजन का जवाब हैव्हाट इफ आई कम भूटान विथ यू?” इला भारतीय महिलाओं की जिस कैटेगरी की प्रोटोटाइप के रुप मेंलंचबाॅक्समें उभरती है, उसमें जूझने की बजाय पलायन की उसकी मंशा कहीं से अस्वाभाविक नहीं लगती है। इस पूरे प्रसंग में जो अस्वाभाविक-सा है। वह है यश्वी का इस्तेमाल। यश्वी इला की पाँच-सात साल की बच्ची है। पाँच-सात साल की बच्ची के मार्फत जीडीपी (ग्राॅस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) और ग्राॅस डोमेस्टिक हैप्पीनेस के बिन्दु को रखना, थोड़ा अस्वाभाविक लगता है। लेकिन इससे निकलनेवाली दूसरी अनुगूंज फिल्म की पूरी संरचना की लिहाज से ज्यादा मारक है। दो परिपक्व और प्रौढ़ लोग एक बच्ची की बातों में आ रहे हैं, इसे क्यों नहीं उनकीबचकानी हरकतमानी जाये? विकल्प के रुप में भूटान के बचकानेपन की हवा तो अगले ही दृश्य में असलम शेख यह कर के निकाल देता है किवहाँ की इकोनाॅमी बहुत डाउन है, हमारा एक रुपया वहाँ के पाँच रुपये के बराबर है।पर फिल्म में इसइंसीडेन्टके आस-पास की जो नाटकीयता है, उस नाटकीयता में अचानक आने-वाले उतार-चढ़ाव में यह बातें ओझल हो जाती हैं। खासकर इस पूरी नाटकीयता के केन्द्र में साजन की बदलती भाव-भंगिमायें हमें फुसला ले जाती हैं।कभी-कभी गलत टेªन भी सही जगह पहुँचा देती है।जैसे चमकते लेकिन खोखले शब्दाडम्बर में हम बह जाते हैं।कभी-कभीकी काव्यात्मकता में हम उसकीरियलिस्टिक प्रोबेबिलिटीकी नगण्यता की ओर ध्यान नहीं दे पाते हैं। इत्तेफाकों से जिंदगी नहीं चला करती। संयोग हमेशा दीर्घकालीक और दूरगामी विकल्पों के सर्जक नहीं होते हैं। दिल को बहलाने का यह अच्छा खयाल हमारे संवेदन तन्त्र को इस कदर अपने प्रभाव में लेता है किफीलगुडके चक्कर में हम फिल्म के मूल मर्म से महरुम हो जाते हैं। मूल मर्म बेहद त्रासद है। इसके लिए फिल्म के दो बिन्दुओं की ओर फिर से लौटना होगा। एक बिन्दु है-इला की पड़ोसन देशपांडे आंटी और दूसरी उसकी माँ। इन दोनों महिलाओं में एक अद्भुत साम्यता है और वह है अपने लगभग मरणासन्न पति की सेवा-सुश्रुषा में अपने जीवन को होम कर देने की भावना। यह उनके लिए बहुत सहज भी नहीं है।देशपांडे आंटी के हसबेंड पिछले पन्द्रह साल से कोमा में है। एक दिन वे उठे और पंखे को घूरते रह गयेे तब से और कहीं नहीं देखते दिन भर पंखे को घूरते रहते हैं और रात को सो जाते हैं। फिर सुबह होती है और अंकल फिर पंखे को घूरने लगते हैं। कुछ नहीं कहते, पिछले पन्द्रह साल से यही चल रहा है। देशपांडे आंटी को लगता है कि अंकल की जान उस पंखे में अटकी है। एक दिन बिजली चली गई और पंखे के रुकते-रुकते अंकल की आंखें पलट गईं, धड़कन भी बस रुक ही गई थी कि बिजली वापस आ गई और उस दिन से आंटी ने घर में जेनिरेटर लगवा लिया।देशपांडे आंटी के इस वस्तुस्थिति को उनके ही एक और संदर्भ से जोड़ कर देखने की जरुरत है और वह फिल्म के आखिर से पहले आता है, जब वह इला को कह रही होती है किपता है इला आज तेरे अंकल का चलता हुआ पंखा साफ किया मैंने।चलते हुए पंखे को साफ करने की कठिनता या असंभाव्यता का अनुमान करें और उनके जीवन की कठिनता से उसका मिलान करें तो इस वाक्य की बेधकता का अनुमान किया जा सकता है। देशपांडे आंटी की रोजमर्रे की जिंदगी का निर्वाह किसी चलते हुए पंखे को साफ करने जितना ही कठिन है। पर उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया है और अपने बूते निभा रही हैं। दूसरे बिन्दु की ओर गौर करें, जब इला के पिता की मौत होती है तब इला की माँ अपनी बेटी से जिस बेतकल्लुफी से यह कहती है किमुझे बहुत भूख लग रही है, पराठे खाने का मन कर रहा है। सुबह नाश्ता नही किया था मैंने, इनके लिए नाश्ता बना रही थी। मुझे हमेशा फिकर लगता था कि इनके जाने के बाद क्या होगा। लेकिन अब सिर्फ भूख लग रही है। शुरु-शुरु में हमारे बीच बहुत प्यार था, जब तू पैदा हुई थी, लेकिन सालों से इनसे इतनी घिन आती थी। तब भी रोज-रोज इनका नाश्ता-दवा-नहाना, नाश्ता-दवा-नहाना।कथाकार अखिलेश के शब्दों में कहें तोएक भयानक हादसे में इतनी भी ताकत नहीं होती है कि वइ इंसान की एक वक्त की भूख भूला दे।

बारीकी से देखें तो क्या देशपांडे आंटी और इला की माँ एक ही यातना के साझीदार नहीं हैं? फर्क है तो उन स्थितियों के प्रति स्वेच्छा या अनिच्छापूर्वक स्वीकार का। पर बावजूद इसके क्या वे दोनों समान परिस्थितियों में पड़े एक ही किरदार के विस्तार या एक्सटेंशन्स नहीं जान पड़ते हैं? क्या यह महज इत्तेफाक है कि देशपांडे आंटी का कोई चेहरा नहीं है, इला के लंग कैंसर से पीड़ित पिता की निर्जीव-सी लगती देह का भी कोई चेहरा कभी फिल्म में नहीं दिखता है। क्या अपने जीवन के उत्तरार्ध में सिगरेट पीने वाले साजन की वह संभावित परिणति नहीं हो सकती है? इस लिहाज से कोमा में पड़े देशपांडे अंकल और इला के पिता को फिल्म में दो अलग किरदारों के बतौर नहीं अलगाया जा सकता है। देशपांडे अंकल और इला के पिता वे सूत्र हैं, जो इस फिल्म के उस पहलू को उजागर करते हैं, जिसकी ओर असल में हमारा ध्यान नहीं जा पाता है और वह है फिल्म के समापन का दृश्य। दरअसल यह फिल्म का समापन ही था, जिसने मुझे परेशान कर रखा था और आखिर में कई दफा देखने के बाद यह सूत्र हाथ लगा कि फिल्मओपेनएंडेडनहीं थी। असल में देशपांडे आंटी और इला की माँ एक दूसरे के प्रतिरुप नहीं थे बल्कि वे इला के भविष्य के दोप्रोजेक्शनथे। इला के जीवन का उत्तरार्ध भी यही होना था, या तो वह स्वेच्छा से साजन के डायपर बदल रही होती या फिर शुरुआती दिनों के प्यार के बाद अपनी माँ की भांति अनिच्छापूर्वक नाश्ता-दवा-नहाने की अंतहीन प्रक्रिया को दुहरा रही होती। फिल्म भले एक खुले अंत का खुशनुमा-सा भ्रम रचती है। पर अंततः सच यह है कि यह कथा के फेरे को बहुत कायदे से पूरा करती है। इसी बिन्दु पर इला के समक्ष उपलब्धविकल्प की विकल्पहीनताका अहसास होता है। इस बिन्दु पर फिल्म जिस गहरी त्रासदी में तब्दील होती है, वह अद्भुत है। अद्भुत इस दृष्टि से भी कि आये दिन अखबारों में इस किस्म की हेडिंग देखने को मिलती है किदो बच्चो की माँ अपने प्रेमी के साथ फरारया एक बच्चे की माँ अपने आशिक के संग फुर्र। इसमें जो भाव निहित है, उसमें एक किस्म के मजे का भाव समाहित है।लंचबाॅक्सइसी विषय को उठाती है, पर इतनी संजीदगी से कि अखबारों की खबरों वाला हल्कापन इससे कोसों दूर नजर आता है। पर बावजूद इसके फिल्म इस बिन्दु पर न ठिठक कर एक दूसरे बिन्दु की ओर प्रयाण कर जाती है। एक ओर तो इला की विकल्पहीनता की ओर और दूसरी ओर प्रारब्ध, नियति या भाग्य जैसे सवालों की ओर। क्योंकि इला की यातना का उसके तईं कोई वैध कारण नहीं है। वह इस यातना की हकदार नहीं है, जो उसके पति के कारण उसके जीवन में आकार ले रहा है। इस या ऐसे अनेक किस्म के अयाचित यातनाओं (अनडिजव्र्ड सफरिंग) का स्त्रियों के सन्दर्भ में भारतीय परम्परा और संस्कार यही संतोषप्रद उत्तर देती आई है कि यह पूर्व जन्म के कर्मों का फल हो सकता है, जिसे प्रारब्ध कहा जाता है। प्रारब्ध जो इस जीवन की नियति या भाग्य पर हावी है। इला संघर्ष करती तो इसके दूसरे नतीजे सामने आते पर खुद उसके परिवार के हालात से उसके समर्पण और पलायन की मानसिकता या संस्कार की पुष्टि होती है। एक घंटे पैंतालीस मिनट की फिल्म में इतनी बातों को पूरी कलात्मकता के साथ पिरोने और साकार करने की रितेश बत्रा की सिनेमाई चेतना की जितनी तारीफ की जाये, वह कम है।

इस फिल्म में एक गजब की बात और है। वह इसकेकंटेटसे नहीं इसकेक्राफ्टसे वाबस्ता है। एक स्वाद जो जिंदगी भर के लिए आपकी जिह्वा पर घर कर जाये, मामूली बात नहीं है। जीवन में चुनींदा जायके ही हमारी स्मृतियों में अपनी जगह बना पाते हैं। इस जायके को सिरजने की प्रक्रिया पर गौर करें तब यादगार जायके या स्वाद के जन्म की कथा का भान हमें होता है। कोई भी भोजन कई चरणों और प्रक्रियाओं से गुजरकर अपने मुकाम तक पहुँचता है। अलग-अलग खाद्य पदार्थों के बीच सही आनुपातिकता के संधान में पूरी उम्र गुजर सकती है। अलग-अलग खाद्य पदार्थ अलग-अलग स्वाद (स्वभाव) को धारण करते हैं। उन अलग-अलग आस्वाद वाले भोज्य पदार्थों के मध्य आपसी साझेदारी से एक साझे स्वाद का जन्म होता है। एक आँच या ताप के आगे वे सभी अपनी-अपनी तासीर को छोड़कर एक दूसरे में घुलने को आतुर होकर उस स्वाद को सिरजते हैं। यह स्वाद उसके नियंता की तन्मयता, संतुलन, अनुभव, समर्पण और भावनाओं का सूचक होता है। इनमें से किसी एक के भी अभाव में उस यादगार जायके की निर्मिति संभव नहीं है। जायका एक कलेक्टिविटी, एक साझेपन को दर्शाता है।लंचबाॅक्सको लगभग फिल्म समीक्षकों ने इला ओर साजन की कहानी के तौर पर बयां किया है। यह लगभग वैसा ही है जैसे हम आलू-गोभी की सब्जी कहते हुए उसकी निर्मिति में शामिल मिर्च, नमक, तेल जैसे अन्य सहायक सामग्रियों के वजूद की अनदेखी कर देते हैं। क्योंकि इनकी मात्रा इतनी कम होती है, हम इनके अस्तित्व को नगण्य मान कर चलते हैं। पर आस्वाद की निर्मिति में इनमें से किसी एक को भी दरकिनार कर दें तो स्वाद, बेस्वाद हो जायेगा। खाना बनाने के इस बुनियादी फलसफे कोलंचबाॅक्सकेक्राफ्टके स्तर पर लागू करें तो इस फिल्म के हर किरदार की अपरिहार्यता को आप महसूस कर सकते हैं। तब असलम शेख (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) के किरदार के मायने को समझा जा सकता है। इला और साजन की केन्द्रीयता के बीच असलम शेख एक तरीके से हाशिये पर है। पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, उसका कैरेक्टरअनफोल्डहोना शुरु होता है। एक दर्शक के सारे पूर्वानुमानों को झुठलाता हुआ वह अप्रत्याशित तौर पर उभरता है। उसकी चापलूसी से भरी चिपकू अदायें और काम निकालनेवाली भंगिमायें अनायस उसकेसर्वाइवल इंस्टिक्टमें तब्दील हो जाती है। इसलिए फिल्म कापोजीटिव नोटतो असलम शेख की दास्तान है। इला और साजन तो निमित्त मात्र है, जो असलम शेख के बरक्स एक बड़ा कंट्रास्ट रचते हैं। असलम शेख की जिजीविषा और संघर्षशीलता कोलंचबाॅक्सके एक जायके के बतौर देखा जा सकता है। एक छोटा-सा सिरा और है, नगण्य-सा, पर उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। यह सिरा है यश्वी और फिल्म में शामिल दूसरे बच्चों का। बच्चों की संवेदनशीलता इतनी निष्कलुष होती है कि उनकी संवेदनाओं पर पहुँची चोटें उनके मन-मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि सालों वे एक दुःस्वप्न की भांति उनकी स्मृतियों में अपना घर-बार बसाये रहते हैं। दो मौकों पर यश्वी की निगाहों केपाॅजको आप गौर करें तो उसकी सांकेतिकता में निहित अर्थवत्ताको भाप सकते हैं। पहला, जब इला डब्बे के गलत जगह पहुँच जाने की बात का जिक्र देशपांडे आंटी से कर रही है और आवाज बाहर न जाये इस लिए रसोई का नल खोल रखा है। बहते पानी के शोर में अपनी मासूमियत से निकल कर समझने की जिस कोशिश के साथ अपनी माँ को देख रही है, उसको महसूसने के लिए आपको वितोरियो डे सिका कीचिल्ड्रेन आर वाचिंग अससरीखी कई फिल्में देखनीं होंगी। या फिर बच्चों के द्वारा गेंद माँगे जाने पर साजन फर्नांडिस के व्यवहार पर रात के खाने के दौरान खिड़की के स्लाइडर को बंद करने के बच्ची के हरकत में उसके प्रतिकार को देख सकते हैं। वहीं बाद में साजन के बदले आचरण का सम्मान करते हुए वही बच्ची खाने के दौरान न सिर्फ अपनी खिड़की खुली रहने देती है बल्कि साजन का अभिवादन भी करती है। इला के दुखपूर्ण जीवन की छांह में यश्वी के कुम्हलाये बचपन को देखा जा सकता है। बचपन व एकाकीपन एक दूसरे के विपर्यय हैं। पर यश्वी के अपनी गुड्डी के संग आँख-मिचैनी खेलने की मार्मिकता को उस दृश्य के दौरान ही अनुभूत किया जा सकता है।

तकरीबन एक घंटे पैंतालीस मिनट की अवधि में यह फिल्म अपनी एक आहिस्ता गति से खुलती है। इस खुलने के क्रम में जिस कदर बारीकी और ब्यौरो के यथाप्रसंग युगलबंदी से अपने परास का फैलाती है, उससे रितेश बत्रा की सिनेमाई चेतना का अहसास होता है। बेहद चुस्त एडिटिंग और दृश्यों के मार्फत् कहानी को बयां करने की जिद की वजह सेलंचबाॅक्ससमकालीन फिल्मकारों के फिल्मगोई के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाती दिखती है। रितेश बत्रा की सिनेमाई चेतना के बहानेलंचबाॅक्सऔरलंचबाॅक्सके जरिये रितेश बत्रा पर थोड़ी और बातें करने की इच्छा है। भलेलंच बाॅक्सके शुरुआती दृश्यों और बीच के हिस्सों में मुम्बई को फिल्माने की जो कोशिशें हैं, वह किरण राव केधोबी घाटमें मुम्बई और शुजाॅय घोष कीकहानीमें कोलकाता को फिल्माने की संजीदगी से कमतर है। खासकरघोबी घाटऔरकहानीमें शहरों के लिए जो बैकग्राउण्ड स्कोर है, वैसे सिनेमेटिक सेन्स को रितेश बत्रा नेलंच बाॅक्समें इस्तेमाल नहीं किया है (संभव है कि इसकी एक बड़ी वजह फिल्म का बजट रही हो)। पूरी फिल्म देखने के बाद यह बात थोड़ी खटकने वाली लग रही थी। क्योंकि अगरलंच बाॅक्सकी ओपनिंग सीन को आप देखें तो मंथर गति से खुलती मुम्बई लोकलों की समांतरता और छत पर अपने पंख संवारते कबूतरों का जत्था निहायत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है। पर उसके बाद मुम्बई की बजाय मुम्बई के डब्बेवालों की निगाह से मुम्बई को फिल्माने में जो फिल्मांकन केडाक्यूमेंट्री फार्मका इस्तेमाल किया गया है, दृश्यों में उसके कारण अचानक से जो रुखरापन या खुरदरापन आता है। दृश्यों का वह खुरदरापन मुम्बई के डिब्बेवालों को फिल्म के एक अनिवार्य सन्दर्भ के बतौर स्थापित करता है। बाद में जानने की कोशिश की तो मालूम हुआ कि रितेश बत्रा बुनियादी तौर पर मुम्बई के इन डिब्बावालों पर फिल्मनुमा कुछ बनाना चाह रहे थे जिसके लिए 2007 से वह उन पर काम कर रहे थे। बल्कि फिल्म के दौरान जो डिब्बेवालें हैं। वे वास्तविक डिब्बेवाले हैं। पूरे फिल्म के दौरान इला के द्वारा साजन फर्नांडिस को भेजा गया खाने का डब्बा इन्हीं डिब्बेवालों के साथ नत्थी कर दिया गया था। और सात दिन तक उस डिब्बे को शहर के अलग-अलग राहों और हाथों से गुजरते हुए फिल्माया गया है। फिल्माने की इस अदा और बाद में फिल्म के समापन पर उसके प्रभावों के बारे में आप सोचें तो आप कुछ-कुछ ईरानी फिल्मों के आस्वाद-सा अपने भीतर घुलता महसूस कर सकते हैं। जैसे ईरानी फिल्मकारों की एक पूरी पीढ़ी बेहद छोटे-छोटे विषयों पर नायाब फिल्मों का निर्माण करती आई है। वैसे हीलंच बाॅक्सएक ऐसी ही मामूली-सी लगनेवाली गैरमामूली फिल्म है।
रितेश बत्रा के शार्ट फिल्मों को गर आप देखें और उसी सिलसिले मेंलंचबाॅक्सको देखें तो उनकी दो खूबियों को पहली निगाह में पहचाना जा सकता है। शब्द की तुलना में दृश्य उनके लिए प्राथमिक महŸव की चीज है। वे यथासंभव दृश्यों के मार्फत् खुद को व्यक्त करना पसन्द करते हैं और दूसरा मितव्ययिता। वे शब्दों को बेहद नपा-तुला उपयोग संवादों के दौरान करते हैं। इस मितव्ययिता में जो एक अन्तनिर्हित काव्यात्मकता होती है, उसे एक नियमित अंतराल परलंचबाॅक्समें महसूसा जा सकता है। दृश्यों के जरिये कहानी को बयां करने का उनका आग्रह भाव-नावों को उनकी फिल्मों की केन्द्रीय संवेदना के तौर पर प्रस्तावित करता है। इसलिएलंचबाॅक्समें क्रियायें भी भावों को समृद्ध करने वाली सहायक की भूमिका में दिखती हैं। जाहिर है भावों की इस सान्द्रता को फिल्माने में कैमरा की निगाह में जो गहराई होनी चाहिए, उसके साथ सही तरीके से न्याय करने की चाहत से हीलंचबाॅक्समें कैमरे केक्लोज अप्सका बहुधा किन्तु न्यायसंगत प्रयोग देखा जा सकता है।

रितेश बत्रा का लम्बा अनुभव पटकथाकार की रही है। उनके इस अनुभव सेलंचबाॅक्सको समृद्ध होते देख सकते हैं। इस लिहाज से भी रितेश बत्रा की सिनेमाई चेतना के सन्दर्भ में दो बातें जरुरी तौर पर रेखांकित करने लायक लगती हैं। पहला, किरदारों के रेखांकन के सन्दर्भ में और दूसरा पटकथा लेखन के उस परम्परागत निगाह के अतिक्रमण में जो पटकथा को या तोहीरेासेन्ट्रिकयाजाॅनरसेन्ट्रिकमानती आई है। रितेश बत्रालंचबाॅक्समें इस परम्परागत नजरिये को इस कदरप्राब्लमेटाइजकरते हैं कि इस फिल्म को न तो बेहद सहजता सेहीरोसेंट्रिकही कहा जा सकता है और न किसीजाॅनरमें ही फिट किया जा सकता है।लंचबाॅक्सको देखते हुए यह बात कही जा सकती है कि एक उम्दा पटकथा के साथ न्याय कर सकने लायककास्टिंगआपने कर ली तो आधी फिल्म उसी वक्त बन गई। इरफान और नवाजुद्दीन के बरक्स निम्रत कौर की कास्टिंग के बाबत इस बात को कह रहा हूँ। गर कायदन आप पूरी फिल्म को देखें तो इला का चरित्र इधर हाल के दिनों में किसी भी अभिनेत्री के द्वारा अभिनीति भूमिकाओं में से सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में से एक है। आरती आचरेकर (देशपांडे आंटी) की आवाज पर निम्रत कौर के जोरेस्पांसेजहैं। उसकी सूक्ष्मता और सटीकता से निम्रत के अभिनय की रेंज का पता चलता है। मैंने पहले भी कहा है कि शब्दों के बजाय दृश्यों में बात करना रितेश बत्रा को पसन्द है। दृश्यों में भी भावनाओं और संवेदनाओं को सटीकता से संप्रेषित कर सकने की उनकी जिद से निम्रत वह दे सकी है कि वह कोई दूसरी फिल्म न भी करे तो उसकी यह भूमिका सिनेप्रेमियों को एक लम्बे अरसे तक याद रहेगी और मुझ जैसे सिनेप्रेमी को ताउम्र। भावों को सटीकता सेकन्वेन करने के दो खराब उदाहरण रख रहा हूँ जिससे निम्रत की यह प्रशंसा अतिरंजित न जान पड़े। एकराॅकस्टारमें नरगिस फाकरी का अभिनय और दूसराराँझणामें सोनम कपूर का।

एक अच्छी पटकथा किसी फिल्म की रीढ़ हुआ करती है।लंचबाॅक्सकी पटकथा में जो कसाव और व्यवस्थित ब्यौरे हैं, उस पर थोड़ी ही सही पर बात जरुरी है। फिल्म की शुरुआत में इला के कपड़े सूंघ कर वाशिंग मशीन में डालने की आदत का समापन फिल्म के समापन से पहले होता है, जो इस बात को जाहिर करता है कि उसने अपने पति के अफेयर को अपनी नियति मान ली है। ट्रेन में असलम शेख के द्वारा आफिस के फाइलों पर सब्जियाँ काटने का सिलसिला उसके बाॅस की टेबुल तक पहुँचता है, जब वह पूछता है कि इन फाइलों से लहसुन, प्याज और आलू की गंध क्यों आती है? साजन के डब्बेवाला के टिफिन का कवर एग्जैटली वही है, जो इला इस्तेमाल करती है। साजन जब डब्बेवाला के पास जाता है तो उसकी शेल्फ पर वैसे दर्जनों कवर लगे डब्बे पड़े होते हैं। फिल्म की शुरुआत में ही इला का पति और साजन एक ही ट्रेन की एक ही बोगी में सफर करते हुए पाये जाते हैं। जो इस ओर इशारा करता है कि उनका दफ्तर कहीं आस-पास ही पड़ता होगा, जिससे यह डब्बों की अदला-बदली वाला कांड हो गया है। पूरे फिल्म में इला का पति कभी इला के साथ एक कायदे का फ्रेम साझा नहीं करता है। एक जगह इला अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए एक और बच्चे की बात कह रही होती है तो उस दौरान भी वह कन्नी काट कर निकल जाता है और सामने के दर्पण में इला की साझीदार उसका प्रतिबिम्ब भर रह जाता है। यह अकारण नहीं है कि साजन को लिखे अपनी चिट्ठियों में इला अपने पति राजीव को नाम से नहीं, बल्किहसबेंडकह कर संबोधित करती है, जो एक ओहदा सरीखा लगता है।  

देशपांडे आंटी के बतौर भारती आचरेकर की आवाज के ठोसपने से उसकी अमूर्तता हवा हो जाती है। खाली डिब्बे में लौटे खत को भर गिलास चाय के साथ पलथी मार के पूरी तसल्ली से पढ़ने की अदा हो, देशपांडे आंटी की आवाज पर बदलती चेहरे की रंगत जैसे अनेक मौके हैं जहाँ रितेश बत्रा की डिटेलिंग की कोई सानी नहीं है। यों तो इस पीढ़ी के फिल्मकारों में दिबाकर बैनर्जी की जोडिटेलिंगकी क्षमता है, वह माशाअल्लाह है। पर इस अकेले फिल्म के बूते रितेश बत्रा कीडिटेलिंगका कोई जोड़ नहीं है।लंचबाॅक्ससर्जनात्मक स्तर पर वाकई एक शानदार फिल्म है, जिसका जायका याद रह जाने लायक है। कई और कोण हो सकते हैं जैसे कि इला का हिन्दू होना, साजन का ईसाई होना और असलम का मुस्लिम होना, पर इसकी कोई सुसंगत व्याख्या फिल्म की बुनियादी संवेदना से जुड़ने लायक कड़ियाँ मैं नहीं जुटा सका, वैसे प्रचलित मुहावरों में इसके लिए एक बेहद खूबसूरत शब्द उपलब्ध है-‘सेकुलर इमेज। आप चाहें तो इस्तेमाल कर सकते हैं।


संपर्क- 09308990184

Tuesday, July 22, 2014

सवाल ये है कि ‘नीला स्कार्फ’ है क्या?

इस समय वह हिंदी की एक बड़ी परिघटना है- नीला स्कार्फ. प्री-लांच यानी किताब छपने से पहले इस किताब की अब तक करीब 1400 प्रतियाँ बिक चुकी हैं. इस किताब ने हिंदी के बहुत सारे मिथों को तोड़ दिया है. जिसमें सबसे बड़ा मिथ यह है कि हिंदी में किताब बिकती नहीं है, यह कि जब तक कोई ‘बड़ा’ संपादक-आलोचक सर पर हाथ न रखे तब तक हिंदी में लेखक बनना असंभव है. अनु सिंह चौधरी के इस कहानी संग्रह ने न जाने कितने लेखकों में यह विश्वास पैदा किया है कि अपने लेखन के दम पर भी खड़ा हुआ जा सकता है. आज हजारों पाठकों की तरह मैं भी ‘नीला स्कार्फ’ की प्रतीक्षा में हूँ. फिलहाल पढ़ते हैं अनु सिंह चौधरी का लेखकीय वक्तव्य जो ‘नीला स्कार्फ’ के बनने को लेकर है, जीवन की आपाधापी में समय चुराकर लेखिका के बनने को लेकर है. ‘जानकी पुल’ के पाठकों के लिए ख़ास तौर पर- मॉडरेटर.
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डिस्केलमर - मैंने ऐसी कोई भी बात नहीं कही जो पहले किसी ने न कही हो। मैने कुछ भी ऐसा नहीं लिखा जो पहले लिखा न गया हो।

फिर ‘नीला स्कार्फ’ में ऐसा क्या था, जो किताब को इस किस्म की प्रतिक्रिया मिली? तब जब कि किताब छपी नहीं? मैं जानती हूं कि बारह-तेरह सौ की प्रीबुकिंग कोई अजूबा नहीं है। मैं ये भी जानती हूं कि एक बार किताब की रिलीज़ के बाद ये ज्वार उतर भी सकता है। मैं ये भी अच्छी तरह समझती हूं कि इस किस्म की प्रतिक्रिया ने मेरे माथे पर अपेक्षाओं का बोझ बढ़ा दिया है। मुझे लगातार ऐसा लग रहा है कि मैं ब्लॉग करते हुए, फेसबुक पर स्टेटस अपडेट डालते हुए, बिना किसी औपचारिकता के और बहुत बेबाकी से कतरा-कतरा अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा पब्लिक प्लेटफॉर्म पर डालते हुए ही ठीक थी। मुझपर कल सुबह से कहीं किसी गुमनाम जगह भाग जाने का खयाल तारी है। मैंने कल एक बेहद करीबी दोस्त को कहा था, दिस इज़ गेटिंग टू बिग फॉर माई कम्फर्ट।

लेकिन मेरे लिए अपनी किताब को लेकर डिटैच होना और फिर इस अप्रत्याशित फेनोमेनन को समझना और इसके बारे में बात करना बहुत ज़रूरी है। इसलिए भी क्योंकि जाने-अनजाने मैंने अपने ही जैसे कई क्लॉज़ेट राईटर्स (कमरों में बंद होकर लिखनेवालों, ख़ासकर लिखनेवालियों) की उम्मीदें हरी कर दी हैं। मेरे इनबॉक्स में आनेवाले ई-मेल्स और छोटे-छोटे संदेश इस बात के गवाह हैं कि एक किताब एक नहीं, कम-से-कम चार-पांच लेखकों को जन्म देती है। एक किताब कई सारे ख़्वाब भी जगा देती है।

सवाल ये है कि ‘नीला स्कार्फ’ है क्या?

‘नीला स्कार्फ’ उन कहानियों का संग्रह है जो मैंने अपना खाली वक़्त भरने के लिए, अपने बच्चों को बड़ा करते हुए लिखीं। ‘नीला स्कार्फ’ उस सफ़र का गवाह है जो पिछले पांच-छह सालों में मैंने तय किया।

शुरुआत कुछ ऐसे हुई। एक दिन फेसबुक अकाउंट बना दिया गया – मेरे छोटे भाई ने बनाया था शायद। मुझे ठीक-ठीक याद भी नहीं कि बच्चे तब कितने छोटे थे। फिर एक दिन प्रियदर्शन जी ने कहा कि घर में रहती हो तो कुछ लिखती क्यों नहीं? ब्लॉग लिखो। एक दिन आकर मेरे टूटी-फूटी कविताओं पर (बहुत तीखी और बेबाक) प्रतिक्रिया भी दे गए। फिर पता नहीं कैसे पहला ब्लॉग लिखा, फिर दूसरा और फिर तीसरा। और फिर डायरी की तरह वो ब्लॉग लिखती रही, लिखती रही। कभी बच्चों को सुलाकर लिखा, कभी उन्हें प्लेस्कूल भेजने के बाद लिखा। कभी एडिटिंग और अनुवाद के असाईनमेंट्स के बीच लिखा, कभी मायके-ससुराल में बैठकर लिखा। कभी ट्रेन में वक्त काटने के लिए लिखा, कभी एयरपोर्ट पर अपने दाएं-बाएं उछलते बच्चों की शरारत से ध्यान हटाने के लिए लिखा। 

फेसबुक का इस्तेमाल करते हुए पता चला कि मुझे बांटने की बीमारी थी, अपने आस-पास के कई और लोगों की तरह। (जानकी पुल भी उसी बीमारी का नतीजा है – फ्री कॉन्टेंट बांटने की बीमारी का)। अच्छी कविता पढ़ी तो अपने जैसे दो-चार लोगों को पढ़वाने का जी चाहा। किसी याद ने सताया तो पूछ बैठी कि तुम्हारे साथ भी ऐसा होता है क्या? फिल्म देखी तो तीन लाईन में रिव्यू लिख दिया। कहीं काम के सिलसिले में घूमने गई तो पूरा का पूरा ट्रैवेलॉग दस लाइनों में फेसबुक पर डाल दिया। मैं अकेली नहीं थी जो ये कर रही थी। मेरे जैसे हज़ारों लोग हैं जो फेसबुक का क्रिएटिव इस्तेमाल कर रहे हैं।

बहरहाल, फेसबुक वो खिड़की थी जो दुनिया को नई नज़र से देखने का रास्ता खोल रही थी मेरे लिए। फेसबुक और ब्लॉग वो ज़रिया भी बन गया जिसके रास्ते मुझसे लोग पूछने लगे, तुम हमारे लिए ये लिख सकोगी? या फिल्म बना सकोगी? या कन्सलटेंसी का काम कर सकोगी? मैं जिन निजी कहानियों को साझा कर रही थी उसके बदले कई सारे दोस्त और शुभचिंतक बनने लगे। मैं जिस फेसबुक पर अपनी ज़िन्दगी के टुकड़े बांट रही थी, उसी फेसबुक के ज़रिए मुझे अपने वजूद की ख़ातिर बड़ा मकसद मिलने लगा। गांव कनेक्शन उनमें से एक था। याद शहर उनमें से एक था। यात्रा बुक्स और बाद में हार्पर हिंदी के साथ मेरा रिश्ता उसी फेसबुक असोसिएशन का नतीजा था।

खुलकर अपनी बात कहने, और ईमानदार बने रहने ने मुझे क्लायंट्स कम, दोस्त ज़्यादा दिए। उन्हें मालूम था कि मैं गायब नहीं हो सकती। मैं कहां हूं, क्या कर रही हूं, किन रास्तों पर चल रही हूं – पता लगाना बहुत आसान था। मेरा रेफरेंस चेक करना बहुत आसान था। इसलिए असाइनमेंट्स के लिए, काम के लिए मुझे कभी पिच नहीं करना पड़ा। मुझे काम मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ी। फेसबुक, गूगल और ब्लॉग मेरे लिए उस रेफ़री का काम कर रहे थे जिनकी ज़रूरत नौकरियां या काम ढूंढते हुए आपको पड़ती है। मुझे पब्लिशर खोजने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी। मेरा लिखा हुआ जो भी अच्छा-बुरा था, पब्लिक प्लैटफॉर्म पर मौजूद था।

‘नीला स्कार्फ’ कई सालों की उसी ईमानदारी का प्रतिफल है। मेरी किताब खरीदने वाले वो क्लायंट हैं जिनसे मैंने कभी नहीं पूछा कि आप मुझसे प्रो-बोनो काम करा रहे हैं, या पैसे भी देंगे मुझे? किताब खरीदने वाले वो पुराने सहयोगी हैं जिन्होंने मुझे काम करते देखा है। किताब खरीदने वाले फेसबुक के वो दोस्त हैं जिन्हें एक पोस्ट में अपनी परछाई नजर आती है। किताब खरीदने वाले वो दो सौ फॉलोअर्स हैं जो मेक्सिको, चिली, चाइना, नाइजीरिया और पता नहीं कहां कहां से मेरे बेहद निजी पोस्ट्स पढ़ते हैं (जिन्हें मैं सिर्फ और सिर्फ भड़ास मानती रही आज तक)। किताब खरीदने वाले और उसके बारे में बात करने वाले वो लोग हैं जो मुझे सालों से निजी तौर पर जानते हैं – जिन्होंने पंद्रह साल की लड़की से पैंतीस साल की औरत हो जाने का मेरा सफ़र देखा है – मेरे दूर के रिश्तेदर, मेरे बचपन के दोस्त जिनसे मैं फेसबुक से वापस जुड़ी। मेरी ग़लतियों के साक्षी रहे हैं ये लोग, मेरे आलोचक रहे हैं, कभी प्यार किया है मुझसे तो कभी मेरी बेवकूफ़ियों पर मुझे माफ़ न करने की कसमें खाई हैं।

‘नीला स्कार्फ’ और कुछ नहीं है, ऐसे ही कई बेहद करीबी रिश्तों का सेलीब्रेशन है।  

लिखने के लिहाज़ से मैं चाहे जितनी भी आलसी रहूं, ऑर्गनाइज़ करने के मामले में (और टू-डू लिस्ट बनाने में) मैं अव्वल दर्ज़े की फ़ितूरी हूं। मुझे हर काम योजना के तहत, सलीके से किया हुआ चाहिए। मेरी तमाम बेतरतीबियों के बीच काम के मामले में सलीका वो लक्ष्य है जिसे मैं हर रोज़ पूरा करने की कोशिश करती रहती हूं। लेकिन ‘नीला स्कार्फ’ लिखने और उसे किताब की शक्ल देने में कोई स्ट्रैटजी, कोई योजना काम नहीं आई। बल्कि इस एक किताब ने मेरी समझ की कई सारी धारणाओं को धराशायी कर दिया है। मैंने तय किया कि किताब नए और छोटे पब्लिशर के पास ले जाऊंगी (शैलेश से मैंने कहा था कि दो सौ कॉपियां मेरा लक्ष्य हैं)। मैंने ये भी तय किया कि मैं किसी से इस किताब के बारे में बात नहीं करूंगी (किताब के प्रोमोशन को लेकर मेरे और शैलेश के बीच में भयंकर मतभेद हुए)। अपनी सारी कमज़ोरियां यहां इस पन्ने पर आकर लिख देना भी एक पुरानी धारणा को तोड़ने जैसा ही है कि हम अपने लिखे हुए के बारे में खुद ही कैसे बात करें? ये अपना पीआर खुद करना होगा। मैं नहीं जानती कि पीआर का असली मतलब क्या होता है, लेकिन वन-ऑन-वन रिलेशन की जो कमाई मैंने पिछले पांच सालों में हासिल की, ‘नीला स्कार्फ’ वो जमापूंजी है (और उसी जमापूंजी की बदौलत मैं खुलकर अपनी किताब के बारे में यहां लिख पा रही हूं)।   

‘नीला स्कार्फ’ कई सारी तकलीफ़ों का गवाह भी है। ये तकलीफ़ें अकेले बैठकर रात-रात भर खुद से जूझते हुए कहानी लिखने की कोशिश और फिर उसमें असफल हो जाने से पैदा होती रहीं। ये तकलीफ़ें उन सवालों से पैदा हुईं जो अक्सर अपने ही घर में अपने ही लोग पूछते थे – इतना क्या लिखती रहती हो? ये तकलीफ़ें उस बेचैनी, उस गुमख़्याली से पैदा हुईं, जो सिर्फ एक लिखनेवाला ही समझ सकता है। कि जब आप एक कहानी को किसी मुकाम पर पहुंचा न पा रहे हों तो क्यों आस-पास की आवाज़ें आपको रुचिकर नहीं लगतीं? कि जब आप कहानियां लिखना शुरु करते हैं तो क्यों सतह से खरोंचकर भीतर की परतों में झांकने का पागलपन आप पर सवार हो जाता है? ये एक लिखने वाला ही समझ सकता है कि अपने लिए लिखने की ज़िद और किसी दूसरे मकसद से (जैसे क्लायंट, फॉर्मैट या डेडलाइन) के लिए लिखे के बीच का संतुलन कैसे आपको पागल बना सकता है। ‘नीला स्कार्फ’ उसी संतुलन को बनाने-बचाने की ज़िद का नतीजा है।


‘नीला स्कार्फ’ एक कन्फेशन भी है – कि आप लिख रहे होंगे तो वो नहीं होंगे जो आप आम तौर पर हैं। आपके भीतर की कई दुनिया आपको दिन-रात परेशान किए रहेगी और ये परेशानी आपका दिमागी हालत पर गहरा असर कर सकती है। ‘नीला स्कार्फ’ ने एक और बात सिखाई है मुझे – जब आप नया रचने की कोशिश कर रहे होते हैं (चाहे वो कुछ भी हो, कितना ही अदना और साधारण क्यों न हो) तो इस दौरान कभी आप ग़लत समझे जाएंगे कभी आपकी समझ ग़लत होगी। ‘नीला स्कार्फ’ इसी अन्वेषण से पैदा हुआ प्रॉडक्ट है।


Monday, July 21, 2014

हृषीकेश सुलभ की कहानी 'हबि डार्लिंग'

हृषीकेश सुलभ अपने 60 वें साल में प्रवेश कर रहे हैं. बिहार की धरती के सम्भवतः सबसे मौलिक इस रचनाकार ने अपने नाटकों में लोक के रंग को जीवित किया तो कहानियों में व्यंग्य बोध के साथ वाचिकता की परंपरा को. समकालीन जीवन की विडंबनाएं जिस सहजता से उनकी कहानियों में आती हैं, जिस परिवेश, जिस जीवन से वे कहानियां उठाते हैं वह उनकी मौलिकता है. उनको पढ़ते हुए कथा सुनने का आनंद भी लिया जा सकता है. जानकी पुल अगले एक साल तक उनकी कुछ रचनाओं, उनके ऊपर लिखे गए आलेखों के माध्यम से इस आत्मीय लेखक की षष्ठी पदी मनायेगा. फिलहाल उनकी इस कहानी का आनंद लीजिये और उनके दीर्घायु होने की कामना कीजिए- मॉडरेटर.
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     उस रात एक आदिम गंध पसरी हुई थी। यह गंध उसके रन्ध्रों से होती हुई उसके मन-प्राण को हिलोर रही थी। वह भारहीन हो गई थी। फूल की पंखुड़ियों की तरह। आलाप से छिटक कर द्रुत में भटकती आवाज़ की तरह। .....रुई वाली हवा मिठाई के गोले की तरह या फिर......! उसके साथ पहली बार ऐसा हो रहा था। 
     वह पूरे घर में चक्कर काट रही थी। कभी सोने के कमरे में, ...कभी ड्राइंग रूम में, तो कभी बालकनी में। कभी बिस्तर पर, कभी सोफे पर, ...तो कभी डाइनिंग चेयर पर। उसकी देह और उसके मन में, ...उसके घर की दीवारों में, ...उन पर टँगी तस्वीरों में ...हर सामान में, ...यहाँ तक कि किचेन के डब्बों-बर्तनों में असंख्य आँखें उभर आई थीं और राह निहार रही थीं। बालकनी के गमलों में फूलों की जगह आँखें ही खिली हुई थीं। वह आ रहा है। बस पहुँचने ही वाला है वह । सच, ऐसा पहली बार हो रहा था। ऐसी आकुलता। ....ऐसी सिहरन। रोम रोम में झिरझिर हवा, ...रिमझिम फुहियाँ। वह पिछले कुछ महीनों से उससे मिलती रही है। व्हाट्स एप्प पर चैट कर रही है। फोन पर घन्टों बातें करती है। रेस्तराँ में साथ बैठकर कॉफ़ी पी है। खाना खाया है। पर पहली बार वह घर आ रहा था, उसके आमंत्रण पर। उससे मिलने आ रहा था। निभृत एकांत में उसके साथ होने की कल्पना के जादू में तैर रही थी वह।      
     उसके मोबाइल फोन पर ‘स्लो कॉफ़ी रिंगटोन बजा। और उसका नम्बर चमका और नाम, ...नाम नहीं। .....नाम की जगह दर्ज़ था - माय लव। उसने बेचैनी से पूछा – कहाँ हो?”
     लिफ्ट में। उधर से एक जादुई आवाज़ आई। ख़ुशबू से मह-मह करती ऐसी आवाज़, ...मानो  मख़मल में लिपटी इत्र की शीशी खुल गई हो। .......और वह दरवाज़े की ओर भागी।
     वह दरवाज़े पर था। दरवाज़ा खुला। वह भीतर आया। दोनों ने एक-दूसरे को बाँहों में कस लिया। वह भी द्रुत में भटकती आवाज़ की तरह ही गमक में भटक रहा था। अपने भीतर उमगती श्रुतियों के बीच उबचुभ हो रहा था। रात अभी शुरु ही हुई थी। .....पर रात का क्या ठिकाना, ...कब ख़त्म हो जाए!

     बमुश्किल बीस-पच्चीस मिनट गुज़रे होंगे कि मोबाइल फिर बजा। और उस पर हबि डार्लिंग चमका। वह कुछ चौंकी पर परेशान नहीं हुई। उधर से आवाज़ आई – कहाँ हो?”
     काँप गई उसकी देह। उसकी आँखें पल भर के लिए बन्द हुईं। हरहरा कर गिरते कदम्ब की छाया लहराई। उसने मुट्ठी में भींचा अपने मन को। 
आकर देख लो। उसके मन्द्र स्वर में चुनौती थी। ललकार।
     आकर तो देखूँगा ही। ......तुम बताओ, ...हो कहाँ?” धमकी और सवाल दोनों एक साथ। धमकी और सवाल के आवेग हबि डर्लिंग के स्वर में टकराए और उस तक पहुँचे। इस टकराव से फूट रहे स्फुलिंग की छुवन से गहरी पीड़ा उभरी उसके भीतर।
     आओ। ......इंतज़ार कर रही हूँ।
      दोनों एक झटके में द्रुत से वापस आलाप तक पहुँचे। अब वे षड़ज-स्वर में बातें कर रहे थे। काॅफी बनने तक वह सिगरेट फूँकता रहा। काॅफी आई तो उसे जल्दबाज़ी में गटका, हालाँकि जीभ जल रही थी। समय नहीं था। वापस निकलना था। जल्दी से जल्दी, ...हर हाल में। वह निकल गया। जाते हुए इतनी हड़बड़ी में था कि चूमना तक भूल गया। उसके तपते होठों की मरीचिका में लपटें लहराती रहीं।
     रूई वाली हवा मिठाई की तरह उसकी भारहीन देह, अब उसके उठाए नहीं उठ रही थी। आनन्द के अतिरेक से अभी भी सिहर रही थी उसकी देह। उसके जाने के बाद बेमन पाँव घसीटते हुए दरवाज़े तक गई। ......उसे बन्द किया। ....फिर वापस आकर पलंग पर कटे हुए कदम्ब वृक्ष की तरह धम्म से गिर गई।

     वह आँखें मूँद कर उस कदम्ब को याद कर रही थी। दृश्य गडमगड्ड हो रहे थे। कदम्ब के छोटे से बिरवे का आना। दो आँगन थे। एक भीतर, ...औरतों के लिए। और दूसरा बाहर, ...सामने से खुला और तीन ओर से घिरा। एक ओर बैठका और बरामदा। दूसरी ओर बरामदा और अन्न के भरे हुए कोठार। और सामने के खुले भाग के विपरीत तीसरा भीतर वाले आँगन में प्रवेश के लिए बने दोमुँहे से जुड़ा। इसी बाहर वाले आँगन में रोपा गया कदम्ब का बिरवा। वह सात साल की थी। अम्मा ने एक पायल ख़रीद कर पहना दी थी। छुनछुन करती फिरती थी इस आँगन से उस आँगन। कदम्ब बड़ा होता रहा। वह भी। दस साल में वह युवा, बलिष्ठ, ऊँचा और छतनार हुआ। वह भी ऊँची हुई, ...रंग, नैन-नक्श, छातियाँ, नितम्ब - सब सजे-सँवरे। कदम्ब फूलते। फल बनते। पकते और आँगन की धरती पर गिरते।
     वह शहर में रहने लगी थी। हाॅस्टल में रह कर पढ़ रही थी। पिता और भाई दो-चार दिनों में एक बार आते। कुशल-क्षेम पूछते। ज़रूरतें जानते। हिदायतें देते। उसे यह पता नहीं चल सका था कि जासूसी भी करते थे। और एक दिन भाई ने हास्टल के वेटिंग रूम में उसके कमर तक लहराते केशों को मुट्ठी में भर लिया और घसीट-घसीट कर उसकी सहेलियों और वार्डन के सामने पीटा। वह उस समय रजस्वला थी। रात तक उसे साथ लेकर भाई वापस घर आया। उसकी अम्मा ने पीने के लिए दूध में हल्दी घोलकर दिया। अम्मा को उसके रजस्वला होने की बात मालूम हुई, उन्होंने चैन की साँस ली। पिता को भीतर वाले आँगन में बुलाकर बात की। बताया कि चिंता की कोई बात नहीं। सब ठीक-ठाक है। ईश्वर ने लाज बचा ली।
     भाई दरवाज़े पर नाग की तरह कुंडली मारे बैठ कर फुँफकारता रहता। एक दिन भाई नहीं था। कहीं आसपास ही गया था। वह दोमुँहा पार कर बाहर वाले आँगन में खड़ी थी। कदम्ब को निहार रही थी। उसकी छतनार डालों, ...गझिन पत्तियों, ...और लट्टुओं की तरह खिले फूलों को देख रही थी। ...वह कदम्ब की आड़ में थोड़ी दूर पर हिलती-डुलती उस छाया को अपनी आँखों से टेर रही थी कि भाई आ गया। वह कदम्ब और कदम्ब के उस पार डोलती छाया में इस कदर खोई हुई थी कि भाई को आते हुए देख नहीं सकी। आते ही वह फुँफकारते हुए फन निकाल कर झपटा। वह सरपट भागी भीतर वाले आँगन में। वह चीख़ रहा था – मना किया था न तुझे कि दोमुँहे से आगे पैर नहीं बढ़ाना। किसे निहार रही थी एक टक? तुझे जो-जो अच्छा लगता है, सब मटियामेट कर दूँगा। तुझे कदम के नीचे राधा बन कर खड़ा रहने का शौक चढ़ा है? मैं इसे जड़ से.......
     उसी दोपहर, ...भाई ने अपने हाथों कदम्ब को काट डाला। युवा कदम्ब हरहराते हुए गिरा धरती पर।
   
     उसने संयत किया ख़ुद को। उठी। शिफौन की झीनी साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज़, ब्रा - सब खोलकर वार्डरोब में ठूँसा। नंगी देह चलती हुई वाश-बेसिन तक आई। चेहरा धोकर गाउन पहना और बिस्तर पर लेट कर बेमन टीवी आॅन कर दिया। कोई इमोशनल दृश्य चल रहा था। नायक और नायिका गले मिल कर रो रहे थे। उसने साउन्ड म्युट किया और करवट फेर कर कमरे की दीवारों को घूरने लगी।
      दीवारों को घूरती उसकी आँखों में फिर कदम्ब उभरा। कट कर धरती पर गिरा हुआ कदम्ब। क्षत-विक्षत डालें, ...बिखरी हुई पत्तियाँ और कच्चे फल। जवान पेड़ के कटने के अपशकुन से भयभीत अम्मा का छाती पीट-पीट कर रोना-चिल्लाना। अम्मा के रुदन में घुल रही थी हरहरा कर गिरते कदम्ब की आवाज़। फिर औरतों का गीत-नाद, ...हल्दी, ...बारात, ...बैन्ड-बाजा, ...परिछावन, ...मँड़वा, ...विवाह की वेदी, ...भाँवर, ...सप्तपदी, ....माथढँकाई, ...विदाई। अनगिनत दृश्य, ...अनगिनत आवाज़ें, ....असंख्य लोगबाग। और विदा से पहले भाई की जलती हुई आँखें और लहकते हुए शब्द और क्रोध के दाब में फुसफुसाती आवाज़। अगर कुछ भी सुने तो गोली मार कर मिटा देंगे अपने पूरे कुल को.....। दीयरी जलाने पुरखों के डीह पर आना पड़ेगा तुमको। सुन रही हो न बुचिया?”
     फिर उसी शहर में बसेरा, जहाँ पढ़ाई वाला बस्ता छूट गया था। एक क्षीण-सी आशा कि शायद मिल जाए बस्ता। पुश्तैनी खेत का एक बड़ा टुकड़ा बेच कर पिता उसे विदा कर सके थे। हालाँकि सस्ते ही जान छूटी थी उनकी। कुल सम्पत्ति का दसवाँ हिस्सा भी नहीं गँवाना पड़ा। निठल्ला भाई भीतर ही भीतर प्रसन्न था कि कम में ही समय पर निबट गया यह संकट। वह जिस घर में पहुँची थी वहाँ असंतोष था कि ठग लिया उसके बाप-भाई ने। जो तय था उसमें भी घालमेल किया गया। ऐसे ही लोगों की बेटी-बहनें फूँक-ताप दी जाती हैं। .......सास और ननदों ने पारम्परिक व्यंग्य वाणों, श्वसुर ने मौन और अपने साथ हुई ठगी से बौखलाए पति ने बदले की हिंसक योजनाओं के साथ उसका स्वागत किया। पहली रात जब वह अपने निचले होठ को दातों से भींचकर सब कुछ सह गई, संदेह का शिकार बनी। जैसे हास्टल के वेटिंग रूम में भाई ने अपनी मुट्ठी में उसके केशों को भरकर खींचा था, लगभग वैसे ही, पहली ही रात उसके केशों को खींचते हुए हबि डार्लिंग ने कई सवाल दागे थे। उसकी चुप्पी से चिढ़कर कहा था – कितने दिन चुप रहोगी.....? आज नहीं तो कल पता चल ही जायेगा। .....ज़रूर खेली-खाई हुई हो तुम .....तभी तो ! पहली रात में लड़कियाँ रो-रो कर जान दे देती हैं और तुम मज़े ले रही थी। ....सच बोलो। अगर ना है, ... कभी कुछ नहीं किया, तो ना ही बोल दो। मैं भरोसा कर लूँगा।
     उसने न ना कहा, न हाँ। और रोई भी नहीं। तय कर लिया था कि न तो कोई सफाई देगी और न रोएगी। अब इन हालातों में कहाँ और कैसे ढूँढ़ती अपना छूटा हुआ बस्ता। इंटर की परीक्षा होने वाली थी। वह दुबला-पतला लड़का उसकी तैयारियों में मदद कर रहा था। अपने नोट्स दे जाता और फिर दो-चार दिनों के भीतर आकर ले जाता। अच्छा दोस्त बन गया था, पर कभी उसने उँगली तक से नहीं छुआ। पता नहीं भाई ने क्या देखा! .....किसी से क्या सुना!

     हबि डार्लिंग की नौकरी शादी के तीन-चार महीनों बाद बैंक में लगी। कलेजा कट गया। मन मसोस कर रह गए हबि डार्लिंग। अपने पिता पर बरसे। इन तीन-चार महीनों में क्या बिगड़ रहा था कि बेटा ब्याहने की ऐसी जल्दबाज़ी थी? बड़ा घाटा हुआ। इस बैंक की नौकरी के बाद विवाह होता तो लड़की भी और पढ़ी-लिखी मिलती और कम से कम पाँच लाख का फ़र्क़ तो पड़ता ही। थोड़ी होशियारी बरतते पिता तो यह फ़र्क़ दस लाख तक का हो सकता था। चिरकुटों के घर की बेटी उठा लाए। न पूरा माल-असबाब मिला और न......। औरत भी प्योर नहीं लगती। ज़रूर पहले किसी के साथ....! यह तो बाद में पता चला कि इसके उत्पात के चलते हॉस्टल वालों ने इसे निकाल दिया था। भाई आकर हॉस्टल से ले गया था। सुना है, कसकर कूटा भी था और इसी चलते इंटर का इम्तेहान नहीं दे सकी। गाँव पर घर में ही नज़रबन्द करना पड़ा था इसे। सब भेद पता चला, पर शादी के बाद। संदेह तो शादी के बाद की पहली रात ही हो गया था, पर....। हबि डार्लिंग ने पिता को कोसा। पिता ने अपनी पत्नी को कोसा। और पत्नी यानी, हबि डार्लिंग की माता ने कोसा भाग्य को।
     उन्नीस की उम्र में पहला गर्भ और बेटी का जन्म। नइहर ससुराल, दोनों जगह कुहराम। फिर दूसरी बेटी का जन्म। शोक ही शोक और प्रताड़ना। तीन साल में दो बेटियों का जन्म और लिंग-परीक्षण के कारण दो गर्भपात। ख़ुद दो बेटियों को जन्म देने वाली सासु माँ दूसरी पोती के जन्म का आघात नहीं सह सकीं और लकवा मार गया। व्याही हुई दो बड़ी ननदों ने पक्षाघात का लांछन उसके ऊपर थोप कर अपनी माँ की सेवा-टहल से अपने को बरी कर लिया। लिथड़ती हुई सासु माँ गईं। इस बीच अपनी ममेरी बहन की शादी में वह दूसरे शहर गई। हबि डार्लिंग नहीं गए थे। वहीं, अपनी एक बहन की मदद से उसने कॉपर-टी लगवा लिया। किसी को कानों कान ख़बर तक न हुई। बस्ता छोड़कर अपने घर लौटने के बाद पहली बार, ...एक लम्बे अरसे के बाद पहली बार वह प्रसन्न हुई। बैंक के खातों और डिपार्टमेंटल प्रोमोशन के लिए बैंकिंग प्रणाली के ज्ञान अर्जन में उलझे हबि डार्लिंग को उसने ठेंगा दिखा दिया।
     इस बीच श्वसुर गुज़रे। उसे अफ़सोस हुआ। ननदें यदाकदा छापामारों की तरह आतीं और बैंक बाबू से कुछ लूट-खसोट कर चली जातीं। जाते-जाते पलीतों में आग लगा जातीं और हबि डार्लिंग पटाखों की तरह कुछ दिनों तक फटते रहते। समय सरकता रहा और उसने बेटियों को पालते-पोसते हुए इंटर, बीए और उसके बाद उद्यमिता का एक शॉर्ट कोर्स किया। अपना शहर छूट गया था। मकान किराए पर लग गया। हबि डार्लिंग बैंक बाबू से बैंक अधिकारी हो गए थे। बेटियाँ सयानी होकर पुणे और हैदराबाद में पढ़ रही थीं। मुम्बई की पोस्टिंग के बाद इत्मिनान आ  गया था। उद्यमिता का शॉर्ट कोर्स काम आया। उसने अपना छोटा-सा व्यवसाय भी शुरु कर दिया था। दस से ज़्यादा औरतें उसके साथ रोज़गार पर लगी थीं। ज्वालामुखी के दहाने पर बसी गृहस्थी को ज़िन्दगी के गर्भ में उबलते खनिजों का उर्वरक मिला और वह जीवित रही।

     कालबेल की आवाज़ आई। उसने दरवाज़ा खोला। हबि डार्लिंग सामने थे। आसमानी रंग का छोटा ट्राली बैग साथ लिये। वे अपनी निर्धारित यात्रा एक दिन पहले ही समाप्त कर लौट आए थे। यह कोई नई बात नहीं थी। वह अक्सर ऐसा करते और ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा  उसे रँगे हाथ पकड़ने की थी।
     खाना खाओगे या.....?”
     या?
     या खाकर आए हो?”
तुमने बनाया है क्या खाना? ...मैं तो आज आने वाला नहीं था, ...तो बनाया किसके लिए था?”
     उसके जी में आया कि कह दे अपने यार के लिए बनाया है। उसे वह चीनी लोककथा याद आई, जिसमें एक औरत के दरवाज़े पर एक यात्री पहुँचता है और साँकल खटखटाता है। औरत निकलती है। वह यात्री उससे पानी माँगता है। पीठ पर भोजपत्रों के भारी बंडलों का बोझ लादे,  ...थका-हारा। वह बहुत प्यासा है। औरत उसे पानी देती है। भोजन के लिए पूछती है। पहले वह सकुचाता है, पर भूखा होने की बात स्वीकारता है। औरत उसे घर के अंदर बैठाती है और भोजन देती है। वह जब जाने को तैयार होता है तो वह उस बोझ के बारे में पूछती है, जिसे वह अपनी पीठ पर ढो रहा है। यात्री बताता है कि वह एक शोधकर्ता है और औरतों के चरित्र के बारे में शोध कर रहा है। अब उसका शोध पूरा हो चुका है और वह वापस अपने नगर जा रहा है। इन बंडलों में औरतों के बारे में जानकारियाँ दर्ज़ हैं। इस बीच उस औरत का पति दरवाज़े की साँकल खटखटाता है। औरत उससे कहती है कि उसका पति बहुत क्रोधी और शक्की है। वह दोनों को मार डालेगा। औरत यात्री को भोजपत्र के बंडलों सहित सामने रखे एक संदूक में छिपा देती है। दरवाज़ा खोलती है। पति दरवाज़ा खुलने में हुई देर के चलते गालियाँ देता है और खाना माँगता है। वह खाना परोसती है। पति सन्दूक पर बैठकर खाने लगता है। वह औरत सन्दूक पर बैठने से मना करती है। पति गालियाँ देते हुए पूछता है कि वह क्यों न बैठे? ...क्या उसने सन्दूक में अपने यार को छिपा रखा है? औरत मुस्कुराती है। उसका पति उसी सन्दूक पर बैठ कर खाता है। वह और खाना माँगता है। औरत कहती है कि खाना ख़त्म हो गया। वह चीख़ता है, हरामजादी, यार को खिला दिया क्या? औरत ठठा कर हँसती है और कहती है, हाँ मेरे राजा, अपने यार को खिला दिया। उसका पति गालियाँ देते हुए बाहर चला जाता है। वह यात्री को सन्दूक से बाहर निकालती है। यात्री हत्प्रभ! औरत ने उसके पूरा हो चुके शोध को अधूरा साबित कर दिया है। वह उसका आभार मानते हुए चला जाता है। ...... वह मुस्कुराई। बोली – यार बिना खाए चला गया। उसका हिस्सा बचा है। खाओगे तो गरम कर दूँ।
     हबि डार्लिंग की भृकुटि तन गई। बहुत लम्बी होती जा रही है तुम्हारी ज़ुबान। साली, किसी दिन ऐसे कूटूँगा कि ज़ुबान भीतर चली जाएगी और बच्चेदानी बाहर आ जाएगी।
तुम बार-बार भूल जाते हो। बच्चेदानी तो कैंसर के डर से तुम्हीं ने निकलवा दिया था। दूसरे अबार्सन के बाद, ...छोटी गोद में थी और मैं काॅपर-टी लगवा कर आई थी। तभी जाने क्यों ख़ून आने लगा था और तुम डर गए थे कि कैंसर हुआ तो बहुत पैसे ख़र्च करने होंगे। .......और बेटियाँ छोटी-छोटी थीं, सो मेरा मरना तुम अफोर्ड ही नहीं कर सकते थे, ...वर्ना निकलवाते ही नहीं तुम। वह हँसी, चीनी लोककथा वाली उस औरत की तरह।
     मारे क्रोध के हबि डार्लिंग दाँत किटकिटा रहे थे। वह फ्रि़ज़ के पास खड़ी उन्हें लहूलुहान होते देख रही थी। कुछ देर चुप रही। थोड़ा सम्भलने दिया उन्हें। अब इस खेल में उसे मज़ा आता था। अब वह अपमान, दुःख, भय और पछतावे से मुक्त हो चुकी थी। उसने कहा – चिकेन गरम कर देती हूँ, तब तक तुम कपड़े बदल लो। फिर गरम-गरम रोटियाँ सेंक दूँगी। ......दो दिनों से बाहर का खाना खाते-खाते जी ऊब चुका होगा। है न?”
     यह है न मारक था। सीधे सीने में जाकर लगा। बोले हबि डार्लिंग – नहाऊँगा पहले। .....ये साली मुम्बई की धूल.......उमस.....पसीना.....चिपचिप......।
     मैं तो नहीं नहाऊँगी आज। अपनी देह की इस गंध के साथ ही सोऊँगी।उसकी आवाज़ मद्धिम थी और उसमें संगीत की लयकारी थी।
     किसकी गंध?”
परफ़्युम की। उसने बात बदल दी।
कहाँ गई थी परफ़्युम लगा कर?”
     यार से मिलने। तुम्हारी तरह बदबू करते हुए नहीं जाती मैं अपने चाहनेवालों के पास। फिर एक तीखी मुस्कान थी उसके साथ।
     लात खाओगी आज तुम।
     आओ। झुक कर फ्रि़ज़ से चिकेन निकालते हुए मुड़ कर देखा उसने। हबि डार्लिंग जा चुके थे, ...कपड़े बदलने.....नहाने।

     बेटियाँ जल्दी ही समझदार हो जाती हैं। चाहे कितनी भी धूल-धक्कड़ हो या कितना भी घना हो कुहासा, छिपकर काँपते सच तक उनकी आँखें पहुँच ही जाती हैं। देखने और सूँघने की कला में माहिर होती हैं बेटियाँ। पीठ पीछे चिपकी आँखें भी देख लेती हैं वे और होनी-अनहोनी की उस हर गंध को भी सूँघ लेती हैं जो घात करने के इंतज़ार में ठिठकी या छिपी होती है। समझदार होती बेटियों के सामने अच्छे और ताक़तवर पिता की छवि बनाए रखने की लालसा ने हबि डार्लिंग को कुछ दिनों के लिए विवश ज़रूर किया था, पर भीतर ही भीतर गाँठें बढ़ती जा रही थीं। और वह इस शहर को जागते-सोते, ...दौड़ते-भागते, ...घिसटते-लिथड़ते, ...रोते-हँसते, ....गाते-विलाप करते हुए देखकर अपनी आत्मा की गाँठ का रेशा-रेशा खोल रही थी। शहर सिखाए कोतवाली, सो मुम्बई ने उसे हिम्मत और हिकमतें दोनों दी। उसने हबि डार्लिंग को पटा कर पहले अपना व्यवसाय शुरु किया। हबि डार्लिंग इतने भोले भी नहीं थे कि पट जाते। उन्होंने सोचा, उद्योंगों के लिए करोड़ों का कर्ज़ स्वीकृत करने के एवज में होने वाली कमीशन की काली कमाई को सफ़ेद करने के लिए पत्नी का व्यवसाय ढाल की तरह काम आयेगा, सो उन्होंने सहजता से सब स्वीकार किया था। कमर तक लटके केशों को सबसे पहले कटवाया था उसने और उन्हें इतना छोटा करवा लिया था कि वे किसी मुट्ठी की ज़द में न आ सकें। उसने अपने हबि डार्लिंग को आप कहना छोड़ कर तुम पुकारना शुरु किया। सम्बोधन के इस बदलाव ने पलक झपकते बहुत कुछ बदल दिया था उसके भीतर। उसने अपनी कमाई से कुछ शिफौन की साड़ियों की ख़रीददारी की। डीपकट, स्लीवलेस, बैकलेस ब्लाउज़ बनवाया। फ़्लोरल प्रिंट के कुछ ब्रा और पैंटीज़ भी लिया। बेटियों के साथ जाकर  कुछ जींस की पतलूनें और स्कर्ट्स  के साथ नए डिज़ाइन की जूतियाँ ली। माँ के इस कायांतरण से बेटियाँ आह्लादित थीं। पहले बड़ी बेटी पढ़ने पुणे गई। इसके अगले साल छोटी गई हैदराबाद। मुम्बई में अपनी माँ को अपने पिता के हवाले छोड़कर बेटियाँ चिन्तित थीं। छोटी के चले जाने के बाद तो बड़ी बेटी शुरु में काफी परेशान रही थी। बार-बार पुणे से भाग कर आती। पिता की फटकार सुनती। जब तक छोटी मुम्बई में थी, उसे भरोसा था कि पिता उसकी उपस्थिति का लोक-लाज रखेंगे, पर उसके जाते ही वह बेचैन रहने लगी थी। उसने बहुत धीरज के साथ बेटियों को भरोसा दिलाया था कि वह सुरक्षित है। हबि डार्लिंग ने भी सोचा था कि दोनों के जाने के बाद, ...पर इस बीच उसने अपने को अपने भीतर जनमा ही नहीं लिया था बल्कि, पाल-पोस कर बड़ा भी कर लिया था।
     हबि डार्लिंग स्नानघर से तरोताज़ा होकर निकले। स्लिपिंग सूट पहना। ज़ुल्फ़ों में कंघी फिरा कर कई कोणों से अपने को देखा। डाइनिंग टेबल पर आकर बैठे। उसने खाना टेबल पर लगा दिया था। आठ-दस की जगह अब तीन  रोटियाँ ही खाते हैं हबि डार्लिंग। भाप से भरी आख़िरी रोटी प्लेट में डाल कर वह बेडरूम में चली गई। जाते-जाते कहती गई – जूठे बर्तन सिंक में डाल देना।
     वह बिस्तर पर थी। लस्त-पस्त। अक्सर ऐसा होता कि वह ध्वंस करती और हरहरा कर गिरते मलबे में ख़ुद ही दब जाती। सारा गर्दो गुबार उसकी आत्मा में भर जाता। ध्वंस की आवाजें बहुत देर तक अपनी बोझिल प्रतिध्वनियों के साथ उसके भीतर भाँवर काटती रहतीं। उसके हृदय की धमनियों का रक्त-प्रवाह इतना तेज़ हो जाता कि वे फटने-फटने को हो आतीं।
    दम साधे क्यों पड़ी हो?” अपने चिर-परिचित सवाल के साथ हबि डार्लिंग ने शयन-कक्ष में प्रवेश किया।
     उसने आँखें खोल कर निमिष भर को देखा और फिर आँखें बन्द कर ली। वह बचना चाहती थी। वह अभी हर तरह की अयाचित स्थितियों से पीछा छुड़ाना चाहती थी। आँखें बन्द किए हुए धीरे से उसने कहा – सो जाओ। ......थके होगे।
मैं नहीं थका हूँ। तुम्हारे पास मुझे थका देने का हुनर ही नहीं है। यह शिकायत नहीं दर्प था।
     वह चाहती थी थोड़ी देर पहले अपने रन्ध्रों में उमगते उस गंध की वापसी। .......वह चाहती थी गमक से आलाप में वापसी के बाद के षड़ज-स्वर की अपनी षिराओं में गूँज। ......वह चाहती थी आनन्द के उस हिंडोले से उतरने के बाद की विश्रांति का स्वप्निल सुख। .....वह चाहती थी उन सारे सुखों की वापसी, जिन्हें वह उसे सौंप गया था। वह आँखें बन्द कर अँधेरे में उस प्रकाश-वलय को खोज रही थी जिसकी दीप्ति में वह कुछ देर पहले तक डूबी हुई थी। पर क्या यह सम्भव था? वह अँधेरे में हाथ-पाँव मार रही थी कि कोई सिरा पकड़ में आ जाए कि यह आज की रात कटे, पर उसके हबि डार्लिंग उसके सौंपे सारे सुखों को चाट गए थे। उसके लिए सब कुछ अछोर था और वह बिस्तर पर बगल में अपने हबि डार्लिंग के होते हुए भी अकेली थी। कुछ ही घन्टे बीते थे कि वह उसके साथ था। उसका सुख उसके साथ था। .......कि वह एक जीवित लोक में भरा-पूरा जीवन जी रही थी। पर अब सब बदल चुका था। वह गया। यह अंदेशा उसे जल्दी लेकर चला गया कि कोई आ रहा है। उसके जाते ही पौधों पर बे-आवाज़ रेंगते हुए पत्तों-फुनगियों को चाट जाने वाले कीड़े की तरह हबि डार्लिंग आए और चाट गए सारा सुख। उसे अपने दुःखों, ...अपनी पीड़ा, ...अपने अकेलेपन के लिए इत्मिनान नहीं था। होता तो वह इसमें ही अपना सुख तलाश लेती। उसे ऐसे पलों में यही लगता कि मानो वह ख़ुद अपने को चबा रही है। ......कि उसके जीवन का सारा  सत्त चूस गए हबि डार्लिंग और वह अपनी ठठरी चबा रही है।
     अपनी अम्मा की मृत्यु से ठीक पहले वह अंतिम बार नइहर गई थी। बिछावन पर संज्ञा-शून्य पड़ी थीं अम्मा की असमय बूढ़ी हुई देह । अपनी लकवा ग्रस्त उस देह की ठठरी चबा रही थी अम्मा, जिसका सत्त जब तक जीते रहे, पिता चूसते रहे। अपने चेहरे पर भिनभिनाती मक्खियों को उड़ाने की ताक़त भी नहीं थी अम्मा के उन हाथों में, जिन हाथों से वे उसके केश सँवारा करती थीं। अम्मा टुकुर-टुकुर उसे निहारती रही थीं। भाई और भावज को अपने राजकाज से फु़र्सत नहीं थी। अम्मा को एक फालतू सामान की तरह घर के पिछवाड़े वाले बरामदे में फेंक दिया गया था। उसकी बेटियाँ साथ थीं। बड़ी होने के बाद पहली बार वे अपनी नानी को देख रही थीं और वह भी मृत्यु-शय्या पर। मरणासन्न। वह चाहती थी रुकना, पर हबि डार्लिंग ने कुछ घन्टों की मोहलत दी थी। वह चाहती थी अपनी अम्मा को साथ ले जाना, पर हबि डार्लिंग पहले ही चेतावनी जारी कर चुके थे। भाई जाने भी नहीं देता क्योंकि उसके भीतर यह डर कुंडली मारे बैठा था कि कहीं अगर किसी कागज़ पर अम्मा  के अँगूठे का निशान ले लिया किसी ने तो......! वह अम्मा की मृत्यु के लिए प्रार्थना करती हुई लौटी। लज्जित। .......पराजित। पराजित होकर तो वह पहली ही बार अपने नइहर से विदा हुई थी। वह लौटते हुए अपनी बेटियों से आँखें चुराती रही थी। अपनी अम्मा को असहाय छोड़कर लौटते हुए उसके पास अपनी बेटियों की आँखों में अपने लिए आश्रय तलाशने का साहस नहीं बचा था।
     जब-जब उसने अपने लिए साहस सँजोना चाहा बरसात में भींगी गाय की तरह थरथरा कर रह गई। जब-जब कसाई के ठीहे पर ज़िबह के लिए चढ़ी उसकी आँखों में भय और करुणा की काली छाया लरज़ती रही। पहली बार जब भाई ने हाॅस्टल के बेटिंग रुम में उसे उसकी सहेलियों के सामने पीटा, ...कदम्ब के उस पार खड़ी उस साँवले लड़के की छाया निहारती हुई जब उसे भाई ने पकड़ा और कदम्ब को ही काट डाला, तब भी वह काँपती रही केवल। .....उसके कानों में भावज का गाया यह गीत गूँजता रहा कि आवहू ननदोइया....पलंग चढ़ी बइठहू.....कचरहू मगही पान/अपना रंगीलिया के डंड़िया फनावहू....ले जाउ बैरन हमार और एक दिन भाई बारात बुला लाया। हबि डार्लिंग आए और वह मिमियाती हुई चली आई उनके साथ। नित नए बहाने, ...कभी बोल और व्यवहार से आत्मा छिलती तो कभी हबि डार्लिंग के लात-जूतों से देह छिलती, पर वह हँकर-डँकर कर रो भी नहीं पाती।
     हबि डार्लिंग की हथेलियाँ उसकी देह टटोल रही थीं। वह दोनों टाँगें और बाहें छितराए चित पड़ी थी। उसकी देह की तमाम कोशिकाएँ हबि डार्लिंग के छूते ही रेत कणों में तब्दील हो गई थीं। जलविहीन, ...सूखी हुई, ...रेत भरी नदी की तरह बिछी रही वह। तेज़ आँधी की तरह बहते रहे हबि डार्लिंग और उड़ते रहे रेत के बगूले। वह चाहती थी कि इतनी रेत उड़े कि हबि डार्लिंग का मुँह, ...नाक, ...कान ही नहीं....फेफड़ा तक भर जाए रेत से। हूँफते हुए अलग हुए हबि डार्लिंग। एक भद्दी-सी गाली उछाल कर वाशरुम में घुस गए। वह वैसे ही पड़ी रही अपने अंग-अंग में रेत के ढूह लिये। हबि डार्लिंग वाशरुम से बाहर निकले और बालकनी में जाकर सिगरेट फूँकने लगे।
     वह सोच रही थी रात और दिन में इतना फ़र्क़ क्यों होता है। दिन में दुनिया के झमेले, पर दिन न बढ़ते हैं, न सिकुड़ते हैं। ...और रातें कभी पलक झपकते बीत जाती हैं, ...दूब की नोक पर टिकी ओस की तरह भाप बन कर उड़ जाती हैं और कभी सुरसा के मुँह की तरह ऐसे फैल जाती हैं कि सब कुछ समा जाता है उनमें। .......और उस रात, ...जब गरजते हुए हबि डार्लिंग ने कहा था – ...हाँ, अय्याषी करने गया था मैं। ......और अक्सर जाता हूँ। कभी लोनावाला, तो कभी खंडाला, ...और कभी पुणे। तुझ जैसी लाश के साथ सो-सो कर उकता चुका हूँ मैं। .......तू तो इस लायक़ भी नहीं कि कहीं जाकर अय्याशी कर सके। कुतिया साली,  बस टाँगे छितराकर पड़ जाना जानती है। ........ पर मैं तुझे छोड़नेवाला भी नहीं। मैं भी तुझे कुत्ते की तरह नोचता-खसोटता रहूँगा। चैन से नहीं जीने दूँगा तुझे।.........
     उस रात का बलात्कार, पिछले सारे बलात्कारों पर भारी था। पर उसी रात पहली बार साहस का बीज अँखुआया था उसके सीने में। उस रात वह रोई नहीं। ......और उसके बाद कभी नहीं रोई। रातें बदलती रहीं दिन में और दिन बदलते रहे रातों में। साँझ और सुबह आती-जाती रहीं। हँसना और रोना, दोनों क्रियाओं का उसके जीवन से लोप हो चुका था। बेटियाँ आतीं, तो पता चलता कि सुबह हुई या साँझ आई। वह बेटियों के सुकून और आश्वस्ति के लिए मुस्कुराती। बेटियाँ लौटतीं और वह उनके फिर आने की आस की डोर थामे डोलती फिरती दिन और रात के बीच, ...सुबह और साँझ के बीच।
     ऐसी ही एक साँझ मिला था वह। उसके लिए मुम्बई के जनसमुद्र में एक हरे-भरे द्वीप की तरह उभर आया था वह। उसे देखते ही जाने क्यों पल भर के लिए उसकी आँखों में कई दृश्य भर गए थे। उस दुबले-पतले साँवले लड़के की छवि कौंध गई थी। हाॅस्टल के गेट पर हाथ में नोट्स की कापियाँ लिये खड़ा दिखा था वह। ......उसके घर के सामने कदम्ब की ओट में थोड़ी दूर खड़ा बेचैन आँखों से उसे ढूँढ़ता हुआ दिखा था वह। ......यह उसका मतिभ्रम था, पर वह इसमें खोई रही थी कुछ पलों तक।....... छोटी हैदराबाद से आई थी। वह छोटी के साथ एक बुक-शॉप में थी। वहीं मिला था वह पहली बार। क़िताबों की रैक से अपने लिए क़िताबें चुन रहा था कि.......। वह उसे लगातार निहार रही थी। पहले तो झिझका वह। फिर मुस्कुराया। दुबला-पतला, ...मँझोला कद, ...उमगती हुई बड़ी-बड़ी आँखें, ...करीने से सँवारी हुई जुल्फें और चेहरे पर काली-सफ़ेद बेतरतीब घनी दाढ़ी। छोटी क़िताबों के रैक में उलझी थी और वह उसके जादू में। वह पास आया। उसने हैलो किया। वह लरज़ उठी।
     कौन सी क़िताब ढूँढ़ रही हैं आप?” हौले से पूछा था उसने।
     उसके जी में आया कह दे कि तुम्हें ही ढूँढ़ रही थी। .......कहाँ गुम हो गये थे?”, पर वह चुप रही।
     मैं आपकी मदद करूँ......क़िताब ढूँढ़ने में?”
“...बेटी के साथ हूँ। वो अपने लिए क़िताबें ले रही है.....वहाँ......वो सामने वाली रैक के पास...... बड़ी मुश्किलों से वह कह सकी।
      कल मिलते हैं।....यहीं......इसी समय। ....आपके लिए क़िताबें ढूँढ़ कर रखूँगा। मैं तकरीबन रोज़ ही आता हूँ यहाँ। उसका स्वर संयत था और दृढ़ भी।
     लरज़ रही थी वह। पता नहीं, यह भय था या रोमांच! डसके होंठ काँपे नहीं....। कल नहीं।
     परसों। ....मैंने कहा न कि तकरीबन रोज़ ही आता हूँ यहाँ।  संडे छोड़ कर।
     हूँउसने हुँकारी भरी। कंठ में फँसी इस हुँकारी को छाती में उमड़ती.... बेक़ाबू होती धड़कन ने बाहर धकेल दिया था।
     “थैंक्स!” कहते हुए वह आगे निकल गया। वह उसे निहारती रही। उसने पीछे मुड़कर देखा। मुस्कुराया। और एक रैक में लगी किताबों की ओट से उसे निहारता रहा। छोटी उसके पास आ चुकी थी।
     दूसरे दिन छोटी हैदराबाद गई। तीसरे दिन उसने आने के लिए हुँकारी भरी थी, पर गई नहीं। चौथे दिन सन्डे था। पाँचवे दिन वह अपने को रोक नहीं सकी थी। सोचा था कि बस एक मिनट के लिए उस बुक शॉप में जाएगी। अगर वह नहीं रहा, तो इंतज़ार नहीं करेगी। वापस लौट आएगी। ......और अगर मिल गया तो!
...वह गई। वह था। बुक-शॉप के दरवाज़े के पास वाली क़िताबों की रैक में अनमना-सा कुछ ढूँढ़ता हुआ। बार-बार अपनी आँखों से किसी के आने की आहट को टेरता हुआ।
     वे दोनों बुक-शॉप से बाहर निकले। एक कैफे में गए। उसी दिन उसने अपने फोन में उसका नम्बर दर्ज़ किया और नाम की जगह लिखा – माय लव। इसके बाद वह लगातार अपने माय लव से मिलती रही। कभी कैफे में, ...कभी रेस्तराँ में, ...कभी समुद्र तट पर। वह टहलती रही उसकी बाहों में बाहें डाल कर। कभी साथ खाना खाया .....और कभी थिएटर में साथ फ़िल्म देखा। ........वह सालों पहले उत्तरप्रदेश के एक क़स्बे से मुम्बई आया था। फ़िल्मों के जादू ने उसे इस मायानगरी तक खींच लिया था। वह ख़ूब पढ़ता था। कविताएँ लिखता था। नाटक करता था। वह सेल्युलाइड पर कविताएँ लिखना चाहता था, सो अपना क़स्बा छोड़कर मुम्बई आ गया। वह अब तक तीन अच्छी, पर असफल फ़िल्में बना चुका था। इस बीच बमुश्किल वह अपने लिए एक कमरे का फ्लैट अर्जित कर पाया था।
     माय लव ने उसकी ज़िन्दगी बदल दी थी। वह सपने देखने लगी थी। वह कल्पनाओं के पंख लगाकर निभृत आकाश में उड़ान भरने लगी थी। माय लव को याद करते ही उसकी देह हिंडोले भरने लगती। आज पहली बार वह उसके घर आया था, ...उसके बुलावे पर। अकूत धैर्य था उसके पास। यह धैर्य उसने अपनी असफलताओं से अर्जित किया था।
     ...आज माय लव का यूँ लौट जाना उसे वेध गया था। अचानक उस युवा कदम्ब के कट कर गिरने से उपजी पीड़ा की तरह यह पीड़ा भी असह्य हो चली थी उसके लिए।... सिगरेट फूँक कर बिस्तर पर वापस आ चुके थे हबि डार्लिंग और खर्राटे भर रहे थे। .......और वह कमरे की नीम रोशनी में उभरते माय लव के चेहरे को निहार रही थी। उसकी साँसें उसके भीतर नई इबारतें लिख रही थीं....... कि वह अब हबि डार्लिंग के ख़ौफ़ से अपने माय लव को विदा नहीं करेगी। बेटियों के ख़ुदमुख़्तार होने में कुछ ही समय शेष है। तब तक सारे छल करेगी और अपने आँचल की ओट में बचाए रखेगी प्यार और लालसाओं की इस लौ को। ......और एक दिन हबि डार्लिंग के मुँह पर थूक कर उन्हें अय्याशी और प्यार का फ़र्क़ बताएगी। ......उसने बगल में पड़ा मोबाइल फ़ोन उठाया। कान्टैक्ट में जाकर हवि डार्लिंग को ढूँढ़ा। एडिट मोड में गई। केवल हबि रहने दिया और डार्लिंग को डिलीट किया।

'कथादेश' से साभार 

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