Wednesday, October 1, 2014

लुक छिप बदरा में चमके जैसे चनवा…

जाने माने रंगकर्मी, कथाकार, लोक कलाओं के माहिर विद्वान हृषिकेश सुलभ का यह षष्ठी योग का वर्ष है, इसलिए जानकी पुल पर हम समय समय पर उनकी रचनाएँ, उनके रचनाकर्म से जुड़ी सामग्री देते रहेंगे. आज प्रस्तुत है एक बातचीत जो की है मुन्ना कुमार पाण्डे और अमितेश कुमार ने- मॉडरेटर. 
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आपके हिसाब से वह कौन सी ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिसने भोजपुरी संस्कृति और यहां की कला को प्रभावित किया है?

पूरी दुनिया की बड़ी त्रासदियों में से एक है विस्थापन। और सिर्फ़ भूगोल नहीं बदलता है, इससे आने वाली कई पीढियां प्रभावित होती हैं। विस्थापन का ये खेल है। अब दुनिया के परिदृश्य में जहां जहां विस्थापन हुआ है जीवन कितना संकट कितना संघर्ष में आया है! कुछ पीढियां तो उस दर्द को लेकर मर गई और कुछ नहीं हो सका। भोजपुरी क्षेत्र की सबसे बडी समस्या जो प्रछन्न रूप से दिखाई देती है विस्थापन है। अब इस विस्थापन की जड़ों में क्या है? तो हम एक सड़े हुए सामंती समाज का हिस्सा रहे हैं। उत्तर प्रदेश का कुछ हिस्सा, बिहार और नेपाल में मधेसियों का हिस्सा है जिसे पूर्वांचल कह लीजिये इसका संकट सामंतवाद है। सामंती व्यवस्था क्या करती है? वह संस्कृति को नष्ट करती है। जमीन तो जिसके पास लाठी होगी वह किसी भी दिन कब्जा कर लेगा। लेकिन संस्कृति को नष्ट करना कठिन काम है, जल्दी नष्ट नहीं होती है इसलिये सबसे ज्यादा ताकत सामंती समाज ने सामान्य जन जीवन और संस्कृति को नष्ट करने में लगाया। जब मैं संस्कृति कह रहा हूं तो उसे पूरी जातीय चेतना के साथ जोड़कर देखना की कोशिश कर रहा हूं। हर गली मोहल्ले, गांव, जवार की अपनी पहचान होती है।  जब इन छोटी छोटी पहचानों को आप नष्ट कर देते हैं तो विजय आसान होता है। जो चीजें मनुष्य के भीतर पैदा होती है जब आप उसको नष्ट नहीं कर पायेंगे तो फिर पनप जायेगी। तो सामंतवाद बहुत चालाकी से, भले वह योजना ऊपर से दिखाई पड़े, उन्हें नष्ट करती है। तो भोजपुरी के साथ यह हुआ है। बाजार वगैरह तो बहुत साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है वह बिलकुल हाल की बात है. लुक छिप बदरा में चमके जैसे चनवा…' कितना वर्ष हुआ इतना सुंदर गीत लिखे हुए? बहुत ज्यादा वर्ष तो हुआ नहीं तो यह क्षरण हाल का है जिसमें बाजार का अपना अलग हिस्सा है।

भोजपुरी क्षेत्र की संस्कृति श्रम की संस्कृति है। भूमि का असमान वितरण है, जिसके पास है उसके पास एक हजार बीगहा है और जिसके पास नहीं है उसके पास कुछ नहीं है। वह शौच करने भी दूसरे के जमीन में जाता है।  अगर लोग लाठी लेकर खड़े हो जायें कि मेरे जमीन में शौच नहीं कर सकते हो तो उसके पास इसके लिये भी भूमि नहीं है। तो भूमि के इस असंतुलित बंटवारे ने  विस्थापन को लगातार बढ़ावा दिया। अब यह रूप बदल कर आता रहा।  

अब इसका एक दूसरा पक्ष भी है। सामंत है सौ बिगहा जमीन है लेकिन फ़सल दह गई तो वह क्या खायेगा? खुद खाने के लिये रखेगा या मजदूर को खिलायेगा। इसलिये लोग वहां भागे जहां उद्योग थे और श्रम का स्थानांतरण हुआ। लोग जब जाते हैं तो छूट गई स्त्रियां है उनका वर्णन साहित्य में होता रहा है। लेकिन स्त्रियां ही  नहीं छूटती मां भी छूटती है, पिता भी छूटता है, गांव, जवार खेत खलिहान सब छूटता है। भिखारी ठाकुर ने जैसे अपने नाटकबिदेसिया में लिखा है कि बिदेसी दूसरी औरत के प्रति आकर्षित होता है, यह एक सत्य है लेकिन वह (बिदेसी) भी वहां संघर्ष करता है। इनकी क्या स्थिति है यह दिल्ली  में देख  लिजीये। दिल्ली में दूसरे प्रदेशों से मजदूर आते हैं भवन बनाते हैं खटते हैं और जब तैयार हो जाता है तो वहां से विस्थापित हो जाते हैं। शीत पाला गर्मी झेलते हुए उनके लिये कोई आशियाना नहीं बनता तो यह भी एक दर्द ह॥ विस्थापित होने के बाद का दर्द। हमारे जिले क्या दर्द है? अब लोग बहुत से खाड़ी देशों मे चले गये तो जब बम फ़ूट रहा था इराक में उसका असर हो रहा था हमारे आंगन में। वहां से लाये गये कपड़े शरीर में आग लगा रहे थे। वहां से लाये गये टेलीविजन ही प्राणलेवा खबरें दे रहा था।

भोजपुरी की पूरी पूरी संस्कृति दो पाटों के बीच पीसती गई है। एक है भूमि का असंतुलित बंटवारा और दूसरा   जो पूरी समाजिक व्यवस्था का खराब पक्ष है वह है श्रम की उचित कीमत नहीं देना तो इसके कारण होने वाला विस्थापन। इन्हीं दो पाटो के बीच पूरा जीवन है। मैं अपनी कहानियों में नाटकों में एक ही चीज लगातार लिख रहा हूं विस्थापन, जो भोजपुरी संस्कृति के नष्ट होने के सबसे बड़े कारण है।

इस प्रक्रिया में हम अपनी परंपरा को कितना बचा पायेंगे?

देखिये परंपरा का वहीं हिस्सा जीवित रह सकता है जो जीवन के साथ स्पंदित हो, जो नहीं चल पायेगा उसको नष्ट होना है। अगर आपके शरीर का अंग सड़ जाये उसे लेकर नहीं चल सकते। समस्या यह है कि भोजपुरी संस्कृति में जो सड़ा गल है हम उसको भी लेकर चलना चाहते हैं। आपको मालूम है कि लोकगीत किस तरह बदल रहे हैं? हम नहीं जानते और चीखते चिल्लाते हैं कि चीजे मर रही है बदल रही है।  अब सेंट के शीशी ढरकवल शहर गमकईल हीरो यह है नया झूमर तो जनता अपना गीत चुन लेती है, बना लेती है। एक समय था उन्हीं स्त्रियों ने लिखा ब्राह्मण का मंत्र कांप रहा है,  कुश का डंठल कांप रहा है, मड़वा कांप रहा है, समय बदल रहा है।मात गईलो मात गईलो पीयली मैं दरूआ यह भी तो गाया है स्त्रियों ने ..डॊमकच देखिये स्त्रियों का पूरा जो दमन है जो पुरूष वर्चस्व है वह एक रात का विस्फ़ोट पूरी पितृसत्ता पर भारी पड़ सकता है। उसी गांव में क्या आप उसी डोमकच की कल्पना कर सकते हैं? अब रोज डोमकच हो रहा है। वह स्त्रियों की स्वतंत्रता की रात थी जैसा कि प्रचारित किया गया कि बारात जाने के बाद गांव की रक्षा के लिये स्त्रियां जागती थी ऐसा नहीं था। बदलती हुई चीजों को देखना और चुनना भी जरूरी है, परंपरा का सब कुछ लेकर नहीं चल सकते और उसकी पुनरावृति नहीं कर सकते उसकी पुनर्विष्कृति आवश्यक है.

रचनाशीलता की जो दुनिया है वह पुनरावृत्ति में विश्वास रखता है। जैसे आप देखिए कि भिखारी ठाकुर का नाच बिदेसिया क्या उसी तरह किया अजा सकता है जैसे वे करते थेजीवन कितना बदला है इस बीच?  

भोजपुरी संस्कृती के लगातार क्षरण से कैसे बचाया जा सकता है और दूसरी बात यह कि भिखारी ही क्यों अपने समय में सबसे प्रखर निकले जबकि इसी कला के अन्य साधक भी थे और इस नाच की कला में भी गिरावट आई। 

देखिये भिखारी भी शादी ब्याह जन्मोत्सव में गये मेहनताना लिया और जिस दरवाजे पर गये हैं उसकी रूचि का खयाल रखना पड़ेगा,. और जो बुलाता है वह अपनी रूचि थोपता है। और फ़िर शादी ब्याह हमेशा नहीं होते, छः महीना बेरोजगारी में आपको कर्ज लेकर खाना होगा। अब भिखारी के सामने यही समस्या है जो वे  करते है वह करना नहीं चाहते थे। जब वे कलकत्ता से लौटते हैं तो रामचरितमानस लेकर लौटते हैं। भिखारी ठाकुर कवि नाटककार हैं और वे भक्त कवि बनना चाहते थे। अंतिम दौर में वो भक्त की तरह रहने भी लगे थे।   यह जो फूहड़ता अश्लीलता है जो दूसरो के दबाव में आ रही है उस पर उनकी नजर है, दृष्टि है। यह दृष्टि ही उन्हें अलग करती है।

अब उनके समय में जो लोग थे जैसे रसूल जिसके बारे में मेरी मां कहती थी कि रसूल रहते तो उनका अपना अंचरा पर नचईति. रसूल पढे लिखे थे, भिखारी ठाकुर अनपढ थे। रसूल कहीं कही सामंतवाद विरोध और हिंदू मुस्लिम एकता की भी बात करते हैं। लेकिन भिखारी के लिये ये बड़ा इश्यु नहीं था, उनके लिये औरतो का हाहाकार उनकी अजस्त्र पीड़ा मुख्य थी। क्राफ़्ट के लेवल पर भी उनको पकड़ना आसन नहीं है। आप घूस तो  सकते है लेकिन उसमें बहुत आंधी है धूल है धक्कड़ है। जब आप पाठ के साथ चह्लते हैं और उसका विश्लेषण करते हैं। उसके भीतर इतने सब टेक्सट है कि आप पागल हो जाते हैं। यह रसूल में भी है लेकिन जो नैसर्गिकता भिखारी के पास है वह रसूल के पास नहीं है। लेकिन यहां यह भी है कि रसूल का बहुत कुछ हमारे सामने नहीं है अतः इसलिये कुछ आसानी से नहीं कहा जा सकता है। दरबारी गिरी. रसूल मियां जैसे लोगों में भिखारी जितना विजन नहीं था। दरबारी गिरी से मैं खुद मिला था।


यह साक्षात्कार, जनवरी २०१४ में भारंगम के दौरान सुलभ जी से मुन्ना कुमार पांडे और अमितेश की लंबी बतकही का हिस्सा है.