Wednesday, December 17, 2014

रायपुर का रायचंद

मेरे प्रिय व्यंग्यकार-कवि अशोक चक्रधर ने रायपुर साहित्योत्सव से लौटकर अपने प्रसिद्ध स्तम्भ 'चौं रे चम्पू' में इस बार उसी आयोजन पर लिखा है. आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन 
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--चौं रे चम्पू! तू रायपुर साहित्य महोत्सव में गयौ ओ, कौन सी चीज तोय सबते जादा अच्छी लगी?
--चीज़ से क्या मतलब है चचा? खाने-पीने की, ओढ़ने-बिछाने की, आवभगत की या साहित्य-सत्संग में आने वाले किसी भगत की?
--अरे, कोई सी बात बताय दै!
--सबसे अच्छी बात हुई वरिष्ठ कवि-साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से मिलना। सन् उन्नीस सौ चौहत्तर में सुधीश पचौरी के कमरे पर अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित 'पहचान' सीरीज़ की ख़ूब चीरफाड़ हुई। उस सीरीज़ में विनोद जी की भी एक कविता-पुस्तिका थी, 'लगभग जयहिन्द', लेकिन सभी ने उसे पसंद किया। व्यंग्य का एक निराला और नया अंदाज़ था। होती हुई चर्चाओं के प्रकाश में मैंने सीरीज़ की समीक्षा 'पहचान अशोक वाजपेयी की' शीर्षक से लिखी, जो 'ओर' नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुई। तभी से मेरा मन था कि विनोद कुमार शुक्ल से मिलना है। इसलिेए भी लालायित था कि राजनांदगाँव में उन्होंने गजानन माधव मुक्तिबोध के साथ लंबा समय बिताया। आप जानते हैं कि मुक्तिबोध मेरे आदर्श कवि हैं। मेरी कविताओं को मानवतावादी यथार्थवादी रास्ता वही दिखाते हैं। लेकिन देखिए, विनोद जी से मिलने की चालीस साल पुरानी हसरत अब आकर पूरी हुई।
--कैसी रही मुलाक़ात?
--अत्यंत संक्षिप्त, अत्यंत आत्मीय। 'लगभग जयहिन्द' के बाद मैंने उनकी कोई रचना नहीं छोड़ी। जैसे-जैसे उन्हें पढ़ता गया, उनके प्रति स्नेहादर बढ़ता गया। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उनकी अल्टीमेट औपन्यासिक कृति है। पूरा उपन्यास एक महाकाव्य सरीखा है। उपन्यास के प्रारंभ में ही उन्होंने उद्घोषणा कर दी थी कि 'उपन्यास में एक कविता रहती थी'। उनसे आजानुभुज मिलना और उन्हें साक्षात सुनना इस महोत्सव की सबसे बड़ी उपलब्धि थी मेरे लिए
--का सुनायौ उन्नै?
--छोटी-छोटी अनेक कविताएं सुनाईं। हर कविता में मार्मिक व्यंग्य! पता नहीं क्यों आज के व्यंग्यकार जब व्यंग्य की बात करते हैं तो उनका नाम नहीं लेते। शायद इसलिए कि वे व्यंग्य में हास्य ज़रूरी मानते हैं। ग़रीब की हितैषी संवेदनशील व्यंजना उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
--तौ सुना उनके संबेदनसील ब्यंग!
--अतुकांत कविताएं यथावत तो मुश्किल से याद रहती हैं पर कुछ पंक्तियां ऐसी हैं जो पिछले चार-पाँच दिन से निरंतर गूंज रही हैं। जैसे उन्होंने कहा कि मैं हिंदी में शपथ लेता हूँ कि मैं किसी भी भाषा का अपमान नहीं करूंगा। कविता में उन्होंने कामना रखी कि उनकी भाषा हर जनम में बदलती रहे। और वे संसार में इसके लिए बार-बार जन्म लेते रहेंगे। कविता के अंत में उन्होंने कहा, मैं कीट-पतंगों से भी यह बात मनुष्य होकर कह रहा हूं। अब चचा, वहां हिन्दी को लेकर काफ़ी चर्चाएं हुईं। मातृभाषा, राजभाषा, संपर्कभाषा, राष्ट्रभाषा, आख़िर हिंदी है क्या? अख़बारों में अशोक वाजपेयी का वक्तव्य बड़ा मोटा-मोटा छपा, हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है। उनके अनुसार यदि किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा माना जाएगा, तो वह भाषा तानाशाह हो जाएगी। उनके अनुसार भारत की सारी भाषाएं और बोलियां राष्ट्रभाषाएं हैं! अंग्रेज़ी के प्रच्छन्न समर्थन के लिए यह बड़ी बारीक कताई है वाजपेयी जी की।
--सो कैसै?
--इस विचार का विरोध करने वाले क्यों चाहेंगे कि अन्य भारतीय भाषाओं के समर्थक न माने जाएं।
--अरे उनकी भली चलाई!
--चचा, आपने विनोद जी का नज़रिया भी सुना। उनके वक्तव्य में एक विश्वदृष्टि है। मनुष्य अगर न समझें तो वे हिंदी में शपथ लेकर कीट-पतंगों को भी सुनाना चाहते हैं। वे संसार की सारी भाषाओं के प्रति आत्मीयता से भरा संवेदनात्मक सोच देना चाह रहे हैं और अशोक जी हिंदी भाषा के तानाशाह होने का ख़तरा दिखा रहे हैं।
--लोग तानासाह होयौ करैं, भासा कैसै है जायगी?
--वही तो बात है चचा! किसी भाषा को मज़हब या शासन से जोड़कर देखना सोचाई को कितना संकीर्ण कर देता है। भाषाओं की आत्मीयताओं की जड़ों में मठा क्यों डाल रहे हैं, खुलकर अंग्रेज़ी मैया की जय बोलें न! इसमें शक नहीं है कि अशोक जी की हिंदी बहुत प्यारी लगती है। हिंदी के वरिष्ठ लेखकों में उनसे ज़्यादा अच्छी अंग्रेज़ी शायद ही किसी की होगी, लेकिन सिद्ध तो करें कि हिंदी पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली और बहुवचन की भाषा नहीं है।

--अरे बे तौ स्बयंसिद्ध ऐं! तू उन्ते का सिद्ध करायगौ, रायपुर कौ रायचंद बनैं खामखां! मोय सुकल जी कौ उपन्यास दइयो, खिरकी वारौ। 

Monday, December 15, 2014

हम खड़ी बोली वाले हर बात के विरोध में खड़े रहते हैं!

हिंदी के एक वरिष्ठ लेखक, एक ज़माने में मैं जिनका दूत होता था, भूत होता था, ने एक बड़ी मार्के की बात कही थी. उन्होंने कहा था कि जानते हो हिंदी भाषा खड़ी बोली से बनी है, और इसलिए हर बात पर विरोध में खड़े हो जाना इसके मूल स्वभाव में है. विरोध हम हिंदी वालों का मूल स्वभाव है, मूल प्रवृत्ति है.

80 के दशक में हम टीवी के खिलाफ खड़े हुए. मनोहर श्याम जोशी जब ‘हमलोग’, बुनियाद’ जैसे सीरियल लिखकर हिंदी के परिसर में एक नई शुरुआत कर रहे थे हम हिंदी वाले उनके ऊपर ढेले फेंक-फेंक कर अपनी प्रगतिशीलता का सबूत देने में लगे हुए थे. भारत के सबसे दूरदर्शी प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने जब कंप्यूटर क्रांति, संचार क्रांति की बुनियाद रखी हम हिंदी वाले ऐसे विरोध में लगे रहे जैसे कंप्यूटर आ गया तो हम जैसे निपट ही जायेंगे. सुधीश पचौरी ने जब उत्तर-आधुनिकता की बात की हम उनके खिलाफ खड़े हो गए. 
जब इंटरनेट आया हम सोशल मीडिया के विरोध में खड़े हो गए, खुद को हिंदी के विधाता मानने वाले बूढ़े कहने लगे इससे तो मर्यादाएं टूटने लगी हैं, जो बात गुपचुप में होनी चाहिए वह खुले आम हो रही है.

एक बड़ा अच्छा किस्सा सुनाता हूँ. मेरे एक आदरणीय प्रोफ़ेसर साहब हैं. मिलने पर बड़े प्यार से जानकी पुल ब्लॉग का हालचाल पूछा, फिर ये कहा कि वे फेसबुक ब्लॉग को पढने से क्यों बचते हैं क्योंकि यह समय नष्ट करने का माध्यम है. इस बात पर बड़ा अफ़सोस भी जताया कि अच्छी अच्छी प्रतिभाएं इसके प्रभाव में आकर नष्ट हो रही हैं. जब मैं चलने लगा तो यह कहा- सुनो, तुम जानकीवल्लभ शास्त्री के भक्त रहे हो, उनकी सारी किताबें दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक से मैंने छपवा दी हैं, जरा इसके बारे में जानकी पुल पर लिख देना. 
प्रगतिशीलता का यही दुचित्तापन है.

बाद हम बाजार के विरोध में खड़े हो गए. जिस दौर में तथाकथित लघु पत्रिकाओं में शिवराज सिंह, रमन सिंह का चेहरा विज्ञापनों के रूप में अगले-पिछले पन्नों पर छप रहा था, छप रहा है उस दौर में हम भाजपा के विरोध में खड़े हो गए. मैं पूछना चाहता हूँ कि प्रगतिशीलता की वह नैतिक जमीन कहाँ बची है जहाँ खड़े होकर हम दक्षिणपंथी राजनीति का विरोध करें, उनको फासीवादी बताएँ और खुद को प्रगतिशील? जिन राज्यों में दक्षिणपंथी सरकारें हैं, वहां हमारी किताबों की थोक खरीद होती है हम उसका विरोध नहीं करते, हम वहां से मिलने वाले नियमित विज्ञापनों का विरोध नहीं करते हम बस रायपुर साहित्योत्सव का विरोध करते हैं! हमारे इसी दुचित्तेपन ने हमारे विद्रोह को हास्यास्पद बना दिया है. विद्रोह त्याग की मांग करता है. उसके बिना सारा विद्रोह छद्म लगने लगता है. यह कहने लगता है हिंदी पर खतरा है.

मैं विरोध में खड़ा नहीं हूँ. मैं इस आयोजन में गया भी, बिक भी गया और आप चाहे इसके लिए मेरे ऊपर थूकाथुकी भी कर लें लेकिन मैं साफ़ साफ़ कहूँगा कि बड़े सकारात्मक भाव से लौटा. कारण है, इससे पहले बहुत सारे लिटरेचर फेस्टिवल्स में भाग लेने का मौका मिला है. मान-सम्मान, स्वागत-बात में कहीं कोई कमी नहीं रहती है. लेकिन एक कमी हर जगह दिखाई देती है कि दिव्यता-भव्यता तो उनमें खूब रहती है लेकिन हिंदी के लेखकों के असली पाठक उनको नहीं मिलते. रायपुर साहित्योत्सव अकेला ऐसा उत्सव लगा जहाँ माहौल में वह अंग्रेजियत नहीं थी, हिंदी के असली पाठक अपने लेखकों से मिल कर गौरवान्वित हो रहे थे. वहां सारे स्टाल हिंदी के प्रकाशकों के थे और मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि वहां स्टाल लगाने वाला कोई प्रकाशक यह नहीं कहेगा कि उसकी बिक्री कम हुई. अच्छी हुई. यह बात मैं हवा हवाई नहीं कह रहा हूँ. वहां स्टाल पर मौजूद प्रतिनिधियों से बातचीत के आधार पर कह रहा हूँ.

एक और बात, मैं बड़े बूढों की बात नहीं करना चाहता. वे बेचारे तो नए पुराने दो पाटों के बीच फँस गए हैं. लेकिन नए लेखकों ने जहाँ भी बोला जमकर बोला और उनको लेकर सुनने वालों में उत्साह भी खूब रहा. वहां आयोजित सत्रों में जिन दो सत्रों में जबरदस्त भागीदारी देखने में आई, उनमें एक सत्र लोकप्रिय लेखन को लेकर था, जिसमें अदिति महेश्वरी, पंकज दुबे, प्रभात कुमार(प्रभात प्रकाशन वाले) आदि वक्ता थे, और जिन्होंने भविष्य की किताबों को लेकर, समकालीन लेखन को लेकर जमीनी बातें की, क्रांति-व्रांति जैसी हवा-हवाई बातें नहीं! दूसरा सत्र आभासी दुनिया के लेखन को लेकर था जिसमें विनीत कुमार, मनीषा पाण्डे, वरुण ग्रोवर और युवा उत्साह से सराबोर बुजुर्ग जगदीश्वर चतुर्वेदी वक्ता थे और आपका यह जानकी पुल का रखवाला उस सत्र का संचालन कर रहा था. सच बताऊँ तो अभूतपूर्व उपस्थिति थी उस सत्र में और विनीत कुमार को तो जैसे सुनने वालों ने सर पर बिठा लिया.

हिंदी के लेखक को पाठक मिल रहे हैं, बड़े बूढों के सर्टिफिकेट के बिना दमदार युवा लेखकों को पहचान मिल रही है. हम जिस जन-जन का हल्ला मचाते हैं वह हम लेखकों तक पहुँच रहा है. इसमें विरोध की क्या बात है. यह सकरात्मक पहलू है जो आश्वस्त करता है कि आने वाले समय में लेखकों द्वारा लेखकों के लिए किया जाने वाला लेखन समाप्त हो जायेगा, पुरस्कारों के लिए लिए लिखी जाने वाली कवितायेँ कूड़ेदान में चली जाएँगी. हिंदी में पाठकों लेखकों के बीच जीवंत रिश्ता बनेगा. कम से कम रायपुर साहित्योत्सव ने मुझे उत्साह से भर दिया है.

अंत में, जहाँ तक मानदेय लेकर बिकने की बात है तो मुझे इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है मैं एक बिका हुआ लेखक नहीं हूँ. मैं पत्र-पत्रिकाओं में लिखता हूँ मानदेय लेता हूँ, लड़-झगड़ कर लेता हूँ, प्रकाशकों से रॉयल्टी लेता हूँ. सभा-समारोहों में पत्रं-पुष्पं लेता हूँ. मैं तो न जाने से कब से बिका हुआ हूँ. यह कोई पहली बार थोड़े न है. साहित्योत्सवों में मानदेय मिलना चाहिए. यह अच्छी शुरुआत है. लेखक बंधुआ मजदूर नहीं होता है, जिस तरह मजदूरों को उचित मजदूरी मिलनी चाहिए उसी तरह लेखकों को उसके लेखन की उचित मजदूरी मिलनी चाहिए. उसके श्रम का मूल्य मिलना चाहिए. तभी उसके लेखन की सार्थकता है. यह मेरा अपना मत है. आप चाहें लाख विरोध करें मैं अपने इस मत से टलने वाला नहीं हूँ.

मेरे आदरणीयों, हिंदी को नकारात्मक मोड(mode) से निकलने दीजिए, सकारात्मक होकर सोचिये. हिंदी के विस्तार में ही हमारा विस्तार है. हमारी भाषा को खड़े खड़े सौ साल से ऊपर हो चुके हैं. अब प्लीज उसे बैठ जाने दीजिए न मंगलेश जी, विष्णु जी!

- प्रभात रंजन 


Thursday, December 11, 2014

विमल राय की फिल्म 'उसने कहा था'

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' पर विमल राय ने एक फिल्म का निर्माण किया था. हालाँकि निर्देशन उन्होंने खुद नहीं किया था. फिल्म के लिहाज से कहानी में काफी बदलाव किया गया था. उस फिल्म पर आज सैयद एस. तौहीद का लेख- मॉडरेटर 
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कथाकार चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कथा उसने कहा थापर जाने-माने फ़िल्मकार बिमल राय ने इसी नाम से एक फ़िल्म बनाई थी। निर्माता बिमल दा की फ़िल्म को मोनी भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था। फ़िल्म मे सुनील दत्त, नंदा, इंद्रानी मुखर्जी, दुर्गा खोटे, राजेन्द्र नाथ, तरूण बोस, रशीद खान व असित सेन ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं।
कहानी के सिनेमाई रूपांतरण की कथा कुछ इस तरह है: --
पंजाब के एक छोटे से शहर मे बालक नंदु अपनी विधवा माता पारो (दुर्गा खोटे) के साथ रहता है। हम देखते हैं कि नंदु की फ़रीदा(बेबी फ़रीदा) से बचपन की दोस्ती है। फ़िल्म की पात्र कमली(बेबी शोभा)अंबाला से अपने माता-पिता के साथ यहां छुट्टियां मनाने आई है। एक घटना मे नंदु बालिका कमली की जान बचाता है, उस दिन से नंदु व कमली अच्छे दोस्त बन जाते हैं। यह मित्रता कमली के अचानक अंबाला लौट जाने से समाप्त हो जाती है।
कमली और नंदु को बिछडे वर्षों बीत चुके हैं। इस बीच आस-पास और दुनिया मे अनेक परिवर्तन आए। द्वितीय विश्वयुध का समय आ गया है। बालक नंदु अब युवा गबरू जवान (सुनील दत्त) है। नंदु का ज्यादातर समय खैराती (रशीद खान) और वज़ीरा (राजेन्द्र नाथ) जैसे हमराह मित्रों के साथ गुज़रता है। घर की परवाह से दूर वह सारा दिन यूं ही मित्रो के साथ मटरगस्ती करता रहता है। घर का खर्च मां पारो के प्रयासों से पूरा हो रहा है।
दोस्तों की संगत मे रहते हुए नंदु मे मुर्गे पर जुआ खेलने का शौक पनप जाता है । इस खेल मे बाज़ी लगाने का शौक उसे कभी-कभी कुछ पैसा दे देता है। एक दिन इसी से कमाए रूपए से वह अपनी मां के लिए हार, चश्मा और गर्म शाल खरीदता है। पहले तो पारो खूब खुश होती है, जब सच सामने आया तो वह बेटे को सारा सामान लौटा देती है। घटना नंदु के जीवन मे आने वाले परिवर्तन संकेत के रूप मे देखी जा सकती है।
हम देखते हैं कि नंदु तांगेवाले खैराती के साथ बाहर निकला हुआ है। राह मे सामने से आ रहे दूसरे तांगेवाले  से उसकी झड़प हो जाती है। इस मामले तांगे पर बैठी एक युवती से बहस कर बैठता है। यह युवती बड़ी हो चुकी कमली है। बचपन के दोस्त इतने वर्षो बाद ऐसे अनजानमिलेंगे दोनो को ऐसी आशा न थी। समय का चक्र कमली को एक बार फ़िर से बचपन की जगह वापस ले आता है। कहानी मे आगे कमली(नंदा) नंदु (सुनील दत्त) को अपने बिछडे हुए बचपन के दोस्त रूप मे पहचान लेती है। नंदु का दोस्त खैराती कमली को उसके बारे मे बताता है कि यह लफ़ंगा(सुनील दत्त) दरअसल उसके बचपन का दोस्त है। सच को जानने के बाद कमली के मन मे नंदु के लिए प्रेम हो जाता है। सुख भरे दिन फ़िर से काफ़ूर होने लगते हैं। कमली के चाचा उसकी शादी सूबेदार के बेटे से करने का मन बनाते हैं
इसी बीच पारो अपने बेटे के लिए कमली का हांथ मांगने आती है। कमली के चाचा इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज़ कर पारो को वापस लौटा देते हैं। नंदु अपनी मां की बेइज़्ज़ती से बहुत आहत होता है। वह माता व स्वयं को अपमानित व तिरस्कृत पाकर खोया सम्मान वापस अर्जित करने के लिए फ़ौज मे चला जाता है।
कुछ महीने फ़ौज मे रहने के बाद नंदु वापस छुट्टियों मे घर आता है। इस बीच कमली के घरवाले उसकी सगाई कर देते हैं। कमली की सगाई की खबर सुनकर नंदु तुरंत ही फ़ौज लौट जाता है। रेजीमेंट पहुंचकर वह अपने सीनियर अफ़सर (तरूण बोस) के पास रिपोर्ट करता है। हम देखते हैं कि नंदु के सीनियर विवाह हेतु घर जा रहे हैं। दरअसल उनका रिश्ता कमली से तय हुआ। सीनियर के चले जाने के पर रणक्षेत्र का दायित्त्व नंदु के कांधे आता है, एक ओर वह फ़ौज मे शत्रुओं का सामना कर रहा है तो दूसरी ओर कमली एक अजनबी के साथ बंध रही है।

प्रेम व डयूटी के दो पाटों मे बंटे नंदु और कमली क्या अपने दायित्त्व का निर्वाह कर सकेंगे? युद्ध का बडा परिवर्तन दोनों की ज़िंदगी मे क्या बदलाव लाएगा? क्या फ़िल्म का सुखांत अंत होगा? इन प्रश्नों के बीच एक ठोस संकेत मिला: जंग अपने साथ हर समय विषम परिस्थिति लेकर आता है। नंदु व कमली की कहानी के माध्यम से फ़िल्म एक कड़वा सच उजागर करती है: जीवन की खुशहाली मे युद्ध एक बडी बाधा है ।