Friday, April 29, 2016

बचे हुए लोग और गाँव

राजकिशोर के संपादन में निकलने वाली पत्रिका रविवार डाइजेस्ट में मेरी पीढ़ी के प्रतिभाशाली कथाकार मनोज कुमार पांडे की  कवर स्टोरी गाँव पर  आई है. जो लोग  पत्रिका  नहीं  पढ़ सकते हुनके लिए यहाँ दे रहा हूँ- प्रभात रंजन 
==============

गाँव के बारे में बात करना बेहद कठिन काम है। खासकर तब और भी जब आप गाँव में ही पले-बढ़े हों और गाँव से प्यार भी करते हों। न जाने कितनी यादें पीछा करेंगी जिनसे बच पाना बेहद मुश्किल। वे इतनी होंगी जिनके लिए कई किताबें भी कम पड़ेंगी। तो ऐसे में आप को तय करना पड़ेगा कि कहाँ आप अभी रुक जाएँगे कहाँ जल्दी ही फिर लौटने का वादा करेंगे। जैसे जब मैं गाँव को याद कर रहा हूँ तो बहुत सारी छवियाँ हैं, बहुत सारे दृश्य हैं, बहुत सारे खेल हैं, बहुत सारे स्वाद हैं पर ये सब स्मृतियों में ही हैं। स्नृतियों के बाहर तो एक दूसरी ही दुनिया है। पूरे देश की तरह गाँवों में भी सब कुछ बदल रहा है तेजी से। जरूरी है कि हम इस बदलाव को समझें और जानें कि गाँव में कितना गाँव बचा है और कितना शहर घुस चुका है। और यह भी कि गाँव में जो शहर आया है उसमें कितनी उसकी अच्छाइयाँ हैं और कितना बुरा पहलू, क्योंकि गाँव में सब कुछ बुरा ही तो नहीं था जैसे शहरों में सब कुछ अच्छा ही तो नहीं है। और यह भी कि गाँव में जो गाँव बचा है उसमें कितना प्यार करने लायक है और कितना छोड़ देने लायक। सवाल पूछा जा सकता है कि वो कौन लोग हैं जो अभी गाँव में बचे हुए हैं और वहाँ रहकर वह क्या कर रहे हैं। ये उनका चयन है या मजबूरी?
      पता नहीं इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए कि गाँव में रह रहे लोगों का निन्यान्बे फीसदी हिस्सा आज भी किसी न किसी रूप में खेती से जुड़ा हुआ है। जिसके पास बिस्से भर खेत नहीं है वह भी। विडंबना यह है कि जिस खेती से गाँव की दशा और दिशा तय होती है वह आज भी लगभग पूरी तरीके से नियति पर आश्रित बनी हुई है। समय पर सिंचाई के लिए पानी मिल पाना आज भी बड़ी उपलब्धि है। मैं अगर अपने इलाके की बात करूँ, जहाँ पर नहरों का जाल फैला हुआ है, वहाँ पर भी पानी शायद ही कभी समय से आता हो। बीच में बोरिंग ने जरूर कुछ हद तक सिंचाई की समस्या का हल दिया था पर आखिरकार बोरिंग भी समाधान से ज्यादा समस्या ही साबित हुई। आज हालत यह है कि गर्मियाँ शुरू होने के पहले बोरिंग के पानी की मात्रा घटने लगती है। और गर्मी आने तक ज्यादातर बोरिंग बेकार हो जाती हैं। कई बार तो पीने के पानी की किल्लत होने लगती है। कुएँ सूखने लगते हैं। चापाकल से पानी की कलकल गायब हो जाती है बस लोहे की एक खड़खड़ाहट भर बचती है। उनसे पानी बस वैसे ही टपकता है जैसे पसीने की बूँदें टपकती हैं। फिर से नहरों की तरफ लौटें तो नहरों ने भी फायदे की तुलना में नुकसान ही ज्यादा किया है। नहरों ने स्थानीय पारिस्थितिकी को गहराई से प्रभावित किया है। इन्होंने जहाँ नए नए खर पतवारों को फैलाया है वहीं गाँवों से उस हरियाली को मिटाने में भी बड़ी भूमिका अदा की है जो गाँवों को एक अलग पहचान देती थी। नहरों ने अपने आसपास के कद्दावर पेड़ों को भी सुखा डाला है।
      गाँवों में पेड़ों के नष्ट होने के साथ साथ उनकी विविधता भी खत्म हो रही है। वो जमाना लगभग खत्म हो चुका है जब आम के हर एक पेड़ का फल अलग स्वाद और खुशबू वाला होता था। उनकी जगह एक तो पेड़ लगाए ही कम जा रहे हैं, जहाँ लगाए जा रहे हैं वहाँ भी देशी आमों की जगह दशहरी, चौसा या सफेदा जैसे ब्रांड लगाए जा रहे हैं जिनके स्वाद की एकरसता कभी खत्म नहीं होती। महुआ एक जमाने में हमारे भोजन का अभिन्न हिस्सा था। इसके फूल और फल से दसियों तरह के व्यंजन तैयार किए जाते थे। आज इससे सिर्फ शराब बनती है। बाकी महुए के पेड़ जितनी तेजी से गायब हो रहे हैं उससे तो यही लगता है कि आने वाली नस्लें उसे तसवीरों में ही पहचानेंगी। स्वाद की ही बात को और आगे बढ़ाएँ तो आज के बच्चों की जबान उसी स्वाद के लिए नहीं मचलती जिसके लिए पहले के लोगों की मचलती थी। आज गाँव में भी मैगी तो आराम से मिल जाएगी पर बाजरा, ज्वार या रागी की रोटी के शौकीन तरसते ही रह जाएँगे। जब हम बचपन में थे तो ऐसे न जाने कितने स्वाद हमारी जबान पर तैरते थे। ऐसे ही पके हुए कटहल, बड़हल या फूट-ककड़ी जैसे फलों की भी फल के रूप में पहचान गायब हो रही है तो इसके पीछे और चीजों के साथ साथ गाँवों की बदलती हुई सत्ता-संरचना भी काम कर रही है। ऐसे ही और भी न जाने कितने फल, अनाज और सब्जियाँ हैं जो देखते ही देखते हमारे घरों से गायब हो चुके हैं।
तो आखिर इतने बड़े पैमाने पर लोगों के स्वाद बदल जाने की क्या वजहें हो सकती है? हमारे गाँव के बच्चे भी पुए की जगह मैगी और पास्ता की माँग कैसे करने लगे? पनीर इतने बड़े पैमाने पर लोकप्रिय कैसे हो गया? पर्वल, कटहल या सूरन जैसी सब्जियाँ बड़े आयोजनों से गायब कैसे होने लगीं? मटन की जगह चिकन कैसे लेता जा रहा है? चीजें इस हद तक बदल रही हैं कि अब स्वाद का इलाके के भूगोल से शायद ही कोई रिश्ता बचा हुआ हो। कह सकते हैं कि इन चीजों की वजह बाजारवाद का मायावी फैलाव और घर घर में घुसकर बैठ चुका टीवी है। पर मैं इसे थोड़ा और पहले हरित क्रांति के साथ जोड़कर देखता हूँ। मुझे लगता है कि यह परिघटना उस हरित क्रांति के साइड इफेक्ट से जुड़ती है जिससे हमें भोजन के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर बनाया पर उसी ने हमारे भोजन की परंपरागत विविधता छीन ली। पुराने व्यंजनों या अनाज को याद करना किसी को रोमानी भी लग सकता है पर यह इतना रोमानी नहीं लगेगा अगर रागी या बाजरे को याद करते हुए उनकी पौष्टिकता के बारे में भी सोचा जाय और यह भी याद रखा जाय कि ये अनाज बेहद कम पानी में भी अच्छी फसल देते थे। जबकि हरित क्रांति ने हमें जिन गेहूँ और धान के भरोसे ला छोड़ा है वे पूरी तरह से सिंचाई और रसायनिक खादों के भरोसे हैं। उर्वरक बेहद महँगे होते गए हैं और कहने की जरूरत नहीं कि सिंचाई आज भी भगवान भरोसे है।
इन चीजों के बारे में बात करना इसलिए जरूरी है कि इन्हीं स्थितियों के बीच गाँव के व्यक्ति का जीवन पलता बढ़ता है। नई तकनीक ने उसे बहुत आराम भी दिया है। अब वो जमाना इतिहास की चीज बन गया है जब बीघे भर के गेहूँ को माँड़ने में पंद्रह पंद्रह दिन लग जाते थे। अब ये घंटे भर का काम है। पुर, रहट और दुगले से सिंचाई करने में बेहद श्रम और समय जाता था। अपना हो या किराए का, एक उठल्लू इंजन ने इन तीनों ही विधियों को इतिहास की चीज बना दिया है। कहने का मतलब यह कि इन तकनीकों ने किसानों को बहुत आराम दिया साथ में बहुत सारा खाली समय भी। जो पहले के किसानों के पास नहीं था। यहीं पर ये सवाल उठाया जा सकता है कि गाँव के लोग इस खाली समय का क्या उपयोग करते दिखाई देते हैं? क्योंकि गाँव में इस बात के बेहद सीमित विकल्प हैं कि वे अपने खाली समय का कुछ बेहतर उपयोग कर सकें। असल दृश्य तब बनेगा जब इस खाली समय को गाँव से निकल गए लोगों के समानांतर रखकर देखा जाय। और भी अच्छा हो कि इसी के साथ गाँवों की सत्ता संरचना और श्रम संरचना को भी जोड़ दिया जाय।
तो गाँवों में जो लोग आर्थिक रूप से थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं, उनका बचा हुआ समय गाँव की राजनीति ने ले लिया है। वे अनायास ही पूरे गाँव की खबर रखते हैं। किसके यहाँ कौन उठ बैठ रहा है, किन लोगों में आपस में ज्यादा पट रही है, किसकी लड़की या औरत किससे फँसी हुई है, किसकी बेटी या बहू बहुत दिनों से ससुराल या मायके नहीं गई, जैसी और भी बहुत सारी बातें उनकी रुचियों के केंद्र में होती हैं। इन चीजों की कृपा से फुसफुसाहटों का बाजार गर्म रहता है। वे अपने खाली समय का उपयोग अपनी आर्थिक स्थिति या जीवन-स्तर को बेहतर बनाने में नहीं खर्च कर सकते क्योंकि तब उन्हें कुछ ऐसे काम भी करने पड़ सकते हैं जो गाँव की सत्ता संरचना और जाति संरचना में उनके लिए वर्जित हैं। आज ही नहीं सदियों से श्रम सवर्णों के लिए उपहास की चीज है। अगर कोई सवर्ण ज्यादा श्रम करता दिखाई देता है तो दूसरे उपहास के भाव से उसकी तुलना दूसरी श्रमजीवी जातियों के साथ करने लगते हैं।
एक केकड़ा प्रवृत्ति गाँवों में तेजी से पनपने लगी है। जो खुद आगे नहीं बढ़ पाते वे उन दूसरों के रास्ते में मुश्किलें खड़ी करने लगते हैं जो उन्हें आगे बढ़ते दिखाई देते हैं। ऊपर बैठे लोग उनका रास्ता रोकते ही रोकते हैं। तो ऐसे में कोई अपनी मेहनत से या नौकरी आदि से कोई आर्थिक तरक्की के रास्ते पर बढ़ रहा है तो हो सकता है कि उस पर बेवजह दो-चार मुकदमें ठोंक दिए जाएँ। कि उसकी तरक्की की रफ्तार थम जाए और उसे अपना श्रम और धन कुछ ऐसी चीजों पर खर्च करना पड़े जो उसके ध्यान को बँटा लें। ऐसा करने वाले समय से पीछे छूटे हुए लोग हैं। उनका कोई भविष्य नहीं है पर त्रासद यथार्थ यह है कि वे उन लोगों के हाथ का खिलौना बन रहे हैं जो आज की तारीख में गाँवों पर राज कर रहे हैं। गाँव की राजनीति और उसके सारे दाँव-पेंच ऐसे ही लोग तय कर रहे हैं।
वहीं पर उत्पीड़ित जातियों के लोग अमूमन इस तरह की चीजों से दूर रहने की कोशिश करते हैं। उनके लिए श्रम के मौके खुले हैं। वे अक्सर काम की तलाश में महानगरों की तरफ कूच कर जाते हैं। आरक्षण के बावजूद सरकारी नौकरी उनके लिए दूर की कौड़ी है क्योंकि उनकी जीवन-स्थिति उनको इतनी छूट नही देती कि वे कुछ दिनों तक दूसरे दबावों से अपेक्षाकृत मुक्त होकर अपने आपको पढ़ाई पर केंद्रित कर सकें। बाकी मजदूरी करने वालों के लिए स्थानीय स्तर पर भी मौके बढ़े हैं पर इसके पीछे मनरेगा जैसी योजनाओं से ज्यादा स्थानीय स्तर के छोटे पूँजीपतियों के उदय का हाथ है। और इन पूँजीपतिओं के उदय में प्रधानी का बहुत बड़ा हाथ है। गाँवों में प्रधानी के लिए यूँ ही हिंसक और व्यक्तिगत लड़ाइयाँ नहीं लड़ी जाती। प्रधानी गाँव की सत्ता संरचना में एक ऊँचा स्थान तो देती ही है, घर बैठे लाखों-करोड़ों कमाने का रास्ता भी खोल देती है।
इस तरह से देखें तो गाँवों का मामला पूरे देश से बहुत अलग नहीं है। सूचना क्रांति और खुले बाजार के इस तथाकथित युग ने गाँवों को भी भीतर तक बदल दिया है। इस बदले हुए गाँव में खाँसी का कोई सीरप या पैरासीटामाल जैसी साधारण दवाएँ भले ही न मिलें पर कोक या पेप्सी जरूर मिल जाएँगे। मनोरंजन के परंपरागत साधन कब के खत्म हो चुके हैं। उन सब की जगह टीवी ने ले ली है। तीज तो खैर पहले से ही था अब टीवी मैया की दया से करवा चौथ भी घर घर पहुँच चुकी है। शादी-ब्याह में जो पहले गाँव भर के लोगों की सक्रियता होती थी और बर्तन भाड़े से लेकर बिस्तर चारपाई तक गाँव भर से इकट्टा किए जाते थे उनकी जगह अब टेंट हाउस वाले को बयाना देकर फुर्सत पा लिया जाता है। ऐसे ही सयुंक्त परिवार अब गाँवों में भी मुश्किल से ही कहीं मिलते हैं। जाहिर है कि संस्कृति के सभी पक्षों खान-पान, तीज-त्योहार, पहनावा, तरह तरह के उत्सव, मनोरंजन के साधन और जीवन शैली हर जगह पर शहर पाँव पसार चुका है। हालाँकि जैसा कि हम भारतीयों के साथ अक्सर होता है कि हम किसी चीज के बुरे पहलू तो आत्मसात कर लेते हैं पर उसकी खूबियों की तरफ हमारी निगाह कम ही जाती है। वैसा ही गाँवों के साथ भी हुआ है हमारे। ये फिलहाल तो शहरी बुराइयों के शिकार ही ज्यादा हुए हैं, शहर की अच्छाइयों तक पहुँचना अभी भी दूर की कौड़ी ही बनी हुई है इनके लिए।
इस बात को कई तरह से समझा जा सकता है। जैसे शहरों में भले ही निजता एक जरूरी मूल्य के रूप में स्वीकृत हो रही हो पर गाँवों में भयानक रूप से किसी का कुछ भी निजी नही है। शहरों में अंतर्जातीय विवाह भलीभाँति दिखने लगे हैं और उनसे कोई कहर भी नहीं टूट पड़ता। गाँवों में अंतर्जातीय विवाह तो छोड़ ही दिया जाय सजातीय प्रेम विवाह भी मुश्किल से संभव हो पाता है। जहाँ कही यह संभव हो भी पाता है वहाँ यह ऐसी अजूबा चीज होता है जिसकी चर्चा बरसों तक बनी रहती है। या अभी भी यह दृश्य गाँवों में अक्सर देखा जा सकता है कि अगर पति-पत्नी साथ-साथ पैदल चले जा रहे हैं तो पति पत्नी से कम से कम पचास मीटर आगे चलता दिखाई देगा। साथ चलने में लाज से ज्यादा गाँववालों के मजे लेने का डर होता है। भला हो दहेज की ही सही पर मोटरसाइकिल का, जिसने इस दूरी को पाँच मिलीमीटर भी नहीं रहने दिया।
      गाँवों में और भी अनेक दिलचस्प चीजें है। जैसे यहाँ प्यार का कोई मौसम आए या न आए पर लड़ाइयों के मौसम जरूर आते हैं जब गाँव वाले जमकर लड़ते हैं। बारिश गाँव वालों के लिए खुशियाँ ही नहीं ले आती लड़ाइयाँ भी लेकर आती है। गाँववाले बारिश का टूटकर इंतजार करते हैं। बारिश का मौसम आते ही बादल खोजती उनकी आँखें यूँ ही बार बार ऊपर की तरफ चली जाती हैं। उनका श्रम, उनकी सालना योजनाएँ, साल भर का भोजन सब कुछ बारिश की कृपा से ही तय होता है। ऐसे में किसान इंतजार करते रहते हैं कि कब बारिश हो जिससे कि वह खेतों में बुवाई कर सकें। स्थिति इस हद तक भयानक है कि उन्हें धान जैसी जलकेंद्रित फसल के लिए ही नहीं तिलहन और दलहन या जानवरों के हरे चारे के लिए भी बारिश का इंतजार करना पड़ता है। और बारिश की शुरुआत होते ही खेती का काम जोर पकड़ लेता है। मनरेगा ने कुछ किया हो या न किया हो पर तालाब बढ़ाने या पानी के संग्रहण की दिशा में स्थानीय भागीदारी को सुनिश्चित करने का काम काफी हद तक किया है। हालाँकि यह भी सच है कि प्रधान बिरले ही यह सोचकर तालाब खुदवाता है कि इससे पानी का संग्रहण बढ़ेगा। सौ में से निन्यान्बे बार वह तालाब खुदवाने में इसलिए रुचि लेता है क्योंकि उसे वहाँ ज्यादा रुपए बनाने का मौका दिखाई पड़ता है।
      पर इसी बारिश में गाँव कीचड़ से सन जाते हैं। रास्ते हैं नहीं, जहाँ खड़ंजे हैं वहाँ ईंटों का पता नहीं चलता। जगह जगह गहरे गड्ढे हो जाते हैं और उनमें पानी भर जाता है। गाँव वालों को तो उन गड्ढों के बारे में पता होता है पर अनजान व्यक्ति शायद ही बिना गिरे वहाँ से निकल पाए। बिना कीचड़ में लथपथ हुए उनके बीच से निकल पाना असंभव हो जाता है। साइकिल, मोटरसाइकिल की बात कौन कहे पैदल चलना भी खासी कलाबाजी के बाद ही संभव हो पाता है। घरों की एक बड़ी संख्या अभी भी कच्ची है, उनमें पानी टपकने लगता है। सीलन बढ़ जाती है और तरह तरह के कीड़े मकोड़ों का प्रकोप बढ़ जाता है। सबसे खास बात यह कि बारिश कम हो या ज्यादा बारिश में लड़ाइयाँ बढ़ जाती हैं और ये लड़ाइयाँ घरों से लेकर खेतों तक में फैल जाती हैं ये पानी के निकास की कोई समुचित व्यवस्था न होने के कारण होती हैं। खासकर घने गाँवों में तो पानी के निकास को लेकर जमकर लड़ाइयाँ होती हैं। तब कई बार एक के दरवाजे का पानी दूसरे के आँगन में जाने लगता है। दरवाजों पर पानी कई कई दिनों तक भरा रहता है। लोग इस सड़ते हुए पानी से किसी भी तरह से मुक्ति चाहते हैं और कोई और रास्ता न देख किसी पड़ोसी की तरफ काट देते हैं। वे अभी भी इस बात से लगभग दूर ही हैं कि इस बात के लिए प्रधान का घेराव करें कि वह पानी के निकास की कोई समुचित व्यवस्था करे। उन्हें लड़ना प्रधान से चाहिए पर वे आपस में लड़कर ही अपनी सारी ताकत नष्ट कर लेते हैं।
      यही हाल खेतों में भी होता है। जहाँ तक पानी के पहुँचने या निकास की व्यवस्था शायद ही कहीं होती हो। ऐसे मे पानी कम बरसे तब भी दिक्कत और ज्यादा बरसे तब तो दिक्कत ही दिक्कत। फसलें सड़ने लगती हैं क्योंकि पानी के निकलने का कोई रास्ता नहीं होता। कई बार किसान जब अपनी सड़ती हुई फसल नहीं देख पाते तो पानी किसी बगल के खेत में काट देते हैं। बस झगड़े की एक बड़ी पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है। ये कहानी साल दर साल ऐसे ही दुहराई जाती रहती है। पूछा जा सकता है कि इन लड़ाइयों का जिम्मेदार कौन है? क्या खुद किसान जो इन विकट स्थितियों से निकलने का कोई आसान सा रास्ता तलाश लेते हैं या फिर कोई और? गाँव में रास्ते की समुचित व्यवस्था करना या पानी के निकास के लिए नालियाँ तैयार करवाना ग्रामसभा का काम है तो खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए नालियाँ खुदवाने का काम सिंचाई विभाग का। खेतों से अतिरिक्त पानी के निकलने के लिए रास्ता बनाने का काम भी सिंचाई विभाग का ही है और इस पानी के संग्रह का काम सिंचाई विभाग और ग्रामसभा दोनों का है। सीधा सा मतलब है कि ये लड़ाइयाँ इस लिए होती है क्योंकि ये संस्थाएँ अपना काम नहीं कर रही हैं। इन कामों के लिए पैसा आता है और वह प्रधानजी की जेब में चला जाता है। सिंचाई विभाग का पैसा वहाँ के बाबू खाते हैं। यही नहीं जब किसान लड़ते हैं तो उनका पैसा पुलिस और प्रधान या दूसरे छुटभैये नेता मिलकर खाते हैं। सब कुछ ऐसे ही चलता रहता है। औ इनसे निकलने का कोई रास्ता नहीं बनता नहीं दिखाई देता।
      इसी तरह से ग्रामसभा का चुनाव भी तनाव और लड़ाइयाँ लेकर आता है। चुनाव लड़ने वाले और वोट देने वाले सभी गाँव के ही होते हैं। सभी के हित और झुकाव स्पष्ट होते हैं। एक एक घर के वोटों की गिनती होती है। कौन परदेश में है कौन गाँव में सबको पता होता है। पर घूँघट की आड़ में दूसरों के वोट भी डाल ही दिए जाते हैं। सभी पक्ष ऐसा करते हैं पर किसी की चोरी पकड़े जाने पर सभी एक हो जाते हैं और पकड़े गए व्यक्ति को फाड़ खाना चाहते हैं। ऐसे ही चकबंदी भी लड़ाइयों का मौसम होता है। चकबंदी इस बात का भी एक बड़ा उदाहरण है कि सही उद्देश्य को लेकर शुरू हुई योजनाएँ भी किस तरह से स्थानीय सत्ता संरचना और भ्रष्ट व्यवस्था की भेंट चढ़ गईं। चकबंदी इसलिए शुरू की गई कि किसानों की जमीनों के बिखरे हुए टुकड़ों को एक किया जा सके जिससे उनके लिए खेती आसान हो सके। खेतों तक पानी की पहुँच के लिए नालियाँ और आने-जाने के लिए रास्ते तैयार किए जा सकें। पर लेखपाल पदनाम का एक अदना सा कर्मचारी इन दिनों प्रधानमंत्री से भी ज्यादा ताकतवर हो जाता है। गाँवों के घर घर मुकदमें में फँस जाते हैं और ये मुकदमें लंबे समय तक उनके लड़ने की वजह बने रहते हैं।
      कुल मिलाकर यही है आज के गाँव की तसवीर। यही हैं ग्लोबल विलेज वाले दौर के असली गाँव। अनेक मामलों में तेजी से बदलते हुए पर अनेक मामलों में जस के तस जड़ या ठस बने हुए। जैसे जाति की जकड़न जिसने थोड़ा बहुत रूप भले ही बदल लिया है पर कम होने का नाम नहीं ले रही। पर बीच में कुछ अच्छॆ संकेत भी दिखने लगे हैं। शिक्षा के प्रति जागरूकता गाँवों में भी बढ़ी है। लोग कष्ट सहकर भी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि इसमें अभी सवर्ण कही जाने वाली जातियों के लोग ही अधिक हैं। साथ में दूसरी जातियों के अपेक्षाकृत संपन्न लोग भी हैं पर उनकी संख्या अभी भी कम ही है। गाँव के ज्यादातर बच्चों के लिए अभी भी सरकारी प्राथमिक पाठशालाएँ हैं पर मुफ्त किताबें, ड्रेस और दोपहर को मिलने वाले भोजन के बावजूद उनमें बच्चे दिन पर दिन कम होते जा रहे हैं। उनकी जगह कुकुरमुत्तों की तरह से उग आए प्रायवेट स्कूल ले रहे हैं। एक और बात है जो बेहद महत्वपूर्ण लगती है मुझे। भले मजबूरी में ही सही पर सवर्ण भी श्रम करना सीख रहे हैं। गाँव में बचे हुए सवर्ण जातियों के लोग भी अब अक्सर अपने खेतों में काम करते हुए देखे जा सकते हैं जो आज के बीस-पचीस साल पहले एक दुर्लभ दृश्य होता था। यथार्थ की मार उनके झूठे अहंकार पर भारी पड़ रही है।

फोन : 08275409685

ई-मेल : chanduksaath@gmail.com

Thursday, April 28, 2016

आंसुओं के माध्यम से कही गयी प्रेम कहानी

फ्रेंच लेखक डाविड फोइन्किनोस के उपन्यास डेलिकेसी' का एक अंश. यह उपन्यास हिंदी में  'नजाकत' के  नाम  से  राजपाल एंड  सन्ज प्रकाशन से  प्रकाशित  हुआ  है. अनुवाद मैंने किया है- प्रभात रंजन 
================================================================            

मार्कस की छोटी सी प्रेम कहानी, उसके आंसुओं के माध्यम से कही गई.

सबसे पहले और सबसे बढ़कर, उसके बचपन के आंसुओं को छोड़कर, अपनी माँ और स्कूल में अध्यापिका के सामने बहाए गए आंसुओं को छोड़कर. ये अकेले आँसू थे जिसकी वजह रोमांटिक थी. तो, नैटेली के सामने रोकने की कोशिश करते उन आंसुओं के सिवा, इस तरह के दो मौके और आये थे.

पहले आँसू का सम्बन्ध स्वीडेन से थे, जिसका सम्बन्ध एक युवा लड़की से था जिसका नाम था मर्लिन. बहुत स्वीडिश किस्म का नाम नहीं था, लेकिन निश्चित रूप से मर्लिन मुनरो की लोकप्रियता की कोई सीमा नहीं थी. मर्लिन के पिता सारी उम्र उसके बारे में सपना देखते रहे, और उनको इसे बेहतर कुछ और नहीं लगा कि उसका नाम मर्लिन के नाम पर रख दिया जाए. इस बात के मनोवैज्ञानिक खतरों के बारे में कुछ बात न की जाए कि अपने प्रेम कल्पना के नाम पर बेटी का नाम रख दिया जाए. मर्लिन के पिता का इतिहास हमारे लिए एक तरह से गैर जरूरी था, नहीं?

मर्लिन उत्सुकता जगाने वाली उन औरतों के वर्ग से आती थी जो अपने दिमाग को जानती थी. विषय चाहे कुछ भी हो, वह हमेशा अनिश्चित से विचार रख देती थी. तब भी यह बात आती थी जब उसकी सुन्दरता की बात आती थी: हर सुबह वह चेहरे पर सितारों सा भाव लिए जगती थी. हमेशा खुद को लेकर निश्चिन्त रहने वाली, वह हमेशा पहली पंक्ति में बैठती थी, कई बार वह अपने पुरुष शिक्षकों को अपने हाव भाव के सामने दुनिया की राजनीति के विषयों को भूलने के लिए मजबूर कर देती थी. जब वह किसी कमरे में घुसती थी तो पुरुष उसे देखकर कल्पना में खो जाते थे, और महिलाएँ स्वाभाव वश उससे नफरत करती थी. वह सबकी कल्पना का हिस्सा बन गई थी, जो उसके ही ऊपर पड़ गया. फिर उसको उनके उत्साह के ऊपर पानी फेरने का एक बहुत ही अच्छा ख़याल आया: कि सबसे बेकार लड़के के साथ प्यार किया जाए. जिससे पुरुष परेशान होंगे, और महिलाओं को चैन मिलेगा. मार्कस वह भाग्यशाली था जिसका चुनाव किया गया. बिना इस बात को समझे कि आखिर क्यों जो सारी दुनिया का केंद्र थी वह उसमें रूचि दिखा रही थी. यह कुछ वैसी ही बात थी कि अमेरिकी दिन के खाने पर लिचेंस्टीन को बुलाये. उसने उसको लेकर कुछ अच्छी अच्छी बातें की, यह दावा भी किया कि वह उसकी तरफ खूब देखती थी.

लेकिन तुम मुझे देख कैसे सकती हो? मैं तो कक्षा में हमेशा पीछे की तरफ बैठता था. जबकि तुम हमेशा पहली पंक्ति में.

मेरे गर्दन कि पिछला हिस्सा मुझे सब कुछ बता देता है. मेरे गर्दन के पीछे के हिस्से में आँखें हैं’, मर्लिन ने कहा.

उनकी समझ इस बातचीत से बढ़ी.

एक ऐसी समझ जिसे देखकर सबकी आँखें चढ़ गई. उस शाम सबकी खुली आँखों के नीचे वे स्कूल से साथ साथ निकले. उस समय के दौरान, मार्कस उतना जागरूक नहीं हुआ था. वह जानता था कि वह उतना आकर्षक नहीं था, लेकिन एक ख़ूबसूरत महिला के साथ उसे वह उतना अस्वाभाविक नहीं लग रहा था. उसने हमेशा यह बात सुनी थी, ‘महिलाएँ पुरुषों की तरह से उथले नहीं होते हैं, उनके लिए सुन्दरता का उतना महत्व नहीं होता है. महत्वपूर्ण बात होती थी कि वह सुसंस्कारी हो और मन लगाने वाला.इस कारण वह कई वजहों से बेवकूफ था और उसने अपने दिमाग का नमूना देने का प्रयास किया. जिसमें कुछ सफलता मिली, यह कहा जाना चाहिए; इसलिए उसका फुंसीदार चेहरा एक सुन्दरता की आभा के पीछे छिप गया.

लेकिन यह जादू उस दिन बिखर गया जब सेक्स का मसला आया. मर्लिन ने निश्चित रूप से बहुत से प्रयास किये थे, लेकिन जिस दिन उसने उसके सुन्दर स्तनों को छूने की कोशिश की वह अपने हाथों के ऊपर नियंत्रण नहीं रख सकी और उसकी पांच उंगलियाँ मार्कस के हैरान गालों पर जा पड़ी. वह पीछे मुड़ा शीशे में अपना चेहरा देखने के लिए और अपने गालों पर पड़े लाल निशान को देखकर स्तब्ध रह गया. उसे लाल रंग हमेशा याद रहा और उस रंग को वह ठुकराए जाने से जोड़ कर देखने लगा. मर्लिन ने यह दावा करते हुए माफ़ी मांगी कि उसका हाथ बस भावनावश उठ गया था, लेकिन मार्कस वह बात समझ गया था जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. कुछ पाशविक और अंदरूनी बात: उसने उसे बद्दुआ दी. उसने उसकी तरफ देखा और रोना शुरू कर दिया. हर शरीर की अभिव्यक्ति का अपना तरीका होता है.

यह पहली बार था जब वह किसी औरत के सामने रोया था.

उसने स्वीडेन से सहायक डिग्री हासिल की और फ्रांस जाने का फैसला किया. उस देश में जहाँ महिलाएँ मर्लिन नहीं होती. अपने पहले रूमानी प्रसंग से उसे दुःख हुआ और उसके भीतर एक तरह का आत्म बचाव का भाव विकसित हो गया. हो सकता है कि वह जीवन में किसी ऐसे रास्ते पर चले जो कि कामुकता का विकल्प हो. उसे पीड़ा से डर लगता था, उसे न चाहे जाने से डर लगता था, उसके पास अपने कारण थे. वह वह अंदर से बड़ा कोमल था, लेकिन उसको इस बात का इल्म नहीं था कि नजाकत जो होती है वह महिलाओं को छू जा सकती थी. तीन साल तक शहरी ढंग का अकेलापन बिताने के बाद, कभी प्यार न पा सकने की हताशा में उसने यह फैसला क्या कि एक स्पीड डेटिंग के सत्र में हिस्सा लिया जाए. उसके पास मौका होता सात महिलाओं से मिलने का और सभी से सात सात मिनट बात करने का. उसके जैसे इंसान के लिए वह बहुत ही कम समय था: उसने सोचा कि उसे कम से कम सौ साल चाहिए जिसमें कि वह किसी महिला को इस बात के लिए मना सके कि वह उसके साथ उसके जीवन के सीमित पथ पर चले. लेकिन कुछ अजीब हुआ: पहली मुलाकात के दौरान उसे कुछ ऐसा महसूस हुआ जो सामान्य था. उस लड़की का नाम था एलिस, और वह एक दवा दुकान में काम करती थी जहाँ वह कभी कभी सौन्दर्य सामग्री की दुकान का काम देखती थी(यह अजीब बात थी कि एलिस नाम की लड़की दवा दुकान में काम करती थी. आम तौर पर एलिस नाम की लड़कियां किताब की दुकानों या यात्रा सम्बन्धी काम में पाई जाती थी). सचाई कहूँ, तो वे दोनों वहां के कार्यकलापों से इतने असहज हो चुके थे कि वे दोनों ही एक दूसरे से सहज हो गए. जिसका नतीजा था, उनकी बातचीत आदर्श रूप से उलझावों से मुक्त थी. तय समय के बाद उन्होंने फिर सात मिनटों की मांग की. जो दिन बन गए, फिर महीने.

लेकिन उनकी कहानी एक साल तक नहीं चल पाई. मार्कस तो बहुत चाहता था लेकिन एलिस उसे पसंद नहीं करती थी. सबसे मार्के की बात यह थी कि वह उसकी तरह उतना आकर्षित नहीं हुआ था. बड़ी विकट स्थिति थी: एक बार वह किसी अच्छी से मिला और उसे उससे बिलकुल ही प्यार नहीं था. क्या हम हमेशा अपूर्ण के लिए अभिशप्त हैं? उनके सम्बन्ध जितने हफ्ते भी चले उसने दम्पति होने के बारे में कुछ सीखें हासिल की. उसने इसकी ताकतों की खोज की प्रेम किये जाने को महसूस किये जाए की क्षमता को समझा. चूँकि एलिस बुरी तरह से प्यार में थी. किसी के बारे में यह जानकारी परेशान करने वाली हो सकती थी कि उसे सिर्फ माँ का प्यार मिला(या शायद वह भी नहीं). मार्कस के बारे में एक बात थी जो बड़ी प्यारी और दिल को छू जाने वाली थी, उसमें एक तरह की आश्वस्त करने वाली क्षमता एवं दिल को पिघला देने वाली कमजोरी का मेल था. और ठीक यही कमजोरी थी जिसने उससे अवश्यम्भावी को करवाया- एलिस को छोड़ देना. लेकिन एक सुबह उसने यही किया. उस युवती की पीड़ा ने उसे स्पष्ट रूप से बहुत गहरे चोटिल कर दिया था. शायद उसकी अपनी पीड़ा से बढ़कर. वह आंसू नहीं रोक पाया, लेकिन वह यह जानता था कि यह फैसला सही था. उसने दोनों दिलों के बीच गहरी दरार बनाकर अकेले रहने को चुना.

यह दूसरी बार था जब वह किसी औरत के सामने रोया.

उसके बाद से करीब दो साल तक उसके जीवन में कुछ नहीं घटित हुआ. वह एलिस को भूलने लगा. विशेषकर तब जब स्पीड डेटिंग के सत्रों में वह उसके बाद गया, जो काफी निराश करने वाले थे- बल्कि कहना चाहिए कि शर्मनाक- जब कोई लड़की उससे बातचीत करने की कोशिश भी नहीं करती थी. जिसका नतीजा यह हुआ कि उसने उनमें और नहीं जाने का फैसला किया. उसने किसी के साथ रहने के बारे में सोचना भी शायद छोड़ दिया था? उस समय उसे उसमें कोई ख़ास रूचि भी नहीं रह गई थी. आखिरकार, लाखों लोग अकेले हैं. वह भी किसी औरत के बिना रह लेगा. लेकिन वह यह बात अपने आपको दिलासा देने के लिए कहता था ताकि वह यही न सोचता रहे कि उसकी अवस्था कितनी दुखद हो गई थी. वह  औरतों के शरीर के बारे में इतने सपने देखता था, और कई बार वह यह सोचने भी लगता था कि उसे यह अब कभी नहीं मिलेगी. कि सुन्दरता को आकर्षित करने के लिए जो पारपत्र(पासपोर्ट) चाहिए होता है वह उसे खो चुका था.

और अचानक नैटेली ने उसे चूम लिया. उसकी प्रमुख और उसके ख्यालों में आने वाली एक स्वाभाविक पसंद. फिर उसने उसे यह समझा दिया कि यह तो कभी था ही नहीं. इसलिए उसे इस बात का आदी हो जाना चाहिए. यह असल में उतनी बड़ी बात नहीं थी. तो भी वह रोया. हाँ, आँसू उसकी आँखों से ढुलक पड़े, और इस बात से उसे हैरानी हुई. अयाचित आँसू. क्या वह कमजोर था? नहीं, बात यह नहीं थी. इससे पहले भी उसकी कई बार बुरी हालत हो गई थी. बात बस यह थी कि वह इस चुम्बन से खास तौर पर हिल गया था; केवल इस कारण से नहीं कि नैटेली सुन्दर थी, बल्कि उसके पागलपन भरे काम के कारण भी. उसे इस तरह से पहले किसी ने नहीं चूमा था, उसके होंठों से बिना मिलने का समय लिए. यही वह जादू था जिससे उसकी आँखों में आँसू आ गए. और अब, निराशा के कड़वे आँसू.

=======================       
पेपरबैक में उपन्यास की कीमत 295 रुपये है.        




Tuesday, April 26, 2016

एक अनुवाद पुस्तक जो अनुवाद के मानक की तरह है!

 क्या सच में हिंदी की दुनिया बदल गयी है, बदल रही है. एक जमाने में अच्छी किताबों की चर्चा हुआ करती थी, आज उनको नजरअंदाज कर दिया जाता है. ऐसा ही एक अनुवाद जाने माने आलोचक, अनुवादक मदन सोनी द्वारा किया हुआ आया है- खाली नाम गुलाब का. अम्बर्तो इको के उपन्यास ‘द नेम ऑफ़ द रोज’ का हिंदी अनुवाद. अम्बर्तो इको के इस उपन्यास को एक जमाने में उत्तर आधुनिक उपन्यास के उदाहरण की तरह देखा जाता था. यह बताने के लिए कि किस तरह से उत्तर-आधुनिक रचनात्मकता में पैरोडी की शैली काम करती है. आर्थर कानन डायल की किताब ‘द हाउंड ऑफ़ बास्करविले’ की पैरोडी की तरह लिखा गया यह उपन्यास अपने आप में अपराध कथा की तरह है, लेकिन ज्ञान और उसके एकाधिकार को लेकर मध्यकालीन चर्चों में होने वाली राजनीति को यह उपन्यास बहुत रोचक शैली में सामने लाता है.

मदन सोनी ने इसका अनुवाद किया है. करीब 16-17 साल पहले इस किताब की मदन जी ने एक समीक्षा लिखी थी और मुझे लगता है कि तभी से इस पुस्तक का अनुवाद करने का ख़याल उनके मन में रहा होगा. बरसों की साधना से कोई अनुवाद नहीं करता. अनुवाद हिंदी में प्रोजेक्ट की तरह नहीं किये जाते हैं, प्रकाशक किताब चुनता है और निश्चित समय अवधि में अनुवादक अनुवाद पूरा कर देता है. लेकिन यह एक ऐसा अनुवाद है जिसको लेखक ने चुना और अनुवाद पूरा किया, बरसों इसके प्रकाशन का इन्तजार किया. आम तौर पर किताबों के राइट प्रकाशक लेता है, फिर अनुवाद की पुस्तक प्रकाशित हो पाती है.

इस तरह के अनुवाद के लिए अनुवादक को सलाम ही किया जा सकता है. असल में इस किताब की एक बड़ी मुश्किल है कि इसमें मध्यकालीन यूरोपीय सन्दर्भ आये हैं, चर्चों के, मध्यकालीन यूरोपीय राजनीति के, जिसके कारण यह किताब अंग्रेजी में मुझे पढने में दुरूह लगी थी. मैंने इसके ऊपर इसी नाम से बनी फिल्म देखी जिसमें सीन कॉनरी ने अभिनय किया है. लेकिन फिल्म की अपनी सीमा होती है, उसमें विस्तार में जाने का अवकाश नहीं होता है.

मैंने पहली बार एक ऐसा अनुवाद देखा है जिसमें अनुवादक ने पूरी कोशिश की है कि हिंदी में पाठकों को यह स्वतंत्र पुस्तक के रूप में समझ में आये. इसके लिए मदन सोनी ने पुस्तक के अंत में एक लम्बा परिशिष्ट दिया है, करेब 30 पन्नों का जिसमें उन्होंने पुस्तक में आये सभी सन्दर्भों को को अपनी तरफ से समझाने की कोशिश की है.

यह एक ऐतिहासिक सन्दर्भों वाली पुस्तक है और इसका अनुवाद भी ऐतिहासिक बन पडा है. मदन जी भाषा के अनेकरूप प्रयोगों से अच्छी तरह वाकिफ हैं इसलिए कहीं भी भाषा में झोल नहीं आ पाया है, न ही भाषा कहीं दुरूह बनी है. एक कठिन पुस्तक का इनता सुबोध, रोचक अनुवाद किस तरह संभव है ‘खाली नाम गुलाब का’ उसके मानक की तरह है. ‘इंटरप्रेटेशन ओवरइंटरप्रेटेशन’ के लेखक अम्बर्तो इको के इस उपन्यास की अनेक व्याख्याएँ होती रही हैं, एक व्याख्या अनुवाद ने भी की है. अनुवाद भी एक रचनात्मक विधा है उसका सबसे अच्छा उदाहरण यह पुस्तक है. शीर्षक में ही रचनात्मकता झलकती है- खाली नाम गुलाब का.

यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे मैं हमेशा अपने पास रखना चाहूँगा. बहुत कम किताबें आपके मन में ऐसी खवाहिश जगाती हैं.

पुस्तक का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन ने किया है. इतालवी भाषा में यह उपन्यास 1980 में प्रकाशित हुआ था अंग्रेजी के रास्ते हिंदी में आते आते किताब को 30 साल से ऊपर लग गए.

अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ कि एक अनुवादक के रूप में इस किताब से काफी कुछ सीखने को मिला. प्रेरक अनुवाद के लिए मदन सोनी को साधुवाद!

हार्डबाउंड में यह किताब 800 रुपये की है.