Friday, August 22, 2014

मल को कमल बनानेवाले पुराणकार आचार्य रामपदारथ शास्त्री की जय हो!

आलोचक संजीव कुमार इन दिनों किसी 'सबलोग' नामक पत्रिका में व्यंग्य का एक शानदार स्तम्भ लिखते हैं 'खतावार' नाम से. अब चूँकि वह पत्रिका कहीं दिखाई नहीं देती है इसलिए हमारा कर्त्तव्य बनता है कि अनूठी शैली में लिखे गए इन व्यंग्य लेखों को आप तक पहुंचाएं. यह नया है और कमाल का है- मॉडरेटर 
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इस बार रामपदारथ भाई का फ़ोन आया तो बड़े नाराज़ थे. बोले, ‘अरे, हम तुमको दिमागी तौर पर ही दीवालिया समझते थे, पर तुम तो नैतिक रूप से भी दीवालिया निकले!’

‘क्या हो गया, पदारथ भाई?’ मैंने किसी बड़े ख़तरे को सूंघते हुए उनका मूड हल्का करना चाहा, ‘मैं न तो किसी स्कैम में फंसा हूँ, न ही सेक्सुअल हरास्स्मेंट केस में. मोदी को लेकर आपसे डिफ़रेंस ज़रूर है, पर वह तो राजनैतिक मामला है, नैतिक नहीं!’

‘छोड़ो-छोड़ो, डिफ़रेंस-फिफरेंस सब नौटंकी है.’ पदारथ भाई हमलावर हुए, ‘तुम हो घुन्ना! मेरे सामने उलटा-सुलटा बात कहके हमसे बोलवाते हो और हमरे बतवा लिख-लिखके लेखक कहलाते हो. साला, बात हमारा और लेखक तुम! ई किसी स्कैम से कम है का? हमको तो पते नहीं चलता अगर कंकरबाग वाले महतो जी ‘सबलोग’ मैग्जिन्वा नहीं दिखलाए होते!’

मैं समझ गया, आज शामत आई... पर शामत ही है, कोई क़यामत तो नहीं! मैंने बिखरते आत्मविश्वास को इकठ्ठा किया और उनका मूड हल्का करने की दुरभिसंधि में जुट गया, ‘देखिये पदारथ भाई, दिमागी तौर पर मैं दीवालिया हूँ, यह तो आप जानते ही हैं. अब लेखक कहलाने की हसरत अन्दर ठाठें मार रही है. तो जो लोग अपने हैं, उन्हीं के दिमाग की तिजोरी से माल मारूंगा ना! किसी पराये से कैसे मारूं, बताइये!’

‘अच्छा बेटा, त हम ई सोच के संतोष कर लें कि घी कहाँ गिरा, थालिये में न!... अब कान खोल के सुन लो, हम घी गिरने ही नहीं देंगे. हमारा बात लिख के जो तुम लेखक बनोगे, सो  हमही काहे नहीं लेखक बन जाएँ? अब तुम कितनो छेड़ो, हम अपना अनमोल वचन बोलेंगे ही नहीं.’

इस बात गुस्सा न आना निर्वीर्य होने का प्रमाण था, सो मैंने आने दिया. थोड़े तैश में कहा, ‘ऐसा है सर जी, आपकी जिन बातों को मैं लिख मारता हूँ, उनका मज़ा तभी तक है जब तक वे एक कैरेक्टर के मुंह से निकलती हैं. आप भला खुद उन्हें कैसे लिखेंगे? अगर आप उन बातों को अखबार के अग्रलेख के रूप में लिखें तो यकीन मानिए, वे दो कौड़ी की ठहरेंगी. कोई छापने को राज़ी न होगा. ऐसा अछ्प्य लेखक बनने से तो अच्छा है, एक बिंदास कैरेक्टर बन कर ही लोगों के बीच रहिये... भाई जी, लेखन का कंटेंट अपने फॉर्म के साथ पैदा होता है. फॉर्म बदल दीजिये, सारा गुड़गोबर हो जाएगा.’

शायद तैश में आने का कुछ असर हुआ. पदारथ भाई नरम पड़े. बोले, ‘देखो, कंटेंट और फॉर्म, ई सब तो हम जानते नहीं हैं, लेकिन आईडिया हमारे पास है. लाओ कुछ नकद नारायण, तब हम आईडिया का उल्टी करेंगे, और का?’

‘नकद नारायण!’ मुझे हंसी आ गयी, ‘आज तक अपने किसी लिखे पर मुझे एक छदाम नहीं मिला, और आप कह रहे हैं कि...’

‘नहीं मिला त लिख काहे रहे हो? इससे तो अच्छा है, दीनानाथ बत्रा या आई सी एच आर वाले राव साहब का घोस्ट राईटर बन जाओ. १०८ बार भारतीय संस्कृति लिखोगे, उसीमें हज़ारों का कमाई हो जाएगा. और कुछ नहीं त एक ठो पुराण लिख मारो. अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना वाला लोग मालामाल कर देगा.’

‘पुराण?’ मैं चौंका. 

‘हाँ भाई, पुराण!’ पदारथ भाई बोले, ‘इसमें चौंकने वाला कौन बात है! आर एस एस का पुरानान्तार्गत इतिहास वाला प्रोजेक्ट के बारे में सुने नहीं हो? अभी से लेके २०२५ तक, माने आर एस एस की सौवीं सालगिरह तक इस प्रोजेक्ट पर काम चलेगा और एक खांटी देसी इतिहास लिखा जाएगा. १०६ पुराण तो ऊ लोग उपरा चुका है. एक ठो तुम भी लिख के ठेल दो, फिर देखो मजा.’

‘लेकिन पदारथ भाई, पुराण आज के जमाने में कैसे लिखा जा सकता है?’

‘अरे आज के ज़माना में नहीं लिखा जा सकता है त पुराना ज़माना में चले जाओ, और का! लगता है, तुम दूधनाथ सिंह वाला ‘आख़िरी कलाम’ नहीं पढ़े हो.’

‘वो पुराण शैली में लिखा हुआ है?’

‘अरे नहीं मरदे! उसमें एक जगह पुराण लिखने का भेद बताया है. कैसे साला मल को भी कमल ठहराया जा सकता है! उसमें एक ठो महंथ है, एकदम जब्बर राजा स्टाइल में रहने वाला. जिस गुरु से ई पूरा ठाठ बाट मिला है, उसको याद करके बार बार रोने लगता है. सच्चाई है कि गुरुआ का मर्डर ऊ खुद किया है. लेकिन कहता है कि गुरु तो सनातन हैं, अजर-अमर हैं, वे सिर्फ अलोप हुए हैं. उनकी अलोप-कथा को मह्न्थवा एक नया पुराण कहता है जिसको ऊ रचने जा रहा है. ‘रचूंगा ज़रूर, कभी फुर्सत से. इसी तरह गुरु-ऋण से उऋण हो पाऊंगा.’ अब अलोप-कथा क्या है? सुनो, उपन्यास में से ही सुना रहे हैं :  बहराइच में हमारा एक मठ है. पुरानी माफी है हज़ार बीघे की. तब हम वहीं रहते थे. हम अक्सर कहते थे, ‘गुरु जी, जर-जमीन बहुत बड़ा टंटा है. गेरुआ पहने अक्सर कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं. तप में बाधा पड़ती है. छोड़िये सब, चलकर साकेतधाम में निवास करें या फिर रक्षार्थ हथियार उठाने की आज्ञा दीजिये.’ हमारे गुरुदेव इस पर कहते थे, ‘अचेतानंद, हथियार खुद को मारता है. उसे कभी पास न रखो. वह आत्मवध का प्रतीक है. और मारनेवाला तो हमेशा अदृश्य रहता है. वह कब प्रकट होगा, तुम नहीं जानते. फिर भी मेरे बाल-हठ पर वे मान गए और इजाज़त दे दी. तब से यह साथ है. (पास में रखा हुआ बंदूकवा के बारे में कह रहा है.) कितना पछताता हूँ, अगर उस दिन भी साथ होती. लेकिन जल्दी-जल्दी में बिसर गया. हमारे गुरु को खुले में निबटने की आदत थी. वे निकलते तो मैं पीछे-पीछे जल-पात्र लिए चलता और मुंह फेर कर खड़ा हो जाता. उस दिन भी वैसे ही खड़ा रहा और प्रतीक्षा करता रहा कि मेरे गुरु की गहन गुरुवाणी सुनाई पड़ेगी, ‘लाओ.’ लेकिन तभी में क्या सुनता हूँ कि गुरु सिंह की गर्जना में हँसे. मैंने पलट कर देखा तो मेरी घिग्घी बंध गयी. क्या देखा मैंने? अजगुत... अभूतपूर्व! मैंने देखा, मेरे गुरु सुनहरी अयालोंवाले सिंह पर सवार हैं और सिंह हंस रहा है. मेरे गुरु मुड़कर देख रहे हैं और वे भी हँसते जा रहे हैं, हँसते जा रहे हैं. मेरा मुंह जो खुला तो बंद होने का नाम ही न ले. फिर मैं एकाएक धाड़ मारकर रो पड़ा. रोते-रोते चिल्लाने लगा, ‘लौट आइये गुरुदेव, लौट आइये.’ तब गुरुदेव की वाणी की जगह सिंह की वाणी सुनाई पड़ी, ‘यह जो महात्मा मेरी पीठ पर सवार हैं, तुम उनके उत्तराधिकारी हो.’ मैं फिर चिल्लाया, ‘लौट आइये गुरुदेव!’ लेकिन वे नेपाल, भूटान फिर तिब्बत होते हुए अन्तरिक्ष में अलोप हो गए. उनकी छवि एकाएक मिट गयी और सर्वत्र अन्धकार छा गया. तबसे यह अंधकारग्रस्त मन लिए मैं इस नश्वर संसार में भटक रहा हूँ.’

अंश पढ़ कर सुनाने के बाद पदारथ भाई ने आधे मिनट का पॉज़ लिया. फिर पूछा, ‘मामला समझ रहे हो ना?’

‘जितना दिमाग है, उतने भर तो समझ रहा हूँ.’

‘अब ज़्यादा दिमाग लगा के बेसी सवाल-उवाल खड़ा मत करना. काहे कि गुरु का कोप चढ़ गया त खड़े-खड़े टें बोल जाओगे. अचेतानंद का आदेश था अपने सैनिकवन सब को कि यही अलोप-कथा सबको बताना है. फिर एक दिन क्या हुआ, सुनो : एक बाल-जिज्ञासु आया. बारादरी पर तैनात रक्षक ने पूछा, ‘कैसे आये?’ उसने पूछा, ‘स्वामी दिव्यानंद जी का स्वर्गवास कैसे हुआ?’ रक्षक ने डांटा कि स्वर्गवास नहीं हुआ और सविस्तार बखान दिया. बाल-जिज्ञासु ने कहा, ‘यह हो नहीं सकता.’ बस फिर क्या था! वह गली में ही मूर्छित हो गया. पुलिस उसे टांग कर ले गयी और चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो गयी. मेरे गुरु की अलोप-कथा पर उसने शंका की, उसी का यह फल था. मेरे गुरु का कोप चढ़ बैठा. अब सोचो, इसी स्टाइल में अगर भाजपाइयों के हर लौकिक खून-खच्चर को अलौकिक शक्तियों के वरदान-अभिशाप में बदल दिया जाए त नया पुराण बन जाएगा कि नहीं! मल का कमल में रूपांतरण! शुरू करो ‘एकदा-आर्यावर्ते-कच्छ-सौराष्ट्र-प्रान्ते-हर-हर-मोदी:-नाम्नी-अवतारस्य-शासनान्तार्गते’ से, और फिर विस्तार से बताओ कि कैसे रामभक्तों के प्रति बुरे भाव रखने वाले मलेच्छों की एक-के-बाद-एक मृत्यु होती गयी, महामारी सी फैल गयी - मियांमारी नहीं, महामारी - फिर कैसे सबको रामभक्ति का माहात्म्य समझ में आया और हर हर मोदी नामक अवतार को अभूतपूर्व स्वीकृति मिली और कालान्तर में वह सम्पूर्ण आर्यावर्त का हृदय-सम्राट बना. बेटा, अभी भी कह रहे हैं, ऊल-जलूल लिखना छोड़ के पुराणकार बन जाओ. भगवत्कृपा से सात पुश्त बैठ के खायेगा.’

कहने के बाद पदारथ भाई क्षण भर को ठहरे. फिर बोले, ‘लेकिन हमको पता है, तुम साला ऊल-जलूल लिखने से बाज नहीं आओगे. भगवत्कोप के शिकार हो जाओ त हमको मत कहना.’ कह कर पदारथ भाई ने फ़ोन रख दिया और मैंने मन-ही-मन उन्हें धन्यवाद दिया कि गुरु ने बिना जताये-बताये ऊल-जलूल की एक और खेप मुहैया करा दी. जय हो पुराणकार गुरुदेव आचार्य रामपदारथ शास्त्री की!    

 

  

Wednesday, August 20, 2014

वीभत्स रस और विश्व सिनेमा

युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर इन दिनों बहुत रोचक ढंग से नौ रस के आधार पर विश्व सिनेमा का अध्ययन कर रहे हैं. आज वीभत्स रस के आधार पर विश्व सिनेमा की कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों का विश्लेषण प्रस्तुत है- मॉडरेटर 
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इस लेखमाला में अब तक आपने पढ़ा:
1.                  भारतीय दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र : http://www.jankipul.com/2014/07/blog-post_89.html
2.                   भयावह फिल्मों का अनूठा संसार: http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_8.html

इसी में तीसरी कड़ी है वीभत्स रस की विश्व की महान फिल्में।
अब आगे :-

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वीभत्स रस और विश्व सिनेमा


वीभत्स रस पर चर्चा करने से पहले कुछ आपत्तियों को खारिज कर देना उचित होगा। सौंदर्यशास्त्री श्रीयुत कोहल ने पत्र लिख कर अपनी आपत्ति से अवगत कराया है कि जैसा कि पहले के लेख में लिखा है कि नाटक  बुराई पर अच्छाई की विजय का उद्घोष लिए, ज्ञान का मशाल लिए, सत्य का जयगान लिए कल्याणकारी संगीत है, इससे वह पूरी तरह असहमत हैं। केवल असहमत हैं वरन उनका कहना है कि प्राचीन भारतीय सौंदर्यशास्त्र का मानक ग्रंथ, यानि भरतमुनि का पाँचवा वेद नाट्यशास्त्र इस विचार के विपरीत अच्छे-बुरे का पक्ष नहीं लेता। इसी सिद्धांत पर यह फिल्मों पर भी कतई लागू नहीं हो सकता।

मैं उनकी आपत्ति को पूरी तरह स्वीकार करता हूँ। नाट्यशास्त्र के अनुसार जब मानव स्वभाव इसके दु:ख-सुख के साथ अनुभावों के द्वारा दर्शाये जायेंगे, तब वह नाटक कहलायेगा। ब्रह्मा के अनुसार नाटक दैत्य और देवों, दोनों के लिये अच्छा या बुरा हो सकता है। फिर भी मैं अपनी कही बात रखना चाहूँगा कि तरह-तरह ज्ञान से मानव अच्छाई ही तो ग्रहण करता है। यह किसी तरह से आवश्यक नहीं है, पर मानवता पर मेरा विश्वास है। इसकी सत्यता निर्धारित करना पाठकों का काम है। यह और बात होगी कि तीनों कालों में ऐसे अनगिनत उदाहरण मिलते रहेंगे जो नाटक-फिल्मों से बुराई ही ग्रहण करेंगे, तदुपरांत कला माध्यम दोनों को दोष देंगे।  फिल्मों औऱ कला के माध्यम से नैतिकता और सदगुणों का प्रभाव- संचार भी सौंदर्यशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रश्नों में एक है। इस पर वाद-विवाद और शास्त्रार्थ इस लेखमाला के विषय वस्तु से हट कर है और हम अपने अध्ययन को कुछ श्रेष्ठ और जटिल फिल्मों तक सीमित रखते हैं, क्योंकि विश्व के सारे प्रबुद्ध लोग मिल कर अज्ञान से प्रकाश की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे होते हैं। अध्ययन के क्रम में विश्वास अत्यंत आवश्यक है। इसकी सत्यता की जाँच-परख अध्ययन के उपरांत की जाती है।

श्रीयुत कोहल के विनम्र आग्रह से नाट्यशास्त्र के अनुसार रसों और स्थायीभाव पर थोड़ा सा प्रकाश डालते हैं।  हमने भय रस के अध्ययन के दौरान समझा कि हमें भय के अनुभूति के लिये कुछ कारण होना चाहिये - जैसे कि निर्जन स्थान, भूत पिशाच, मृत्यु का भय यह कारण ही विभाव कहलाते हैं। इन विभावों से भाव की उत्पत्ति होती है। भाव के कारण अभिनेता उस भा‌‌ कुछ तरह से प्रकट करते हैं - जैसे हँस कर, रो कर, मूर्छित हो कर, शर्मा कर आदि! यह आचरण अनुभाव कहलाता है। भय रस की अनुभूति के लिये हम अभिनेताओं को चीखते, चिल्लाते, मूर्छित होते देखते हैं - यह अनुभाव हैं।

भाव तीन तरह के होते हैं - 1. स्थायी भाव (आठ तरह के) 2. व्यभिचारी भाव या संचारी भाव (तैंतीस तरह के) 3. सात्विक भाव (आठ तरह के)

विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से जब दर्शक के चित्त में स्थायी भाव स्थित हो जाता है, तब ही रस-निष्पत्ति होती है।  रस और उससे जुड़े स्थायी भाव निम्नलिखित है:-
1.                    भयानक रस भय भाव
2.                    वीभत्स रस –  जुगुप्सा भाव
3.                    अद्भुत रस विस्मय भाव
4.                    वीर रस उत्साह भाव
5.                    कारूण्य रस शोक भाव
6.                    रौद्र रस –  क्रोध भाव
7.                    हास्य रस हास भाव
8.                    शृंगार रस रति भाव
इसके अलावा परंपरा में तीन रस की और चर्चा होती है : - शांति रस (अभिनव गुप्त के अनुसार समस्त रसों का मूल रस), साहित्य में वात्सल्य रस और भक्ति रस ! पर फिल्मों के  अध्ययन के लिये हम परिश्रम उपरोक्त आठ रसों तक निहित रखेंगे।

नाट्य शास्त्र के अनुसार भयानक रस के लिये स्वेद, रोमांच (रोगंटे खड़े होना), स्वर भंगमरण, वैवर्ण्य, स्तंभन, और भय जैसे भावों से पहुँचा जा सकता है। वीभत्स रस के लिये अपस्मार (मिर्गी), व्याधि, उन्माद, विषाद, प्रलय (मूर्छित होना), मरन, भय आदि भाव से उत्पन्न होता है।

अब बात करते हैं वीभत्स रस की। प्रमुख समकालीन भारतीय दर्शनशास्त्री 'अरिंधम चक्रबर्ती'  ने वीभत्स रस पर अपनी टीका में सदाअत हसन मंटो की छोटी सी कहानी का जिक्र किया है। उन्हीं की टीका से आभार लेते हुये ये कहानी यहाँ उद्धृत की गयी है।

सदाअत हसन मंटो की कहानी: जेली

सुबह छः बजे पेट्रोल पम्प के पास हाथ गाड़ी में बर्फ़ बेचने वाले के छुरा घोंपा गया - - सात बजे तक उस की लाश लुक बिछी सड़क पर पड़ी रही और उस पर बर्फ़ पानी बन बन गिरती रही।
सवा सात बजे पुलिस लाश उठा कर ले गयी. बर्फ़ और खू़न वहीं सड़क पर पड़े रहे।
एक तांगा पास से गुजरा। बच्चे ने सड़क पर जीते जीते खू़न के जमे हुए चमकीले लोथड़े की तरफ देखा। उसके मुंह में पानी भर आया। अपनी माँ का बाजू़ खींच कर बच्चे ने उंगली से उसकी तरफ इशारा किया- "देखो मम्मी जेली"!

यह कँपा देने वाली घृणा और एक लाश की दशा का वीभत्स चित्रण है। बालक का खून को जेली कह कर इंगित करना, नरभक्षीपन की तरह इशारा सा करता है। कश्मीरी दार्शनिक अभिनवगुप्त के अनुसार नाटक में वीभत्स का चित्रण एक अलौकिक रसास्वादन है जिसमें इस शरीर की नश्वरता, क्षणभंगुरता, और क्षय होने की प्रवृत्ति याद जाती है। भरतमुनि के अनुसार वीभत्स रस में दो तरह के जुगुप्सा का वर्णन है - पहला, अरूचिकर जिसमें शरीर के मल, पील्लू, थूक, लसलसी लार जैसी अरुचिकर चीजों से अत्यंत घृणा उत्पन्न हो। दूसरा - आवेशित करने वाला वर्णन, जैसे रक्त, अंतड़ियाँ, शव का चित्रण।

यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि वीभत्स का रसास्वादन हो सकता है? प्राचीन भारतीय सौंदर्यशास्त्रियों ने इसे एक अलग रस क्यों माना? जिसे चीज से अतिरेक घृणा हो, वह सौंदर्य की वस्तु कैसे हो सकती है?
भारतीय सिद्धांतों मे प्राकृतिक सुंदरता को अध्ययन नहीं करते। हम इस बात की चिंता नहीं करते कि प्रात: काल में प्रत्यूष सुखकारी क्यों लगता है? बादल नदियाँ क्यों हमारा मन मोह लेती है? कई पाश्चात्य विद्वानों ने भी नैसर्गिक सुंदरता पर चिंतन के बजाये मानव जनित कला के रसास्वादन पर चिंतन किया है। अनुचित सौंदर्यबोध का ये हाल है कि कई नर-नारी सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त लोगों की सहायता करने के बजाये उनके दु:ख में सौंदर्य तलाशने लग जाते हैं और अपने मोबाइल पर उसकी वीडियो उतारने लगते हैं। यह वैचारिक दोष है और कर्त्तव्यविमुखता।
लेकिन किसी भी रचनात्मक व्यक्ति के लिये इच्छित भाव दर्शक/ पाठक/ श्रोता में लाने के लिये खासी मश्ककत करनी पड़ जाती है। किन्हीं परिस्थितियों में कलाकार को अपनी बात पहुँचाने के लिये वीभत्स रस का सहारा लेना पड़ता है। युद्ध कैसी विभीषिका वाली हो सकती है, हत्या कितनी जघन्य हो सकती है, उन्माद कितना वीभत्स हो सकता है - इनको दर्शाने के लिये नाटक/फिल्मों में वीभत्स का सहारा लेना पड़ जाता है।

वीभत्स और साधारण मार-धाड़ में बेहद फर्क है। हिंसा की पराकाष्ठा जब शरीर पर धृणास्पद प्रभाव उत्पन्न कर दे, तब जा कर वह सचमुच में वीभत्स हो जाता है। अत: बी आर चोपड़ा की 'इंसाफ का तराजू' में दर्शाया बलात्कार या प्रसिद्ध अमेरिकी निर्देशक Stanley Kubrick की A Clockwork Orange (1971) में नायक की घृणास्पद हरकतें जुगुप्सा भाव की श्रेणी में नहीं आते। हॉलीवुड में कई ऐसी फिल्में बनती हैं जिसमें अंग भंग करना आइसक्रीम खाने जितना आसान होता है जिनमें कुछ हैं - Saw (2004), Cannibal Holocaust (1980), The Thing (1982) इत्यादि। इसी तरह बहुचर्चित भयानक फिल्म The Exorcist (1973) में पिशाचग्रस्त बच्ची का पादरी पर हरी उल्टी करना, भय पैदा करने के लिये है, वीभत्सता के लिये नहीं।  जैसा कि हम जानते हैं कि कोई भी प्रस्तुति किसी एक रस की नहीं हो सकती, इसलिये हम फिल्म विशारदों की कुछ फिल्मों की चर्चा करते हैं जिसका उद्देश्य केवल दर्शकों को विचलित कर के उनके अंदर जुगुप्सा भाव का संचार करना हो कर, उससे कहीं बढ चढ कर था।

अमेरिकी निर्देशक Ridley Scott (1937- ) ने आवेशित कर देने वाले जुगुप्सा भाव जगाने वाली दो चर्चित फिल्में बनायी Alien (1979) और Hannibal (2001)। 
Alien फिल्म में लम्बी अंतरिक्ष यात्रा के बाद लौट रहे अंतरिक्ष विमान जब एक ग्रह पर जीवन ढूँढने जाता है, तब अनजाने में ही एक एलियन (अंतरिक्षवासी) उनके साथ उनके विमान पर चला आता है। जब अंतरिक्ष यात्री भोजन कर रहे होते हैं, ठीक उसी समय एक यात्री को मितली से आती है और उसके पेट को फाड़ कर वीभत्स हत्या सा करता अंदर से मछली- सरीसृपनुमा एलियन दाँत किटकिटाता बाहर निकल आता है।  https://www.youtube.com/watch?v=tRX2ntm2rXQ इस तरह वीभत्स की कल्पना केवल हाथ-पाँव काट देने, आँख-अतंड़ियाँ बाहर निकाल देने की सामान्य स्थिति से हट कर फिल्म इतिहास में अविस्मरणीय बन गया है। अगर इस फिल्म का इतिहास पढा जाये, तब पता चलता है कि एलियन की रूपरेखा पर जीव विज्ञान का गहन अध्ययन किया गया है। यह केवल कहानी की शक्ति नहीं, बल्कि दृश्य की कल्पनाशीलता और चित्रण कई लोगों के मानसिक परिश्रम का परिणाम थी। जब Ridley Scott ने The Silences of The Lambs (1991) की सीक्वेल Hannibal (2001) बनायी, तो डॉक्टर हैनीबल का चरित्र और कथानक उपन्यास से थोड़ा सा बदल कर पेश किया। फिल्म के अंत के एक भयानक दृश्य में एक शैतान डॉक्टर का बेमिसाल अभिनय करते हुये, हैनीबल का चरित्र एक आदमी का दिमाग उपरी हिस्सा खोल कर उसी के दिमाग का टुकड़ा तल कर उसे खिलाता है। इस दृश्य का पार्श्व संगीत, इसका फिल्मांकन, और अभिनेत्री की बेबसी जुगुप्सा जगाती है।
बेहतरीन फिल्मों में हिंसा का चित्रण करने में अगर किसी को महारथ हासिल है तो वह हैं अमेरिकी निर्देशक Quentin Tarantino (1963 - ) यह अपनी बहुचर्चित Reservoir Dogs (1992), Pulp Fiction (1994), Kill Bill ( Vol 1- 2003, Vol 2- 2004),  Inglourious Basterds (2009), और Django Unchained (2012) फिल्मों के लिये विख्यात हैं। इसमे Western Films औऱ Hongkong Martial Arts फिल्मों को श्रद्धांजलि देते हुये दो खण्डों में बनायी गयी Kill Bill ( Vol 1- 2003, Vol 2- 2004) में वीभत्सता की पराकाष्ठा है। एक आतंकी गिरोह की सदस्य अपना इंतकाम लेने के लिये बरसों बाद चार लोगों की हत्या करने निकलती है। रे निशी की हत्या से पहले एक बड़ी सेना को अपराजेय तलवार की बदौलत नायिका कत्ले आम मचा कर खत्म कर देती है। देखते ही देखते एक खूबसूरत लड़की बाँह काट देने से उसमें रक्त का फव्वारा फूट पड़ता है। खुद रे निशी भी एक सम्मेलन मे एक सदस्य की निर्ममता से सर कलम कर देती है। आधुनिक समाज में हत्या का दर्शन अमानविक, अदर्शनीय एवं दुर्लभ है। इसकी विभीषिका फिल्मों के माध्यम से दिखला कर समझायी जा सकती है।
Quentin Tarantino अपनी फिल्मोें में हिंसा से ठीक पहले बेहतरीन संवाद जैसे विभाव का प्रयोग करते हैं। इसमें अपमान, क्रोध, घृणा, द्वेष, गर्व जैसे भावों का चित्रण होता है। हिंसक दृश्यों में पश्चिमी क्लासिकल अॉपेरा की तर्ज पर उत्तेजित करने वाला संगीत का प्रयोग करते हैं।  Stanley Kubrick और Jean-Luc Godard भी अक्सर पश्चिमी क्लासिकल गानों का सहारा लेते हैं। लेकिन हमारे आज कल की हिन्दी फिल्मों में पार्श्व की बात तो छोड़ दिया जाये, गानों में भी शुद्ध राग सुनायी नहीं देता। यूरोप में लोग मेहनत से बकायदा संगीत की शिक्षा ले कर बाख, बीथोफेन, मोजार्ट, विवाल्डी, चायकोवस्की, द्वाराक जैसे महान संगीतकारों के संगीत संजो कर सदियों से बजाते रहे हैं। हिंदी भाषी क्षेत्रों में सर्वजन सुलभ पारंपरिक संगीत, लोक संगीत की संस्कृति खत्म हो सी गयी है। केवल कुछ विधिवत शिक्षा लेने वाले ही रागों को, बंदिशों को, सुरों को ठीक-ठीक पहचान पाते हैं।  नौशाद, मदन मोहन, जयदेव, शंकर जयकिशन, खय्याम, भूपेन हजारिका जैसे संगीतकार जो लोक संगीत, पारंपरिक संगीतों पर जोर दिया करते थे, अब वैसा कोई उदाहरण नजर नहीं आता।

अरुचिकर वीभत्स फिल्मों की चर्चा करते समय हम दो महान किंतु कठिन, अत्यंत प्रतिभाशाली पर दुर्गम फिल्म निर्देशकों की। इन दोनों का साहित्य से गहरा लगाव रहा और इन्होंने बड़ी कठिन और कालजयी फिल्में बनायी। पहले हैं  - इतालवी फिल्म निर्देशक, चिंतक, कवि, पत्रकार - Pier Paolo Pasolini (1922- 1975) और दूसरे ठहरे - अमेरिकी निर्देशक  David Lynch (1946 - )

डेविड लिंच महान लेखक फ्रैंज काफ्का, रूसी लेखक निकोलई गोगोल, भारतीय उपनिषदों से बेहद प्रभावित रहे हैं। वह अपनी फिल्म Eraserhead (1977), The Elephant Man (1980), Blue velvet (1986), Twin Peaks : Fire Walk with me (1992), Lost Highway (1997),  Mulholland Drive (2001) जैसी महान फिल्मों के लिये जाने जाते हैं।

उनकी पहली फिल्म Eraserhead में जुगुप्सा का विचित्र चित्रण है। भविष्य में किसी अजीब सी दुनिया में फिल्म का मुख्य पात्र हेनरी स्पेंसर जब अपने परिवार के साथ मुर्गा खा रहा होता है, तब तले मुर्गे चलने लगता है और उसमें से खून निकलने लगता है। उसकी गर्लफ्रेंड उन दोनों के बच्चे की जिम्मेदारी की संभालना नहीं चाहती, और उन दोनों को अकेला छोड़ कर चली जाती है। यहाँ हेनरी के नवजात बच्चे का रूप बड़ा ही अरूचिकर है - साँप जैसा चेहरा, पट्टियों में लिपटा लोथड़ा, पतली गर्दन, मरनासन्न भाव... इस फिल्म में महान मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड के सिद्धांतों का कथानक और रूपकों में प्रयोग किया गया है। फिल्म के अंत में हेनरी अपने बच्चे की पट्टियाँ कैंची से काटता है। यह हैरत की बात होती है कि बच्चे के आंतरिक अंग केवल पट्टियों के सहारे बंधे हुये थे। बच्चे की चीख के दौरान हेनरी कैंची की नुकीली धार अपने बच्चे के अंग में घोंप देता है, जिससे विचित्र द्रव की धार निकल पड़ती है। इसी तरह Elephant Man में शारीरिक विकृति का शिकार नायक, Blue velvet में कटे कानों से शुरूआत करता अंडरवर्ल्ड की रहस्यमयी थ्रिलर में जुगुप्सा जगाने की कोशिश की गयी है। डेविड लिंच के लिये फिल्म में संवाद के अपेक्षा, विचित्र कथानाक, उसमें मानव शरीर और दृश्य महत्वपूर्ण है।

पसोलिनी अपनी राजनैतिक, मार्क्सिस्ट, क्रांतिकारी विचारों के कारण करीब करीब कुख्यात रहे। उनकी प्रमुख फिल्में थी - The Gospel According to Matthew (1964),   Edipo re (1967), Teorema (1968), Boccaccio's Decameron (1971), Chaucer's The Canterbury Tales (1972), और Il fiore delle mille e una notte (literally The Flower of 1001 Nights या  Arabian Nights, 1974), और Salò o le 120 giornate di Sodoma या Salo, or the 120 Days of Sodom (1975). जब तक कि कोई उनकी The Gospel According to Matthew और The Flower of 1001 Nights नहीं देखेगा, और गलती से भी किसी ने Teorema या 120 Days of Sodom देख ली, तो पसोलिनी को पागल, विक्षिप्त, दुराचारी जैसे विशिष्ट विशेषणों से संबोधित करने से नहीं चूकेगा। मार्की डे सैड की कुख्यात काम उपन्यास पर बनी फिल्म 120 Days of Sodom के रिलीज होने के करीब बीस दिन पहले पसोलिनी की हत्या उन्ही की कार से कई बार रौंदे जाने से बड़ी वीभत्स तरीके से कर दी गयी थी। हत्या का कारण आज भी ठीक ठीक नहीं पता है।

पसोलिनी की आखिरी फिल्म आज भी आलोचकों और दर्शकों अचंभे में डाल देती है। कई देशों में आज भी 120 Days of Sodom देखने और प्रदर्शित करने पर प्रतिबंध लगा हुआ है। जबकि कई आलोचक इसे दुनिया की महानतम फिल्मों में गिनते हैं। पसोलिनी ने मूल कथा में बदलाव कर के, अठारहवीं सदी के फ्रांस के बजाये बीसवीं सदी के  फासिस्ट इटली में कथानक को रखा, जिसमें कई नवयुवक और नवयुवतियाँ कुछ शक्तिशाली नौकरशाह, सैन्य अधिकारी, न्यायाधीश, पादरी के सिपाहियों के द्वारा बंदी बना कर विशाल महल में रख दिये जाते हैं। यहाँ चार अधेड़ वेश्यायें के साथ मिल कर शक्तिशाली प्रतिष्ठित लोग युवक और युवतियों का घृणास्पद तरीके से यौन शोषण करते हैं। एक दृश्य में नवयुवकों और युवतियों को मानव मल खिलाया जाता है। इसका फिल्मांकन करने के लिये पसोलिनी ने काली चॉकेलेट का इस्तेमाल किया था। फासिस्ट गतिविधियों की मानसिक विकृति, निर्ममता दिखाते हुये, फिल्म का अंतिम दृश्य बड़ा ही वीभत्स है जिसमें युवकों की जीभ काटते हुये, आँखें निकालते हुये, फाँसी देते हुये दिखलाया जाता है। यह फिल्म पॉर्नोग्रॉफी नहीं है क्योंकि कोई भी इसके कथानक को पूरी तरह काम तृप्ति के लिये नहीं देख सकता। पश्चिमी विद्वान इसे हॉरर की श्रेणी में रखने की असफल कोशिश करते हैं। यह फिल्म कला के दृष्टि से महत्वपूर्ण, घृणात्मक जुगुप्सा जगाने वाली है। फासिस्ट विचारधाराओं और औद्योगिक तरीके बनाये गये खाद्य पदार्थों का भयानक उपहास है। यह भी सोचनीय है कि ऐसी फिल्म कोई देखेगा ही नहीं तो उनकी बात लोगो तक कैसे पहुँचेगी? इस पर काफ्का का कथन स्मरणीय हो उठता है कि हमें ऐसी किताबें पढनी चाहिये जो हमें आरी की तरह अंदर से चीर दे। उस किताब को पढने के बाद हम पहले जैसे बिल्कुल न रहें। शायद ऐसा ही प्रभाव यह विवादास्पद फिल्म पैदा करती है।


उपरोक्त दो प्रकार के अलावा अभिनवगुप्त तीसरे तरह की जुगुप्सा की बात करते हैं - शुद्ध ! यह चिंतन की काल और मृत्य सबसे बड़े भक्षक हैं, हम अपने भोज्य पदार्थों के भोजन हैं, इस तरह के विचार से अपने शरीर और इच्छाओं के प्रति जुगुप्सा शुद्ध जुगुप्सा कहलाती है। सन 2008 में बनी इसराइली एनिमेटेड फिल्म Waltz with Bashir में युद्ध के दौरान इक सिपाही की मनोदशा को दिखाया गया है। रोज रोज लाशों को देख कर उससे दुखी न होने के लिये एक सिपाही ऐसा सोचता है कि वह केवल एक तरह की फिल्म देख रहा है। खुद को इसी भ्रम में रख कर वह रोज गिरती लाशों को देख कर विचलित नहीं होता। एक दिन वह शहर के किनारे बहुत से घायल घोड़ों को कराह कर मरने का वीभत्स दृश्य देखता है, तब वह अपने ओढ लिये भ्रम से निजात पा कर अवसाद में चला जाता है।

सौंदर्यशास्त्र मनोरंजन का अध्ययन नहीं, अपितु वास्तविकता और दर्शन का अध्ययन है। अगले लेख में हम चर्चा करेंगे अद्भुत रस और विस्मय भाव की!