Tuesday, July 29, 2014

राकेश तिवारी की कहानी 'अंजन बाबू हँसते क्यों हैं'

80-90 के दशक में जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढता था तो जिन कथाकारों की कहानियां पढने में आनंद आता था उनमें एक राकेश तिवारी थे. मध्यवर्गीय जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को लेकर कई कमाल की कहानियां लिखी उन्होंने. बीच में अपने लेखन को लेकर खुद लापरवाह हो गए. अभी दो दिन पहले ही उनका कहानी संग्रह 'मुकुटधारी चूहा' रिलीज हुआ तो अचानक मुझे उनकी कहानियां याद आ गई. अब देखिये वेतनवृद्धि-पदोन्नति को लेकर कितनी रोचक और मार्मिक कहानी है यह- मॉडरेटर.
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अंजन बाबू हँसते क्यों हैं

अंजन बाबू नहाते-नहाते खिलखिलाने लगते हैं। इतनी जोर से कि बाहर वाश-बेसिन पर झुककर कुल्ला कर रही पत्नी के कान चौकन्ने हो जाते हैं। वह कुल-कुल, कुल-कुल.पुच्चकरने को होती है, किन्तु एकाएक रुक जाती है। मुँह का पानी धीरे से थूकती है, ताकि सुन सके। फिर पंजों के बल आगे बढ़ती है.. बमुश्किल दो कदम। स्नान घर के दरवाजे पर कान टिकाती है। अन्दर खिल-खिलजारी है। जैसे कोई उन्हेंगुदगुदा रहा हो। वह हलकी-बक्की। क्या कोई चुटकुला याद आया होगा? या फिर पुर्जातो नहीं खिसका...।

आखि़र अंजन बाबू इस कदर हँसते क्यों हैं?

तंगी और आर्थिक दबावों में अंजन बाबू की हँसी कब की फुर्र हो चुकी थी। अभी हाल तक उनकी तस्वीर कुछ इस तरह थी.. दुबली काया पर फ्यूज बल्ब की तरह लटका चेहरा। पपड़ियाये होंठ। मिट्टी पड़ी-सी आँखें। माथे पर बल। कमर से सरकती पतलून।

घर आते तो कुछ रुटीन वार्तालाप। सूचनाओं का आदान-प्रदान। फिर पढ़ने की मेज पर झुक जाते। नमक, मिर्च, तेल, मसाले, पसन्द-नापसन्द, किसी बात को लेकर न कोई टिप्पणी, न नाक-भौंह सिकोड़ना। खाना तैयार होता तो पत्नी के बुलावे पर रस्सी से बँधे मवेशी की तरह पहुँच जाते। चार पैसे की आमदनी बढ़ाने को, कहीं से कोई काम ले आते और मेज पर गर्दन दिये रहते।

गर्दन अब भी दिये रहते हैं। पर, इधर कुछ दिनों से खुश-खुश से रहने लगे हैं। यदा-कदा बत्तीसी भी दिखा देते हंै। किन्तु आज तो हद हो गयी। स्नान घर में खिलखिला रहे थे। जीवन में ऐसा कोई परिवर्तन तो आया नहीं। खुशी हरामजादी लुटने को लुच्चों के पास जाने में तो संकोच न करे, लेकिन अंजन बाबू से दो गज की दूरी। घर में ऐसा कुछ नहीं बदला। वही मासूम-सी बच्ची है, वही सुन्दर, सुशील पत्नी.. गुलदस्ते में सजे गुलाब-सी। अंजन बाबू की नजर टिक गयी तो टिकी, नहीं तो नहीं। क्या करें, फुर्सत तो हो। हरदम चिन्ताएँ, हर कदम जिम्मेदारियाँ। उम्र तैंतीस, वजन पचपन और कन्धों पर बोझ कई मन, कई टन।

तो फिर इस बदरंग जीवन को अंजन बाबू ने अचानक कौन से प्रिज्म से देखना शुरू कर दिया कि सतरंगी नजर आने लगा?

अंजन बाबू उँगलियों से फिटर-फिटर बालों का पानी छिटकते हैं। कमीज पहनने को होते हैं तो पत्नी पूछती है, ”कैसे हँसी आ रही थी?“

ऐसे ही।वह मुस्कुरा देते हैं। पत्नी फिर कुरेदती है, ”ऐसे ही?“

कुछ याद आ गया था।

कुछ क्या?“

शाम को बताऊँगा। दफ्तर के लिए पहले ही देर हो चुकी है। झटपट नाश्ता दो और खाना बाँधो।

आखि़र, आजकल अंजन बाबू बात-बात पर हँसते क्यों हैं? अंजन बाबू हँसते क्यों हंै, यह सवाल दफ्तर के लोगों को ज्यादा मथता-कचोटता है। दफ्तर वाले ज्यादा निकट हंै तो ईष्र्या स्वाभाविक है। हालाँकि अंजन बाबू की हालत दफ्तर वालों से छिपी नहीं है। उन्हीं साथियों के आगे महीने की दस तारीख़ के बाद वे उधार के लिए हाथ पसारते हैं। उन्हीं को दुखड़े सुनाते हैं। फिर भी एक निहायत मरियल, फक्कड़ और दो टके के नौकरीपेशा आदमी से ईष्र्या? और ईष्र्या का कारण.. कि आखि़र यह अंजन का बच्चा आजकल ठट्टा मारकर हँसता क्यों है?

बधाई हो, शीलाजी।अंजन बाबू दफ्तर पहुँचते ही शीला शुक्ला को बधाई देते हैं। शीलाजी गद्गद। साथी अंजन बाबू को घेर लेते हैं। इन्दु भूषण पांडे पूछते हैं, ”अंजन बाबू, शीलाजी का नाम भी है?“

है का मतलब?’’ अंजन बाबू शरारती मुस्कान बिखेरकर कहते हैं, ”अरे भाई, इस बार वह पहले नम्बर पर हैं। यकीन न हो तो चन्दर साहब से पूछ लो।

चन्द्र प्रकाश बड़े साहब के निजी सचिव हैं। लोग उन्हें भी साहबों-सा सम्मान देते हैं और प्रायः उनसे किसी तरह की पूछताछ का साहस नहीं जुटा पाते।

अंजन बाबू की बात पर आधे लोग मुस्कुराने लगते हैं। बाकी चिन्तित और परेशान। कहीं सचमुच शुक्लाइन बाजी न मार ले गयी हो। शीलाजी की खुशी सतह पर आये बुलबुले की तरह फट जाना चाहती है। अंजन बाबू की ओर झुककर पूछती हैं, ”सच-सच बताना, मेरा नाम है?“

अंजन बाबू हँसते क्यों है: देखिये, आप विश्वास नहीं करेंगी तो मैं नहींकह दूँगा।

नहीं, ऐसा मत कहियेगा।उनका गिरगिटी चेहरा बदरंग हो जाता है। ऐसा भय कि जैसे फैसला अंजन बाबू की कलम से होता हो।

कुछ दूर स्टूल पर बैठा चपरासी वार्तालाप सुनने का प्रयत्न कर रहा है। ध्वनि तरंगें उसके कानों के पर्दों को छू नहीं पा रहीं। वह अपनी गिद्ध दृष्टि से हिलते होंठों का अर्थ ढूँढ़ने का प्रयास कर रहा है। अचानक जोश में आकर वह सीटी मार देता है.. वय वये...!

अंजन बाबू पांडे की ओर गर्दन घुमाकर जाॅनी वाॅकरछाप अदा के साथ देखते हैं। इस अदा की विशेषता यह है कि दोनों आँखें अधमुँदी हो जाती हैं। इसके बाद आँख दबाकर संकेत करने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

पांडेजी फौरन संकेत पकड़ लेते हैं, जैसे उनका टीवी पड़ोस में चल रही केबल टीवी की फिल्म पकड़ लेता है। कहते हैं, ”चलिए, बधाई हो, शीलाजी। मुझे बहुत खुशी है।

शीलाजी के होंठों पर विजयी मुस्कान फैल जाती है। वह विजय वर्मा की ओर तीर चला देती हंै, ”लेकिन कुछ लोगों के सीने पर साँप लोट रहे होंगे।

लोटने दीजिए, शीलाजी“, पांडेजी आगे कहते हैं, ”पर हाँ, थोड़ा सावधान रहियेगा। पिछली बार ख़बर उड़ते ही आपके विरोधियों ने बना-बनाया काम बिगाड़ दिया था।

लोग मुँह छिपाकर हँसने लगते हैं।

अंजन बाबू जब से नौकरी के लिए शहर आये, गाँव में दो बहनें ताड़ की तरह बढ़ती हुई एक साथ दरवाजे की चैखट को छूने लगीं। न उन्होंने बहनों के बढ़ने-गदराने का क्रम देखा, न पिताजी के मुरझाने का। बस छुट्टी पर गाँव गये, तो देखा बहुत कुछ बदल गया है.. जैसे अचानक।

पिता रिटायर हो चुके थे। फंड वगैरह की सारी रकम बड़ी बेटी और अंजन बाबू की शादी में पहले ही झोंक दी। अब ठन-ठन गोपाल। शरीर की सारी कुव्वत बुढ़ापे ने चूस ली। आँखों की ज्योति भी दगा दे गयी। चश्मा लगाकर भी धुँधला ही दिखाई देता है। इसके बावजूद दो ट्यूशन कर रहे हैं।  मुँहजबानी सवाल हल करा देते हैं। जीवनभर की मास्टरी में इतना अनुभव भी न होगा? यह बात और है कि उनके निजी जीवन में दो सवालों का हल नहीं निकल रहा.. बेला और मिट्टू का ब्याह कैसे होगा, इसका कोई उत्तर उनके पास नहीं है।

आँखों से असहाय होकर भी बेटे पर कम से कम बोझ डालना चाहते हैं। ज्यादा कमा नहीं सकते तो ख़र्चे ही समेट लिए। घर की हालत देखकर अंजन बाबू दंग रह गये थे। हर कोने-चप्पे में कंगाली के पैरों की छाप नजर आ रही थी। जैसे उनकी अनुपस्थिति में कमजोर बाप और जवान लड़कियों को अकेला देखकर कंगाली घर को रौंद गयी हो, राशन-पानी खा गयी हो और लत्ते-कपड़े तार-तार कर गयी हो।

उनके पीछे, घर में कंगाली का कथकलीहोता है, यह समझते अंजन बाबू को देर नहीं लगी। उन्होंने तय कर लिया कि जैसे भी हो, गाँव को सौ रुपए माहवार ज्यादा भेजने होंगे।

गाँव से लौटकर आये तो मेज पर गर्दन और अधिक झुक गयी। हालाँकि, इसके बावजूद अभी पचास रुपये भी बढ़ाकर नहीं भेज पाये हैं। पता नहीं, क्या होता है, वेतन मिलने के हफ्ते दिन में ही नोट जाने कहाँ चले जाते हैं। जेब निगल जाती है कि पंख लग जाते हंै?

 गणित के मास्टर तो अंजन बाबू के पिताजी थे। पर हिसाब-किताब लगाते रहना अंजन बाबू की नियति बन गयी है। मसलन, सौ रुपये की आमदनी बढ़ी तो पचास इस मद में, पचास उस मद में। दो सौ की वेतन बढ़ोतरी हो जाये तो सौ का ये, पचास का वो और पचास का वो। तीन-चार सौ एकमुश्त बढ़ गये, फिर तो...आये हाये, मजा आ जाये। सौ रुपये गाँव भेजूँ...और बाकी रकम से सारा स्वर्ग ख़रीदकर घर ले जाऊँ।...और फिर चैन की बाँसुरी बजाऊँ.. हरि प्रसाद चैरसिया की तरह।

लेकिन सालाना बढ़ोतरी से पहले ही बेटी के स्कूल की फीस, दूध, सब्जी, राशन-पानी और तेल-चीनी के दाम बढ़ जाते हैं। कितना ही बजट बना लो, कितने ही गणितज्ञ हो जाओ, बाजार की आँधी सब चैपट कर देती है। जेब में मन्दी, बाजार में उछाला।

गणित कोई जादूगरी तो है नहीं। वह तो सिर्फ दो और दो चार होने का सत्य बताता है, दो के चार बनाना नहीं। इसीलिए कभी-कभी यह हिताब-किताब अंजन बाबू को मिथ्या और छलावा लगता है। खर्चों का जोड़-बाकी करने से जेब की रकम तो बढ़ती नहीं।

लेकिन फिर भी वे जोड़-बाकी करते हैं। किये बिना भी मन नहीं मानता। कभी यह विचार भी आता है कि पिताजी गणित के मास्टर थे, उनके गुण-सूत्रों के जरिये आनुवंशिक गुण-दुर्गुण की तरह यह हिसाब-किताब उनके खून में तो नहीं आ गया? फिर अपनी मूर्खता पर ख़ुद ही झल्ला पड़ते हैं.. धत तेरी, अधपड़ अंजन की ऐसी-तैसी।

पदोन्नति पर अंजन बाबू की बड़ी उम्मीदें टिकी हैं। हालाँकि अपनी वरिष्ठता के कारण ऊपर वाले पद के वेतनमान पर वे पहले ही पहुँच चुके हैं। इसलिए ज्यादा कुछ मिलना-मिलाना नहीं है। सिर्फ डेढ़ सौ रुपये का इजाफा होगा। लेकिन जिसके लिए एक-एक पाई की घट-बढ़ मायने रखती हो, जिसके लिए टूटा प्लास्टिक, फूटा काँच और पिचका टिन बेचकर महीने में दो-चार रुपये बना लेना मायने रखता हो, उसके लिए डेढ़ सौ के बहुत मायने होते हैं। पर इस नामुराद इजाफे का इन्तजार करने की कोई सीमा तो हो!

अभी कुछ दिन पुरानी बात है। तीन-चार साल पहले नौकरी पर आये कुलानन्द को पांडे ने फुसला दिया। कहा, ”गुरु, मुबारक हो, तुम्हारा भी हो रहा है।

कुलानन्द को एकाएक विश्वास नहीं हुआ। वर्मा ने तुरन्त पुष्टि कर दी, ”सचमुच तेरा हो रहा है। अब पता नहीं, कैसे हो रहा है, लेकिन तेरा भी नाम है।

कुलानन्द सक्रिय हो गया। पदोन्नति के दूसरे दावेदारों के बारे में अधिकारियों को बताने लगा कि कौन पार्ट टाइमकाम में कितना व्यस्त है, कौन कितना बदजबान है और क्या-क्या बकझक करता है। लेकिन इस सबसे भी वह एक दिन ऊब गया। अंजन बाबू से कहने लगा, ”यार हद है, बहुत उल्लू बना रखा है। कई बार सुन चुके कि अब हो रहा है, तब हो रहा है। होता-हवाता कुछ नहीं। मैं तो ऊब गया।

अंजन बाबू का मुँह खुला का खुला रह गया। लेकिन अगले ही क्षण वह मुस्कुराने लगे। बोले, ‘‘होने ही वाला है। शीलाजी के मामले में किसी ने टंगड़ी मार दी थी। इसीलिए मामला लटक गया था। अब नये सिरे से हो रहा है। तुम्हारा नाम भी है।

शीलाजी सुन रही थीं। उन्हें सुनाने के लिए ही अंजन बाबू ने उनका नाम घसीटा। वह बड़बड़ायीं, ”लोग तो बहुत चाहते थे कि मेरा न हो। पर ऊपर वाला सब देखता है।

लोगहँसने लगे। अंजन बाबू भी फी-फीकर हँस दिये।

पता नहीं, सबसे पहले अफवाह किसने उड़ायी। हो सकता है, किसी यी साजिश हो। या किसी ने अपनी दावेदारी पुख़्ता करने के लिए ख़ुद ही अपना नाम उछलवाया हो। या फिर शायद इन्तजार और अटकलबाजियों की परिणति हो। पर वातावरण ऐसा बन गया है  कि कुलानन्द सहित हर कोई पदोन्नति की मृग मरीचिका का पीछा कर रहा है। और दूसरों को रेगिस्तान में प्यासे हिरन की तरह भटकता देख उसकी छटपटाहट बढ़ाने के लिए बधाइयाँ भी दी जाती हैं। कुछ छोटे अधिकारी भी इस खेल में रस लेने लगे हैं। श्रीवास्तव साहब आते-आते अक्सर वर्मा को छेड़ते हंैए कहिए वर्माजी, आपका तो हो रहा है?“

सर, आप बताइये, हो रहा है?“

सुना है।

”...सर, काॅफी पियेंगे?“

शर्माजी जैसे अधिकारी भी, जो गम्भीर प्रकृति के माने जाते हैं, हरिमोहन को पदोन्नति का समाचार देकर मजे लेते रहते हैं। हरिमोहन अपने बारे में सुन-सुनकर फूले नहीं समाते। यूँ अब तक, ख़ुद को लेकर वह आश्वस्त हो चुके हैं।

वरिष्ठ लोगों में महेन्द्रजी भी हैं। पदोन्नति की चर्चा सुनते ही गम्भीर हो जाते हैं। पथराई आँखों से सामने वाले को इस तरह देखते हंै, जैसे कह रहे हों.. होना तो मेरा है बच्चू, उछल रहे हो तुम? पदोन्नति की अन्तहीन प्रतीक्षा ने उन्हें अन्दर ही अन्दर चिड़चिड़ा बना दिया है। मीठा बोलना चाहते हैं, किन्तु मुँह से निकलते ही बात कड़वी हो जाती है।

और भी कई चरित्र हैं। ओझाजी को ही लीजिए। पदोन्नति की अफवाह तेज होते ही अधिकारियों की प्रशंसा करना और साथियों की कमजोरियाँ बताना शुरू कर देते हैं। उपेन्द्र वक्त से पहले आने और देर तक रुकने लगते हैं। गंगा प्रसाद दो घंटे का काम आधे घंटे में निपटा देते हैं। ललित मोहन फाइलों के ढेर के पीछे चूहे की तरह दुबके रहते हंै और व्यस्तता का नाटक करते हैं।

एक ममताजी भी हैं। पदोन्नति की बात चले तो उनका गला भर आता है। मुँह से कुछ नहीं बोलतीं। पर रुँधे गले से अपने साथ अन्याय होने का संकेत देती रहती हैं। नितिन कुमार को जब उम्मीद नजर आती है तो खरगोश हो जाते हैं, अन्यथा नोचन बिलौटा।

हरेक का अपना चरित्र है, अपनी-अपनी विशेषताएँ। किन्तु ऐसा कोई नहीं है जिसने महत्वाकांक्षान पाली हो। काम, क्रोध, मद और लोभ की तरह पदोन्नति की लालसा भी हर वेतनभोगी मनके अँधेरे कोने में कुंडली मारे बैठी है। जिज्ञासा, ईष्र्या, निराशा और क्रोध के प्रदर्शन से यह कमजोरी प्रायः पकड़ में आ जाती है। आज ने को पकड़ा, कल ने को। पकड़न-पकड़ाई के इस खेल में दूसरे की कमजोर नस पकड़ने के क्षण सबसे आनन्ददायक होते हैं। लेकिन जो लम्बी जीभ निकालकर सरेआम लार टपकाता नजर आता है, वह अफवाहों के केन्द्र में सबसे अधिक रहता है।

अफवाहें हर कोई उड़ाता है। जो नहीं उड़ाता, वह हवा देने का काम तो करता ही है। फर्क इतना है कि विजय वर्मा की तरह कुछ लोग अफवाहों को उड़ने के लिए हवा के रुख़ पर छोड़ देते हंै, जबकि कुछ अंजन बाबू की तरह कन्धे पर अफवाह रखकर सरेआम फेरी लगाते फिरते हैं।

अंजन बाबू कभी-कभी गम्भीरता से सोचते हैं। तब उन्हें साथियों पर, यहाँ तक कि अपने आप पर भी तरस आता है। जीवन के दलदल में कदमताल के लिए संघर्ष कर रहे मामूली बाबू लोग। सिर के ठीक ऊपर, दृष्टि की सीमा के अन्तिम छोर पर टँगी नीली चादर। यानी हर किसी का अपना-अपना आकाश। किसी का दो अंगुल ऊपर, किसी का दो अंगुल नीचे। शून्य में टँगी भ्रम की उस चादर पर टकटकी लगाये हुए एक दिन आँखें पथरा जाए। कदमतालके लिए छटपटाने में ही ऊर्जा चुक जाये।

आखि़र एक साथ छटपटाने, कराहने वाले एक-दूसरे से इतनी ईष्र्या क्यों रखते हैं? मुर्गों की तरह एक-दूसरे को नोचना क्यों चाहते हैं? यह सब मनुष्य के अन्दर विद्यमान आदिम प्रवृत्ति के कारण है या इसमें उत्प्रेरकोंकी भी भूमिका है?.. डिवाइड एंड रूल...!

अंजन बाबू जोर से हँसते हंै। उन्हें अपनी हँसी हिनहिनाहट-सी लगती है।

हाँ अब बताइए, आजकल आप कैसे इतना खुश रहते हैं? मुझे तो कभी-कभी आपके ठहाकों से डर लगने लगता है।घर पहुँचते ही अंजन बाबू की पत्नी ने चाय के साथ उन्हें प्रश्न थमा दिया और आशंका भी।

अंजन बाबू हँसने लगे। फिर विस्तार से पत्नी को दफ्तर पुराणका पदोन्नति कांड सुना डाला। पूरा प्रकरण सुनाने के बाद एकाएक चुप हो गये। सोचने लगे.. दरअसल, कर्मचारी कुत्ते-बिल्लियों की तरह जीभ से अपने फोड़े चाटते न दिखाई दंे तो अधिकारियों को कैसे पता चले कि वे मामूली कर्मचारी हैं। खुद कर्मचारी लोग भी जब एक-दूसरे को पैंट की दोनों जेबों में हाथ डालकर रान खुजाते देखते हैं, तो उन्हें सन्तोष होता है कि सबका दुख बराबर है। तो फोड़े-फुंसी, दाद-खाज से मुक्त व्यक्ति ईष्र्या का कारण नहीं बन जायेगा?

लेकिन आपने हँसते रहने का कारण तो नहीं  बताया?“ पत्नी ने उन्हें चुप देखकर सवाल किया। अंजन बाबू बोले, ”बस, दूसरों को छेड़ता हूँ, उनके मन के अँधेरे कोने में दबी, फफूँद लगी इच्छाओं को कुरेदता हूँ और हँसता हूँ।

अपने लिए यही मनोरंजन का जरिया है। ख़ुद क्यों सहानुभूति का पात्र बना जाये? सहानुभूति और उपहास के बीच बहुत कम फासला होता है। सहानुभूति का पात्र किसी भी क्षण उपहास का पात्र बन जाता है। मैंने तय किया है कि जियो तो लोगों की ईष्र्या का पात्र बनकर जियो। ठहाके लगाओ।

हँसना यूँ भी सेहत के लिए अच्छा है।

न हो सेहत के लिए अच्छा, मेरी यह उन्मुक्त हँसी तनावों से जूझने और कुंठाआंे को ठेंगा दिखाने की शक्ति तो है। दरअसल, यह हँसी भीतर की दुर्बलाताओं से लड़ने के लिए उत्पन्न की गयी प्रतिरोधक क्षमता है। बस, कभी-कभार, किसी दिन सदमा न लग पड़े, यही क्षीण-सी आशंका भयभीत कर देती है। हालाँकि पदोन्नति में रुपये-पैसे का जोड़-बाकी न होता और यदि रुपये के साथ जीने व जीवित रहने का गणित न जुड़ा होता, तो मैं सहर्ष पदोन्नति की इच्छा त्याग देता।

तो कौन कहता है, त्याग दो? न त्यागो, न उसके पीछे भागो।

यही सोचता हूँ। क्योंकि, यह प्रतियोगिता ही दरअसल बेमानी है। कुछ लोगों को सीढ़ियों से चढ़ना है, कुछ को लिफ्ट से।

तो फिर अपनी टाँगों की कुव्वत बढ़ाओ। यह मानकर कि व्यायाम सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए ही नहीं होता, जमीन पर टिके रहने को भी मजबूत टाँगे चाहिए।

गृहिणी का तर्क सुन अंजन बाबू चकित। पत्नी चुप। एकदम सिक्का खनक सन्नाटा।

अगले दिन दफ्तर जाते हुए अंजन बाबू अत्यन्त उत्साहित थे। पत्नी की ओर से बल मिल जाने पर नयी स्फूर्ति आ गयी थी। रास्ते में उल्लू खिंचाई के कई नायाब नुस्ख़े खोज निकाले। मसलन, शीलाजी को कौन-सी ख़बर देंगे, कुलानन्द को कैसे छलेंगे और गंगा प्रसाद को किस कोण से व्यंग्य बाण मारेंगे।

दफ्तर पहुँचे तो माहौल में काफी तब्दीली नजर आयी। न किसी ने उत्साहित स्वर में बात की, न पदोन्नति की चर्चा छेड़ी। दो-दो, तीन-तीन की टोली में कई लोग खुसर-पुसर कर रहे थे। कुछ उदासी ओढ़े बैठे थे। शीलाजी की आँखें सूजी हुई थीं।

अंजन बाबू कुछ समझ नहीं पाये। अपनी पुरानी अदा में बोले, ”शीलाजी, आपको...और आपको ही क्यों, सभी साथियों को बधाई। अभी-अभी सुना है कि उच्च स्तर पर पदोन्नति का फैसला हो गया। इसलिए न किसी को दुखी होने की जरूरत है, न अकेले-दुकेले खुश होने की।

अंजन बाबू उम्मीद कर रहे थे कि नयी अफवाह देशी ठर्रे की तरह फौरन सिर चढ़ेगी। पर किसी ने उनकी बात पर कान नहीं दिये। किन्तु मुँह लटकाये बैठे इन्दु भूषण पांडे से रहा नहीं गया। बोले, ”कब तक छलोगे अंजन? मुझे, शीला जी, कुलानन्द और आपको छोड़कर बाकी वरिष्ठ लोगों की पदोन्नति हो गयी। दो जूनियर भी हैं।

एंे?“कृ अंजन बाबू की आँखें खुली रह गयीं। धम्म से कुर्सी पर गिर पड़े। सिर चकराने लगा। उन्होंने आँखें मूँद लीं। अगले ही क्षण कानों को बाहर की आवाजें सुनाई देना बन्द हो गया। केवल अन्दर से एक अकेली आवाज आ रही थी- जमीन पर टिके रहने को भी मजबूत टाँगें चाहिए। यह बात उन्हें गीता के उपदेश की तरह लगी। जैसे कहा जा रहा होकृ अंजन , उठ, तीर चला।

अंजन बाबू झटके से खड़े हो गये। महेन्द्र जी की ओर लपके। हाँक लगाई, ”गुरु, पहली सूची में आने की बधाई।

अंजन बाबू ने एक पल के लिए रुककर सोचाकृ अरे, यह क्या, वह हँस रहे हैं? तो क्या उनका भय बेवजह था? क्या हँसी का आन्तरिक स्रोत बाहर की खनन-खुदाई से नहीं सूखता?


वह हँसे और हिनहिनाते हुए-से बोले, ”दो महीने बाद जिन लोगों की पदोन्नति हो रही है उनमें सबसे ऊपर शीलाजी का नाम है और सबसे नीचे कुलानन्द का।


साथी हक्के-बक्के। अंजन बाबू हँस रहे हैं?

यह कहानी संग्रह वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है!