निलय उपाध्याय को हम सब एक बेहतरीन कवि के रूप में जानते हैं, लेकिन वे एक शानदार गद्यकार हैं. औपन्यासिक संवेदना के लेखक, जिनके पास अनुभव की अकूत सम्पदा है. आज उनकी एक ताजा कहानी आपके लिए- जानकी पुल.
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सुबह सुबह मनबोध बाबू को लगा जैसे उनकी देह पर हजारो हजार
चीटियां रेंग रही है और न दिखने वाली उनके
पावों की सूईयां उनकी चमडी पर चुभ रही है।हडबडा कर बिस्तर से उठे, देखा तो देह
पर कहीं कुछ नहीं था। हाथ से सहला कर टटोला , कहीं कुछ नहीं मिला मगर हल्की चुभन
अब भी महसूस हो रही थी। इसका मतलब क्या हो सकता है। चींटियां जरूर उनकी चमडी के
भीतर समा गई है जिसे महसूस तो किया जा सकता है,देखा नहीं जा सकता।
इसकी शुरूआत कई साल पहले हुई
थी जब वे बस से यात्रा कर रहे थे। उनकी बस एक टोल नाके पर रूकी। खलासी ने डेढ सौ
रूपए दिए,रसीद ली तब बस आगे बढी। यह देख मनबोध बाबू के मुंह से अनायास ही निकल
गया-बाप रे, बस वाले का सारा पैसा तो टोल नाके वाले ले लेंगे।
बगल में बैठे आदमी ने
कहा-बस वाले का क्या जाता है. पैसा तो हमारा है ना। सरकार और बस वाले मिलकर हमें
ही लूट रहे है।
मनबोध बाबू सब कुछ समझ गए।
मन ही मन हिसाब लगाया। अभी पचास लोग थे बस में, यानी उन डेढ सौ रूपयों मे तीन
रूपया उनका भी है।
यह सोंच कर उनका मन रूंआसा
हो गया।
उसके बाद पूरी राह में जितने
टोल नाके आए मनबोध बाबू को लगता कि खलासी के दिए जा रहे उन रूपयो में उनका भी
रूपया शामिल है और ठ्गा सा महसूस करते। पहली बार वहीं पर देखा कि एक चींटी उनकी
देह पर रेंग रही है। थोडी देर बाद वह चीटी जाने कहां गायब हो गई और उन्हे लगा जैसे
अपना पांव चुभाते हुए चमडी के भीतर कही चल रही है। तब से घर बाजार दफ़्तर और जाने
कितनी जगहों पर ,जाने कितनी बार वे अपने शरीर पर जाने कितनी चीटियों के पांव की
चुभन महसूस कर चुके है।
कहा जाता है कि चींटियों में कुछ ग्रंथियाँ
होती हैं जिनसे रसायन निकलते हैं. इन्हीं के ज़रिए वो एक दूसरे के संपर्क में रहती
हैं.रानी चींटी भोजन की तलाश में निकलती है तो रसायन छोड़ती जाती है. दूसरी
चीटियाँ अपने ऐंटिना से उसे सूंघती हुई रानी चींटी के पीछे-पीछे चली जाती हैं. मनबोध
बाबू को संदेह था कि बस यात्रा के दौरान जो चींटी उनकी देह पर दिखी थी वह रानी चीटी
थी जो निरंतर रसायन छोड रही है और बाकी दूसरी चीटियां उसका रसायन सूंघ कर उनकी
चमडी के भीतर पीछे चली आई हैं.
चींटियो के बारे में बचपन
में उनका बहुत नेक खयाल था ।
चींटियां ब्राहमण होती है।
आटा में चीनी मिलाकर उन्हे हर शनिवार को खिलाया जाय तो मंगल जैसे खतरनाक ग्रह का
कोप मिट जाता है। उनकी यह धारणा पहली बार तब टूटी थी जब उन्होने देखा कि उनके किचन
से चीटियां मांस का बहुत बडा टुकडा लिए जा रही है। गांव के कामता सिंह का हाथी मरा
था तो बताया गया कि चीटियो ने उसके कान के भीतर घुस कर काट लिया था। तब से चींटियो
के बारे में उनकी धारणा एकदम बदल गई थी और डर लगने लगा था। चीटियों के रेंगने और
उनके पांवो के चुभने की यह घटना आज इतनी तीब्रता से हुई थी कि मनबोध बाबू को लग
रहा था कि अब उनका कुछ न कुछ इलाज करना ही होगा।
२
आंख मलने,पानी पीने और चार कदम टहलने के बाद सब कुछ सहज हो
गया और मनबोध बाबू भूल गए कि उनके साथ ऎसा कुछ हुआ था । नित्यक्रिया से निपट कर जब
चाय पीने बैठे तो शरीर कुछ हल्का लगा, सिर में हल्का चक्कर भी आ रहा था और कमजोरी
महसूस हो रही थी।
चाय का कप ले जाने उनकी पत्नी आई तो उनका मन हुआ कि सारा
वाकया विस्तार के साथ बताए पर जिस तरह वे जवानी के दिनों में बताया करते थे मगर
पत्नी बहुत जल्दी में थी,हिम्मत नही हुई। सोचा कि किसी डाक्टर को चल कर दिखा लें
मगर जब तक उनको इस बात पक्का यकीन नहीं हो जाता कि वे चीटियां ही है जो उनके भीतर
समा गई है तब तक किसी से कुछ नहीं कहेंगे।पत्नी से भी नहीं, बच्चों से भी नहीं।जो
गलती पिछली बार हुई थी उसे फ़िर नहीं दुहराऎगे।
कुछ दिन पहले राह मेंचलते हुए किसी पत्थर से उनको चोट लग गई
थी और पैर की उंगली से खून रिसने लगा था। मनबोध बाबू को तो आरंभ से रास्ता देख कर,
फ़ूंक फ़ूंक कर चलने की आदत थी और वे तो लगातार देखते हुए भी जा रहे थे। इतना बडा
पत्थर था आज उनको कैसे दिखाई नहीं पडा। पहली बार उनके मन में यह सवाल आया कि क्या
उनको कम दिखाई दे रहा है ?
इसी तरह एक दिन कहीं जाना था और उनका पर्स कहीं दिखाई नहीं
दे रहा था और वे परेशान होकर अपनी पत्नी को लगातार आवाज दे रहे थे। थोडी देर बाद
झल्लाई सी पत्नी आई,टेबल पर से उठा हाथ में पर्स थमाते हुए कहा- अंधे हो गए है।
सामने पडी चीज दिखाई नहीं देती | इस तरह एक एक कर जब कई घटनाए सामने आ गई तोउन्होंने महसूस
किया कि बहुत सारी चीजे उन्हे दिखाई नहीं देती। इसका मतलब अब उम्र असर दिखा रही
है। सचमुच उनको कम दिखाई दे रहा है। बहुत विचार करने के बाद यह बात उन्होने अपनी
पत्नी से बताई। उनकी पत्नी सुन कर परेशान हो गई कि उनको कम दिखाई दे रहा है।शाम के
समय दोनों बेटे जब अपने अपने काम पर से लौट कर घर आए तो उनकी पत्नी ने गम्भीरता से
बच्चो को बताया-
पता है,पापा को कम दिखाई दे रहा है?
बच्चे अपने जिस काम में लगे थे पापा को न दिखाई देने से
ज्यादा जरूरी थे।सबने सुन लिया और अपने अपने कमरे में चले गए।
उनके बडे बेटे का मानना था कि पापा को बहुत पहले से बहुत कम
दिखाई पड रहा है। अगर पापा को आने वाला समय दिखाई पडा होता तो कम से बच्चो के लिए यहां
एक फ़्लैट तो ले लिया होता। कितना सस्ता था उस समय। आज कितने सुखी होते वे।पापा ने
जीवन भर श्रम किया मगर जब पापा की ख्याति बढने लगी जब असल पैसा कमाने का समय आया
सब कुछ छोड दिया। मगर किसी ने कुछ नहीं कहा।
कुछ न कुछ कह कर उनके बच्चों ने जब टालने की कोशिश की,यह बात उनकी पत्नी समझ गई और उसे यह बुरा भी लगा। उनकी
पत्नी यह भी जानती थी कि बच्चेइसलिए नहीं टाल रहे कि वे उसे टालना चाहते थे या
पापा से प्रेम कम था बलिक इसलिए कि जिस काम में वे इस वक्त लगे थे वे पापा की आंख
से ज्यादा जरूरी थे। मगर उनकी पत्नी अच्छी तरह यह भी जानती थी कि अगर मनबोध बाबू को
सचमुच कम दिखाई देने लगा तो उनकी मुसीबत कितनी बढ जाएगी। अब उनका भी सारा काम उनको
ही करना पडेगा। इसके अलावे वे यह भी कहना शुरू करेंगे कि मोटा मोटा उपन्यास पढ कर
सुनाओ। मैं बोलता हूं तुम लिखो।
रविवार के दिन
इतमिनान से बच्चों को उन्होने याद दिलाया-देखो ,बचपन में जब तुम लोगों को जरा सी छींक भी आ जाती थी तो पापा
शहर के सबसे अच्छे चिकित्सक के पास ले जाते थे और तुम्हारे ठीक होने तक छुट्टी ले
लेते थे।तुम लोगों को उनकी बातो पर गौर करना चाहिए।
पता नहीं मम्मी की बातोंका भावनात्मक असर था या मम्मी के
रोज की बकबक सुनने से बचने के लिए बडे बेटे ने एक हजार का नोट निकाल कर दिया और
कहा-हम डाक्टर तो है नहीं,
तुम जाकर उनकी जांच करा दो और अगर डाक्टर कहे तो चश्मा
खरीदवा देना।
एक हजार का हरा नोट हाथ में आते ही पत्नी खुश हो गई और
मनबोध बाबू को ताना देते हुए कहा-जवानी के दिनों में जहां तहां नजरे लडाते रहे थे उसी का फ़ल
आज मिल रहा है। कराना तो नहीं चाहिए लेकिनचलिए जांच करा देते हैऔर दया भाव से मनबोध
बाबू को आटो रिक्शा में बिठाकर शहर के सबसे बडे अस्पताल में ले गई।
अस्पताल में डाक्टर ने जांच के बहाने वहां बहुत कोशिश की कि
मनबोध बाबू की आंख में कुछ तो दोष निकल आए ताकि फ़ीस के बाद मंहगे दाम चुका कर लाईसेंस
ली गई उसकीनई दुकान का एक चश्मा भी बिक सकेमगर कोई दोष ही नहीं निकला।डाक्टर ने समझाया-
अभी तो आपका सब कुछ ठीक है मगर उम्र बढ रही है आपको एक चश्मा
जरूर ले लेना चाहिए ताकि आंखो में जितनी रोशनी है उतनी बनी रहे।
हाथ में पैसा था ही, डाक्टर की बात सुन मनबोध बाबू की पत्नी
तैयार हो गई –ठीक है डाक्टर साहब, ले लेते है।
मगर मनबोध बाबू ने इसे स्वीकार नही किया और सख्ती से डाक्टर
से कहा आप इलाज करते है या जीवन बीमा ।
ऎसे तो जीवन बीमा वाले भय दिखा कर रोजगार करते है। जब आंख की रोशनी कम नहीं हुई है
तो चश्मा क्यो?
मनबोध बाबू ने छोटे से भाषण में अपने जीवन के अनुभव का
हवाला देकर डाक्टर को समझाया कि संभावित खतरे की आशंका से वे कभी नही डरे और उसके
लिए कभी कोई प्रयत्न नहीं किया। उनके सामने जब कोई समस्या आई तब उन्होने डट कर बहादुरी
से उसका सामना किया है।
डाक्टर भौचक सा उनका मुंह देखता रह गया।
मनबोध बाबू की पत्नी यह कहते हुए उन्हे घर लेकर आ गई कि
डाक्टर साहब , तीस साल का
अनुभव है मेरा ,बात में
इनसे कोई नहीं जीत सकता।
मनबोध बाबूने एक दिन दोनों बेटों और पत्नी हंस हंस कर बात
करते सुना। पापा को जांच करवाने का शौक लग गया है।इलाज के लिए जाने के पहले
उन्होने सूई में तागा लगाया था। मनबोध बाबू की पत्नी कहने लगी कि मुंह बिचका बिचका
कर नर्सों से बात कर रहे थे।क्या नाम है आपका? अरे इलाज करवाने गए है कि नाम
पूछने। मैं उनकी नस पहचानती हूं, वे तो बस ।
मनबोध बाबू को यह सब सुनकर सचमुच बहुत बुरा लगा और उन्होंने
तय कर लिया कि अब उनको जब भी कुछ होगा, पहले वे रूक कर,कुछ दिन इंतजार कर वाकई यह समझ लेंगे कि
उन्हे कुछ हुआ है तब किसी को बताऎंगे और अगर बहुत ही जरूरी हुआ, तब जांच या इलाज
करवाने जाऎगे।
जब तक वे कमाते थे तब तक उनकी पत्नी उनके लिए रोज सुवह एक
सेव देती थी। एक दिन एक सेव सडा निकल गया। उनकी पत्नी दुकान दार को देर तक गालियां
देती रही और इस तरह सेव बन्द कर दिया,गोया दुकानदार को सजा दे रही हो। अब मनबोध बाबू को अपना
ख्याल खुद रखना होगा।कई महीनों से टहलना और प्राणायाम भी छूट गया है कल से वह भी
आरम्भ करेंगे और किसी भी डाक्टर के पास जाने से पहले पता करेंगे कि क्या सचमुच वे
चिटियां ही है।
३
अगले दिन सुबह जब मनबोध बाबू की नींद खुली तो विलकुल वैसा
ही हुआ जैसा कल सुवह हुआ था। वहीं शरीर पर चीटियो के रेगने सा अहसास और वहीं उनके
पांवों की चुभन। चाय पीने बैठे तो फ़िर शरीर में कुछ और कम लगा खून। उनकी चिन्ता बढ
गई लेकिन उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
तीसरे दिन चौथे दिन और लगातार एक सप्ताह तक जब यूं ही होता
रहा तो मनबोध बाबू को लगा कि अब कुछ करना चाहिए और जब उसके लिए कुछ नहीं किया तोअन्दर
अन्दर तनाव बढता चला गया ।न तो टहलने के लिए जा सके और न ही प्राणायाम किया। आठवें
दिन चाय पीने के बाद जब आईने के सामने बैठ कर खुद को निहारा तो चेहरे का रंग पीला
और आंखो के नीचे काला धब्बा सा नजर आया।
यह खून कम होने के कारण तो नही ।
इस बार वे अपने पर नियंत्रण नही रख सके। उन्होने अपनी पत्नी
को वहीं से चिल्लाकर बुलाया-सुनती हो
सुवह में आठ बजे तक का समय उनकी पत्नी के लिए बहुत कठिन
होते थे।मनबोध बाबू जानते थे कि जब तक बच्चे नाश्ता कर टिफ़िन लेकर काम पर निकल
नहीं जाते तब तक पत्नी को बुलाना डांट सुनने की तरह था । मगर उनके भीतर तनाव इस
कदर बढ गया था कि बुलाने के अलावे उनके पास कोई चारा न था। उन्हे यकीन था कि उनकी
पत्नी आकर जरूर बता देगी कि यह काला धब्बा डिहाईड्रेसन के कारण है या खून की कमी
के कारण।
कभी समय था कि उनकी पत्नी उनके शरीर के एक एक अंग का इस तरह
ख्याल रखती थी और उसका अपना शरीर हो। वह प्यार से मनबोध बाबू को कोमल बाबू कहती
थी। दरअसल मनबोध बाबू की चमडी इतनी कोमल थी कि जरा सी चोट लगने पर वहां का रंग
काला हो जाता था और कई दिनो तक काला बना रहता था। जवानी के दिनों में एक बार कहा
था -मन करता है कि तुम्हे
काट कर खा जाऊंऔर सचमुच जोर से काट लिया था। महीनो तक वहां काला धब्बा बना रहा था
और पछताते हुए उसकी सेकाई भी करती रही थी। उसके बाद उनके शरीर को जब भी छूती बडे
प्यार से जैसे शीशे का बर्तन हो और जरा भी असावधानी पर गिर कर टूट जाने का डर हो।
मनबोध बाबू पत्नी आई तो हडबडी में थी और बडबडा रही थी कि आप
दूसरे का कष्ट नहीं समझते। उनके हाथ में आटा लगा था जिसे अभी गूंथना बाकी था।
बच्चे जाने के लिए तैयार हो रहे थे।पास आने पर मनबोध बाबू ने जब पत्नी से अपनी आंख
के नीचे के काले धब्बे और पीले रंग के बारे में पूछा तो नाराज हो गई जैसे यह गैर जरूरी
बात हो। कहा-इसी के लिए बुलाया था। गौर से देखा भी नहीं और कह दिया कि इसे मै कई
साल से देख रही हूं यह ऎसा ही था।
कह कर जैसे आई थी चली गई।
मनबोध बाबू ने सुन तो लिया मगर उनको पत्नी की बात पर यकीन
नहीं हुआ। पहले की तरह आखों के नीचे के भाग को छूती, थोडा फ़ैला कर देखती और यही बात वैसे कहती जैसे पहले कहती
थी तो उनको भरोसा हो जाता। मगर पत्नी को अब फ़ुरसत कहां है उनके लिए। अब तो बेटे और
बेटी ही उनके लिए सब कुछ है।मनबोध बाबू को अपना खयाल खुद ही रखना ही पडेगा।
आंखो के नीचे काला पडने का मतलब क्या खून की कमी है?
मनुष्य के शरीर में खून की
कमी हो जाने पर कमजोरी,
थकावट, शक्तिहीनता और चक्कर आने लगते है। कई बार चमडी पर समय पूर्व
झुर्रियां पड जाती है ,याददाश्त की कमी, मामूली काम करने या चलने पर सांस फ़ूल जाना, ,सिर दर्द होना और दिल की धडकन बढ जाना ये लक्षण भी रक्त की कमी के रोगी में अक्सर
देखने को मिलते हैं। कभी किसी ने खून की कमी के
कारण आंखो के नीचे काला होने का जिक्र नहीं किया इसलिए सहज हो गए मगर न जाने क्यों मन में यह अहसास बना रहा कि उनके शरीर में खून कम हो गया है।
एकाएक मनबोध बाबू को खयाल आया कि एक सप्ताह पहले उनकी साली
आई थी। उसका लडका कुछ स्केच बना कर मनबोध बाबू को दिखाना चाहता था । उसके पास कागज
था पेन्सिल थी मगर छिलने वाला कटर छूट गया था । मनबोध बाबू को याद आया कि वे तो
बचपन में ब्लेड से पेन्सिल छीलते थे। वे तुरत उठे और दाढी बनाने वाले बैग से ब्लेड
निकाल उसकी पेंसिल छीलने लगे। पेन्सिल छीलते समय उनकी उंगली कट गई थी और बहुत खून
गिरा था । हो सकता है कि उसकेकारण लग रहा हो कि शरीर में खून बहुत कम है। इसका
मतलब कि खाना पीना ठीक रहा तो दो चार दिन में सब कुछ ठीक हो जाएगा।
मगर ऎसा नहीं हो सका।
बल्कि उसके बाद तो जैसे यह नियमित क्रम बन गया। एक माह तक सुवह
नींद खुलने के बाद मनबोध बाबू को देह में रोज ही कुछ कम लगता खून। अब कमजोरी के लक्षण साफ़ सामने आने लगे।
एक दिन जब सुवह मनबोध बाबू की नींद खुली तो हद हो गई। वहीं चिटियों
का रेगना और वहीं उनके पावों की चुभन मगर तेज बहुत तेज चुभन ।लाख चाहने और प्रयास
करने के बाद भी उनकी आंख खुल ही नही रही थी । हिलाने के बाद भी हिल ही नहीं रहे थे
उनके हाथ । और पांव तो जैसे बिस्तर पर जड हो गए थे। करवट बदलना चाहा तो नहीं बदल
पाए। खुद को इतना अशक्त , इतना कमजोर कभी महसूस नही किया था मनबोध बाबू ने। लगा
जैसे आज आखिरी दिन हो उनका।काफ़ी मशक्क्त के बाद जैसे तैसे उनकी आंख खुली तो तेज चक्कर
आ रहा था। लग रहा था जैसेउनके चारो ओर आसमान घूम रहा हो। किसी तरह अपनी ताकत समेट
उठे और घडी देखा तो पता चला कि रोज के वजाय कुछ जल्दी जाग गए थे आज। नित्य क्रिया
से निपटते निपटते सब कुछ सहज हो गया था मगर मनबोध बाबू असहज हो गए थे।
उनके भीतर यह यकीन बैठ गया कि कि जरूर कोई हॆ...चीटियो या दीमक की तरह जो समा गया है मेरे भीतर और सुवह तीन
से चार बजे के बीच निश्चित समय पर रेंगता हॆ और उन्हें बेचैन कर देता है।मगर सवाल बना रहा कि आखिर कौन है यह ?क्या चीटियां
या कोई और?
४
कई साल पहले एक बार पिताजी के साथ गांव का सकुचहा नाला पार
करते हुए मनबोध बाबू के पांव से एक जोंक चिपट गया था और उन्हें पता भी नहीं चला।कमाल
यह था कि जोंक उनके पैर से सटा उनके साथ घर तक चला आया था और उन्हे इसका अहसास तक
नहीं हुआ। घर आने के बाद खाना देते हुए मां ने उसे देखा और कहा- अरे ये जोंक कब से
तुम्हारा खून चूस रहा है।
मनबोध बाबू ने उस जोंक देखा तो डर गए।
मांस का घिनौना सा एक लाल लोथडा उनके पैरों से सटा लटका हुआ
था,मनबोध बाबू ने उसे नोच कर फ़ेंकना चाहा तो मां ने रोका और किचन से लाकर उस पर
नमक गिरा दिया। नमक गिरते ही जोंक ने उनका पैर छोड दिया। यही नहीं जितना उनका खून
चूसा था सब आंगन में उगल दिया और मर गया।
मां देर तक देखती रही और अंत में कहा-जब कभी तुम इस तरह की
जगहो से गुजरो साथ में नमक रखा करो
मनबोध बाबू ने पूछा-नमक, क्यों?
इस धरती पर नमक ही वह चीज है जो किसी को स्वाद से अधिक
बर्दास्त नहीं होती.आदमी को भी नही,जोको को तो एकदम नही।मनबोध बाबू भौचक होकर मां
की ओर देखने लगे।
मां अपनी रौ में कहे जा रही थी-बीस साल के थे तभी तुम्हारी
नौकरी लग गई। अब तक तुमने जो भी कमाया अपने पिताजी को दिया। पिताजी ने तुम्हारे
पैसो से सारे भाई बहनो की शादी की और घर बनवाया। अब पैतिस साल की उम्र हुई
तुम्हारी।बडा बेटा नवी में है। बेटियां भी सयानी होंगी। अब तुम अपनी पत्नी का कहना
मानो और अपने बच्चों पर ध्यान दो। उन्हें लेकर शहर चले जाओ। इसके बाद मनबोध बाबू
ने अपने पिताजी से साफ़ साफ़ कह दिया कि अब मै आपको पैसा देने के बजाय अपनी पत्नी और
अपने बच्चो पर ध्यान दूंगा जिसे उनके पिताजी ने बडी कठिनाई से स्वीकार किया।
मां की बात मान कर मनबोध बाबू शहर आ गए और नौकरी कर ली। अपनी
आदत के मुताबिक घर की पूरी मल्कियत अपनी पत्नी को दे दी । वेतन में और ओभर टाईम से
जो मिलता लाकर पत्नी के हाथ में रख देते।
महीना भर घर कैसे चलता है इसकी जरा भी चिन्ता नहीं करते। वे
जानते थे कि मेहनत की कमाई से ऎश नहीं हो सकती, पेट ही भरा जा सकता है।वैसे भी जिन्दगी
कभी उनके लिए फ़ूलो की सेज नहीं रही मगर बुनियादी जरूरते कभी कम नही पडी। जब जैसी
जरूरत हुई,दिन रात खट कर काम किया। परिवार चलाने लिए कई बार कर्ज लेकर चुकाया और
इस तरह जीवन जिया कि कभी किसी के आगे सिर न झुकाना पडॆ।
एक दिन जब मनबोध बाबू आफ़ीस से घर लौट कर आए तो देखा कि उनका
साला आया था और भाई बहन में न जाने क्या कुछ पक रहा था। साले का चेहरा देख वे
पहचान ही नहीं पाए। एकदम जैसे हड्डियो का ढांचा,उसका चेहरा एक दम पीला पड गया थाजैसे
मरने ही वाला हो। मनबोध बाबू ने पूछा तो उसने कोई जबाब नहीं दिया। मनबोध बाबू समझ
गए कि घर में आठ आठ लोग खाने वाले और कमाने वाला अकेला। यह हाल तो किसी का भी हो
सकता है। पत्नी ने मनबोध बाबू की शंका को निराधार साबित करते हुए बताया कि एक दिन
रात को पीपल के पेड के नीचे पेशाब कर दिया । उस पेड पर एक चुडैल रहती थी ,साथ लग
गई। उसका चेहरा रोज रोज ऎसे ही पीला पडता जा रहा था। कहां कहां नहीं दिखाया। डाक्टरो
की कोई दवा कारगर नही हो रही थी। अंत में एक ओझा ने बताया कि उनके पीछे एक चुडैल
पडी है जो रोज रात को उनके पास आकर सोती है और धीरे धीरे उसका खून चूसती है।बडी
मुश्किल से उस चुडैल से पीछा छूटा है और अब उसी चुडैल से बचने और कुछ काम खोजने के
लिए यहां आया है।
और घर काक्या होगा?
सब लोग अब अलग हो गए है और अपने जोगाड में लगे है। उन लोगों
के लिए अकेला जान तो नहीं देगा न। मनबोध बाबू की पत्नी ने समझाया। इस बार मनबोध
बाबू ने पत्नी को गौर से देखा जैसे उनकी समझ में सब कुछ आ गया हो।
मनबोध बाबू केदो बेटे थे।
जो जितना पढ सका पढा दिया और अब वे अपने बारे में सोचने लगे
थे। उनके सोचने का तरीका मनबोध बाबू से अलग था।मनबोध बाबू की जीवन शैली बच्चों को पसंद
नहीं थी। वे धरती पर कम सपनो में अधिकजीते थे। सबके पास लैप टाप था। सबके पास
अच्छी कंपनी की मोबाईल था । मनबोध बाबू कभी बाजार जाते तो दो सौ रूपयो से अधिक का
कपडा नहीं खरीदते और बच्चो को दो हजार से कम का कुछ पसन्द ही नही आता। अभी उनकी
यात्रा जारी थी और विराम की कहीं कोई जगह नहीं दिख रही थी।
पत्नी ने कहा -पैसा खर्च करने के लिए ही कमाया जाता है
मगर खर्च करते समय अगर इस बात का अहसास रहे कि कितनी कठिनाई
से कमाया गया है तो वह कभी फ़िजूल खर्च नहीं होता। मन्बोध बाबू ने संकेतों में
समझाने का प्रयास किया पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ।
मनबोध बाबू समझ गए थे कि जिस नाव पर उनके बच्चे सवार है वो
उनके रोके से नहीं रूकेंगे इसलिए कभी रोकने की कोशिश भी नही की। सीखना होगा तो
अपने अनुभव से सीखेंगे वरना वे जाने उनका काम जाने।
कई दिनों तक सोचते रहने के बाद मनबोध बाबू ने एक दिन सबको
बुला कर कहा कि देखो,जब मै पचास साल का हो जाउंगा कोई काम नहीं करूंगा। जीवन का
पन्द्रह साल माता पिता को दिया, पन्द्रह साल बाल बच्चों को और अब पन्द्रह साल अपने
मन का जीवन जीऊंगा। उसके पहले तुम लोग तय कर लो कि क्या करना है। मुझे मुक्ति
चाहिए।
इस बात को उनकी पत्नी ने भी सुना और बच्चो ने भी मगर किसी
को यकीन नहीं था कि वे सच में ऎसा करेंगे।
अब तक के जीवन में नाराज होने पर कई बार मनबोध बाबू धमकियां
देते थे जैसे आज के बाद तुमको एक पैसा नहीं दूंगा, आज के बाद तुमसे बात नहीं
करूंगा, मगर बाद मेखुद ही पलट जाते थे। सबको यकीन था कि मनबोध बाबू इस बार भी पलट
जाऎगे, मगर पचास पूरा होते ही उन्होंने जो कहा था वही किया।
परिवार में उनका
विरोध था मगर जिन हालातों में संघर्ष करके उन्होंने परिवार को यहां पहुंचाया था वह
भी किसी से छिपा नहीं था इसलिए किसी को कुछ कहने की हिम्मत नही हुई। इस घटना की
खबर तेजी से उनके रिश्तेदारो और मित्रो के बीच फ़ैल गई। कई लोग उनको समझाने के लिए
आने लगे ताकि वे अपना यह निर्णय बदल ले। कई लोगो ने उनका पलायन कहा और कई लोगों ने
गीता का कर्म योग समझाया। कईयो ने कहा कि अपनी जिम्मेदारियां तो पूरी कर लीजिए।
मनबोध बाबू ने पूछा- कौन सी जिम्मेदारी
बच्चों की शादी
मनबोध बाबू हंस पडे।
जब वे मेरी पसन्द का कपडा नहीं पहन सकते तो मेरी पसन्द की
शादी करेंगे?
करेंगे क्यो नहीं
और पिताजी अपनी पसन्द की शादी करेंगे यह सुन कर बच्चे बिदक
गए। वे चाहते थे पिताजी शादी करे मगर उनसे जिन्हे वे पसन्द करते है । और इस घटना
के बाद सभी समझ गए कि मनबोध बाबू किसी की बात आज तक न तो माने है न मानेंगे।
५
जब तक मनबोध बाबू का बचा पैसा बैंक में जमा था ,परिवार का
वातावरण सहज रहा किन्तु उनके खतम होते ही सब कुछ असहज होने लगा। कई बार बच्चों के
बीच तू तू मै मै भी हो चुकी थी।
अब तक मकान का किराया विजली का बिल घर का राशन और सब्जी का
खर्च मनबोध बाबू देते थे इसका परिणाम था कि बच्चे जितना कमाते थे वह उनको अतिरिक्त
लगता था। कम कमाने के बाद भी बच्चे जाने अनजाने
उच्च वर्ग में जीने लगे थे। अब उन्हें महसूस हो रहा था कि पैसे कम पड रहे है।
उनकी पत्नी बात बात में अपने परिवार को आदर्श परिवार कहती
थी मगर अब सारा दोष मनबोध बाबू को दे रही थी कि बीच मजधार में लाकर छोड दिए. जिसकी
उन्हे बहुत परवाह नहीं थी। जो मिल जाता खा लेते जो मिलता पहन लेते जहां जगह मिलती
सो जाते और लगातार सोचते कि अब क्या करे?
मनबोध बाबू चाहते थे कि मुक्ति के बाद एक बार गंगोत्री से
गंगा का किनारा पकड पैदल चलते बंगाल की खाडी तक हो आए। इसके अलावे विंध्याचल के
पर्वत पर विजयादशमी के दिनो में दस दिन तक भिखारियों के साथ बैठ कर भीख मांगे।
मूंगफ़ली का झोला लेकर ट्रेन में बेचते हुए एक बार पूरे देश की सैर कर आए और जीवन
को अलग अलग तरीके से देखे, महसूस करे।मगर मनबोध बाबू ने अपनी इस योजना के बारे में
अभी तक किसी को कुछ नही बताया था और सच कहे तो तय भी नहीं किया था और बीच में चींटियो
का अध्याय आकर जुड गया था।
कुछ भी नया सोचने और करने के पहले शरीर से स्वस्थ तो रहना
ही पडेगा।
अपनी इस योजना में शामिल होने से पहले चींटियों से तो पीछा
छुडाना ही पडेगा।पीछा छुडाने से पहले यह साबित करना पडेगा कि वे चीटियां ही हैं। वर्षो
पहले मां के कारण जोंक से पीछा छूट गया मगर वह जोंक ही था।
कहीं मनबोध बाबू के पीछे भी कोई चुडैल तो नही पडी है।लेकिन
जब उन्हे पता चला कि जैसे जोंक जमीन पर नहीं पकड सकते वैसे ही चुडैले भी आदमी के अवशिष्ट
स्थलों पर आने की प्रतिक्षा करती है। जब तक आप वहां नहीं जाते किसी को नहीं पकडती
और सबसे बडी बात कि वे चीटियो की तरह कभी नहीं रेगती और उनसे देह में चुभन की तो
कल्पना ही नहीं कर सकते।
मनबोध बाबू टीबी के पास बैठे थे।
टीबी पर वे बस समाचार ही देखते है वह भी कभी
कभार। अचानक समाचार आया कि किसी शहर के अस्पताल में चींटियां किसी नवजात बच्ची की
आंख खा गई और उसकी मौत हो गई। समाचार सुन कर मनबोध बाबू बुरी तरह डर गए। एक ही
झटके में टी बी बन्द कर दिया और अपने कमरे में चले गए।
रात को खाना लेकर जब उनकी पत्नी आई तो बहुत परेशान
थी। मनबोध बाबू समझ गए मगर जब कुछ नहीं पूछा तो उनकी पत्नी ने कहा कि मैं बहुत
परेशान हूं। मनबोध बाबू ने फ़िर भी कुछ नहीं कहा तो पत्नी ने कहा-पूछोगे नहीं कि
क्यों परेशान हूं।मनबोध बाबू को हंसी आ गई-मंहगाई बहुत बढ गई है इस कारण परेशान
होगी
नहीं
तो देश में भ्रष्टाचार बढ गया है इस कारण
परेशान होगी
नहीं
तो राजनीतिज्ञों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के
बीच जो सांठ गाठ बन रही है उस कारण परेशान होगी।
इस बार उनकी पत्नी नाराज हो गई और कहा-क्यों
मजाक उडाते है मेरा?मैं इसलिए परेशान हूं कि आज बडका और छोटका में झगडा हो गया था
लगता था कि दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे है। मैं नहीं होती तो दोनों मे
से किसी न किसी की मौत हो गई होती।बडा वाला अपने लिए अलग घर खोजने गया है।
मनबोध बाबू का बडा बेटा चालीस हजार रूपया महीना
कमाता था । छोटा तीस हजार । आरम्भ में मनबोध बाबू की तर्ज पर बेटे सारा पैसा मम्मी
को देते थे मगर जब से मनबोध बाबू ने काम करना छोड दिया और उनका पैसा खतम हुआ सभी
अपना अपना पैसा अपनेपास रखने लगे थे । और अब हर छोटी बडी जरूरतों के लिए उनकी
पत्नी को हर बार बच्चों के सामने गिडगिडाना पडता था। कभी समझा कर कभी फ़ुसला कर
अपना काम चलाती आ रही थी मगर अब स्थिति असहज हो गई थी।
मनबोध बाबू की पत्नी ने आंख में आंसू भर कर
कहा-अब आप ही इसे सम्भाल सकते है
मैं?
हां
कैसे
इस बार उनकी पत्नी के चेहरे की मुद्रा बदल गई।
बडे प्यार से मनबोध बाबू के पास बैठ गई और उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा- तीनों
हर महीना दस दस हजार देने के लिए तैयार है। उपर से अगर आप महीने में बीस हजार का
भी इंतजाम कर दें तो मैं सब सम्हाल लूंगी। बस कुछ दिनों के लिए अपना निर्णय बदल
दीजिए, आपका ही परिवार है टूटने से बच जाएगा।
अगले पल मनबोध बाबू को खून चूसने वाली मकडियो का खयाल आया
जो खास कर गांव में पुराने बबूल के पेडों पर पाई जाती थी। वे ऎसा जाल बनाती थी जो
छोटे छोटे कीडो मकोडो को दिखाई नही देता था।
हवा में उडते जब उस
राह से गुजरते तो उनके जाल में फ़ंस जाते।
निकलने के लिए जितना ही प्रयास करते उतना ही उलझ जाते। बबुल
के डाल पर बैठी मकडी उनको देखती रहती और जब वे थक कर चूर हो जाते आकर आराम से उनका
रक्त चूस लेती और मार डालती।क्या किसी अदृष्य मकडी ने उनके चारो ओर जाला बुन दिया
है और वे उसमें फ़ंस गए है।
मनबोध बाबू ने पत्नी को टालने के लिए कहा कि
सोचूंगा ।
६
बिस्तर पर गए तो अचानक चींटियों की याद आ गई ।
आज सुवह नींदखुलीमगर आंख खुल नही रही थी
।हिल ही नहीं रहे थे हाथ और पांव ।चक्करआरहा था, उनके चारो ओर आसमानघूम रहा था। मनबोध बाबू को लगा किअगर
कल सुवह भी ऎसा ही हुआ तो क्या होगा। कहीं ऎसा तो नहीं कि चींटिया उनके सो जाने के
बाद आती है, उनके भीतर समाती है और जागने के पहले कर चली जाती है। पता नहीं क्यों
उन्हें इस पर यकीन होने लगा और मनबोध बाबू ने तय किया कि आज चाहे जो हो जाय आज की रात
वे सोऎगे नहीं।
आज
वे जागकर देखेंगे कि कैसी चीटियां है ये और चाहती क्या है?
मनबोध
बाबू ने बिस्तर पर जाकर थोडी देर नाक बजाकर सोनेका नाट्ककिया ताकि चीटियों को यकीन
हो जाय कि वे सो गए है। देर रात और लगभग भोर पहर
तक जागकर इंतजार किया मगर कोई नहीं आया और न ही चीटियों के रेंगने का अहसास हुआ। सबसे
बडा चमत्कार यह था कि दो दिन पहले और कल सुवह भी ठीक इसी वक्त उनकी आंख खुली थी और
चीटियों के रेंगने के कारण उनका समूचा शरीर जैसे चनक रहा थालेकिन अभी वे विलकुल
स्वस्थ और सहज थे।
थोडी देर बाद भोर की हवा चली तो उनकी आंखे बोझिल होने लगी ।
और आंखे लग भी गई होती अगर असली मंजर दिख न जाता । सामने
देखकर उनकी आंखे फ़टी रह गई और शरीर के रोंगटे खडे हो गए।
जिस तरफ़ उनके पांव थे, उधर से खटमलों का एक कारवा तेजी से
उनकी ओर बढ रहा था । खटमलो की शक्ल और सूरत देखकर मनबोध बाबू दंग रह गए।गोलमिर्च
जैसे खटमल ,मंगरैला और जीरा जैसे खटमल,हल्दी धनिया और बडी बडी मिर्च जैसे खटमल ,चावल
जैसे दाल जैसे गेंहू जैसे.आलू और प्याज जैसे खटमल ,फ़ल और मिठाई जैसे खट्मल ,दवा
जैसेखटमल उनकी ओर तेजी से बढ रहे थे और ठीक उसी वक्त लगा कि उनकी चमडी के भीतर कुछ
रेग रहा है और चनक बढ रही है।
मनबोध बाबू को इस बात का अहसास नहीं था कि जिस तेजी से ये
खटमल उनकी ओर बढ रहे है उसी तेजी से उनके शरीर के हर रोम के छिद्र से सिर निकाल
चीटियां झांक रही थी और मुकाबले के लिए खुद को तैयार कर रही थी
एक खटमल जो सबसे आगे था उसकी आकृति एकदम गैस के सिलिंडर की
तरह थी। एक खटमल जो दूर खडा था,और घूर कर उनको देख रहा था उसकी शक्ल तो एकदम
मोबाईल जैसी थी। उसके पीछे देखा तो बाप रे
बापलैप टाप ,टीबी फ़्रीज और वाशिंग मशीन जैसे। मनबोध बाबू को लगा किउनकी दिनचर्या
में जितनी भी चीजे शामिल है खटमल उनकी आकृति में बदल चुके है।मनबोध बाबू को यकीन
ही नहीं हुआ कि कि अब तक जिन चीजों का इस्तेमाल वे देह में खून बनाने के लिये करते
थे, उनकीशक्ल बना कर खटमल उनका खून चूस रहे है।
अचानक मनबोध बाबू को अपने शरीर पर वहीं चुभन महसूस हुई और
देखा तो भौचक रह गए। हां वे चीटियां ही थी जो चीटियों की शक्ल में उनके रोम कूपो
से बाहर निकल आई थी और पूरी ताकत से खटमलो से लड रही थी।चीटियो के प्रति अब उनके
मन में गुस्सा नहीं श्रद्धा का भाव था।
मनबोध बाबू को लगा कि उठकर चीटियों की मदद करनी चाहिए।
अरे यह क्या हाथ उठाया तो नहीं उठा। पांव उठाया तो हिला भी
नहीं।करवट बदलने की कोशिश की मगर कुछ नहीं हुआ। असहाय की तरह मनबोध बाबू पडे रहे
और चीटियॊं और खटमलों की जंग देखते रहे। खटमल और चीटियां एक दूसरे से जूझ रहे थे।
खटमल अपने पेट से चिटियों को मसल रहे थे और चिटियों ने जिन खटमलों को काटा था वे
खून से लथपथ थे ।
कमरे मेबदबू फ़ैल गई थी ।
खटमलो के खून में इतनी बदबू थी कि सांस लेना भारी पड रहा था
और अब सिर में चक्कर भी आने लगा था।
चमडियों के पीछे चुभन काफ़ी तेज हो गई थी और विलकुल यही
विलकुल ऎसा ही हुआ था कल भी। थोडी देर तक यूं ही चलता रहा और अचानक दरवाजा खुलने
की आवाज आई। ज्योहिं उन खटमलो को पता चला कि कोई कमरे में आ रहा है ,सभी खटमल एकसाथ
उडकर भागे और सामने दीवार में लगी बडी सी टी बी मे समा गए। उसी गति से चीटियां भी
उनके पीछे भागी और टीबी मे समा गई।सबसे गजब बात थी कि मनबोध बाबू भी उन चींटियॊं
के संग एक चीटी में बदल गए थे और उनके साथ भाग रहे थे। टी बी मे समाते ही खटमलों
की आकृति बदल गई। वे एक दूसरे से जुड गए थे और अब केबल के तार पर सांप की तरह भाग
रहे थे। चीटियां उसी गति से उनका पीछा कर रही थी उनके साथ मनबोध बाबू भी थे। छत पर
लगे डिस्क एन्टीना तक खटमल आए और चीटियों को अपने पीछे आते देखा तो हवा में उड
चले।न जाने कैसे चीटियों को भी पंख निकल आए और वे भी उनके पीछे हवा में उड चली।
मनबोध बाबू के पंख नहीं उगे और वे ठ्गे से देखते रह गए।
कुछ आवाज आई और झटके से मनबोध बाबू की नींद खुल गई। शरीर पर
सिहरन के निशान अब भी थे। इसके पहले कि वे कुछ समझ सके उनकी पत्नी और दोनों बेटे
दौड कर आ गए।
क्या हुआ?
और सबने जब देखा कि टीबी टूट गई है तो उनकी पत्नी ने घूर कर
मन बोध बाबू को देखा। उनकी आंखे विलकुल खटमलो की तरह थी।
उनकी पत्नी ने कहा-ये क्या कर दिया आपने ?
बडे बेटे ने कहा- पगला गए है पापा।
मनबोध बाबू के जमाने का बक्सा वाला टी बी बेच लोन लेकर यह
एल सी डी टीबी उनके छोटे बेटे खरीदा था
।आई पी एल आरम्भ होने वाला था। छोटे बेटे ने गुस्से में मनबोध बाबू का कालर पकड
लिया था और गालिया बक रहा था। मनबोध बाबू की नजर उस कमरे पर गई ,वह कमरा भी एक बडे
खटमल की तरह दिख रहा था और उनकी ओर लाल लाल आंखे किए बढ रहा था।
मनबोध बाबू को अब कुछ सुनाई नही दे रहा था।
उन्हें बचपन में मां के मुंह से सुनी गई नन्हीं चिडिया और चींटी
की कहानी याद आई। चिडिया को अकाल के दिनों में कहीं से एक दाना मिला था। खाने के
लिए उसने दाने को एक खूँटे से रगड़कर
दो भागों में तोड़ने की कोशिश में उसी खूंटे में अंटक गया था। चिडिया बढ़ई के पास गई
और कहा-“बढ़ई-बढ़ई खूँटा चीरो,खूँटे में मोर दाल बा,का खाई का पीई, का ले परदेस जाई?”बढ़ई ने मना कर दिया तोचिडिया राजा के पास
गई और इस क्रम में मना करने पर सांप लाठी आग नदी और हाथी के पास गई और सबने उसे
मना कर दिया।
चिडिया रोतीहुई जा रही थी। उसका विलाप एक
चींटी ने सुना। उसने कहा कि चलो मैं तुम्हारी समस्या का समाधान करने की कोशिश करती
हूँ। वह सीधे हाथी की सूँड़ के अन्दर घुस गयी और काटने लगी।हाथी परेशान हो गया और
बोला-“हमें काटो-वाटो मत कोई, हम नदी सोखब लोई”और वह नदी सोखने नदी के पास जा पहुँचा।उसके
बाद सब कुछ बदल गया। नदी आग के पास गई आग लाठी के पास, लाठी सर्प के पास और अन्त
में बढई ने खूंटा चीर दिया और चिडिया को दाना मिल गया।
मनबोध बाबू को भी अपना रास्ता मिल गया था।
घर छोड कर जाने से पहले उन्होंने पत्नी से
एक बार पूछना जरूरी समझा- मैं जा रहा हूं, तुम बच्चो के साथ रहोगी या मेरे साथ?
जल्दी तय कर लो?
तय करने के वजाय पत्नी ने सवाल पूछा-कहां जाओगे
जहां खटमल न हो
कहां मिलेगी ऎसी जगह
मिट्टी में खटमल नहीं रह्ते।
इतना कहने के बाद मनबोध बाबू को खटमलों के
पीछे उडती हुई चीटियां याद आई और लगा जैसे उनके भी पंख निकल आए हो और वे भी खटमलों
के पीछे जा रहे हो।

