Thursday, April 17, 2014

क्या ग़ज़ब की बात है कि जिंदा हूँ

कविताओं में नयापन कम दिखता है जबकि मर-तमाम कविताएं रोज छपती हैं. इसका एक कारण यह है कि ज्यादातर कवि बनी -बनाई लीकों पर चलते हैं. इसमें एक सहूलियत रहती है कि सफलता का फार्मूला मिल जाता है. कोई सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की तरह नहीं कहता- मुझे अपनी यात्रा से बने ये अपरिचित पंथ प्यारे हैं'. बहरहाल, मुझे ऐसी कवितायेँ प्रभावित करती हैं जो सफलता-असफलता के भाव से मुक्त कुछ नए ढंग से कहने की कोशिश करती हैं. अंकिता आनंद की कविताओं ने इसी कारण मुझे आकर्षित किया. आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन. 
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1.
अधपका
अभी से कैसे परोस दें?
सीझा भी नहीं है।
पर तुम भी तो ढीठ हो,
चढ़ने से पकने तक,
सब रंग देखना होता है तुमको।

2.
चाहिए
उधेड़ने की हिम्मत,
बुनने का शऊर
और एक अन्तहीन रात्रि की असंख्य सम्भावनाएं। 


3.
जवाबतलब
लड़ना है तुमसे,
लड़े क्यों नहीं मेरे लिए?


4.
महामृगनयनी

फ्लाईओवर, सेमल, बादल  
उठी नजरों की भेंट तो इन्हीं से होती है।   
पर जब नज़र पर पहरा बिठानेवालों की मुलाकात इन नजरों से होती है,
तो ये खुरदरापन, लहक, नित-नवीन-आकार उन्हें पसोपेश में डाल देते हैं। 
वे ढूंढ़ते रहते हैं गुलाबजल में डूबे उन संकुचित होते रूई के फ़ाहों को,
जो डालने वाले की आँखों में जलन
और देखने वाले की आँखों को शीतलता प्रदान करते हैं। 

अभी वक्त लगेगा उन प्रहरियों को समझने में
कि उन नजरों का दायरा बहुत बढ़ चुका है,
कि वे चेहरे पर अपना क्षेत्रफल बढ़ाते जा रहे हैं।
और इस बीच वह दायरा विस्तृत होता रहेगा,
नज़रबंदी की सूक्ष्म सीमाएं उसमें अदृश्य बन जायेंगी। 


5.
जो तटस्थ हैं 
    
क्या ग़ज़ब की बात है
कि जिंदा हूँ। 
गाड़ी के नीचे नहीं आई,
दंगों ने खात्मा नहीं किया,
बलात्कार नहीं हुआ,
मामूली चोट-खरोंच, नोच-खसोट ले निकल ली पतली गली से। 

अपने-अपने भाग्य की बात है। 
जाने बेचारों के कौन से जन्म का पाप था,
जो शिकार हो गए। 

मेरे पिछले जन्म के पुण्य ही होंगे
कि शिकारियों की नज़र में नहीं आई,
उनसे नज़र नहीं मिलाई
जाने कौन से जन्म का पाप है
हाय, क्या सज़ा इसी पारी में मिल जाएगी?


6.
एक नई पेशकश

मेरी तरह तुम भी ऊब तो गए होगे ज़रुर,
जब बार-बार तुम्हारे पाँव के नीचे खुद को पानेवाली
बित्ते भर की जंगली फूल मैं अपनी कंपकपाती पंखुडियों से
तुम्हें वही पुरानी अपनी शोषण की कविता सुनाती हूँ,
(ये जानते हुए की प्रशंसा-गीत गाकर भी अब जान नहीं बचनी)
एक मरते इन्सान की आखिरी ख्वाहिश,
जिसकी बुद्बुदाहट वो खुद भी ठीक से नहीं सुन पाती
और आत्मघृणा से खिसिया मर ही जाती है। 

आओ अबकी बार कुछ नया करें,
एक नया खेल ईज़ाद करें। 
इस बार मैं तुम्हें एक ढीठ गीत, उछलते नारे और खीसे निपोरते तारे सी मिलने आती हूँ। 
खासा मज़ा आएगा, क्या कहते हो?



Tuesday, April 15, 2014

मेरे मरने के बाद मेरी कहानियों का नोटिस लिया जाएगा

 70 के दशक में जिन्होंने 'सारिका' पढ़ा होगा वह कथाकार आलमशाह खान को नहीं भूल सकता. उनकी एक कहानी 'किराए की कोख' के खिलाफ कितने पत्र छपे थे, उनको धमकियाँ मिला करती थी. उनकी हर कहानी से उस दौर में सामाजिक संतुलन का नाटक भंग होता था. वे सच्चे अर्थों में सबाल्टर्न के लेखक थे, दुर्भाग्य से आज उनको लगभग भुला दिया गया है. 'बनास जन' पत्रिका में जब प्रखर युवा आलोचक हिमांशु पंड्या का यह लेख पढ़ा तो अचानक उनकी कहानियों की याद आई जो एक ज़माने में खूब वाद-विवाद पैदा करती थी. आप भी पढ़िए. यादगार लेख- प्रभात रंजन 
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हम अहले सफा मर्दूदे हरम
वी शुड नॉट डेजर्ट अवर ओन क्लास ! हम यदि गरीब मध्य वर्ग में पैदा हुए हैं तो उसकी भाव स्थितियों को जरूर बताएंगे। प्रश्न विषय का भी है और दृष्टिकोण का भी। हममें से बहुतेरे ऊपर की श्रेणी में मिल गए हैं। वे हमारी भावनाएं प्रकट नहीं करते, कोई दूसरी दृष्टि प्रकट करना चाहते हैं।
                                       ग.मा.मुक्तिबोध, एक साहित्यिक की डायरी
इतना सजग और संवेदनशील व्यक्ति जब कहानी लिखता है तो उसकी टीस किराए की कोख का सृजन करती है और गिद्ध दृष्टि आवाज़ की अरथी जैसी अर्थपूर्ण कहानी का सृजन करती है। उसकी भाषा में एक परिश्रमी कलाकार का पसीना बोलता है और उसकी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति दूसरे रचनाकारों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकती है।
स्वयं प्रकाश, हमसफ़रनामा
आलमशाह खान हाशिए के लोगों के जीवन संघर्ष के गायक हैं। हमारे हिन्दी संसार में सदा ही जनपक्षधरता की बात की जाती रही है। डीक्लास होना आदर्श चाहे हो किन्तु स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी मध्यवर्गीय परिधि को यदा कदा ही लांघती दिखी है। ऐसे गिने चुने नाम जब भी लिए जायेंगे जिन्होंने निम्नवर्गीय पात्रों को केन्द्र में रखकर कहानियां लिखीं तो उनमें आलमशाह खान का नाम हमेशा आएगा। उनकी कहानियों का अस्सी फीसदी संसार ज़िंदगी की तलछट में जी रहे लोगों से बना है। उन्होंने ऐसे ऐसे पात्रों को अपनी रचना का विषय बनाया जिन्हें हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में दो पल ठहरकर ध्यान से भी नहीं देखते। कुल्फीवाले, कब्र खोदनेवाले, स्वांग दिखाकर भीख मांगनेवाले, नालबंदी करनेवाले, धूलधोए, कबाड़ी, कप-प्लेट मांजने वाले,यौनकर्मी -आलमशाह खान ने इनकी जिंदगियों को नज़दीक से देखा और उनके सच्चे चित्र हमारे सामने प्रस्तुत किये हैं।
हाशिए के इंसान को लेकर लिखी गयी हिन्दी की कालजयी कृतियाँ याद कीजिये। दाज्यू, ज़िंदगी और जोंक, गुलकी बन्नो, साग मीट, टेपचू, नैनसी का धूड़ा..... इन सभी कहानियों में और आलमशाह खान द्वारा लिखी गयी सभी ( और मैं ये बात जोर देकर कह रहा हूँ, सभी ) कहानियों में एक मूलभूत अंतर है। ये सारी कहानियां या तो किसी मध्यवर्गीय पात्र के उवाच में लिखी गयी कहानियां हैं या इनमें स्वयं लेखक नैरेटर बनकर बतकही के अंदाज़ में घटनाओं-परिस्थितियों का विवरण प्रस्तुत करता है। यह मध्यवर्गीय दृष्टि, निम्नवर्गीय पात्र की दारुण जीवनपरिस्थितियों के प्रति करुणा पैदा करने में सफल रहती है, दो भिन्न वर्ग के पात्रों के कारण अंतर्विरोध ( कंट्रास्ट ) भी उभर पाता है और मध्यवर्गीय सचेतनता के कारण बहुधा एक वैचारिक परिप्रेक्ष्य भी मिल पाता है। लेकिन - जिस हाशिए के इंसान की व्यथा कथा कहने की कोशिश इस कहानी ने की, उसके मन की थाह नहीं मिल पाती।

इसी बिंदु पर आलमशाह खान सबसे अलग हैं। विशिष्ट।

आलमशाह खान की कहानियों में कोई नैरेटर नहीं है। वे पात्रों की अपनी भाषा में उनकी व्यथा कथा कहते हैं। रेणु के यहाँ भी ऐसे पात्र अपनी भाषा बोली के साथ आये लेकिन उनके यहाँ इस जीवन की रूमानी मुग्धकारी तस्वीरें हैं, उनकी जहालत का उल्लेख प्रायः नहीं है। आलमशाह खान की कहानियों के पात्र निम्नवर्गीय ज़िंदगी की तलछट में जीने वाले हाशिए के लोग हैं। इनके पास अपनी दुःख-तकलीफ के वास्तविक कारण की विश्लेषणात्मक समझ चाहे न हो पर अपनी तकलीफों को बयान करने की भाषा जरूर है। यह भाषा बेहद लाउड है। झींकती-कलपती,गालियाँ बकती, रोज की लड़ाई के लिए तिकड़में भिड़ाती भाषा। इस भाषा में अपने प्रति करुणा पैदा करने का भी कोई खास आग्रह नहीं है, क्योंकि जिन लोगों से इनका संसार बना है, वे सारे इसी तलछट के सहभागी हैं। ‘आवाज़ की अरथी’ में यह संसार अपने पूरे तेवर के साथ मौजूद है. एक दूसरे के प्रति संशय रखते मियाँ-बीवी, बेटे के सहारे अपनी पार लग जाने का जुगाड़ करते माँ-बाप, सौतेले बेटे को पोस्त पिलाकर रोकर रखने वाला बाप - क्या यह अतिरंजनायुक्त यथार्थवाद है ? या हमीं इस दुनिया की पूरी ताब झेल सकने में असमर्थ हैं ? कहीं यह हमारा ग्लानिबोध तो नहीं ? इन पात्रों की संवेदना का स्रोत इसलिए तो नहीं सूख गया कि इन्होने हमसे जो पाया , प्रत्युत्तर में आगे बढ़ाया ? ‘आवाज़ की अरथी’ का नरसिंघा जब अपनी माँ से एक बार अपने हिये की बात कहता भी है, “माई री ! मैं तो हंसने बोलने को तरस गिया। इस कठगोले से जबड़ा पिरा गया। किसी दूसरे हिल्ले लगा दे न !” तो छग्गी का जवाब - “दूजा हिल्ला ? अपनी जनती को नचा चौपड़ पे। पर इस डायन को कौन देखे ?तू कौन मर जाएगा जो एक तनी दड़ी-गेंद मूँ में रख लेगा ?”  स्पष्ट कर देता है कि जहाँ खुद को बचाए रखना ही रोज की लड़ाई है, वहाँ किसी भी अपने के लिए करुणापूर्ण भाषा की उम्मीद बेमानी है। भाषा का कटखनापन दरअसल पात्रों के जीने-जागने की पहचान है। यह उनकी अदम्य जिजीविषा है।

हो सकता है कि मध्यवर्गीय वाचक अथवा पात्र के द्वारा संप्रेषित कुछ वाक्य कहानी की पक्षधरता, लेखक की प्रतिबद्धता और सबसे बढ़कर एक व्यापक वैचारिक परिप्रेक्ष्य दे पाते लेकिन इस दृष्टि का प्रवेश न होने देना लेखक का एक सायास निर्णय है। इसके पीछे कहीं न कहीं ये विश्वास है कि जिस परिवेश को अपनी सम्पूर्णता में उसने चित्रित किया है, उसके बाद किसी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक विश्लेषण की पृथक आवश्यकता नहीं है। यह अपने पाठकों पर विश्वास की बात है।

प्रेमचंद ने ‘कफ़न’ कहानी में दिखाया था कि यह कामचोरी नहीं है जो भूख का बायस बनती है बल्कि यह भूख है जो जब देखती है कि मेहनत का सिला रोटी हो ही, यह कतई जरूरी नहीं – तो कामचोरी की ओर बढती है। आलमशाह खान की सतर्क नज़र उन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को दिखाती चलती है जिनके चलते एक मनुष्य सामाजिक पददलितता की ढलान पर लुढकता जाता है. प्लास्टिक के खिलौनों से पटा बाज़ार ‘आवाज़ की अरथी’ के कागज़ के खिलौने बनाने वाले परिवार को बेरोजगार कर देता है तो ‘लोहे का खून’ के करीम का पुश्तैनी नालबंदी का पेशा बाज़ार में मिलने वाले रेडीमेड पुर्जों की बलि चढ जाता है। बाज़ार की खासियत यह है कि उसके नियम सदा ही छोटे खिलाड़ी के लाभांश को संकुचित करते हुए बड़े खिलाड़ियों की रक्षा में सन्नद्ध रहते हैं। ‘सांस भई कोयला’ की रमली इस राजनीति को जानती है, खेल के नियम बदल भले न पाए, “मैं बापुड़ी लगाऊंगी आग ? वो भी हाट-बजार में...देखो नी; आज तो एक किलो कोयले का पूरा एक रुपा खुलवा लिया इस सिंधी मुए ने... हम बढ़ाएँ मजूरी में एक चवन्नी तो गिराक के माथे सात सल चढें और बजार में एक के दस ले ले बनिया तो कोई नी पूछे ! यूं ही तो मर रिये हम; हाड़ तोड़ मजूरी करके भी।” 

स्वाभाविक है कि आलमशाह खान की कहानियों में प्रत्यक्ष खलनायक प्रायः नहीं होते। ‘पंछी करे काम’ का सेठ या ‘दंडजीवी’ के महाराज जैसे पात्र उँगलियों पर ही हैं। बहुतायत तो ‘आवाज़ की अरथी’ के फन्ने, ‘मुरादों भरा दिन’ के सत्तार या ‘तिनके का तूफ़ान’ के जबरे जैसे पात्रों की है जो स्वयं इस व्यवस्था के सताए हुए हैं, इसका स्पष्ट संकेत आलमशाह खान अपनी कहानियों में देते चलते हैं। ‘जबरा, मंगत तोले का आगेवान। डीलडौल से ड्योढा होकर भी आधा आदमी था। एक पैर छोटा पिंडली तक; दूजा बड़ा और गंठला। एक हाथ उसका सही तो दूसरा कोहनी तक ठूंठ। एक आँख नापेद तो दूसरी आधी बंद, पर चमकदार और खाऊ। वह एक मोटे लठ्ठ के सहारे कूद कूद कर चलता था। लठ की गाँठ ऊपर फंदी रुकी छोटी पटिया पर टिकाकर टीले के भूखे-भीरू, नशेड़ी लतखोरे छोरा-छोरी, डींगे-हरामखोरों को हांकता था। सभी उसकी डबक में थे। उसका लगाव जुड़ाव किसी से था तो खुद से। वह कहता, “जब उस अजाने-अनदेखे पत्थर में पैठे देव-भगवान ने मुझे आधा आदमी बनाकर जनम दिया तो मैं किसी दूसरे को क्यों पूरा देखूं-रखूँ। सबकी खंडत करूँगा। सबको तोडूंगा-बखेरूंगा।”   ( ‘तिनके का तूफ़ान’)

‘आवाज़ की अरथी’ की छग्गी जब फन्ने को कोसती है कि वह नरसिंघा को हनुमान बनाकर उसपर जुलुम इसलिए कर रहा है कि वह उसका अपना बेटा नहीं है तब फन्ने का कथन उसकी प्रकट अमानवीयता के पीछे की विवशता को हमारे सामने रख देता है, “अरे ! मेरा तुखुम होता तो कौन राज करता ? इधर-उधर मोटे-मानुस की सेवा-टहल में खुटता, मिमियाता डोलता या तेरी मेरी तर्ज पर भूखों मरता..... तू नी चाहे तो मुझे क्या पड़ी ? मैं फिर छींके-पिंजरे गढ़-गाँठ दूंगा, रद्दी कागज़-गत्ते के फिर मोर-चिड़िया बना दूंगा। लिए डोलना उन्हें उड़ाने-बेचने को... तू जाने अपनी तो डेढ़ टांग है, उसे लेकर लंगड़ाता-लठियाता चल भर सकूं हूँ ।” और इस संवाद के तत्काल बाद कहानीकार का व्यंग्य गरीबी-संतोष-मेहनत-तरक्की की हमारी किताबी समझ की कपालक्रिया कर देता है, ‘इतना बोल फन्ने ने पास बिखरे ‘मजबूत इरादा, कड़ी मेहनत, पक्का अनुशासन’ वाले पोस्टरों को सहेज लिया और खिलौनों के लिए क़तर-ब्योंत करने लगा।’

‘आवाज की अरथी’ के स्वांग रचने वाले भिखमंगे हों या ‘लोहे का खून’ में ट्रकों पर नाल टांकने वाला करीम - ये मेहनत से रोटी कमाने के परिचित रास्तों पर ठोकर खाने के बाद ही इस रास्ते पर आये हैं। ‘लोहे का खून’ के करीम को हम एक के बाद एक कितने ही रोजगारों में जुटते और असफल होते देखते हैं। सीमेंट की बोरियां सिलने का धंधा माँ-बेटी के लिए खून की कै लाता है तो काले घोड़े की नाल टांगने का धंधा करीम के लिए ग्लानि। जहाँ बिरादरी से करीम को धिक्कार मिलती है वहीं कचरू मोची और रामलखन से वह मिलता है जिसे समझना करीम जैसों के लिए सबसे जरूरी है – वर्गीय एकता की पहचान।

यह विडम्बना उल्लेखनीय है कि फन्ने ( आवाज की अरथी ) और करीम ( लोहे का खून ) को सबसे हुनरमंद हम तब पाते हैं, जब वे आस्था के नाम पर झांसा देने का बूता लेकर निकलते हैं। वो जो बस स्टैंड पर एक गूंगी होने का स्वांग करती लडकी आपके हाथ में एक कार्ड थमा देती है, जिस पर किसी फादर या मौलवी की ओर से आपके नाम मदद की अपील लिखी होती है या वो गांधी सर्किल की रेड लाईट पर शनिवार को एक तेलभरा बर्तननुमा लेकर लड़का आपको रोकता है, अब इन्हें फिर ध्यान से सुनिए। वे दरअसल ये कह रहे हैं कि झांसा देना उन्होंने आपसे ही सीखा है। आज अगर वे झांसा देने में इतने कुशल हो गए हैं तो तय मानिए आपकी तालीम बहुत अच्छी रही।

‘दण्ड-जीवी’ सामंतवाद के खिलाफ लिखी गयी हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक है। इसे भी एक राजस्थान के लेखक द्वारा ही लिखा जाना था क्योंकि राजस्थान में सामंतवाद अपने प्रत्यक्ष और क्रूरतम रूप में औपनिवेशिक काल तक विद्यमान रहा है। बहुत से लोगों को नहीं पता होगा कि जब औपनिवेशिक सत्ता के साथ जर्जर होते सामंतवाद ने दुरभिसंधि की थी तब कई आधुनिक संस्थाओं या पदों के साथ पुरातन दण्डप्रक्रिया नहीं जारी रखी जा सकती थी, सो ऐसे में इस छद्म आधुनिकता के साथ अपनी ऐंठ बरकरार रखते हुए जीने के लिए दक्षिणी राजस्थान में ये खास पद अस्तित्त्व में आया- ‘मारखावण्या’ अथवा ‘मारबख्शी’। आज भी जब ताकतवर के प्रति पैदा हुई खीझ किसी कमज़ोर पर निकाली जा रही हो तब मेवाड़ में लोग इस शब्द को मुहावरे की तरह इस्तेमाल करते हैं। आलमशाह खान ने इसे बिलकुल लोककथाओं की शैली में ही लिखा है। अभिधा को अपने सशक्ततम रूप में काम लेते हुए अन्याय को विद्रूपतम रूप में प्रस्तुत किया गया है।

पूंजीवाद, कल्याण का नकाब ओढकर आता है और न्याय, बराबरी के नारों के साथ अपना शोषण का जाल बिछाता है इसलिए पूंजीवादी छल-छद्म को अरह्स्यीकृत किया जाना अभिप्रेत होता है। इसके ठीक उलट सामंतवाद इस स्तरीकृत समाज में परम्परा से प्राप्त ‘दैवीय’ प्रभुता के मद में इतराता हुआ अपने अन्यायी बल के साथ ही टिकता है। यहाँ अन्याय का प्रत्यक्ष वर्णन सटीक होता है जो करने वाला रचनाकार ‘बहुत कला’ का नहीं ‘परिवर्तन’ का आकांक्षी होता है. हमारे इस आधुनिक प्रतीत होते समय में भी जब जब सामंती संस्कृति के चिह्न दिखाई दें, तब तब एक नागार्जुन द्वारा ‘आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी / यही हुई है राय जवाहरलाल की’ लिखकर अभिधा में तंज किया ही जाता है। यह न भूला जाए कि जिस शहर में बैठकर आलमशाह खान कहानियाँ लिख रहे थे, उस शहर के लोगों के लिए इस राजा को पहचानना मुश्किल न था। खुद अपने को ‘राजाधिराज योगेन्द्रसिंह जी के. सी. एस. आई. जी .सी. एस. आई.’ कहने वाले इस राजा की अपने राज्य की जानकारी का स्तर यह है कि ‘कल रात खेमली ( गाँव ) लुट गयी’ सुनकर उसकी प्रतिक्रया होती है, “ वा रांड घर छोड़ एकली राते बारे क्यूं निकली ?”

महाराजाओं और महारानियों को विधायिका और संसद में अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजने वाले राज्य में ऐसी अनेक कहानियों की जरूरत थी और आज भी है। राजा की मदांधता, मूर्खता और रंगरेलियों का स्पष्ट विवरण करती हुई यह कहानी अंत में ‘दैवीय प्रभुता’ के उस मूल सिद्धांत पर ही करारी चोट करती है जब हत्यारा राजा अंत में कहता है, “राजा धरती पे ईश्वर-अवतार होवे। अन्याव वो कदी नी करे। अन्याव ने वो न्याव में ढालै। जो होणी थी सो कल हुई। न्याव आज भी राजरे हाथ है। राज हुक्म करे के गुजरा मारबख्शी रो बेटो आज और अब सूं नवो ‘मार-बख्शी’ है। राज ने भान है के नवो ‘मार-बख्शी’ मुटियार नी छोटो है, बारह बरस रो, भगवान भूतनाथ रे भरोसे राज री मार खावेगा तो काल बड़ो वे जावेगा।”

राज की मार -का ज्ञान, अबोधता को लुप्त कर- जल्दी ‘बड़ा’ बनाता है। ( यहाँ ‘राज’ को किसी भी प्रभुत्वशाली शोषक संस्था से विस्थापित कर दीजिए, वाक्य की अर्थछवियाँ रेडिकल हो जायेंगी।) आलमशाह खान की अविस्मरणीय कहानी ‘पराई प्यास का सफर’ भी ऐसे ही जल्दी बड़े हो गए बच्चे की कथा है। लखना बाल श्रमिक है और जीवन के थपेड़ों ने उसे सिखा दिया है कि कोई भी दुःख बड़ा नहीं होता क्योंकि पता नहीं आगे उससे कितना बड़ा दुःख और प्रतीक्षा कर रहा हो। कहानी में जब होटल पर बैठे कुछ लोग अपने काम की एकरसता के लिए हायतौबा कर रहे हैं, ठीक तभी हम इस लंबे प्रभावी दृश्य में लखना को तेरह बार ‘आडर’ पूरा करने के लिए ऊपर-नीचे करते देखते हैं। चकित ग्राहक पाते हैं कि लखना सुख-दुःख के प्रति निर्विकार हो चुका है। कहानी में अपने साथी बड़के के सामने भी जब वह ज़रा सा खुलता है तब हम पाते हैं कि भाई की मृत्यु, माँ की बदहाली, स्वयं का शोषण, टुनिया की याद ये सब मामूली से उद्वेग के साथ स्वीकार लेने वाले लखना का दिल टूटा तो तब जब एक छोटी बच्ची ने उसके लिए कह दिया- “गंदा...हुस्S !”

आश्चर्य है कि विकराल दुखों का सूचनाओं की तरह आना-जाना प्रसिद्ध कथालोचक मधुरेश को रचनात्मकता की कमी लगता है और वे इस कहानी को ‘यथास्थितिवाद की पोषक’ मानते हैं। ( हिन्दी कहानी का विकास, पृ. 158) अश्रुविगलित भावुक वर्णन की चाशनी चढाये बिना आलमशाह खान ने कहानी में इस त्रासदी को बखूबी दिखाया है जहाँ विकरालता भी दैनंदिन का हिस्सा बन जाती है। ‘ईदगाह’ में हामिद के खिलौने की बजाय चिमटा खरीद लेने पर बिछ बिछ जाने वाले लोग यह नहीं सोचते कि प्रेमचंद वहाँ हामिद के बचपन के नष्ट होने और उसके एक झटके में बड़ा होने की हाहाकारी कथा कह रहे थे। अविस्मरणीय फिल्म ‘लाइफ इज ब्यूटीफुल’ की सबसे बड़ी सुंदरता ये थी कि वहाँ एक पिता न सिर्फ अपने बेटे की रक्षा करता है बल्कि वो सारे नाजी कैम्प को एक खेल बताकर इस सारी वीभत्सता की खरोंच अपने बेटे के बचपन पर पड़ने से बचाता है। ‘पंछी करे काम’ के सनीचरा,अब्दू, गफूर, रमजू और मसीता के पास ऐसा कोई भी नहीं है जो उनके बचपन को घायल न होने दे इसलिए वे खुद अपने नन्हे हाथों उसे संभालने की कोशिश करते हैं। ये सारे, - और इनमें ‘भूखे फरिश्ते : खुशबू की दावत’ के राधू, जनकू, नूरा, ममदू को भी जोड़ लें - सब आपस में भूखे रहने की शर्त बदते हैं और एक दूसरे को चुनौती देते हैं। यह शर्त नहीं मजबूरी है -इस सच से सामना न हो, इस कोशिश में सारे पंछी ‘धरमिंदर-हेमा की फिलिम’ देखना ज्यादा महत्त्वपूर्ण मान रहे हैं, पर, क्या सच से सामना नहीं हुआ है, या रोज-ब-रोज नहीं होता इनका ? ऐसा लगता है जैसे इन सब बच्चों के भीतर एक बड़ा बैठा हुआ है जो दूसरे हाथ से अपने बच्चे को थपकी दे रहा है। गौरतलब है कि इनमें से कोई भी कहानी खुद के प्रति करुणा जगाने की कोशिश करते बेचारे बच्चे की कथा नहीं है। तमाम दारुण दुखों के बावजूद यह धींगामस्ती करते, असम्भाव्य सपने देखते और खुशबू की दावत का शाहों की तरह निमंत्रण देते लड़ाकों की कथा है।

निर्धन-दलित-अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यकों में दलित, आलमशाह खान शोषण की बहुआयामी स्तरीयता को जानते थे। बच्चों के बारे में जैसे उनकी कई कहानियां हैं वैसे ही स्त्रियों के बारे में भी क्योंकि वे भी दोहरे शोषण की शिकार हैं। ‘किराए की कोख’ उनकी सर्वाधिक विवादास्पद कहानी कही जा सकती है.यह सारिका के जून,77 अंक में प्रकाशित हुई थी और साम्प्रदायिक शक्तियों ने इस कहानी को ‘हिन्दू धर्म पर चोट’ करने वाली कहानी बताते हुए निशाने पर लिया। कमलेश्वर ने आगे एक सम्पादकीय इस पूरे प्रसंग को उठाते हुए आलमशाह खान के पक्ष में लिखा। कहानी एक स्त्री के बारे में है और स्त्री देश-धर्म की पहचानों से पहले एक स्त्री होती है। मर्दवादी समाज का अंतिम उपनिवेश स्त्री, उसकी तमाम दरिन्दगियों, शोषण का दंश अपने शरीर और मन पर झेलती स्त्री और फिर अंत में आदिम पाप के लिए स्वयं अकेली पापिन करार दी जाकर पत्थर खाती स्त्री। ‘किराए की कोख’ की कुई, इस मर्दवादी समाज की मारी, बार बार छली गयी स्त्री अंत में अपने बेटे के सामने एक स्त्री की तरह पसर कर उसे अपनी मर्दानगी दिखाने की चुनौती देती है। इसे माँ-बेटे के रिश्ते को कलंकित कर देने वाला करार देकर ही सारा नैतिक पाखण्डपूर्ण वितंडा खड़ा किया गया। कहानी का अंतिम संवाद जबकि स्वयं स्पष्ट था कि “उजाले में नी परचे, आ अँधेरे में तू भी आ और दिखा अपनी मरदानगी !” कहकर कुई अससे ठीक पिछले प्रसंग में - जब बिरजू पत्थर खाती पगली कुई को बचाने उसका बेटा बनकर नहीं आया था - की याद दिलाकर उसे कोस रही है। वह कह रही है कि अंततः उसका बेटा भी एक पुरुष ही है।

आलमशाह खान की कई कहानियों में यह प्रविधि है। ठीक अंत में पात्र कोई ऐसा कदम उठाता है जो थोड़ा नाटकीय लगता है लेकिन उससे कहानी खत्म होने के साथ ही उसके पाठक के दिमाग में जारी रहने के दरवाज़े खुल जाते हैं। कुई का कथन निमंत्रण था या धिक्कार ? स्त्री की धिक्कार में इस समाज को अपनी बदसूरती आईने की तरह दिख जाती है और यही तकलीफदेह होता है।

‘मुरादों भरा दिन’ कहानी में सत्तार द्वारा अपनी पत्नी को देहव्यापार में उतारने का दृश्य और कारक जो उपस्थित किया गया है वह बड़ा औचक और इसलिए अविश्वसनीय सा लगता है। सत्तार को जिन पूर्ववर्ती परिस्थितियों में दिखाया गया है, जाहिर है देहव्यापार का फैसला तात्कालिक लगता हुआ भी तात्कालिक नहीं ही होगा, उसके पीछे कई सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ रही होंगी, लेकिन उन्हें दिखाने का प्रयास लेखक ने नहीं किया है। इसके बावजूद, कहानी यदि अविस्मरणीय बनती है तो सत्तार और नूरी के संबंधों की उस ऊष्मा से जो देहव्यापार की कालिख में दबकर भी नष्ट नहीं हुई है और राख से निकलकर अपनी लपट दिखाती है। सत्तार सुहाग के जोड़े को सात बार दरूद शरीफ फूंककर नूरी को पहनाता है और इस तरह उसे ‘पाक’ करता है, दूसरी ओर नूरी के सामने ग्राहकों और शौहर की एक दूसरे में डूबती उतराती परछाइयां तैर रही हैं।
हिन्दी में यौनकर्मियों के जीवन पर बहुत थोड़ी कहानियां उपलब्ध हैं और जो हैं उनमें भी पापमुक्ति, सुधारवाद आदि की ही छाप दिखाई देती है। ‘मुरादों भरा दिन’ दैहिक पवित्रता, स्वच्छता के परम्परागत शुचितावादी मानदंडों को नकारती हुई नूरी जैसा अविस्मरणीय चरित्र हमारे सामने रखती है। एक यौनकर्मी में सतत शोषण का शिकार होने के बावजूद गुनाहगार होने का ग्लानिभाव और इस कारण अपनी देह के प्रति पैदा हुई विरक्ति और इसके बाद भी इसी देह के सहारे अपने दाम्पत्य के बिखरे सूत्रों को संभालना इस कहानी को अपने समय से आगे की कहानी बनाता है।

यह कहानी सारिका के जनवरी,74 अंक में प्रकाशित हुई थी. इसी साल मथुरा नाम की एक लडकी के साथ थाने में दो पुलिसवालों द्वारा किये गए बलात्कार के मुकदमे में फैसला सुनाते हुए सत्र न्यायालय ने इस आधार पर अभियुक्तों को बरी किया था कि लड़की यौनानुभव की अभ्यस्त थी और उसका पर्याप्त प्रतिरोध न करना रजामंदी का सूचक था। इस फैसले के बाद भारत के स्त्रीवादी आंदोलन में एक जलजला आया और मर्यादा, शुचिता जैसे पितृसत्तात्मक मूल्यों से बंधी संरक्षणीय प्रवृत्ति को चुनौती देते हुए स्त्री की सहमति असहमति के अधिकार को केन्द्रीय प्रश्न मानने का आंदोलन शुरू हुआ। इस कहानी में जब सत्तार जान पर खेलकर मन्ना पहलवान का रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है, तब इसके पीछे दैहिक सुख की आकांक्षा से कहीं अधिक अपने भीतर के खाविंद के मरे हुए अहसास को जिलाने की ख्वाहिश है और नूरी, एक यौनकर्मी के लिए-अपने मरद के बांकपन -को पहली बार देखने ( भोगने ? ) का सुख। यदि इस कहानी के बरक्स ‘एक और सीता’ की नायिका सीती के इस कथन को भी रखकर देख लें, “रुकें ठाकुर ! ... उनके रहते मेरी लाज के धनी वे ही थे। अपने रहते अपनी बसत उन्होंने तुम्हें दी। उनके बीतने पर अपनी लाज की पहरू मैं हूँ। सुहाग उनका था। उन्होंने लुटवाया। दुहाग मेरा है, मैं तुम्हें न दूंगी। प्राण देकर और लेकर भी उसे सहेजूंगी।” तो कोई संदेह नहीं रह जाता कि आलमशाह खान लाज को देह, योनि से परे रखकर देखने की बात कर रहे थे जो इन कहानियों के लिखे जाने के चालीस साल बाद भी ‘इज्जत लूट ली’, ‘मुंह काला किया’ जैसी शब्दावली का प्रयोग करने वाले भारतीय मीडिया की समझ से परे है. 16 नवंबर,2013 की अंधेरी रात अपनी जान पर खेलकर लड़ जानेवाली ‘निर्भया’ के समर्थन में उमड़े असाधारण जनसैलाब द्वारा बुलंद आवाज़ में फिर इसे दोहराया गया कि बलात्कार का शिकार हुई स्त्री के कपड़ों, चालचलन आदि पर टिप्पणी करनेवाली मर्दवादी मानसिकता को भी वे बलात्कारी मानसिकता ही मानते हैं। ‘एक और सीता’ की सीती द्वारा खींची ‘लखन-रेखा’ किसी पुरुष द्वारा लगाया गया मर्यादा का बंधन नहीं है बल्कि एक स्त्री द्वारा ‘ना’ कहने के अधिकार की उद्घोषणा है।
इसे रेखांकित किया जाना चाहिए कि आलमशाह खान को भारतीय परम्परा में अनेकानेक रूपों में समाई पितृसत्ता का निरंतर अहसास है। हिन्दी कहानी की प्रगतिशील परम्परा में चोर कोनों से झांकने वाला पौरुषीय दंभ आलमशाह खान के यहाँ ज़रा भी नहीं है. ( ‘रणराग’ एकमात्र दुखद अपवाद है. ) 1963 में उन्होंने ‘अनार’ जैसी कहानी लिखी जिसकी नायिका द्विलिंगीय पहचान के दायरे से बाहर की है। आज भी हमारी भाषा के पास इन बहुल यौनिक अस्मिताओं के लिए उचित शब्द नहीं हैं, विमर्श की तो बात ही छोड़िये। ‘अबला जीवन का गणित’ कुलगौरव के नाम पर रक्तपिपासु बनकर लड़े और जान गँवा बैठे बेटों के पीछे रह गयी माँ-पत्नी का विलाप है तो ‘हरा ठूंठ : प्यासी बेल’ यौनिक अक्षम होने के बावजूद विवाह करलेने वाले पुरुष की पत्नी के अपने पति के सुलगते घावों को बुझाने के प्रयास में स्वयं भी ठंडक से परिचित हो जाने की कथा है।

आलमशाह खान के यहाँ स्त्री-पुरुष सम्बन्ध प्रचलित रैखिक दायरों में बंधे हुए नहीं हैं। नूरी और सत्तार का उल्लेख पहले आया है। ‘तिनके का तूफ़ान’ की दामली जो कितने ही लोगों द्वारा उत्पीड़ित होकर आज ऐसी हो गयी है - “अब वह फकत मांगती और भिखारिन थी। डाल से टूटी पत्तों-झड़ी सूखी-लक्कड़ टहनी. पीली जर्दा थी धूल-पसीना पुती, ठूंठ-ठहरी ठोड़ी पर रूआं नहीं। देह पर पिचके दो छिछड़े और कपाल पर काली कुतिया की पूंछ-से बाल लीतरे। बस इसके नार होने के यही लक्खन।” तो दूसरी ओर घीसू है - ‘बौडम लार टपकाता, टेड़ी आँख-नाक, एक बाजू तनी गर्दन, गन्ने की गाँठ तक गए हाथ और बांस-खंड की सी टांगों को घसीट घुटनों के बल रेंगता’ घीसू। दोनों के बीच चाहे आर्थिक समझौतों के चलते ‘प्रेम’ हुआ हो लेकिन यही तिनका दामली के लिए तूफ़ान खड़ा कर देता है और दामली को लगता है कि “कोई एक है जो उसकी लाज का पहरू है।” कहना न होगा कि आलमशाह खान के यहाँ विषम परिस्थितियों में प्रेम पनपता है। भट्टी में तपकर सोना निकलता है।

‘मेहंदी रचा ताजमहल’ भी संस्कारों की दीवारों को धक्का देकर हमारी प्रेम की बनी बनाई स्वीकृत छवि को ध्वस्त कर देने वाली कथा है जहाँ जवानी में धर्म की दीवार को न लांघ पाए दो जन आखिरकार बुढापे में अपने प्रेम का सार्वजनिक स्वीकार कर सहजीवन प्रारम्भ करते हैं और परिवार से भी इस फैसले के प्रति उचित सम्मान पाते हैं। यहाँ इस कहानी की तुलना ‘पगबाधा’ कहानी से करें तो दिलचस्प निष्कर्ष सामने आते हैं। ‘मेहंदी रचा ताजमहल’ के मुंशी और दुलारी अपने रिश्ते को कोई समाजस्वीकृत नाम दिए बगैर भी एक दूसरे में आसरा पा जाते हैं वहीं ‘पगबाधा’ की कविता और आलोक के बाकायदा विवाह कर लेने के बाद भी कविता यह पाती है कि आलोक के लिए लोक-लाज-मर्यादा के सामने प्रेम और विश्वास का कोई महत्त्व नहीं। पहली कहानी निम्नमध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि की है जिसके पात्र पर्याप्त आधुनिकता बोध से युक्त हैं जबकि दूसरी के नायक-नायिका अभिजात वर्ग से आते हैं फिर भी पुरातन पितृसत्तात्मक संस्कारों से पीछा नहीं छुड़ा पाए हैं। यह कहा जाए तो गलत न होगा कि लेखक के लिए आधुनिकता बोध जीवनदृष्टि का हिस्सा है, कोई नारा नहीं।

ठीक यही बात सौंदर्यबोध के बारे में है। आलमशाह खान वर्णन के नहीं चित्रण के उस्ताद हैं - बात बोलेगी, हम नहीं। उनका सौंदर्यबोध हमारे सुरुचिपूर्ण मानदंडों की सीमाओं को सामने रख देता है। ‘जूतों का कफ़न’ में पुराने जूतों की बदबू से घर का रुंधकर बासना या ‘लोहे का खून’ में सीमेंट की उड़ती धूल से सनी महिलाओं का खंखार कर थूकना या ‘साँसों का रेवड़’ में जिनावरों के रगड़े खाते डील से फैलती चमड़गंध, ऊपर से झरते मेंगनी-मूत और तल में रमी गंदगी- आलमशाह खान हाशिए के लोगों की ज़िंदगी के यथार्थ का साक्षात्कार रूप-गंध-स्पर्श के स्तर तक कराते हैं। ( ‘घिन तो नहीं आती है ?’ ) और विवरण की सूक्ष्मता इतनी कि एक तसले का धूलधोए के लिए क्या महत्त्व है, ये भी पाठक को ठीक से समझ आये, “मडगाड़ के टुकड़े से सनीचरा ने यहाँ-वहाँ नालियों मोरियों को उलीचा पर तलछट की ठीक ठीक टोह तसले में फैलाकर ही की जा सकती थी। बारीक तार - टुकड़े कापे-किरपे तसले के तल पर ही टिपते थे और तसला पंडत ने दाब लिया था।” ( पंछी करे काम )

यह हर दिन की लड़ाई है, ज़िंदगी की रस्सी पर संतुलन और कलाबाजी की खेल है, यहाँ तक कि भीख मांगना भी एक पेशा है जिसमें मेहनत और कला दोनों दरकार है, “जहाँ उसने ‘दाता’ को देखा नहीं कि धरती पर मत्था टेक अपने डंठल से बाजू कुहनियों को ऊपर उछाल ऐसी दया उपजाऊ चिरौरी चमकाता कि सामने वाला पिघलकर कुछ-न-कुछ देने को बेबस क्यों न हो जाए. कौड़ी सी टेड़ी-तिरछी पनियल आँखों में बेबसी-बेचारगी लाकर वह अपना टूंटिया हाथ माथे के आगे ले जाकर ऐसी अबोली गुहार करता कि राहगीर उसकी तरफ निगाह किये बिना आगे न बढ़ पाता। और जहाँ किसी ने उसे नज़र भर देखा नहीं कि वह दामली के मजीरों की धुन पर बिलबिलाकर मुंह में कौर न जाने का सांग धर अपना धंसा पेट उसे दिखा देता। यूं करते हुए उसके सकोरे में टना-टन होने लगती और दोपहर तक पेट-भराऊ कमाई हो जाती, ऊपर से कुछ पल्ले भी बंध जाता दामली के।” (तिनके का तूफान )

दलित चेतना की दस्तक से पहले हमारी हिन्दी का संसार इन विद्रूप सच्चाइयों के चौंधिया देने वाले प्रत्यक्ष वर्णन के लिए तैयार नहीं था। क्या आलमशाह खान वक्त से आगे के रचनाकार थे ? उन्होंने साठ के दशक में कहानियां लिखना शुरू किया था। सत्तर के दशक में समान्तर कहानी आंदोलन के समय उनका नाम धूमकेतु की तरह हिन्दी कहानी के पटल पर चमका पर समान्तर कहानी के अवसान के साथ ही कहीं बिला गया। समान्तर कहानी के अपने आग्रह-दुराग्रह और इसके कारण आलोचकों-इतिहासकारों के उसके प्रति आग्रह-पूर्वाग्रह का खामियाजा आलमशाह खान को भी भुगतना पड़ा। बीसवीं सदी के आख़िरी चार दशक उनकी रचनाधर्मिता के दशक हैं। इसी दौरान भारत बैंकों के राष्ट्रीयकरण से विदेशी पूंजी के सुस्वागतम की ओर बढ़ चला। आदिवासियों का अपनी जमीन से बेदखल किया जाना संस्थागत रूप से प्रारम्भ हो गया। साम्प्रदायिकता राजनीति अपने डैने फैलाती हुई हमारे घरों तक घुस आयी और भारत सरकार के आला अफसरों ने बताया कि आलमशाह खान की कहानियों के परिवारों को चाहिये महज- बत्तीस रुपये। क्या अब इस लेखक की कहानियों को फिर से नहीं पढ़ा जाना चाहिए ?
आलमशाह खान ने कमर मेवाड़ी से कहा था, “कमर, मेरे मरने के बाद मेरी कहानियों का नोटिस लिया   जाएगा। ”



Monday, April 14, 2014

हिंदी की पहली एडल्ट किताब पर एक लेख

फ्रैंक हुज़ूर की किताब आई है ‘सोहो: जिस्म से रूह का सफ़र’. पोर्न इंडस्ट्री की हैरतनाक सच्चाइयों से रूबरू करवाती हिंदी में पहली किताब है. इसके आरम्भ में लिखा हुआ है '18 वर्ष से अधिक आयु के पाठकों के लिए.’ मेरे जानते यह घोषित रूप से हिंदी की पहली वयस्क किताब है. फ्रैंक हुज़ूर के लेखन का रेंज कई बार चौंकाता है. इमरान खान की जीवनी लिखने से लेकर मुलायम सिंह की जीवनी लिखने तक और यह 'सोहो'. बहरहाल, इस किताब की समीक्षा मैंने 'हंस' के नए अंक में लिखी है. आप लोगों के राय-विचार के लिए- प्रभात रंजन 
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यह घोषित रूप से हिंदी की संभवतः पहली ‘एडल्ट’ किताब है. किताब के शुरू में ही लिखा है- ’18 वर्ष से अधिक आयु के पाठकों के लिए.’ ‘सोहो: जिस्म से रूह का सफ़र’ पुस्तक में पहली दिलचस्पी इस वाक्य ने जगाई. पुस्तक मेले के दौरान अपनी कई प्रिय लेखिकाओं-पत्रकारों को मैंने इस किताब से साथ फोटो खिंचवाते देखा. कुछ ने अपनी तस्वीरों को फेसबुक पर भी साया किया. यह ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे’ के बाद की किताबी दुनिया है, जिस उपन्यास ने स्त्री के नजरिये से सेक्सुअलिटी की दास्तान कहने-सुनने का ट्रेंड शुरू किया. और ऐसी किताबों के प्रति महिलाओं की पारंपरिक झिझक को भी दूर किया. लेकिन ‘सोहो’ की तुलना ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे’ से यहीं तक. क्योंकि वह एक महिला द्वारा लिखा गया काम-उपन्यास है, जबकि इस किताब के लेखक फ्रैंक हुज़ूर पुरुष हैं और उनकी यह किताब लन्दन से बदनाम मोहल्ले सोहो के कुछ किरदारों के जरिये ‘पोर्न इंडस्ट्री’ के जाने-अनजाने पहलुओं का फर्स्ट हैण्ड ब्यौरा देने का एक प्रयास भर है.

अंग्रेजी में भारतीय उप-महाद्वीप के महान क्रिकेटर इमरान खान की जीवनी लिखने वाले लेखक ने यह किताब हिंदी में लिखी, जिसे साहसिक कहा जायेगा. मैं इसे पढ़ते हुए सोच रहा था कि हिंदी प्रदेशों के तमाम छोटे-बड़े शहरों में फैले रेड लाईट बाजारों के ऊपर सिवाय रंगीले रसीले किस्सों के हिंदी में कोई पाठ्य सामग्री उपलब्ध क्यों नहीं है? मुझे सिर्फ एक उदाहरण याद आता है आबिद सुरती के उपन्यास ‘वासकसज्जा’ का जो मुंबई के मशहूर रेड लाईट एरिया कमाटीपुरा में धंधा करने वाली महिलाओं के जीवन को लेकर है, जो 80 के दशक में कोलकाता से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘रविवार’ में धारावाहिक प्रकाशित हुआ था. लेकिन वह भी उपन्यास था जो मूलतः कल्पना में यथार्थ की मिक्सिंग की विधा है.

‘सोहो’ कई मायने में एक ट्रेंडसेटर किताब है. यह इंसानी दुनिया के उन अँधेरे कोनों की दास्तान कहता है जो हिंदी की दुनिया में अब तक निषिद्ध रहा है. जिसके बारे में जुबानी जुगाली तो की जा सकती है लेकिन उसका लिखित रूहानी सफ़र अभी भी निषिद्ध समझा जाता रहा है. सोहो उस दुनिया की खिड़की खोलने का काम करता है. लन्दन के पश्चिमी छोर पर बसा इलाका सोहो अपने आप में सेक्स इंडस्ट्री का पर्याय बन चुका है, जिसके बारे में लेखक किताब में यह सूचना देता है कि ‘न्युयोर्क से लेकर हांगकांग, फ्लेर्मो और ब्यूनस आयर्स जैसे शहरों में ‘सोहो’ नाम अपना लिए गए हैं. सवाल यह है कि सोहो है क्या?

इसी बात का जवाब देने की कोशिश लेखक फ्रैंक हुज़ूर ने इस साहसिक किताब में की है. सोहो दरअसल सेक्स की एक उद्दाम दुनिया है जहाँ स्त्री-पुरुष होना मायने नहीं रखता है, वहां सिर्फ सेक्स मायने रखता है, हर तरह का सेक्स. गे, लेस्बियन यहाँ सब जायज है. लेखक ने इसे जादू कहा है. ऐसा जादू जिसकी गिरफ्त में कैद यहाँ ‘चार्ल्स डार्विन से लेकर कार्ल मार्क्स, चर्चिल और बिल क्लिंटन क्यों तफरी करने की तमन्ना लेकर भटकते.’ असल में सेक्स की दुनिया महज खोने-पाने की दुनिया नहीं होती, जीत-हार की दुनिया नहीं होती. असीम आनंद की एक ऐसी दुनिया होती है जिसका होना ही पाना है और वही उसका खो जाना.  

जादू नहीं मुझे लगता है एक तरह का रहस्य होता ऐसी जगहों का. हाल के दिनों में सनी लियोन के माध्यम से भारत में लोग अच्छी तरह से वाकिफ हो गए हैं कि पोर्न फिल्मों का बाजार, कारोबार क्या होता है. लेखक ने पुस्तक में जानकारी दी है कि पूरी दुनिया में पोर्न फिल्मों का कारोबार करीब 10 अरब डॉलर का माना जाता है. बहरहाल, यह फिर भी एक रहस्य है क्योंकि यह कारोबार उस तरह से खुले में नहीं होता बल्कि यह अँधेरी दुनिया का बाजार है. लेखक ने एक घटना का उल्लेख किया है जब वह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा करता था. उन दिनों उसकी दिलचस्पी ड्रामा, सिनेमा, पेंटिंग में थी. उन्हीं दिनों वह अक्सर इस तरह के विज्ञापन अखबारों में देखा करता था कि नए कलाकार चाहिए नई फिल्मों के लिए. एक दिन वे विज्ञापन देखकर उसमें बताये पते पर पहुंचे तो पता चला कि वह पोर्न फिल्म की दुनिया में पहुँच गया था. मुझे लगता है उस रहस्य से साक्षात्कार होने के बाद पोर्न फिल्मों के रहस्य की ओर लेखक की दिलचस्पी हुई होगी और वह दिलचस्पी उनको सोहो तक ले गई होगी.

बहरहाल, फ्रैंक ने साशा, मिशेल, सुजान, एम्मा, क्लार्क आदि पोर्न इंडस्ट्री के माहिर कलाकारों के माध्यम से पोर्न इंडस्ट्री के अलग-अलग तरह की चुनौतियों, उसके अलग-अलग तरह के मसाइलों से रूबरू करवाने की पूरी कोशिश की है. और इसमें कोई शक नहीं सेक्स को लेकर, सेक्स के व्यापार को लेकर कई तरह की जिज्ञासाओं के समाधान इस पुस्तक में हो जाते हैं. इस सवाल का भी एक जवाब इस किताब में मिशेल के माध्यम से मिलता है कि आखिर पोर्न क्यों? उसका बच्चों पर खराब असर नहीं पड़ता क्या? मिसेल बड़ी हैरानी से जवाब देती है- ‘मासूम बच्चे जब बिन लादेन के वीडियो देखते हैं और वीडियो गेम खेलते हैं तब उनका दिमाग खराब नहीं होता और जब उनकी आँखों एक समंदर में हमारा सेक्सुअल एक्ट आ जाए तो जलजला आने लगता है.’

यह एक ऐसा सवाल है जो बतौर पाठक मेरे दिमाग में लगातार बना रहा और आज भी बना हुआ है कि हम ऐसे युग में आ गए हैं जिसमें बहुत कम उम्र में बच्चों की उँगलियों की एक हरकत से दुनिया के बड़े बड़े रहस्य उसके सामने ऐसे खुलने लगते हैं जैसे अलादीन के चिराग के खुलने से मनचाही मुराद पूरी ही हो जाया करती थी. एक जमाने तक जन बातों का बच्चों को घर परिवार में कोई माकूल जवाब नहीं मिल पाता था आज इंटरनेट पर एक क्लिक से मिल जाया करता है. ऐसे में सेक्स के बारे में दबाव-छिपाव का पुराना नजरिया बदला जाना चाहिए. यही समय की मांग है. केवल बच्चे ही क्यों इंसानी जीवन के इस सबसे बड़े रहस्य, इस सबसे बड़े सुख समझी जाने वाली चीज के बारे में हम सबकी जानकारी भी आधी अधूरी ही बनी रह जाती है. आज भी तमाम खुलेपन के बावजूद इंसानी जीवन वर्जनाओं का पुंज बनकर रह गया है. इसमें कोई शक नहीं कि सोहो जैसी किताबें हमारे मन के कुछ अँधेरे कोनों तक थोड़ी बहुत रौशनी पहुंचाने का काम करती है. नहीं, मैं सेक्स शिक्षा की बात नहीं कर रहा बल्कि सेक्स को अन्य विषयों की तारः आम तौर पर देखे जाने की बात कर रहा हूँ.

इस किताब को पढ़ते हुए यह बार-बार लगा कि यह महज सोहो नामक उस स्थान के ऊपर लिखी गई किताब नहीं है, जो लन्दन का एक इलाका है, बल्कि उसके कलाकारों, सेक्स के बहाने दुनिया भर में फैले सेक्स के बाजारों की सैर कराने वाली पुस्तक है. जिसमें गे और लेस्बियन सेक्स के बाजारों के बारे में भी विस्तार से बताया गया है. और कुछ किरदारों के माध्यम से दुनिया के कुछ मशहूर हस्तियों की सेक्स आदतों से जुड़े कुछ किस्से, जो इस पुस्तक को एक अलग किस्म का रंग देते हैं- ‘म्युनिच में हिटलर के गर्दिश के दिनों का एक खास साथी था जिसे इतिहास एर्नस्ट हन्फ्सतेंगल के बनाम से जानता है. उसकी राजदारी उसे ये कह रही थी कि हिटलर न तो पूरी तरह से होमोसेक्सुअल था और न ही हेट्रोसेक्सुअल. एर्नस्ट का ऐलान चौंकाने वाला है, ‘हिटलर इम्पोतेंट, नपुंसक था. उसकी जांघों के बीच जो ऊष्मा थी उसमें लपटें हरगिज़ नहीं थी. वो सिर्फ मास्टरबेट करने वाला एक फ़ोर्सलेस और गटलेस लोनर था.’ इस तरह की दिलचस्प कहानियां पुस्तक को कुछ और रसदार बनाती हैं.

यह सवाल फिर भी रह जाता है कि इस तरह की किताब की क्या जरूरत है? एक ज़माना था जब ‘ट्रोपिक ऑफ़ कैंसर’ और ‘ट्रोपिक ऑफ़ कैप्रिकोर्न’ जैसी किताबें यूरोप, अमेरिका के मुक्त समाज में भी प्रतिबंधित कर दी जाती थी. हमारे यहाँ नेहरु-काल में भी डी. एच. लॉरेंस के उपन्यास को प्रतिबंधित कर दिया जाता था. अश्लील लेखन के लिए मंटो पर बाकायदा मुकदमा चला था. वह नैतिकता का ज़माना था जब यह माना जाता था साहित्य का काम समाज अच्छे मूल्यों का प्रसार करना है, बेहतर नागरिक तैयार करना है. हाल के दशकों किसी किताब को इसलिए प्रतिबंधित नहीं किया गया कि उसमें सेक्स का उद्दाम वर्णन है. बल्कि ऊपर मैंने जिक्र भी किया था कि ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे’ जैसे उपन्यास को पढना फैशन स्टेटमेंट माना गया. इस बात को लेकर बहस चली कि यह महिला द्वारा महिलाओं के लिए लिखा गया पोर्न है.

बहरहाल, बात ‘सोहो’ की हो रही है. यह एक संजीदा लेखक की किताब है, जिसे लिखने के लिए न उसने मस्तराम जैसा कोई छद्म नाम अपनाया है न ही इंटरनेट के दौर में सविता भाभी जैसा कोई किरदार खड़ा किया है. और इसे छापने वाला प्रकाशक हिंदी युग्म आज हिंदी में नए तरह के पाठकवर्ग पैदा करने वाली किताबों के प्रकाशक के रूप में जाना जाता है. निश्चित तौर पर इस खुलेपन का स्वागत होना चाहिए. अच्छे-बुरे का सेंसर लागू करने का ज़माना नहीं है यह. फिर भी कुछ बातें हैं. एक जो जरूरी बात मुझे इस पुस्तक के सन्दर्भ में कहनी है वह यह कि पूरी किताब पढ़कर दुनिया भर में पोर्न इंडस्ट्री और उनके कारोबार के बारे में पता चल जाता है मगर सोहो के बारे में ठीक से समझ नहीं आता. अलबत्ता उसके जादू और जादू जगाने वाले किरदारों के बारे में दिलचस्प जानकारियाँ मिलती हैं. लेकिन हम यकीन के साथ यह नहीं कह सकते कि आप इस एक किताब को पढ़कर सोहो नाम के उस मोहल्ले के बारे में सब कुछ जान गए हैं. उसका रहस्य पुस्तक पढने के बाद भी बरकरार रहता है. जो कई सदियों से बना हुआ है. रहस्य है तभी तो सोहो है, वरना क्या रखा है साकी तेरे मैखाने में...

एक जरूरी बात किताब के प्रस्तुतीकरण को लेकर. मुझे सबसे अधिक आपत्ति इस किताब के कवर को लेकर है. इसके कवर पर नग्न चित्र आपत्तिजनक तो नहीं मगर पुस्तक के कंटेंट को कहीं न कहीं हल्का जरूर बना देता है. पुस्तक के अंदर बहुत संजीदगी से, बड़ी बारीकी से पोर्न इंडस्ट्री के कार्यव्यापार के बारे में लेखक ने बताया है, दुर्भाग्य से किताब का कवर कुछ और इशारे करता है. यही बात किताब के अंदर प्रकाशित चित्रों को लेकर कही जा सकती है. इंटरनेट और गूगल बाबा के इस दौर में चित्रों में ऐसा कुछ भी नहीं लगता जो इस किताब को विश्वसनीय बनाने में मदद करता हो. यह कुछ ऐसी बात हुई जैसे पुराने बोतल में नई शराब.

यह एक ‘कल्ट’ किताब हो सकती थी, जो नहीं हो पाई. लेकिन जिस रूप में यह हमारे सामने है उसका स्वागत किया जाना चाहिए. हिंदी का दबा छुपा माहौल बदले, खुलापन आये, निषिद्ध समझे जाने वाले विषयों को लेकर चर्चा हो इस उद्देश्य में यह किताब सफल कही जा सकती है. और इसे लिखने के लिए फ्रैंक हुज़ूर बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने हिंदी-उर्दू के कॉकटेल में अंग्रेजी का मौकटेल मिलाते हुए एक रसदार किताब लिखी है.