Wednesday, April 23, 2014

सुनील ने संन्यासी सा जीवन जिया

समाजवादी जन परिषद् के महामंत्री सुनील का महज 54 साल की आयु में निधन हो गया. जेएनयू से अर्थशास्त्र की डिग्री लेने के बाद उन्होंने मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के गाँवों में किसानों के बीच काम करने को प्राथमिकता दी. उनको श्रद्धांजलि देते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने यह लेख लिखा है- जानकी पुल. 
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समाजवादी आंदोलन के इन परिशिष्ट वर्षों में मैं दो व्यक्तियों की खास इज्जत करता हूँ। सच्चिदानंद सिन्हा मुजफ्फरपुर में रहते हैं और देश तथा दुनिया की घटनाओं पर लगातार सोच-विचार करते हैं। जनसत्ता या सामयिक वार्ता, कहीं भी उनकी नई टिप्पणी प्रकाशित होती है, तो हम किसी नए सत्य की तलाश में बड़े चाव से उसे पढ़ते हैं। शायद ही कभी निराशा हुई हो। सुनील होशंगाबाद की केसला तहसील के एक गाँव में रहते थे। उनकी उम्र मुझसे कम थी, पर मेधा मुझसे कई गुना ज्यादा। कल उनका अंत हो गया। दिमाग में खून बहने से वे कई दिन बेहोशी में रहे और अंत में दिल्ली के एम्स में मृत्यु ने उन्हें दबोच लिया। हमारे जीवन के दुख और शोक की परतों में एक और परत आ जुड़ी।

      साथी सुनील की सब से बड़ी खूबी यह नहीं थी कि वे समाजवादी थे। आजकल अपने को समाजवादी कहने से न कोई पत्ता खड़कता है, न किसी की पेशानी पर बल पड़ते हैं।  सुनील का सब से बड़ा आकर्षण यह था कि मध्य वर्ग में जन्म होने और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पाने के बाद भी वे एक युवा संन्यासी की तरह रहते थे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उन्होंने अर्थशास्त्र में सब से ज्यादा अंक प्राप्त किए थे। वहाँ की छात्र राजनीति में उन जैसी लोकप्रियता कइयों को मिली, पर जेएनयू का गाँधी सुनील को ही कहा गया। वहीं से सुनील और उनके साथियों ने समता एरा नाम से एक पत्रिका निकाली थी।

लोग गाँव से शहर में आते हैं, सुनील शहर से गाँव में गए। शहर भी ऐसा, जो मुगल काल से ही भारत की राजधानी रहा है। हमारे बहुमुँही  समय में कुछ प्रसिद्धों ने ऐसा निर्णय एक सात्विक नौटंकी के स्तर पर किया है, सुनील के लिए यह उनकी वैचारिक दिशा और भावनात्मक ऊँचाई का अनिवार्य निष्कर्ष था। सुनील का मिजाज किसी से कम शहराती नहीं था, फिर भी उन्होंने युवावस्था में ही तय कर लिया था कि स्वच्छ राजनीति करनी हो तो किसी गाँव में जा कर रहना ही श्रेयस्कर है। शहर व्यर्थ के लालच पैदा करता है और अनिवार्य रूप से भ्रष्ट करता है। महानगर हो तो और भी कई तरह की फिसलनों के लिए यह जरखेज जमीन है।  

      परंतु मामला सिर्फ यही नहीं है। आप कम्युनिस्ट हों या सोशलिस्ट, राजनीति करने के लिए पैसा चाहिए। राजनीति खुद पैसा नहीं देती, दिलवा जरूर सकती है। सुनील ने राजनीति की शुरुआत दिल्ली से ही की थी, पर वे किसी के आगे भिक्षुक बनना नहीं चाहते थे। दिल्ली में भिक्षा भी सौ-दो सौ रुपयों की नहीं होती, लाखों या कम से कम हजारों की होती है। सुनील ने यह भी देखा कि बड़े शहरों में आदर्शवाद के लिए कोई जगह नहीं रही। यहाँ आदर्श की बातें सिर्फ यथार्थवाद को मजबूत करने के लिए की जाती हैं। इसीलिए उन्होंने गाँव का रास्ता पकड़ा। वे अखिल भारतीय होने के पहले किसी गाँव का होना चाहते थे और आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनना चाहते थे। गाँव में उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन को पुख्ता करने के लिए कई तरह के काम किए और स्थानीय लोगों से करवाए। लोग छोटे उद्योगों की बात करते हैं, सुनील ने यह करके दिखाया कि उनका निर्माण कैसे किया जा सकता है – पूँजी के नहीं, श्रम के बल पर। उनकी सादगी, वैचारिक क्षमता और राजनीतिक सक्रियता से उन्हें इतनी ख्याति मिली के अंग्रेजी साप्ताहिक द वीक ने एक साल मैन ऑफ द इयर का सम्मान दिया।   जो लोग बड़े मन से परिवर्तन की राजनीति कर रहे हैं या करना चाहते हैं, उन्हें सुनील मॉडल का विस्तार से अध्ययन करना चाहिए। रोशनी मिलना तय है।

      राजनीति करने के लिए पत्र या पत्रिका की जरूरत होती है। स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में ही इस तथ्य को पहचान लिया गया था। राममनोहर लोहिया हिंदी में जन और अंग्रेजी में मैनकाइंड निकालते थे। सुनील, लिंगराज, योगेंद्र यादव, प्रेम सिंह आदि के राजनीतिक गुरू किशन पटनायक ने, जिन्हें मैं आधुनिक सुकरात का दरजा देता हूँ, सामयिक वार्ता निकाली। अपने अच्छे दिनों में यह मासिक पत्रिका प्रबुद्ध चर्चा का विषय हुआ करती थी। मेरे आकलन के अनुसार, सामयिक वार्ता में जितने मौलिक विचार प्रकाशित हुए, उनकी संख्या सत्तर के बाद प्रकाशित अन्य सभी पत्रिकाओं में छपे मौलिक लेखों से कहीं ज्यादा है। मुझे तो सामयिक वार्ता के हर अंक ने वैचारिक खुराक प्रदान की। किशन पटनायक की मौत के बाद वार्ता के संपादन और प्रकाशन का भार सुनील के ही कंधे पर आया। पहले रमेशचंद्र सिंह और अशोक सेकसरिया ने और बाद में प्रेम सिंह, हरिमोहन, राजेंद्र राजन, योगेंद्र, महेश आदि ने कई तरह से वार्ता का साथ दिया, पर अंतिम दिनों में इस सलीब को ढोने की जिम्मेदारी अकेले सुनील भाई पर आ पड़ी थी। समाजवादी राजनीति और सामयिक वार्ता के प्रति सुनील की प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि समाजवादी जन परिषद को बाकियों ने भी अँगरेजी मुहावरे में कहूँ तो नए चरागाहों की तलाश में छोड़ दिया होता और सामयिक वार्ता के सहयोगियों की संख्या दस से नीचे आ गई होती, तब भी वे परिषद को चलाते रहते और भले ही तीन महीनों में एक बार, वार्ता को प्रकाशित करते रहते। उनके जीवन से मैं यही शिक्षा लेता हूँ कि अकेले पड़ जाने से कभी डरना नहीं चाहिए।

      सुनील का व्यक्तिगत खर्च उससे थोड़ा-सा ही ज्यादा था जो भारतीयों की औसत आय है। यह जीवन पद्धति उन्होंने इसलिए अपनाई थी कि वर्तमान समय में इससे अधिक की चाह नैतिक दुराचरण है। किशन पटनायक की तरह सुनील को भी मैंने कभी हताश या निराश नहीं देखा। अब हमारा कर्तव्य क्या है? समाजवादी राजनीति की विरासत को बचाए रखने या आगे बढ़ाने की कामना चींटियों की मदद से राम सेतु तैयार करने की इच्छा है। पर हमारी संख्या जितनी भी कम रह गई हो, हममें इतना क्षमता तो हैं कि हम सामयिक वार्ता को इतिहास न होने दें। जब राजनीति नहीं हो पा रही हो, पत्रिकाओं के माध्यम से कुछ नेक विचार फैलाना एक अपरिहार्य कर्तव्य है, ताकि वे विचार समाज में बचे रहें और जब किसी में कुछ करने की चाह पैदा हो, तब उसे इतिहास को ज्यादा खँगालना न पड़े।

'जनसत्ता' से साभार 

लेखक संपर्क-truthonly@gmail.com               
     
       

          

Tuesday, April 22, 2014

कोई लटक गया फांसी किसी ने छोड़ दिया देश

इस बार आम चुनावों में जमीन से जुड़े मुद्दे गायब हैं. खेती, किसान, अकाल, दुर्भिक्ष, पलायन- कुछ नहीं. जमीन से जुड़े कवि केशव तिवारी की कविताएं पढ़ते हुए याद आया. बुंदेलखंड के अकाल और पलायन को लेकर कुछ मार्मिक कविताएं आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन 
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1.
ऋतु पर्व

घोर दुर्भिक्ष में परती पड़े
खेतों के बगल चू रहा है महुवा
अकाल की आंत में
चैत का ऋतु पर्व है यह

2.
सूखा

सूखा खदेड़ रहा है परदेश
और वहां से भी खदेड़े जा रहे हैं वापस
कहीं कोई जगह है जहां पल भर को
ठहर कर ये सांस साध सकें
ये वतन की याद में वापस नहीं
लौट रहे हैं
धकेल कर वापस भेजे गए हैं
जैसे सूखी धरती पर
बगोड़ दिए जाते हैं अन्ना* ढेर

*बुंदेलखंड में खेत कटने के बाद जानवरों को चारा न देने की स्थिति में स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है.


3.
एक हठ यहां भी है

जेठ का मध्य है यह
अपने चारों और बह रही
आग के बीच
किसी हठयोगी-सा बैठा
पंचाग्नि ताप रहा है
यह टुनटुनिया पहाड़
आज कुछ समय से पहले ही
लौट रही हैं
दुरेडी गाँव की औरतें
छंहा रही है नीम के नीचे
शहर से कंडा, लकड़ी, सब्जी
बेचकर लौटी हैं ये
एक हाथ यहां भी है जो

पहाड़-सा स्थिर नहीं है
ये पैरों से चलता है
और बोलता है आंखों से
फिर से आशंका में डूबा असाढ़ है
इनके कठेठ पड़ गयी छाती में भी
कहीं-न-कहीं धुक-धुका रहा है
एक भय.

4.
डाका

कोई लटक गया फांसी
किसी ने छोड़ दिया देश
हालात बगल में पड़े डाका से हैं
जहां घरों से ही आ गए आ गए
चिल्ला रहे हैं सब लोग.


5. 
 कहीं खोजता होगा क्या

शहनाई यहां अब सपनों में भी नहीं बजती है
स्वप्न में भी लड़कियों को नहीं दिखते हैं
पीले हाथ
शहनाई सारंगी सब खूटियों पर टांग
कलाकार क्रेशर पर गिट्टियां तोड़ रहे हैं
गिट्टी तोड़ता एक सारंगी कलाकार
क्या यहां भी सारंगी के सुरों को
कहीं खोजता होगा?


6.
ये जहां भी होंगे

पिछला बरस तो
मवेशी बेंच बेंच कर
काटा अकाल,
अब के फिर
यहाँ-वहां छिछ्कार कर
चले गए बादल
अब पूरे गाँव के
पलायन की बारी है
पलायन एक क्रिया भर नहीं है
एक कसक है
जो हर वक्त सालती है इन्हें
समेटने सम्हालने में कुछ-न-कुछ
तो रह ही जाएगा यहाँ
जिसे पाने को लौट-लौट
आयेंगे ये
यह तय है कि ये जहां भे होंगे
बना लेंगे अपने लिए एक नया लोक
महानगरीय रंगों से
अछूते भी नहीं रहेंगे ये
फिर भी
गेहूं के खेत में
सरसों के फूल की तरह
अलग से
पहचान लिए जायेंगे.


7.
आवाज़ दो

आवाज़ दो कोई न कोई तो
बोलेगा ही
कोई न बोला तो
ये
टूट रही शहतीरें बोलेंगी

जरूरी सामान बांधते वक्त

गठरी से बाहर निकाल दी गई
यह बच्चों की
मिट्टी की गाड़ी बोलेगी

चूल्हें में बची राख बोलेगी

बोलेंगे कोहबर में उकेरे
उधस होते चित्र
कि कभी वहां भी गूंजी थी ढोलक

किवाड़ों पर घर छोड़ते
वह मजबूरी भरा स्पर्श बोलेगा

आवाज़ दो
कोई न कोई तो बोलेगा ही

 (अकाल में पलायन से खाली घर देखकर )




Monday, April 21, 2014

कथाकार काशीनाथ सिंह की बातें उनके बेटे सिद्धार्थ की जुबानी

लेखक काशीनाथ सिंह को सारा हिंदी समाज जानता है. लेकिन उनके यशस्वी पुत्र प्रोफेसर सिद्धार्थ सिंह उनके बारे में क्या सोचते हैं यह पढने को मिला 'चौपाल' नामक पत्रिका के प्रवेशांक में. इसकी तरफ ध्यान दिलाया युवा संपादक-आलोचक पल्लव कुमार ने. आइये पढ़ते हैं. पिता की नजर से पुत्र को देखते हैं- प्रभात रंजन 
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बचपन से शुरुआत करता हूँ तो याद आता है कि शायद पापा से भी पहले हम दोनों भाईयों की मुलाक़ात उनके मुसुक से हुयी थी|  मुसुक यानि भुजाओं की मसल्स ; जिन्हें पंजाबी लोग डोले शोले भी कहते हैं |  पापा को कसरत का खासा शौक था, अपने बचपन में अखाड़े में कुश्ती लड़ने का जिक्र तो उन्होंने खुद ही किया है | लेकिन वे बी.एच.यू. में नौकरी शुरू करने और बाद तक भी दो दो नम्बरिया ईंट जमीन पर रख कर पहले पुश-अप किया करते थे और फिर दंड बैठक, यह कम लोगों को पता है| सामान्य व्यायाम तो अब भी जारी है, लेकिन पुश-अप और दंड बैठक नहीं |  हाँ ,  दंड बैठक की परम्परा श्री राम जी सिंह, जिन्हें हम बीच वाले बाबू जी कहते हैं,  आज भी निभा रहे हैं जिसको लेकर बड़ी अम्मा कभी-कभी बिगड़ जाया करती हैं |  कई वर्षों पहले की बात है, हम दोनों भाई राम जी बाबू जी के घर गए हुए थे |  दरवाजे पर ही बड़ी अम्मा से भेंट हो गयी, अम्मा की आँखें सूजी हुयी थीं | रहा नहीं गया, पूछ बैठे :
का भईल अम्मा, सुतलु नाही का ठीक से?”
जवाब था अरेऽऽ....ई नकलोलवा सुत्ते देई तब नऽऽ......
काहें...., का भईल?
तीनै बजे भोरे उठ कर रोजै ऊपर छते पर धम्म धम्म उठक बैठक करे लगला| एतना हांफी, एतना हांफी कि केहू के सुत्ते ना देई | ओकरे बाद एक कड़ाही चना खाई |
थोड़ी देर के लिए फिर बड़ी अम्मा रुकीं, हम दोनों कहानी के क्लाईमैक्स का इंतज़ार कर रहे थे | क्लाईमैक्स आया और बहुत रोचक आया. उन्होंने अउर को लंबा खींचते हुए बोला:
अउ.......र ओकरे बाद उ दिनवाऽऽऽ भरऽऽऽ... छेरी |
हम दोनों हँसते-हंसते लोट-पोट हो गए |
खैर, पापा के मुसुक जबरदस्त थे और उस दौर में उनकी कद-काठी, चौड़ा सीना किसी अखाड़ची मजबूत पहलवान से कम न था |  हम दोनों को साहित्य वगैरह से क्या लेना देना, पापा के मुसुक पर फिदा रहते थे |  और उसका दिलोदिमाग पर असर इतना गहरा था कि बस किसी के घर में आने भर की देर है, हम दोनों उसे दोनों तरफ से घेर कर बैठ जाते थे |  आदमी कमजोर किस्म का हुआ या फुल शर्ट में हुआ तो हमारे किसी काम का नहीं | यदि हॉफ शर्ट में और कुछ रियाजी शरीर का लग रहा है तो हम एक ही मुलाक़ात में उससे धीरे धीरे नजदीकियां बढ़ाते थे A और जैसे ही घनिष्ठता सहजता के स्तर पर पहुँच गयी, हम बिना देर किये तत्काल अर्जी लगा देते थे :
चाचा जी, ज़रा अपना मुसुक दिखाईये ना |””
कई बार आगंतुक साहित्य सेवक परिवार के सदस्यों की इस मांग पर हक्का-बक्का हो जाता था , लेकिन हमें अपनी प्रतिभा पर पूरा भरोसा रहता था |  आने वाला जब तक अपना मुसुक दिखाने को मान न जाए, हम छोड़ते नहीं थे, यहाँ तक कि कई बार तो उसे शर्ट की बांह मोड़ने का तकल्लुफ़ भी नहीं करना पड़ता था, हमीं ये काम कर लिया करते थे |
अब आने वाले ज्यादातर साहित्यकार होते, कहाँ से मुसुक देखने को मिले |  पापा के आस-पास तो क्या दूर-दूर तक कोई मुकाबला नहीं |  यह बात हम दोनों को असीम तृप्ति देती थी की पापा जैसा मुसुक किसी का नहीं |
यह मुसुक प्रसंग तब का है जब मैं संभवतः कक्षा तीन में पढ़ता था |  पापा के व्यक्तित्व का छोटा छोटा अंश हम सभी पांचों भाई बहनों में दिखायी देता है , लेकिन दुर्भाग्य से किसी में भरपूर नहीं आ पाया |  मुसुक वाला तत्त्व मेरे बड़े भैया मुन्ना में आया और वे पापा की देखा-देखी कक्षा दो-तीन में ही अस्सी पर तुलसी अखाड़े में जाकर कुश्ती लड़ने  लगे |  चड्ढी में लड़ने के तमाम खतरे थे, इसलिए उन्होंने कई दिनों तक रो-रोकर के अम्मा से हनुमान जी वाला, चटक लाल रंग का लंगोट सिलवाया और फिर तो बी. एच . यू .के मकान में शिफ्ट होने तक नागपंचमी पर होने वाली कुश्ती प्रतियोगिता में जूनियर चैम्पियन बने रहे |  जाहिर है, पापा भैया की इस प्रतिभा पर गदगद होते थे और नाक फुला कर मुसकराते थे |
*
दूसरी यादगार मुलाक़ात हम दोनों की पापा से तब हुयी जब हम ताजा-ताजा बी. एच . यू .के बिरला हॉस्टल के वार्डेन्स क्वार्टर में आये थे और कक्षा पांच-छह में पढ़ रहे होंगे |  हम दोनों खिलवाड़ी थे और पढ़ने-लिखने में विशेष मन नहीं लगता था | हाँ, दीदी लोग सभी पढ़ने में बहुत तेज और गंभीर थीं |  पापा ने एक दिन हम दोनों को अपने पास बुलाया और पूछा
 आप लोग जिंदगी में क्या बनना चाहते हैं?
आप सुनते ही हमें लग गया कि मामला गंभीर है, क्योंकि आज भी उनके स्वभाव में है कि यदि वे तुम से आप पर आ जाएँ तो या तो वे नाराज हैं या फिर कोई गंभीर बात कहना-सुनना चाह रहे हैं | हम दोनों को जिस प्रश्न का उत्तर बी.ए., एम.ए. तक नहीं मिला, वह पांच-छह में पढ़ने के दौरान क्यूँ कर मिलता |  हम सिर झुका, चुप मार कर बैठे रहे | पापा बोलते रहे और तुरंत आप से तुम पर आ गए :
तुम लोग ज़िंदगी में जो भी कुछ करना, कोशिश करना कि उसमें सर्वोत्तम रहो |  डाकू भी बनना तो मलखान सिंह बनना, खिलाड़ी बनना तो मोहम्मद शाहिद बनना और पान बेचना तो केशव की तरह बनना |
केशव का नाम सुनते ही मैंने कनखियों से भैया की आँखों में देखा और भैया खिस्स से हँस दिए, पापा बोलते रहे :
देखो, हम लोग गरीब किसान के बेटे हैं | गाँव में इतनी जमीन-जायदाद तो है नहीं कि तुम लोगों की रोज़ी-रोटी उसके भरोसे चल सके | मेरी आमदनी भी इतनी नहीं है कि तुम लोगों की पढ़ाई के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर सकूँ | और जहाँ तक नौकरी की बात है मैंने सिद्धांततः तय किया है कि आप लोगों के लिए न तो मैं रिश्वत दूँगा और न ही किसी से पैरवी करूँगा |
अंतिम शब्दों पर विशेष जोर था जो कि हम पर बम की तरह फूट कर गिरे |  नामवर बाबू जी तब तक नामवर सिंह बन चुके थे, पापा की भी केन्द्रीय विश्वविद्यालय की नौकरी थी | हम लोगों को यह मुगालता था कि पृष्ठभूमि ठीक-ठाक मजबूत है, नौकरी-चाकरी का क्या सोचना |  उम्र भी ज्यादा सोचने-वोचने की नहीं थी |  अभी कुछ ही दिनों पहले एक दिन पापा की दी हुयी स्वतंत्रता का फायदा उठाते हुए मुन्ना भैया ने पापा से उनकी तनख्वाह पूछी |  पापा ने कुछ जवाब दिया |  अपने बचपने में भैया ठठा कर हँसे, फिर मेरी तरफ मुखातिब हुए और कहा:
गुरु (हमारी बातचीत की शुरुआत आज भी गुरु से ही होती है), इतना तो कोई हमको दे तो हम नौकरी ही न करें |
मैं गुस्से में भैया से भिड़ गया | भैया अपनी जगह अडिग इतनी तनख्वाह पर नौकरी नहीं करूँगा तो नहीं करूँगा |  पापा बिल्कुल शांत, मुस्कराते हुए हुए चले गए |  वैसे भी पापा ने हमें जिंदगी में कभी भी मारा नहीं, डांटा भी तो बहुत गंभीर गलतियों पर |  उनकी निगाह में यह सिर्फ हमारा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करना था, लेकिन हमारे इस दुष्प्रयोग ने उन्हें यह एहसास करा दिया था कि हम लोगों के अंदर अहं की पैदाइश हो रही है और उसकी जड़ में नामवर बाबू जी और उनका खुद का कद और नौकरी है |  
पापा की उस दिन की सीख हम दोनों भाईयों को आज तक नहीं भूली | सौभाग्य हमारा कि जीवन के किसी भी मोड़ पर उन दोनों लोगों को हममें से किसी भाई बहन के लिए याचक बनना तो दूर सोचना भी नहीं पड़ा |
*
माँ बचपन से एक बात बतातीं हैं कि जब वे पापा से ब्याह कर घर पर आयीं तो पापा ने जो पहली बात उनसे कही थी, वह थी:
देखिये, मैं किसी भगवान को तो मानता नहीं हूँ | मेरे लिए जो कुछ भी हैं, वे मेरे भैया हैं, उन्हीं को मेरा भगवान समझ लीजिए |  ध्यान रखियेगा, कभी उनको कोई कष्ट न हो |
नामवर बाबू जी का स्वास्थ्य, उनकी खुशियाँ, उनकी चिंताएँ, उनके जीवन के हर उतार-चढ़ाव पापा और राम जी बाबू जी के जीवन का अभिन्न अंग हैं और हम लोगों के तो उनका पूरा व्यक्तित्व ही अतर्कावचर रहा है | यह बात हम सभी भाई-बहन पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि नामवर बाबू जी का जो सम्मान हम सभी के दिल में है उसमें उनके बड़ा आदमी होने या महान आलोचक होने की कोई भूमिका नहीं हैं, बल्कि पापा के दिए गए संस्कारों की भूमिका है | नामवर बाबू जी कुछ नहीं होते, कुछ भी नहीं होते तो भी इन संस्कारों के साथ हम उन्हें उतनी ही श्रद्धा देते |  
भाईयों के प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण इस दुनिया में कोई दूसरा होगा, संभव नहीं लगता |  होगा भी तो अब तक की उम्र में मुझे तो दिखाई नहीं पड़ा |  अभी कुछ ही दिनों पहले घर में एक रोचक वार्तालाप देखने को मिला | राम जी बाबू जी और पापा गंभीर हो कर चर्चा कर रहे थे:
का हो काशी, यदि भैया दू तीन महीना के लिए बनारस आ जातैं त हम दूनों भाई ओनकर गोड़ हाथ दबा कर सेवा कर देवल जात |”
राम जी बाबू जी की उम्र ८१ वर्ष और खुद का स्वास्थ्य भी कुछ अच्छा नहीं; पापा की उम्र ७६ साल और एक जबरदस्त व्यवस्थित दिनचर्या के आदती; और दोनों वृद्ध बड़ी मासूमियत से आपस में बातें कर रहे हैं कि बड़े भाई के हाथ-पांव दबा कर सेवा करने का मौका मिल जाता तो कितना अच्छा होता | बात सुनने-देखने वाले की आँखों में आंसू छलक जाएँ |  आज भी यदि नामवर बाबू जी को छींक भी आने का समाचार दिल्ली से बनारस पहुँच जाता है तो तूफान मच जाता है |  राम जी बाबू जी और पापा में मंत्रणा शुरू हो जाती है कि दिल्ली चला जाए क्या? नमवर (नामवर बाबू जी के परम प्रिय मित्र, उन्हें डाँटने का पेटेंट अधिकार रखने वाले, विख्यात वकील नगेन्द्र प्रसाद सिंह उन्हें नमवर कहते हैं) कहने वाले, खुद नब्बे साल के, वकील बाबू जी का फोन भी आने लगता है |  तीनों  भाई लोग ऊँचा सुनने लगे हैं, हम लोगों का खानदानी गुण है बुढ़ापे में केवल अतिआवश्यक बातों को सुनना |  राम जी बाबू जी और पापा में जब तक नामवर बाबू जी पर बात होती है, दोनों एक दूसरे को बराबर सुनते हैं, उसके बाद गूंगा बहिरा क सनेस (अम्मा के शब्दों में) शुरू हो जाता है:
भैया, देख कर सड़क पर साइकिल चलावल कइली | सड़क खराब हौ |
बक मर्दवा नहीं त.....सुबहियें उठ कर एक किलो चना खा ले लीं | नाहीं, नाहीं; नाश्ता का कौनो दिक्कत ना हौ |
अच्छा सुना कासी, कल चम्पवा तोहरे हियाँ आये खातिन बोलत रहल |
अच्छा, चला ई ठीक है कि चम्पवा आज कल लिखत पढ़त हौ |
और, राम जी बाबू जी अपनी साइकिल पर सवार हो कर निकल लेते हैं |       
पापा प्रायः हर इंसान की तरह ही एक बेटा, भाई, पति, पिता और बाबा आदि हैं और हर भूमिका में उन्होंने भरसक न्याय करने की कोशिश की है, लेकिन भाई के रूप में जो उनका रूप रहा है, वह विराट है और उससे भी श्रेष्ठतर यदि किसी का है तो वो है राम जी बाबू जी का |  उनकी तो हर साँस धड़कती ही है तो सिर्फ भाईयों के लिए |  वृहत्तर परिवार के हम सभी सदस्यों के लिए इस तिकड़ी के टूटने की कल्पना करना भी नाकाबिले बरदाश्त है | मेरी व्यक्तिगत राय है कि हमारे परिवार में जो सबसे रोचक व्यक्तित्व है और जिसके व्यक्तित्व की एक छोटी सी झलक उनके द्वारा पापा को अंग्रेजी सिखाये जाने वाले प्रसंग में मिलती है, से दुनिया अब भी अनजान है और पापा को अपने खास चुटीले संस्मरणों की तरफ लौटते हुए राम जी बाबू जी पर एक समूचा संस्मरण लिख ही डालना चाहिए |  
*
पापा एक पिता के रूप में पिता कम, हम लोगों के दोस्त ज्यादा रहे हैं और आज भी हैं |  यदि मैं, मुन्ना और पापा साथ हों तो हम मजाक करते, हँसते और लोट पोट होते घंटों और दिनों गुज़ार सकते हैं, बशर्ते कि बीच में कोई साहित्यसेवी न हो, और कवी (राम जी बाबू जी के शब्दों में) तो कतई न हो |  साथ में पापा ने यह विवेक भी विकसित किया कि हम उस दोस्ती के चक्कर में पिता को अपेक्षित सम्मान देने की सामान्य सभ्यता न भूल जाएँ | बचपन से उन्होंने हम पर कभी भी अपने विचार थोपने की कोशिश नहीं की |  माँ आर.एस.एस. के धार्मिक परिवार से थीं, उन्हें मंदिर ले कर जाते थे, बाहर खड़े रहते थे, माँ पूजा कर के लौटतीं थीं, और उन्हें वापस ले कर घर लौट जाते थे |  विचार-स्वातंत्र्य उन्होंने हमें इतना दिया, आतंरिक लोकतंत्र की समझ इतनी पैदा की कि हम कभी भी अपने व्यक्तित्व में प्रतिक्रियावादी नहीं हुए |  जैसे बाग का सौन्दर्य इसी में है कि उसमें भांति-भांति के फल-फूल रहें, उसी तरह हर जीवन पद्धति, हर सोच एक जीवन जीने का अपना तरीका है और हमें यह फतवा देने से बचना चाहिए कि हम ही एकतरफा सही हैं या दूसरे ही एकतरफा गलत राह पर हैं यह समझ उन्हीं की दी हुयी है |  इस दर्शन का व्यावहारिक प्रयोग उनके जीवन में दिखायी पड़ता है कि वे जीवन के हर पक्ष में असीमित रूप से भावात्मक सोच रखते हैं | उनके सामने बड़ी से बड़ी दुर्घटना उपस्थित हो जाए, वे तत्काल उसका पॉजिटिव पक्ष ढूंढ ही लेंगे |  
उनसे बोलिए:
गुरु जी, एक लाख रुपये बैंक से आते समय आज सड़क पर गिर गए |
वे कहेंगे:
प्रधान जी, शुक्र है कि बैग में पांच लाख नहीं थे| जाने दीजिए, हो सकता है किसी दुखियारे के हाथ लग गया हो और आपके हाथ से उसके दुःख दूर हो जाएँ |”
आप कहेंगे:
काशी भाई, दुर्घटना में मेरी दोनों टांगें टूट गयीं, बिस्तर पर पड़ा हूँ |
जवाब मिलेगा:
अबे रमाकांत, ये तो सोचो कि जान भी जा सकती थी | चलो, इसी बहाने बिस्तर पर पड़े-पड़े एकाध उपन्यास पूरा कर डालो |   इतने दिन सहानुभूति में बीबी से डांट भी नहीं पड़ेगी, उसका मज़ा अलग |”
एक बार मुन्ना भैया को किसी ने बहुत विश्वास जीत कर गंभीर धोखा दिया |  भैया ने पूरा वृत्तान्त पापा को सुनते हुए कहा कि, पापा! वो आवश्यकता से अधिक चालाक है |  
पापा ने कहा, देखो बेटा, चालाक और धूर्त आदमी कभी भी जिंदगी में सफल नहीं होता |  वो तात्कालिक तौर पर सफल होता दिखायी तो पड़ता है, लेकिन उसे कभी भी अंतिम तौर पर सफल और सुखी होता नहीं पाओगे | दुनिया में जितनी भी वास्तविक रूप से बड़ी हस्तियों को देखोगे तो पाओगे कि उनमें एक किस्म की मासूमियत जरूर
है |
      यह मासूमियत वाला तत्त्व हमारे पापा में भी भरपूर है, जो उनकी हँसी में, उनकी सामान्य आदतों में रोज़-ब-रोज़ दिखायी पड़ता है |  दसियों वर्ष पहले वे एक बार मुंबई गए थे |   वहाँ से फोन किया, कुछ खास चीजें ले कर आ रहा हूँ |  हम लोग बेचैनी से इंतज़ार करते रहे |  आखिरकार वह रोमांचकारी क्षण आया जब पापा वापस आये| कहा भई, दुनिया में क्या-क्या चीजें हैं. हमें यहाँ तो पता ही नहीं चलता कि ऐसे-ऐसे भी सामान भी होतें हैं |
हमने कहा, सूटकेस खोलिए तो सही |
रुकिए, रुकिये....अभी खोलता हूँ |” कहते हुए उन्होंने सूटकेस खोला | सूटकेस से निकलता क्या है? एक प्लास्टिक का झाड़ू जो करीने से कपड़ों के बीच में सहेज कर रखा गया था, और एक नया  मच्छर मारने वाला ऑल आउट लिक्विड मशीन | हम लोग अवाक् |  
यह वह समय था जब दैनिक चीजों के लिए मैं बाज़ार जाने लगा था, इसलिए वह झाड़ू पड़ोस के दुकान में ही मिलता था, ये उन्हें पता नहीं था |  घर पर मच्छरदानी का प्रयोग होता था इसलिए ऑल आउट लिक्विड मशीन के लाने का कोई औचित्य हमें समझ नहीं आया, सो नहीं लाये |  सुख के भोला बाबू की तरह पापा को मुंबई जाने पर अचानक इलहाम हुआ कि दुनिया में क्याक्या चीजें हैं और उनका आज तक उस तरफ ध्यान ही नहीं गया था |  
हम एक साथ चिल्लाये कि, पापा, ये तो अरुण की दुकान पर वर्षों से मिलती हैं |
तो आप लोग अब तक लाये क्यों नहीं, लाना चाहिए था,...... बहरहाल ठीक है, कह कर मुस्कराने लगे | माँ हँसते हुए कहती हैं, बहरहाल-फिलहाल में ही इनकी ज़िंदगी कट गयी, लेखक कब बन गए, पता ही नहीं चला | हालाँकि ये माँ का केवल प्यार जताने का तरीका है, उन्होंने ही तो सबसे ज़्यादा पापा को रात रात भर जग-जग कर लिखते देखा है | 
एक बार मध्य प्रदेश से डोर मैट खरीद कर लाये, कुछ अलग किस्म का था, शायद जूट का | माँ ने सोचा कि ड्राइंग रूम के बाहर रख देंगी, आने-जाने वाले जूता-चप्पल पोछा करेंगे | गयीं सूटकेस में से निकालने के लिए, तो देखा कि गायब |  चकरा गयीं कि गया कहाँ? तभी नज़र पड़ी कि ड्राइंग रूम के अंदर की मुख्य दीवाल पर सजा दिया गया है | डोर मैट और ड्राइंग रूम की दीवाल? समझते देर न लगी कि पापा की कारगुजारी है |  पापा नहाने गए थे, नहा कर लौटे तो माँ आक्रमण की मुद्रा में, हम सब भी उनके साथ | पापा बिल्कुल शांत | कहा लीजिए, आप लोगों में कोई सौंदर्यबोध ही नहीं है तो क्या कहा जाए |  देखियेगा, साहित्य जगत के लोग आयेंगे तो कैसी प्रतिक्रिया देंगे |  वही इसके महत्त्व को समझ सकेंगे |
खैर, वह डोर मैट महीनों ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाता रहा, जब तक कि पापा को फिलहाल इसे हटा देता हूँ, कहते हुए अपने सौंदर्यबोध पर खुद ही पुनर्विचार नहीं करना पड़ गया |
ऐसे ही पापा एक बार जब जापान के विश्व लेखक सम्मेलन में भागीदारी कर के लौट रहे थे तो किसी ने उन्हें भेंटस्वरूप एक जापानी चप्पल और एक आयताकार वस्तु प्रदान कर दी | पापा ने जब आकर पिटारा खोला तो हम सब आँख फाड़े सामान देखने के लिए उन्हें घेर कर बैठे हुए थे | जापानी चप्पल तो अविलम्ब ड्राइंग रूम की दीवारों पर सजा गया | अब बारी थी आयताकार सामग्री का पैकेट खोले जाने की | पैकेट खुला तो वह एक लाल रंग की आंशिक कड़ी वस्तु थी, जिस पर अंग्रेजी में केक लिखा हुआ था |  हममें से किसी ने भी केक नहीं देखा था, आज की तरह घर-घर में जन्म-दिन तो मनते नहीं थे, पूरे बनारस में एक ही बेकरी थी भेलूपुर के ललिता सिनेमा के पास, जहाँ जाना किसी के भाग्य में नहीं आया था अब तक, संभवतः पापा के भी नहीं; तभी तो केक को भौंचक देख रहे थे | हम सभी खुशी से पागल |  पापा ने जापान के केक की महत्ता पर प्रकाश डाला और तय हुआ जल्दी ही आने वाले नीना (दीदी लोगों में मंझली) के जन्म-दिन पर यह केक काटा जायेगा | जन्म-दिन आया और चाकू ले कर केक काटने की शुभ घड़ी भी आयी | नया चाकू लाया गया था, जिसकी चिप्पी वगैरह हटा कर पापा खुद ही उसे धो-धा कर लाये | नया धुला हुआ चाकू जब पहली बार केक पर चलाया गया तो वह केक पर फिसला | हुआ कि जापान की हर चीज निराली है, सो केक भी निराला
होगा | पापा ने अपने पॉजिटिव स्वभाव के मुताबिक़ पुनः जापान की विशेषता पर कोई सुन्दर सी टिप्पणी की |  चाकू फिर चला तो फिर फिसला | अब हुआ कि बहुत तकल्लुफ़ हो गया, अब चाकू धंसा कर एक ही वार में काट ही डालना है |  केक को कटना था, कट ही गया | पहले टुकड़े के लिए मारामारी की नौबत | तय हुआ कि भाई, पापा लाएं हैं, सबसे पहले वही चखें | पापा ने पहला टुकड़ा मुंह में डाला और मजे से चबाने लगे |  फिर पॉजिटिव स्वभाव का परिचय देते हुए उन्होंने जापानी केक की प्रशंसा की और कहा
हूँ.......अलग ही स्वाद है, जरूर स्वास्थ्यवर्धक भी होगा, जापानी स्वास्थ्य के प्रति बहुत जागरूक होते हैं | क्या बनायेंगे ससुरे यहाँ ऐसा केक |
भई, धैर्य की भी एक सीमा होती है, अब और बर्दाश्त नहीं होता |  सब केक पर टूट पड़े | कोई चाकू से काटे, कोई हाथों से नोच कर खाए | सभी के मुंह में केक, सभी का चबाना शुरू..............
पर यह क्या? सभी के मुंह में झाग? ढेर सारा झाग?
पापा अब भी झागयुक्त केक चबाये जा रहे हैं, लेकिन हम सब गैर- पॉजिटिव लोगों को यह समझने में देर न लगी कि वास्तव में ये वो वाला केक नहीं है, बल्कि सो़प केक है, शुद्ध भाषा में कहें तो वो मनहूस, लाल रंग का साबुन था | मची उसके बाद थू-थू और सभी भागे कुल्ला करने के लिए | पापा ने बड़ी मासूमियत से कहा भई, बात है कि केक तो नहीं था ये, लेकिन साबुन अच्छा मालूम पड़ता है | कुसुम जी, न हो इसे मेरे नहाने के लिए बाथरूम में रख दीजिए | हाँ, आप लोग भी कभी-कभी इस्तेमाल कर सकते हैं |

पापा ने अपनी जिंदादिली, मस्ती और खिलंदड़ स्वभाव से कभी समझौता नहीं किया, न तो विश्वविद्यालय की प्रोफेसरी या विभागाध्यक्षी आड़े आयी और न ही परिवार | उनका मूलतत्व किन्हीं भी परिस्थितियों में मस्ती और हास्य ढूंढ लेना है और उनके भीतर के कहानीकार के लिए यही ईंधन का काम करता है | पापा को प्रारम्भ से ही मस्ती भरे किशोर कुमार, गीता दत्ता या आशा भोंसले के गाने पसंद रहे हैं और नामवर बाबू जी को पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज का शास्त्रीय संगीत और मेंहदी हसन की गज़लें | ये पसंदगी ही बहुत कुछ कह देती है कि किसको लेखक बनना था और किसको आलोचक | हालाँकि माँ बताती हैं कि अस्सी के लोलार्क कुंड पर रहने के दिनों में पापा और चौथी राम चाचा जी ध्रुपद मेला ( तुलसी घाट पर होने वाला विख्यात शास्त्रीय संगीत समारोह) के दौरान पूरी – पूरी रात ध्रुपद गायन सुनने के लिए गायब रहते थे | पापा के संगीत – रुझान को देखते हुए मुझे शक है कि वे वास्तव में संगीत के ही लिए गायब रहते थे या उनके लिए यह एक स्वर्णिम अवसर होता था छह बच्चों (जिसमें हमारी समीक्षा दीदी भी शामिल थीं, जो इंटरमीडिएट के बाद नामवर बाबू जी के पास चली गयीं) समेत पूरे परिवार के कौवा-झामर से बच कर पूरी रात आवारगी करने का | यह फक्कड़ मस्ती ही पापा का निर्वाण है, मोक्ष है, कैवल्य है; और इन सबके ऊपर, उनकी प्राण-वायु है | हम सब भाई-बहनों ने ये बात बचपन से ही महसूस कर ली थी, इसीलिए हम कभी उनके और उनकी रचनाओं, उनके और उनके पाठकों के बीच नहीं आये, और न आयेंगे | पापा के लिए भाईयों और अपनी रचनाओं के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण पूंजी उनके पाठक और मित्र-यार हैं | इनके साथ खुशियाँ बांटने, ठहाके लगाने के दौरान या उनके साथ उड़न-छू हो जाने के पहले उनके चेहरे की चमक देखने लायक होती है | वे आज भी अपने मित्रों का इंतज़ार आधे-एक घंटे पहले से घर भर में टहल-टहल कर वैसे ही करते हैं, जैसे लड़के किशोरावस्था में किया करते हैं | यदि वे अपने पुराने मित्र-यार से फ़ोन पर बात कर रहे हों तो अपनी बात पहुँचाने के लिए आज के अत्याधुनिक तकनीकी युग में भी टेलीफ़ोन कम्पनियों के तार या मोबाइल के नेटवर्क के नहीं, बल्कि अपनी मर्दाना मजबूत आवाज के ही भरोसे रहते हैं | जितना प्रिय दोस्त, उतनी ही दहाड़ती हुयी आवाज – अबे साले कालिया, कहाँ मर गए थे इतने दिनों से...... |  माँ कहतीं हैं कि अब तो इनके फ़ोन वार्तालाप के को सुन कर अड़ोस-पड़ोस वाले भी इनके ऊपर संस्मरण लिख सकते हैं |
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पापा का दिली प्यार जताने का पुराना तरीका है – पेन बदलना.  
यदि कोई बहुत ज्यादा आत्मीय है तो कुर्ता भी बदलते हैं |  नामवर बाबू जी अपने सारे पुराने, बीमार और फटे कुर्तों का यहीं आ कर श्राद्ध करते हैं और पापा नाक फुला खुश हो कर एक्सचेंज में उनके सामने अपना पूरा कलेक्शन सामने रखते हैं जिससे किसी कुर्ते का भाग्य संवरे और वो उनके भैया के अंगों पर सुशोभित हो सके | पापा एक-एक कर सारे कुर्ते उनकी तरफ़ बढ़ाते हैं: भैया, ई कईसन रही?’ अऊर एहू के देखा...
अंत में, बाबू जी किसी अच्छे से कुर्ते को बुद्ध की तरह मौन भाव से स्वीकार कर लेते हैं |  नाप बिल्कुल एक है इसलिए कोई दिक्कत भी नहीं है | ये प्रायः हर बार का क्रम है |
पहले पापा और दूधनाथ चाचा जी ने भी शायद दर्जनों कुर्ते बदले होंगे | शरीर संरचना का अंतर देख कर के कोई भी कह देगा कि न उनके कुर्ते इनके काम आये होंगे और न इनके कुर्ते उनके किसी काम के होंगे | फिर यह बात तो ये दोनों मित्र भी जानते थे, लेकिन कौन मुआ कपड़े के लिए कपड़े बदलता था, ये तो प्यार का आदान-प्रदान था |  हम सब फिर से इंतज़ार कर रहे हैं कि देखें, वे कब फिर से अपने कुर्ते आपस में बदलते हैं और हम प्रार्थना करते हैं कि वो दिन जल्दी आये |
 पेन का बदलना भी पापा के लिए उसी तरह प्यार जताना है | किसी प्यारे शिष्य या प्यारे मित्र की तीन रुपये की पेन को देख कर ललचाते हुए बोलेंगे –
 भई देवेन्द्र जी, ज़रा आपकी पेन देखूं तो, अदभुत दिख रही है, ऐसी तो बनारस में दिखती ही नहीं है, क्यों मंटू जी?”
देवेन्द्र जी खुश हो कर पेन आगे बढ़ा देंगे. पापा कहेंगे:
वाह, बहुत अच्छी चल रही है, इसे मैं ले लूँ तो कोई हर्ज़ तो नहीं है |
नहीं गुरु जी, बिलकुल ले लीजिये |
लेकिन, रुकिए, रुकिए, रुकिए! मैं भी एक कलम देता हूँ आपको , भाग कर अपने कमरे में जायेंगे और वहॉं से कोई ‘पार्कर’ नुमा अच्छी महंगी पेन ले कर आयेंगे:
ये लीजिये, स्टील की पेन है इसलिए मैं लिखता नहीं | शायद आपके काम आ जाए |”

हम जैसे अल्पज्ञों के लिए पहले ये घाटे का सौदा नज़र आता था | लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है कि पापा के लिए पेन की कीमत तो महत्त्वपूर्ण थी ही नहीं, यह तो उनके लिए प्यार दर्शाने का एक तरीका होता था, और आज भी है – बिल्कुल निश्छल, बिल्कुल स्वाभाविक |

ये तो रही कुछ यादें पापा के साथ, ज्यादातर बचपन की | गठरी में और भी बहुत कुछ यादें हैं, उनके साथ अपने किशोरावस्था और जवानी की | ईश्वर करें कि बुढ़ापे की भी हों | खोलूंगा धीरे-धीरे फिर कभी |   
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