Sunday, March 18, 2012

कितने ही चाँद रोने लगे हैं सियारों की तरह


70 के दशक के आरम्भ में अशोक वाजपेयी सम्पादित 'पहचान सीरीज' ने जिन कवियों की पहचान बनाई थी दिविक रमेश उनमें एक थे. अर्सा हो गया. लेकिन दिविक रमेश आज भी सृजनरत हैं. अपने सरोकारों, विश्वासों के साथ. उनकी कविता का मुहावरा जरूर बदल गया है लेकिन समकालीनता से जुड़ाव नहीं कम हुआ है. पढते हैं चार कविताएँ- जानकी पुल.
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तभी न
    सुना था मॆंने
  वह झूठ झूठ नहीं होता
  जो पहुँचाता हो सुख किसी को ।

तभी न
      कहा था मॆंने एक रोते हुए बच्चे को
      देखो वहाँ उस पेड़ पर
      पत्तों की ओट
      हँस रहा हॆ एक कॊवा तुम्हारे रोने पर !
      ऒर बच्चा चुप हो गया था ।
      ढूंढते-ढूंढते हँसी पत्तों में
      रोना भूल गया था ।

      तभी न
      लाचारी पर माँ-पिता की
      एक टूट चुकी मामूली लड़की को
      कहा था मॆंने
      तुम कम नहीं किसी राजकुमारी से
      चाहो तो उखाड़ फेंक सकती हो
      इस टूट को !
      सुनकर
      चॊंकी ज़रूर थी लड़की
      पर डूब गई थी सोच में
      ऒर भूल गई थी अपनी टूट को ।

      तभी न
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      पर जानकारों ने क्यों दी सजा मुझे
      ऒर वह भी बीच चॊराहे खड़ा कर !
      आरोप था मुझ पर
      कि मॆंने बोले थे असंभव झूठ
      न हँस सकता हॆ कॊवा
      ऒर न ही जुर्रत कर सकती हॆ मामूली लड़की
      होने की राजकुमारी ।

      सोच रहा हूं --
      तो मॆंने कब कहा था
      कि हँस सकता हॆ कॊवा
      या कर सकती हॆ जुर्रत एक मामूली लड़की होने की राजकुमारी ।
      हांलाकि हर्ज भी क्या होता
      अगर हँसे होते कॊवे
      ऒर की होती जुर्रत मामूली लड़कियों ने होने को राजकुमारियां ।

      मॆंने जो कहा था
      क्यों समझा था उसे
      बस एक रोते हुए बच्चे ने
      एक टूटती मामूली लड़की ने ?

      तो कुछ बातें ऎसी भी होती हॆं
      जिन्हें समझ सकते हॆं
      बस रोते हुए बच्चे
      ऒर टूट रहीं मामूली लड़कियाँ ।

      तभी न ?


      किस्सा न समझा जाए तो बताऊं
                       
      किस्सा न समझा जाए तो बताऊं ।
      कभी होती थी जान क़ाबिज़ तोते में
      राक्षसों की, डायनों की ।
      किस्सा इसलिए न समझा जाए
      कि जब सुनाते थे दादा
      तो नहीं होता था वह किस्सा हमारे लिए भी ।
      यूं अर्थ भी तब कहां समझ पाते थे पूरा ।
      डरना होता था या चॊंकना ऒर होता था खुश हो जाना । बस ।

      आज जब अर्थ समझ आया हॆ
      यानि कब्जे में होती थी जान राक्षस की तोते में
      जॆसे आज रहती हॆ जान हमारी कब्जे में चंद गुण्डों के
      जॆसे आज रहता हॆ न्याय कब्जे में चंद कद्दावर लोगों ऒर कुछ शातिर गवाहों के ।
      ऒर समानता यह हॆ
      कि किस्सा न तब था न अब हॆ ।

      डरते तब भी थे ऒर अब भी
      चॊंकते तब भी थे ऒर अब भी
      बस हां, खुश होने के मॊके अब नहीं मिलते
      नहीं मिलते क्योंकि कहानी का अंत ही नहीं होता ।

      राजकुमार हॆं पर वे संविधान में नहीं हॆं राजकुमार
      राजकुमार जुटे हॆं अपनी रजकुमारियत बचाने में
      ऒर लगे हॆं बेवकूफ बनाने में लोगों को ।

      किस्सा यह भी नहीं हॆ
      कि लोग बेवकूफ बन रहे हॆं
      क्योंकि वे सच में बेवकूफ बन रहे हॆं ।
      ऒर बख्शते जा रहे हॆं कितनों ही को राजकुमारियत ।

      चाह रहा हूं कि एक किस्सा गढ़ूं इस बिन्दु पर ।
      मसलन गढ़ूं
      कब्जे में आ गया हॆ देश का सूचना तंत्र
      उन तमाम लोगों के जो अब तक भीड़ थे
      ऒर कब्जें में थे जो रजकुमारियत के लिए लड़ते-मरते राजकुमारों के ।

      आते ही कब्जे में सूचना-तंत्र
      ढहने लगी हॆ इमारतों के कब्जे की सारी भव्यता
      ऒर बहने लगी हॆ फॆल फॆल कर
      धरती के आखिरी कोने तक सचमुच ।

      लगता हॆ जॆसे हर एक उठता हुआ आदमी
      बिना किए एस एम एस जा बॆठा हॆ हॉटसीट पर
      ऒर जीत गया हॆ बड़ी से बड़ी रकमें ।

      अब किस्सा हॆ तो बढ़ाया भी जा सकता हॆ चाहे जितना ।
      ठूंसी जा सकती हॆं सारी खुशफहमियां
      खुशियों की तरह हर जेब में ।

      पर अन्त तो, वह कहते हॆं न, होता हॆ किस्से का भी ।
     

       कुछ सपने अपने

      मुझे छोड़ दिया गया
      छोड़ दिया गया इसीलिए किया गया दावा
      कि करना चाहिए मुझे उनका समर्थन
      की नहीं की उन्होंने मेरी हत्या ।

      समझाया उन्होंने ही
      कि नहीं पड़ना चाहिए मुझे पचड़े में, कि नहीं भिड़ना चाहिए
      नहीं सोचना चाहिए कि क्यों की थी उन्होंने हत्या पड़ोसी की
      कि नहीं खड़ा करना चाहिए महज इतनी सी बात पर हंगामा ।

      कॆसे समझाऊं कि पड़ोसी की हत्या में
      कुछ ह्त्या मेरी भी हुई हॆ
      कि पड़ोसी के सपनों में
      कुछ सपने थे मेरे भी ।

   
 वे ही हैं कुछ       

गलती हुई हड्डियां नहीं थम रही गलने से
पानी नहर का तब्दील हो रहा हे कीचड़ में
आँखें उल्लुओं की सहचर हो चुकी हॆं दिन की
पाँवों ऒर हाथों की जगह
फिलहाल ’रिक्त हॆ’ की सूचनाएं गई हॆं टंग
अस्पतालों के दरवाजे ऒर बड़े ऒर सुरक्षित
ऒर अभेद्य कर दिए गए हॆं ।

सुना है स्विस बॆंकों में पड़ी रकमें सड़ांध मारने लगी हॆं ।

कितने ही चाँद रोने लगे हॆं सियारों की तरह
सूरज लंगड़ा गया हॆ ।

सुना हॆ एक देश लटक गया हॆ
आसमान के किसी तारे से लटकी रस्सी पर ।

कोई कह रहा था ऒर वह सच भी लग रहा था कि
बस अब दुनिया का अंत आ गया हॆ ।
सब घबरा गए हॆं ।

बस वे ही हॆं कुछ
जो इस बार भी गोदामों को भरने में जुट गए हॆं
बस वे ही हॆ कुछ
जो नए नए चुनाव चिन्ह खोजने में लग गए हॆं
मसलन मत्स्य, नॊका, प्रलय, मनु आदि इत्यादि ।






     
     

Saturday, March 17, 2012

किनारे बैठी औरत धोती रहती है अपने शोक


हाल के दिनों में जिन कुछ कवियों की कविताओं ने मुझे प्रभावित किया है महेश वर्मा उनमें एक हैं. हिंदी heartland से दूर अंबिकापुर में रहने वाले इस कवि की कविताओं में ऐसा क्या है? वे इस बड़बोले समय में गुम्मे-सुम्मे कवि हैं, अतिकथन के दौर में मितकथन के. मार-तमाम चीज़ों के बीच अनुपस्थित चीज़ों की जगह तलाशती, छोटे-छोटे सुकून के पल तलाशती उनकी कुछ कविताएँ आज पढते हैं- 
जानकी पुल.
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1.
अनुपस्थित

सामने दीवार पर
चौखुट भर जगह है एक तस्वीर की
कोई तस्वीर नहीं है एक जगह है-
तस्वीर के न होने की,

यह न होना भी इतनी पुरानी घटना कि
पिछले बार की पुताई में मिल नहीं पाया था-
इस चौखुटे से पुती हुई बाकी दीवार का रंग.

अलग से और उजला दिखने लगा है इस खाली जगह का खाली रंग
एक जि़द की तरह जब  की गई दोबारा पुताई बस इस चैखुटे भर की .

क्या था इस जगह पर ?
देवता-पितर या शाश्वत झरते झरने का भूदृश्य ?
  कोई प्रमाणपत्र ?

याद करते हुए देखने लगता हूँ खिड़की से बाहर
दूर एक सूखा वृक्ष और उसकी टहनियाँ,
जैसे खाली जगह हरे पत्तों के न होने की.

अपने अनुषंगों के साथ आती जाती रहती उस पर भी वर्षा
और गहराता जाता सूखी टहनियों के बीच का अनुपस्थित हरा रंग.

निशब्द घुस जाता असमय मारा गया दोस्त सोचने की
धुंधली कोठरी में.
भूल की तरह आ जाता जिसका नाम जीवित दोस्तों की महफि़ल में
फिर और साफ दिखने लगती वह जगह दोस्त के न होने की,
इसके बाद दिखने लगता शब्दों का न होना शब्दों के बीच.

अंततः की तरह लौटते हुए अपने कमरे
सामने दीवार पर-कोई तस्वीर नहीं है एक जगह है
तस्वीर के न होने की.

अपने अनुपस्थित की तरह देखता हूँ यह, अपना कमरा.
मेरे अनुपस्थित की तरह देखता है यह मुझको.

2.

पुराना पेड़

वह दुख का ही वृक्ष था
जिसकी शिराओं में बहता था शोक
दिन-भर झूठ रचती थीं पत्तियाँ हंसकर
कि ढका रह आए उनका आंतरिक क्रँदन

एक पाले की रात
जब वे निःशब्द गिरतीं थीं रात पर और
ज़मीन पर
हम अगर जागते होते थे
तो खिड़की से यह देखते रहते थे

देर तक


3.

आदिवासी औरत रोती है

आदिवासी औरत रोती है गुफाकालीन लय में.
इसमें जंगल की आवाज़ें हैं और पहाड़ी झरने के गिरने की आवाज़,
इसमें शिकार पर निकलने से पहले जानवर के चित्र पर टपकाया
गया आदिम खू़न टपक रहा है,
तेज़ हवाओं की आवाज़ें हैं इसमें और आग चिटखने की आवाज़.
बहुत साफ और उजली इस इमारत के वैभव से अबाधित
उसके रूदन से यहां जगल उतर आया है.

लंबी हिचकियों के बीच उसे याद आते जायेंगे
मृतक के साथ बीते साल, उसके बोल, उसका गुस्सा-
इन्हें वह गूँथती जायेगी अपनी आवाज़ के धागे पर
मृतक की आखिरी माला के लिये.
यह मृत्यु के बाद का पहला गीत है उस मृतक के लिये-
इसे वह जीवित नहीं सुन सकता.

हम बहरहाल उन लोगों के साथ हैं
जिनकी नींद ख़राब होती है- ऐसी आवाज़ों से.


4.
वक्तव्य
अपने आप में बड़बड़ाते चलने वालों के पास
दूसरों के स्थगित वाक्य हैं.
टल गया जिनका कहा जाना कभी संकोच
कभी हड़बड़ी और अक्सर
समय पर न सू झ पाने के कारण.
आपके ठीक बगल से गुज़रते हुए वे कहते हो सकते हैं
वह वाक्य जो आपसे कहना चाहता था आपका परिचित
और चुप रह गया था पिछले किसी मौसम.

वे यूँ ही याद रखने को दुहरा रहे हों
किसी दूसरे के हिस्से का वाक्य जिसे
आगे किसी जगह पहुँचाना है.
बाज़ दफा जब वे चुपचाप गुज़र जाएँ
आपके पास से सोचते कोई बात-
वे सुन रहे होते हैं कान देकर आपके भीतर गूंजते
आपके अनकहे वाक्य.


5.
वर्षाजल

अगर धरती पर कान लगाकर सुनो
कराहटें सुनाई देंगी.

सम्राटों की हिंस्त्र इच्छाएँ,
साम्राज्ञियों के एकाकी दुःख,
स्त्रियों के रूदन की चौड़ी नदी का हहराता स्वर-
गूंजते हैं धरती के भीतर.

ऊपर जो देखते हो इतिहास के भग्नावशेष
सूख चुके जख़्मो के निशान हैं त्वचा पर.
फिर लौटकर आई है बरसात-
जिंदा घावों को धो रहा है वर्षाजल.


6.
बारिश
घर से निकलते ही होने लगती है वर्षा
थोड़ा बढ़ते ही मिटते जाते कीचड़ में पिछले पदचिन्ह
ढ़ांढ़स के लिये पीछे मुड़कर देखते ही
ओझल हो चुका होता है बचपन का घर.
घन-गर्जन में डूब जाती मां-बाबा को पुकारती आवाज़
पुकारने को मुंह खोलते ही भर जाता है वर्षाजल
मिट रही आयु रेखाएँ त्वचा से
कंठ से बहकर दूर चला गया है मानव स्वर
पैरों से उतरकर कास की जड़ों में चली गई है गति.
अपरिचित गीली ज़मीन पर वृक्ष सा खड़ा रह जाता आदमी
पत्रों पर होती रहती है बारिश.


7.

और छायाएँ

ऊपर यहां इस पहाड़ी मोड़ से-
दिखाई देता है एक पोखर.
आज इसके किनारे बैठी है एक स्त्री
धोती हुई अपने कपड़े और अपनी देह.

मेरे भीतर है यह पोखर जिसके शांत जल में
झांकती वृक्षों की छायाएँ और आकाश,
किनारे बैठी औरत धोती रहती है अपने शोक.

मैं हूँ वह पोखर जो दिखता ऊपर से
मैं ही हूँ वह औरत जो देखती है-जल में हिलती छाया.
मैं ही वह शोक जो धोया जा रहा इस जल में.

यहीं से ऊपर की ओर
देखता  हूँ ऊपर से
जहां से दिखाई देता एक पोखर, एक स्त्री और छायाएँ


8.

दीवारें

कमरा यह बना दीवारों से
यहां वर्जित है आकाश का आना
सुबह को खुली खिड़कियों के अंतराल से ज़्यादा.

कमरे में नहीं होता आकाश तो नहीं होती चिडि़या,
न पतंग या न लड़ाकू विमान.
नहीं होते सितारे, न बरसती ओस न बरखा
एक हवा होती, रंगहीन,
जिसमें
घूमता होता पंखा मीडियम स्पीड पर.

दीवारें रोकती हैं आकाश.

इस गहरी रात में निकलकर बाहर छोटे से इस चांद के नीचे-
मैं ज़ोर से भरता हूँ फेफड़े में आकाश-
थोड़ा उजला हो जाता, आत्मा का साँवला रंग.