Monday, April 20, 2015

हृषीकेश सुलभ कथाकार हैं, क्रॉनिकल राइटर नहीं!

हृषीकेश सुलभ के छठे कहानी संग्रह 'हलंत' की कहानियों को पढ़ते हुए यह मैंने लिखा है- प्रभात रंजन 
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हृषीकेश सुलभ की कहानियों का छठा संग्रह ‘हलंत’ पढ़ते हुए बार बार इस बात का ध्यान आया कि संभवतः वे हिंदी के अकेले समकालीन कथाकार हैं जिनकी कहानियों का कंटेंट लगातार समकालीन बना रहा है. बिखरते-बनते समाज के रोयें-रेशे से बुनी उनकी कहानियाँ कई अर्थों में समकालीन समय-समाज के दस्तावेज की तरह हैं. स्पैनिश भाषा के लेखक मारियो वार्गास योसा ने गल्पकार को परिभाषित करते हुए लिखा है कि जो सबको दिखाई देता हो गल्पकार का काम उसको बताना-दिखाना नहीं है. यह काम तो क्रॉनिकल राइटर का होता है. लेखक का काम होता है जो दिखाई दे रहा है, जो सामने चमक रहा है उसके पीछे छिपे सच को दिखाना. चमक-दमक के पीछे की स्याही को दिखाना. हृषीकेश सुलभ की कहानियां यही काम करती हैं. विस्थापन के दौर में छूटती जाती, बदलती जाती दुनिया की वह कहानी जिसके बारे में कहीं लिखा नहीं जाता. सुलभ जी मूल रूप से कथाकार हैं क्रॉनिकल राइटर नहीं. इसलिए उनकी कहानियों की ज़मीन लगातार विस्तृत होती गई है, समृद्ध होती गई है.  

‘हलंत’ संग्रह की पहली ही कहानी है ‘अगिन जो लागी नीर में’. विस्थापन के कारण गाँव की अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा का किस कदर क्षरण हुआ है यह कहानी बड़ी बारीकी से इसकी कहानी कहती है, किस तरह विकास के बनते नक़्शे से गाँव बाहर होता जा रहा है, किस तरह गाँव की पहचान गुम होती जा रही है, लेखक ने बिना जजमेंटल हुए इस कहानी में इन पहलुओं को उठाने की कोशिश की है. गाँव को लेकर यह कहानी विकास बनाम विनाश के प्रचलित फ़ॉर्मूले को तोड़ती है और भावुकता से हटकर गाँव का बदलता हुआ यथार्थ सामने लाती है. गाँव की कहानी के नाम पर हिंदी में या तो जाति संघर्ष की कहानियां लिखी जाती हैं या राजनीतिक चक्र-कुचक्र की कहानियां. विस्थापन के दबाव में गाँव की सामाजिक संरचना किस तरह बदल रही है, गाँव में शहर बन जाने की लालसा किस तरह बढ़ रही है यह कहानी बिना लाउड हुए इस पहलू को सामने रखती है. रेणु की कहानियों की तरह ‘अगिन जो लागी नीर में’ कहानी में भी गाँव पूरी जीवन्तता के साथ मौजूद है, जो इस बात से आश्वस्त करता है कि गाँवों की सामाजिकता अभी भी कायम है लेकिन उसका रंग ढंग बदल रहा है. मुझे नहीं लगता है कि नई शताब्दी में गाँव को लेकर ऐसी कोई कहानी लिखी भी गई है. निस्संदेह यह इस संग्रह की सबसे यादगार कहानी है. बदलाव को मजबूती से रेखांकित करती हुई.

संग्रह में ग्रामीण परिवेश की एक और जीवंत कहानी है ‘काजर आँजत नयन गए’. कहानी हमें लेकर जाती है गाँव-देहातों की जातीय राजनीति, उसकी बदलती हुई दुनिया और उसमें स्त्री शक्ति की केन्द्रीयता है. यह एक अजीब विरोधाभास है कि जिस दौर में महिला आरक्षण के कारण ही सही हिंदी पट्टी में पंचायत चुनावों में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता बढ़ी है, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ी है, उस दौर में ग्रामीण समाज में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता को लेकर हिंदी में कहानियां न के बराबर लिखी गई हैं. यह एक उदाहरण भर है जो यह बताता है कि हिंदी कहानियां अपने समाज से, अपनी जड़ों से कटती जा रही हैं. उनमें अपने समकाल की आहट कम सुनाई देती है. हिंदी कहानियों के कुछ बने बनाए फ़ॉर्मूले हैं, कुछ परम्पराओं के फीते हैं जिनसे कहानियों नाप तौल की जाती है. जिनकी रचनाओं में यथार्थ उनसे भिन्न होता है उनको कहानियों की तथाकथित चौहद्दी से बाहर कर दिया जाता है. इसकी वजह से होता यह है हिंदी कहानियों में बदलते समाज की आहटें कम दर्ज हो पाती हैं. जो कहानियां इन बने बनाए फ़ॉर्मूले से भिन्न होती है, उनको जैसे जात निकाला दे दिया जाता है, कथा परम्परा के हाशिये पर ठेल दिया जाता है.

काजर आँजत नयन गए कहानी के केंद्र में वह जातीय संघर्ष है जो हिंदी पट्टी की राजनीति की धुरी रही है. बदल कुछ नहीं रहा, वही षड़यंत्र, वही कुचक्र, बस उसकी डोर स्त्री बड़ी मजबूती से थाम रही है. कहानी में सुधा सिंह यादव का किरदार बड़ी मजबूती से केंद्र में आता जाता है. स्थानीय राजनीति में स्त्री का गुड़िया की तरह उपयोग की एक रूढ़ छवि से यह भिन्न स्त्री है जो हिंदी कहानी की बदलती जमीन की तरफ इशारा करती है. वह सत्ता का नया कोण बनकर सामने आ रही है.  

इन दो कहानियों की चर्चा से से बात आरम्भ करने का मतलब यह नहीं है कि सुलभ जी ग्रामीण समाज के उल्लेखनीय कथाकार हैं. नहीं, यह निवेदन मैंने आरम्भ में ही किया था कि गाँव बनाम शहर के क्लीशे को तोडती हुई कहानियां हैं हृषीकेश सुलभ की. वे बदलाव के कथाकार हैं जिनकी कहानियों के कथानक  विस्थापन के इधर और उधर अवस्थित हैं. संग्रह की एक कहानी है ‘हलंत’. विस्थापितों के शहर में बढ़ती अजनबियत ने किस कदर हमारे जीवन को असुरक्षित बना दिया है, आपसी संबंधों में संवेदनहीनता बढती जा रही है. शहर में अहिंसा मैदान है, उस मैदान में एक दिन कुछ अज्ञात लोगों द्वारा धमाका किया जाता है और उसके बाद शहर के ज्ञात लोगों में भय व्याप्त हो जाता है. न जाने कब कौन पकड़ा जाए. आखिर में जो पकड़ा जाता है उसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था. कहानी में कहीं यह संकेत नहीं आता है कि किस शहर के अहिंसक माहौल के हिंसात्मक होते जाने की यह कहानी है. सिवाय इसके कि कहानी में यह उल्लेख आता है कि वह शहर कस्बाई है. यानी जो रोग महानगरों के माने जाते थे. जिनकी वजह से नई कहानी के दौर में कमलेश्वर की कहानी ‘दिल्ली में एक मौत’ बहुत मानीखेज मानी जाती थी. इसमें सिग्नेचर ट्यून की तरह एक ट्रेजिक प्रेम कहानी है, जिसमें भावनात्मकता की जगह व्यवहारिकता हावी होता जाता है. इतना कुछ हो जाता है लेकिन क्यों हो जाता है यही समझना मुश्किल होता जा रहा है. सब कुछ पीछे छूटता जा रहा है.

संग्रह में एक अलग मूड की, अलग कैफियत की कहानी है ‘उदासियों का वसंत’, जो विशेष तौर उल्लेख किये जाने की मांग करती है. हम सब जानते हैं कि आभासी दुनिया का हमारी वास्तविक दुनिया में दखल बढ़ता जा रहा है, लेकिन उसके गंभीर प्रभाव को हम सभी स्वीकार करने से बचते हैं, सार्वजनिक तौर पर उससे कतराते हैं. हम जानते हुए भी यह नहीं मानना चाहते हैं कि संबंधहीनता के दौर में संबंधों की यह आभासी दुनिया सुकून देती है. यह कहानी उसका न सिर्फ सहज स्वीकार है बल्कि हमारे एकाकी होते जाते जीवन में उसकी सकारात्मक भूमिका के ऊपर बहुत विश्वसनीयता से मुहर लगाती है. इस कहानी पर टिप्पणी करते हुए अपने फेसबुक पोस्ट में वरिष्ठ आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस बात को सही रेखांकित किया है-  'फेसबुक' की आभासी दुनिया हमारे वास्तविक अनुभवों की दुनिया को केवल विपन्न नहीं करती, उसे संवेदना के लिहाज से संपन्न भी करती है।“ संवेदनहीन होते समय में संवेदना से संपन्न कहानी है यह.

कहानी में कथानायक के सामने यह द्वंद्व है कि वह अपने अतीत से कैसे निकले, उस अतीत से जो घाव के जख्म की तरह बचा रह गया है, बीच बीच में टीस देता हुआ. पत्नी और बेटी की यादें धुंधलाती जा रही हैं लेकिन वह उससे मुक्त नहीं हो पा रहा है. पत्नी शोध करने अमेरिका गई और वहां से कभी नहीं लौटी, बाद में उसकी बेटी को भी ले गई. जिससे उसके बाद उनका मिलना कभी नहीं हो पाया. हाँ, फेसबुक पर वह उनके साथ चैट करती रहती है. उसी फेसबुक के माध्यम से उनके जीवन में बिन्नी नाम की एक अपेक्षाकृत युवा लड़की आ जाती है, उसके अकेलेपन के साथ अपने अकेलेपन को साझा करने लगती है. उसका भी अपना अतीत है. जिसे पीछे छोड़ वह आगे बढ़ना चाहती है. उम्र के फासले के बावजूद जीवन के फासले कम होते जाते हैं. कथानायक अपनी स्मृतियों की अतीत यात्रा पर मन्नार जाता है और वहीं अपने अतीत से मुक्त हो जाता है, दोनों अपने  वर्तमान को स्वीकार कर कर लेते हैं. मुझे रूथ प्रवर झाबवाला की कहानी ‘इन द माउंटेन्स’ याद आती रही. हालाँकि उस कहानी का सन्दर्भ अलग है, पृष्ठभूमि अलग है लेकिन एकाकीपन यही है.

यह आज की कहानी है और अलग से बहस की मांग करती है. छह कहानियों के अपेक्षाकृत इस छोटे से संग्रह में ये चारों कहानियां समकालीन वृहत्तर समाज के बदलाव के दस्तावेज की तरह हैं, उनके गाँव भी गत्यात्मक हैं, उनको लेकर कहीं यह भाव नहीं है कि हाय-हाय हमारा गाँव क्यों बदल गया? हम बदले तो बदले लेकिन हमारे मन में बसा वह गाँव क्यों बदल गया. अब हम किसको याद करके भावुक होंगे. ये सारी कहानियां भावुकता से मुक्त हैं, बल्कि भावुकता के स्थान पर इन कहानियों में एक अन्तर्निहित व्यंग्यबोध है. लेकिन किसी तरह का सिनिसिज्म नहीं है.

सुलभ जी की कहानियों में एक बात जो पढ़ते हुए सहज रूप से अपना ध्यान खींचती है वह उनकी नाटकीयता है. ‘अगिन जो लगी नीर में’ और ‘काजल आँजत नयन गए’ कहानियों में नाटकीयता कहानी को नए नए सन्दर्भों, नए नए संकेतों से भर देती है. लोकगीतों की हुक जिसमें टेक की तरह मौजूद है. कहानियों की भाषा सम्मोहक है, वाचिक शैली की याद दिलाती हुई. उनको पढने का नहीं सुनने का भी अपना आनंद है- सामने नदी थी...नदी में जल न के बराबर  था। लगभग सूखी हुई नदी। बीच-बीच में...कहीं-कहीं...छिट-पुट जल के छिछले चहबच्चे थे। नदी-तल में बिछे पत्थर के निरावृत्त टुकड़े। निस्तेज। धूमिल। जल ही तो था जो उन्हें सींचता...जिसका प्रवाह उन्हें माँजकर चमकाता...आकार देता और अपने साथ लाए खनिजों से उन्हें रंगता...आभा देता। जल की थाप से ही मृदंग की तरह बोलते थे ये पत्थर और लहरें अपने प्रवाह से इन्हें तारवाद्य की तरह झंकृत करतीं थीं। अब जल नहीं था.

जिस कहानी संग्रह में चार कहानियां ऐसी हों जो ट्रेंडसेटर हों, कहानियों के नए सीमांतों की तरफ इशारा करती हों, वह निस्संदेह हमारी भाषा के लिए, हमारी कथा-परम्परा के लिए एक उपलब्धि की तरह है. वर्ष 2014 में जितने कहानी संग्रह आये उनमें अलग से उल्लेख करने योग्य- हलंत. उम्र के 60 वें साल में छह कहानियों के इस संग्रह के साथ हृषीकेश सुलभ ने कथा-जगत में एक बड़ी लकीर खींची है.    


समीक्षित पुस्तक: हलंत; कथा सग्रह; लेखक- हृषीकेश सुलभ, राजकमल प्रकाशन, मूल्य- 250 रुपये. 

Friday, April 17, 2015

नेताजी का सच और गुमनामी बाबा का मिथक!

गुमनामी बाबा नेताजी थे- इस बारे में सबसे पहले ‘गंगा’ नामक पत्रिका में पढ़ा था. बात 1985-86 की है. तब फैजाबाद में गुमनामी बाबा की मृत्यु हो गई थी और वहां के एक स्थानीय पत्रकार अशोक टंडन ने कमलेश्वर के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘गंगा’ में धारावाहिक रूप से लिखना शुरू किया था- ‘वे नेताजी नहीं तो कौन थे’. उसके करीब 25 साल बाद अनुज धर की किताब प्रकाशित हुई है, जिसके हिंदी अनुवाद का नाम है ‘नेताजी रहस्य गाथा’. मुझे अच्छा लगा कि इस किताब में अनुज धर ने मय तस्वीर अशोक टंडन के बारे में लिखा है कि किस तरह उनकी वजह से गुमनामी बाबा की मृत्यु के बाद उनके नेताजी होने का मुद्दा चर्चा में आया था. हालाँकि इसमें कोई शक नहीं कि अनुज धर ने अधिक विस्तार से अपनी पुस्तक में भगवन के बारे में लिखा है, उनको ही गुमनामी बाबा कहा गया. सिर्फ उनके बारे में ही नहीं बल्कि इस बारे में भी विस्तार से लिखा है कि किस तरह 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में तथाकथित मृत्यु के कुछ दिनों बाद से ही यह बात जोर पकड़ने लगी कि असल में नेताजी मरे नहीं थे.

अनुज धर ने लिखा है कि नेताजी की तथाकथित मृत्यु के सात दिन बाद ही एक अमेरिकी पत्रकार अल्फ्रेड वैग ने यह दावा किया कि नेताजी जिन्दा हैं और चार दिन पहले उनको साईगोन नामक जगह में देखा गया है. कहते हैं कि नेताजी के जीवित होने को महात्मा गाँधी ने भी हवा दी. उन्होंने एक भाषण में कहा कि कोई मुझे अस्थियाँ दिखा दे तब भी मैं इस बात को नहीं मानूंगा कि सुभाष जीवित नहीं बचे.

18 अगस्त 1945 तक नेताजी एक इतिहासपुरुष थे उसके बाद के सालों में वे एक मिथक में बदलते गए.

जब गाँधी जी की मृत्यु हुई तो अनेक लोगों ने यह दावा किया कि शवयात्रा में उन्होंने नेताजी को देखा था. नेहरु की मृत्यु के बाद एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें साधू वेश में एक आदमी उनके दर्शन कर रहा है. उस आदमी के गोलाकार चश्मे की वजह से यह कहा गया वह और कोई नहीं सुभाष चन्द्र बोस ही थे. अनुज धर ने यह लिखा है नेताजी सुभाष चन्द्र के जीवित होने की बात को इससे भी बल मिला क्योंकि ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया विभाग लगातार उनकी तलाश करते रहे. उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद ही उनके रूस में होने के दावे किये जाने लगे. अभी हाल में ही हर बात की सच्चाई जानने का दावा करने वाले सुब्रमनियम स्वामी ने तो यहाँ तक कहा है कि नेताजी को रूस में स्टालिन ने मरवा दिया था. हालाँकि इस बात का दूर दूर तक कोई प्रमाण नहीं है.

हाँ, जिस बात के प्रमाण 60 के दशक से सबसे अधिक मिलने लगे वह भगवन नामक एक साधू के नेताजी होने के बारे में है. 1970 के शुरुआत में एक पुस्तक प्रकाशित हुई बंगला में ‘ओई महामानव आसे’. इसमें भगवन के कथनों को अंग्रेजी में शामिल किया गया था. कई उद्धरणों को अनुज धर ने अपनी पुस्तक में जगह भी दी है. लेखक ने लिखा है इस किताब में या तो भगवन को महामानव का दर्जा दिया गया या सुभाष चन्द्र बोस के रूप में. एक उद्धरण देखिये- ‘अभी तक आप मुझे राय बहादुर के बेटे के रूप में जानते हैं. फिर आपको पता लगा कि देशबंधु की जादुई छड़ी से वह राजनीति में आ गया. कुछ को तो यह भी पता चला कि वह गुपचुप साधना भी करता है. दूसरे देशों और काल में तांत्रिकों से मेलजोल कर वह उनसे सलाह भी लेता था. वह विदेश गया और गुम हो गया और मृत हो गया. फिर आपको पता चला कि वह जीवित है- वह मरा नहीं था.’

गुमनामी बाबा की मृत्यु के बाद फैजाबाद में राम भवन से, जहाँ गुमनामी बाबा रहते थे, एक ख़त बरामद हुआ था जिसमें भगवन ने लिखा था- ‘तुम और तुम्हारी सरकार भी अजीब है... बार-बार आयोग बनाती है ताकि जान सके कि वह मरा है या नहीं! इस सबके पीछे तुम्हीं हो... बेवकूफ बनना तुम्हारी इच्छा में भ्रम है.’

अकारण नहीं है कि भगवन की मौत के बाद सुभाष चन्द्र बोस की भतीजी ललिता बोस ने उनके सामानों को सुरक्षित रखवाने के लिए सरकार से लम्बी लड़ाई लड़ी थी. उनको लगता था कि वे उनके चाचा हो सकते थे. भगवन के सामानों में ललिता बोस के पिता यानी सुभाष के भाई सुरेश चन्द्र बोस की तस्वीर के अलावा नेताजी के माता-पिता की तस्वीरें भी मिली थी. हालाँकि ललिता बोस के चचेरे भाई शिशिर बोस ने यह कहा कि जो लोग उस रहस्यमयी बाबा के बारे में यह कह रहे थे कि वे नेताजी थे, असल में वे नेताजी के नाम को बेच रहे थे. जवाब में ललिता जी ने कहा था कि शिशिर बोस सरकारी जुबान इसलिए बोल रहे थे क्योंकि वे सरकार से फायदा चाहते थे. बहरहाल, नेताजी के परिवार के सुगत बोस द्वारा नेताजी के ऊपर लिखी गई किताब के बारे लेखक अनुज धर ने भी यही सवाल उठाया है कि उस किताब में और कुछ नहीं सरकारी जुबान है. असल में नेताजी के परिवार में भी दो मत रहे हैं. एक मत सरकारी जुबान बोलता रहा दूसरे, यह मानते रहे कि नेताजी मरे नहीं थे.
बहरहाल, ललिता बोस और स्थानीय लोगों के प्रयासों के कारण 23 मार्च 1986 से 23 अप्रैल 1987 के दौरान भगवन के सामानों की सूची बनाई गई. आज भी फैजाबाद के सरकारी कोषागार में उनके करीब 2673 सामान रखे हुए हैं. जिसमें उनका दांत भी है. सरकार डीएनए जांच क्यों नहीं करवाती है? उस रहस्यमयी साधू के बारे में सच क्यों नहीं सामने लाना चाहती है जिसके बारे में यह कहा जाता रहा कि वियतनाम युद्ध में उन्होंने वियतनाम की मदद की, और अमेरिकियों को वहां से बाहर निकालने में कामयाबी दिलवाई. बंगला देश युद्ध में मुजीब उनकी ही मदद से विजयी रहे. भगवन ने खुद अपने शिष्यों को मुसोलिनी और हिटलर के किस्से सुनाये थे.

भगवन यानी गुमनामी बाबा अपने आप में ऐसे मिथकीय चरित्र हैं जिनको उनके शिष्य देश-विदेश की हर बड़ी घटना से जोड़ते रहे. नेताजी का सच जो भी हो गुमनामी बाबा का सच सामने आना चाहिए. आखिर महंगे विदेशी सिगार पीने वाला, महंगे महंगे लाइटर रखने वाला, रोलेक्स घड़ी बंधने वाला वह साधू कौन था, जो हमेशा अपना चेहरा ढँक कर रखता था, गिने-चुने लोगों से मिलता था. हमेशा स्थान बदल बदल कर रहता था. जिसके पास नेताजी से जुड़ी छोटी छोटी सामग्रियां तक मिली?

उस साधू का नेताजी से क्या सम्बन्ध था? क्या वे नेताजी ही थे जो 1985 में 88 साल की उम्र में स्वर्ग सिधार गए? अनुज धर का कहना है कि सरकार सब जानती है लेकिन इस सच को सामने नहीं लाना चाहती है. मिथक और इतिहास के द्वंद्व को बनाए रखना चाहती है! जो मरकर भी नहीं मरा उसे जनता की नजरों में अचानक नहीं मारना चाहती है.
प्रभात रंजन  




Wednesday, April 15, 2015

'कोर्ट' : भारतीय सिनेमा का उजला चेहरा

सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म 'कोर्ट' हो और प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या की लेखनी हो तो कुछ कहने को नहीं रह जाता है, बस पढने को रह जाता है- मॉडरेटर 
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जब मुझसे साल दो हज़ार चौदह में देखी गई सर्वश्रेष्ठ हिन्दुस्तानी फ़िल्मों के नाम पूछे गए तो मेरी ज़बान पर फ़ौरन अाए पहले तीन नाम − अाँखों देखी, किल्ला अौर कोर्ट, में दो नाम मराठी फ़िल्मों के हैं। यह भाषाई विभेद याद रख किया गया चयन नहीं है, लेकिन मैं यह जानता हूँ कि यह शुद्ध संयोग भी नहीं है। मायानगरी में बन रहे अौर अाजकल 'बॉलीवुड' कहे जाते बड़े बजट अौर बड़े सितारों वाले लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा की चकाचौंध से कुछ दूर टहलते हुए निकलें तो समकालीन हिन्दुस्तानी सिनेमा पर पैनी नज़र रखने वाले विश्लेषक अापको बतायेंगे कि हमारे दौर का सबसे उल्लेखनीय सिनेमा दरअसल मराठी भाषा में ही निर्मित हो रहा है। बिना ज़्यादा शोर-शराबे के बीते अाठ-दस सालों में नई पीढ़ी के मराठी निर्देशक सिनेमा की तकनीक अौर कथ्य में निरंतर नए अध्याय जोड़ रहे हैं। गहरी सामाजिक सोद्देश्यता से युक्त यह फ़िल्में भारतीय सिनेमा के मानचित्र पर कुछ उसी तरह की मौन क्रांति कर रही हैं, ठीक जिस तरह अाज से बीस साल पहले इरानी सिनेमा ने अपनी मितव्ययी सिनेमाई भाषा अौर भावप्रवण कथ्य के साथ विश्व सिनेमा के पटल पर हलचल मचाई थी।

चैतन्य तम्हाणे निर्देशित 'कोर्ट' को हाल ही में सम्पन्न राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में साल की 'सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म' का तमगा (स्वर्ण कमल) हासिल हुअा है। अविनाश अरुण की 'किल्ला' भी ज़्यादा पीछे नहीं है अौर उसे 'सर्वश्रेष्ठ मराठी फ़िल्म' के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया है। चैतन्य अौर अविनाश, दोनों के लिए ही यह फीचर फ़िल्म की दुनिया में निर्देशकीय पदार्पण है, पहला प्रयास। अौर दोनों ही अभी उमर में तीस से कुछ कम हैं।

यहाँ उल्लेखित दोनों फ़िल्में 'कोर्ट' अौर 'किल्ला' अपने कथ्य अौर कहन में एक-दूसरे से नितान्त भिन्न स्पेस घेरती हैं, सरल बंटवारे में इन्हें 'विचारप्रधान' अौर 'भावप्रधान' के भिन्न सिनेमाई वर्गीकरणों में बाँटा जा सकता है। लेकिन फिर यह दोनों फ़िल्में यह बताने के लिए भी उपयुक्त उदाहरण हैं कि क्यों बेहतर सिनेमा के सामने बुद्धि अौर हृदय को अलग-अलग खाँचों में रखनेवाले ऐसे सरलीकृत वर्गीकरण पूरी तरह फेल हो जाते हैं। दरअसल समकालीन मराठी सिनेमा का चेहरा इन दोनों समांतर धाराअों के संगम की उपज है जो उच्च कलात्मक गुणवत्ता के साथ कथ्य की ईमानदारी को अपनी प्राथमिकताअों में सबसे ऊपर रखता है। मैंने यह दोनों फ़िल्में बीते साल ठंडे तिब्बती शहर मैक्लॉडगंज में एक छोटे लेकिन बहुत ही खूबसूरती अौर समझ के साथ अायोजित होनेवाले फ़िल्म समारोह 'धर्मशाला अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव' में देखीं। दरअसल इन भाषाई फ़िल्मी उत्कृष्टताअों अौर इन्हें मंच देने वाले ऐसे स्वतंत्र सिनेमाई अायोजनों से मिलकर ही हमारे दौर के सिनेमा का एक उजला चेहरा बनता है जो बड़े निर्माताअों अौर निरंतर विकराल रूप धारण कर रहे वितरकों की मनमानियों के मध्य अच्छे सिनेमा को बचाने की कोशिश कर रहा है।

'कोर्ट' सत्रह अप्रैल को हिन्दुस्तान भर के सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली है।
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'कोर्ट'
लेखक अौर निर्देशक: चैतन्य तम्हाणे
निर्माता: विवेक गोम्बर, कैमरा: मृणाल देसाई,
कलाकार: वीरा साथीदार, विवेक गोम्बर, गीतांजली कुलकर्णी, प्रदीप जोशी, उषा बाने


"शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है। उसके मध्‍य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुकद़मेबाजी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोंटा जाता है।" − प्रेमचन्द, 'रंगभूमि' उपन्यास की शुरुअाती पंक्तियाँ।

बीते साल देखी वृत्तचित्र फ़िल्मकार अानंद पटवरधन की गहरी अात्म अालोचनात्मक विज़न से भरी फ़िल्म 'जय भीम काम्रेड' की याद अभी तक हृदय पर ताज़ा है। अपने दोस्त विलास घोघरे की अात्महत्या से उपजे सवालों से जूझते फ़िल्मकार अपना फोकस जाति अौर वर्ग के अापसी अंत:संबंधों की अोर मोड़ते हैं अौर समकालीन समय अौर समाज की कुछ जटिल संरचनाअों को हमारे समक्ष रखते हैं। चैतन्य तम्हाणे का फ़ीचर की दुनिया में निर्देशकीय पदार्पण, नई मराठी फ़िल्म 'कोर्ट' देखते हुए पटवरधन का सवालों भरा वृत्तचित्र बेतरह याद अाता है। 'कोर्ट' अपनी चेतना में जाति, वर्ग अौर राज्यसत्ता के अन्त:संबंधों पर उतना ही जागरुक राजनैतिक बयान है जितना पटवरधन का वृत्तचित्र था। लेकिन 'जय भीम काम्रेड' के गहरे अात्मीय स्वर से उलट, फिक्शन फ़िल्म होने के बावजूद तम्हाणे की 'कोर्ट' का स्वर अपने किरदारों अौर उनकी कथा से सचेत निरपेक्षता रखता है। यह सिनेमाई भाषा, जहाँ स्केंडिनेवियन निर्देशक द्वय दार्देने ब्रदर्स की सिने-भाषाई निस्संगता की झलक मिलती है, दर्शक को विश्लेषण का विचारशील धरातल देती है अौर 'कोर्ट' की यही विशेषता इसे हमारे दौर की सबसे ख़ास फ़िल्मों में से एक बनाती है। 

कथा के केन्द्र में हैं दलित लोकगायक नारायण काम्बले (वीरा साथीदार), जिनसे दर्शक का पहला परिचय फ़िल्म निम्नवर्गीय बस्ती में चल रही नुक्कड़ सभा के मंच पर उनके सत्ता अौर सरकार को सीधे चुनौती देते अोजस्वी जनगीत के माध्यम से करवाती है। लेकिन इस जनसभा के ख़त्म होने से पहले ही पुलिस द्वारा उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाता है अौर यहीं कथा में राज्यसत्ता का प्रवेश होता है। उनकी गिरफ़्तारी की एक विचित्र वजह सामने है। उन पर शीतलादेवी झोपड़पट्टी के सफ़ाई मज़दूर वासुदेव पवार, जिसकी मौत गटर में उतरकर सफ़ाई का कार्य करते हुए ज़हरीली गैस का शिकार होकर हुई है, को अात्महत्या के लिए उकसाने का अारोप है। अारोप है कि पिछले दिनों उसी बस्ती में हुई सभा में उनके द्वारा गाए लोकगीत, जिसमें कथित रूप से कहा गया है कि सिर पर मैला ढोने जैसा अपमानजनक कार्य करने से मौत भली, को सुनकर वासुदेव ने जानबूझकर अपनी जान दी है। अौर इसके साथ ही शुरु होती है अदालती कार्यवाही की असमाप्त प्रक्रिया जिसे फ़िल्मकार ने किसी शल्य चिकित्सक वाली बारीक़ी से फ़िल्माया है। मृत अौपनिवेशिक कानूनों की सरकार द्वारा अपने हित में मनमानी व्याख्या, बचाव पक्ष द्वारा बेल की निरंतर खारिज होती अपीलें अौर इस सबके बीच न्याय पाने की असमाप्त प्रक्रिया को ही स्वयं कार्यवाही का असल उद्देश्य बनते देखा जा सकता है। अगर उस पुरानी कहावत को याद करें जिसमें भारतीय न्याय व्यवस्था के बारे में कहा गया था कि यहाँ 'देर है अंधेर नहीं', तो 'कोर्ट' इस प्रक्रिया के दोष स्पष्ट करते हुए बताती है कि अधिकतर मामलों में यहाँ दरअसल 'देर ही अंधेर है' 

लेकिन जो बात 'कोर्ट' को पूर्ववर्ती सामाजिक रूप से चेतस फ़िल्मों से अलग अौर ख़ास बनाती है वो है इसकी सामाजिक विषमताअों के विभिन्न स्तरों अौर उनके मध्य मौजूद अंतरविरोधी जटिलताअों को धारण करने की क्षमता। किसी एक सामाजिक असमानता को विषय बनाने की प्रक्रिया में समाज में मौजूद अन्य सामाजिक विषमताअों का सरलीकरण अौर उन्हें 'गौण' बनाकर देखने की प्रवृत्ति न सिर्फ़ सिनेमा में, हमारे समाज अौर राजनीतिक विमर्श में भी बहुतायत से मिलती है। 'कोर्ट' के केन्द्र में हमारे मुल्क़ की भीतर से खोखली हो चुकी न्याय व्यवस्था है जो अब सिर्फ़ राज्यसत्ता में बैठे लोगों के हित में काम करती है। लेकिन इसमें मौजूद प्रतिनिधि किरदारों के माध्यम से समकालीन समाज अपनी तमाम असमानताअों अौर जटिल संरचनाअों के साथ यहाँ मौजूद है। फ़िल्म में जैसे कोर्ट की कार्यवाही अागे बढ़ती है कथा में पक्ष अौर विपक्ष में ज़िरह करते दोनों किरदार − सरकारी वकील की भूमिका में गीतांजली कुलकर्णी अौर बचाव पक्ष के वकील की भूमिका में विवेक गोम्बर, प्रमुख किरदार बनकर उभरते हैं। अागे फ़िल्म अदालत से निकलकर इन दोनों किरदारों की निजी ज़िन्दगियों में बारी-बारी से प्रवेश करती है। काम्बले को इस बेतुके अारोप से बचाने की लड़ाई लड़ रहे वकील विनय को हम मानव अधिकारों के लिए लड़नेवाले एक अादर्शवादी अौर ईमानदार वकील के रूप में जानते हैं जो स्वयं धनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से होने के बावजूद एक समतावादी समाज के लिए लड़ी जा रही सामूहिक लड़ाई में शामिल है। विनय शहर के उस बौद्धिक सभ्रान्त का हिस्सा है जो समाज में सामाजिक अौर अार्थिक बराबरी के लिए लड़ने को प्रतिबद्ध है लेकिन ज़मीनी धरातल पर निरंतर अकेला पड़ता जा रहा है। इसके बरक़्स सरकारी वकील नूतन वृहत भारतीय मध्यवर्ग का हिस्सा है। फ़िल्म अदालत से बाहर उनकी रोज़मर्रा की दिनचर्या के शान्त निरीक्षण के माध्यम से दिखाती है कि किस तरह एक कामकाजी महिला का संघर्ष सिर्फ़ उसके कार्यस्थल तक सीमित न होकर चौबीस घंटे जारी रहता है। 'कोर्ट' अन्य राजनैतिक फ़िल्मों की तरह सही को सही अौर गलत को गलत दिखाने के लिए न तो घटनाअों का सरलीकरण करती है, न किरदारों को स्याह सफ़ेद के दायरों में बांटती है अौर न ही उनका कैरीकेचर बनाती है, अौर यही इसे अन्य सामाजिक रूप से सोद्देश्य फ़िल्मों के दायरे में एक पायदान ऊपर ले जाता है। 

फ़िल्म के एक प्रसंग में जहाँ मृत सफ़ाई मज़दूर की पत्नी अदालत में गवाही देने के लिए अाई हैं, बचाव पक्ष के वकील विनय उन्हें अपनी कार में वापस घर छोड़ने जाते हैं। तार्किक रूप से देखें तो यह दोनों पात्र असमान सामाजिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक ही अोर खड़े हैं। वकील विनय की अागे बढ़कर मदद करने की तमन्ना भी स्पष्ट है। लेकिन इस सदिच्छा के बावजूद सचेत कैमरा पूरे दृश्य में दोनों किरदारों के मध्य मौजूद असुविधाजनक अपरिचय को बखूबी पकड़ता है। इस अपरिचय की वजहों को समझना ज़रूरी है। यहाँ वकील विनय का किरदार उस पूरे वाम बौद्धिक सभ्रान्त का प्रतिनिधि चरित्र हो जाता है जिसने समानता के सिद्धान्तों पर सदा यकीन किया अौर वर्गीय बराबरी के नारे भी लगाए, लेकिन अपनी दैनिक दिनचर्या में वह देश के बहुसंख्यक शोषित-दलित वर्ग से पूरी तरह कट गया। सदिच्छा के बावजूद उसने जाति के सवाल को वर्ग के सामने अौर सामाजिक सम्मान के सवाल को वर्गीय बराबरी की स्थापना के स्वप्न के सामने सदा दोयम दर्जे पर रखा। अाज के दौर में जब देश का बहुसंख्यक पिछड़ा वर्ग प्रगतिशील खेमे से निकलकर रूढ़िवादी ताकतों के प्रभाव में जाता दिखाई दे रहा है, प्रगतिशील खेमे के लिए यह अात्मालोचना बहुत ज़रूरी है कि कहीं इसकी एक वजह समय के साथ उसके सिद्धान्तों अौर रोज़मर्रा के व्यवहार में अायी फांक तो नहीं है? अगर अाप मध्यवर्गीय पात्र सरकारी वकील नूतन अौर बचाव पक्ष के वकील विनय, दोनों की कोर्ट से बाहर दिनचर्या को एक-दूसरे के बरक़्स रखें तो साफ़ दिखाई देगा कि कार से चलनेवाले, रोज़मर्रा की खरीददारी के लिए भी सुपरमार्केट पर निर्भर अौर ख़ाली वक्त बिताने के लिए एलीट क्लब का चयन करनेवाले उच्चवर्गीय पात्र विनय की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में उसका निम्नवर्ग से सम्पर्क न्यूनतम है जबकि लोकल ट्रेन से यात्रा करनेवाली, अदालत के काम के बाद घर जाकर पूरे परिवार के लिए खाना बनानेवाली अौर मनोरंजन के लिए स्थानीय नाट्यमंडली पर निर्भर मध्यवर्गीय चरित्र नूतन वृहत समाज से सीधे जुड़ी हैं। 'कोर्ट' इन महीन पर्यवेक्षणों के माध्यम से स्पष्ट करती चलती है कि सामाजिक असमानता अौर अन्यायपूर्ण व्यवस्था का ठीकरा कुछ खल पात्रों के सिर नहीं फोड़ा जा सकता (जैसा फार्मूलाबद्ध हिन्दी सिनेमा करता है) अौर इस कोशिश में यह सफ़लतापूर्वक हमें स्वयं प्रक्रिया में निहित अन्याय को पहचानने का दुर्लभ मौका देती है।
  
तम्हाणे हमारे दौर के सबसे मितव्ययी सिनेमाई भाषा के फ़िल्मकार हैं। वह अपनी फ़िल्म में संवादों से कम, मौन अौर ठहराव द्वारा कहीं ज़्यादा बातें कहते हैं। यहाँ कैमरा अपनी बदहवास गति से नहीं, अपनी बंधनकारी स्थिरता से उपजी बेचैनी के माध्यम से सर्वाधिक प्रासंगिक चीज़ें कहता है। यह बेचैनी देर तक मन के भीतर बनी रहती है अौर तकनीक के माध्यम से कथ्य के प्रतीकार्थों को खोलने का बेहतरीन उदाहरण बनती है। सिनेमैटोग्राफर मृणाल देसाई अौर निर्देशक तम्हाणे पटकथा की निरपेक्ष अाधारभूमि को कैमरा निर्देशन पर लागू करते हैं अौर फ़िल्म कोर्ट से बाहर अामतौर पर, अौर कोर्ट के भीतर के दृश्यों में ख़ासतौर पर स्थिर अचल कैमरा एंगल का प्रयोग करती है। अौर यहाँ भी अदालत की ज़्यादातर कार्यवाही पीछे कुछ दूरी पर, स्थिर धरातल पर खड़े होकर फ़िल्माई गई है। यह कथ्य में पक्षधरता बरक़्स तकनीक में वस्तुनिष्ठता बनाए रखने का प्रयास है। पक्ष-विपक्ष में बहस करते किरदारों से कैमरे की अाँख की बराबरी की दूरी देखनेवाले को एक निरपेक्ष किस्म का परिपेक्ष्य देती है, जो सिर्फ़ संवेदना जगाकर रुकती नहीं बल्कि अागे किसी ब्रेख़्तियन थियेटर की तरह दर्शक को घटनाक्रम पर सोचने अौर उसका विश्लेषण करने की अोर धकेलती है। अचल कैमरा एंगल इससे पहले भी समांतर सिनेमा के दौर में अाए मणि कौल अौर कुमार शाहनी जैसे स्थापित निर्देशकों का अौर बाद में पुणे के फ़िल्म संस्थान से पढ़कर निकले अमित दत्ता जैसे युवा वृत्तचित्र निर्देशकों का प्रिय शगल रहा है। लेकिन 'कोर्ट' में यह अचल कैमरा एंगल इसलिए भी अाकर्षित करते हैं क्योंकि यह मुख्य किरदार को अन्यायपूर्ण तरीके से घेरकर खड़ी भारतीय न्याय व्यवस्था का सिनेमाई भाषिक प्रतीकार्थ हो जाते हैं।
  
कोर्ट के बाहर के दृश्यों में भी इस अचल कैमरागति का बहुत सचेत इस्तेमाल किया गया है। मैं यहाँ फ़िल्म से सिर्फ़ एक उदाहरण देना चाहूँगा। पक्ष के सभ्रान्त वकील विनय अपने परिवार के साथ भोजन कर किसी  नफ़ीस रेस्त्रां से निकल रहे हैं। यहीं उन पर कुछ अज्ञात व्यक्तियों द्वारा हमला होता है। घटनाक्रम के विकास की वजह से हम अन्दाज़ा लगा लेते हैं कि यह अौचक हमला प्रायोजित है अौर जिस जाति समूह की भावनाअों के 'अाहत' होने की चेतावनी धमकी भरे स्वर में उन्हें कोर्ट में उनके तर्क के जवाब में दी गई थी, यह उसका ही नतीजा है। लेकिन यहाँ कैमरागति बड़ी दिलचस्प है। लगता है कि अज्ञात हमलावर वकील का मुँह काला करने की कोशिश में हैं अौर उनसे बचने की प्रक्रिया में विनय कैमरे के फ्रेम से बाहर चले जाते हैं। यहाँ कैमरा उन्हें फॉलो नहीं करता अौर अागे का घटनाक्रम हम सिर्फ़ ध्वनिसंकेतों के माध्यम से सुन पाते हैं। एक ईमानदार अौर निडर वकील पर किसी समूह विशेष के 'अस्मिता के ठेकेदारों' द्वारा हमला कैमरे की गतिसीमा से बाहर ले जाकर निर्देशक अप्रत्यक्ष ही समकालीन अस्मिता विमर्श के उन अंधेरे कोनों की अोर इशारा कर देता है, जिन्हें तर्कशील बौद्धिक जनमानस ने असुविधाजनक सवालों से बचने के लिए जानकर भी अनदेखा किया हुअा है।
  
'कोर्ट' का लक्ष्य किसी पूर्वनिर्मित निष्कर्ष पर पहुँचना नहीं है। न ही यह अागे अाकर कमज़ोर के पक्ष में नारा लगाती है। घोर राजनैतिक फ़िल्म होते हुए भी 'कोर्ट' निरपेक्ष किस्म का सिनेमाई नज़रिया बनाए रखती है अौर  निर्णयकारी निष्कर्ष दर्शक को हाथ में थमाने की बजाए उन्हें स्वयं पर्यवेक्षक की सम्माननीय भूमिका में पदस्थापित करती है। पिछले साल अाई अानंद गांधी की 'शिप अॉफ थीसियस' की परम्परा में 'कोर्ट' भारतीय सिनेमा में उभर रहे नवयथार्थवादी स्वर का एक अौर तेजस्वी सबूत है जो मुश्किल दिखती बातें बखूबी सिनेमाई भाषा में कहती है अौर अगर वह भाषा हमारी परम्परा में पहले से मौजूद नहीं है तो उसका अविष्कार करने से भी नहीं हिचकती।

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(सर्वप्रथम 'हंस' पत्रिका में प्रकाशित)

फ़िल्म का थिएट्रिकल ट्रेलर − https://www.youtube.com/watch?v=yhuQr4ZvZ9A

फ़िल्म में शामिल जनगीत − https://www.youtube.com/watch?v=L0QfvGWeeVQ