Tuesday, September 2, 2014

लड़कियां तरह-तरह से बचाए रखती हैं अपना प्रेम

'लव जेहाद' के बहाने ये कविताएं लिखी जरूर गई हैं मगर ये प्रेम की कवितायेँ हैं, उस प्रेम की जिसके लिए भक्त कवि 'शीश उतार कर भूईं धरि' की बात कह गए हैं. ये कवितायेँ प्रासंगिक भी हैं और शाश्वत भी. प्रियदर्शन की कविताई की यह खासियत है कि वे नितांत समसामयिक लगने वाले प्रसंगों में शाश्वत के तत्त्व ढूंढ लेते हैं. दिलो-दिमाग को छूने वाली कविताएं- मॉडरेटर.
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लव जेहाद

एक

लड़के पिटेंगे और लड़कियां मारी जाएंगी
इस तरह संस्कृति की रक्षा की जाएगी, सभ्यता को बचाया जाएगा।
किसी ज़रूरी कर्तव्य की तरह अपनों के वध के बाद
भावुक अत्याचारी आंसू पोछेंगे
प्रेम पर पाबंदी नहीं होगी
लेकिन उसके सख्त नियम होंगे
जिनपर अमल का बीड़ा वे उठाएंगे
जिन्होंने कभी प्रेम नहीं किया।
जो बोलेंगे, उन्हें समझाया जाएगा
जो चुप रहेंगे उन्हें प्रोत्साहित किया जाएगा
जो प्रशंसा करेंगे उन्हें प्रेरित किया जाएगा
जो आलोचना करेंगे, उन्हें ख़ारिज और ख़त्म किया जाएगा।
धर्म के कुकर्म के बाद पैसे के बंटवारे को लेकर पीठ और पंठ का झगड़ा
राजा सुलझाएगा,
और पुरोहितों-पंडों, साधुओं की जयजयकार पाएगा
राष्ट्र कहीं नहीं होगा, लेकिन सबसे महान होगा
धर्म कहीं नहीं होगा, लेकिन हर जगह उसका गुणगान होगा
एक तानाशाह अपनी जेब में चने की तरह उदारता लिए चलेगा
और मंचों और सभाओं में थोड़ी-थोड़ी बांटा करेगा
उसके पीछे खड़े सभासद उच्चारेंगे अभय-अभय
और
पीछे अदृश्य भारी हवा की तरह टंगा रहेगा विराट भय।                  
इस पाखंडी-क्रूर समय में
प्रेम से ही आएगा,
वह विवेक, वह संवेदन, वह साहस,
जो संस्कृति के नाम पर प्रतिष्ठित की जा रही बर्बरता का प्रतिरोध रचेगा।

 

दो

और संकरी हो गई है प्रेम की गली,
गली के दोनों तरफ़ तरह-तरह की चमकती दुकानें सौदागरों ने जमा ली हैं
जो प्रेम के अलग-अलग पैकेज पेश करते हैं
इन गलियों में इत्र सूंघते, बाल संवारते, शीशों में अपना चुपड़ा हुआ चेहरा देखते
और प्रेम के नाम पर तरह-तरह की अश्लील कल्पनाओं से भरे शोहदे जब पाते हैं कि
उनकी बहनें भी सहमी-सकुचाई, दुकानों के कानफाड़ू शोर से बचती हुई
आंखें नीची किए, किन्हीं लड़कों के साथ गुज़र रही हैं
तो उनके भीतर का भाई और मर्द जाग जाता है- अपनी कुंठित कल्पनाओं के प्रतिशोध में
वै वैसी ही कुंठित नैतिकता की शरण में चले जाते हैं,
उनके हाथों में लाठियां, साइकिल की चेन, बेल्ट, बंदूकें कुछ भी हो सकती हैं
और वे घर की आबरू बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
ज़्यादा वक़्त नहीं लगता- अगले दिन प्रेम किसी पेड़ से लटका मिलता है,
किसी तालाब में डूबा मिलता है,
किसी सड़क पर क्षत-विक्षत पड़ा मिलता है।
घर की दीवारें राहत की सांस लेती हैं-
ग़मगीन पिता क्रुद्ध-उदास भाइयों की पीठ थपथपाते हैं
कलपती हुई मां मन ही मन करमजली को कोसती है
बस अकेली छोटी बहन अपने कातर प्रतिरोध के बीच सहमी हुई
छटपटाती हुई तय करती है- बचाए रखेगी वह अपना प्रेम
किसी को पता नहीं लगने देगी और एक दिन निकल जाएगी चुपचाप,
शीश देने को तैयार उद्धत प्रेम बचा ही रहता है।

तीन

लड़कियां तरह-तरह से बचाए रखती हैं अपना प्रेम।
चिड़ियों के पंखों में बांध कर उसे उड़ा देती हैं
नदियों में किसी दीये के साथ सिरा देती हैं
किताबों में किसी और की लिखी हुई पंक्तियों के नीचे
एक लकीर खींच कर आश्वस्त हो जाती हैं
किसी को नहीं पता चलेगा, यह उनके प्रेम की लकीर है
सिनेमाघरों के अंधेरे में किन्हीं और दृश्यों के बीच
अपने नायक को बिठा लेती हैं,
हल्के से मुस्कुरा लेती हैं
कभी-कभी रोती भी हैं
कभी-कभी डरती हैं और उसे हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाने की कसम खाती हैं
लेकिन अगली ही सुबह फिर एक डोर बांध लेती हैं उसके साथ।
अपनी बहुत छोटी, तंग और बंद दुनिया के भीतर भी वे एक सूराख खोज लेती हैं
एक आसमान पहचान लेती हैं, कल्पनाओं में सीख लेती हैं उड़ना
और एक दिन निकल जाती हैं
कि हासिल करेंगी वह दुनिया जो उनकी अपनी है
जो उन्होंने अपनी कल्पनाओं में सिरजी है
बाकी लोग समझते रहें कि यह प्रेम है
उनके लिए यह तो बस अपने को पाना है- सारे जोखिमों के बीच और बावजूद।


Monday, September 1, 2014

इतिहास की सही समझ के सिद्धांतकार

आज प्रसिद्ध इतिहासकार बिपिन चन्द्रा को श्रद्धांजलि देते हुए प्रोफ़ेसर राजीव लोचन ने 'दैनिक हिन्दुस्तान' में बहुत अच्छा लेख लिखा है. जिन्होंने न पढ़ा हो उनके लिए- मॉडरेटर 
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पिछले 50 साल में शायद ही इतिहास का कोई ऐसा छात्र होगा, जिसने बिपिन चंद्रा द्वारा लिखी हुई किताबें न पढ़ी हों। बिपिन चंद्रा के लिए किताबें लिखना महज बौद्धिक शगल नहीं था, वह अपने लेखन से समाज को बदलने का काम भी कर रहे थे। एक शिक्षक, वह भी कम्युनिस्ट विचारधारा वाले, बिपिन चंद्रा छात्रों को देश में फैली समस्याओं से जूझने की एक समझ देते थे। स्थिति यह थी कि उनके लेक्चर सुनने के लिए दूसरे विभागों तक के छात्र आ जाते थे। कुछ  उनकी आज्ञा लेकर वहां बैठते, तो बाकी बस चुपके से इतिहास के छात्रों में घुल-मिलकर बैठ जाते थे। उनकी कक्षाओं में एक अनौपचारिक-सा माहौल रहता। भारत में राष्ट्रवाद किस तरह पला-बढ़ा, वह इसके बारे में बताना शुरू करते और पता नहीं कहां से देश के वर्तमान की समस्याओं पर चर्चा शुरू हो जाती। हर चीज की समझ के लिए, प्रोफेसर साहब के अनुसार, बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के विस्तार और उसकी समस्याओं को समझना जरूरी था। इससे छात्रों में इतिहास की समझ भी बढ़ती, और देश के मौजूदा हालात की भी।

बिपिन चंद्रा खुद द्वितीय विश्व-युद्ध के समय के छात्र थे। यह वह पीढ़ी थी, जिसने भारतीय कम्युनिस्टों को बरतानिया सरकार से हाथ मिलाते देखा था। जिसने देश का विभाजन देखा था। और यह भी देखा था कि किस तरह लोग हालात के शिकार बन जाते हैं। उनके लिए इस तरह कि दुविधाओं से बचने का एक ही रास्ता था कि लोग इतिहास की बेहतर समझ रख सकें। वह खुद बताते थे कि किस तरह कम्युनिस्ट नेता पीसी जोशी के कहने पर उन्होंने गांधी के चंपारण सत्याग्रह के बारे में जानकारी हासिल की। बिपिन चंद्रा ने जाना कि यदि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समझना है, यह समझना है कि लोग किस तरह से इस संग्राम के साथ जुड़े, तो गांधी को समझना जरूरी है। गांधी चंपारण के किसानों की समस्याओं को लेकर किस तरह सरकार से जूङो, यह समझना जरूरी है। आगे जाकर देश के इतिहास ज्ञान में उनका एक बड़ा योगदान शायद इस अनुभव से ही निकला। उन्होंने भारतीय इतिहास को फॉल्स कॉन्शसनेसयानी मिथक चेतना का सिद्धांत दिया। यह सिद्धांत कहता है कि लोगों की ऐतिहासिक समझ गलत होगी, तो उनकी वर्तमान के बारे में भी समझ गलत ही होगी। बिपिन चंद्रा का अधिकांश लेखन सही समझ प्रेषित करने में लगा रहा, ताकि लोग गलत समझ से बच सकें।

इस सिलसिले में एनसीईआरटी की स्कूली पाठ्य-पुस्तकों के जरिये बिपिन चंद्रा ने सीधे सरल तरीके से यह समझाने का प्रयास किया कि जब लोग राष्ट्रवाद की मुख्यधारा को छोड़कर संप्रदायवाद की तरफ बढ़ते थे, तो वे किस तरह ऐतिहासिक गलतफहमियों का शिकार हो जाते थे। इन गलतफहमियों को फैलाने में सांप्रदायिक राजनेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। बिपिन चंद्रा मानते थे कि ऐसे हालात में यह इतिहासकार का जिम्मा है कि वह लोगों को यह समझा सके कि उनकी समस्याओं की जड़ देश की औपनिवेशिक गुलामी थी और समस्याओं का समाधान देश को मजबूत बनाने में है। 1973 में लिखी गई उनकी यह किताब आज भी लोग पढ़ रहे हैं। यह जरूर है कि सांप्रदायिक राजनीति करने वाले आज भी इन किताबों की आलोचना करते हैं, पर पढ़े-लिखे लोगों के लिए आज भी यह सबसे जरूरी पढ़ने लायक किताबों की सूची में शामिल है।

इन किताबों के जरिये वह लोगों तक सुदृढ़ भारत की एक ऐसी तस्वीर पेश करना कहते थे, जो लोकतांत्रिक हो, जो सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर टिका हो, जहां रूढ़िवादिता के लिए कोई स्थान न हो और जो भारतीय संस्कृति की नैसर्गिक धारा से जुड़ा हो। स्वतंत्र भारत को सांप्रदायिकता के जहर से बचाने के लिए बिपिन चंद्रा को इतिहास की सही समझ ही एकमात्र साधन जान पड़ती थी। इसलिए वह अपनी पूरी जिंदगी, जो भी लिखते रहे, जो भी कहते रहे, हर जगह लोगों को सही समझ बनाने के लिए प्रेरित करते रहे। उनके छात्रों में न केवल वे थे, जो उनके लेक्चर सुनते, बल्कि वे भी थे, जो उनके विचारों से प्रेरित होकर उनकी किताबें पढ़ते थे। पढ़ाई का सिलसिला क्लास रूम में ही खत्म नहीं होता था। अपने छात्रों को वह कहते कि केवल पुस्तकालय में बैठकर इतिहास लेखन न करो। जहां मौका मिलता, आगे बढ़कर छात्रों को बाहर भेजने की कोशिश करते।

जाओ, फील्ड ट्रिप करो, लोगों से मिलो, उनकी बातें सुनो, समझो कि उनके अनुभव क्या थे।कई छात्रों को उनके साथ फील्ड ट्रिप पर जाने का मौका मिला। बिपिन चंद्रा बीसवीं सदी के इतिहास की प्रमुख हस्तियों का इंटरव्यू करते, जहां जाते अपने विद्यार्थियों को भी ले जाते, खुद सारा काम करते और नौजवानों से कहते: देखो, ऐसे काम किया जाता है। मजाल है कि कभी उन्होंने किसी विद्यार्थी से अपना कोई काम करने को कहा हो। कहां तो देश की पुरानी परंपरा थी कि विद्यार्थी गुरुजी की सेवा करता फिरता, कहां बिपिन चंद्रा थे कि अपने छात्रों की सेवा करते। इनमें से अनेक खुद आगे बढ़कर देश में बड़े काम कर रहे हैं।

मृदुला मुखर्जी, माजिद सिद्दीकी, भगवान जोश, आदित्य मुखर्जी, सलिल मिश्र, विशालाक्षी मेनन वगैरह उनके अनेक छात्र आज देश के जाने-माने इतिहासकार हैं। हफ्ते में एक दिन बिपिन चंद्रा के घर सभी छात्र इकट्ठा होते और रिसर्च के बारे में चर्चा होती। कोई दो दशकों तक, जब तक बिपिन साहब जेएनयू परिसर में रहे, तो चर्चा का यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहा। छह दशक के अपने सार्वजनिक जीवन में बिपिन चंद्रा ने इतिहास लेखन के अलावा लोगों तक बेहतर साहित्य पहुंचाने में बड़ा योगदान दिया। अनेक भारतीय प्रकाशकों को उन्होंने इतिहास की बेहतरीन किताबें छापने के लिए प्रेरित किया। नेशनल बुक ट्रस्ट की अगुआई की। इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में आगे बढ़कर हिस्सा लिया। पर उनका सबसे बड़ा योगदान तो समर्थ नागरिक बनाने में रहा।

बिपिन चंद्रा एक महान राष्ट्रवादी तो थे ही, भारतीय साम्यवाद में सन 1964 में हुए दो फाड़ से वह नाखुश थे। 1979 में उन्होंने आग्रह किया था कि भारत में साम्यवाद की दोनों धाराएं जुड़ जाएं, तो सभी के लिए अच्छा रहेगा। पर ऐसा हुआ नहीं। साल 2009 में भी उन्होंने यह आग्रह दोहराया। देश को संप्रदायवादी और उपनिवेशवादी शक्तियों से बचने के लिए जो सही समझ चाहिए, उनके अनुसार, यह केवल एक साम्यवादी समझ ही हो सकती थी। आज जब देश पुन: सांप्रदायिकता में उभार देख रहा है, तो लगता है कि बिपिन चंद्रा का बताया रास्ता ही शायद ठीक था।

Sunday, August 31, 2014

बादल रोता है बिजली शरमा रही

जब सीतामढ़ी में था तो नवगीत दशक-1 को साहित्य की बहुत बड़ी पुस्तक मानता था. एक तो इस कारण से कि हमारे शहर के कवि/गीतकार रामचंद्र 'चंद्रभूषण' के गीत उसमें शामिल थे, दूसरे देवेन्द्र कुमार के गीतों के कारण. नवगीत के प्रतिनिधि संकलन 'पांच जोड़ बांसुरी' में उनका मशहूर गीत 'एक पेड़ चांदनी लगाया है आंगने...' पढ़ा था. आज 'हिंदी समय' पर देवेन्द्र कुमार बंगाली नाम से उनके गीत पढ़े तो वह दौर याद आ गया, और वह बिछड़ा दोस्त श्रीप्रकाश, जो मेरे पढने के लिए डाक से ये किताबें मंगवाता था. आप भी पढ़िए- जानकी पुल. 
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1.
एक पेड़ चाँदनी

एक पेड़ चाँदनी
लगाया है
      आँगने,
फूले तो
आ जाना एक फूल
माँगने।

ढिबरी की लौ
जैसे लीक चली आ रही
बादल रोता है
बिजली शरमा रही
      मेरा घर
छाया है
तेरे सुहाग ने।

तन कातिक, मन अगहन
बार-बार हो रहा
मुझमें तेरा कुआर
जैसे कुछ बो रहा
रहने दो,
यह हिसाब
कर लेना बाद में।

नदी, झील, सागर के
रिश्‍ते मत जोड़ना
लहरों को आता है
यहाँ-वहाँ छोड़ना
      मुझको
पहुँचाया है
तुम तक अनुराग ने।

एक पेड़ चाँदनी
लगाया है
      आँगने।
फूले तो
आ जाना एक फूल
माँगने।

2.
मेघ आए, निकट कानों के

मेघ आए, निकट कानों के
फूल काले खिले धानों के

दूब की छिकुनी सरीखे
हवा का चलना
दूर तक बीते क्षणों में
घूमना-फिरना
सिलसिले ऊँचे मकानों के।

रंग की चर्चा तितलियों में
मेह भीगी शाम
       बिल्‍ली-सी
नदी की पहुँच गलियों में
खिड़कियों का इस तरह गिरना
गीत ज्‍यों उठते पियानों के।

मेघ आए निकट कानों के
फूल काले खिले धानों के।

3.
हमको भी आता है
पर्वत के सीने से झरता है
              झरना...
हमको भी आता है
भीड़ से गुजरना।

कुछ पत्‍थर
कुछ रोड़े
कुद हंसों के जोड़े
नींदों के घाट लगे
कब दरियाई घोड़े
       मैना की पाँखें हैं
       बच्‍चों की आँखें हैं
       प्‍यार है नींद, मगर शर्त
              है, उबरना।

गूँगी है
बहरी है
काठ की गिलहरी है
आड़ में मदरसे हैं
सामने कचहरी है
बँधे खुले अंगों से
भर पाया रंगों से
डालों के सेव हैं, सँभाल के
कुतरना।

4.
मन न हुए मन से
मन न हुए मन से
हर क्षण कटते रहे किसी छन से।

तुमसे-उनसे
मेरी निस्बत
क्या-क्या बात हुई।
अगर नहीं, तो
फिर यह ऐसा क्यों?
दिन की गरमी
रातों की ठंडक
चायों की तासीर
समाप्त हुई
एक रोज पूछा निज दर्पन से।

मन न हुए मन से
हर क्षण कटते रहे किसी छन से।

5.
सोच रहा हूँ
सोच रहा हूँ
लगता है जैसे साये में अपना ही
गला दबोच रहा हूँ।

एक नदी
उठते सवाल-सी
कंधों पर
है झुकी डाल-सी
अपने ही नाखूनों से अपनी ही
देह खरोंच रहा हूँ।

दूर दरख्तों का
छा जाना
अपने में कुआँ
हो जाना
मुँह पर घिरे अँधेरे को
बंदर-हाथों से नोच रहा हूँ।

6.
हम ठहरे गाँव के

हम ठहरे गाँव के
बोझ हुए रिश्‍ते सब
कंधों के, पाँव के।
भेद-भाव सन्‍नाटा
ये साही का काँटा
सीने के घाव हुए
सिलसिले अभाव के!

सुनती हो तुम रूबी
एक नाव फिर डूबी
ढूँढ़ लिए नदियों ने
रास्‍ते बचाव के।

सीना, गोड़ी, टाँगें
माँगें तो क्‍या माँगें
बकरी के मोल बिके
बच्‍चे उमराव के।