Saturday, July 4, 2015

मंजरी श्रीवास्तव की नई कविताएं

मंजरी श्रीवास्तव मूलतः कवयित्री हैं. लेकिन कई मोर्चों पर एक साथ सक्रिय रहने के कारण उसका कवि रूप इधर कुछ छिप सा गया था. उसकी नई कविताएं पढ़ते हुए ताजगी का अहसास हुआ. खासकर इसलिए भी क्योंकि ये कविताएं मेरे प्रिय लेखकों में एक निर्मल वर्मा के लेखन, उसके जादू को लेकर है- प्रभात रंजन 


निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए


१.

कभी घोड़े की आँखों में झांककर देखो
एक ठहरी हुई उदासी होती है वहां
आजकल मैं घोड़े की आँखों जैसी होती जा रही हूँ
जो आदमियों की दुनिया में सबसे ज़्यादा उदास रहते हैं
दरअसल वे अपनी सबसे आत्मीय चीज़ से अलग होने के बावजूद भी उस  अलगाव के आदी नहीं हो पाते

मैं भी नहीं हो पाई हूँ उस अलगाव की आदी
तुमसे अलग होने के बावजूद
अब भी मेरे लैपटॉप की स्क्रीन रोशन होते ही जगमगाता है तुम्हारा नाम
मेरी ज़िन्दगी से लेकर कंप्यूटर और ई-मेल के तमाम पासवर्ड तुमसे शुरू होकर तुम पर ही ख़त्म होते हैं

किसी चीज़ का आदी न हो पाना
इससे बड़ा कोई और दुर्भाग्य है क्या ...?

अभी घोड़े की आँखों की उदासी मेरी आँखों में आकर ठहर गई है
लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव तक भी गर न हो पाई मैं इस अलगाव की आदी
तो आख़िर तक ढूँढती रह जाऊंगी धूप का एक आख़िरी मद्धिम टुकड़ा

दरअसल दुनिया ऐसा नहीं सोचती...
यह मेरे ही भीतर का खटका है.

बात यह है कि
अब भी तुम्हारे प्यार का चमगादड़ मेरे अंधेरों में मेरे चारों ओर फड़फड़ाता रहता है
कानों  से  सिर्फ़ एक गर्म, सनसनाती फड़फड़ाहट टकराती रहती है हरपल
मेरी देह और मेरी आत्मा एक खंडहर बन गई है
और इसकी दीवारों पर मैं अब भी तलाश रही हूँ तुम्हारा नाम
जो कभी प्यार के उन दिनों में तुमने अपने होंठों से लिखा था.

लेकिन अब कहाँ है वहां मेरा नाम...
कहीं नहीं शायद
वहां उभर आए हैं समय के साथ कुछ और निशान
जो आज से पहले मुझे कभी नज़र नहीं आए
जिनका दूर-दूर तक मुझसे कोई वास्ता नहीं.

तुम्हारे प्यार के चमगादड़ के साथ
ये निशान मंडराते हैं मेरे चारों ओर अब
और तुम्हारी मुर्दा देह लिए अपने साथ फिरती हूँ मैं हरपल
अब भी मेरे जिस्म पर रेंगते हैं तुम्हारे मुर्दा हाथ
जबकि हमारे बीच आये खालीपन में किसी भी चीज़ के लिए कोई जगह नहीं
वह  हमेशा ख़ाली रहेगा अब

लेकिन...देखो न ...
इस खालीपन ने मुझे अचानक कितना बड़ा बना दिया है. 

२.

आजकल रोज़ रात को अपने छत पर लेटकर
नीली मखमली डिबिया-सा खुला, ढेर सारे तारों भरा आकाश देखती हूँ
और मर जाने की ख्वाहिश होती है
पर दिन इतना गर्म, सफ़ेद, धुला और साफ़ होता है कि मरने की इच्छा ही नहीं होती.
फिर नज़र जाती है घास के बीच खिले बहुत नन्हे-नन्हे फूलों पर
जिन्हें शायद जीसस ने ‘लिलीज़ ऑफ़ द फ़ील्ड’ कहा था
(ऐसे फूल जो आनेवाले दिनों के बारे में नहीं सोचते और गुज़री हुई गर्मियों की याद दिलाते हैं)
सोचती हूँ ऐसी ही कोई ‘लिली’ बन जाऊं
आनेवाले दिनों से बेफ़िक्र और बेपरवाह
फिर अचानक तुम्हारी यादों की अनगिन तहें खुलती जाती हैं...
आकाश फिर से उतना ही नीला दिखाई देने लगता है जितनी तुम्हारी आँखें
और नीचे घास-सी बिछी मैं निहारती रहती हूँ अपलक तुम्हारा नीलापन
फिर एक सफ़ेद बादल का टुकड़ा मुझे और तुम्हें अपने अँधेरे की ज़द में ले लेता है.
हम एक साथ चीख पड़ते हैं मारे भय के
और हमारे शब्द का आख़िरी हिस्सा लाल डोर में बंधे गुब्बारे की तरह नज़र आता है दूsssर तक जाता हुआ...
गुब्बारे की लाल डोर खींचकर कभी बांधे थे तुमने मेरे अधगीले खुले-खुले भूरे बाल
डोर खुलकर न जाने कहाँ खो गई है और बाल फिर से बिखर गए हैं...
पर अब वे धूसर और मटमैले हो गए हैं...
शायद...बहुत थक गए हैं...

अब तुम्हें याद करते वक़्त मेरे होंठों पर आती है पीली धूल-सी हंसी
जो शाम की ढलती आख़िरी धूप की तरह हर चीज़ पर बैठ जाती है.
एक उदास-सी हंसी जो एक ख़ाली जगह से उठकर दूसरी ख़ाली जगह पर जाकर ख़त्म हो जाती है और बीच की जगह को भी ख़ाली छोड़ जाती है.
मैली धूप का यह टुकड़ा मेरी हंसी के साथ मेरे पूरे वजूद में पैवस्त हो जाता है और रात हो जाने के बाद भी मुझमें रेंगता रहता है.
अँधेरे में भी एक पीला...ज़र्द...अवसन्न-सा आलोक फैला रहता है प्रभामंडल की तरह मेरे इर्द-गिर्द
अब कोई प्रश्न नहीं तुमसे, न ही कोई शिकायत है.
सारी शिकायतों और प्रश्नों की मैंने एक पुड़िया बनाई है और उन्हें किसी अँधेरे गड्ढे में फेंक आई हूँ.

अब वक़्त ने करवट ली है
नीचे रात है, ऊपर दिन
अब मैं नीला आकाश हो गई हूँ असंख्य तारों भरा
और तुम हरे घास से भरा पार्क बनकर नीचे लेटे हो
तुम ज़मीन हो मेरी
जहाँ बड़ी ही मजबूती से जमा रखे हैं मैंने अपने पैर
तुम्हारा अपना एक सुरक्षित अँधेरा है जो किसी भी बड़े पंछी के पंखों की भयावह छाया पर भारी है.
तुमपर पड़ने के बाद यह छाया बस एक बादल-सी दिखाई देती है जो हवा में इधर-उधर मंडराती रहती है.
तुमसे फूटनेवाले फव्वारे मुझे घुटनों तक भिगोते रहते हैं अब भी
तुम अब भी कबूतरों-सी फड़फड़ाती मेरी मांसल धडकनों को दबोच लेते हो.
अब भी हमारे बीच फड़फड़ाती है कबूतरों की छाया

पतझड़ और बर्फ़ के दिन आए और गए लेकिन अब हम नहीं बच पायेंगे एक-दूसरे से
गर्मियां चल रही हैं और हमारा झूठ पिघलने लगा है.
शाम के पीले चिपचिपे धुंधलके में बहने लगी हैं हमारी आँखें
और हम एक-दूसरे के गाल सहलाने लगे हैं...जैसे...
जैसे बारिश के बाद घास की धुली-धुली-सी नर्म-गर्म पत्तियाँ.

इन झूठी गर्मियों के दिन ख़त्म हो जायेंगे जल्द ही
और सारे शहर पर पीली धुंध की परत-दर-परत जम जाएगी
फिर कुछ नज़र नहीं आएगा
सपने भी भयानक हो जायेंगे
जैसे कि आप खुद मर चुके हों...कब्र में लेटे हों...
और कब्र के बाहर से बारिश की टिप-टिप सुन रहे हों
कब्र से उठकर बाहर आने के बाद भी
वही टिप-टिप, वही बारिश होगी
लेकिन इन सबसे घबराना मत
एक न एक दिन आकाश नज़र आएगा
बेशक़ पूरा न सही...एक नीली डूबी फांक-सा ही सही
पेड़ों पर चमकेगी वही बारिश
जिसकी टिप-टिप कब्र में से सुनाई पड़ती थी
फिर आनेवाली सर्दियों की अफ़वाह से सिकुड़ने लगेंगे वे
धीरे-धीरे शाम का पीला, पतझड़ी आलोक मंद पड़ने लगेगा
लेकिन तब भी चमकेगी शाम की आख़िरी धूप
और हमें ले जाएगी किसी प्रागैतिहासिक युग में
जहाँ,
हमारे भीतर जो कुछ भी होगा, वहीँ ठहर जाएगा
और बाहरी दुनिया चलती हुई नज़र आएगी.

तुम्हारे ऊपर उठे हुए होंठ और भीगी आँखें
हवा में उड़ते परिंदों को निहारती हुई
ठहर जाएंगी निविड़ शून्य में
फिर रात होगी
धीरे-धीरे पेड़ों पर तारे थिरकेंगे हर रात की तरह
पर वह अद्भुत रात होगी
जब तारे भी बारिश से धुले-धुले
साफ़ और और ज़्यादा चमकीले नज़र आयेंगे
सहसा हवा उठेगी
तुम्हारे प्यार से असीम आग्रह में लिपटी
एक हल्का-सा झोंका मुझे फिर से छू जाएगा
और शायद एक बार फिर तुम सरसराने लगोगे मेरे पूरे वजूद में.         
                   
           



Friday, July 3, 2015

अमीर खुसरो पर नाटक लिखने की तैयारी में हूँ- उषाकिरण खान


वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान हिंदी, मैथिली साहित्य की जानी पहचानी लेखिका हैं. उनके नए उपन्यास अगनहिंडोला के बहाने पेश है सुशील कुमार भारद्वाज से हुई उनकी कुछ बातें:-
---------------------------------------------------------------------------------------

आपका नया उपन्यास अगनहिंडोला आया है? अगनहिंडोला का क्या मतलब है?

अगनहिंडोला ब्रजभाषा का एक शब्द है| जो दो शब्दों से बना है- अगन और हिंडोला |जिसमे अगन का अर्थ है आग”, जबकि हिंडोला का मतलब है झूला”| यानी आग का झूला| दरअसल, अगनहिंडोला शेरशाह सूरी के जीवन पर आधारित उपन्यास है| और सभी जानते हैं कि शेरशाह सूरी युद्ध में मरे नहीं थे, बल्कि आग में जले थे| मतलब आग के झूले में चढ कर चले गये|

अगनहिंडोलाको आपने उपन्यास के शीर्षक के रूप में क्यों पसंद किया?

मैं शीर्षक के रूप में देशी शब्द को रखना पसंद करती हूँ| और अगनहिंडोला मुझे सही लगाइसीलिए शेरशाह सूरी को ध्यान में रखकर, इसका नाम अगनहिंडोला रखा| ठीक वैसे ही जैसे विद्यापति पर लिखे उपन्यास के लिए सिरजनहार|

शेरशाह सूरी के जीवन पर लिखने की कोई खास वजह?

शेरशाह सूरी पर लिखने की लालसा लगभग पन्द्रह वर्षों से थी| मैं उनके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित थी| वे बिहार के थे| बहुत बड़े विद्वान थे| उन्होंने हिंदी में पहला फरमान जारी किया था| घोड़ों का व्यापर करने वाले साधारण से परिवार में जन्म लेकर, इस ऊँचाई तक पहुंचना, कोई साधारण बात तो नही है| फिर शेरशाह के ही कार्यों को आगे बढाकर अकबर महान बन गया| ऐसी ही बहुत सी बातें थीं जो मेरे मन को छू रही थी| सिरजनहार लिखने के साथ ही मैंने सोच लिया था कि शेरशाह पर लिखकर ही अपने ऐतिहासिक उपन्यास लेखन का अंत करुँगी|

शेरशाह सूरी के जीवन पर लिखे कुछ उपन्यास के नाम स्मृति में है?

मुझे शेरशाह सूरी पर लिखी सुधाकर अदीब की उपन्यास –“शान–एतारीकयाद है| लेकिन मेरे और उनके उपन्यास में एक बहुत बड़ा फर्क है कि उनके लेखन में इतिहास अधिक है जबकि मेरे लेखन में सामाजिकता| इसी चर्चा के सम्बन्ध में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एक प्रोफेसर का फोन आया था| जिसमें उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक दृष्टि से कहीं भी चूक नहीं हुई है, लेकिन संवाद पर थोडा भ्रम है| तो मैंने उन्हें कहा – “चतुर्वेदी जी आप उपन्यास पढ़ रहे हैं| ये तो किसी किताब में नहीं लिखा है कि कौन से शहंशाह अपनी किस बेगम से क्या बात करते थे? ये तो हम उपन्यासकार रोचकता को ध्यान में रखते हुए संवाद को लिखते हैं| यह पूरी तरीके से इतिहास बन जाये तो इसे पढ़ेगा कौन?”........ संभव है सूरी के जीवन पर किसी और भाषा में कोई और उपन्यास हो, लेकिन उसकी जानकारी अभी मेरे पास नहीं है|

इस ऐतिहासिक उपन्यास लिखने का अनुभव कैसा रहा?

समाज में रहते हुए अलग अलग विचार के लोगों से मेलजोल होता है| बहुत सी बातों को जानने का मौका मिलता है| आसपास के माहौल से प्राप्त अनुभव से सामाजिक विषयों पर आसानी से लिखती हूँ| ... फिर भी इतिहास से सम्बन्ध होने की वजह से प्रमाणिकता पर ध्यान देती हूँ| लेकिन ऐतिहासिक विषयों पर लेखन से पूर्व काफी तैयारी करनी पड़ती है| प्रमाणिकता के दृष्टिकोण से बहुत सारी चीजों को ध्यान में रखना पड़ता है| कोशिश होती है कि हर संभव उपलब्ध ग्रन्थ, शोध, नाटक, कहानी, लेख आदि सम्बंधित चीजों का गहन अध्ययन कर जाऊँ| मौलिक किताबों की खोज करती हूँ| उसमें भी शेरशाह सूरी मेरे काल के विषय ठीक वैसे हीं नहीं थे, जैसे विद्यापति| लेकिन शेरशाह के बारें में कुछ छूटे नहीं, इसके लिए गुलबदन बेगम आदि तक की रचनाओं को पढ़ी| उसके अनुसार समय और सन्दर्भ को ठीक से समायोजित कर अपने साहित्यिक शैली में प्रस्तुत की जो कि बहुत ही श्रमसाध्य कार्य था|`

इस तरह के ऐतिहासिक विषयों पर लिखे उपन्यासों के पाठकों के बारें में आप क्या सोचते हैं?

इतिहास को पढ़ने वाले लोग कुछ खास होते हैं| जबकि सामाजिक विषय पर लिखे उपन्यासों के पाठकों का वर्ग बड़ा है| कोई यह जान ले कि यह किताब विद्यापति या शेरशाह सूरी पर है तो कोई नहीं पढ़ेगा, जबतक कि उसे उनके बारे में जानने की लालसा न हो| लेकिन यदि उसे सामाजिकता के चाशनी में एक अच्छी शैली में प्रस्तुत किया जाय तो कोई भी इसे पढ़ सकता है| जैसे कि कुछ लोगों ने अगनहिंडोला को बेमन से उठाया लेकिन एक ही बैठकी में पढकर संतुष्ट भाव से उठे|

यूँ तो आप काफी छोटी उम्र से कविता का लेखन और पाठ करती रही हैं, लेकिन 1977 से आपने गद्य लेखन शुरू किया| तो 1977 से 2015 तक के सफर को आप किस रूप में देखती हैं?

हाँ| ....... 1977 से 2015 तक का सफर एक लंबा साहित्यिक सफर रहा| उसके पहले कविता लिखती और पढ़ती थी| जो कि अब, सब इधरउधर हो गया है| इसलिए अब उसका कोई खास मतलब नहीं रह गया है| कहानी, उपन्यास, नाटक, आदि विभिन्न विधाओं में लिखते हुए थोडा संतुष्ट तो हूँ|..... लेकिन कभी कभी लगता है मैं न तो पूर्ण रूप से लेखिका हूँ, न ही समाज-सेविका और न ही गृहिणी .......| इच्छा है कि किसी चीज में पूर्णता हासिल करूँ ......|मेरे साथ के लेखक लेखिकाओं ने कितना अधिक लिखा है? मेरी भी कोशिश होगी कि अंत अंत तक अधिक से अधिक सार्थक रचना दे सकूँ|

बाबा नागार्जुन का साथ आपको काफी मिला| उन्होंने आपके साहित्यिक जीवन और विचार पर कितना प्रभाव डाला?

बाबा नागार्जुन का प्रभाव हमारे विचारों पर नहीं पड़ावे तो कम्युनिस्ट विचारधारा के थे| लेकिन उनका प्रभाव मुझ पर बहुत अधिक पड़ा| वे मुझे कविता लिखने के लिए प्रेरित करते थे| साथ में कविता पाठ करने के लिए ले जाते थे| कभी कभी किसी विवशता में इस तरह के आयोजनों में जाने से कतराती थी तो अक्सर वे प्रोत्साहित करते हुए कहते थे- अधिक से अधिक लोगों से मिलो| उनके जीवन शैली को करीब से देखो| बहुत कुछ सीखने को मिलेगा|” मेरे घर पर रहते हुए एक घरेलू सदस्य की तरह हमेशा मार्गदर्शन करते रहे|..... बाद के दिनों में जब पढाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझते चली गयी तो सब छूटने लगा| एक दिन बाबा ने कहा- काफी दिनों से कुछ लिखी नहीं हो, कुछ कुछ लिखते रहना चाहिए|” तब मैंने अपनी रूचि कहानी लिखने में बतायी| तब बाबा ने कहा – “कहानी के साथ-साथ उपन्यास भी लिखो| साथ ही उन्होंने सलाह दी कि गद्य लेखन से पहले अज्ञेय को पढ़ना चाहिए| भाषा कि रवानी अज्ञेय में है|” और अज्ञेय जी हँसते हुए कहते थे बाबा से बढ़कर कौन हैखैर, बाबा से मुझे हमेशा मार्गदर्शन मिलता रहा|

बाबा के अलावा और किन साहित्यकारों ने आपको प्रभावित किया?

हमारे यहाँ तो साहित्यकारों का आना जाना काफी अरसे से रहा है| इसलिए बाबा के अलावा कई लोग प्रेरणा के रूप में सामने आये| .... लेकिन धर्मवीर भारती जी ने काफी प्रभावित किया| परंतु उनसे कभी मेरी मुलाकात नहीं हुई|.... होगी भी क्यों? ....कहीं बाहर जाने का मौका ही नही मिला|... खासकर उनकी गुलकी बन्नोमुझे काफी पसंद आयी| गद्य लेखन की ओर तभी से मुड़ने की इच्छा हुई| वैसे तो प्रेरणा के रूप में क्या नही है? कालिदास कम हैं क्या?

विद्यार्थी जीवन में कविता करने वाली छोटी सी बच्ची और पद्मश्री उषाकिरण खान में क्या अंतर है?

जब पद्मश्री मिला तो सोचने लगी कि मैंने क्या किया है?. जो यह मुझे मिला है| लेकिन जब स्कूल में थी| या आईएससी में पढते हुए बाबा के साथ कविता पाठ करने जाती थी, तो अजीब खुशी मिलती थी| लगता था कि कुछ खुद से लिखकर पढ़ी| कुछ खास काम किया| अज्ञेय जी, नामवर जी, काशीनाथ जी और धूमिल जी आदि के बीच मंच से कुछ भी प्रस्तुत करने पर लगता था कि बहुत कुछ हासिल हुआ| .... समय के साथ ज्यों ज्यों ये लोग जितने प्रसिद्ध होते गए, उनके कहे शब्द हमारे अंदर उतने ही ऊर्जा भरते चले गए| लेकिन अब उस तरह का उल्लास उमंग मन में नहीं भर पाता है|

आलोचना के बीच अपने साहित्यिक जीवन को कैसे बढाती हैं?

जीवन का इतना लंबा अनुभव हो गया है कि अब आलोचनाओं से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता है| ... और भी बहुत सारी बातें हैं जिंदगी में| ...अधिकांश समय स्वयं को इससे दूर कर लेती हूँ| और साहित्य का कार्य तो मैं निर्विघ्न हो करती रहती हूँ|

इन दिनों नया क्या चल रहा है?


इन दिनों अमीर खुसरो पर एक नाटक लिखने की तैयारी में हूँ| मौका मिलते ही पूरा कर दूँगी|