Thursday, July 30, 2015

शीन काफ़ निज़ाम की चुनिन्दा नज़्में

शीन काफ निज़ाम की गज़लों के हम सब पुराने शैदाई रहे हैं लेकिन हम हिंदी वाले उनकी नज्में किसी मुकम्मल किताब में नहीं पढ़ पाए थे. खुशखबरी है कि वाणी प्रकाशन से उनकी नज्मों का संकलन आया है 'और भी है नाम रस्ते का'. उसी संकलन से उनकी कुछ चुनिन्दा नज्में- मॉडरेटर 
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1.

चाँद-सा प्यार

जाने, कितने लम्हे बीते—
जाने, कितने साल हुए हैं—
तुम से बिछड़े!

जाने कितने—
समझौतों के दाग लगे हैं
रूह पे मेरी!

जाने क्या क्या सोचा मैंने
खोया, पाया,
खोया मैंने
ज़ख्मों के जंगल पर लेकिन
आज—
अभी तक हरियाली है.

तुम ने
ठीक कहा था.
उस दिन—
‘प्यार चाँद-सा होता है
और नहीं बढ़ने पाता तो
धीरे-धीरे
खुद ही घटने लग जाता है!’


2.
तुम्हें देखे जमाने हो गए हैं

भरी है धूप ही धूप
आँखों में
लगता है
सभी कुछ उजला-उजला
तुम्हें देखे जमाने हो गए हैं

3.
अहसास होने का

पानी से पतला
कुछ नहीं होता
हवा से ज्यादा... शफ्फाक
आग से बढ़कर नहीं कुछ गर्म
ख़ाक है खुशबू का मम्बा1
कहने वालों को कहाँ अहसास
होने का तुम्हारे....
1.              1.   स्रोत

4.
मैं अंदर हूँ

गंध से जाना...
बरसी है पेड़ों पर
रात

हवा ने भर दी है
रोम-रोम में
नींद

सोचा
कर दूँ बंद
किवाड़
मैं अंदर हूँ

मैं ही तो अंदर हूँ
खुले रहें किवाड़
आ जाए अंदर रात
क्या ले जाएगी
मैं जो अंदर हूँ!

5.
मौसम बदलने में देर ही लगती है कितनी

पीले हो गए पहाड़
आती नहीं
आवाज
कहीं से भी

झरने की
सुस्ताते सन्नाटों में
आते हैं,
कभी कभार
इक्का-दुक्का
परिंदे
जगाने उंघती यादें
मौसम बदलने में देर ही कितनी लगती है

6.
मौत

साथ है सब के मगर
किस कदर अकेली है
मौत

7.
परिन्द पिंजरा

अपने अपने पिंजरे में
कैद सब परिंदे हैं
अपनी अपनी बोली में
अपने दुःख सुनाते हैं
चोंच तेज करते हैं
फड़फड़ाते रहते हैं



Tuesday, July 28, 2015

कलम आज कलाम की जय बोल!

कलाम साहब का जाना 21 वीं सदी के सबसे बड़े भारतीय नायक का जाना है, युवाओं के प्रेरणास्रोत का जाना है. 21 वीं सदी में भारत में जो तकनीक विस्फोट हुआ उसमें कलाम साहब को युगपुरुष के रूप में देखा गया. आईआईटी से स्नातक युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर ने कलाम साहब को सम्यक श्रद्धांजलि दी है. उनको अंतिम प्रणाम के साथ पढ़ते हैं यह लेख- मॉडरेटर 
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हरेक युग के अपने नायक और प्रतिमान होते हैं. हर सभ्यता के विशिष्ट मानक तथा मूल्य होते हैं. किन्तु वे महामानव होते हैं जो हर देश और काल के प्रतिमानों पर अग्रणी सिद्ध हो जाते हैं. जिनकी शीलता, सौम्यता, विश्वदृष्टि, बंधुत्व आने वाली सदियों के लिए उदहारण बन जाती है. इस कलयुग में घृणा और द्वेष पौरुष के मूल्य बन कर, प्रेम और सहिष्णुता से अधिक स्वीकार्य बन चुके हैं, वहीं पूर्व राष्ट्रपति अवुल पकिर जैनुलब्दीन अब्दुल कलाम का व्यक्तित्व उन सभी नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण रहा जो हमारे जन मानस में आदर्श जीवन के निर्विवाद प्रतीक रहा है. उनका जीवन  चिंतनशील और गरिमामय विचारधारा के अक्षुण्ण ज्योतिर्मय स्त्रोत बन गया है. महात्मा गाँधी के बाद अब्दुल कलाम उन विशिष्ट लोगों में गिने जाते हैं जिन्हें समाज के सभी वर्ग, सभी क्षेत्र, राजनैतिक दलों का अपूर्व समर्थन मिला. जिस तरह सूरज की प्रकाश के सन्दर्भ में किसी तरह उपमा व्यर्थ ही जायेगी, उसी तरह उनके बेमिसाल व्यक्तित्व की महिमा का वर्णन भी अपूर्ण ही होगा.

यह हमारा राष्ट्रीय शोक है, जहाँ महान वैज्ञानिक, भौतिकवेत्ता, एरोस्पेस इंजिनियर, मिसाइल पितामह, भारत रत्न अब्दुल कलाम के निधन पर देश के कोने कोने से करोड़ों रूदन समवेत स्वर में उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं. जैसे लाखों लोग सहसा अनाथ हो गए हैं. जैसे हमारा नायक हमसे छीन गया हो. सहसा पुण्य प्रकाश स्तम्भ का लोप हो गया हो और घनघोर अन्धकार छा गया है.

सन १९३१ में एक गरीब मछुआरे परिवार में जन्म ले कर, अखबार बेच कर, छोटे मोटे काम करते हुए, विज्ञान और इंजीनियरिंग की कठिन पढाई करते हुए, भारत की रक्षा में अपूर्व योगदान देते हुए, देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले डॉ अब्दुल कलाम अदम्य इच्छा शक्ति के पर्याय थे. पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को उनके पोखरण अभियान में योगदान, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, भारत रत्न, बहुतेरे मानद उपाधियाँ से याद करने की अपेक्षा उस स्वरुप में याद करना चाहिये, जिस स्वरुप में आम लोग उन्हें पहचानते हैं और उनका नाम बड़े ही आदर के साथ लेते हैं.

विद्यार्थियों से घुलने मिलने वाले, शिष्ट, सौम्य, सरल, सहज, स्वप्नद्रष्टा, विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय, वीणा वादक, गीता और कुरआन के प्रति आदर करने वाले एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करना चाहिये जो राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने पर केवल दो सूटकेस ले कर राष्ट्रपति भवन से निकल गए. धन के प्रति कोई मोह नहीं, चिंतन और नैतिकता के लिए प्रतिबद्धता, यही आचरण तो श्रद्धेय ऋषि-मुनियों का आचरण है. इसी अंतःकरण की शुद्धता की वंदना की जाती है. यही मानव की सर्वोत्तम उपलब्धि समझी जाती है. निंदा, द्वेष, और क्रोध से कोसों दूर वहीं लोगों में ऊर्जा फूंकने के लिए कटिबद्ध, जन प्रतिनिधियों को उनका दायित्व का स्मरण करने वाले, सही मायनों में कलाम साहब सच्चे ऋषि, जननायक और नेता थे.

थोड़ी सफलता मिलने पर ही आम लोग सातवें आसमान पर चढ़ जाते हैं. आज सोशल मीडिया पर नज़र डालें, अनगिनत ऐसे उदहारण मिल रहे हैं जहाँ राष्ट्रपति पर आसीन अब्दुल कलाम ने स्वयं साधारण पत्रों को उत्तर दिया, विभिन्न कार्यक्रमों में लोगों से मिले. जीवन भर वो स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों और आम लोगों से मिलते जुलते रहे. लगभग निर्विवाद रूप से चुन लिए गए राष्ट्रपति जैसा आदर और सम्मान आज किसी राजनैतिक दल के किसी नेता को हासिल हो, ऐसा अकल्पनीय है. उनका होना इस बात की आश्वस्ति थी कि नैतिकता है. कोई ऐसा आदर्श है, जैसा हम बनना चाहें या आने वाली पीढ़ियों को बता सकें. कई बुद्धिजीवी अक्सर यह आलोचना करते नज़र आते हैं कि अब्दुल कलाम जैसे वैज्ञानिक क्यों आध्यात्म (जिसका मतलब वो अंधविश्वास समझते हैं) को महत्त्व देते रहे? उन बुद्धिजीवियों से यह प्रश्न है कि वह इसे किस रूप में लेते हैं? एक विज्ञान का चिन्तक आध्यात्म को क्या केवल पूजा-पाठ या हवन से लेता है? एक जटिल विषय पर व्यक्ति विशेष की अवधारणा से उनका मूल्यांकन या आलोचना उसके समग्र स्वरुप को नहीं समझ पाती.

कहते हैं मृत्यु जीवन को रेखांकित करती है. कुछ विलक्षण उदाहरणों में नियति का खेल बड़े अनुपम तरीके से प्रतीकात्मक हो उभर आता है. टॉलस्टॉय के अमीर नौकरशाह ईवान इलिइच की मौत तब होती हैं, जब लोगों से उसे उसकी अपनी मृत्यु की सूचना मिलती हैं. चेखोव का एक मामूली अदना क्लर्क अपने अधिकारी के खफ़ा होने से चुपचाप मर जाता है. वहीं यथार्थ में महात्मा गाँधी जो बड़े भक्त थे, प्रार्थना को जाते हुए उनका इहलीला समाप्त कर दी गयी. जनजीवन में चेतनता को समर्पित डॉ कलाम आइआइएम शिलांग में भाषण देते गिर पड़े.

अगर जीवन परिपूर्ण हो, सार्थक हो, मानक हो; ऐसी स्थिति में मृत्यु उनके तिरासी वर्ष के आदर्श जीवन का अंतिम उत्सव बन जाना चाहिये. फिर भी अपनी मानवीय कमजोरियों से वशीभूत हो कर आज अनगिन जनों से वेदनाधारा फूट पड़ी है. इन असंख्य श्रद्धांजलियों के साथ डॉ ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को आखिरी सलाम!
 
अंधा चकाचौंध का मारा,
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के,
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल।

कलम, आज उनकी जय बोल।

Monday, July 27, 2015

शायक आलोक की कविताएं

शायक आलोक और विवाद का बहुत अन्तरंग रिश्ता है. लेकिन सब कुछ के बावजूद उनकी रचनात्मकता प्रभावित करती है. मसलन इन कविताओं को ले लीजिये- प्रभात रंजन 
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(एक दिन)
एक दिन 
कीड़े खा जाएंगे तुम्हारी रखी जमा की गई किताबों को 
फिर कीड़े आहार बनाएंगे तुम्हारी लिखी जा रही कविताओं को 
फिर वे तुम्हारे जेहन पर हमला करेंगे
चबा लेंगे अजन्मी कविताओं के एक एक शब्द 
वे खा लेंगे नींब से चाटते तुम्हारी पूरी कलम 
और अंत में वे तुम्हारी उँगलियों को घर बना लेंगे.

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(वे जो कविताएं लिखते हैं, मेरी कविताएं चबाएंगे)
अंत में यही होगा बहुत से बहुत कि 
तुम उठा डाल दोगे मुझे पागलखाने में 
एक बयान जारी कर कहोगे कि नहीं था यह किसी के पक्ष में 
न लाल हरा न नीला केसरिया
कि इसने मुझे भी 
मेरे विरोधियों को भी गालियाँ बकी 
कि प्रेस वार्ता के बाद के शराब भोज में 
मुझे जानने वाला संपादक तुम्हारे कान में कहेगा- 
'
ठीक किया .. अजब पागल था ' 

वे जो मुझे कनखियों से देखते हैं 
जो इस दौरान चुप थे, रहे थे ताक में 
मुस्कुराएंगे
वे जो कविताएं लिखते हैं, मेरी कविताएं चबाएंगे. 

यह भी होगा कि 
पागल-दीवार की सलाखों से मैं हंसूंगा तुमपर 
कुछ और ही जोर से, और चिल्लाऊंगा 
और तुम्हें लिखेंगे गुमनाम चिट्ठियाँ वे कुछ 
जो मेरी तरह शोक में थे लोकतंत्र के. 

अंत में यह भी होगा कि तुम्हारे तमाम पक्षों के खिलाफ 
मेरे पक्ष की संख्या में इजाफा होगा 
या यह होगा कि इस मुल्क में 
पागलखानों की तादाद बढ़ानी होगी तुम्हें. 

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(कवि होने की हताशा से गुजरते हुए)
और एक दिन 
मैं ही घोषित करूँगा कि प्रतिदिन सुबह कविता पढने से ज्यादा जरुरी था 
कागज पर गुणा जोड़ घटाव बनाना  
जरुरी था चाय से ज्यादा भरा ग्लास नीम का जहर 
जरुरी था कि पुरानी मसहरी सिलते हुए
एक दिन मैं पूरे दिन बैठकर बनाता मच्छड़ों से जूझने की कोई ठोस कार्यनीति. 

एक दिन मैं ही घोषणा करूँगा कि प्रेम से ज्यादा जरुरी था देह का सम्बन्ध 
अनामिका कुमारी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी नामिका कुमारी 
घोषणा करूँगा कि मैं लिखता रहा हूँ झूठ 
दुनिया के कथित सच पर अंत में मैं भी लगाऊंगा मेरा नाम का अंगूठा. 

मैं खुद से माफ़ी मांगूंगा एक दिन. 

मैं घोषणा करूँगा एक दिन कि चूक हुई है मुझसे 
कविता मगजमारी के बजाय मुझे पास करनी चाहिए थी क्लर्की की परीक्षा  
दफ्तरी बड़ा बाबू बनकर समय रहते खरीद लेनी चाहिए थी स्कूटर 
स्कूटर पर पीछे बैठने वाली अंगिकाभाषी पत्नी का इंतजाम 
समय रहते कर लेना चाहिए था. 

और किसी दिन अगर मुझे कविता के लिए चिन्हित होने का सर्टिफिकेट मिलेगा 
तो उस दिन हाथ पकड़कर ले आऊंगा तुम्हारे पास मेरे वृद्ध होते पिता को 
मेरे पिता पूछेंगे तुमसे कि प्रति कविता किस दर से किया तुमने सौदा
सस्ते रेट के लिए मुझे घूरेंगे कोसेंगे  
और मैं करूँगा अट्टहास 
घोषणा करूँगा कि कविता नहीं है किसी ख़ास काम की चीज 
और इस कवि को चौराहे पर टांग दूंगा.

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(मुझे नींद नहीं आती)
मेरी खिड़की के दक्षिण के बांस जंगल में 
इन दिनों रात के पहले पहर बोल उठता है एक सियार 
एक बच्चे के रोने की आवाज़ आती है 
मेरे अन्दर उतर आती है बुढ़िया होकर मर गयी दादी मेरी 
भर्राई भारी आवाज़ में मुझे सोने को कहती है 
कहती है सो जाओ नहीं तो सियार आ जाएगा 

दादी के चले जाने और सियार के थक कर चुप हो जाने के बीच 
मैं याद करता हूँ दिन भर की खबरें 
ज़ुम्म्म जमाक किसी मृत नवब्याहता के गले के नीले निशान पर 
फोकस मारता है मेरा कैमरा 
फ्रेम में ढूंढता हूँ एक चील 
जो कलम खरीदने निकले बिंद बच्चे की सड़क पर पड़ी लाश पर निशाना साध रहा हो 
रोज के बलात्कार के बीच रोज के पत्रकार की तरह 
सपाट पूछता हूँ बकरीहारन से कि बताओ कितने आदमी थे
मेरी हलकी साँसों से सियार की गंध और तेज साँसों से 
दादी के हुक्का गुडगुडाने की आवाज़ आती है 

आज सियार की हुआँक के अंतिम अक्षर में 
जाने कैसे मैंने जोड़ा है मेरे रुदन का एक टुकड़ा 
सियार से कहा है पढूंगा जल्द ही तुम्हारी मुक्ति के श्लोक 
दादी से कहा है कि दादी सियार रोज आता है – रोज मुझे नींद नहीं आती.

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(हस्तक्षेप)
तुम्हारे हस्तक्षेप से 
एक दिन बदल जाएगी इस जंगल की सूरत 
तुम्हारी लकड़-दहाड़ से 
मांदों में दुबके लोग बाहर निकल आयेंगे 
तुम्हारे पीछे चलते लोग 
सत्ता के प्रतीकों पर धावा बोलेंगे 
मुर्दाबाद के नारे लगायेंगे 
काले झंडे लहरायेंगे. 

और एक दिन फिर, 
तुम गायब हो जाना लकड़बग्घे 
और हम हमारे लिए सियार ढूंढ लायेंगे. 

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(कुकुरमुत्ते)
मुझे पसंद हैं कुकुरमुत्ते
कुकुरमुत्ते तटस्थ खड़े रहते हैं 
हर मौसम में एक सा रंग लिए 
बहती रहे बातों की बयार / वे हिलते डुलते भी नहीं
बारिश में हुमरने और तेज धूप में 
मुंह लटका लेने के सायास हुनर से बचे हुए 

कुकुरमुत्तों पर मुद्रास्फीति का असर नहीं होता 
रहता है बाजार के उतार चढ़ाव से निरपेक्ष 
ज्यादा कमा ले तो पाव भर मुर्गा भात खा लेता है आम आदमी 
कुकुरमुत्तों के लिए लार नहीं टपकाता

हर प्रतीक में फिट बैठते हैं कुकुरमुत्ते 
यह आपके मानने भर पर है कि 
छाते को आप ताज कहें कि 
गरीब के माथे पर की गठरी 
अपनी अर्थव्यवस्था को अम्ब्रेला इकॉनमी कहना हो तो 
अशोक स्तम्भ के बगल में आप बना दीजिये
एक कुकुरमुत्ते की भी तस्वीर 
कुकुरमुत्तों को कोई आपत्ति नहीं

चित्तकबरे कुकुरमुत्ते को इंडिया 
डाउटफुल सफ़ेद वाले को ईरान और 
सफ़ेद डंठल पर काले गुम्बद वाले कुकुरमुत्ते को
अमेरिका भी कहा जा सकता है

मेरे पड़ोस में 
हर बात पर 
कुछ बड़े कुकुरमुत्ते ऐसे खड़े रहते हैं 
जैसे जवान बेटे की लाश देखकर 
बूढ़े बाप को काठ मार गया हो 
रंध खाए काठ सा भौकाया खड़ा कुकुरमुत्ता ! 

ठीक मेरे घर के बायीं तरफ 
नस्ल में उन्नत तीन कुकुरमुत्ते सीधे खड़े हैं 
चौथा थोडा टेढ़ा हो बाप कुकुरमुत्ता को लंघी मारता हुआ

कुकुरमुत्ते पड़ोस की हरियाली देख भी हरे नहीं होते 
कुकुरमुत्ते खड़े होने को किसी का सहारा नहीं लेते 
कुकुरमुत्ते किसी बेल किसी लत्ती को सहारा नहीं देते
कुकुरमुत्ते हमेशा कुकुरमुत्ते बने रहते हैं 

यूँ मुझे नहीं पसंद है किसी कुकुर का टांग उठाकर 
मेरी दीवार, मेरे गाड़ी के पहिये, मेरी किसी कुर्सी पर मूत देना 
मुझे नहीं पसंद है अमेरिका चीन की अफ्रीका में उपस्थिति
पर मुझे बेहद पसंद हैं कुकुरमुत्ते. 

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(दृष्टिकोण का सवाल)
सोचती है बिल्ली 
कि अंधी हो जाय मालकिन तो मजा हो 
कि पी सके वह दूध नजर बचाकर
कि इत्मिनान रहे. 

कुत्ता सोचता है कि मालिक को बरकत हो 
कि बढ़ेगी आय तो 
बढ़ जाएगी उसके लिए हड्डियों की तादाद. 

बिल्ली कुत्ते का बैर दृष्टिकोण के इसी सवाल पर है. 

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(यह मेरे फ़लस्तीन का मसला नहीं है)
मेरे जेहन में मुर्दा शांति है
कान में आवाज़ है आबिदा परवीन की 
उनके होठों पर बुल्ले शाह आँखें बंद कर हुमर रहे हैं
'
मस्ज़िद ढा दे मंदर ढा दे ढा दे जो कुछ ढैंदा' 

और अभी ज्यादा देर नहीं बीता जब नजरों से गुजरी हैं कुछ तस्वीरें 
तस्वीरें जिनमें खून जमा था बच्चों के चेहरों पर 
औरतों की आँखों में आग जमी थी  
पुरुषों के पूरे रुख पर बर्फ़ सी ठंडक थी
 
और जबकि मैं मेरी खींची तस्वीर में 
मोरों के पंखों का रंग उभार रहा हूँ 
तब मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा 
जबकि ये मेरे घर, मेरी जमीन, मेरे कौम, मेरे फ़लस्तीन का मसला नहीं है. 

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(समय संक्रमित है)
समय संक्रमित है 
और रोजमर्रा की ज़िन्दगी जीता मैं 
संभव है एक बहुत जल्द दिन एक पत्थर में बदल जाऊं 
एक डॉक्टर मेरे जेहन के घुटनों पर एक छोटी हथौड़ी से वार करे 
मेरी दिमागी नसों में सूइयाँ चुभोये 
पूछे मुझसे कि बयान करो कि क्या महसूस हुआ 
और मैं मुस्कुराते हुए कह दूँ 
कि मेरी हड्डियों में जमे वक़्त को अब कुछ भी महसूस नहीं होता डॉक्टर ! 

मेरे शरीर के अनुक्रिया दिखाने वाले तंत्र ने 
एकदम गंभीर बातों पर भी चौंकना बंद कर दिया है. 

उदाहरण से कहूँ मैं मेरी बात 
तो जैसे टूथपेस्ट का स्वाद मुंह में बिगड़ते ही मैं थूक देता हूँ 
वैसे ही चिल्ला के मैं कह देता हूँ रोती हुई गंवार लड़की से 
कि ड्रामा कम करो और बताओ मुझे 
तुम्हारे बलात्कार का पूरा दृश्य प्रसंग 
और मुझे संक्षेप में बताओ ये रोज की कहानी. 

या जितने सामान्य तरीके से कहता हूँ मैं कि 
जरा ज्यादा उबाली जाय सुबह की मेरी चाय 
चीनी की मात्रा तेज रखी जाय 
उतने ही सामान्य तरीके से कह देता हूँ कि जरा जोर से लगाओ नारा 
जरा ज्यादा चिल्लाओ मुआवजे के लिए
कि मामला भूख से हुई मौत का है. 

संक्रमित समय में मैंने 
दुनिया के तमाम लिखे-बोले गए शब्दों से भरोसा खो दिया है

मैं संशय करता हूँ कि स्त्री संवेदना पर भाषण दे रहा व्यक्ति  
शाम घर लौटते केले खरीद ले जाना भूल जाएगा 
पूरे दिन भूखी रही उसकी धार्मिक पत्नी फिर खुद के इंतजाम से व्रत तोड़ेगी 
लगता है मुझे कि आम और ख़ास की कही गई हर एक बात 
उसके खुद के समीकरण पर दुरुस्त और लागू है 
मैं मानने लगा हूँ कि पक्ष का निर्माण कवि 
अपनी कविता की आवश्यकता पर करता है. 

यूँही धीरे धीरे मेरे पत्थर होते जाने के समानान्तर
मेरे अन्दर विचारों के कब्रिस्तान की घेराबंदी चल रही है 
और मैं वहीँ कब्र के पत्थर की तरह जड़ दिया गया हूँ. 

संक्रमित समय में 
रोजमर्रा की ज़िन्दगी जीता मैं 
संभव है एक बहुत जल्द दिन एक पत्थर में बदल जाऊं 
और डॉक्टर मुझमें मेरे होने की संभावना ढूंढें 
उससे पहले मुझे मेरे बचे रहने की संभावना तलाशनी होगी. 

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