Thursday, March 5, 2015

एक बड़े आदर्श का यथार्थवादी अंत?

देश जिसे अपने आदर्श की तरह अपनाने के लिए तैयार था वह तो कमबख्त हिंदी कहानियों के उस यथार्थ की तरह निकला जिसमें पचास साल से कुछ नहीं बदला. जो लोग राजनीति बदलने निकले थे राजनीति ने उनको बदल दिया. असल में लोकतंत्र का एक ही मॉडल है इस देश में जिसमें लोक के नाम पर कुछ लोग तंत्र बनाते हैं और फिर उनके लिए अपने हित में फैसले लेने लगते हैं. फॉर ए चेंज यह कह सकते हैं कि इस बार लोकतंत्र नहीं आमतंत्र है. लेकिन बहुमत के नाम पर एकतंत्र से जो फैसला कल की फाल्गुनी शाम लिया गया है उसने एक बार फिर यही साबित किया है प्रचण्ड बहुमत नेता को स्वेच्छाचारी बना देता है. नेहरु के बाद देश ने जिस नेता को भी ऐसा बहुमत दिया है वह एकमतवादी बन गया है. 1971 के लोकसभा चुनावों के बाद इंदिरा गाँधी और 1984 के लोकसभा चुनावों के बाद राजीव गाँधी के पतन का कारण उनको मिला विशाल बहुमत बना.

बहरहाल, अभी यह आम आदमी पार्टी एक राज्यस्तरीय पार्टी है. लेकिन अगले आम सभा चुनावों में सबसे बड़ी उम्मीद के रूप में इस पार्टी को देखा जाने लगा है. कांग्रेस पार्टी के संगठन से जुड़े कुछ वरिष्ठ नेताओं से मेरी भेंट-मुलाकात होती रहती है. उनमें से भी कई का यह मानना था कि अगली बड़ी उम्मीद शायद राहुल गाँधी नहीं बल्कि अरविन्द केजरीवाल हों. अब सवाल है कि क्या वह उम्मीद टूट गई है? शायद हाँ, शायद नहीं. हाँ, लेकिन एक बात जरूर है कि जिस तरह की सहानुभूति लहर मीडिया में, सोशल मीडिया में योगेन्द्र यादव को लेकर चली है उसने अचानक भारतीय राजनीति को एक नया नायक दे दिया है. एक अवसरवादी बौद्धिक से विकल्प की राजनीति के नायक जो अपने आचार-विचार में शुद्ध सौम्य लक्स की तरह लगता है. आम आदमी पार्टी ने उसको राजनीतिक मामलों की समिति से निष्कासित कर दिया और अचानक वह जन सहानुभूति का केंद्र बन गए हैं. 

क्या वैसा ही नायक जैसे 1971 के चुनावों के कुछ साल बाद जेपी बन गए थे या 84 के चुनावों के कुछ साल बाद वीपी सिंह. अभी मैं भी भावुक हूँ और यह कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि आम आदमी पार्टी ने अभी अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं का विस्तार करना शुरू नहीं किया है. इसलिए फिलहाल यही कह सकता हूँ कि अगर अरविन्द केजरीवाल आम आदमी की जनाकांक्षाओं के नायक हैं तो एक झटके में योगेन्द्र यादव प्रति नायक बन गए हैं. मीडिया अब तक नायक पैदा करता रहा है , इस बार उसने प्रति नायक पैदा कर दिया है.

सारी संभावनाएं भविष्य के धुंधलके में हैं लेकिन एक बात है एक झटके में आम आदमी की उम्मीदों में बड़ी दरार पड़ गई. आखिर ऐसा क्यों होता है कि आम आदमी की आजादी की सारी बड़ी बड़ी संभावनाएं छोटी-छोटी महत्वाकांक्षाओं में सिमट जाती हैं? वैसे उम्मीद इस बात से कायम है कि यह मकाम बहुत जल्दी आ गया. शायद आगे इससे कुछ बेहतर राह निकले! 

-प्रभात रंजन  

Wednesday, March 4, 2015

भारतीय लोकतंत्र में सुप्रीमो

आम आदमी पार्टी के अंदरूनी विवाद पर आज अविजित शर्मा का लेख. अविजित आईआईटी दिल्ली के ग्रेजुएट हैं. आम आदमी पार्टी के स्वयंसेवी रहे हैं. यह संकट देश की वैकल्पिक राजनीति का एक बड़ा संकट है जो उसके भविष्य के लिए अच्छा नहीं होगा- मॉडरेटर 
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            दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी को सत्‍ता संभाले अभी एक महीना भी नहीं हुआ लेकिन सुप्रीमकौन के मुद्दों पर  पार्टी विभाजन की ओर बढ़ रही है। इसे विभाजन न भी कहा जाए तो यह खतरे की आहट तो है ही। पूरे देश की नौजवान पीढ़ी के लिए एक नयी उम्‍मीद के रूप में उभरी पार्टी में ऐसा क्‍यों हो रहा है? आम आदमी पार्टी न केवल दिल्‍ली बल्‍कि‍ पूरे देश को यह संदेश पहुंचाने में कामयाब रही कि वह देश के सभी राष्‍ट्रीय और क्षेत्रीय दलों से कुछ अलग है। उन्‍होंने कुछ आदर्श भी गिनाए कि एक परिवार के एक से अधिक आदमी पार्टी में नहीं हों। चंदा और उसके खर्च का सार्वजनिक रूप से बताया जाएगा; पार्टी के सारे कामकाज सूचनाधिकार के अंतर्गत होंगे और सबसे बड़ी बात कि हम पार्टी ज‍न समस्‍याओं के समाधान के लिए हैं, किसी आईडियालॉजीको बघारने या प्रचार के लिए नहीं। और सबसे बड़ी बात कि पार्टी उस भ्रष्‍टाचार को खत्‍म करने के लिए लोकपाल से लेकर हर संभव वह प्रयास करेगी जिसने साठ साल में घुन की तरह पूरे देश को खा लिया है।

पिछले वर्ष 49 दिन के अपने अल्‍पकाल में इस पार्टी ने यह करके भी दिखाया और उसी पर  दिल्‍ली की जनता ने विश्‍वास जताया जब सत्‍तर पार्टी की विधान सभा में 67 सीटें मिली। एक राष्‍ट्रीय पार्टी कांग्रेस पूरी तरह से साफ हो गयी तो केंद्र में 9 महीने पहले ही बहुमत में आई भारतीय जनता पार्टी मुश्किल से तीन सीटें बचा पाई। दिल्‍ली के इतिहास में तो यह पहली बार हुआ ही देश के इतिहास में एक बार सिक्किम विधानसभा को छोड़ कर और कहीं भी इतना बहुमत नहीं मिला। यह लोगों के अभूतपूर्व विश्‍वास का प्रतीक था आम आदमी पार्टी के लिए। अरविंद केजरीवाल से लेकर योगेन्‍द्र यादव सभी ने इसे नतमस्‍तक होकर स्‍वीकारा भी। अरविंद केजरीवाल ने तो अपनी जीत के बाद की कुछ बातें जो कहीं उसमें यही था कि इतनी जीत के बाद हमारा दायित्‍व बढ़ गया है कि हममें कोई अहंकार न आए।

            लेकिन पार्टी में टूट की जो बातें हो रही हैं यह तो कुछ-कुछ अहंकार को छूती हुई लग रही हैं। अगस्‍त 2014 के किसी लेख के बहाने यदि योगेन्‍द्र यादव या दूसरे साथियों पर उंगली उठाई जा रही है तो यह शायद उस जीत की मदहोशी में ही किया जा रहा है।  योगेन्‍द्र यादव ने जो कुछ कहा या प्रशांत भूषण ने कुछ संदिग्‍ध उम्‍मीदवारों को टिकट दिये जाने को लेकर जो बातें उठाईं इन सबका स्‍वागत होना चाहिए। दिल्‍ली के मध्‍यवर्ग से लेकर देश की नौजवान मेधावी पीढ़ी जो आई.आई.टी., आई.आई.एम. या दूसरे संस्‍थानों से निकलकर आम आदमी पार्टी के लिए सड़कों पर उतरी उसे इन्‍हीं बातों से तो लगा कि यह वह पार्टी है जहां सब अपनी बात निर्भय होकर कह सकते हैं। उसके कोई ऐसे जड़ सिद्धांत नहीं हैं किसी भी बात या विचार के विरोधी हों। दूसरी पार्टियों के मुकाबले पार्टी में एक आंतरिक लोकतंत्र मौजूद है। प्रशांत भूषण जी ने जिन संदिग्‍ध उम्‍मीदवारों की बात की दिल्‍ली के एक बहुत बड़े समझदार वर्ग ने उस पर यकीन किया और फिर भी आम आदमी पार्टी का साथ दिया। इस उम्‍मीद के साथ कि यदि किसी पार्टी में ऐसे निंदक नियरेहैं तो उसका भविष्‍य निश्चित रूप से अच्‍छा होगा लेकिन मौजूदा दलों की राजनीति के साएं में पले-बढ़े कुछ कार्यकर्ताओं  को यह बात नहीं पच रही कि ऐसी निडर आवाजें आम आदमी पार्टी में रहें और इसीलिए इसको इतना तुल दिया जा रहा है।

कौन नहीं जानता कि अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी की जीत के सबसे मुख्‍य चेहरे हैं। पिछले वर्ष के  चुनावों में भी वे थे और आज भी हैं। नि:संदेह उनकी राजनीतिक समझ उनके सभी साथियों में सबसे पैनी, चुस्‍त तो है ही उनका व्‍यक्तित्‍व भी उतना ही सहज, आत्‍मीय और निडर। इसीलिए यह अचानक नहीं है कि वे मध्‍य वर्ग के भी चहेते हैं और रेहड़ी, पटरी वालों से लेकर स्‍कूटर चालकों, मजदूरों के बीच भी। गांधी के हावभाव, शैली संघर्ष के 21वीं सदी के कुछ-कुछ प्रतिरूप। काश!  वे इसी तरह आगे बढ़ते रहे तो यह 2015 में गांधी के ठीक सौ वर्ष बाद अफ्रीका से भारत में राजनीतिक संघर्ष की एक नयी शुरूआत की तरह होगा।

लेकिन यदि गांधी से सीखा जाए तो कांग्रेस आजादी के कठिनतम दौर में भी उनकी बात मानती जरूर थी लेकिन वे सत्‍ता का केंद्र कभी नहीं बने।  गांधी कांग्रेस अध्‍यक्ष भी मुश्किल से एक आध बार ही रहे। और शायद 1924 में तो उन्‍होंने कांग्रेस की चार आने की सामान्‍य सदस्‍यता भी छोड़ दी थी। लेकिन असली नेता वही होता है जिसकी बात कुर्सी के बिना भी संगठन मानता हो। 1977 के आंदोलन में जय प्रकाश नारायण ने भी वही भूमिका निभाई थी।  

इसलिए यदि आम  आदमी पार्टी के कुछ नेता योगेन्‍द्र यादव, प्रशांत भूषण समेत यदि कभी किसी विचार को आगे बढ़ाते हैं तो शायद उसे केजरीवाल के खिलाफ किसी मुद्दे के रूप में सूंघने की जरूरत नहीं है। देश की जनता को यह भी यकीन है कि केजरीवाल किसी भी पद पर रहें तब भी जनता आम आदमी पार्टी को उनके नाम से ही जानती है। केजरीवाल और उनके निकट  कट्टर समर्थकों को यह बात समझनी चाहिए और शायद बिना कारण ऐसी बातों को तूल भी नहीं देना चाहिए।

            वहीं योगेन्‍द्र यादव, प्रशांत भूषण को भी यह समझने की जरूरत है कि वे केजरीवाल और दूसरे लोगों से बेहतर बुद्धिजीवी हो सकते हैं, उनकी अकादमिक या वकील के रूप में देश भर में ख्‍याति है; उनकी निडरता, निष्‍पक्षता भी,  लेकिन यह सब गुण यदि राजनैतिक सफलता की तराजू पर तौला जाए तो उन्‍नीस ही ठहरते हैं। पिछले साठ वर्ष का इतिहास बताता है कि कुलदीप नैयर से लेकर बड़े-बड़े पत्रकार, लेखकों को इस देश के लोकतंत्र ने धूल चटा दी है बिरले ही कभी कोई अपनी कला, कलम, कूंची की वजह से चुनाव में सफल हुए हों। यहां राजनीति के मुकाबले कला या बौद्धिक जगत को कम ऑंकना नहीं है बल्कि बस इतना भर कहना है कि राजनीति की दौड़ में इन मूल्‍यों को समझने में कम से कम भारत की जनता को अभी कई दशक लगेंगे। आम आदमी पार्टी के लिए सबसे जरूरी था तो अरविंद केजरीवाल और उनकी राजनैतिक क्षमता वह चाहे बिजली के खम्‍बे पर चढ़कर बिजली की दरों में कमी करने के लिए तार काटने का चित्र हो या  अन्‍ना आंदोलन के समय धरने पर बैठने अथवा मुख्‍य मंत्री के रूप में ठिठुरती सर्दियों में अनशन करना। जनता संघर्ष के इस प्रतीक को पहचानती है। लेकिन सिर्फ यह प्रतीक ही पर्याप्‍त नहीं थे। दिल्‍ली और देश के एक बड़े  वर्ग ने इस सबको नौटंकीकहने में भी देर नहीं लगाई। यहीं शुरू होता है योगेन्‍द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे सक्रिय बुद्धिजीवियों का हस्‍तक्षेप और योगदान। टेलीविजन के हर चैनल से लेकर राजधानी के प्रतिष्ठित अखबारों में केजरीवाल के समर्थन में। उन्‍होंने आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के धरने, विरोध, विचार की ऐसी व्‍याख्‍याएं प्रस्‍तुत कीं जिसने मीडिया के मन में भी केजरीवाल के प्रति वैसा ही सम्‍मान जगाया जैसा किसी वक्‍त गांधी के समर्थन में अंग्रेजी प्रेस भी जगाती थी। इसलिए अच्‍छा यही रहेगा कि राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की होने वाली बैठक में यह मुद्दा तो जरूर उठे। इस पर बात भी हो, प्रेस को भी खुलकर आमंत्रित किया जाए और पूरे देश को फिर एक बार यह विश्‍वास दिला दिया जाए कि हॉं आम आदमी पार्टी वास्‍तव में उसी लोकतंत्र का नमूना है जिसका संविधान  इंग्‍लैंड, अमेरिका के उदार लोकतंत्र से सीख लेते हुए बुना गया है और उसका यकीन उन्‍हीं आदर्शों पर चलना है।

यदि किसी दबावों के तहत पार्टी का विभाजन हुआ तो क्‍या आम आदमी पार्टी की छवि वैसी ही नहीं बन जाएगी जैसे देश के दूसरे दल हैं ? कांग्रेस पार्टी की अध्‍यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी लगभग दो दशक से उस पद पर हैं और वैसे ही लालू यादव, मुलायम सिंह यादव अपने-अपने दलों के सुप्रीम वैसी ही सुप्रीमो हैं जयललिता, मायावती करुणानिधि, ममता बैनर्जी और राष्‍ट्रीय कांग्रेस पार्टी के शरद पवार। ये सभी दल लगभग वन मेन शोहैं जहां  अलग विचार की गंध आने से पहले ही लोकतंत्र उन्‍हें पार्टी से बाहर कर दिया जाता है। शुरू के नेहरू के कार्यकाल को यदि छोड़ भी दें तो शायद नेहरू के अंतिम दिनों में भी इसकी झलक आने लगी थी। इंदिरा गांधी के समय में भी ऐसा ही होता था भारतीय लोकतंत्र की यह  सीमाएं रही हैं। लेकिन 21 वीं सदी में एक उम्‍मीद की किरण बन कर उभरी आम आदमी पार्टी को यह सिद्ध करना होगा कि उसमें विरोधाभासों के बीच लोकतंत्र को बचाने की क्षमता है।

दिनांक : 3.3.15
अविजित शर्मा
96, कला विहार अपार्टमेन्टस,
मयूर विहार,फेज-1 एक्सटेंशन, दिल्ली-91                                                   
टेलीफोन नं- 22744596 (घर)
Email : avijit.sharma@gmail.com

Tuesday, March 3, 2015

क्या हिन्दी में भी कोई ‘चेतन भगत’ आ सकता है?

हाल में ही हिंदी में कुछ किताबें आई तो यह चर्चा शुरू हो गई कि हिंदी में चेतन भगत आने वाला है. लेकिन यह इतना आसान नहीं है. युवा लेखक अनिमेष मुखर्जी ने चेतन भगत के बहाने समकालीन अंग्रेजी लोकप्रिय साहित्य की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी को लेकर एक बहुत दिलचस्प लेख लिखा है- मॉडरेटर 
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"यदि राम की कक्षा में 40 विद्यार्थी हैं, वह सबको एक-एक टॉफी बाँटना चाहता है और दस टॉफी अपने लिए भी बचाना चाहता है। राम को कुल कितनी टॉफी खरीदनी चाहिए?" इस तरह के कई प्रश्न हम सबने स्कूल के शुरुआती दिनों में हल किये होंगे। अब ज़रा इस सवाल को थोड़ा बदल कर देखते हैं। "किसी भी अंग्रेज़ी भारतीय लेखक की सफल से सफल पुस्तक की एक वर्ष में अधिकतम पांच हज़ार प्रतियां बिकती हैं, किसी प्रकाशक को एक नए उपन्यास की कितनी कॉपी छापनी चाहिए? आप का जवाब क्या होगा? पांच हज़ार, आठ हज़ार अधिकतम दस हज़ार लेकिन अगर इस सवाल का जवाब एक लाख हो तो आप क्या कहेंगे?

चेतन भगत आज एक ऐसा मानक बन चुके हैं जिसके ज़िक्र के बिना हिंदुस्तान में लेखकों की लोकप्रियता की चर्चा अधूरी है। हिंदी के पॉपुलर लेखकों के चेतन भगत बनने की संभावनाओं और क्षमताओं की बहस के बीच आइये अब तक कुछ कम देखे समझे गए तथ्यों पर फिर से एक नज़र डालते हैं।

2004 में जब चेतन भगत की किताब 5 पॉइंट समवन, व्हाट नॉट टू डू इन आईआईटी बाजार में आई थी तो कहा जाता है की देखते ही देखते 5000 प्रतियाँ बिक गयीं और साल भर के में किताब की बिक्री का आंकड़ा एक लाख की संख्या को पार कर गया. इन दावो की पूरी तरह से प्रमाणिकता का कोई सीधा सीधा साक्ष्य तो नही मिला मगर चेतन भगत की वर्तमान प्रसिद्धि और उनकी बाद में आई किताबों के बिक्री के रेकोर्ड्स को देखते हुए इन्हें सही माना जा सकता है. मगर इस पूरे घटनाक्रम में गौर करने वाले ३ बिंदु हैं.

किताब के लांच से पहले कोई सोशल मीडिया प्रचार अभियान ऑरकुट(तब फेसबुक नही था) पर नही चलाया गया था. किताब ‘इंस्टेंट हिट’ थी यानी पहले महीने में ही किताब ने तत्कालीन अंग्रेजी बेस्ट सेलर का आंकड़ा, ‘5,000’ पार कर लिया था. और तीसरा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बिंदु, प्रकाशक ने एक अनजान से बैंकर की चलताऊ शैली में लिखी किताब की एक लाख प्रतियां छापी क्यों? (क्योंकि इतनी प्रतियां बेचने के लिए उनका छपना भी ज़रूरी है) जबकि उससे पहले कोई भी अंग्रेजी लेखक इस आंकड़े के दस प्रतिशत पर भी पहुँच जाता था तो उसे निर्विवाद रूप से बेस्ट सेलर मान लिया जाता. इस सवाल का जवाब हमें मिलता है ‘अंकिता मुखर्जी’ के 2010 में ओपन मैगज़ीन के लिए लिखे एक लेख ‘वन मिस्टेक ऑफ़ माय लाइफ’ में. अंकिता उस समय रूपा पब्लिकेशन के प्रतिद्वंदी फर्म की एडिटोरियल अस्सिस्टेंट थीं और पांडुलिपियों को छांट कर उनमें से काम की स्क्रिप्ट्स को संपादक के पास पहुँचाना उनकी ज़िम्मेदारी थी. अपने लेख में अंकिता बताती हैं कि कैसे चेतन की भेजी गई स्क्रिप्ट के साथ किसी कवर लैटर की जगह एक सीडी थी जिसमें कितब को हिट करवाने का एक पूरा बिसनेस प्लान था (जो अंकिता के प्रकाशन को समझ नहीं आया और उसके बाद की कहानी का ज़िक्र करना अब ज़रूरी नही है). सरल तरीके से समझा जाए तो फाइव पॉइंट समवन की सफलता के पीछे मार्केटिंग के बड़े चुने हुए निम्नलिखित कारण थे.

सबसे पहली बात जिसने किताब को हिट बनाया वो थी किताब के नाम के साथ जुडी टैग लाइन, “व्हाट नॉट टू डू इन आईआईटी”. इस लाइन ने तीन तरह के लोगों को किताब की तरफ आकर्षित किया पहले वो जो आईआईटी में पढ़ रहे थे या पढ़ चुके थे, दुसरे वो जो आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के लिए प्रयासरत थे और तीसरा वर्ग उन युवाओं का था जिन्हें इस जन्म में तो आईआईटी में जाना नसीब नही हुआ लेकिन कैम्पस के अन्दर की जीवनशैली का सम्मोहन उनके दिल में कहीं न कहीं दबा पडा था. इन तीनों के लिए ही नब्बे रूपए की कीमत कोई ज्यादा नही थी और प्रकाशन से पूर्व ही चेतन इस बाद को पक्का कर चुके थे की देश के हर कोने में जहां-जहां इन तीन श्रेणियों के जीव पाए जाते हों वहां-वहां उनकी किताब उपलब्ध हो. किताब लोकार्पण के समय ही गोवाहाटी जैसे सुदूर शहर में अच्छी खासी संख्या में उपलब्ध थी. इसके बाद सबसे अच्छा प्रचार माध्यम ‘वार्ड टू माउथ पब्लिसिटी’ अपनाया गया, बाकी की कहानी हम और आप दोनों ही अच्छे से जानते हैं.

अंत में सवाल आता है कि क्या हिन्दी में भी कोई ‘चेतन भगत’ आ सकता है? इस बात के जवाब के लिए हमें पॉपुलर हिंदी लेखकों और अंग्रेजी बेस्ट सेलर लेखकों के बीच के बुनियादी फर्क को समझना होगा. आज जो भी लेखक या प्रकाशक हिंदी में पॉपुलर लेखन में हाथ आजमा रहे हैं उनका काम करने का तरीका हस्तशिल्प के कारीगरों जैसा है. पहले पूरी मेहनत से वो एक किताब तैयार करते हैं और उसके बाद उसकी बिक्री और मार्केटिंग की कोशिशें करते हैं वहीँ चेतन भगत बनने के लिए किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी की तरह पहले से एक बाज़ार को पहचान कर उस हिसाब से उत्पाद(किताब) तैयार करना और उसका प्रचार, उप्लबधता बड़े पैमाने पर सुनिश्चित करना ज़रूरी है. एक और फर्क है जो हिंदी और अंग्रेजी लेखकों की लोकप्रियता के मायनों में अलग करता है. अमिश त्रिपाठी जैसे लेखक को जब कोई प्रकाशक छापने को तैयार नही होता तो वो न सिर्फ अपने दम पर किताब प्रकाशित करवाते हैं अपितु शाहरुख़ खान की ‘रा-वन’ के इंटरवल में उसका एक विडियो सिनेमाघरों में प्रदर्शित करवाते हैं. देश की हर बड़ी पत्रिका में ‘मेलुहा’ के ऊपर एक बड़ा सा आर्टिकल प्रकाशित होता है, जिसके अंत में लिखा होता है कि यह सिर्फ एक कल्पना है जो अमिश त्रिपाठी की किताब पर आधारित है,” हिंदी के कितने लेखक/प्रकाशक यह सब करने में सक्षम हैं यह विचारणीय प्रश्न है.


कुल मिला के यही समझा जा सकता है कि हिंदी और अंग्रेज़ी की किताबों की दुनिया में कई बुनियादी फर्क हैं जिन्हे हाल-फिलहाल में दूर करना मुश्किल है. किंतु हिंदी साहित्य और उसकी आत्मा को बचाए रखते हुए यदि एक लेखक की जीविका के बेहतर करने का कोई उपाय सम्भव है तो उसे अपनाने में भी कोई समस्या नहीं होनी चाहिये.