Monday, November 24, 2014

डीयू का बिहार कनेक्शन और अंग्रेजी उपन्यास

लोकप्रिय अंग्रेजी उपन्यासों का यह साल दिल्ली विश्वविद्यालय के नाम रहा. दिल्ली विश्वविद्यालय का बिहार कनेक्शन इस साल अंग्रेजी के लोकप्रिय उपन्यासों का सबसे कारगर मुहावरा रहा. रविंदर सिंह का उपन्यास ‘Your Dreams are Mine Now’(हिंदी अनुवाद: तुम्हारे सपने हुए अपने) इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी है.

सबसे पहले आया था पंकज दुबे का उपन्यास, जो अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में था. अंग्रेजी में ‘what a looser’ जबकि हिंदी में ‘लूजर कहीं का’. यह अकेला ऐसा उपन्यास था जो एक इनसाइडर का लिखा हुआ था. इसके लेखक पंकज दुबे दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि यह उपन्यास उन लोगों को स्मृतियों के गलियारे में ले जाने में पूरी तरह सक्षम रहा जो डीयू के छात्र रहे हैं, यहाँ के होस्टल्स में रहे हैं. लेकिन जो डीयू के बाहर के लोग हैं, जो इस तरह के साहित्य का बड़ा पाठक वर्ग है शायद यह उपन्यास उनके साथ उतना कनेक्ट नहीं हो पाया. लेकिन जिस तरह से बिहार के विद्यार्थी, डीयू की पढ़ाई, प्यार-मोहब्बत का चक्कर इस उपन्यास से शुरू हुआ वह आगे इस साल की सबसे बड़ी परंपरा साबित हुई. अफ़सोस की बात है कि इस उपन्यास से डीयू कथा का एक नया दौर शुरू तो हुआ लेकिन इस उपन्यास को उस तरह ट्रेंडसेटर का दर्जा नहीं मिल पाया जिसका यह हकदार था.

बहरहाल, दिल्ली विश्वविद्यालय अपन इनसाइडर के लिए जिस तरह की है उसके बाहर वालों के लिए उसकी छवि कुछ और तरह की है. चेतन भगत ने जब बिहार से दिल्ली पढने आने वाले लड़के की कहानी को आधार बनाकर ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ उपन्यास लिखा तो मुझे लगा जैसे यह उपन्यास ‘लूजर कहीं का’ के आइडिया का ही विस्तार है. लेकिन डीयू, बिहार के बाद न्युयोर्क का एंगल जोड़कर चेतन भगत ने इस उपन्यास को 100 करोड़ क्लब की फिल्मों की तरह भरपूर मसालेदार बना दिया ताकि इसके सुपर डुपर हित होने में कोई कसर न रह जाए. इसमें कोई शक नहीं कि यह उपन्यास उन स्टीरियोटाइप्स को ही पुष्ट करता है जो डीयू न आने वाले, यहाँ न पढने वाले विद्यार्थियों के मन-मिजाज में बनी हुई है.

बाकी चेतन भगत के उपन्यास मौसमी सब्जी की तरह होते हैं खूब बिकती है, और सीजन के हिसाब से कीमत भी कम रहती है. यह उपन्यास इतना बिक चुका है कि इसके आगे पीछे के सारे फ़साने बेकार हो जाते हैं. चेतन भगत जिस विषय को उठाते हैं वह विषय बाद में उनके नाम हो जाता है. चाहे उससे पहले उस विषय को लेकर कितना ही लिखा गया हो, कहा गया हो.

इस कड़ी का तीसरा उपन्यास है ‘तुम्हारे सपने हुए अपने’. रविंदर सिंह चेतन भगत के सामने ब्रांड के रूप में बौने नजर आ सकते हैं. लेकिन अपने चौथे उपन्यास के साथ बाजार में आने वाला यह लेखक एक टिकाऊ ब्रांड है, इसमें कोई शक नहीं. नई पीढ़ी की जद्दोजहद को लेकर, उनके जीवन के तनावों को लेकर लिखे गए उनके उपन्यासों ने अपना बड़ा पाठक वर्ग बनाया है. उनके इस उपन्यास में भी बिहार-डीयू कनेक्शन है. फर्क इतना है कि इसमें पटना की एक लड़की डीयू के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढने आती है. वह बहुत आदर्शवादी है, सही को सही और गलत को गलत कहना चाहती है. बदलाव की लड़ाई लड़ना चाहती है, लड़ती है और अचानक....

यह उपन्यास समर्पित है देश की निर्भायाओं के नाम. जाहिर है इस उपन्यास में लड़कियों के होस्टल, प्यार मोहब्बत की कहानी को यह सोशल एंगल का नया आयाम देता है. महानगरों में अकेली रहती लड़की के जीवन-संघर्ष की तरफ इशारा करता है. यही रविंदर सिंह की ताकत भी है कि उनके उपन्यासों में मनोरंजन के साथ-साथ उचित उपदेश का मर्म भी होता है. अधिक न सही लेकिन जरुरत भर तो होता ही है.

साल भर में भले डीयू के विद्यार्थी दो सेमेस्टर की पढ़ाई करते हों लेकिन उपन्यास तीन आये. हालाँकि यह सवाल तब भी रह ही जाता है कि क्या डीयू की कोई मुकम्मल कहानी आ पाई? वहां बाहर से पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के जीवन की कश्मकश, उनके संघर्ष में आ पाए? उपन्यास से इतनी उम्मीदें पालने का मौसम नहीं रहा. फिलहाल आप रविंदर सिंह के इस मूल अंग्रेजी उपन्यास का हिंदी अनुवाद पढ़िए. अनुवाद मेरा ही है और प्रकाशक पेंगुइन. कीमत 150 रुपये है.


प्रभात रंजन  

Sunday, November 23, 2014

रणदीप और नंदना की अधिक रवि वर्मा की कम बनी 'रंगरसिया'

100 करोड़ के टारगेट की वजह से आजकल ऐसी फ़िल्में कम आ पाती हैं जिनमें कंटेंट के स्तर पर कुछ कहने सुनने को हो. 'रंगरसिया' एक अलग फिल्म फिल्म साबित हुई. जब से आई है चर्चा में बनी हुई है. रंजीत देसाई के उपन्यास पर बनी केतन मेहता की इस फिल्म पर यह समीक्षा लिखी है युवा फिल्म लेखक सैयद एस. तौहीद ने. एक पढने लायक समीक्षा, फिल्म को समझने का एक और एंगल देती हुई- मॉडरेटर 
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राजा रवि वर्मा पर केतन मेहता की रंगरसिया आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हुई। मुख्यधारा से व्यस्क कहानियां आने का चलन सतही बातों से बच कर ही विमर्श का विषय बन सकता है। केतन की फिल्म सतही व कला में फर्क कर सकी? सिनेमाघर में जाकर महसूस हुआ कि फिल्मकार ने अधिक बेहतर लक्ष्य का अवसर खो दिया। केतन की यह परियोजना आरंभ से विवाद का विषय बनीफ्लोर पर जाने व अंतत: पूरा बनने दरम्यान सेंसरशिप सहन करना पडा। कभी कभार moral policing अधिक रिएक्ट कर विवाद खडा कर देती है? कंटेंट के हिसाब से केतन ने आजादी जरुर ली है। लेकिन कहना होगा कि महिला व कला दोनों समाज के सताए लोग हैं। रंगरसिया के साथ हुआ बर्ताव सही था? सवाल का जवाब फिल्म बेहतर दे सकेगी। राजा रवि वर्मा पर रंजीत देसाई की लिखी किताब फिल्म का आधार बनी। आधुनिक कला के पितामह कहे जाने वाले राजा रवि वर्मा की यह कहानी अतीत-वर्त्तमान के सर्कल से गुजरती है। एक जीवन यात्रा किस्म कीलेकिन बाजार की ओर झुकी प्रस्तुति। सत्यजित राय व श्याम बेनेगल राजा रवि वर्मा पर इस तरह फिल्म नहीं बनाते। कोशिशों के बावजूद रंगरसिया रणदीप व नंदना की होकर रहीराजा रवि की वर्मा कम।

केतन की फिल्म को नजर चाहिए क्योंकि नजरिया ही वस्तु का मूल्यांकन कर सकता है। रंगरसिया में अभिवयक्ति के एक से अधिक नजरिए नजर हैं। रणदीप का राजा रवि वर्मा की शक्ल में कला की खातिर संघर्ष एवं सामाजिक बदलाव का नजरिया।  कला की खातिर संघर्ष का नजरिया। किसी कलाकार की जीवनी का अनुभव रवि वर्मा की जीवन यात्रा में महसूस होगा। कहानी में इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया गया है। राजाओं के दरबार में कलाकार का ऊंचा मुकाम हुआ करता था। दक्ष कलाकारों की पहचान की एक नजर हुआ करती थी। चित्रकला को आवरण बना लेने वाले बालक रवि वर्मा की काबिलियत को राजा ने पहचाना था। रवि वर्मा को राजा की उपाधि से नवाजा गया। राजा ने रवि वर्मा को पुत्री का हांथ देकर घर का सदस्य बना लिया। महाराज के निधन उपरांत राजपाठ का अधिकारी राजकुमार हुआनए राजा के आ जाने से रवि वर्मा को पुराना तोहफा भूल जाना पडा। राजकुमारी को पति के चित्रकार किरदार से लगाव नहीं था। 

रवि वर्मा कलात्मक अभिवयक्ति के लिए मानव व समाज द्वारा निर्धारित बातों की परवाह नहीं किया करते थे। पत्नी की नाराजगी की वजह से उनमें बसा कलाकार कला की खोज के लिए बंबई चला आया। नंदना सेन की सुगंधा से चित्रकार की यहीं मुलाकात हुई। फिल्म राजा रवि वर्मा के सामानांतर उनकी कला प्रेरणा स्त्रियों की कहानी है  राजा रवि वर्मा ने कला को अभिव्यक्ति की बंदिशों से मुक्त करने की पहल ली थी। कला की साधना में कलाकार खुद को फना करने का फन जानता है। अनावश्यक अथवा अनचाही moral policing कलाकार की प्रतिभा को हताश कर दिया करती है। राजा रवि वर्मा पर फिल्म बनाने का निर्णय केतन को हताश कर गया ? काफी हद तक। लेकिन निराश नहीं हुए व संघर्ष जारी रखा। काफी अरसे से रूकी रंगरसिया के रिलीज में वो संघर्ष विजयी हुआ।

राजा रवि सरीखे फनकारों को समाज से बहुत अधिक सहयोग नहीं मिल सका। रवि वर्मा ने परवाह नहीं किया कि लोग क्या कहेंगे। सहयोग के रूप में प्रोत्साहन व संरक्षण की आशा फिर भी हर कलाकार रखता है। किसी न किसी वजह से आदमी जिंदगी से ज्यादा की उम्मीद रखता है। समय से आगे की सोंच को नजरिए में कमी वजह से हमेशा उचित स्वीकृति नहीं मिलती। राजा रवि वर्मा कला को अपने समय से आगे ले गए। उस जमाने में चित्रकारी के लिए आयल कलर का इस्तेमाल चलन से जुदा था। आपकी कला में ग्लोबल तत्व समाहित थे। कलाकार कृति का सृजन उसे महान बनाने के उददेश्य से नहीं करता। काम को जुनूं  से आगे ले जाने फन लेकिन उसे खूब आता है। महान रचनाएं महान समर्पण की चाह रखती हैं। कलाकार समाज से लिया हुआ हर कीमती लम्हा दूसरे अंदाज में वापस कर देने में सक्षम होता है। राजा रवि वर्मा को समाज से इस मायने में सहयोग नहीं मिला कि धर्म का नुकसान किया था। धर्म व आस्था का दामन पर कूची से चित्र उकेरने लिए आप पर मुकदमा चला। पूज्य देवियों की तस्वीर बनाने के लिए आपने जिसका सहयोग लियावो समाज के अछुत तबके की थी। धर्म वालों की नजर में एक नाकाबिले कुबूल अभिव्यक्ति रही होगी। चित्रकार को यदि यह प्रेरणाएं नहीं मिली होती वो औरतों को खोया सम्मान लौटा पाता? महिलाओं के देवी तस्व्वुर करने की एक उदाहरण यह था। 

देवदासी प्रथा से दलित महिलाओं का नुकसान हुआ। देवदासियों के हितों की दृष्टि से रवि वर्मा का साहस सराहनीय था। कला समाज द्वारा बनाए गए अस्वीकार्य बातों के विरुध अधिक मुखर बन गयी।  रचना की प्रेरणा कलाकार को किसी भी सामान्य अथवा असामान्य बात से मिल सकती है। अभिव्यक्ति कलात्मक नजरिया तलाश लिया करती है। साधना उपरांत कला कलात्मकता का मुकाम पा लेती है। राजा रवि वर्मा ने साधना के माध्यम से सुगंधा में आदर्श देवियों का रूप देख लिया। रंगरसिया की नग्नता फूहडता को स्पर्श कर जाती तो आज की शक्ल नहीं अख्तियार कर पाती। एक चित्रकार रंगों से अधिक प्रेरणाओं से इश्क होना चाहिए। रंगरसिया में कलाकार की रचनात्मक एवं प्राकृतिक स्थिति बयान हुई है। समाज संस्कृति एवं अभिव्यक्ति बीच संवाद की स्थिति हमेशा तालमेल तक ही सीमित नहीं रहती। कला में vulgar की परिभाषा क्या?  प्रकृति व संस्कृति बीच मतभेद अथवा कुछ दूसरा?  राजा रवि वर्मा ने जवाब दिया तस्वीरों में।

राजा रवि वर्मा ने समय एवं समाज से संघर्ष करते हुए मिथक चरित्रों को चित्र में ढाला। वेद पुराण में उपस्थित प्रेरणाओं को लोगों के सामने लाया। देवियों की गाथाओं ने आपको रचना के लिए प्रोत्साहित किया। सुगंधा के संपर्क में आने उपरांत उन रचनाओं के जीवंत होने का समय था। सुगंधा की सुदरता से गुजर कर चित्रकार सौंदर्यबोध तक पहुंच सका। कला की मंशा वही थीराजा रवि वर्मा ने सुगंधा के जरिए समाज के एक तबके को इज्जत भी दी। आपके विरुद्ध चलाया गया मुकदमा तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। मुकदमे में कला की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर जोरदार बहस चलीसमाज को ऊंच नीच में बांटने से नुकसान ज्यादा होता है। कला को नुकसान होता है। एक पीरियड फिल्म के रूप में रंगरसिया इतिहास का कोना है। राजा रवि वर्मा ने जिस शिद्दत से चित्रकारी जरिए पुराण व मिथक कहानियों को जिंदा कियाउसी तर्ज पर केतन मेहता ने अतीत को परदे पर उतारा। बढिया पीरियड फिल्म दरअसल इतिहास व संस्कृति का पुनर्सृजन लगनी चाहिए। फील के हिसाब से रंगरसिया इसमें सफल नजर आईचित्रकार के जीवन से प्रेरित कर्म रंगों से भरी दुनिया की कामना रखता है। सवाल में घिरा हुआ हूं कि सचमुच रंगरसिया एक ईमानदार प्रयास थीरंगों के सामयिक इस्तेमाल में फिल्मकार हद तक कामयाब रहे हैं। रंगरसिया वो बहुरंगी पिचकारीजिसमें कामना रखने वाले को हर रंग मिलेगा। मर्यादा तय आप को करनी है। राजा रवि वर्मा की उत्सुकता अथवा कंटेंट की उत्सुकता में सिनेमाघर जा रहे हैं?
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passion4pearl@gmail.com





Saturday, November 22, 2014

क्या है जर्मन-संस्कृत विवाद?

केन्द्रीय सेवाओं में हिंदी के उचित महत्व के मुद्दे पर प्रेमपाल शर्मा के तर्कों के हम सब कायल रहे हैं. केन्द्रीय विद्यालयों में जब जर्मन भाषा के स्थान पर संस्कृत पढ़ाने का मसला आया तो यह जरूरी लगा कि त्रिभाषा फ़ॉर्मूला और विदेशी भाषाओं के सन्दर्भ को समझा जाए. देखिये, कितने विद्वत्तापूर्ण ढंग से प्रेमपाल जी ने भारतीय भाषाओं के पक्ष इमं अपने तर्कों को रखा है. मैं भारतीय भाषा के इस कमांडर को सलाम करता हूँ. आप यह लेख पढ़िए- प्रभात रंजन 
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      केन्‍द्रीय विद्यालयों में मौजूदा जर्मन भाषा की जगह संस्‍कृत पढ़ाए जाने का विवाद तूल पकड़ता जा रहा है। देश की मौजूदा भाषा और शिक्षा नीति के संदर्भ में यह अच्‍छा ही हुआ क्‍योंकि इससे कई सबक सीखे जा सकते हैं। पूरे विमर्श में सत्‍ता, संस्‍कृति और समाज की कई दरारें भी झॉंकती हैं। देश में लगभग ग्‍यारह सौ केन्‍द्रीय विद्यालय हैं जि‍समें अस्‍सी हजार छात्र पढ़ते हैं। इनमें से सत्‍तर हजार  तीसरी भाषा के रूप में छठी से आठवीं तक जर्मन भाषा पढ़ रहे हैं। जर्मन पढ़ाने का फैसला 2011 में हुआ था। यह क्‍यों और किन परिस्थितियों में हुआ इसके लिए एक समिति का गठन किया गया है।  लेकिन क्‍या ऐसे फैसले हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था में उस राष्‍ट्रीय भाषा नीति के खिलाफ नहीं है जिसकी सिफारिश पहली बार कोठारी आयोग ने 1964-66 की अपनी रिपोर्ट में की थी और इसे फिर 1986 की शिक्षा नीति और 2005 की शिक्षा नीति में भी दोहराया गया। जाने मानेशिक्षाविद, वैज्ञानिक, प्रशासक डॉ. दौलतसिंह कोठारी ने उपशीर्षक नयी भाषा नीति में त्रिभाषा सूत्र की सिफारिश की थी । यानि एक मातृभाषा दूसरी अंग्रेजी जो बाकी दुनिया से जुड़ने का माध्‍यम और तीसरी कोई और प्रादेशिक भाषा जैसे उत्‍तर भारत के लिए कोई दक्षिण की और दक्षिण के लिए हिन्‍दी। अपनी सिफारिश में उन्‍होंने यह भी कहा था कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सम्‍पर्क भाषा के रूप में हिंदी को बढ़ावा दिया जाए तथा गैर-हिंदी क्षेत्रों में हिंदी हो जिससे कि‍ भारत की सभी राष्‍ट्रीय भाषाएं परस्‍पर नजदीक आएं।

फिर किन कारणों से त्रिभाषा सूत्र में दो विदेशी भाषाएं अंग्रेजी और जर्मनी आ गई? और जब तीन वर्ष का अनुबंध सितंबर 2014 में समाप्‍त हो रहा है तो इतना बवाल क्‍यों? दूसरी दरार उस मध्‍यवर्गीय मानसिकता की । केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ने वाले ज्‍यादातर बच्‍चे उन सरकारी कर्मचारियों के होते हैं जिनका जगह-जगह स्‍थानांतरण होता है। ये अमीर वर्ग तो नहीं लेकिन देश की मौजूदा गरीबी को देखते हुए अच्‍छा खासा खाया-पीया है। यही कारण है कि‍ इनमें से नब्‍बे प्रतिशत ने भारतीय भाषाएं सीखने के बजाए अंग्रेजी के साथ-साथ जर्मनी सीखना शुरू किया। इसके कुछ कारण यह भी हो सकते हैं कि जर्मनी, जापानी या दूसरी भाषाओं में लोकप्रिय और संख्‍या बढ़ाने के प्रयोजन से नंबर खूब लुटाए जाते हैं। कुछ नंबरों की होड़ और उसके बाद आसानी से विदेश भागने की दौड़ का लालच बच्‍चों की मानसिकता पर ऐसा असर डाल रहा है कि उनके लिये न ये देश ठीक, न इसकी भाषा। दुहाई तो यह वर्ग धर्म, संस्‍कृति के नाम पर संस्‍कृ‍त, पाली सबकी देता है लेकिन खुशामद कर करके दुतकारे जाने पर भी दाखिला अंग्रेजी स्‍कूलों में ही लेता है। सत्‍ता भी प्रकारांतर से इसमें मदद करती है। जिस सरकार ने 2011 में संघ लोक सेवा परीक्षा की सिविल सेवा परीक्षा के सीसैट में भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी लाद दी उसी ने न जाने किन प्रलोभनों में केंद्रीय विद्यालयों में जर्मनी की शुरूआत करा दी। आश्‍चर्य की बात कि इसकी किसी को कानो कान भनक भी नहीं पड़ी । हो सकता है यदि इसकी जगह संस्‍कृ‍त या दूसरी देसी भाषा अनिवार्य की जाती तो शायद देश में कोहराम मच जाता। यह है हमारे बुद्धिजीवी विमर्श की एक और दरार।

महात्‍मा गांधी, रवीन्‍द्र नाथ टेगौर से लेकर दुनियाभर के शिक्षाविद शिक्षा और समझ के लिए अपनी भाषाओं की वकालत करती रहे हैं। ऐसा नहीं कि वे विदेशी भाषाओं के खिलाफ थे। गांधी जी का कहना था कि विदेशी भाषा एक खिड़की की तरह है और ज्ञान जहां से भी आ सकता हो उसे आने देना चाहिए। ज्ञान और समझ के बारे में सभी इस बात से सहमत हैं कि जितनी भाषाएं हैं उतने ही विस्‍तृत ज्ञान। इसलिये अंग्रेजी या जर्मनी सीखना कोई गलत नहीं गलत है उसका असमय बच्‍चों पर लाद देना। प्रोफेसर यशपाल ने 1992 में बस्‍ते के बोझ की अपनी प्रसिद्ध रिपोर्ट में किताबों और परीक्षा के दबाव की बात कही थी। उसमें भी यदि देखा जाए तो जितना वजन अंग्रेजी सीखाने का होता है जिसकी वजह से अधिकांश बच्‍चे स्‍कूल छोड़ देते हैं उतना किसी और विषय का नहीं। कम से कम हिंदी पट्टी के राज्‍यों के सर्वेक्षणों से यह बात बार-बार जाहिर होती है कि अंग्रेजी सीखना उसके लिए कितना मुश्किल, समझ विरोधी है। अब इसमें एक और जर्मनी भाषा भी लाद दी जाए तो आप समझ सकते हैं बस्‍ते का वजन कितना बढ़ जाएगा।

एक और महत्‍वपूर्ण पक्ष भाषा की उपयोगिता और बच्‍चे के विकास का है। क्या सिर्फ नंबरों की होड़ के लिए संस्‍कृत अथवा जर्मनी पढ़ी जाए? या क्‍या इसकी रोजाना की जिंदगी में भी कोई प्रासंगिकता है? इस कसौटी पर दोनों ही भाषाएं भारतीय संदर्भ में बहुत कमजोर लगती हैं। भाषा हम समाज से सीखते हैं और वही समाज उसके विकास में सहायक होता है। किसी पाठ्यक्रम के तहत 2-4 साल नंबरों की खातिर पढ़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। आप जर्मनी, रूसी या जापानी किसी अंतर्राष्‍ट्रीय समझौते के तहत पढ़ते भी हैं लेकिन यदि उसका उपयोग नहीं कर पाते तो उसे भूलने में भी देर नहीं लगती। यही बात संस्‍कृत के साथ है। बहुत समृद्ध भाषा है और भारतीय भाषाओं का मूल आधार भी। लेकिन रोजाना की जिंदगी में शायद ही आपको कोई संस्‍कृत बोलता नजर आए। बावजूद इसके संस्‍कृत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। क्‍योंकि संस्‍कृत यदि पढ़ाई गई तो भविष्‍य में देश की सभी भाषाओं के साथ जुड़ने का आधार बनता है।

पूर्व केबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रमणियन ने अपनी नयी किताब द टर्निंग प्‍वाइंट में स्‍कूल के दिन में लिखा है कि शुरू की शिक्षा बांग्‍ला भाषा में हुई और फिर माध्‍यमिक शिक्षा में संस्‍कृत पर जोर रहा। कॉलिज स्‍तर पर अंग्रेजी माध्‍यम । इस पृष्‍ठभूमि में जब उन्होंने उत्‍तर प्रदेश में एक आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में काम किया तो हिंदी सीखने में उन्‍हें कोई परेशानी नहीं हुई। हिंदी के इसी सम्‍पर्क भाषा की कल्‍पना तो हमारे संविधानविदों महात्‍मा गांधी, अम्‍बेडकर, जवाहर लाल नेहरू, राजगोपालाचार्य ने की थी। यानि संस्‍कृत समेत भारतीय भाषाओं को इस ढंग से आगे बढ़ाया जाए कि पूरे देश के लिए अंग्रेजी के कुछ दशकों के बाद हिंदी को सम्‍पर्क भाषा के रूप में अपना लें लेकिन ऐसा सपना लगातार बिखरता गया। रही बात संस्‍कृत और जर्मन के बीच आर्य जाति, स्‍वास्तिक जैसे अवांतर संबंधों को खोजने की तो वक्‍त आ गया है कि आधुनिक समाज किसी ऐसे भावनात्‍मक तर्कों से नहीं चलाया जा सकता। दस बीस ऐसे समान शब्‍द तो दुनिया की हर भाषा में खोजे जा सकते हैं। इसलिये न जर्मन की चिंता में पतले होने की जरूरत न संस्‍कृत के। हिंदी या हिंदुस्‍तानी को समृद्ध करने की जरूरत है और मौजूदा प्रधानमंत्री के कामों से यह स्‍पष्‍ट भी है। जर्मनी, जापानी, चीनी के विभाग विश्‍वविद्यालयों में हों, स्‍कूली पाठ्यक्रम में नहीं। यहां तक कि अंग्रेजी भी धीरे-धीरे विदा होनी चाहिए। बोध धर्म भारत में पैदा हुआ लेकिन क्‍या हमें चीन के साथ संबंधों में कोई मदद कर पा रहा है? या एक ही विरासत पाकिस्‍तान से सतत तनाव को कम कर पा रही है? नये राजनयिक संबंधों का आधार नये आर्थिक सांस्‍कृतिक समीकरण ज्‍यादा है अतीत की बातें नहीं। यदि ऐसा होता तो जिस संस्‍कृत भाषा में जर्मन रेडि़यो 2003 तक खबरें प्रसारित करता था वे आज तक क्‍यों बंद हैं? एक और भी विचाराधीन प्रश्‍न है कि यदि कल जापान, चीन या फ्रांस भी अपनी भाषाओं को भारतीय स्‍कूलों में पढ़ाए जाने के लिए जिद करे तो क्‍या यह हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था और बच्‍चों के साथ अन्‍याय नहीं होगा?

भारतीय संदर्भ में एक महत्‍वपूर्ण सबक सीखने की जरूरत यह है कि अपनी भाषा और संस्‍कृति के लिए यूरोप का एक देश जर्मन जिस स्‍तर पर संवाद, विमर्श में पूरी ताकत झौंक रहा है क्‍या भारत ने भी कभी भारतीय भाषाओं के लिए इस स्‍तर पर आवाज उठाई? भारत में भी। भारत में तो और उल्‍टा हो रहा है। भारतीय भाषाएं न शिक्षा में बची हैं न नौ‍करियों में। यहां तक कि सरेआम स्‍कूल उन छात्रों को दंड देते हैं जो भारतीय भाषाएं बोलते हैं। सच्‍चे लोकतंत्र के नाते नयी सरकार से इस देश के हर नागरिक को अपेक्षा है ‍कि भारतीय भाषाओं के अध्‍ययन अध्‍यापन पर वैसा ही ध्‍यान दे जैसे जर्मन जर्मनी के लिए और अमेरिका, इंग्‍लैंड अंग्रेजी के लिए दे रहे हैं।