Friday, November 28, 2014

सिनेमा में करुण रस क्या होता है?

युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर इन दिनों रस सिद्धांत के आधार पर विश्व सिनेमा के अध्ययन में लगे हैं. उनका यह लेख इस बात को लेकर है कि करुण रस दुनिया भर की फिल्मों में किस तरह अभिव्यक्त हुआ है. अंतर्पाठीयता का एक बेजोड़ उदाहरण- मॉडरेटर.
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इस लेखमाला में अब तक आपने पढ़ा:
1.                  हिन्दी फिल्मों का सौंदर्यशास्त्र - http://www.jankipul.com/2014/06/blog-post_7.html
2.                  भारतीय दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र - http://www.jankipul.com/2014/07/blog-post_89.html
3.                  भयावह फिल्मों का अनूठा संसार - http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_8.html
4.                  वीभत्स रस और विश्व सिनेमा - http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_20.html
5.                  विस्मय और चमत्कार : विश्व सिनेमा में अद्भुत रस की फिल्में - http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_29.html
6.                  विश्व सिनेमा में वीर रस की फिल्में - (भाग- ) http://www.jankipul.com/2014/09/blog-post_24.html,
7.                  विश्व सिनेमा में वीर रस की फिल्में -(भाग २) : http://www.jankipul.com/2014/10/blog-post_20.html
8.                  शोक, पीड़ा, और कर्त्तव्य: विश्व सिनेमा में करूण रस की फिल्में (भाग- ) : http://www.jankipul.com/2014/11/blog-post_12.html
भारतीय शास्त्रीय सौंदर्यशास्त्र के दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का परिचय कराती इस लेखमाला की नौवीं कड़ी में कारूण्य रस की विश्व की महान फिल्में -
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शोक, पीड़ा, और कर्त्तव्य: विश्व सिनेमा में करूण रस की फिल्में (भाग- २)


(पिछले अंक से आगे ...)

धन का नाश होना शोक का कारण है। किन्तु प्रश्न यह उठता है कि धन क्या है। कितना खो जाना शोक का कारण हो जाता है? इस संदर्भ में संस्कृत सुभाषितानि का एक श्लोक है:
सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्मर्धं त्यजति पण्डित:
अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशो हि दु:सह:
अर्थात् जब सर्वनाश निकट आता है, तब बुद्धिमान मनुष्य अपने पास जो कुछ है उसका आधा गँवाने की तैयारी रखता है। आधे से भी काम चलाया जा सकता है, परंतु सब कुछ गँवाना बहुत दु:खदायक होता है।
फिल्म इतिहास में Bicycle Thieves (Ladri di biciclette – 1948) अक्सर दुनिया की महानतम फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म में इटालियन नियो-रियलिज्म को पुख्ता किया। यह कहानी है द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बेरोजगार आदमी की जिसे सरकार की तरफ से नौकरी मिलती है फिल्मों के पोस्टर लगाने की। यह नौकरी उसके दो बच्चों, बीवी और खुद का पेट पालने के लिये बहुत जरूरी है, लेकिन अड़चन ये है कि उसके पास एक साइकिल नहीं है। घर के चादर बेच कर मियाँ बीवी एक पुरानी साइकिल खरीदते हैं। जब बाप-बेटे काम पर जाते हैं, तब थोड़ी ही देर में उनकी साइकिल चोरी हो जाती है। पूरी फिल्म में, गरीब आदमी की एकमात्र पूँजी और जीने का सहारा, एक पुरानी साइकिल की खोज के बारे में है। मुझे आज भी याद है कि जब पहली बार ये फिल्म हमारे हॉस्टल में फिल्म सोसाइटी ने दिखायी थी, एक ऐसा लड़का न था जो फिल्म के आखिरी दृश्य को देख कर रो नहीं रहा था। मैं ये कहना चाहूँगा कि साधन रहते हुये, जिसने यह फिल्म नहीं देखी है, या तुरंत देखने की ललक नही रखता वह सिनेमा का प्रेमी नहीं हो सकता। Vittorio De Sica (1901- 1974)  की ही अगली फिल्म Umberto D. (1951) एक बूढे आदमी और कुत्ते के घर से बेदखल होने जाने की करूण कहानी है। यह फिल्म बर्गमैन की पसंदीदा फिल्मों में एक थी।
महान स्पेनी निर्देशक Luis Buñuel (1900- 1983) की मेक्सिकन फिल्म Los Olvidados (1950) कई महान लेखकों (जैसे कि नोबल पुरस्कार विजेता मारियो वर्गास लोसा) की पसंदीदा फिल्म है । ये गरीब लड़कों की दुष्टता, एक अंधे भिखारी की पिटाई और उसके शैतानियों का ऐसा चित्रण किया जैसा कि आमतौर पर देखने को मिलता है, जिसे हम वास्तविकता का नाम देते हैं। इस फिल्में में अनैतिकता, छोटी पूँजी का नाश, मृत्यु- हर तरह का शोक मौजूद है। गरीब और अनाथ होने के साथ जो कई तरह की बुराईयाँ साथ आ जाती हैं, उनका ये बेजोड़ चित्रण है। लुइस बुनुएल की महान फिल्मों के साथ यह समस्या रही है कि उनकी महान फिल्में जैसे कि Viridiana (1961), Tristana (1970), The Discreet Charm of the Bourgeoisie (1972), The Phantom of Liberty (1974), That Obscure Object of Desire (1977) - किसी एक प्रमुख रस पर आधारित न हो कर कई सारे भावों और रसों का समन्वय हुआ करती हैं। मेरा मानना है कि लुइस बुनुएल फिल्मों के माध्यम से अपने विचार रखने में, लोगों को कला के दम पर सोचने पर मजबूर करने में ज्यादा दिलचस्पी रखते थे। उनके लिये अनुभूति आवश्यक तो थी पर उत्पन्न अनुभूति यह चाहती थी कि बुद्धि संदेश जल्दी से जल्दी ग्रहण करे। फिल्मों में जितनी विविधता बुनुएल ने अपने लम्बे कैरियर में दी, उतनी विशाल और महान विविधता शायद ही किसी और निर्देशक ने दी है। उन्होंने कभी अपने फिल्मों का प्रचार प्रसार नहीं किया। कभी उसकी महत्ता नहीं समझायी। जब उन्हें अॉस्कर अवार्ड लेने के लिये बहुत दबाव डाला गया तो अपने अंदाज में उन्होंने बड़े धूप के चश्में पहने, औऱ एक विग लगा कर अवार्ड स्वीकार किया।

फेडरिको फेलिनी (1920-1933), जिन्होंने कैरियर के शुरूआत में रॉबर्टो रोसेलिनी के सहायक के रूप में की, बाद में दुनिया के महान निर्देशकों में एक कहलाये। फिल्म 8 1/2(1963) इनके कैरियर की महान फिल्म थी जो उनके काम के बीच में भी गहरा विभाजन करती है। इससे पहले की महान फिल्में जैसे कि I Vitelloni (1953), La Strada (1954),  Nights of Cabiria (1957), La Dolce Vita (1960) जो कि समाज की विसंगतियाँ और करूण कहानियाँ थी, और कैरियर के दूसरे भाग में उन्होंने Satyricon (1969), Amarcord (1974), जैसी फिल्में बनायीं जिसमें स्वप्न जैसे दृश्य, स्मृतियाँ, संगीत, समारोह प्रमुख होते गये। कैरियर के अंत में उनका सम्मान बहुत हद तक कम गया। जिस तरह लोग देव आनंद साहेब की बेकार फिल्मों को भी केवल आदर दे कर नजरअंदाज कर देते थे, कुछ-कुछ उसी तरह उनकी बाद की फिल्मों को लोगों ने नजरअंदाज करने लगे थे।
इनकी दो फिल्में La Strada (1954) और Nights of Cabiria (1957) करूण रस की दृष्टि से महान फिल्में हैं। ये दोनों ही फिल्में नायिका प्रधान हैं जिसमें फेलिनी की पत्नी Giulietta Masina ने अभिनय किया था। दोनों फिल्मों को विदेशी फिल्मों के लिये ऑस्कर अवार्ड मिला था। फिल्म Nights of Cabiria (1957) ही वो फिल्म थी जिसने महबूब खान की मदर इंडिया को एक वोट से ऑस्कर अवार्ड मिलने से रोक दिया था। इस फिल्म के लिये जिउलिटा मसीना को कान फिल्म फेस्टिवम में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब मिला था। नीना रोटा के करूण संगीत से सजी दोनों फिल्म असहाय और गरीब औरत की कहानी है। फिल्म La Strada में नगर-नगर घूम के तमाशा दिखा कर पैसे कमाने वाला बलशाली आदमी 'जम्पानो' एक बेहद गरीब औरत से उसकी जवान बेटी खरीद लेता है, जिसकी बड़ी बहन उसकी पहली पत्नी थी, जो किसी तरह मर गयी थी। रोती हुयी गरीब औरत अपनी बेटी 'जेल्सोमिना'को बेचते हुये कहती है कि इससे उसे एक कम आदमी के लिये खाना बनाना पड़ेगा। ये गरीब लड़की मार खा कर तमाशा करना सीखती है, लेकिन चोरी बेईमानी, खून खराबे से दूर रहना चाहती है। ठीक इससे उलट स्वाभाव के अपने दुष्ट जीजा को अपना मर्द मानने लगती है। फिल्म में 'नीना रोटा' का संगीत अविस्मरणीय है। इस फिल्म को बनाते हुये आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुये फेलिनी का नर्वस ब्रेकडाउन हो गया था। शुरू में इस फिल्म को आलोचकों ने बकवास करार दिया। आज इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों मे गिना जाता है। फिल्म की नायिका मसीना को दुनिया के कोने-कोने से हजारों ऐसी बेसहारा औरतों के खत मिलें जिसमें लिखा था कि उनके मर्द जो उन्हें छोड़ गये थे, इस फिल्म को देख कर वापस लौट आये। सिनेमा के ऐसे चमत्कार का लेखा-जोखा कौन रखता है? लोग को सच्चाई का रास्ता दिखाना कला की सबसे बड़ी ताकत है। फिल्म Nights of Cabiria द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एक वेश्या 'कैबिरिया' की कहानी है, जिसके कमाये पैसे उसके पुरूष दोस्त चोरी कर के उसे मरने के लिये छोड़ देना चाहते हैं। भोली भाली, और दिल की बेहद अच्छी कैबिरिया का इस्तेमाल एक जादूगर अपने शो में करता है, जब वो उसे सम्मोहित कर के दुनिया के सामने उसकी भावनाओं का मजाक उड़ाता है कि वो भी किसी प्रेम करना चाहती है, घर बसाना चाहती है। लोग कैबिरिया पर हँसते हैं मानों कि किसी वेश्या को सपने देने का कोई हक नहीं, कोई चाहत रखने का हक नहीं। रातों को घूमते हुये कैबिरिया की मुलाकात शमशान के पास जमीन के खोह में रहने वाली बूढी फटेहाल वेश्याओं से भी होता है जिनके पास कभी ढाई किलो का सोना हुआ करता था, औऱ जो अब दो वक्त के रोटी के लिये भी किसी की दया पर निर्भर हैं। दोनों फिल्में अपने महान अंत के दृश्यों के लिये याद की जाती है।
अमेरिकी निर्देशक Elia Kazan (1909- 2003) की प्रसिद्ध नाटक के नाम पर ही बनी फिल्म A Street Car Named Desire (1951) में एक शराब की लत की मारी युवावस्था की ढलान पर खोयी सी 'ब्लैंच' को घोर गरीबी में अपनी बहन और उसके पति के घर शरण लेनी पड़ती है। दिखावटी अमीरी में वह कई अपमान को सहती रहती है। फिल्म के अंत में नर्वस ब्रेकडाउन के बाद जब अधिकारी उसे लेने आते हैं, तब पगलायी सी 'ब्लैंच' दयालु अधिकारी के बढ़ाये हुये हाथ को थाम कर कहती है - आप जो भी हैं, मैं हमेशा अजनबियों के दया पर निर्भर रही हूँ।" यह शोक है, करूणा है, विषाद का प्रलाप है कि धनहीन अवस्था में कैसी दयनीय हालत हो जाती है। वूडी एलेन की बहुचर्चित फिल्म Blue jasmine (2013) की ठीक ऐसी ही कहानी थी।
बिली वाइल्डर की फिल्म Sunset Boulevard (1950) में मूक फिल्मों के ज़माने की एक अभिनेत्री का जीवन है, जो फिल्मों से रिटायर हो चुकी है और अब वापस हॉलीवुड में बतौर अभिनेत्री आना चाहती है। किसी सफल अभिनेत्री के यश छीन जाने के बाद उसकी लालसा का इसमें करुण चित्रण है. इस फिल्म का अंत भी बेहद मार्मिक और अविस्मरणीय है।
कल्पना कीजिये कोई धरती के सबसे बड़े भूभाग का राजा हो, सम्राट हो, औऱ उसकी सारी जायदाद छीन कर उसे जेल में डाल दिया जाये। जेल से छूटने पर जिसे माली का काम करना पड़े, जिसके इशारे पे कई लोगों के सर कलम हो सकते थे। ऐसी कहानी थी इटालवी निर्देशक Bernando Bertullocci (जन्म 1941) की महान फिल्म The Last Emperor (1987), जिसे नौ ऑस्कर पुरस्कार मिले थे। चीन के आखिरी सम्राट पुयी Aisin-Gioro Puyi (1906- 1967) के जीवन पर आधारित फिल्म उनके जीवन से चीन के इतिहास पर सरसरी निगाह दौड़ाती है। धन का चला जाना, शक्ति का चला जाना, इन सब कारणों से सम्राट का मानवीय चित्रण सहज करूणा का कारण बन जाता है।
मृत्यु का शोक पीड़ादायक व अस्तित्व को हिला देने वाला अनुभव होता है। मृत्यु को जीवन का सत्य समझ कर मन में कई तरह के दार्शनिक विचार उत्पन्न होते रहते हैं। किसी प्रियजन की मृत्यु की कल्पना भी कष्टकर होती है। लेकिन सच्चाई से मुख नहीं मोड़ा जा सकता कि जो संसार में आया है सब को जाना पड़ता है। बहुधा ऐसे शोक का आशय असमय मृत्यु से होता है। जीवन का शतक वर्ष बीत जाने के बाद समृद्ध जीवन का शोक नहीं उत्सव मनाया जाता है, पर ऐसी बहुत कम ही लोग हो पाते हैं जो सुखी समृद्ध जीवन जीवन गुजारे। असमय मृत्यु कई कारणों से हो सकती है, जैसे कि युद्ध, व्याधि, प्रसव, हत्या, आकस्मिक दुर्घटना, आत्महत्या, प्राकृतिक आपदा आदि। इन सबों के लिए शोक होता है।
हमनाम उपन्यास पर आधारित All Quiet on the Western Front (1930) युद्ध पर शोक बनी बहुचर्चित और पुरस्कृत फिल्म है। फिल्म के शुरुआत में एक विद्यालय के शिक्षक के जोश दिलाने से कुछ छात्र सैनिक बन जाते हैं। लेकिन जब युद्धक्षेत्र की विभीषिका से सामना होता है, एक के बाद एक संगी साथी मरते जाते हैं, या उनके अंग भंग हो जाते हैं। फिल्म के अंतिम दृश्य में किशोर सैनिक सीमा पर एक तितली पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाता है दुश्मन की गोलियों से मारा जाता है।
जब फ्रांसिसी निर्देशक रेन्वा की बंगाल की पृष्ठभूमि पर आधारित अपनी बहुत ही सुन्दर फिल्म The River (1951) बना रहे थे, सत्यजित राय ने उनसे मुलाकात की थी। उनसे प्रेरित हो कर जब सत्यजित राय ने बिभूतिबिभूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास पर Pather Panchali (1955) बना रहे थे, उन्होंने फिल्म बनाने के लिए अपनी पत्नी के गहने तक गिरवी रख दिए। फिर भी काम नहीं बना तो बंगाल की सरकार ने पथ निर्माण विभाग के नाम से उन्होंने पैसे मुहैय्या करवाया। सत्यजित राय रस सिद्धांत के प्रतिबद्ध थे, और उनकी पहली फिल्म ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया। अपु और उसकी बहन का ट्रेन देखने का दृश्य हो, उनकी दादी के मरने का दृश्य, बेहद गरीबी, दुर्गा की मृत्यु पर माँ-बाप का करुण रुदन और अपु का बारिश में भीगना, घर छोड़ के कहीं और जाने का दृश्य, कुल मिला कर यह फिल्म कारुण्य रस की जटिलता को दिखलाने वाली अनुपम कृति है। फिल्म अपराजितो Aparajito (1956) और  अपूर संसार Apur Sansar ( 1959) में भी कारुण्य रस ही मुखर होता है। यही करुण रस के विभाव और अनुभाव बंगाल के अकाल पर बनी उनकी फिल्म आशानी शंकेत Ashani Sanket (1973), अरण्येर दिन रात्रि Aranyer Din Ratri (1969) में बार-बार उभरते हैं।
फ़िल्मकार ऋत्विक घटक की तीन महान फिल्में मेघे ढाका तारा  Meghe Dhaka Tara (1960), कोमल गांधार Komal Gandhar (1961), सुबर्णरेखा Subarnrekha (1963)- बंगाल विभाजन की त्रासदी पर बनी फिल्में हैं, जिनके चरित्र अपने निवास स्थान से उजड़े हुए कहीं और शरणार्थी बन गए हैं। बिना विभाजन की चर्चा किये, इन फिल्मों में त्याग, मृत्यु, हत्या, उभर कर आते रहे हैं। इन फिल्मों का अंत बहुत ही मार्मिक और बंगाल सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर है। मेघे ढाका तारा में एक बड़ी बहन अपने माँ, बाप, भाई, बहनों का नौकरी कर के खर्च उठाती है। सारी ज्यादतियाँ सहते हुए अंत में खुद टीबी का शिकार हो कर मृतप्राय हो जाती है। सुबर्णरेखा फिल्म के अंत में आर्थिक कठिनाई से जूझती औरत वेश्यावृत्ति में प्रवेश करती है तो उसका पहला ग्राहक नशे में धुत्त उसका भाई होता है। इस स्थिति में बहन अपनी गर्दन काट कर आत्महत्या कर लेती है। इस दृश्य का विभाव, अनुभाव, छाया संयोजन, संगीत आदि अनुपम बन पड़े हैं।
सत्यजित रायऔर ऋत्विक घटकजितना सम्मान किसी और भारतीय निर्देशक को आज तक नहीं मिला है। यहाँ ध्यान देने वाली कई बातें हैं इन दोनों में संगीत की अद्भुत समझ थी। दोनों ही महान लेखक भी थी। (ऋत्विक घटक ने मधुमती की कहानी भी लिखी थी) फिल्म के कथानकों पर उनकी गहरी पकड़ रही (सत्यजित राय ने अपनी सभी फिल्मों का कथानक खुद लिखा था), पर केवल कथानक तो वे कभी सीमित नहीं रहे, बल्कि सुन्दर दृश्य का संयोजन, फिल्मांकन, कैमरे पर पकड़, दृष्टि का अभूतपूर्व नयापन बहुत ही कम लोगों में` हुआ है। फिल्म को तकनीक से ऊपर उठा कर, व्यवसाय से ऊपर उठा कर, कला मान कर, पवित्र समझ कर, अनुभूति पर जोर देते हुए, पारंपरिक सिद्धांतों को समझ कर, अपने समय को समझ कर, विदेशी कलाकारों का यथोचित सम्मान देते हुए, उन्होंने अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया। कार्यकुशलता में नवीनता, अपनी समझ, विश्वदृष्टि बाकी चीजों से कहीं बढ़ कर है जैसे कि किसी क्रिया में सिद्धहस्त होना, और सफलता के साधारण मानकों (जैसे कि व्यवसाय) पर खरा उतरना।
महान रूसी निर्देशक आंद्रे तारकोवस्की Andrei Tarkovsky (1932- 1986) की Ivan's Childhood (1961) में युद्ध के दौरान एक बच्चे का छीन लिए बचपन की त्रासदी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। अपनी स्वप्न जैसे चित्रों के छायांकन से कई बार न कहा जा सकने वाला शोक उन्होंने बखूबी दिखाया है। उनकी इतालवी फिल्म में Nostalaghia (1983) अपने देश से बिछुड़े एक लेखक की मुलाकात एक विचित्र आदमी से होती है जिसने दुनिया के डर से अपने घर में बीवी बच्चों को कैद कर रखा था। जब सात साल बाद पुलिस उसके घर में उसके बच्चों को आज़ाद करने आते हैं तो बच्चे आवारा चूहों की तरह घर से निकलते हैं। यही विचित्र आदमी बीथोवन की नौवी सिम्फनी पर विश्व बंधुत्व पर भाषण देता हुआ खुद को आग लगा कर मर जाता है। फिल्म के अंत कुत्तों के भूँकने का दृश्य, बहुत से स्वप्निल दृश्यों से गुजरते नायक की मृत्यु से उत्पन्न कारुण्य रस साधारण मृत्यु और शोक से कहीं जटिल है।
तारकोवस्की की आखिरी फिल्म Offret/ Sacrifice (1986) जो स्वीडिश थी, उन्होंने अपने मित्र इंगमार बर्गमन को समर्पित की थी। यह फिल्म असाधारण रूप से जटिल और कठिन है। इस फिल्म में एक अधेड़ प्रोफेसर समुद्र किनारे अपने बीवी बच्चों के साथ रह रहा होता है कि टीवी पर नाभिकीय विश्वयुद्ध का समाचार आता है। इससे बचने के लिए प्रोफेसर अल्क्सेंदर भगवान से यह प्रार्थना करता है कि अगर सब कुछ ठीक हो जाये तो वह अपना सब कुछ त्याग देगा। अगले दिन सुबह उठने पर जब सब कुछ ठीक रहता है, तब अपने वचन को पूरा करने के लिये वह अपने पूरे घर में आग लगा देता है। अपने छायांकन और कलाकार दृष्टि के कारण यह फिल्म बहुत सम्मानित की गयी। यह फिल्म Nostalaghia (1983) की ही तरह अपने लम्बे बेहतरीन शॉट्स के कारण जानी जाती है। इन फिल्मों के माध्यम से रस की जटिलता और विविधता का चित्रण ही निर्देशक की महानता है। अभिनवगुप्त जैसे सौन्दर्यशास्त्री तत्क्षण तारकोवस्की को रस सिद्धांत को सही समझने के लिए मुबारकबाद देंगे।
सेर्गेई पराजनोव Sergei Parajanov (1924 – 1990) की लोककथाओं पर आधारित दो फिल्में Shadows of Forgotten Ancestors (1964) (जो कि उन्होंने तारकोवस्की की Ivan's Childhood (1961) फिल्म से गहरे तौर पर प्रभावित होने के बाद बनायीं थी) और The Legend of Suram Fortress (1984) में मृत्यु और स्वाभाविक शोक से न उबार पाने की दास्ताँ हैं। लोक कथाएँ बहुधा कई रसों पर होती हैं। इन फिल्मों में श्रृंगार रस और कारुण्य रस समावेश है।
फिल्म Shadows of Forgotten Ancestors में इवान अपने पिता के हत्यारे की पुत्री और अपनी प्रेमिका मरिच्का से शादी करना चाहता है पर मरिच्का की असमय मृत्यु हो जाती है। अपनी दूसरी शादी के बाद भी इवान अपने पहले प्रेम को भूल नहीं पाता और बीवी के धोखे से मारा जाता है। इस फिल्म में सुन्दर पहाड़ों, झीलों, कोहरे, धुआं, रातों, लोक संगीत, शादी के रस्मों का खूबसूरत चित्रण है। फिल्म के पहले दृश्य में जब एक ऊँचा पेड़ कट कर गिरता है और इवान के भाई की मौत होती है, इसके फिल्मांकन के लिए पराजनोव ने पेड़ पर कैमरा बाँध रखा था जो की पेड़ के गिरने के साथ टूट कर बेकार हो गया, पर फिल्म बच गयी। फिल्म The Legend of Suram Fortress में प्रेमी द्वारा धोखा देने के बाद ज्योतिषी बन गयी औरत की भविष्यवाणी पर उसके प्रेमी के लड़के को किले की दीवार में जिन्दा चुनवा दिया जाता है। भविष्य बताने वाले औरत रात के अँधेरे में किले के उस हिस्से पर चादर चढाने जाती है जहाँ वो लड़का दफ़न होता है और अपने अविवाहित जीवन का हवाला देते हुए मरे हुए लड़के को अपना लड़का मानती है।
इटालियन निर्देशक पसोलिनी Pier Paolo Pasolini (1922- 1975) की  Il fiore delle mille e una notte (The Flower of 1001 Nights या  Arabian Nights, 1974) में अलिफ लैला (अरेबिन नाइट्स) की मशहूर कहानियाँ नहीं हैं, जैसे कि अलादीन और जादुई चिराग, अलीबाबा और चालीस चोर, सिंदबाद जहाजी आदि, बल्कि दूसरी कहानियाँ हैं। उसमें एक कहानी थी अजीज़ और उसकी चचेरी बहन अजीज़ा की प्रेम कहानी। इस फिल्म के लिये पसोलिनी ने एक पूरे गाँव से मशीन बने समस्त उत्पाद चुन चुन कर हटा दिये। घर, बर्तन, कपड़े - सारे आठवीं सदी के अरब की तर्ज पर बनाये गये। इस फिल्म में अजीज़ और अजीज़ा की शादी के अजीज़ किसी सुंदरी के प्यार में पड़ जाता है और नियत समय पर शादी के लिये नहीं पहुँचता है। अजीज़ा उसे कुछ भी नहीं कहती है। लेकिन जब अजीज़ उस लड़की की याद में खाना पीना छोड़ देता है तब अजीज़ा उस बुद्धिमती और रहस्यमयी लड़की को हासिल करने में उसकी मदद करती है। अंत में दुख से चूर हो कर अजीज़ा आत्महत्या कर लेती है। इस करूण कहानी का अरब देश की संस्कृति से बहुत ही सुंदर फिल्मांकन किया गया है। 
एनेमेटेड जापानी फिल्म Grave of Fireflies या Hotaru no haka (1988) एक आत्मकथा पर आधारित बहुचर्चित करूण गाथा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के दस साल के लड़के और उसकी चार साल की बहन के माता-पिता युद्ध और बमबारी में मारे जाते हैं। अपनी नन्हीं बहन को ले कर रिश्तेदारों से प्रताड़ित होने से ले कर, पुलिस से पिटना, एक झील के किनारे घर बना कर रहना, बहुत से हृदय विदारक दृश्यों और संवादों से सजी यह फिल्म युद्ध की विरूद्ध महान दस्तावेज मानी जाती है।  सन1967 में प्रकाशित इस उपन्यास के लेखक इस पर फिल्म बनाने के सारे प्रस्ताव बहुत दिनों तक यह कह कर ठुकराते रहे थे कि वैसी तबाही, वैसा अभिनय पुनर्जीवित करना किसी के लिये असंभव है। लेकिन जब उनके पास ऐनिमेशन फिल्म का प्रस्ताव आया, तो वह कहानी पर बनाये हुये स्टोरीबोर्ड से बहुत प्रभावित हुये। यह लेखक की कल्पना के बहुत ही करीब था। ऐनीमेटेड फिल्म में बहुत सारी चीजें की जा सकती हैं जो कि साधारण रूप से फिल्माना कठिन है, जैसे कि लाश के चेहरे पर मक्खी का किसी निश्चित क्रम में भिनभिनाना (क्योंकि मक्खियों को निर्देशित करना संभव नहीं है)
महान पोलिश निर्देशक Krzysztof Kieślowski (1941- 1996) ने कई करूण फिल्में बनायीं। उनकी प्रमुख कृतियाँ  The Decalogue (1989) (दस भागों की टीवी सीरिज), The Double Life of Véronique (1991), औऱ The Three Colors Trilogy (1993–1994) (Three Colors: Blue (1993), Three Colors: White (1994), and Three Colors: Red (1994)) विश्व सिनेमा की महानतम कृतियों में आंकी जाती हैं। टीवी के लिये बनायी उनकी सीरिज The Decalogue का स्तर इतना ऊँचा था कि स्टैनले क्यूब्रिक जैसे निर्देशक ने इसे दुनिया की महानतम कृति करार दिया था। डेकालोग के पहले एपीसोड में एक बारह साल की मृत्यु का दुखद चित्रण है। एपीसोड दो में मृत्यु के शोक से लिपटा डॉक्टर जीवन का महत्व समझता है।
कई बार शोक से वैराग्य, कई बार नैराश्य से मानव सब कुछ छोड़ कर मुक्ति का प्रयास करता है। फिल्म Three Colors: Blue (1993), जिसकी मूल अवधारणा स्वतंत्रता की है, एक संगीतज्ञा के संगीतज्ञ पति और पुत्री के कार दुर्घटना में निधन के पश्चात सब कुछ छोड़ कर शोक में डूब कर मुक्ति ढूँढ रही होती है, पर अंतत: कर्त्तव्य की राह पर वापस चलने लगती है। इसी तरह शोक का स्थायीभाव भी बदलने के लिये है।
शोक के पश्चात शांति है।

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अगले लेखों में हम चर्चा करेंगे
1. क्रोध भाव और रौद्र रस- विश्व सिनेमा में रौद्र रस की मुख्य कृतियाँ
2. हँसी, ठिठोली, और व्यंग - विश्व सिनेमा में हास्य रस की फिल्में (दो भागों में)
3. प्रेम, विरह और मिलन - विश्व सिनेमा और शृंगार रस (तीन भागों में)