Friday, July 25, 2014

यह हिंदी प्रकाशन जगत में नए दौर की शुरुआत है!

वाणी प्रकाशन की स्थापना के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस मौके पर 26 जुलाई को वाणी फाउन्डेशन(न्यास) की स्थापना की घोषणा होगी. लेखन, चित्रांकन और अनुवाद के क्षेत्र में शोधवृत्तियों के साथ यह एक नई शुरुआत होगी जो हिंदी के किसी भी प्रकाशन गृह द्वारा की जाने वाली अपने तरह की नई पहल होगी. हम इस पहल का स्वागत करते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि विश्व स्तर पर हिंदी की पहुँच बढाने में यह फाउंडेशन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा- मॉडरेटर 
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वाणी प्रकाशन अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर 26 जुलाई 2014 को स्थापना दिवस मना रहा है। इसी अवसर वाणी न्यास की स्थापना की घोषणा भी की जाएगी। न्यास की शुरुआत लेखन, चित्रांकन व अनुवाद के क्षेत्रों में तीन महत्वपूर्ण शोधवृतियों से होगी।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए जो भी कार्य किये जा रहे हैं वे अपर्याप्त हैं। वाणी न्यास हिन्दी और भारतीय साहित्य से विश्व स्तरीय अनुवाद करवाने तथा भारतीय साहित्य को अनुवाद के माध्यम से अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलवाने के लिए कार्य करेगा। वाणी न्यास हिन्दी और भारतीय भाषाओं को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए कार्य करेगा जिसमें यूनेस्को में हिन्दी को मान्यता दिलानानोबल पुरस्कारों के लिए भारतीय साहित्य की प्रविष्टि को प्रोत्साहित करनादुनिया भर के विश्वविद्यालयों में भारतीय साहित्य की उपस्थिति दर्ज कराना आदि शामिल है।

वाणी न्यास बाल साहित्य में चित्रांकन एवं लेखनसाहित्य में नवाचारहिन्दी साहित्य का अन्तरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद आदि वाणी न्यास द्वारा किये जाने वाले शोध कार्यों के मुख्य उद्देश्य हैंइन सभी विषयों पर वाणी न्यास शोधवृत्ति को बढ़ावा देते हुए एक लाख प्रत्येक तीन फेलोशिप देगा जब कि अनुवाद के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुवादकों को भारत में रेसिडेंशियल फेलोशिप देगा।

दुनिया भर के जाने माने लेखक और बुद्धिजीवी इस न्यास के परामर्श मंडल में हैं।

51वर्षों की साहित्यिक सफल परम्परा को कायम रखते हुए वाणी प्रकाशन ने इस समारोह में सभी प्रतिष्ठित साहित्यकारों को आमन्त्रित किया है। इस मौके पर वाणी न्यास के अध्यक्ष अरुण माहेश्वरीन्यास के मुख्य संरक्षक प्रख्यात शायर और फिल्मकार गुलज़ारन्यासी प्रसिद्ध लेखिका नमिता गोखलेविख्यात साहित्यकार अशोक वाजपेयीसमाजसेवी बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र व माहेश्वरी परिवार के सभी सदस्य उपस्थित रहेंगे। न्यास की कार्यकारिणी समिति सदस्य प्रसिद्ध विदुषी शुभा मुद्गलवरिष्ठ लेखिका सुकृता पॉल कुमारप्रसिद्ध समाज-विज्ञानी अभय कुमार दुबेवरिष्ठ पत्रकार अनंत विजयबाल साहित्यकार पारो आनंदवरिष्ठ समाजशास्त्री व चिन्तक धीरूभाई सेठवरिष्ठ चित्रकार मनीष पुष्कलेयुवा कवि यतीन्द्र मिश्र और हैप्पी हैंड्स फाउंडेशन के संस्थापक मेधावी गाँधी सहित साहित्य व कला जगत की प्रमुख हस्तियाँ उपस्थित रहेंगी। इस समारोह की अध्यक्षता प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह करेंगे। 

अदिति माहेश्वरी
निदेशक, कॉपीराइट व अनुवाद विभाग
वाणी प्रकाशन
+91 9999578418
-मेल : vaniprakashan@gmail.com
            aditi@vaniprakashan.in

Wednesday, July 23, 2014

राहुल सिंह का 'लंचबॉक्स'

युवा आलोचक राहुल सिंह कई विधाओं में अच्छी दखल रखते हैं, सिनेमा भी उनमें एक है. कुछ अरसे पहले आई फिल्म 'लंचबॉक्स' पर उन्होंने कुछ ठहरकर जरूर लिखा है लेकिन बड़े विस्तार से और बड़ी बारीकी से लिखा है. फिल्म तब अच्छी लगी, अब पढ़ा तो उनका यह विश्लेषण एक बार फिर उस फिल्म की याद दिला गया. आप भी पढ़िए- जानकी पुल.
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कुछ फिल्में होती हैं, जो खत्म होने के बाद भी जारी रहती हैं। दिलो-दिमाग पर उनका असर इस कदर होता है कि एक अंतराल के बाद मौके-बेमौके आप उस तक लौट आते हैं। यह लौटना कुछ छूट चूके को समेटने के लिए होता है और समेटने की उस कोशिश में हर दफा कुछ अलहदा-सा हाथ लगता चलता है।लंच बाॅक्सऐसी ही फिल्म है। जैसे पूर्ण विराम के अभाव में कई दफा एक खूबसूरत वाक्य भी कुछ अधूरा-सा रह जाता है, ‘ओपेन एंडेडफिल्में एक हद तक वैसे ही पूर्णविराम विहीन खूबसूरत वाक्यों की तरह होती है, जिस खालीपन को अपने तसव्वुराना पूर्णविराम के जरिये हम खूबसूरती प्रदान करते हैं। पर जब तक उसके एक संभावित अंत, जिसकी संगति पूरी कथा के साथ न बैठती हो, की तलाश न कर ली जाये, मन किसी अभिशप्त बैताल की तरह उस डाल पर बारहा लौटता रहता है। आवाजाही के इस सिलसिले मेंलंच बाॅक्सकी सतह पर तिरते आशयों को एकसूत्र में पिरोने का जो अवसर मिला तो उसके कुछ दिलचस्प नतीजे उभर कर सामने आये। यहाँ उन्हीं नतीजों को साझा करने की कोशिश भर है।

फिल्म में कंट्रास्ट के दो युग्म हैं। एक जोड़ा जो बहुत आसानी से पहचान में आता है, वह तो साजन फर्नांडिस (इरफान खान) और असलम शेख (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) का है। एक की मितव्ययिता और दूसरे की वाचालता का कंट्रास्ट फिल्म की सतह पर पसरा है। पर असल कंट्रास्ट इला (निम्रत कौर) और साजन फर्नांडिस के बीच का है। साजन फर्नांडिस दुनिया से बेजार एक ऐसा जीव है, जिसने जीवन की एकरसता को अपने जीवन का स्थायी भाव स्वीकार कर लिया है। उसकी संवेदनायें छीज गई हैं (बच्चों के द्वारा गेंद मांगे जाने पर उसकी प्रतिक्रिया या फिर उसके सहकर्मियों के उसके बारे में व्यक्त की गई राय से इस बात की पुष्टि होती है)। वह एक स्तर पर लगभग यांत्रिक हो चुका है। अपने आत्मनिर्वासित एकाकीपन को उसने स्वीकार लिया है। इसके उलट इला के जीवन की पूरी जद्दोजहद उन संवेदनाओं को बचाये रखने की है। ऐन फिल्म की शुरुआत में ही जब कैमरा माँ-बेटी के एक जोड़े को अपनी जद में लेता है, जिसमें एक माँ अपनी बच्ची को स्कूल भेजते हुए उसको कुछ सावधानियाँ बरतने की हिदायत दे रही है। और उसके बाद के दृश्यों में गृहस्थन और पत्नी की भूमिका का जिस संजीदगी से निर्वाह कर रही है, या पति के संवेदना तन्तुओं में मौजूदगी दर्ज कराने की अपनी इकहरी कोशिशों में वह जिस कदर दुहरी हुई जा रही है, उन दृश्यों में उसके सांवलेपन के गहराने को आप महसूस कर सकें तो घर की चैखट के भीतर अपने संवेदनाओं को बचाये रखने की उसकी अकुलाहट को महसूसा जा सकता है। इला और साजन व्यक्तित्व के दो विपरीत छोरों पर हैं। इसे उस बिलकुल पहले मौके पर देखा जा सकता है, जब इला साजन को टिफिन के डब्बे में पहला खत भेजती है। उसके अल्फाज हैं-“कल खाली डब्बा भेजने के लिए आपका शुक्रिया, वैसे वह खाना मैंने अपने हसबेंड के लिए बनाकर भेजा था। और जब डब्बा वापस आया तो ऐसा लगा कि घर आकर आज वह मुझसे कुछ कहेंगे। कुछ घंटों के लिए सोचने लगी कि दिल का रास्ता वाकई पेट से होकर जाता है, उन घंटों के बदले आज भेज रही हूँ पनीर मेरे हसबेंड का फेवरेट-इला।”  क्या कोई संवेदनशील व्यक्ति इसके जवाब में यह लिख सकता है किडियर इला, द फूड वाॅज वेरी साल्टी टूडे।इसके बाद रोज के लंचबाॅक्स में खतों के आने-जाने का जो सिलसिला है, उसमें भी अपनी निजता को साझा करने का साहस इला ही दिखलाती है, साजन की संवेदनागत शुष्कता बनी रहती है। साजन के आत्मनिर्वासनगत सूखे को अपनी निजता से सींचने का काम यों तो इला करती है, पर इला से भी पहले उसके एकांत में शुरुआती सेंधमारी करने का काम असलम शेख करता है। लेकिन जिन क्षणों में साजन के मन में नमी घर करने लगती है, उन क्षणों से पूर्व फिल्म की कहानी में कुछ ऐसी चीजें गुंथी हुई हैं, जो इस फिल्म की भारतीयता को पुष्ट करती है। विवाहेतर संबंधों को लेकर भारतीय मन अब भी सहज नहीं हो सका है। इसलिए इला के जीवन में विकसित होनेवाले इस विवाहेतर सम्बन्ध को वैधता प्रदान करने के लिए इला के पति केअफेयरऔर गृहस्थ जीवन के प्रति गैर-जिम्मेदार होने की बात, फिल्म पहलेइश्टेब्लिशकरती है, उसके बाद इला के जीवन में साजन एक विकल्प के बतौर दाखिल होता है। फिल्म की बुनियादी फांस इसविकल्प की विकल्पहीनतामें निहित है। आमतौर पर कलायें असंभव कल्पनाओं को साकार किया करती हैं। इस लिहाज से फिल्म भी असंभव कल्पनाओं को साकार करनेवाली एक आधुनिक कला विधा है। आमतौर पर इला और साजन के बीच का उम्रगत फासला इतना है कि सामान्य स्थितियों में उनके बीच किसी किस्म के सम्बन्ध की संभाव्यता को सहजता से अस्वीकार किया जा सकता था। पर फिल्म अपनी कलागत-विधागत अहर्ता को पूरा करती है।

पर यह फिल्म भारतीय सन्दर्भों में स्त्रीत्व के कुछ ऐसे पहलुओं को उजागर करती है, जिसकी ओर एकबारगी हमारा ध्यान नहीं जाता है। ज्याँ पाल सार्त्रमानते थे कि किसी भी देश को समझने के लिए वहाँ की स्त्रियों को समझना जरुरी है। संयोग से इला, इला की अनदेखी पड़ोसन और इला की माँ की भूमिकाओं को गौर से देखें तो उनका समुच्चय भारतीय महिलाओं की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करती जान पड़ती हैं। यह सब भारतीय औरतों की उस जमात का नुमाइंदगी करती जान पड़ती हैं, जो बहुत महŸवाकांक्षी कभी नहीं रहीं, जिनके लिए उनका घर-आँगन ही सर्वोच्च प्राथमिकता पर रहता आया है। विवाह, परिवार और संतति से बाहर उनकी दुनिया कभी फैली ही नहीं है। सात्र्र की सहचर सिमोन द बोउवा स्त्रियों की इस कैटेगरी के बारे में कुछ ऐसा सोचती थी किएक साफ-सुथरी चैकोर (स्क्वायर) पारिवारिक जीवन जीने वाली स्त्री कहीं भी स्वतंत्र नहीं है और न उसका कोई निजी अस्तित्व है। दरअसल सदियों से कंडीशंड होकर (जिसे भारत में संस्कार कहा जाता है) स्त्री के मन में एकबैड फेथके रुप में यह विश्वास बद्धमूल हो गया है कि पुरुष की छत्रछाया में रहकर भी वह स्वतंत्र है और उसका कोई निजी जीवन है। इसके बाद बच्चे पैदा होते हैं औरपरिवारबनता है तो स्त्री की स्वतंत्रता और सिकुड़ने लगती है और वे पति के साथ ही बच्चों की परवरिश में अपने को होम कर देती हैं।विवाह ऐसी स्त्रियों के लिए जीवन का सर्वाधिक निर्णायक पहलू होता है। उसमें ठगे जाने पर, संस्कार और नैतिकता की ओढ़ाई गई चादर, उन्हें धार्मिक और कर्मकाण्डी बनने की दिशा में ढकेलता है या फिर सर्वाधिक सहजता से उपलब्ध विकल्प को संबल के तौर पर स्वीकार करने की दिशा में, जो जीवन से पलायन भी हो सकता है। इला के लिए साजन वही सर्वाधिक सहजता से उपलब्ध संबल या विकल्प है। लेकिन सहजता से उपलब्ध यह संबल या विकल्प क्या वाकई में संबल और विकल्प होते हैं? मुझे लगता है कि यह सवाल हीलंचबाॅक्सको देखने का एक बेहतर प्रस्थान बिन्दु हो सकता है, जहाँ से फिल्म की सतह के नीचे उतर कर उसके उत्स तक पहुँचा जा सकता है।

कागज पर कोई इबारत कलम और स्याही के बगैर नहीं लिखी जा सकती है, सिनेमाई संदर्भ में यह काम कैमरे और निगाह के बगैर नहीं किया जा सकता है। कैमरे और निगाह की अर्थपूर्ण युगलबंदी सेलंचबाॅक्सलबरेज है। (उन दृश्यों पर बात करने लगूं तो रस्ता भटक जाऊंगा, यथाप्रसंग उनको पिरोने की कोशिश करुंगा। अभी पहला नमूना।) फिल्म की शुरुआती चंद मिनटों के बाद एक दृश्य में गृहस्थी की जिम्मेदारियों के निभाने के क्रम में इला एक बेमतलब-सी हरकत करती नजर आती है। कपड़ों को धोने से पहले वह उन्हें सूंघ-सूंघ कर वाशिंग मशीन में डाल रही है। दूसरी बार जब वह इस बेमतलब-सी लगनेवाली हरकत को दुहरा रही होती है और कपड़ों से जब वह अपने पति के अफेयर को सूंघ लेती है। तब इस बात का भान होता है कि स्त्रियों की छठी इंद्रिय कितनी असाधारण और नायाब तरीके से काम करती है। यह इसका एक बेजोड़ नमूना है। यह फिल्म का टर्निंग प्वाइंट है। ससुराल में बिगाड़ होने परबैक-अपमायके का रहता है। वैवाहिक जीवन में हुए इस सेंधमारी पर, कपार पर हाथ धरे जब वह अपने माय-के पहुँचती है, गजब की त्रासदी वहाँ घटित होते हुए पाते हैं। जर्जर मायका और ध्वस्त होती गृहस्थी के बीच इला के लिए क्रमिक आत्महत्या का ही संभावित विकल्प बचता है। (या तो वहधोबी घाटकीयास्मीनकी तरह आत्महत्या कर ले या ‘15 पार्क एवेन्यू कीमीठीकी तरह विक्षिप्त हो जाये।) इससे उबरने की इला की कोशिशों में असल त्रासदी निहित है। वह अपने दुख-दर्द को साजन से साझा करते हुए लिखती है - “हलो, मुझे आपको कुछ बताना है, मेरे हसबेंड का अफेयर चल रहा है, बहुत सोचा उनसे बात करुंगी पर हिम्मत नहीं जुटा पाई। बात करके जाती भी कहाँ? एक जगह है, यश्वी ने स्कूल में सीखा है, भूटान में सब खुश रहते हैं। वहाँ ग्राॅस डोमेस्टिक प्रोडक्ट नहीं है, ग्राॅस डोमेस्टिक हैप्पीनेस है, यहाँ भी ऐसा होता तो।इस पर साजन का जवाब हैव्हाट इफ आई कम भूटान विथ यू?” इला भारतीय महिलाओं की जिस कैटेगरी की प्रोटोटाइप के रुप मेंलंचबाॅक्समें उभरती है, उसमें जूझने की बजाय पलायन की उसकी मंशा कहीं से अस्वाभाविक नहीं लगती है। इस पूरे प्रसंग में जो अस्वाभाविक-सा है। वह है यश्वी का इस्तेमाल। यश्वी इला की पाँच-सात साल की बच्ची है। पाँच-सात साल की बच्ची के मार्फत जीडीपी (ग्राॅस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) और ग्राॅस डोमेस्टिक हैप्पीनेस के बिन्दु को रखना, थोड़ा अस्वाभाविक लगता है। लेकिन इससे निकलनेवाली दूसरी अनुगूंज फिल्म की पूरी संरचना की लिहाज से ज्यादा मारक है। दो परिपक्व और प्रौढ़ लोग एक बच्ची की बातों में आ रहे हैं, इसे क्यों नहीं उनकीबचकानी हरकतमानी जाये? विकल्प के रुप में भूटान के बचकानेपन की हवा तो अगले ही दृश्य में असलम शेख यह कर के निकाल देता है किवहाँ की इकोनाॅमी बहुत डाउन है, हमारा एक रुपया वहाँ के पाँच रुपये के बराबर है।पर फिल्म में इसइंसीडेन्टके आस-पास की जो नाटकीयता है, उस नाटकीयता में अचानक आने-वाले उतार-चढ़ाव में यह बातें ओझल हो जाती हैं। खासकर इस पूरी नाटकीयता के केन्द्र में साजन की बदलती भाव-भंगिमायें हमें फुसला ले जाती हैं।कभी-कभी गलत टेªन भी सही जगह पहुँचा देती है।जैसे चमकते लेकिन खोखले शब्दाडम्बर में हम बह जाते हैं।कभी-कभीकी काव्यात्मकता में हम उसकीरियलिस्टिक प्रोबेबिलिटीकी नगण्यता की ओर ध्यान नहीं दे पाते हैं। इत्तेफाकों से जिंदगी नहीं चला करती। संयोग हमेशा दीर्घकालीक और दूरगामी विकल्पों के सर्जक नहीं होते हैं। दिल को बहलाने का यह अच्छा खयाल हमारे संवेदन तन्त्र को इस कदर अपने प्रभाव में लेता है किफीलगुडके चक्कर में हम फिल्म के मूल मर्म से महरुम हो जाते हैं। मूल मर्म बेहद त्रासद है। इसके लिए फिल्म के दो बिन्दुओं की ओर फिर से लौटना होगा। एक बिन्दु है-इला की पड़ोसन देशपांडे आंटी और दूसरी उसकी माँ। इन दोनों महिलाओं में एक अद्भुत साम्यता है और वह है अपने लगभग मरणासन्न पति की सेवा-सुश्रुषा में अपने जीवन को होम कर देने की भावना। यह उनके लिए बहुत सहज भी नहीं है।देशपांडे आंटी के हसबेंड पिछले पन्द्रह साल से कोमा में है। एक दिन वे उठे और पंखे को घूरते रह गयेे तब से और कहीं नहीं देखते दिन भर पंखे को घूरते रहते हैं और रात को सो जाते हैं। फिर सुबह होती है और अंकल फिर पंखे को घूरने लगते हैं। कुछ नहीं कहते, पिछले पन्द्रह साल से यही चल रहा है। देशपांडे आंटी को लगता है कि अंकल की जान उस पंखे में अटकी है। एक दिन बिजली चली गई और पंखे के रुकते-रुकते अंकल की आंखें पलट गईं, धड़कन भी बस रुक ही गई थी कि बिजली वापस आ गई और उस दिन से आंटी ने घर में जेनिरेटर लगवा लिया।देशपांडे आंटी के इस वस्तुस्थिति को उनके ही एक और संदर्भ से जोड़ कर देखने की जरुरत है और वह फिल्म के आखिर से पहले आता है, जब वह इला को कह रही होती है किपता है इला आज तेरे अंकल का चलता हुआ पंखा साफ किया मैंने।चलते हुए पंखे को साफ करने की कठिनता या असंभाव्यता का अनुमान करें और उनके जीवन की कठिनता से उसका मिलान करें तो इस वाक्य की बेधकता का अनुमान किया जा सकता है। देशपांडे आंटी की रोजमर्रे की जिंदगी का निर्वाह किसी चलते हुए पंखे को साफ करने जितना ही कठिन है। पर उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया है और अपने बूते निभा रही हैं। दूसरे बिन्दु की ओर गौर करें, जब इला के पिता की मौत होती है तब इला की माँ अपनी बेटी से जिस बेतकल्लुफी से यह कहती है किमुझे बहुत भूख लग रही है, पराठे खाने का मन कर रहा है। सुबह नाश्ता नही किया था मैंने, इनके लिए नाश्ता बना रही थी। मुझे हमेशा फिकर लगता था कि इनके जाने के बाद क्या होगा। लेकिन अब सिर्फ भूख लग रही है। शुरु-शुरु में हमारे बीच बहुत प्यार था, जब तू पैदा हुई थी, लेकिन सालों से इनसे इतनी घिन आती थी। तब भी रोज-रोज इनका नाश्ता-दवा-नहाना, नाश्ता-दवा-नहाना।कथाकार अखिलेश के शब्दों में कहें तोएक भयानक हादसे में इतनी भी ताकत नहीं होती है कि वइ इंसान की एक वक्त की भूख भूला दे।

बारीकी से देखें तो क्या देशपांडे आंटी और इला की माँ एक ही यातना के साझीदार नहीं हैं? फर्क है तो उन स्थितियों के प्रति स्वेच्छा या अनिच्छापूर्वक स्वीकार का। पर बावजूद इसके क्या वे दोनों समान परिस्थितियों में पड़े एक ही किरदार के विस्तार या एक्सटेंशन्स नहीं जान पड़ते हैं? क्या यह महज इत्तेफाक है कि देशपांडे आंटी का कोई चेहरा नहीं है, इला के लंग कैंसर से पीड़ित पिता की निर्जीव-सी लगती देह का भी कोई चेहरा कभी फिल्म में नहीं दिखता है। क्या अपने जीवन के उत्तरार्ध में सिगरेट पीने वाले साजन की वह संभावित परिणति नहीं हो सकती है? इस लिहाज से कोमा में पड़े देशपांडे अंकल और इला के पिता को फिल्म में दो अलग किरदारों के बतौर नहीं अलगाया जा सकता है। देशपांडे अंकल और इला के पिता वे सूत्र हैं, जो इस फिल्म के उस पहलू को उजागर करते हैं, जिसकी ओर असल में हमारा ध्यान नहीं जा पाता है और वह है फिल्म के समापन का दृश्य। दरअसल यह फिल्म का समापन ही था, जिसने मुझे परेशान कर रखा था और आखिर में कई दफा देखने के बाद यह सूत्र हाथ लगा कि फिल्मओपेनएंडेडनहीं थी। असल में देशपांडे आंटी और इला की माँ एक दूसरे के प्रतिरुप नहीं थे बल्कि वे इला के भविष्य के दोप्रोजेक्शनथे। इला के जीवन का उत्तरार्ध भी यही होना था, या तो वह स्वेच्छा से साजन के डायपर बदल रही होती या फिर शुरुआती दिनों के प्यार के बाद अपनी माँ की भांति अनिच्छापूर्वक नाश्ता-दवा-नहाने की अंतहीन प्रक्रिया को दुहरा रही होती। फिल्म भले एक खुले अंत का खुशनुमा-सा भ्रम रचती है। पर अंततः सच यह है कि यह कथा के फेरे को बहुत कायदे से पूरा करती है। इसी बिन्दु पर इला के समक्ष उपलब्धविकल्प की विकल्पहीनताका अहसास होता है। इस बिन्दु पर फिल्म जिस गहरी त्रासदी में तब्दील होती है, वह अद्भुत है। अद्भुत इस दृष्टि से भी कि आये दिन अखबारों में इस किस्म की हेडिंग देखने को मिलती है किदो बच्चो की माँ अपने प्रेमी के साथ फरारया एक बच्चे की माँ अपने आशिक के संग फुर्र। इसमें जो भाव निहित है, उसमें एक किस्म के मजे का भाव समाहित है।लंचबाॅक्सइसी विषय को उठाती है, पर इतनी संजीदगी से कि अखबारों की खबरों वाला हल्कापन इससे कोसों दूर नजर आता है। पर बावजूद इसके फिल्म इस बिन्दु पर न ठिठक कर एक दूसरे बिन्दु की ओर प्रयाण कर जाती है। एक ओर तो इला की विकल्पहीनता की ओर और दूसरी ओर प्रारब्ध, नियति या भाग्य जैसे सवालों की ओर। क्योंकि इला की यातना का उसके तईं कोई वैध कारण नहीं है। वह इस यातना की हकदार नहीं है, जो उसके पति के कारण उसके जीवन में आकार ले रहा है। इस या ऐसे अनेक किस्म के अयाचित यातनाओं (अनडिजव्र्ड सफरिंग) का स्त्रियों के सन्दर्भ में भारतीय परम्परा और संस्कार यही संतोषप्रद उत्तर देती आई है कि यह पूर्व जन्म के कर्मों का फल हो सकता है, जिसे प्रारब्ध कहा जाता है। प्रारब्ध जो इस जीवन की नियति या भाग्य पर हावी है। इला संघर्ष करती तो इसके दूसरे नतीजे सामने आते पर खुद उसके परिवार के हालात से उसके समर्पण और पलायन की मानसिकता या संस्कार की पुष्टि होती है। एक घंटे पैंतालीस मिनट की फिल्म में इतनी बातों को पूरी कलात्मकता के साथ पिरोने और साकार करने की रितेश बत्रा की सिनेमाई चेतना की जितनी तारीफ की जाये, वह कम है।

इस फिल्म में एक गजब की बात और है। वह इसकेकंटेटसे नहीं इसकेक्राफ्टसे वाबस्ता है। एक स्वाद जो जिंदगी भर के लिए आपकी जिह्वा पर घर कर जाये, मामूली बात नहीं है। जीवन में चुनींदा जायके ही हमारी स्मृतियों में अपनी जगह बना पाते हैं। इस जायके को सिरजने की प्रक्रिया पर गौर करें तब यादगार जायके या स्वाद के जन्म की कथा का भान हमें होता है। कोई भी भोजन कई चरणों और प्रक्रियाओं से गुजरकर अपने मुकाम तक पहुँचता है। अलग-अलग खाद्य पदार्थों के बीच सही आनुपातिकता के संधान में पूरी उम्र गुजर सकती है। अलग-अलग खाद्य पदार्थ अलग-अलग स्वाद (स्वभाव) को धारण करते हैं। उन अलग-अलग आस्वाद वाले भोज्य पदार्थों के मध्य आपसी साझेदारी से एक साझे स्वाद का जन्म होता है। एक आँच या ताप के आगे वे सभी अपनी-अपनी तासीर को छोड़कर एक दूसरे में घुलने को आतुर होकर उस स्वाद को सिरजते हैं। यह स्वाद उसके नियंता की तन्मयता, संतुलन, अनुभव, समर्पण और भावनाओं का सूचक होता है। इनमें से किसी एक के भी अभाव में उस यादगार जायके की निर्मिति संभव नहीं है। जायका एक कलेक्टिविटी, एक साझेपन को दर्शाता है।लंचबाॅक्सको लगभग फिल्म समीक्षकों ने इला ओर साजन की कहानी के तौर पर बयां किया है। यह लगभग वैसा ही है जैसे हम आलू-गोभी की सब्जी कहते हुए उसकी निर्मिति में शामिल मिर्च, नमक, तेल जैसे अन्य सहायक सामग्रियों के वजूद की अनदेखी कर देते हैं। क्योंकि इनकी मात्रा इतनी कम होती है, हम इनके अस्तित्व को नगण्य मान कर चलते हैं। पर आस्वाद की निर्मिति में इनमें से किसी एक को भी दरकिनार कर दें तो स्वाद, बेस्वाद हो जायेगा। खाना बनाने के इस बुनियादी फलसफे कोलंचबाॅक्सकेक्राफ्टके स्तर पर लागू करें तो इस फिल्म के हर किरदार की अपरिहार्यता को आप महसूस कर सकते हैं। तब असलम शेख (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) के किरदार के मायने को समझा जा सकता है। इला और साजन की केन्द्रीयता के बीच असलम शेख एक तरीके से हाशिये पर है। पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, उसका कैरेक्टरअनफोल्डहोना शुरु होता है। एक दर्शक के सारे पूर्वानुमानों को झुठलाता हुआ वह अप्रत्याशित तौर पर उभरता है। उसकी चापलूसी से भरी चिपकू अदायें और काम निकालनेवाली भंगिमायें अनायस उसकेसर्वाइवल इंस्टिक्टमें तब्दील हो जाती है। इसलिए फिल्म कापोजीटिव नोटतो असलम शेख की दास्तान है। इला और साजन तो निमित्त मात्र है, जो असलम शेख के बरक्स एक बड़ा कंट्रास्ट रचते हैं। असलम शेख की जिजीविषा और संघर्षशीलता कोलंचबाॅक्सके एक जायके के बतौर देखा जा सकता है। एक छोटा-सा सिरा और है, नगण्य-सा, पर उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। यह सिरा है यश्वी और फिल्म में शामिल दूसरे बच्चों का। बच्चों की संवेदनशीलता इतनी निष्कलुष होती है कि उनकी संवेदनाओं पर पहुँची चोटें उनके मन-मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि सालों वे एक दुःस्वप्न की भांति उनकी स्मृतियों में अपना घर-बार बसाये रहते हैं। दो मौकों पर यश्वी की निगाहों केपाॅजको आप गौर करें तो उसकी सांकेतिकता में निहित अर्थवत्ताको भाप सकते हैं। पहला, जब इला डब्बे के गलत जगह पहुँच जाने की बात का जिक्र देशपांडे आंटी से कर रही है और आवाज बाहर न जाये इस लिए रसोई का नल खोल रखा है। बहते पानी के शोर में अपनी मासूमियत से निकल कर समझने की जिस कोशिश के साथ अपनी माँ को देख रही है, उसको महसूसने के लिए आपको वितोरियो डे सिका कीचिल्ड्रेन आर वाचिंग अससरीखी कई फिल्में देखनीं होंगी। या फिर बच्चों के द्वारा गेंद माँगे जाने पर साजन फर्नांडिस के व्यवहार पर रात के खाने के दौरान खिड़की के स्लाइडर को बंद करने के बच्ची के हरकत में उसके प्रतिकार को देख सकते हैं। वहीं बाद में साजन के बदले आचरण का सम्मान करते हुए वही बच्ची खाने के दौरान न सिर्फ अपनी खिड़की खुली रहने देती है बल्कि साजन का अभिवादन भी करती है। इला के दुखपूर्ण जीवन की छांह में यश्वी के कुम्हलाये बचपन को देखा जा सकता है। बचपन व एकाकीपन एक दूसरे के विपर्यय हैं। पर यश्वी के अपनी गुड्डी के संग आँख-मिचैनी खेलने की मार्मिकता को उस दृश्य के दौरान ही अनुभूत किया जा सकता है।

तकरीबन एक घंटे पैंतालीस मिनट की अवधि में यह फिल्म अपनी एक आहिस्ता गति से खुलती है। इस खुलने के क्रम में जिस कदर बारीकी और ब्यौरो के यथाप्रसंग युगलबंदी से अपने परास का फैलाती है, उससे रितेश बत्रा की सिनेमाई चेतना का अहसास होता है। बेहद चुस्त एडिटिंग और दृश्यों के मार्फत् कहानी को बयां करने की जिद की वजह सेलंचबाॅक्ससमकालीन फिल्मकारों के फिल्मगोई के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाती दिखती है। रितेश बत्रा की सिनेमाई चेतना के बहानेलंचबाॅक्सऔरलंचबाॅक्सके जरिये रितेश बत्रा पर थोड़ी और बातें करने की इच्छा है। भलेलंच बाॅक्सके शुरुआती दृश्यों और बीच के हिस्सों में मुम्बई को फिल्माने की जो कोशिशें हैं, वह किरण राव केधोबी घाटमें मुम्बई और शुजाॅय घोष कीकहानीमें कोलकाता को फिल्माने की संजीदगी से कमतर है। खासकरघोबी घाटऔरकहानीमें शहरों के लिए जो बैकग्राउण्ड स्कोर है, वैसे सिनेमेटिक सेन्स को रितेश बत्रा नेलंच बाॅक्समें इस्तेमाल नहीं किया है (संभव है कि इसकी एक बड़ी वजह फिल्म का बजट रही हो)। पूरी फिल्म देखने के बाद यह बात थोड़ी खटकने वाली लग रही थी। क्योंकि अगरलंच बाॅक्सकी ओपनिंग सीन को आप देखें तो मंथर गति से खुलती मुम्बई लोकलों की समांतरता और छत पर अपने पंख संवारते कबूतरों का जत्था निहायत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है। पर उसके बाद मुम्बई की बजाय मुम्बई के डब्बेवालों की निगाह से मुम्बई को फिल्माने में जो फिल्मांकन केडाक्यूमेंट्री फार्मका इस्तेमाल किया गया है, दृश्यों में उसके कारण अचानक से जो रुखरापन या खुरदरापन आता है। दृश्यों का वह खुरदरापन मुम्बई के डिब्बेवालों को फिल्म के एक अनिवार्य सन्दर्भ के बतौर स्थापित करता है। बाद में जानने की कोशिश की तो मालूम हुआ कि रितेश बत्रा बुनियादी तौर पर मुम्बई के इन डिब्बावालों पर फिल्मनुमा कुछ बनाना चाह रहे थे जिसके लिए 2007 से वह उन पर काम कर रहे थे। बल्कि फिल्म के दौरान जो डिब्बेवालें हैं। वे वास्तविक डिब्बेवाले हैं। पूरे फिल्म के दौरान इला के द्वारा साजन फर्नांडिस को भेजा गया खाने का डब्बा इन्हीं डिब्बेवालों के साथ नत्थी कर दिया गया था। और सात दिन तक उस डिब्बे को शहर के अलग-अलग राहों और हाथों से गुजरते हुए फिल्माया गया है। फिल्माने की इस अदा और बाद में फिल्म के समापन पर उसके प्रभावों के बारे में आप सोचें तो आप कुछ-कुछ ईरानी फिल्मों के आस्वाद-सा अपने भीतर घुलता महसूस कर सकते हैं। जैसे ईरानी फिल्मकारों की एक पूरी पीढ़ी बेहद छोटे-छोटे विषयों पर नायाब फिल्मों का निर्माण करती आई है। वैसे हीलंच बाॅक्सएक ऐसी ही मामूली-सी लगनेवाली गैरमामूली फिल्म है।
रितेश बत्रा के शार्ट फिल्मों को गर आप देखें और उसी सिलसिले मेंलंचबाॅक्सको देखें तो उनकी दो खूबियों को पहली निगाह में पहचाना जा सकता है। शब्द की तुलना में दृश्य उनके लिए प्राथमिक महŸव की चीज है। वे यथासंभव दृश्यों के मार्फत् खुद को व्यक्त करना पसन्द करते हैं और दूसरा मितव्ययिता। वे शब्दों को बेहद नपा-तुला उपयोग संवादों के दौरान करते हैं। इस मितव्ययिता में जो एक अन्तनिर्हित काव्यात्मकता होती है, उसे एक नियमित अंतराल परलंचबाॅक्समें महसूसा जा सकता है। दृश्यों के जरिये कहानी को बयां करने का उनका आग्रह भाव-नावों को उनकी फिल्मों की केन्द्रीय संवेदना के तौर पर प्रस्तावित करता है। इसलिएलंचबाॅक्समें क्रियायें भी भावों को समृद्ध करने वाली सहायक की भूमिका में दिखती हैं। जाहिर है भावों की इस सान्द्रता को फिल्माने में कैमरा की निगाह में जो गहराई होनी चाहिए, उसके साथ सही तरीके से न्याय करने की चाहत से हीलंचबाॅक्समें कैमरे केक्लोज अप्सका बहुधा किन्तु न्यायसंगत प्रयोग देखा जा सकता है।

रितेश बत्रा का लम्बा अनुभव पटकथाकार की रही है। उनके इस अनुभव सेलंचबाॅक्सको समृद्ध होते देख सकते हैं। इस लिहाज से भी रितेश बत्रा की सिनेमाई चेतना के सन्दर्भ में दो बातें जरुरी तौर पर रेखांकित करने लायक लगती हैं। पहला, किरदारों के रेखांकन के सन्दर्भ में और दूसरा पटकथा लेखन के उस परम्परागत निगाह के अतिक्रमण में जो पटकथा को या तोहीरेासेन्ट्रिकयाजाॅनरसेन्ट्रिकमानती आई है। रितेश बत्रालंचबाॅक्समें इस परम्परागत नजरिये को इस कदरप्राब्लमेटाइजकरते हैं कि इस फिल्म को न तो बेहद सहजता सेहीरोसेंट्रिकही कहा जा सकता है और न किसीजाॅनरमें ही फिट किया जा सकता है।लंचबाॅक्सको देखते हुए यह बात कही जा सकती है कि एक उम्दा पटकथा के साथ न्याय कर सकने लायककास्टिंगआपने कर ली तो आधी फिल्म उसी वक्त बन गई। इरफान और नवाजुद्दीन के बरक्स निम्रत कौर की कास्टिंग के बाबत इस बात को कह रहा हूँ। गर कायदन आप पूरी फिल्म को देखें तो इला का चरित्र इधर हाल के दिनों में किसी भी अभिनेत्री के द्वारा अभिनीति भूमिकाओं में से सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में से एक है। आरती आचरेकर (देशपांडे आंटी) की आवाज पर निम्रत कौर के जोरेस्पांसेजहैं। उसकी सूक्ष्मता और सटीकता से निम्रत के अभिनय की रेंज का पता चलता है। मैंने पहले भी कहा है कि शब्दों के बजाय दृश्यों में बात करना रितेश बत्रा को पसन्द है। दृश्यों में भी भावनाओं और संवेदनाओं को सटीकता से संप्रेषित कर सकने की उनकी जिद से निम्रत वह दे सकी है कि वह कोई दूसरी फिल्म न भी करे तो उसकी यह भूमिका सिनेप्रेमियों को एक लम्बे अरसे तक याद रहेगी और मुझ जैसे सिनेप्रेमी को ताउम्र। भावों को सटीकता सेकन्वेन करने के दो खराब उदाहरण रख रहा हूँ जिससे निम्रत की यह प्रशंसा अतिरंजित न जान पड़े। एकराॅकस्टारमें नरगिस फाकरी का अभिनय और दूसराराँझणामें सोनम कपूर का।

एक अच्छी पटकथा किसी फिल्म की रीढ़ हुआ करती है।लंचबाॅक्सकी पटकथा में जो कसाव और व्यवस्थित ब्यौरे हैं, उस पर थोड़ी ही सही पर बात जरुरी है। फिल्म की शुरुआत में इला के कपड़े सूंघ कर वाशिंग मशीन में डालने की आदत का समापन फिल्म के समापन से पहले होता है, जो इस बात को जाहिर करता है कि उसने अपने पति के अफेयर को अपनी नियति मान ली है। ट्रेन में असलम शेख के द्वारा आफिस के फाइलों पर सब्जियाँ काटने का सिलसिला उसके बाॅस की टेबुल तक पहुँचता है, जब वह पूछता है कि इन फाइलों से लहसुन, प्याज और आलू की गंध क्यों आती है? साजन के डब्बेवाला के टिफिन का कवर एग्जैटली वही है, जो इला इस्तेमाल करती है। साजन जब डब्बेवाला के पास जाता है तो उसकी शेल्फ पर वैसे दर्जनों कवर लगे डब्बे पड़े होते हैं। फिल्म की शुरुआत में ही इला का पति और साजन एक ही ट्रेन की एक ही बोगी में सफर करते हुए पाये जाते हैं। जो इस ओर इशारा करता है कि उनका दफ्तर कहीं आस-पास ही पड़ता होगा, जिससे यह डब्बों की अदला-बदली वाला कांड हो गया है। पूरे फिल्म में इला का पति कभी इला के साथ एक कायदे का फ्रेम साझा नहीं करता है। एक जगह इला अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए एक और बच्चे की बात कह रही होती है तो उस दौरान भी वह कन्नी काट कर निकल जाता है और सामने के दर्पण में इला की साझीदार उसका प्रतिबिम्ब भर रह जाता है। यह अकारण नहीं है कि साजन को लिखे अपनी चिट्ठियों में इला अपने पति राजीव को नाम से नहीं, बल्किहसबेंडकह कर संबोधित करती है, जो एक ओहदा सरीखा लगता है।  

देशपांडे आंटी के बतौर भारती आचरेकर की आवाज के ठोसपने से उसकी अमूर्तता हवा हो जाती है। खाली डिब्बे में लौटे खत को भर गिलास चाय के साथ पलथी मार के पूरी तसल्ली से पढ़ने की अदा हो, देशपांडे आंटी की आवाज पर बदलती चेहरे की रंगत जैसे अनेक मौके हैं जहाँ रितेश बत्रा की डिटेलिंग की कोई सानी नहीं है। यों तो इस पीढ़ी के फिल्मकारों में दिबाकर बैनर्जी की जोडिटेलिंगकी क्षमता है, वह माशाअल्लाह है। पर इस अकेले फिल्म के बूते रितेश बत्रा कीडिटेलिंगका कोई जोड़ नहीं है।लंचबाॅक्ससर्जनात्मक स्तर पर वाकई एक शानदार फिल्म है, जिसका जायका याद रह जाने लायक है। कई और कोण हो सकते हैं जैसे कि इला का हिन्दू होना, साजन का ईसाई होना और असलम का मुस्लिम होना, पर इसकी कोई सुसंगत व्याख्या फिल्म की बुनियादी संवेदना से जुड़ने लायक कड़ियाँ मैं नहीं जुटा सका, वैसे प्रचलित मुहावरों में इसके लिए एक बेहद खूबसूरत शब्द उपलब्ध है-‘सेकुलर इमेज। आप चाहें तो इस्तेमाल कर सकते हैं।


संपर्क- 09308990184

Tuesday, July 22, 2014

सवाल ये है कि ‘नीला स्कार्फ’ है क्या?

इस समय वह हिंदी की एक बड़ी परिघटना है- नीला स्कार्फ. प्री-लांच यानी किताब छपने से पहले इस किताब की अब तक करीब 1400 प्रतियाँ बिक चुकी हैं. इस किताब ने हिंदी के बहुत सारे मिथों को तोड़ दिया है. जिसमें सबसे बड़ा मिथ यह है कि हिंदी में किताब बिकती नहीं है, यह कि जब तक कोई ‘बड़ा’ संपादक-आलोचक सर पर हाथ न रखे तब तक हिंदी में लेखक बनना असंभव है. अनु सिंह चौधरी के इस कहानी संग्रह ने न जाने कितने लेखकों में यह विश्वास पैदा किया है कि अपने लेखन के दम पर भी खड़ा हुआ जा सकता है. आज हजारों पाठकों की तरह मैं भी ‘नीला स्कार्फ’ की प्रतीक्षा में हूँ. फिलहाल पढ़ते हैं अनु सिंह चौधरी का लेखकीय वक्तव्य जो ‘नीला स्कार्फ’ के बनने को लेकर है, जीवन की आपाधापी में समय चुराकर लेखिका के बनने को लेकर है. ‘जानकी पुल’ के पाठकों के लिए ख़ास तौर पर- मॉडरेटर.
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डिस्केलमर - मैंने ऐसी कोई भी बात नहीं कही जो पहले किसी ने न कही हो। मैने कुछ भी ऐसा नहीं लिखा जो पहले लिखा न गया हो।

फिर ‘नीला स्कार्फ’ में ऐसा क्या था, जो किताब को इस किस्म की प्रतिक्रिया मिली? तब जब कि किताब छपी नहीं? मैं जानती हूं कि बारह-तेरह सौ की प्रीबुकिंग कोई अजूबा नहीं है। मैं ये भी जानती हूं कि एक बार किताब की रिलीज़ के बाद ये ज्वार उतर भी सकता है। मैं ये भी अच्छी तरह समझती हूं कि इस किस्म की प्रतिक्रिया ने मेरे माथे पर अपेक्षाओं का बोझ बढ़ा दिया है। मुझे लगातार ऐसा लग रहा है कि मैं ब्लॉग करते हुए, फेसबुक पर स्टेटस अपडेट डालते हुए, बिना किसी औपचारिकता के और बहुत बेबाकी से कतरा-कतरा अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा पब्लिक प्लेटफॉर्म पर डालते हुए ही ठीक थी। मुझपर कल सुबह से कहीं किसी गुमनाम जगह भाग जाने का खयाल तारी है। मैंने कल एक बेहद करीबी दोस्त को कहा था, दिस इज़ गेटिंग टू बिग फॉर माई कम्फर्ट।

लेकिन मेरे लिए अपनी किताब को लेकर डिटैच होना और फिर इस अप्रत्याशित फेनोमेनन को समझना और इसके बारे में बात करना बहुत ज़रूरी है। इसलिए भी क्योंकि जाने-अनजाने मैंने अपने ही जैसे कई क्लॉज़ेट राईटर्स (कमरों में बंद होकर लिखनेवालों, ख़ासकर लिखनेवालियों) की उम्मीदें हरी कर दी हैं। मेरे इनबॉक्स में आनेवाले ई-मेल्स और छोटे-छोटे संदेश इस बात के गवाह हैं कि एक किताब एक नहीं, कम-से-कम चार-पांच लेखकों को जन्म देती है। एक किताब कई सारे ख़्वाब भी जगा देती है।

सवाल ये है कि ‘नीला स्कार्फ’ है क्या?

‘नीला स्कार्फ’ उन कहानियों का संग्रह है जो मैंने अपना खाली वक़्त भरने के लिए, अपने बच्चों को बड़ा करते हुए लिखीं। ‘नीला स्कार्फ’ उस सफ़र का गवाह है जो पिछले पांच-छह सालों में मैंने तय किया।

शुरुआत कुछ ऐसे हुई। एक दिन फेसबुक अकाउंट बना दिया गया – मेरे छोटे भाई ने बनाया था शायद। मुझे ठीक-ठीक याद भी नहीं कि बच्चे तब कितने छोटे थे। फिर एक दिन प्रियदर्शन जी ने कहा कि घर में रहती हो तो कुछ लिखती क्यों नहीं? ब्लॉग लिखो। एक दिन आकर मेरे टूटी-फूटी कविताओं पर (बहुत तीखी और बेबाक) प्रतिक्रिया भी दे गए। फिर पता नहीं कैसे पहला ब्लॉग लिखा, फिर दूसरा और फिर तीसरा। और फिर डायरी की तरह वो ब्लॉग लिखती रही, लिखती रही। कभी बच्चों को सुलाकर लिखा, कभी उन्हें प्लेस्कूल भेजने के बाद लिखा। कभी एडिटिंग और अनुवाद के असाईनमेंट्स के बीच लिखा, कभी मायके-ससुराल में बैठकर लिखा। कभी ट्रेन में वक्त काटने के लिए लिखा, कभी एयरपोर्ट पर अपने दाएं-बाएं उछलते बच्चों की शरारत से ध्यान हटाने के लिए लिखा। 

फेसबुक का इस्तेमाल करते हुए पता चला कि मुझे बांटने की बीमारी थी, अपने आस-पास के कई और लोगों की तरह। (जानकी पुल भी उसी बीमारी का नतीजा है – फ्री कॉन्टेंट बांटने की बीमारी का)। अच्छी कविता पढ़ी तो अपने जैसे दो-चार लोगों को पढ़वाने का जी चाहा। किसी याद ने सताया तो पूछ बैठी कि तुम्हारे साथ भी ऐसा होता है क्या? फिल्म देखी तो तीन लाईन में रिव्यू लिख दिया। कहीं काम के सिलसिले में घूमने गई तो पूरा का पूरा ट्रैवेलॉग दस लाइनों में फेसबुक पर डाल दिया। मैं अकेली नहीं थी जो ये कर रही थी। मेरे जैसे हज़ारों लोग हैं जो फेसबुक का क्रिएटिव इस्तेमाल कर रहे हैं।

बहरहाल, फेसबुक वो खिड़की थी जो दुनिया को नई नज़र से देखने का रास्ता खोल रही थी मेरे लिए। फेसबुक और ब्लॉग वो ज़रिया भी बन गया जिसके रास्ते मुझसे लोग पूछने लगे, तुम हमारे लिए ये लिख सकोगी? या फिल्म बना सकोगी? या कन्सलटेंसी का काम कर सकोगी? मैं जिन निजी कहानियों को साझा कर रही थी उसके बदले कई सारे दोस्त और शुभचिंतक बनने लगे। मैं जिस फेसबुक पर अपनी ज़िन्दगी के टुकड़े बांट रही थी, उसी फेसबुक के ज़रिए मुझे अपने वजूद की ख़ातिर बड़ा मकसद मिलने लगा। गांव कनेक्शन उनमें से एक था। याद शहर उनमें से एक था। यात्रा बुक्स और बाद में हार्पर हिंदी के साथ मेरा रिश्ता उसी फेसबुक असोसिएशन का नतीजा था।

खुलकर अपनी बात कहने, और ईमानदार बने रहने ने मुझे क्लायंट्स कम, दोस्त ज़्यादा दिए। उन्हें मालूम था कि मैं गायब नहीं हो सकती। मैं कहां हूं, क्या कर रही हूं, किन रास्तों पर चल रही हूं – पता लगाना बहुत आसान था। मेरा रेफरेंस चेक करना बहुत आसान था। इसलिए असाइनमेंट्स के लिए, काम के लिए मुझे कभी पिच नहीं करना पड़ा। मुझे काम मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ी। फेसबुक, गूगल और ब्लॉग मेरे लिए उस रेफ़री का काम कर रहे थे जिनकी ज़रूरत नौकरियां या काम ढूंढते हुए आपको पड़ती है। मुझे पब्लिशर खोजने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी। मेरा लिखा हुआ जो भी अच्छा-बुरा था, पब्लिक प्लैटफॉर्म पर मौजूद था।

‘नीला स्कार्फ’ कई सालों की उसी ईमानदारी का प्रतिफल है। मेरी किताब खरीदने वाले वो क्लायंट हैं जिनसे मैंने कभी नहीं पूछा कि आप मुझसे प्रो-बोनो काम करा रहे हैं, या पैसे भी देंगे मुझे? किताब खरीदने वाले वो पुराने सहयोगी हैं जिन्होंने मुझे काम करते देखा है। किताब खरीदने वाले फेसबुक के वो दोस्त हैं जिन्हें एक पोस्ट में अपनी परछाई नजर आती है। किताब खरीदने वाले वो दो सौ फॉलोअर्स हैं जो मेक्सिको, चिली, चाइना, नाइजीरिया और पता नहीं कहां कहां से मेरे बेहद निजी पोस्ट्स पढ़ते हैं (जिन्हें मैं सिर्फ और सिर्फ भड़ास मानती रही आज तक)। किताब खरीदने वाले और उसके बारे में बात करने वाले वो लोग हैं जो मुझे सालों से निजी तौर पर जानते हैं – जिन्होंने पंद्रह साल की लड़की से पैंतीस साल की औरत हो जाने का मेरा सफ़र देखा है – मेरे दूर के रिश्तेदर, मेरे बचपन के दोस्त जिनसे मैं फेसबुक से वापस जुड़ी। मेरी ग़लतियों के साक्षी रहे हैं ये लोग, मेरे आलोचक रहे हैं, कभी प्यार किया है मुझसे तो कभी मेरी बेवकूफ़ियों पर मुझे माफ़ न करने की कसमें खाई हैं।

‘नीला स्कार्फ’ और कुछ नहीं है, ऐसे ही कई बेहद करीबी रिश्तों का सेलीब्रेशन है।  

लिखने के लिहाज़ से मैं चाहे जितनी भी आलसी रहूं, ऑर्गनाइज़ करने के मामले में (और टू-डू लिस्ट बनाने में) मैं अव्वल दर्ज़े की फ़ितूरी हूं। मुझे हर काम योजना के तहत, सलीके से किया हुआ चाहिए। मेरी तमाम बेतरतीबियों के बीच काम के मामले में सलीका वो लक्ष्य है जिसे मैं हर रोज़ पूरा करने की कोशिश करती रहती हूं। लेकिन ‘नीला स्कार्फ’ लिखने और उसे किताब की शक्ल देने में कोई स्ट्रैटजी, कोई योजना काम नहीं आई। बल्कि इस एक किताब ने मेरी समझ की कई सारी धारणाओं को धराशायी कर दिया है। मैंने तय किया कि किताब नए और छोटे पब्लिशर के पास ले जाऊंगी (शैलेश से मैंने कहा था कि दो सौ कॉपियां मेरा लक्ष्य हैं)। मैंने ये भी तय किया कि मैं किसी से इस किताब के बारे में बात नहीं करूंगी (किताब के प्रोमोशन को लेकर मेरे और शैलेश के बीच में भयंकर मतभेद हुए)। अपनी सारी कमज़ोरियां यहां इस पन्ने पर आकर लिख देना भी एक पुरानी धारणा को तोड़ने जैसा ही है कि हम अपने लिखे हुए के बारे में खुद ही कैसे बात करें? ये अपना पीआर खुद करना होगा। मैं नहीं जानती कि पीआर का असली मतलब क्या होता है, लेकिन वन-ऑन-वन रिलेशन की जो कमाई मैंने पिछले पांच सालों में हासिल की, ‘नीला स्कार्फ’ वो जमापूंजी है (और उसी जमापूंजी की बदौलत मैं खुलकर अपनी किताब के बारे में यहां लिख पा रही हूं)।   

‘नीला स्कार्फ’ कई सारी तकलीफ़ों का गवाह भी है। ये तकलीफ़ें अकेले बैठकर रात-रात भर खुद से जूझते हुए कहानी लिखने की कोशिश और फिर उसमें असफल हो जाने से पैदा होती रहीं। ये तकलीफ़ें उन सवालों से पैदा हुईं जो अक्सर अपने ही घर में अपने ही लोग पूछते थे – इतना क्या लिखती रहती हो? ये तकलीफ़ें उस बेचैनी, उस गुमख़्याली से पैदा हुईं, जो सिर्फ एक लिखनेवाला ही समझ सकता है। कि जब आप एक कहानी को किसी मुकाम पर पहुंचा न पा रहे हों तो क्यों आस-पास की आवाज़ें आपको रुचिकर नहीं लगतीं? कि जब आप कहानियां लिखना शुरु करते हैं तो क्यों सतह से खरोंचकर भीतर की परतों में झांकने का पागलपन आप पर सवार हो जाता है? ये एक लिखने वाला ही समझ सकता है कि अपने लिए लिखने की ज़िद और किसी दूसरे मकसद से (जैसे क्लायंट, फॉर्मैट या डेडलाइन) के लिए लिखे के बीच का संतुलन कैसे आपको पागल बना सकता है। ‘नीला स्कार्फ’ उसी संतुलन को बनाने-बचाने की ज़िद का नतीजा है।


‘नीला स्कार्फ’ एक कन्फेशन भी है – कि आप लिख रहे होंगे तो वो नहीं होंगे जो आप आम तौर पर हैं। आपके भीतर की कई दुनिया आपको दिन-रात परेशान किए रहेगी और ये परेशानी आपका दिमागी हालत पर गहरा असर कर सकती है। ‘नीला स्कार्फ’ ने एक और बात सिखाई है मुझे – जब आप नया रचने की कोशिश कर रहे होते हैं (चाहे वो कुछ भी हो, कितना ही अदना और साधारण क्यों न हो) तो इस दौरान कभी आप ग़लत समझे जाएंगे कभी आपकी समझ ग़लत होगी। ‘नीला स्कार्फ’ इसी अन्वेषण से पैदा हुआ प्रॉडक्ट है।