Friday, March 27, 2015

जेंटलमैन लेखक थे विजय मोहन सिंह

विजय मोहन सिंह नहीं रहे. यह सुनते ही सबसे पहले मन हिन्दू कॉलेज होस्टल के दिनों में वापस चला गया. मेरा दोस्त आनंद विजय उनका नाम लेता था, कहता था बड़े लेखक हैं. उसके पिता के साथ उन्होंने कभी महाराजा कॉलेज, आरा में अध्यापन किया था.

विजय मोहन जी को मैंने बहुत बाद में पढ़ा. उनसे पहला परिचय संपादक के रूप में हुआ था. 90 के दशक में वे हिंदी अकादेमी, दिल्ली के सचिव बने थे. मेरे जानते वह हिंदी अकादेमी का स्वर्ण काल था. उसकी पत्रिका ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’ अचानक से उस दौर में प्रासंगिक हो गई थी. मुझे याद है मेरे प्राध्यापक स्वर्गीय दीपक सिन्हा, अग्रज लेखक संजीव कुमार के पास उस पत्रिका के अंक मिल जाया करते थे. आज भी उस पत्रिका के कई अंक दिमाग में चित्रित हैं. वह अंक जिसमें मार्केज के इंटरव्यू का अनुवाद छपा था. याद रखिये, वह गूगल बाबा का ज़माना नहीं था. तब पत्र-पत्रिकाएं ही सूचना और ज्ञान का स्रोत हुआ करती थी. पहली बार मैंने मार्केज, उसकी बातचीत की पुस्तक ‘फ्रेगरेंस ऑफ़ ग्वावा’ का जिक्र ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’ के पन्नों पर ही देखा था. यही नहीं, रोलां बार्थ के लेख ‘लेखक की मृत्यु' का अनुवाद. एक तरह से उत्तर आधुनिकता से हमारा पहला परिचय हिंदी अकादेमी की पत्रिका ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’ ने ही करवाया था, जिसके संपादक विजय मोहन सिंह थे. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब उनको श्रद्धांजलि देते हुए किसी ने इस पहलू को याद नहीं किया. असल में, हम बहुत अधिक वर्तमान में जीने लगे हैं. स्मृतिहीन होते जा रहे हैं. लगे हाथ यह भी बता देना चाहता हूँ कि ‘कविता दशक’, कहानी दशक’, ‘आलोचना दशक’ जैसे यादगार संचयन भी उनके रहते ही हिंदी अकादेमी से आया था, जिक्रे मीर का अनुवाद भी, और हाली की लिखी ग़ालिब की पहली जीवनी का अनुवाद भी.

उनकी एक गुरु गंभीर छवि मन में अंकित रह गई. बहुत बाद में जब मिलना हुआ तो उनकी आत्मीयता का कायल हो गया. मैं उन दिनों बहुवचन का संपादन करता था और व्यवस्थित रूप से लेखक नहीं बना था. उनके वसुंधरा एन्क्लेव स्थित घर मैं अक्सर जाता था. हेमिंग्वे की कहानियों के वे जबरदस्त अध्येता थे, और उन्होंने ही मुझे यह सिखाया था कि कहानी लिखते हुए सब कुछ कह नहीं देना चाहिए, कुछ पाठकों के लिए भी रहने देना चाहिए. यही तो कहानी का कहानीपन होता है, और किसी कहानी को रिपोर्ताज होने से बचाता भी है. उन्होंने मुझे सिखाया कि हेमिंग्वे की कहानियों की यही ब्यूटी है, जिसे बाद में आलोचकों ने ‘हिडेन फैक्ट’ के नाम से पहचाना. प्रसंगवश, मेरे पहले कहानी संग्रह ‘जानकी पुल’ में एक कहानी ‘हिडेन फैक्ट’ है, जिसका आधार उनका यही ज्ञान है. मुझे याद है और इस बात पर मुझे गर्व भी है कि जब कई किताबों के साथ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित मेरे पहले कहानी संग्रह ‘जानकी पुल’ का लोकार्पण हुआ था तो उस दिन वे वक्ता के रूप में मौजूद थे. वहां वे काफी देर तक हिडेन फैक्ट पर बोलते रहे थे.

यह मैं नहीं कह सकता कि मैंने उनके जैसा पढ़ाकू लेखक नहीं देखा लेकिन यह जरूर कहना चाहता हूँ कि हर तरह के विषय में न सिर्फ उनकी गहरी रूचि थी बल्कि अच्छा दखल भी रखते थे. हेमिंग्वे के अलावा जिस दूसरे अमेरिकी लेखक में उनकी गहरी आस्था थी वे नार्मन मेलर थे. मनोहर श्याम जोशी के अलावा हिंदी के वे दूसरे लेखक थे जो अमेरिकी लेखकों को पसंद करते थे. वरना वे जिस पीढ़ी के थे उस पीढ़ी के लिए रुसी लेखकों के अलावा और कोई लेखक माना ही नहीं जाता था. उन्होंने एक बहुत अच्छी किताब सार्त्र पर भी लिखी थी, जो संवाद प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी.

मैं उनको पढता था और अक्सर सहमति-असहमति दर्ज करने उनके घर पहुँच जाता था. वे खुद जितना स्नेह करने वाले थे, उनकी पत्नी उनसे भी अधिक. एक बार मुझे याद है उन्होंने मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘हमजाद’ की समीक्षा इण्डिया टुडे में लिखी थी, जिसमें उन्होंने उसे घोर अश्लील उपन्यास ठहराया था और उसे ख़ारिज कर दिया था. मैं गुस्से में उनके घर गया और सख्ती से अपनी असहमति दर्ज करते हुए बोला कि आपने यह समीक्षा जोशी के उपन्यास पर नहीं उनके व्यक्तित्व पर लिखी है और यह आपकी बेईमानी है. वे हँसने लगे, बोले, अपने गुरु से यह क्यों नहीं कहते हो कि कभी कुछ अपनी शैली में भी लिख लें. लिखना चाहते हैं हेमिंग्वे की तरह लिख जाते हैं फिलिप रोथ की तरह. फिलिप रोथ भी अमेरिकी लेखक हैं और उनके लेखन में भी अश्लील प्रसंग बेधड़क आते हैं. मुझे याद है उन्होंने कहा कि मनोहर श्याम जोशी ने इतना अधिक पढ़ रखा है कि वह जब लिखते हैं तो वे सारे लेखक उनके उपन्यासों में उतरने लगते हैं. उनमें मौलिकता एकदम नहीं है.

उस दिन उनके घर मालपुए खाने को मिले.

मैं पढ़ रहा था कि लोगों ने लिखा है कि वे फिल्म संगीत के बड़े अच्छे ज्ञाता थे. जहा तक मुझे याद आता है उन्होंने बीएचयू से संगीत की बाकायदा पढ़ाई की थी. एक प्रसंग और याद आता है. जिन दिनों पंकज राग की किताब ‘धुनों की यात्रा’ के हम दीवाने होते थे उन्हीं दिनों उन्होंने उसकी समीक्षा इण्डिया टुडे में लिखी थी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि लेखक ने पुस्तक में शुद्ध रागों पर आधारित फ़िल्मी गीतों की सूची दी है, जबकि ज्यादातर फ़िल्मी गीत शुद्ध रागों पर नहीं मिश्र रागों पर आधारित होते हैं.

वे कहानियों के गहरे आलोचक और खुद भी बड़े अच्छे कथाकार थे. हिंदी में डीकेइंग बुर्जुआ क्लास को लेकर लिखने वाले वे अकेले लेखक थे. अगर मैं गलत नहीं हूँ तो उनकी कहानी ‘शेरपुर 15 मील’ कहानी है, जो बिखरती जमींदारी के ऊपर है. हम हिंदी वालों ने सामंती संस्कृति को बिना समझे ख़ारिज किया, कभी उसको समझने का प्रयास नहीं किया.

मेरे पहले कहानी संग्रह ‘जानकी पुल’ का ब्लर्ब उन्होंने लिखा था जो उनका दिया एक अमूल्य तोहफा है, जो आजीवन मेरे साथ रहेगा. वे जेंटलमैन थे. उखाड़-पछाड़ से दूर रहने वाले. अपनी तरह के अकेले. वह जो रिक्त स्थान छोड़ गए हैं उसकी पूर्ति कभी नहीं हो पायेगी.

विजय मोहन जी नार्मन मेलर की लिखी मर्लिन मुनरो की जीवनी के बड़े कायल थे. उनकी स्मृति में मैं उस किताब को दुबारा पढूंगा. जो उन्होंने मुझे अपने निजी संग्रह से दी थी.

विजय मोहन जी को अंतिम प्रणाम! 

Wednesday, March 25, 2015

हिंदी सिनेमा की नई 'क्वीन'

कल घोषित सिनेमा के राष्ट्रीय पुरस्कारों में 'क्वीन' फिल्म के लिए कंगना रानावत को सर्वश्रेष्ठ नायिका का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. प्रियदर्शन का यह लेख 'क्वीन' के बहाने सिनेमा की बदलती नायिकाओं को लेकर है. लेख पुराना है लेकिन आज एक बार फिर प्रासंगिक लगने लगा है. आप भी पढ़कर बताइयेगा- मॉडरेटर 
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रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास नौका डूबी की नायिका को जब पता चलता है कि उसका पति बदल चुका है और वह किसी और को पति मानकर रह रही है तो वह पहले आत्मदया में डूब जाती है, फिर आत्महत्या की सोचती है और आख़िरकार अपने भाग्य के भरोसे अपने खोए हुए पति की तलाश में अपना सर्वस्व होम कर निकल पड़ती है। यह गुरुदेव की कथालीला है कि वे अंत में सबको मिलाते हैं और एक बहुत दिलचस्प और मानवीय उपन्यास अपने सुखद अंत तक पहुंचता है।

भारतीय कथा संसार पतियों द्वारा छोड़ी गई, प्रेमियों द्वारा छली गई, घर से निकाली गई, लेकिन घर बनाने-बसाने को बेताब-दृढ़संकल्प स्त्रियों का भी संसार है- शायद कहीं इस मान्यता से अनुप्राणित कि यह स्त्री है तो घर है, संसार है और उसकी धुरी है। यह नहीं रहेगी, या ऐसी ही नहीं रहेगी तो धरती अपनी धुरी से खिसक जाएगी, संसार की लीला उलट-पुलट जाएगी, घर-परिवार बिखर जाएंगे, उनकी रची सभ्यता नष्ट हो जाएगी। जाहिर है, इस कथा-संसार को आभास नहीं है कि उसकी तय दुनिया सिरजने में, उसके घर-बसाने में, उसकी सभ्यता बचाने में स्त्री की अपनी दुनिया किस तरह-तरह तार-तार है, उसके अपने स्वप्न कैसे तहस-नहस हैं, उसका अपना वजूद कैसे बिल्कुल दासीत्व की नियति झेलने को मजबूर है।

बेशक, इस कथा के समांतर कई उपकथाएं भी हैं जो खासकर हाल के वर्षों में खूब सामने आई हैं जिनमें कहीं स्त्री के विद्रोह की कहानी, कहीं उसके दर्द की दास्तान, कहीं उसकी मुक्ति की बेचैनी और कहीं उसकी आज़ादी की राह भी खोजी गई है। हिंदी साहित्य के अलावा हिंदी सिनेमा भी इस स्त्री को बार-बार सिरजता और तलाशता रहा है। दो तरह की स्त्रियों के स्टीरियोटाइप हिंदी सिनेमा में खूब दिखते रहे हैं- एक तो बिल्कुल पतिव्रता, सती-सावित्री, लजीली स्त्री छवि है जो नायक को भाती है और अंत में नायक का घर बसाती है। दूसरी स्त्री छवि सिगरेट के छल्ले बनाती, क्लबों में नाचती-गाती, माफ़िया गिरोहों से लेकर कोठों तक में घिरी हुई उस बागी प्रतिनायिका से बनती है जिसका अंत में उद्धार होना है, जिसे हीरो-हीरोइन को बचाते हुए मारा जाना है- अगर बचना भी है तो हृदय परिवर्तन के साथ। करीब 60 साल पहले आई फिल्म श्री 420 की नादिरा और नरगिस इन दो अलग-अलग स्त्री छवियों की प्रतिनिधि हैं जिन्हें बाद में कई फिल्मों में थोड़े-बहुत बदलावों के बीच- कभी अलग-अलग और कभी साथ-साथ लगातार दुहराया जाता रहा है।

लेकिन इक्कीसवीं सदी की भारतीय स्त्री बदल रही है और उसके साथ भारतीय सिनेमा का नज़रिया भी बदल रहा है, इसे बताने वाली कई फिल्में हाल के दौर में आई हैं। खासकर जो युवा निर्देशक आ रहे हैं, वे छवियों के इस बने-बनाए जाल से बाहर जाकर हाड़-मांस के जिंदा किरदार ख़डे कर रहे हैं। विकास बहल के निर्देशन में बनी पहली फिल्म क्वीनइसका एक बहुत रचनात्मक सबूत है। इस फिल्म की नायिका को उसका पूर्व प्रेमी और भावी पति शादी से ठीक दो दिन पहले छोड़ देता है। दिल्ली के नितांत मध्यवर्गीय और पारंपरिक संसार में पली इस नायिका की पूरी दुनिया ही जैसे उजड़ जाती है। कुछ देर के लिए लगता है, वह आत्महत्या कर लेगी। लेकिन वह ऐसा नहीं करती- जीने की एक दबी हुई भूख उसके भीतर फिर भी सिर उठाती है- देस-विदेश घूमने की तमन्ना के तहत पेरिस में हनीमून मनाने के ख़्वाब के साथ बनवाया गया पासपोर्ट, लिया गया टिकट और बुक किया गया होटल उसे याद आते हैं। और एक दिन अपने आंसुओं और मायूसी के बीच वह घरवालों को बताती है कि वह अकेली ही अपनी हनीमून ट्रिपपर जाएगी। यह असंभव सा लगता ट्रिप लेकिन संभव होता है। दिल्ली से चली एक नितांत मध्यवर्गीय लड़की डरी-सहमी पेरिस पहुंचती है, नामालूम सी भाषा से उलझती हुई, नामालूम से व्यंजनों से जूझती हुई, कहीं पुलिस से घिरती हुई, कहीं लुटेरे से बचती हुई, धीरे-धीरे जैसे अपने जाले साफ़ करती है। इन सबके बीच उसे एक ऐसी दोस्त मिलती है जिसका जीवन उसके अपने जीवन, अपने मूल्यों और अपनी मान्यताओं से काफी भिन्न है। धीरे-धीरे रानी को यह समझ में आता है कि खुलकर शराब पीने वाली और मनचाहे मित्रों से संबंध बनाने वाली यह लड़की अंततः एक भली लड़की है और उसकी सबसे अच्छी बात यह है कि वह अपनी शर्तों पर जी रही है। पहली बार वह पहचानती है कि उस पर कितनी सारी बंदिशें थोपी गई हैं। हल्के नशे में एक जगह उसकी बेबसी उभर आती है- हमारे यहां तो लड़कियों को कुछ भी अलाऊ नहीं है- डकार लेना भी अलाऊ नहीं है। कुछ भी अलाऊ नहीं है। कभी पेरिस से फौरन निकल जाने को बेताब रानी इसके बाद रुकती है और अपनी इत्तिफाक से ही हासिल आज़ादी का लुत्फ लेती है।

लेकिन रानी जब पेरिस से एम्सटर्डम पहुंचती है तो अपनी आज़ादी की शर्तें कुछ और कड़ी होकर उसके सामने खड़ी हो जाती हैं। इस बार उसे ऐसा हॉस्टल मिलता है जहां तीन अनजाने-विदेशी लोगों के साथ उसे ठहरना है। एक बार फिर वह इसके लिए तैयार नहीं है। लेकिन एक बार फिर डरते, सहमते-सिकुड़ते हुए वह पाती है कि दुनिया उतनी भयावह और बुरी नहीं है जैसी उसके लिए बना दी गई है। इस दुनिया में बहुत सारी लड़कियां अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर जी रही हैं और आज़ादी और असुरक्षा के हिंडोले में वे कम से कम उस सुरक्षित दुनिया से कहीं ज़्यादा बेहतर हैसियत में हैं जहां वे पति की कठपुतली होकर रहती है। यह दुनिया दरअसल रानी को उसका छुपा हुआ व्यक्तित्व लौटाती है।

ऐसा नहीं कि इस परिवर्तन के साथ रानी कोई क्रांतिकारी लड़की हो उठती है। वह पहले की तरह ही सहज है- बस ख़ुद को पहचान रही है और दुनिया को भी। उसका घूमना दरअसल दुनिया को देखना ही नहीं, दुनिया के आईने में अपने-आप को देखना भी हो जाता है। इसी दौरान ज़िंदगी उसके सामने वापसी का एक विकल्प भी रखती है। जिस पति ने छोड़ दिया था, अब वह उसके पीछे घूम रहा है- लगभग चिरौरी करता हुआ कि वह उसे माफ़ कर दे और अपना ले। वह रानी के लिए पेरिस आता है और फिर एम्सटर्डम भी पहुंच जाता है- बताता हुआ कि सब परिवार में उसका इंतज़ार कर रहे हैं।
इस मोड़ पर हिंदी फिल्मों की नायिकाओं का खोया हुआ सौभाग्य जैसे जाग जाता है। नौका डूबीकी कमला की कहानी वहीं ख़त्म हो जाती है जहां उसका पति उसे पहचान लेता है। लेकिन रानी ने दुनिया के समंदर में तैरते हुए अपने व्यक्तित्व की जो नौका अर्जित की है, उसे वह खोने को तैयार नहीं है।  सुहाग की वापसी के सौभाग्य का यह समारोह अब उसे नहीं चाहिए। वह भारत लौटती है, लड़के के घर जाती है, उसे उसकी अंगूठी लौटाती है और एक थैंक्स बोलकर निकल जाती है।

यह धन्यवाद किस बात का है? इस बात का कि नायक ने उसे छोड़ दिया और दुनिया नायिका की हो गई। अगर यह शादी हो गई होती तो रानी की कहानी शुरू ही नहीं होती। यह हिंदी सिनेमा की नई रानी है- अपने बोलचाल और पहनावे में बेहद मामूली- लेकिन इस मामूलीपन के साथ वह भारतीय समाज में बदलती औरत की छवि का एक सुराग दे जाती है। बेशक, पूरी फिल्म को कंगना रानावत का सहज अभिनय ऐसी विश्वसनीयता प्रदान करता है कि यह फिल्म हमारे लिए यादगार अनुभव में बदल जाती है।

इम्तियाज़ अली की फिल्म हाइवेकी नायिका क्वीन की तरह दबी-सहमी नहीं दिखती- वह कुछ बिंदास है और कुछ रोमांटिक भी। उसे एक खुली दुनिया और उसके ढेर सारे अनुभव चाहिए। रात के वक्त अपने दोस्त के साथ ऐसी ही खुली ड्राइव के बीच उसका अपहरण हो जाता है। आगे की कहनी फिर उसके बदलने की कहानी है। जिस अनपढ़ और खूंखार शख्स ने उसका अपहरण किया है, उसके भीतर भी एक मासूम इंसान बैठा हुआ है, यह वह पहचान पाती है। यह भी कि यह खूंखार शख्स कम से कम उसके उस चाचा से कहीं ज्यादा अच्छा है जो बचपन में उसे चॉकलेट देकर उसका जबरन यौन शोषण किया करता था।

जिस तरह सिहरते और हिचकते हुए आलिया भट्ट अपने भीतर की दबी हुई यह तकलीफ खुरचती है, इसका बयान करती है, वह बहुत मार्मिक है। वह याद करती है कि मां को जब उसने यह सब बताया तब हरक़त तो बंद हो गई, लेकिन उसे बस चुप करा दिया गया। यह लड़की जब किडनैप है तो कहीं ज़्यादा आज़ाद है, घर में भी तो कहीं ज़्यादा असुरक्षित थी।

चाहें तो कह सकते हैं कि क्वीन और हाइवे दोनों एक रोमानी दुनिया रचती हैं। बाहर की दुनिया लड़कियों के लिए उतनी हसीन और आसान नहीं है जितनी इन फिल्मों में है। घर हो या बाहर- इस दुनिया में यौन हिंसा से लेकर सामाजिक वर्जनाओं तक की बेड़ियां जैसे हर क़दम पर किसी लड़की के पांव रोकने को तैयार रहती हैं।

लेकिन इन फिल्मों का मोल यही है कि ये बेड़ियां यहां टूटती हैं, पीछे छूट जाती हैं। दोनों फिल्में अपने सफ़र में उस सहज मनुष्यता की तलाश है जो अब तक लड़कियों के लिए एक मरीचिका रही है। पुरानी फिल्में ऐसी तलाश को भी जैसे कुफ़्र मानती थीं- बेशक, उन फिल्मों में कई बार लड़कियां बहुत साहसी दिखती हैं, विद्रोही भी होती हैं, लेकिन एक हद के बाद वे मर्दवाद की किसी न किसी सरणी में बंधी नज़र आती हैं।

बेशक, लड़कियों के लिए खुलेपन का न्योता भी एक स्तर पर इस मर्दवाद की नई सरणी है। बाज़ार इस खुलेपन के बहुत सारे फायदे ले रहा है- उसने स्त्री को बिल्कुल कटी-छंटी देह में बदल डाला है। लेकिन इसी खेल के भीतर एक खामोश चुनौती सिर उठा रही है जो स्त्रीत्व को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश और मांग कर रही है, इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। इन दो फिल्मों के अलावा हाल के दिनों में ऐसी बनी ढेर सारी और फिल्में भी हैं जहां यह बदलती हुई लड़की पहचानी जा सकती है। ये सिर्फ बहादुर, जांबाज़ या स्वच्छंद लड़कियां नहीं हैं, लेकिन अपने दिए हुए लड़कीपन को नकार कर अपने स्त्रीत्व का एक नया पाठ गढ़ती, अपने चारों तरफ खींची हुई परिधि को मिटाकर नई रेखाएं बनाती नई लड़कियां हैं। ठीक इसी तरह नहीं, लेकिन अपनी शर्तों पर जीने की मांग कर रही ऐसी ल़डकियां हमारे समाज में बढ़ रही हैं और इनका बढ़ना पुराने घरों और परिवारों की बुनियाद हिला रहा है। जाहिर है, इस नई लडकी को समायोजित करने के लिए घर और परिवार को भी कुछ बदलना पड़ेगा।




Monday, March 23, 2015

वक्त लिखता रहा चेहरे पर हर पल का हिसाब

लेखिका अनु सिंह चौधरी की की दूसरी किताब 'मम्मा की डायरी' हिंदी में अपने ढंग की पहली किताब है. रिश्तों को, जीवन को, समकालीन जद्दोजहद को समझने  के लिहाज से एक मुकम्मल किताब. हिन्दयुग्म प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य इस किताब की प्रीबुकिंग चालू है. फिलहाल इसका एक छोटा सा अंश, जो पिता-पुत्री के रिश्तों को लेकर है- मॉडरेटर.
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फ़िल्म डैडीमैंने रिलीज़ होने के बहुत साल बाद देखी। शायद 1999 में।

मैं कॉलेज की छुट्टियों से घर लौटी थी। ये अद्भुत संयोग ही था कि कभी न खाली रहने वाले उस विशालकाय घर में उस दिन कोई नहीं था। कम से कम नीचे वाली मंज़िल पर तो कोई नहीं। इसलिए पुराना पड़ता टीवी और बेकार होता वीसीआर, दोनों मेरे कब्ज़े में आ गए थे। डीवीडी तक गए नहीं थे अभी, और फ़िल्में अभी भी वीएचएस पर आती थीं। नवकेतन में हमारी मेंबरशिप थी, इसलिए दस रुपए में किराए पर फ़िल्में मिल जाया करती थीं। नवकेतन वालों को भी मालूम था कि महेश भट्ट की तरह वीएचएस भी एंटीक पीस में तब्दील होने वाला है। इसलिए डैडीजैसी फ़िल्म ले आओ तो कई-कई दिन तक तगादा नहीं होता था। एक थके-हारे टूटे हुए शराबी पिता की कहानी में किसी को क्या मिल जाता कि कोई डैडीजैसी फ़िल्म देखने की ख़्वाहिश भी रखता? वो भी तब, जब सिमरन के पापा में अपने पापा का अक्स दिखाई देने की ज़्यादा गुंजाईश थी!

फ़िल्म मैंने अकेली देखी थी, और मुझे आज तक नहीं मालूम कि पापा ने वो फ़िल्म देखी या नहीं। लेकिन पापा देखते वो फ़िल्म तो इस बात पर सहमत होते कि डैडीहमारा आईना थी, हमारे रिश्तों का आईना थी।

जब मैं पापा से दूर-दूर होती गई तो पापा के पापा यानी अपने बाबा से करीब होती गई। बाबा के साथ रिश्ता सहज था। बाबा को मैंने ख़ुश करने की कोशिश कभी नहीं की। लेकिन ज़िन्दगी भर मैं पापा का समर्थन हासिल करने की, उनकी स्वीकृति पाने की, उनका दिल जीतने की अजीब सी कोशिश में लगी रही पापा और मेरे बीच के लंबे ख़ामोश रिश्ते के बावजूद। मेरे और पापा के बीच बाप और बेटी का रिश्ता तभी मुकम्मल हो पाया जब मैं बहुत बड़ी हो गई और जब पापा भी बहुत बड़े हो गए। इस बीच पापा ने डैडीकी तरह दो बार मुझे बहुत बुरी तरह टूटने और बर्बाद होने से बचाया। मैं आज तक इस उम्मीद में हूँ कि मैंने भी डैडीकी पूजा की तरह अपने पापा को जीने की कोई वजह दी ही होगी।

बहरहाल, इस फ़िल्म का संदर्भ इसलिए नहीं आया क्योंकि फ़िल्म की कहानी अच्छी है, या इस फ़िल्म में अभिनय के लिए अनुपम खेर को नेशनल अवॉर्ड से नवाज़ा गया था। या इसलिए क्योंकि ये फ़िल्म एक ऐसे ऐल्कोहॉलिक की कहानी है जिसे किस्मत ने कहीं का नहीं छोड़ा। या सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ये फ़िल्म बाप-बेटी के रिश्ते की कहानी है।

इस फ़िल्म को मैं उस मिसाल के तौर पर पेश करना चाहती हूँ जिसमें पिता बन जाने के बाद एक पुरुष की ज़िन्दगी में आए बदलावों की कई परतें नज़र आती हैं। एक पिता से समाज और ख़ुद परिवार किस तरह की अपेक्षाएँ रखता है, और उन अपेक्षाओं पर खरे न उतरने पर एक पिता को किस तरह नाकामयाब करार दिया जाता है, ‘डैडीउसकी कहानी है।

पापा कौन होता है बच्चे के लिए? हीरो। सबसे शक्तिशाली। सबसे सही। पापा के वश में सब होता है। पापा घर चलाते हैं, घर में सुख-सुविधाएँ जुटाते हैं। दुनिया चाहे जो भी समझे, पापा आदर्श हैं। शान हैं अपने बच्चों के लिए।

असल ज़िन्दगी में एक हारे हुए, नाकामयाब, ज़िन्दगी से हताश पापा के होने से अच्छा है पापा के न होने के झूठ का होना। इसलिए कांताप्रसाद अपनी लाडली नातिन को कह देते हैं कि उसके पापा हैं ही नहीं। अपनी बेटी की तलाश में थका-हारा ज़िन्दगी से बेज़ार बाप किसी तरह अपनी बेटी का पता खोज लेता है, और उसे फ़ोन पर कहता रहता है, आई लव यू। ख़ुदा ख़ैर करे, लेकिन ऐसे सनकी, पागल पिता से दूर रहना ही अच्छा’, बेटी की कंडिशनिंग ये कहती है। लेकिन उसका दिल है कि उस आवाज़ को पहचानने की, उसे अपनी पहचान वापस दिलाने की कोशिश में जुट जाता है। बेटी पापा का रिडेम्पशन चाहती है, उनके सारे दाग़ों के उनकी मुक्ति चाहती है। बेटी पापा के लिए थोड़ी-सी इज्ज़त, थोड़ी-सी शोहरत चाहती है। लेकिन पापा के लिए बेटी का प्यार हासिल तो सब हासिल। संतान की माफ़ी ख़ुदा की माफ़ी से बढ़कर है।

ऐसे एक डैडी को हम सब जानते हैं। ऐसी एक संतान हम सबमें है। डैडीफ़िल्म ने मेरे भीतर की संतान को बदल दिया था। अचानक उसे समझदार बना दिया था। पापा को लेकर मेरी तंगदिली दिखाई दी थी पहली बार। पापा से न बोलने का, या बहुत कम कम बोलने का रिश्ता इसलिए था क्योंकि मेरे दिमाग़ में बैठ गई पापा की परफेक्ट छवि से मेरे पापा का चेहरा मिलता ही नहीं था। ज़िन्दगी के असली आईने में जो तस्वीर दिखती थी पापा की, वो मुकम्मल नहीं थी।

इसलिए पापा की कमज़ोरियाँ स्वीकार नहीं थीं। पापा की ग़लतियाँ स्वीकार नहीं थीं। पापा का इंसान होना स्वीकार नहीं था क्योंकि पापा तो हमें सुपरह्यूमैन चाहिए होते हैं। डैडीकी पूजा ने पहली बार मुझे पापा से एक नया रिश्ता बनाना सिखाया था। डैडीने मुझमें दुनिया के तमाम पापाओं, तमाम पुरुषों के कंधे पर मौजूद अदृश्य सलीब को देखने की समझ पैदा की थी।

पुरुष पर घर चलाने का भार होता है। ज़िन्दगी में हासिल उसकी सफलताओं और असफलताओं का असर पूरा परिवार जीता है, कई-कई तरह से। कई-कई सालों तक। अपने पिता के साथ किसी बेटे का रिश्ता ये तय करता है कि आगे चलकर वो किस तरह का पिता बनेगा। बेटी जो पापा के साथ जीती है, जो उनमें देखती है, उसी के दम पर बाद में अपने पति के साथ भरोसे का, या तकलीफ़ों का, रिश्ता जोड़ती है। जो पिता जी नहीं पाता, उसका बोझ अपने बच्चों पर डाल देता है। मशहूर मनोविश्लेषक सी. जी. जंग ने यूँ ही नहीं कहा कि पारिवारिक माहौल, और ख़ासकर बच्चों पर, किसी और चीज़ का उतना गहरा मनोवैज्ञानिक असर नहीं होता जितना माता-पिता में से किसी एक के अधूरे ख़्वाब का होता है। हम जाने-अनजाने वो बना दिए जाते हैं, जो हमारे पिता नहीं हो सके। ठीक वैसे ही, जैसे हम अपने बच्चों से उस ज़िन्दगी के जीने की उम्मीद रखते हैं जो चाहते हुए भी हमारे हाथ न आ सकी।


चूँकि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाने वाली ये कड़ी इतनी ही बारीकी से एक-दूसरे से गूँथी होती है, इसलिए हर बच्चे को, बल्कि वयस्क हो जाने के बावजूद हर शख़्स को, एक फ़ादर फ़िगर चाहिए होता है जो उसका आदर्श हो। उसकी शान हो, उसका गुमान हो। पिता में वो भरोसा नहीं मिलता तो कहीं और जाकर उस भरोसे की तलाश होती है नाना या दादा में, चाचा में, बड़े भाई में, शिक्षक में, किसी दोस्त के पिता में, बॉस में, मेन्टर में... और अगर वो भरोसा कहीं नहीं मिलता, तो फिर किसी पर भी भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। किसी की ज़िन्दगी में पिता या पिता रूपी किसी शख्सियत का न होना उसकी शख़्सियत में सबसे बड़े अधूरेपन के रूप में बचा रह जाता है।
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