Thursday, May 21, 2015

कविताएं सीत मिश्र की

आज कविताएं सीत मिश्र की. कविताओं में कच्चापन हो सकता है दिखाई दे मगर अनुभव सघन हैं. 
सोंधापन है भाषा में, अच्छी कवयित्री बनने की सम्भावना पूरी है. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर 
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1.
प्रेम

प्रेम की नई परिभाषा गढ़ी थी उसने
साथ रहना, सोना, खाना-पीना प्रेम नहीं
दैनिक जीवन का हिस्सा है यह
बढ़ती उम्र के साथ जिस्म की भी जरुरत होती है
और उसे प्रेम का नाम देना गलत है
जरुरतें प्रेम की दिशा तय करती हैं
जब मां की जरुरत थी तब सिर्फ मां से प्रेम था
जब शारीरिक जरुरतें जागी
तो प्रेम का दायरा व्यापक हुआ और मेरा प्रेम तुम तक सिमट गया
फिर सामाजिक जरुरतें जाग्रत हुई तो पत्नी से प्रेम हुआ
लेकिन बच्चों के जन्म के साथ प्रेम दूसरी दिशा में प्रवाहित होने लगा
जब जरुरतों की सीमाएं नहीं तो भला प्रेम की क्यों हों?
हां, उनमें से कुछ रिश्ते आज भी मुझमें पल रहे हैं, कुछ मृत भी हो गए।
लेकिन क्या फर्क पड़ता है जीवन मजे में है।
प्रेम और जरुरतें फिर बदलने लगी हैं
समझ रहा हूँ अभी, फिर समझाउंगा तुम्हें
प्रेम की नई परिभाषा।।

2.
साथ

सुनो...
एक बार फिर लौटकर आना तुम
पूछना प्रेम करोगी मुझसे
मैं इनकार कर दूंगी
तुम फिर इजहार करना कई बार
लेकिन इस बार तुम इजहार करते-करते हार जाना
और मैं इनकार करते हुए जीत जाउंगी
समय और परिस्थितियों के उलट
हम बदल लेंगे अपनी परिस्थितियां
खीज, नाराजगी और गमों से लदे हुए
कुछ एहसास जो तुमसे परे रहे
कुछ हसरतें जो मेरी अधूरी थी
उन्हें हम जिएंगे अलग-अलग
अपने-अपने तरीके से
शायद मैं समझ जाऊं तुम्हारी बेबसी
और सारे इल्जाम वापस रख लूं
या कि तुम समझ जाओ मेरा दर्द
फिर हम चल पड़े साथ-साथ

3.
हिसाब

आज हिसाब कर ही लेते हैं तुम्हारे जाने से
क्या बदल गया, कुछ भी तो नहीं
बस तकलीफें नहीँ बांटती किसी से
तुम्हारी तरह कोई ध्यान नहीं रखता
समय बोझिल हो उठा है कटता ही नहीं
आंखें बेवजह पनीली हैं
इन्तजार करने की लत भी खत्म हो रही है
सांसे चल रही हैं धड़कनों की रफ्तार भी वही है
मैं ठीक हूं बस सपने मर गए
एक साथ ही तो छूटा, तकलीफ बड़ी है क्या?
बंद सी मुठ्ठी में खाली हाथ रह गया
मेरा तो कुछ गया नहीं लेकिन मुझमें मुझ सा बचा भी नहीं
बीतते वक्त के साथ मैं खर्च हो गयी
फिर भी इस सौदे में बड़ा घाटा हुआ तुम्हें
मेरे हिसाब का निष्कर्ष यही कह रहा है
भूल चूक लेनी देनी का हिसाब तुम्हीं कर लो
मैं जानती हूँ व्यवसायी तुम अच्छे हो
घाटे को मुनाफे में तब्दील कर लोगे।

4.
नियंता

सुनो...
एक काम करते हैं,
तुम मुझे बदनाम करो
हम खुद को तुम्हारे नाम करते हैं
तुम हमें बहलाओ और दुत्कारो भी
हमें चुभलाओ और करो दारोश भी
दुर्गा कहकर कुचलो पैरों तले
लक्ष्मी कहकर छीन लो जीने का अधिकार
हम वंदना करेंगे तुम्हारी
पूजेंगी तुम्हें
सौन्दर्य का ताज पहनाकर कैद करो
बेड़ियाँ डालो रूढ़ियों की
हवाला दो शास्त्रों का
बांध लो बाहुपाश में
और खींच दो लक्ष्मण रेखा
काट दो हमारे पंख
हम उफ्फ तक नहीं करेंगी
टूटकर चाहेंगी तुम्हें
तुम्हारे अंश को खुद में पालेंगी
देंगी तुम्हें बाप बनने का गौरव
तुम हम पर लांछन लगाना
फिर भी तुम्हारा गुणगान करेंगी हम
कृतज्ञ रहेंगे तुम्हारीआजीवन आभारी भी
अब भी तो सांसे चल रही हैं हमारी
तुमने हमारा अस्तित्व कुचला
लेकिन हमें मिटाया नहीं
हम इसे अपनी नियति मानते हैं
हमारे नियंता हो तुम
तुम्हारी जय-जयकार हो ।।


Wednesday, May 20, 2015

यह शिक्षा के नए पंथ में ढलने का दौर है!


दक्षिणपंथ की सरकार जब भी केंद्र में आती है तब वह शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करने में लग जाती है. एक बार फिर ऐसी आशंका लग रही है. युवा शिक्षाशास्त्री कौशलेन्द्र प्रपन्न का एक सुचिंतित लेख- मॉडरेटर 
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शिक्षा समितिओं और आयोगों की सिफारिशों और नीतियों को समय समय पर पुनरीक्षा से गुजारा गया है। वह 1964-66 का कोठारी आयोग हो, 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा आयोग हो या 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति। सन् 1990-92 में आचार्य राममूर्ति पुनरीक्षा समिति बनाई गई थी जिसका मकसद था 1986 की नीतियों को आज के संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन किया जाए और आवश्यकतानुसार सुझाव दिए जाएं। एक बार फिर राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पुनरीक्षा और पुनर्गठन के दौर से गुजरने का मौका आया है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने पिछले साल ही घोषणा की थी कि 2015 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति देश भर में लागू की जाएगी। इस बाबत राज्य के शिक्षा मंत्रियों और शिक्षाविदों, समाज के विभिन्न धड़ों से बातचीत की जाएगी। गौरतलब है कि जब जब सत्ता में हिन्दूत्वहावी सरकार आई है उसने अपने तरीके से शिक्षा को बदलने का प्रयास किया है। न केवल एक दल बल्कि अन्य वैचारिक दलों की सरकारों ने भी शिक्षा को अपने वैचारिक प्रसार-प्रचार के लिए इस्तेमाल किया है। 2000 में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2000 तैयार हो कर देश भर में लागू हुआ तो जिस तरह से पाठ्यचर्या को बुना गया था उसी तर्ज पर पाठ्यपुस्तकें बनाई गईं। प्रेमचंद के साहित्य को मृदुला सिन्हा के साहित्य से पुनर्स्थापित किया गया। इतना नहीं बल्कि भाषा,  इतिहास, विज्ञान की धार को तेज करने की बजाए कुंद ही किया गया। शिक्षा नई सोच और सृजनात्मकता को बढ़ावा देने का काम करती है। शिक्षा दरअसल इतिहास को पढ़ने और अतीत की गलतियों को सुधारने की समझ भी पैदा करती है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज जिस नई राष्ट्रीय  शिक्षा नीति निर्माण की बात की जा रही है। उसके उद्देश्यों से हमें असहमति का अधिकार है। क्योंकि इस नई नीति के जड़ में आरएसएस की विचारधारा और पूर्वग्रह स्पष्ट दिखाई देते हैं। जहां माना जा रहा है कि भारतीयों को भारतीयता से हटा कर पश्चिमवादी विचारधारा पढ़ाई जा रही है, जिससे उनमें पाश्चात्य जीवन मूल्य का प्रसार हो रहा है। इसलिए आवश्यक है कि नई पीढ़ी को भारतीय शिक्षा दी जाए, उंची कक्षाओं में भी उन्हें अंग्रेजी के बाजए हिन्दी माध्यम से पढ़ाया जाए और संस्कृत को अनिवार्य बना दिया जाए।

योग गुरु रामदेव नई सरकार के सलाहकार भी हैं उन्होंने शिक्षा पाठ्यक्रम का एक दस्तावेज सरकार को सौंपा है। इसमें प्रमुखता से संघ और हिन्दुत्व विचारधारा को पोषित किया गया है। वहीं दीनानाथ बत्रा की लिखी किताब ‘तेजोमय भारत गुजरात के तकरीबन 42 हजार सरकारी स्कूलों में पढ़ाए जा रहे हैं। उस किताब के कुछ अंशों से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे किस तरह की शिक्षा देने पर उतारू हैं-
“अमेरिका स्टेम सेल अनुसंधान के आविष्कार का श्रेय लेना चाहता है, पर सच यह है कि भारत के डॉ. बालकृष्ण गणपत मातापुरकर को पहले ही शरीर के अंगों का फिर से निर्माण करने के पेटेंट मिल चुका है...तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह अनुसंधान नया नहीं है और डॉ. मातापुरकर को इसकी प्रेरणा महाभारत से मिली थी। कुंती का सूर्य के समान तेजस्वी एक पुत्र था।अजेय कुमार, 12-12-2014 जनसत्ता

पाठ्यपुस्तकों में इस्तेमाल किए गए शब्दों को निकाल बाहर करने के बाबत दीनानाथ बत्रा ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को ज्ञापन सौंपा है जिसमें उर्दू, फारसी, अंगे्रजी के शब्दों को पाठ्यपुस्तकों से बाहर निकालने की वकालत की गई है। इन शब्दों में दोस्त, शरारत, खबरदार, गायब,गुस्सा, मौका आदि शामिल हैं। इन शब्दों को बाहर करने के पीछे तर्क दिया गया कि इन शब्दों से हिन्दी खराब होती है। जरा शैक्षिक दर्शन और शिक्षा शास्त्र की दृष्टि से इन तर्कों पर विचार करें तो यह हास्यास्पद से ज्यादा नहीं लगता। जबकि भाषाविदों और शिक्षा शास्त्रियों की मानें तो हिन्दी व अन्य भाषाओं को उर्दू, फारसी, बोलियां खराब करने की बजाए समृद्ध ही करती है। यदि हिन्दी से उक्त शब्दों व बोली भाषाओं को निकाल बाहर किया जाए तो वह हिंदी कैसी होगी इसके अनुमान मात्र से ही डर लगता है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति किन किन बिंदुओं पर प्रहार करने वाली है इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। शिक्षा की बुनियाद मानी जाने वाली भाषा नीतियों, इतिहास, विज्ञान और समाज शास्त्र आदि पर इन बदलावों के तलवार चलने वाले हैं। संभव है आगामी शिक्षा नीति में हिन्दी उर्दू विहीन, अंग्रेजी के कटी, बोलियों से बेदखल होगी जहां हिन्दी के संस्कृतनिष्ठ शब्दावलियां होंगी। और उस हिन्दी में प्रेमचंद का कोई स्थान नहीं होगा। क्योंकि प्रेमचंद को काफी समय तक हिन्दी में नहीं लिख रहे थे। वे तो उर्दू में लिखा करते थे। सो प्रेमचंद हिन्दी के लेखक न रहें। साथ ही गंगा-जमुनी संस्कृति यानी हिन्दी उर्दू की साझा जबान को घातक साबित कर उर्दू को हाशिए पर धकेल दिया जाए।

संस्कृत शिक्षण को लेकर पिछले साल विवाद का जन्म हो चुका है। जर्मन की जगह केंद्रीय विद्यालयों में आगामी शैक्षिक सत्र में संस्कृत को पढ़ाने का निर्णय लिया जा चुका है। इसके साथ ही हिन्दी की शुद्धता के तर्क तले भाषा दर्शन का गला दबा दिया जाए इसकी भी पूरी संभावना नजर आती है। नई शिक्षा नीतियों में जिन मूल्यों, नैतिकता और जीवन मूल्यों को शामिल किया जाएगा उसमें नहीं लगता है वैज्ञानिक सोच के लिए कोई स्थान होगा। ऐसा भी नहीं लगता है कि तैयार होने वाली नई शिक्षा नीति त्रिभाषा सूत्र की आत्मा को बचा पाए।

इसकी एक बानगी देख सकते हैं- जिन लोगों ने खास विचार धारा के प्रसार में अपना हाथ खींच लिया उन्हें उनके पद से ही हटा दिया गया। मसलन एनसीइआरटी ने निदेशक प्रवीण सिनक्लेयर को इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वे 2005 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या को जारी रखना चाहते थे। वहीं राजस्थान विश्वविद्यालय के उपकुलपति को भी पद से हाथ धोना पड़ा। इतना ही नहीं अपने एजेंडे को लागू कराने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में ऐसा कुलपति नियुक्त किया गया जो हिन्दुआइजेशन ऑफ़ एजुकेशन में भाग ले सके।

कौशलेंद्र प्रपन्न
भाषा विशेषज्ञ एवं शिक्षा सलाहकार,
अंतः सेवाकालीन शिक्षक शिक्षा संस्थान

टेक महिन्द्रा फाउंडेशन, दिल्ली

Sunday, May 17, 2015

'मम्मा की डायरी के बहाने' एक अलग तरह का प्रोग्राम

सभी मम्माओं-पापाओं को यह सूचित किया जाता है कि आज शाम 6.30 बजे इण्डिया हैबिटेट सेंटर के कैजुरिना हॉल में अनु सिंह चौधरी की किताब ‘मम्मा की डायरी’ के बहाने कुछ पैरेंटिंग के अनुभवों को साझा करने-सुनने का मौका है. एक अलग तरह की दुनिया का यह अलग तरह का प्रोग्राम है. आज नगरों-महानगरों में पैरेंटिंग एक बड़ी चुनौती है, कि किस तरह से दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच अपने बच्चों को संभाला जाए, उनको समय दिया जाए. कल मेरी एक महिला मित्र से बात हो रही थी तो उनका कहना था कि हमारे बच्चों के लिए आजकल सबसे बड़ी ट्रीट यही हो गई है कि हम उनके लिए समय निकाल पायें, दिन बिता पायें.

अब पैरेंटिंग सिर्फ माँ की जिम्मेदारी नहीं रह गई है, पुरुष भी इस चुनौती को समझ रहे हैं अपना योगदान दे रहे हैं. अनु सिंह चौधरी की किताब ‘मम्मा की डायरी’ एक कामकाजी महिला के अनुभवों की दास्तान है. कैसे जीवन की चुनौतियों का सामना करते हुए अपने बच्चों की बेहतर परवरिश की जाए. हमने जो अपने माँ-पापाओं से लिया था कैसे उन संस्कारों को अपने बच्चों तक पहुंचाया जाए, उनको अपने समय का मुकाबला करने के लिए कैसे तैयार करवाया जाए. यह एक बड़ी चुनौती है जिससे बचा नहीं जा सकता है.

माँ-पापा बनना स्वर्गिक ख़ुशी देता है तो एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी देता है. आज अपने अपने अनुभवों को साझा करने, दूसरों के अनुभवों को सुनने-गुनने का दिन है.

क़िस्से बाँटनेवालों के नाम-
नताशा बधवार
सायरी चहल
प्रीति अग्रवाल मेहता
रमा भारती
विजय त्रिवेदी
मंजीत ठाकुर
रंजना सिंह
निरुपमा सिंह
विनीता सिन्हा
क्षितिज रॉय
प्रियंका मंजरी
नीलम मिश्रा
तूलिका
और मनीषा पांडे

कार्यक्रम में MCBC FILMY द्वारा निर्मित लघु फ़िल्म आओगी ना माँकी स्क्रीनिंग भी होगी।

मुझे नहीं लगता है कि यह अलग से बताने की जरूरत है कि ‘मम्मा की डायरी’ पुस्तक का प्रकाशन हिन्द युग्म प्रकाशन ने किया है. आप चाहें तो पुस्तक की एक प्रति भी लेखिका के हस्ताक्षर के साथ खरीद सकते हैं.


मैं तो जा रहा हूँ. आप भी समय निकाल कर आइये. रोजमर्रा के कार्यक्रमों से अलग हटकर इस आयोजन का हिस्सा बनिए.