Sunday, November 23, 2014

रणदीप और नंदना की अधिक रवि वर्मा की कम बनी 'रंगरसिया'

100 करोड़ के टारगेट की वजह से आजकल ऐसी फ़िल्में कम आ पाती हैं जिनमें कंटेंट के स्तर पर कुछ कहने सुनने को हो. 'रंगरसिया' एक अलग फिल्म फिल्म साबित हुई. जब से आई है चर्चा में बनी हुई है. रंजीत देसाई के उपन्यास पर बनी केतन मेहता की इस फिल्म पर यह समीक्षा लिखी है युवा फिल्म लेखक सैयद एस. तौहीद ने. एक पढने लायक समीक्षा, फिल्म को समझने का एक और एंगल देती हुई- मॉडरेटर 
========================================================

राजा रवि वर्मा पर केतन मेहता की रंगरसिया आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हुई। मुख्यधारा से व्यस्क कहानियां आने का चलन सतही बातों से बच कर ही विमर्श का विषय बन सकता है। केतन की फिल्म सतही व कला में फर्क कर सकी? सिनेमाघर में जाकर महसूस हुआ कि फिल्मकार ने अधिक बेहतर लक्ष्य का अवसर खो दिया। केतन की यह परियोजना आरंभ से विवाद का विषय बनीफ्लोर पर जाने व अंतत: पूरा बनने दरम्यान सेंसरशिप सहन करना पडा। कभी कभार moral policing अधिक रिएक्ट कर विवाद खडा कर देती है? कंटेंट के हिसाब से केतन ने आजादी जरुर ली है। लेकिन कहना होगा कि महिला व कला दोनों समाज के सताए लोग हैं। रंगरसिया के साथ हुआ बर्ताव सही था? सवाल का जवाब फिल्म बेहतर दे सकेगी। राजा रवि वर्मा पर रंजीत देसाई की लिखी किताब फिल्म का आधार बनी। आधुनिक कला के पितामह कहे जाने वाले राजा रवि वर्मा की यह कहानी अतीत-वर्त्तमान के सर्कल से गुजरती है। एक जीवन यात्रा किस्म कीलेकिन बाजार की ओर झुकी प्रस्तुति। सत्यजित राय व श्याम बेनेगल राजा रवि वर्मा पर इस तरह फिल्म नहीं बनाते। कोशिशों के बावजूद रंगरसिया रणदीप व नंदना की होकर रहीराजा रवि की वर्मा कम।

केतन की फिल्म को नजर चाहिए क्योंकि नजरिया ही वस्तु का मूल्यांकन कर सकता है। रंगरसिया में अभिवयक्ति के एक से अधिक नजरिए नजर हैं। रणदीप का राजा रवि वर्मा की शक्ल में कला की खातिर संघर्ष एवं सामाजिक बदलाव का नजरिया।  कला की खातिर संघर्ष का नजरिया। किसी कलाकार की जीवनी का अनुभव रवि वर्मा की जीवन यात्रा में महसूस होगा। कहानी में इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया गया है। राजाओं के दरबार में कलाकार का ऊंचा मुकाम हुआ करता था। दक्ष कलाकारों की पहचान की एक नजर हुआ करती थी। चित्रकला को आवरण बना लेने वाले बालक रवि वर्मा की काबिलियत को राजा ने पहचाना था। रवि वर्मा को राजा की उपाधि से नवाजा गया। राजा ने रवि वर्मा को पुत्री का हांथ देकर घर का सदस्य बना लिया। महाराज के निधन उपरांत राजपाठ का अधिकारी राजकुमार हुआनए राजा के आ जाने से रवि वर्मा को पुराना तोहफा भूल जाना पडा। राजकुमारी को पति के चित्रकार किरदार से लगाव नहीं था। 

रवि वर्मा कलात्मक अभिवयक्ति के लिए मानव व समाज द्वारा निर्धारित बातों की परवाह नहीं किया करते थे। पत्नी की नाराजगी की वजह से उनमें बसा कलाकार कला की खोज के लिए बंबई चला आया। नंदना सेन की सुगंधा से चित्रकार की यहीं मुलाकात हुई। फिल्म राजा रवि वर्मा के सामानांतर उनकी कला प्रेरणा स्त्रियों की कहानी है  राजा रवि वर्मा ने कला को अभिव्यक्ति की बंदिशों से मुक्त करने की पहल ली थी। कला की साधना में कलाकार खुद को फना करने का फन जानता है। अनावश्यक अथवा अनचाही moral policing कलाकार की प्रतिभा को हताश कर दिया करती है। राजा रवि वर्मा पर फिल्म बनाने का निर्णय केतन को हताश कर गया ? काफी हद तक। लेकिन निराश नहीं हुए व संघर्ष जारी रखा। काफी अरसे से रूकी रंगरसिया के रिलीज में वो संघर्ष विजयी हुआ।

राजा रवि सरीखे फनकारों को समाज से बहुत अधिक सहयोग नहीं मिल सका। रवि वर्मा ने परवाह नहीं किया कि लोग क्या कहेंगे। सहयोग के रूप में प्रोत्साहन व संरक्षण की आशा फिर भी हर कलाकार रखता है। किसी न किसी वजह से आदमी जिंदगी से ज्यादा की उम्मीद रखता है। समय से आगे की सोंच को नजरिए में कमी वजह से हमेशा उचित स्वीकृति नहीं मिलती। राजा रवि वर्मा कला को अपने समय से आगे ले गए। उस जमाने में चित्रकारी के लिए आयल कलर का इस्तेमाल चलन से जुदा था। आपकी कला में ग्लोबल तत्व समाहित थे। कलाकार कृति का सृजन उसे महान बनाने के उददेश्य से नहीं करता। काम को जुनूं  से आगे ले जाने फन लेकिन उसे खूब आता है। महान रचनाएं महान समर्पण की चाह रखती हैं। कलाकार समाज से लिया हुआ हर कीमती लम्हा दूसरे अंदाज में वापस कर देने में सक्षम होता है। राजा रवि वर्मा को समाज से इस मायने में सहयोग नहीं मिला कि धर्म का नुकसान किया था। धर्म व आस्था का दामन पर कूची से चित्र उकेरने लिए आप पर मुकदमा चला। पूज्य देवियों की तस्वीर बनाने के लिए आपने जिसका सहयोग लियावो समाज के अछुत तबके की थी। धर्म वालों की नजर में एक नाकाबिले कुबूल अभिव्यक्ति रही होगी। चित्रकार को यदि यह प्रेरणाएं नहीं मिली होती वो औरतों को खोया सम्मान लौटा पाता? महिलाओं के देवी तस्व्वुर करने की एक उदाहरण यह था। 

देवदासी प्रथा से दलित महिलाओं का नुकसान हुआ। देवदासियों के हितों की दृष्टि से रवि वर्मा का साहस सराहनीय था। कला समाज द्वारा बनाए गए अस्वीकार्य बातों के विरुध अधिक मुखर बन गयी।  रचना की प्रेरणा कलाकार को किसी भी सामान्य अथवा असामान्य बात से मिल सकती है। अभिव्यक्ति कलात्मक नजरिया तलाश लिया करती है। साधना उपरांत कला कलात्मकता का मुकाम पा लेती है। राजा रवि वर्मा ने साधना के माध्यम से सुगंधा में आदर्श देवियों का रूप देख लिया। रंगरसिया की नग्नता फूहडता को स्पर्श कर जाती तो आज की शक्ल नहीं अख्तियार कर पाती। एक चित्रकार रंगों से अधिक प्रेरणाओं से इश्क होना चाहिए। रंगरसिया में कलाकार की रचनात्मक एवं प्राकृतिक स्थिति बयान हुई है। समाज संस्कृति एवं अभिव्यक्ति बीच संवाद की स्थिति हमेशा तालमेल तक ही सीमित नहीं रहती। कला में vulgar की परिभाषा क्या?  प्रकृति व संस्कृति बीच मतभेद अथवा कुछ दूसरा?  राजा रवि वर्मा ने जवाब दिया तस्वीरों में।

राजा रवि वर्मा ने समय एवं समाज से संघर्ष करते हुए मिथक चरित्रों को चित्र में ढाला। वेद पुराण में उपस्थित प्रेरणाओं को लोगों के सामने लाया। देवियों की गाथाओं ने आपको रचना के लिए प्रोत्साहित किया। सुगंधा के संपर्क में आने उपरांत उन रचनाओं के जीवंत होने का समय था। सुगंधा की सुदरता से गुजर कर चित्रकार सौंदर्यबोध तक पहुंच सका। कला की मंशा वही थीराजा रवि वर्मा ने सुगंधा के जरिए समाज के एक तबके को इज्जत भी दी। आपके विरुद्ध चलाया गया मुकदमा तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। मुकदमे में कला की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर जोरदार बहस चलीसमाज को ऊंच नीच में बांटने से नुकसान ज्यादा होता है। कला को नुकसान होता है। एक पीरियड फिल्म के रूप में रंगरसिया इतिहास का कोना है। राजा रवि वर्मा ने जिस शिद्दत से चित्रकारी जरिए पुराण व मिथक कहानियों को जिंदा कियाउसी तर्ज पर केतन मेहता ने अतीत को परदे पर उतारा। बढिया पीरियड फिल्म दरअसल इतिहास व संस्कृति का पुनर्सृजन लगनी चाहिए। फील के हिसाब से रंगरसिया इसमें सफल नजर आईचित्रकार के जीवन से प्रेरित कर्म रंगों से भरी दुनिया की कामना रखता है। सवाल में घिरा हुआ हूं कि सचमुच रंगरसिया एक ईमानदार प्रयास थीरंगों के सामयिक इस्तेमाल में फिल्मकार हद तक कामयाब रहे हैं। रंगरसिया वो बहुरंगी पिचकारीजिसमें कामना रखने वाले को हर रंग मिलेगा। मर्यादा तय आप को करनी है। राजा रवि वर्मा की उत्सुकता अथवा कंटेंट की उत्सुकता में सिनेमाघर जा रहे हैं?
---

passion4pearl@gmail.com





Saturday, November 22, 2014

क्या है जर्मन-संस्कृत विवाद?

केन्द्रीय सेवाओं में हिंदी के उचित महत्व के मुद्दे पर प्रेमपाल शर्मा के तर्कों के हम सब कायल रहे हैं. केन्द्रीय विद्यालयों में जब जर्मन भाषा के स्थान पर संस्कृत पढ़ाने का मसला आया तो यह जरूरी लगा कि त्रिभाषा फ़ॉर्मूला और विदेशी भाषाओं के सन्दर्भ को समझा जाए. देखिये, कितने विद्वत्तापूर्ण ढंग से प्रेमपाल जी ने भारतीय भाषाओं के पक्ष इमं अपने तर्कों को रखा है. मैं भारतीय भाषा के इस कमांडर को सलाम करता हूँ. आप यह लेख पढ़िए- प्रभात रंजन 
================== 

      केन्‍द्रीय विद्यालयों में मौजूदा जर्मन भाषा की जगह संस्‍कृत पढ़ाए जाने का विवाद तूल पकड़ता जा रहा है। देश की मौजूदा भाषा और शिक्षा नीति के संदर्भ में यह अच्‍छा ही हुआ क्‍योंकि इससे कई सबक सीखे जा सकते हैं। पूरे विमर्श में सत्‍ता, संस्‍कृति और समाज की कई दरारें भी झॉंकती हैं। देश में लगभग ग्‍यारह सौ केन्‍द्रीय विद्यालय हैं जि‍समें अस्‍सी हजार छात्र पढ़ते हैं। इनमें से सत्‍तर हजार  तीसरी भाषा के रूप में छठी से आठवीं तक जर्मन भाषा पढ़ रहे हैं। जर्मन पढ़ाने का फैसला 2011 में हुआ था। यह क्‍यों और किन परिस्थितियों में हुआ इसके लिए एक समिति का गठन किया गया है।  लेकिन क्‍या ऐसे फैसले हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था में उस राष्‍ट्रीय भाषा नीति के खिलाफ नहीं है जिसकी सिफारिश पहली बार कोठारी आयोग ने 1964-66 की अपनी रिपोर्ट में की थी और इसे फिर 1986 की शिक्षा नीति और 2005 की शिक्षा नीति में भी दोहराया गया। जाने मानेशिक्षाविद, वैज्ञानिक, प्रशासक डॉ. दौलतसिंह कोठारी ने उपशीर्षक नयी भाषा नीति में त्रिभाषा सूत्र की सिफारिश की थी । यानि एक मातृभाषा दूसरी अंग्रेजी जो बाकी दुनिया से जुड़ने का माध्‍यम और तीसरी कोई और प्रादेशिक भाषा जैसे उत्‍तर भारत के लिए कोई दक्षिण की और दक्षिण के लिए हिन्‍दी। अपनी सिफारिश में उन्‍होंने यह भी कहा था कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सम्‍पर्क भाषा के रूप में हिंदी को बढ़ावा दिया जाए तथा गैर-हिंदी क्षेत्रों में हिंदी हो जिससे कि‍ भारत की सभी राष्‍ट्रीय भाषाएं परस्‍पर नजदीक आएं।

फिर किन कारणों से त्रिभाषा सूत्र में दो विदेशी भाषाएं अंग्रेजी और जर्मनी आ गई? और जब तीन वर्ष का अनुबंध सितंबर 2014 में समाप्‍त हो रहा है तो इतना बवाल क्‍यों? दूसरी दरार उस मध्‍यवर्गीय मानसिकता की । केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ने वाले ज्‍यादातर बच्‍चे उन सरकारी कर्मचारियों के होते हैं जिनका जगह-जगह स्‍थानांतरण होता है। ये अमीर वर्ग तो नहीं लेकिन देश की मौजूदा गरीबी को देखते हुए अच्‍छा खासा खाया-पीया है। यही कारण है कि‍ इनमें से नब्‍बे प्रतिशत ने भारतीय भाषाएं सीखने के बजाए अंग्रेजी के साथ-साथ जर्मनी सीखना शुरू किया। इसके कुछ कारण यह भी हो सकते हैं कि जर्मनी, जापानी या दूसरी भाषाओं में लोकप्रिय और संख्‍या बढ़ाने के प्रयोजन से नंबर खूब लुटाए जाते हैं। कुछ नंबरों की होड़ और उसके बाद आसानी से विदेश भागने की दौड़ का लालच बच्‍चों की मानसिकता पर ऐसा असर डाल रहा है कि उनके लिये न ये देश ठीक, न इसकी भाषा। दुहाई तो यह वर्ग धर्म, संस्‍कृति के नाम पर संस्‍कृ‍त, पाली सबकी देता है लेकिन खुशामद कर करके दुतकारे जाने पर भी दाखिला अंग्रेजी स्‍कूलों में ही लेता है। सत्‍ता भी प्रकारांतर से इसमें मदद करती है। जिस सरकार ने 2011 में संघ लोक सेवा परीक्षा की सिविल सेवा परीक्षा के सीसैट में भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी लाद दी उसी ने न जाने किन प्रलोभनों में केंद्रीय विद्यालयों में जर्मनी की शुरूआत करा दी। आश्‍चर्य की बात कि इसकी किसी को कानो कान भनक भी नहीं पड़ी । हो सकता है यदि इसकी जगह संस्‍कृ‍त या दूसरी देसी भाषा अनिवार्य की जाती तो शायद देश में कोहराम मच जाता। यह है हमारे बुद्धिजीवी विमर्श की एक और दरार।

महात्‍मा गांधी, रवीन्‍द्र नाथ टेगौर से लेकर दुनियाभर के शिक्षाविद शिक्षा और समझ के लिए अपनी भाषाओं की वकालत करती रहे हैं। ऐसा नहीं कि वे विदेशी भाषाओं के खिलाफ थे। गांधी जी का कहना था कि विदेशी भाषा एक खिड़की की तरह है और ज्ञान जहां से भी आ सकता हो उसे आने देना चाहिए। ज्ञान और समझ के बारे में सभी इस बात से सहमत हैं कि जितनी भाषाएं हैं उतने ही विस्‍तृत ज्ञान। इसलिये अंग्रेजी या जर्मनी सीखना कोई गलत नहीं गलत है उसका असमय बच्‍चों पर लाद देना। प्रोफेसर यशपाल ने 1992 में बस्‍ते के बोझ की अपनी प्रसिद्ध रिपोर्ट में किताबों और परीक्षा के दबाव की बात कही थी। उसमें भी यदि देखा जाए तो जितना वजन अंग्रेजी सीखाने का होता है जिसकी वजह से अधिकांश बच्‍चे स्‍कूल छोड़ देते हैं उतना किसी और विषय का नहीं। कम से कम हिंदी पट्टी के राज्‍यों के सर्वेक्षणों से यह बात बार-बार जाहिर होती है कि अंग्रेजी सीखना उसके लिए कितना मुश्किल, समझ विरोधी है। अब इसमें एक और जर्मनी भाषा भी लाद दी जाए तो आप समझ सकते हैं बस्‍ते का वजन कितना बढ़ जाएगा।

एक और महत्‍वपूर्ण पक्ष भाषा की उपयोगिता और बच्‍चे के विकास का है। क्या सिर्फ नंबरों की होड़ के लिए संस्‍कृत अथवा जर्मनी पढ़ी जाए? या क्‍या इसकी रोजाना की जिंदगी में भी कोई प्रासंगिकता है? इस कसौटी पर दोनों ही भाषाएं भारतीय संदर्भ में बहुत कमजोर लगती हैं। भाषा हम समाज से सीखते हैं और वही समाज उसके विकास में सहायक होता है। किसी पाठ्यक्रम के तहत 2-4 साल नंबरों की खातिर पढ़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। आप जर्मनी, रूसी या जापानी किसी अंतर्राष्‍ट्रीय समझौते के तहत पढ़ते भी हैं लेकिन यदि उसका उपयोग नहीं कर पाते तो उसे भूलने में भी देर नहीं लगती। यही बात संस्‍कृत के साथ है। बहुत समृद्ध भाषा है और भारतीय भाषाओं का मूल आधार भी। लेकिन रोजाना की जिंदगी में शायद ही आपको कोई संस्‍कृत बोलता नजर आए। बावजूद इसके संस्‍कृत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। क्‍योंकि संस्‍कृत यदि पढ़ाई गई तो भविष्‍य में देश की सभी भाषाओं के साथ जुड़ने का आधार बनता है।

पूर्व केबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रमणियन ने अपनी नयी किताब द टर्निंग प्‍वाइंट में स्‍कूल के दिन में लिखा है कि शुरू की शिक्षा बांग्‍ला भाषा में हुई और फिर माध्‍यमिक शिक्षा में संस्‍कृत पर जोर रहा। कॉलिज स्‍तर पर अंग्रेजी माध्‍यम । इस पृष्‍ठभूमि में जब उन्होंने उत्‍तर प्रदेश में एक आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में काम किया तो हिंदी सीखने में उन्‍हें कोई परेशानी नहीं हुई। हिंदी के इसी सम्‍पर्क भाषा की कल्‍पना तो हमारे संविधानविदों महात्‍मा गांधी, अम्‍बेडकर, जवाहर लाल नेहरू, राजगोपालाचार्य ने की थी। यानि संस्‍कृत समेत भारतीय भाषाओं को इस ढंग से आगे बढ़ाया जाए कि पूरे देश के लिए अंग्रेजी के कुछ दशकों के बाद हिंदी को सम्‍पर्क भाषा के रूप में अपना लें लेकिन ऐसा सपना लगातार बिखरता गया। रही बात संस्‍कृत और जर्मन के बीच आर्य जाति, स्‍वास्तिक जैसे अवांतर संबंधों को खोजने की तो वक्‍त आ गया है कि आधुनिक समाज किसी ऐसे भावनात्‍मक तर्कों से नहीं चलाया जा सकता। दस बीस ऐसे समान शब्‍द तो दुनिया की हर भाषा में खोजे जा सकते हैं। इसलिये न जर्मन की चिंता में पतले होने की जरूरत न संस्‍कृत के। हिंदी या हिंदुस्‍तानी को समृद्ध करने की जरूरत है और मौजूदा प्रधानमंत्री के कामों से यह स्‍पष्‍ट भी है। जर्मनी, जापानी, चीनी के विभाग विश्‍वविद्यालयों में हों, स्‍कूली पाठ्यक्रम में नहीं। यहां तक कि अंग्रेजी भी धीरे-धीरे विदा होनी चाहिए। बोध धर्म भारत में पैदा हुआ लेकिन क्‍या हमें चीन के साथ संबंधों में कोई मदद कर पा रहा है? या एक ही विरासत पाकिस्‍तान से सतत तनाव को कम कर पा रही है? नये राजनयिक संबंधों का आधार नये आर्थिक सांस्‍कृतिक समीकरण ज्‍यादा है अतीत की बातें नहीं। यदि ऐसा होता तो जिस संस्‍कृत भाषा में जर्मन रेडि़यो 2003 तक खबरें प्रसारित करता था वे आज तक क्‍यों बंद हैं? एक और भी विचाराधीन प्रश्‍न है कि यदि कल जापान, चीन या फ्रांस भी अपनी भाषाओं को भारतीय स्‍कूलों में पढ़ाए जाने के लिए जिद करे तो क्‍या यह हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था और बच्‍चों के साथ अन्‍याय नहीं होगा?

भारतीय संदर्भ में एक महत्‍वपूर्ण सबक सीखने की जरूरत यह है कि अपनी भाषा और संस्‍कृति के लिए यूरोप का एक देश जर्मन जिस स्‍तर पर संवाद, विमर्श में पूरी ताकत झौंक रहा है क्‍या भारत ने भी कभी भारतीय भाषाओं के लिए इस स्‍तर पर आवाज उठाई? भारत में भी। भारत में तो और उल्‍टा हो रहा है। भारतीय भाषाएं न शिक्षा में बची हैं न नौ‍करियों में। यहां तक कि सरेआम स्‍कूल उन छात्रों को दंड देते हैं जो भारतीय भाषाएं बोलते हैं। सच्‍चे लोकतंत्र के नाते नयी सरकार से इस देश के हर नागरिक को अपेक्षा है ‍कि भारतीय भाषाओं के अध्‍ययन अध्‍यापन पर वैसा ही ध्‍यान दे जैसे जर्मन जर्मनी के लिए और अमेरिका, इंग्‍लैंड अंग्रेजी के लिए दे रहे हैं।   




Friday, November 21, 2014

मनीषा पांडे की पांच कविताएं

कहते हैं कविता अभिव्यक्ति का विशुद्ध रूप होता है- भावना और बुद्धि के सबसे करीब. मनीषा पांडे की कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे हम किसी और लेखिका को पढ़ रहे हैं, उस मनीषा पाण्डे को नहीं जिसके लेखन के तेवर से हम सब परिचित रहे हैं. ऐसे समय में जब काल के कलुष में सब कुछ घुलता-मिलता जा रहा है कविताओं का होना ही अपने आप में प्रतिरोध है. सबसे कोमल, सबसे सुन्दर, और कहीं न कहीं सबसे सच्ची अनुभूतियों को बचाने की जिद की तरह इन कविताओं को पढ़ा जाना चाहिए. आप भी पढ़िए और अपनी राय दीजिए- मॉडरेटर
=============================================

1.

चाहती हूं तुम्‍हें देना
सुख का सबसे गहरा चुंबन
संसार के सबसे बीहड़ बियाबान में खिल उठा
एक बैंगनी फूल
प्रेम से काते गए प्रेम के ऊन से बुना
एक सुनहरा मफलर
तुम्‍हारे गले के गिर्द लिपटा
जैसे मैं ही होऊं
तुम्‍हें चूमती हुई
चाहती हूं
बर्फ में धूप बनकर खिल जाऊं
तपन में बनकर बारिश
तुम्‍हारी समूची देह पर बरस पडूं
बालों से टपकूं
जमीन पर गिरकर धरती में समा जाऊं
जिंदगी के हर शोर के बीच
प्रकृति के आदिम राग की तरह
बजती रहूं तुम्‍हारे कानों में
मेरे होने का मतलब हो तुम्‍हारी आंखों में हँसी
शांत, गहरी
ऐसे रहूं तुम्‍हारे भीतर हमेशा
जैसे दरख्‍तों की जड़ों में नमी रहती है
शिराओं में रक्‍त सी बहती रहूं
रहूं भी और दिखूं भी नहीं
-------------------

2 .

चीड़ के जंगलों से बहती चली आती
हवा हो तुम
आती
बालों को उड़ाती
दुख से चुभती आंखों पर सुख बनकर बैठ जाती
गालों को दुलार से छूती
बतियाती
पूछती हाल,
कभी न कही गई कहानियां
मन के सबसे अंधेरे कोने
अपने संग बहा ले जाती
सब उदासियों का बोझ
मन इतना हल्‍का
जैसे हवा में उड़ते
रूई के फाहे हों 
-----------------------


3 .

कहां नहीं हो तुम
मेरे कानों में बजता
धरती का कोई कोई ऐसा राग नहीं
जिसमें तुम बज न रहे हो
कोई ऐसी नदी नहीं
जो तुमसे होकर नहीं गुजरती
ब्रह्मांड के किसी भी कोने में
बारिश की कोई ऐसी बूंद नहीं गिरती
जो तुम्‍हारे बालों को न भिगोए
धरती के आखिरी छोर से बहकर आती है
जो हवा
मुझे छूने
तुमसे ही होकर गुजरती है
फूल कहीं भी खिलें, प्‍यार कहीं भी जन्‍मे
सब में तुम ही होते हो हमेशा
-------------------------------


4.

तुम हो भी और नहीं भी
तुम मैं हो
और मैं तुम
एकाकार ऐसे
जैसे
कुम्‍हार की मिट्टी में ढला हुआ घड़ा
जैसे फूलों में घुले रंग
जैसे शहद में मिठास
जैसे पसीने में नमक
जैसे आंखों में रहते हैं आंसू
और दिल में उदासी
जैसे आत्‍मा के भीतर एक सतानत दिया जलता है
राह दिखाता
तुम वही दिया हो
अंधेरे में टिमटिमाते हुए
दिखा रहे हो आत्‍मा को
रास्‍ता।
-------

5 .

नहीं,
तुम कोई नहीं
हाड़-मांस का इंसान नहीं
किसी का पति, प्रेमी, बेटा, पिता कुछ भी नहीं
कोई रिश्‍ता नहीं, कोई संबंध, कोई पहचान,
कोई पद-नाम-प्रतिष्‍ठा
कुछ भी नहीं
तुम्‍हारा कोई आकार नहीं
रूप-रंग नहीं
तुम वो नहीं कि जिसे जब चाहें छूकर महसूस कर लें
रख लें अपने घर में अपने कीमती सामानों की तरह
उसे चाहें अपने चाहने के हिसाब से, जैसा हम चाहें
नहीं,
तुम इसमें से कुछ भी नहीं
तुम प्रकृति का आदिम अनहद राग हो
जो कभी कहीं से आया नहीं था
कभी कहीं गया भी नहीं
वो तब से वैसे ही मौजूद है जबसे जीवन
तुम चूम लिए जाने की हड़बड़ी नहीं हो
न पा लिए जाने की बेचैनी
तुम विश्‍वास की तरह रहते हो मन में
जैसे

प्रेम में दुख पाई स्‍त्री की आंखों में आंसू रहते हैं