Saturday, January 24, 2015

हर पिछला कदम अगले कदम से खौफ खाता है

‘लप्रेक’ को लेकर हिंदी में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं देखने में आ रही हैं उससे मुझे सीतामढ़ी के सबसे बड़े स्थानीय कवि पूर्णेंदु जी की काव्य पंक्तियाँ याद आती हैं- ‘कि हर पिछला कदम अगले कदम से खौफ खाता है.’ हिंदी गद्य का इतिहास बताता है कि हर दौर का अपना मुहावरा होता है, अपनी भंगिमा होती है, अपनी विधा भी होती है. उदाहरण के लिए, कहानियां लम्बी होनी चाहिए यह बात हिंदी में 80 के दशक उत्तरार्ध में स्थापित होने लगी जब उदयप्रकाश की कहानियों की धूम मची, व्यावसायिक पत्रिकाएं बंद होने लगी, लघु पत्रिकाओं का चलन बढ़ा, जहाँ पन्नों की कोई सीमा नहीं होती थी. नहीं तो, याद कीजिए तो हिंदी कहानी के मूर्धन्य लेखकों कमलेश्वर, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा की बहुत कम कहानियां हैं जो आकार में दीर्घ हैं. लेकिन इसमें शायद किसी को हो संदेह हो कि उनकी कहानियों के माध्यम से हिंदी में आधुनिकता आई.

लप्रेक आज की जीवन स्थितियों की देन है. आज हम यूनिकोड फॉण्ट की वजह से फोन में, लैपटॉप में हिंदी लिखने के क्षेत्र में क्रांति आ गई है. हिंदी जितना पढने पढ़ाने की वजह से, हिंदी दिवस मनाने से, राष्ट्रभाषा राष्ट्रभाषा चिल्लाने से नहीं फैली थी उससे कहीं अधिक यूनिकोड क्रांति की वजह से फ़ैल रही है. यह तथ्य है कि हिंदी में लिखने वालों की इतनी बड़ी तादाद कभी नहीं थी जितनी आज है. आज यह जन जन की अभिव्यक्ति की भाषा ही गई है. लोग मेट्रो में जाते हुए, बसों में बैठे हुए, किचेन में सब्जी बनाते हुए, ऑफिस में काम की बोरियत तोड़ते हुए लिख रहे हैं. हिंदी में इसी लेखन क्रांति की जरुरत थी. इसकी वजह से अभिव्यक्ति की छोटी विधाओं की स्वीकृति बढ़ेगी. अंग्रेजी में तो 140 कैरेक्टर्स की ट्विटर कहानियों ने भी धीरे धीरे अपना बड़ा स्पेस बनाया है. प्रतिरोध प्रतिरोध चिल्लाने का नहीं यह समय को, उसकी मांग को समझने का समय है.

अब तक हम साहित्य वाले दडबों में सिमटे रहना चाहते हैं, कोने में दुबके रहना चाहते हैं. इसलिए हमें यह लग रहा है कि लप्रेक हमारी जमीन के ऊपर कब्ज़ा जमा रहा है. मैं विनम्रता के साथ कहना चाहता हूँ कि कोई किसी की जगह नहीं हड़प रहा है बल्कि हिंदी का विस्तार हो रहा है. यूनिकोड क्रांति की वजह से जो हिंदी का एक बड़ा मध्यवर्ग पैदा हुआ है उसको साहित्य पढने की तरफ मोड़ना होगा. सही बताऊँ, बिना ओरिएंटेशन के जब ‘गुनाहों का देवता’ जैसी लोकप्रिय समझी जाने वाली कृति भी बच्चों को पढ़ाई जाती है तो उनको वह कडवी दवा की तरह लगने लगती है. मैं यह बात विश्वविद्यालय में पढ़ाने के अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ.

लप्रेक पाठकों को न केवल हिंदी से जोड़ेगा बल्कि रवीश कुमार जैसे हिंदी समाज के सबसे विश्वसनीय चेहरे के लप्रेक लेखक होने से लोग हिंदी पढ़ते हुए शर्मायेंगे नहीं. बल्कि उसे अपनाएंगे. हिंदी के विस्तार की विधा को संकुचित मानसिकता से नहीं खुले दिमाग से समझने की जरुरत है. लप्रेक जहाँ जहाँ जाएगी वहीं वहां हिंदी जाएगी. मुश्किल उन लेखकों के लिए है जो जुगाड़ से भाषा में अपनी पहचान बनाते रहे हैं. जब पाठक और बाजार की सीधी दखल बढ़ेगी तो जनतांत्रिकता आएगी. वह जनतांत्रिकता जिसमें पाठक ही निर्णय की अंतिम मुहर लगाएगा. बड़े बड़े बाबाओं के सर्टिफिकेट जाली करार दिए जायेंगे.


मैं यह नहीं कह रहा कि लप्रेक साहित्य की कोई बड़ी विधा है, लेकिन यह ख़म ठोक कर कह रहा हूँ कि यह आत्मविश्वास की विधा है. आज हिंदी वालों को इस आत्मविश्वास की सबसे अधिक जरुरत है.  

Friday, January 23, 2015

क्रांति और भ्रांति के बीच 'लप्रेक'

लप्रेक के आने की सुगबुगाहट जब से शुरू हुई है हिंदी में परंपरा-परम्परा की फुसफुसाहट शुरू हो गई है. कल वरिष्ठ लेखक भगवानदास मोरवाल ने लप्रेक को लेकर सवाल उठाये थे. आज युवा लेखक-प्राध्यापक नवीन रमण मजबूती के साथ कुछ बातें रखी हैं लप्रेक के पक्ष में. लप्रेक बहस में आपकी भी वैचारिक बातों का स्वागत है. फिलहाल यह लेख- मॉडरेटर.
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हिन्दी साहित्य जगत की दुनिया के परस्पर जो हिन्दी का नया स्पेसबन रहा है। उसको अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस पूरी प्रक्रिया का विश्लेषण एवं मूल्याकंन किया जाना चाहिए। हिन्दी साहित्य जगत की दुनिया और हिन्दी का बनता नया स्पेस ये दोनों दो अलग-अलग दुनिया बना दी गई हैं। क्योंकि हिन्दी साहित्य जगत में प्रवेश की एक खास प्रक्रिया है और जहां किसी भी नए लेखक का पैर जमा पाना संभव नहीं है। जबकि हिन्दी के बनते नए स्पेसमें किसी आलोचक,प्रकाशक आदि की पीठ नहीं सहलानी पड़ती। यहां पाठक-लेखक सब स्वतंत्र है। और दोनों के बीच संवाद, नोक-झोंक सब चलती है। यहां कोई दादा-पोते का संबंध निभाने नहीं आते, बल्कि हर कोई अपनी बात कहने के लिए ज्यादा स्वतंत्र है। इस नए स्पेस में पाठक और लेखक दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जबकि हिन्दी साहित्य जगत में पाठक भी गढ़े जाते हैं। समीक्षाएं लिखवाई जाती है, शोध करवाएं जाते है, प्रशंसा प्रायोजित-आयोजित होती है। प्रकाशक के आगे कौन दरी बिछाता है, इसका सबको पता ही है। लाइब्रेरी में कितना कूड़ा भरा हुआ, इस पर शोध होना बाकी है।
बात जहां तक लप्रेक की है, यह इस बनते-बिगड़ते नए स्पेस की ही देन है। जिसमें लेखक और पाठक के बीच के दूरी सपाट और एकहरी नहीं हैं। दोनों ही एक दूसरे के साथ घुल मिलकर नई संरचनाओं के बीच अपने होने के अहसास के क्षणों को जी रहे हैं। यह जीना आत्ममुग्धता के साथ जीना नहीं है, बल्कि एक सार्थक हस्तक्षेप के साथ अपनी मौजूदगी का दखल है। एक ऐसे समय में जब प्रेम को सतही और थोथा करार दिया जाने लगा हो, तब ये अपने व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ प्रेम के क्षणों को मुखर करता है।

प्रेम का आख्यान हमेशा अपने विराट रूप में अभिव्यक्त हुआ है। उस आख्यान के बरक्स लप्रेक जिंदगी की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक आदि तुरंता प्रतिक्रियाओं के बीच अपने जीवन में होने वाली हलचलों को दर्ज करता है। शहर के गुणा-गणित के बीच प्रेम के लिए स्पेस की तलाश शहर में रहने वाला हर प्रेमी जानता है। प्रेम केवल खुली प्रकृति और बंद कमरों के बीच ही नहीं पनपता, बल्कि वह हर छोटी से छोटी जगह पर अपने लिए स्पेस का निर्माण भी करता है। इसी को इश्क में शहर होना कहा जा सकता है। इस इश्क में सेक्स और रूप-सौंदर्य के सौंदर्यबोध से अलग एक ठोस किस्म का आम जीवन है, जो शहर और कस्बे के युवा को अपना जान पड़ता है। जो कहीं से भी फिल्मी और किताबी नहीं है। न ही इसमें शहर को खलनायक बनाने की कोशिश होती है। इश्क और शहर दोनों में डूब कर जीना इसका खास तेवर है। क्रांति और भ्रांति के बीच इश्क मूलतः जीवन के उलझे हुए रेशे को खंगालने का काम करता है,जिंदगी और शहर दोनों में।

लप्रेक दरअसल धड़कनों को शब्दों के जरिए अभिव्यक्त करने का माध्यम है। इन धड़कनों में शहर भी है, कस्बा भी है और गाम भी है। नहीं है तो वो है बेगानापन। अपनेपन के रस में भीगे रेसों को हर एक छोटी कथा में पिरोया गया है। कहानी छोटी है पर अधूरी नहीं है।

हिन्दी में प्रेमचंद, रेणु की परंपरा के (जैसा तमगा उन्होंने खुद के लिए लगाया) प्रतिष्ठित लेखक भगवानदास मोरवाल जी ने लप्रेक को लेकर जो चिंता और सवाल खड़े करने का प्रयास किया हैं। दरअसल उसमें बहस की गुंजाइश कम ही है। क्योंकि उनके पूरे लेख में हिन्दी और उसके पाठक वर्ग की चिंता कम है। बल्कि एक तथाकथित प्रतिष्ठित लेखकों और अपने खुद के बाजार को लेकर  चिंता अधिक है। जो कि स्वाभाविक भी है। दूसरा उन्होंने मूल्याकंन करते वक्त जल्दबाजी के साथ-साथ नए पाठक वर्ग और संचार माध्यमों के प्रति अपनी कमजोर समझ को भी उजागर कर दिया है। हिन्दी के बनते नए स्पेस के प्रति उनकी नजर रूढ़ नजरिया ही पेश करती है। उनका विरोध बहुत कुछ खाप की तरह है, जो परंपरा के नाम पर विरोध करना चाहते है और रूढ़ को बचाने के चक्कर में फब्तियां कसने का मौका भी नहीं छोड़ते है। उनकी भड़ास राजकमल प्रकाशन के प्रति ज्यादा लग रही है, बजाय लप्रेक के। लप्रेक तो आड़ भर है। इस पूरी बहस में आम पाठक और हिन्दी के शोधार्थियों के अंतर को भी समझना होगा। लप्रेक से हिन्दी का तो भला होगा,पर हिन्दी साहित्य के नाम पर जड़ जमा चुके लेखकों का शायद नुकसान होना स्वाभाविक है।
हम हिन्दी वाले लेखक बनाम बाहरी (बिहारी)

हम और वे की गूंज पूरे लेखन में साफ झलकती है। मानो हिन्दी में कुछ भी करने या लिखने का सारा अधिकार तथाकथित हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखकों के पास ही है। जिस तरह सामाजिक संरचनाओं में बिहारीशब्द का चलन है, कुछ-कुछ उसी तर्ज पर हिन्दी साहित्य में बाहरीका चलन है। खारिज करने का चलन हिन्दी में यों नया नहीं है। हिन्दी साहित्य जगत से जुड़े तमाम लेखक, आलोचक, पाठक, शोधार्थी और प्रवक्ता आदि सब अंदर के खानों में चलने वाली रणनीतियों को जानते-समझते ही है। जिसे आम भाषा में जुगाड़ कहा जाता है। हिन्दी साहित्य में स्थान बनाने-पाने के लिए एक खास योग्यता की मांग रहती ही है। जो उसे पूरा नही करता, उसे बाहर धकेल दिया जाता है। मोरवाल जी की चिंता के संदर्भ में अंतिम बात अज्ञेय के शब्दों में - दूर के विराने तो कोई सह भी ले, खुद के रचे विराने कोई सहे कैसे? ( स्मृति आधारित)



Thursday, January 22, 2015

प्रेमचंद की परम्परा बचेगी या लप्रेक की परम्परा चलेगी

'लप्रेक' एक नई कथा परम्परा की शुरुआत है. लेकिन हर नई शुरुआत को अपनी परम्परा के साथ टकराना पड़ता है, उनके सवालों का सामना करना पड़ता है. आज 'लप्रेक' के बहाने हिंदी परम्परा को लेकर कुछ बहासतलब सवाल उठाये हैं हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक भगवानदास मोरवाल ने, जिनके उपन्यास 'नरक मसीहा' की आजकल बहुत चर्चा है- मॉडरेटर 
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'लप्रेक' आज जैसे ही प्रभात रंजन का 'जानकीपुल' खोला, तो एक बार फिर इस शब्द से सामना हुआ.  जबसे इस शब्द से पाला पड़ा है अनेक कूढ़मगज हिंदी के लेखकों की तरह मैं भी इसका अर्थ खोजना लगा हूँl एक बार सोचा कि यह बिहार से आयातित शब्द होगाl फिर सोचा कि हो सकता है यह कोई स्पेनिशजर्मन, फ्रांस,पुर्तगाल आदि जैसे किसी मुल्क की भाषा से उड़ाया गया होl एक बार अनुमान लगाया कि यह लघु प्रेम कविता भी हो सकता हैl

अंतत:मेरे  एक निजी शब्दकोश ने मेरी यह समस्या हल कर दी कि इसका अर्थ वह नहीं है जैसा मैं समझ रहा हूँl दरअसल 'लप्रेक' का अर्थ है 'लघु प्रेम कथा'l इसके बाद मैंने अपने कुछ निजी स्रोतों से इसकी अंतर्कथा पता की और जो पता चला उसे मैं आपसे भी साझा कर रहा हूँइधर सुना है हिंदी प्रकाशन जगत  में एक युगांतकारी क्रांति होने जा रही है l अभी तक हमने फेसबुकिया कविताओं के बारे में सुना था, पर अब सुनने में आ रहा है कि ज़ल्द ही कोई फेसबुक फिक्शन शृंखला नामक सपना साकार होने वाला  हैl वास्तव में फेसबुक फिक्शन शृंखला नामक इस योजना का ही नाम 'लप्रेक' हैl पिछले कुछ दिनों से जिस तरह इस योजना का प्रचार और प्रसार किया जा रहा है, और इसके नेपथ्य से जो बातें छन-छन कर आ रही हैं, वे बेहद रोमांच पैदा करने वाली हैंl  मसलन, पहली  तो  यही कि हिंदी के बहुत से मुझ जैसे प्रेमचंदीय जो  लेखक इस 'लप्रेक' शब्द के असली अर्थ और परिभाषा को जानने के लिए हलकान हुए जा रहे थे, जब इसका अर्थ पता चला तो मेरी हालत सचमुच घायल की गति घायल जाने जैसी हो गईl

 'लप्रेक' अर्थात लघु प्रेम कथा यानी ऐसी प्रेमकथाएं जो सिर्फ और सिर्फ फेसबुक पर लिखी गई होंगीl मगर सावधान हे हिंदी लघुकथा लेखक यह योजना  आप जैसे प्रेमचंदीय लेखकों के लिए नहीं, बल्कि उन सेलीब्रेटीज़नुमा लेखकों के लिए है जिन्हें इस आधुनिक भारत का युवा जानता तो है मगर  उनकी कथा-प्रतिभा से अभी तक परिचित नहीं हैl तो, इस योजना का असली मकसद आधुनिक भारत के इसी युवा वर्ग के उस सेलीब्रेटी साहित्य प्रेम अर्थात उनके भीतर छिपे उस साहित्य अनुराग को जाग्रत करना है जिसको जगाने में कथा सम्राट प्रेमचंद,रेणु, राही मासूम रज़ा, श्रीलाल शुक्ल से लेकर मुझ जैसा प्रेमचंदीय लेखक असफल रहा है,और जिनकी असफलताओं के चलते हमारा यह युवा पाठक आज के हिंदी साहित्य से विमुख होता जा रहा हैl

फेसबुक फिक्शन शृंखला अर्थात 'लप्रेक' यानी इस लघु प्रेम कथा योजना की सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षित करने वाली बात यह होगी कि हिंदी के नए बनते पाठक के भीतर छिपे उसके साहित्यानुराग को जाग्रत या दोहन करने के लिए प्रकाशित की जाने वाली इस प्रथम सौ पृष्ठीय पुस्तक की प्री-बुकिंग कीमत मात्र 80/- रुपए रखी गई हैl यानी एक ज़माने में जिस तरह राजन-इकबाल सीरिज़ की पुस्तकें युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करती थीं , वही काम अब 'लप्रेक' करने जा रहा हैl पुस्तक की प्री-बुकिंग का एक अर्थ तो साफ़ है कि इसके अंतर्गत जितनी भी बुकिंग होगी वह सार्वजनिक और बेहद पारदर्शी होगीl हो सकता है इस योजना के शुरू होने के बाद हिंदी प्रकाशन जगत इस तौहीन से निष्कलंक हो जाए , और जिसकी हर छोटे-बड़े लेखक को शिकायत रहती  है कि हिंदी का प्रकाशक कभी भी उसकी पुस्तक की सही बिक्री नहीं बताताl

वैसे सुनने में यह भी आ रहा है कि इस योजना को 'लौंच' करने की बड़े जोर-शोर से  भव्य तैयारी चल रही हैl इतना ही नहीं, सुना है कि प्रकाश्य पुस्तक और उसके लेखक को इसके  प्रकाशक द्वारा इस घटना को हिंदी साहित्य का एक ऐतिहासिक 'इवेंट' बनाने के लिए फ़िल्मी सितारों से लबरेज़ जयपुर में चल रहे एक मेले में अपने पराश्रित मध्यवर्गीय पाठकों को परिचित करने के लिए महंगी इवेंट भी रखी हैl मुझे तो इस अप्रतिम इवेंट के बारे में सुन-सुन कर हिंदी के उन अभागे लेखकों पर तरस आ रहा है, जो अपनी छपी हुई पुस्तक को अपने सीमित संसाधनों और प्रयासों के चलते कभी पटना भागा जा रहा है, तो कभी लखनऊ कभी महाराष्ट्र जा रहा है तो कभी दूसरी जगह तलाश है और  तलाश रहा है अपने उस पाठक को जो प्रेमचंदरेणु, राही मासूम रज़ा और श्रीलाल शुक्ल के साहित्य की  तरह उसके साहित्य से भी विमुख  होता जा रहा हैl


हिंदी जगत की इस ऐतिहासिक घटना से साफ़ है कि हिंदी का वह लेखक जो अपनी कुछ सौ पुस्तकों के बल पर, अपने लेखन को समाज परिवर्तन की ज़मीन तैयार करने वाला औज़ार मानता थाऔर इतराता फिर रहा था, उसके दिन अब लदने वाले हैंl  सोच रहा हूँ कि जिस फेसबुक पर अपनी वाल को अपने उपन्यास 'नरक मसीहा' के प्रचार में रंगे जा रहा हूँ, उसकी जगह मैं भी लघु प्रेम कथा अर्थात 'लप्रेक' लिखना शुरू कर ,यह जानते हुए कि आज तक मैंने किसी से प्रेम तो क्या ,प्रेम से देखा तक नहीं l मगर एक दिक्कत भी है कि जब मैं कोई सेलिब्रेटी ही नहीं हूँ तो मेरी इन 'लप्रेक' पर यकीन कौन करेगा? मैं  तो अपने पुरखों प्रेमचंद, रेणु, राही मासूम रज़ा यशपाल, जैनेन्द्र, श्रीलाल शुक्ल के साथ-साथ मुझ जैसे  लेखकों के बारे में सोच कर परेशान हो रहा हूँ जिन्होंने धूल और  धूप में  अपने रक्त को सीच-सींच कर समाज के दुखों को अपना दुःख बनायाl