Thursday, August 28, 2014

अविनाश मिश्र की कविताएं

हरेप्रकाश उपाध्याय के संपादन में निकली पत्रिका 'मंतव्य' की वाह-वाह हो रही है लेकिन यह लिखने वाले कम लोग हैं कि इस पत्रिका में छपी रचनाओं में अच्छा क्या है. सोशल मीडिया की वाह-वाह ऐसी ही होती है. बहरहाल, इस पत्रिका पर मैं विस्तार से बाद में लिखूंगा. पहले युवा कवि अविनाश मिश्र की कविताएं जिसका तेवर मुझे अच्छा लगा. 'मंतव्य' के प्रवेशांक की एक उपलब्धि- प्रभात रंजन 


सोलह अभिमान


सिंदूर

क्या वह बता सकता था
कि अब तुम मेरी नहीं रहीं
लेकिन उसने ही बताया
जब तुम मिलीं बहुत बरस बाद
और वह तुम्हारे साथ नहीं था
***

बेंदा

यूं तुम देखने में बुरे नहीं
उम्र भी तुम्हारी कुछ खास नहीं
बनावट से भी तुम्हारी रश्क होता है
लेकिन तुम्हें सब वक्त ढोया नहीं जा सकता
जबकि तुम उसके इतने करीब हो!
***

बिंदिया

वह तुम्हारा कोई स्वप्न थी
या अभिलाषा
या कोई आत्म-गौरव
या वह कोई बाधा थी
सूर्य, चंद्रमा, नखत, समुद्र या पृथ्वी की तरह नहीं
एक रंग-बूंद की तरह प्रतिष्ठित—
तुम्हारे भाल पर
***

काजल

तुम्हारी आंखों में बसा
वह रात की तरह था
दिन की कालिमा को संभालता
उसने मुझे डूबने नहीं दिया
कई बार बचाया उसने मुझे
कई बार उसकी स्मृतियों ने
***

नथ

वह सही वक्त बताती हुई घड़ी है
चंद्रमा को उसमें कसा जा सकता है
और समुद्र को भी
***

कर्णफूल

बहुत बड़े थे वे और भारी भी
तुम्हारे कानों की सबसे नर्म जगह पर
एक चुभन में फंसे झूलते हुए
क्या वे दर्द भी देते थे
तुम से फंसे तुम में झूलते हुए
क्या बेतुका ख्याल है यह
क्या इनके बगैर तुम अधूरी थीं
नहीं, आगे तो कई तकलीफें थीं
***



गजरा

मैं तुम्हारे अधरों की अरुणाई नहीं
तुम्हारे नाखूनों पर चढ़ी गुलाबी चमक नहीं
तुम्हारे पैरों में लगा महावर नहीं
नाहक ही मैं पीछे आया
तुम्हारे केश-अरण्य में गमकता
अपनी ही सुगंध से अनजान
मैं तुम्हारा अंतरंग नहीं
***

मंगलसूत्र

वह वास्तविक निकष है एक तय निष्कर्ष का   
या मुझे अनाकर्षित करने की कोई क्षमता
मर्यादा उसका प्रकट गुण है
और कामना तुम्हारा
मैं अगर कोई सूत्र हूं
तब मेरा मंगल तुम पर निर्भर है
***

बाजूबंद

वह आमंत्रित है
मैं भी
अन्य भी

प्रथम पुरुष के लिए वह अर्गला है
मध्यम के लिए आश्चर्य 
अन्य के लिए आकांक्षा
***  

मेहंदी

इस असर से तुम्हारी हथेलियां
कुछ भारी हो जाती थीं
इतनी भारी
कि तुम फिर और कुछ उठा नहीं सकती थीं
इस असर के सूखने तक
बहुत भारी था जीवन
समय बहुत निर्भर
***

चूड़ियां

तुम्हें न देखूं तब भी
बंधा चला आता था
बहुत मीठी और नाजुक थी उनकी खनक
छूते ही रेजा-रेजा...
***

अंगूठी

इसका मुहावरा ही और है
यह सबसे पहले आती है
शेष सब इसके बाद
एक भार की तरह
आत्म-प्रचार की तरह
इसमें उदारता भी स्वाभाविक होती है और उपेक्षा भी
यह जब जी चाहे उतारकर दी जा सकती है
उधार की तरह
*** 


मेखला

मध्यमार्गी वह
मध्य में मैं
मध्यमांगी तुम
***

पायल

वह शोर और दर्द जो उठ रहा था
उनसे नहीं उनके बिछड़ जाने से उठ रहा था
कितनी सूनी और कितनी अधूरी थी इस बिछुड़न में
तुम्हारी चाल
बेताल
***

बिछुए

वे रहे होंगे
मैं उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता
मैं उनके बारे में जानना नहीं चाहता
उनके बारे में जानना स्मृतियों में व्यवधान जैसा है
***

इत्र

मैं ऐसे प्रवेश चाहता हूं तुम में
कि मेरा कोई रूप न हो
मैं तुम्हें जरा-सा भी न घेरूं
और तुम्हें पूरा ढंक लूं

***

Saturday, August 23, 2014

आत्मालोचन के खाद-पानी से मनुष्य-धर्म समृद्ध होता है

यु. आर. अनंतमूर्ति के उपन्यास 'संस्कार' को कन्नड़ भाषा के युगांतकारी उपन्यास के रूप में देखा जाता है, वह सच्चे अर्थों में एक भारतीय उपन्यास माना जाता है, जिसने भारतीय समाज के मूल आधारों पर सवाल उठाया. उनको श्रद्धांजलिस्वरूप उस उपन्यास पर प्रसिद्ध आलोचक रोहिणी अग्रवाल का यह लेख- मॉडरेटर 
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''मन को प्रकाश और छाया के उन आकारों की तरह होने दो जो धूप के वृक्षों से छन कर आने से स्वाभाविक रूप से बन जाते हैं। आकाश में प्रकाश, वृक्षों के नीचे छाया और धरती पर आकार! यदि सौभाग्य से पानी की बौछार हो जाए तो इंद्रधनुष की मरीचिका भी। मनुष्य का जीवन इसी धूप के समान होना चाहिए। मात्र एक बोध - मात्र एक विशुद्ध आश्चर्य - निश्चल-निश्चलता में तिरते हुए, और जैसे कोई बड़े, फैले हुए पंखों वाला पक्षी आकाश में तिरता है। पांव चलते हैं, आंखें देखती हैं, कान सुनते हैं - काश! कि हम नितांत इच्छारहित हो सकते! तभी जीवनग्राही हो सकता है। अन्यथा इच्छा के कड़े छिलके में वह सूख जाता है, मुरझा जाता है और कंठस्थ किए हुए हिसाब के पहाड़ों के पुंज की तरह हो जाता है।'' (संस्कार, पृ0 110)

'संस्कार' उपन्यास प्रतीक उपन्यास है जो धर्म और धर्मशास्त्र के परम्परागत स्वरूप और परिभाषाओं पर प्रश्नचिह्न लगाता हुआ उनके जड़ स्वरूप से निकले ब्राह्मणवाद, अंधविश्वासों, रूढ़ियों और परम्परागत संस्कारों पर केवल चोट करता है बल्कि उन्हें बदलते संदर्भ में मानवीय दृष्टि से मूल्यांकित करने का बीड़ा भी उठाता है। इसलिए यह उपन्यास ब्राह्मणवादी रूढियों से विद्रोह करने वाले नारणप्पा के शव के दाह संस्कार के जटिल प्रश्न में नहीं उलझता बल्कि उसे प्रस्थान बिन्दु मानते हुए समस्त संकीर्णताओं, स्वार्थों और अमानवीयताओं के बीच छिपी उन संभावनाओं की तलाश करता है जो विकल्प रूप में मनुष्य-समाज का निर्माण और संस्कार करने में सहायक है।

अपने इस महत उद्देश्य की पूर्ति हेतु उपन्यासकार ने पात्रों और घटनाओं को प्रतीक रूप में इस्तेमाल किया है। संकट का बिन्दु है विद्रोही नारणप्पा की प्लेग से अकाल मृत्यु और उसके दाह संस्कार का प्रश्न। इसी के इर्द-गिर्द धर्म और धर्मशास्त्र की जड़ता, ब्राह्मणवाद का खोखलापन, विद्रोह की दिशाहीनता और नव-निर्माण की अनिवार्यता को बुना गया है। नारणप्पा इस उपन्यास में बार-बार एक ही बात उठाता है कि प्राणेशाचार्य के अतिरिक्त अग्रहार में कोई दूसरा ब्राह्मण नहीं। इसी आशय को प्रतिध्वनित करते हुए उसका शिष्य श्रीपति कहता है, ''इन ब्राह्मणों की बांझ दृष्टि को भोजन के सिवाय क्या नजर आता है?'' बेशक, दोनों का मूल्यांकन सही है क्योंकि लक्ष्मणाचार्य ''जायदाद के लालच से गन्दगी में पड़े सिक्के जीभ से चाटकर उठा लेने वाला ब्राह्मण है,'' तो ''विधवाओं की जायदाद हड़पने वाला, जादू-टोना करवाकर दूसरों की बुराई चाहने वाला गरूड़ाचार्य'' आत्मकामी व्यक्ति है। यदि लक्ष्मणचार्य हर घर में गांव भर के उपभोग के निमित्त लगाए गए आधे से ज्यादा फलों को चोरी-चोरी बाजार में बेच आता है और चन्द्री द्वारा प्रस्तुत गहनों के लोभ में नारणप्पा के प्रति घृणा, द्वेष और विरोध को भूलकर उसके दाह संस्कार के लिए तैयार हो जाता है तो दासाचार्य भी कुछ कम नहीं। उसकी समस्त चिन्ता अपने पेट और व्यवसाय को लेकर है। नारणप्पा के दाह संस्कार को लेकर वह इसलिए चिन्तित नहीं कि शव का उचित रीति से दाह संस्कार कर मनुष्य धर्म का निर्वाह किया जाना चाहिए, बल्कि इसलिए चिन्तित है कि वह अधिक देर भूखा नहीं रह सकता। दूसरे, नारणप्पा के दाह संस्कार को लेकर वह अपने ब्राह्मणत्व पर भी आंच नहीं आने देना चाहते क्योंकि कलंकित हो जाने की अवस्था में उसे चिन्ता है कि आस-पास के गांवों से भोजन और श्राद्ध के निमन्त्रण नहीं मिलेंगे।

अग्रहार के समस्त ब्राह्मण जीविकोपार्जन के सीमित साधनों की वजह से लोभी और स्वार्थी हो गए हैं या वर्तमान से जुड़ पाने की वजह से - यह प्रश्न विचारणीय है। लेकिन इतना तय है कि वैचारिक जड़ता उन्हें किसी भी प्रकार मनुष्य का दर्जा देने में संकोच करती रही है। स्थिति से सीधे टकराने के बजाय उसका स्थगन करते रहना उनकी इसी वैचारिक जड़ता का परिणाम है। इसलिए आगे बढ़कर नारणप्पा का दाह संस्कार करने की अपेक्षा पहले प्राणेशाचार्य की सम्मति पर निर्भर करना, और फिर कैमर के सुब्बाणाचार्य और तत्पश्चात मठ के स्वामी जी की राय लेने के लिए दल बांधकर प्रस्थान करना - उन्हें बुद्धिशून्य, विवेकशून्य और चेतनाशून्य प्रमाणित करता है। इनके लिए ब्राह्मणत्व अर्थात विवेकशाील आचरण का सम्पूर्ण दायित्व अकेले प्राणेशाचार्य पर है। स्पष्ट है कि श्रीपति और नारणप्पा यदि उन सबका उपहास करते हुए उन्हें मनुष्यत्व से हीन समझते हैं तो कुछ गलत नहीं करते। लेकिन यू .आर .अनन्तमूर्ति सिर्फ इसी एकपक्षीय मूल्यांकन पर अपनी आस्था व्यक्त करने की अपेक्षा नारणप्पा आदि के विद्रोह की गहराई भी नाप लेना चाहते थे। शालिग्राम को पत्थर समझकर पानी में फेंक देना और पवित्र समझे जाने वाले मंदिर के तालाब की मछलियों को शूद्रों और मुसलमानों के साथ पकड़कर धर्म का मजाक उड़ाना नारणप्पा के दुस्साहस और अनास्था का प्रतीक हो सकता है, लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि उसने धर्म के मर्म को समझ लिया है। अग्रहार के शेष ब्राह्मणों की तरह वह आग्रहपूर्वक यदि शास्त्रसम्मत जीवन नहीं जीता और दुराग्रहपूर्वक उस जीवन का विरोध करते हुए व्यसनी और कामी व्यक्ति के रूप में उभर कर आता है तो असल में वह भी इन रूढ़िग्रस्त ब्राह्मणों से भिन्न नहीं है।

यदि अग्रहार के ब्राह्मण अपने अस्तित्व-रक्षण की चिन्ता के कारण लोभी, स्वार्थी और नीच हो गए हैं तो ठीक यही दोष नारणप्पा पर भी लगाया जा सकता है जो अपनी तामसी वृत्तियों की तुष्टि में सीमित सरोकारों के प्रति मोह को सूचित करता है। दूसरे, विद्रोही पीढ़ी के रूप में वह जिन अबोध युवकों को जड़ों से काट रहा है, उन्हें आधार देने के लिए कोई संस्कार या ऊर्ध्व सोच का धरातल उसके पास नहीं है। यही कारण है कि मद्यपान करके ही इस नई पीढ़ी में ''वीरोचित भावों'' का स्फुरण होता है और उसी क्षणिक उत्तेजना की अवस्था में वे 'अपने मित्र नारणप्पा की अंत्येष्टि स्वयं करने का निश्चय' करते हैं, लेकिन मृत चूहों से अटे कमरे में फूल कर ऐंठी, बीभत्स और दुर्गंधमय लाश देख अपनी जान बचाने का संकट उन पर हावी हो जाता है। यदि लौकिक इच्छाओं को जीवन का पर्याय मानने के कारण अग्रहार के ब्राह्मणों की मानवीय सत्ता 'अमानवीय' आचार-व्यवहार मेेें नष्ट हो जाती है तो नारणप्पा भी इसका अपवाद नहीं है बल्कि उसकी स्थिति अपेक्षाकृत अधिक कष्टकर है जो मरकर सद्गति पाने की अपेक्षा फूली हुई विकृत लाश बनकर केवल सड रहा है बल्कि प्लेग जैसी संक्रामक महामारी का प्रसार भी कर रहा है। समाज के लिए यदि ब्राह्मणों की जड़ता, पाखण्ड और कर्मकाण्ड घातक हैं तो नारणप्पा का दिशाहीन अंधा विद्रोह और भी प्रलयंकारी है जिसे समय रहते रोका गया तो वह सारी व्यवस्थाओं और आस्थाओं का समूल नाश कर सकता है।

उपन्यासकार ने धर्मशास्त्र के रूढ़ और कर्मकाण्डी स्वरूप को व्यंग्य का निशाना बनाया है और व्यंग्य वही कर सकता है जो अपनी मूल चेतना में विवेकशील और संवेदनशील हो। नारणप्पा में इन संभावनाओं को देखकर उपन्यासकार प्राणेशाचार्य की ओर मुड़ता है। निस्संदेह उपन्यास के प्रारम्भिक भाग मेें प्राणेशाचार्य भी वैचारिक जड़ता से आक्रान्त दिखाई पड़ते हैं। दाह-संस्कार के विषय में कोई भी निर्णय लेने की अपेक्षा वे धर्मशास्त्रों में इसका कोई पका-पकाया हल चाहते हैं और वहां से असफल हो जाने पर भगवान मारुति की पूूजा करके कोई रास्ता पाना चाहते हैं। दूसरे, वे पाखण्डी भी दिखाई पड़ते हैं। चिर रुग्णा पत्नी की परिचर्या में अपने 'तपस्वी-जीवन' की सफलता देखने का स्वप्न बुनने वाले प्राणेशाचार्य निष्काम कर्म और निरासक्ति का जीवन-दर्शन समाज के समक्ष प्रस्तुत करता चाहते हैं, लेकिन पाते हैं कि उनके प्रवचन समाज में कामवासना और निरंकुश अनैतिकता का प्रसार अधिक कर रहे हैं। अपने को चीरती नजर से देखते हैं तो आत्म-संयम और इन्द्रिय निग्रह की दीक्षा देता प्राणेशाचार्य उन्हें रंगा सियार नजर आता है जो मन ही मन चंद्री के गदराए यौवन का उपभोग कर लेना चाहता है। चूंकि वे संवेदनशील और विवेेकशील हैं, इसलिए संकटापन्न स्थिति का मूल्यांकन करते-करतेे अकस्मात व्यक्ति के रूप में अपनी दुर्बलताओं और शास्त्र के रूप मे धर्म के अंतर्विरोधों से परिचित होते चलते हैं। भगवान मारुति द्वारा दाह संस्कार विषयक स्पष्ट निर्देश दिए जाने से उन पर ही नहीं अपितु समूचे अग्रहार, 'नारणप्पा की सड़ती देह' और आसपास की निर्दाेष बस्तियों पर संकट गहराने लगता है। एक के बाद एक ब्राह्मणों की मृत्यु होना, प्राणेशाचार्य की पत्नी का चल बसना और बेल्ली जैसे दलितों की बस्ती में मृत्यु का महातांडव इसी का प्रमाण है। उन्हें लगता है कि धर्म पर अंध आस्था व्यक्ति को निर्णय-दुर्बल करती है; कि निर्णय-दुर्बलता संकट को गहराने के बावजूद औसत व्यक्ति को इसलिए प्रिय है क्योेंकि इसमें उसे अपने सही या गलत निर्णय के परिणाम को भोगकर अपने या समाज के प्रति जवाबदेह नहीं होना पड़ता। साथ ही, जोखिम की भावना भी शून्य हो जाती है। लेकिन ऐसा व्यक्ति अपनी स्वतंत्रा अस्मिता खोकर मात्र कठपुतली बना रह जाता है जिसके लिए कर्म से अधिक महत्वपूर्ण भाग्य, और उत्साह से अधिक महत्वपूर्ण डाह हो जाता है। इन सबके परिणामस्वरूप निर्णय-दुर्बलता कातरता, द्वन्द्व, भय और असुरक्षा का भाव भी पैदा करती है।

प्राणेशाचार्य को लगता है कि नारणप्पा के व्यक्तित्व का एक ही पक्ष महत्वपूर्ण और वंदनीय है और वह है तुरन्त किसी निर्णय पर पहुंचकर कर्मकाण्ड और परम्परा को चुनौती देने का साहस, अर्थात् इस निर्णय के तमाम परिणामों की नैतिक जिम्मेदारी को वहन करना। इसके विपरीत उन्हें अपनी स्थिति अत्यन्त जड़ और उपेक्षणीय जान पड़ती है क्योंकि उन्हें लगता है बार-बार शास्त्रों की शरण में जाकर वे बैसाखियों का सहारा ले रहे हैैं, अकेले अपनी कन्विक्शंस के साथ अपने पैरों पर खड़े होने का साहस उनमें नहीं है। वे क्षुब्ध हैं कि उनका जीवन 'कंठस्थ किये हुए हिसाब के पहाड़ों के पुंज की तरह' हो गया है, जबकि मनुष्य का जीवन धूप के समान होना चाहिए जो स्वाभाविक रूप से सूरज से निकलती है; ''आकाश में प्रकाश, वृक्षों के नीचे छाया और धरती पर आकार'' बनाती है; और ''यदि सौभाग्य से पानी की बौछार हो जाए तो इन्द्रधनुष की मरीचिका भी।'' उन्हें लगता है जीवन ''मात्र एक बोध, मात्र एक विशुद्ध आश्चर्य'' होना चाहिए, ठीक नारणप्पा के जीवन दर्शन की तरह। लेकिन नारणप्पा के लौकिक संस्कार का मेलिगे के रथ-उत्सव में अंतरंग परिचय पाकर वे वितृष्णा से भर उठते हैं। बौखला देने वाली गति, अंधा बना देने वाली चकाचौंध, ठग ले जाने वाली मासूमियत, प्राणों को लील लेने वाले खेल इस दुनिया के अनिवार्य अंग हैैं। इस प्रकार वे नारणप्पा नहीं, ब्राह्मण हैं - धर्मशास्त्र में विहित कर्मकाण्ड, मूर्तिपूजा, पाखंड को धर्म स्वीकार कर धर्म के मर्म को मनुष्य की तरह समझने की और उस समझ के जरिए मनुष्य मात्र के कल्याण की इच्छा रखने वाले ब्राह्मण। लेखक के अनुसार यही ब्राह्मणत्व है, हिंदुत्व के तमाम आप्लावनकारी दबावों से मुक्त मनुश्य-धर्म का प्रतिष्ठापक।             उल्लेखनीय है कि इस धर्म की निःस्वार्थ व्याख्या और पालना में अहम् प्रमुख होता है, अंध श्रद्धा भाव, किसी पर निर्भरता और ही निजता का बोध बल्कि इन सबका अतिक्रमण कर जीवन की निरंतरता में मनुष्य, उसकी मनोवृत्तियों और उसकी सार्थकता को समझने का प्रयास है जो निरन्तर उर्ध्वगामी होता है। प्राणेशाचार्य चन्द्री के साथ स्वतन्त्र जीवन जीने की गहरी लालसा रखते हैं लेकिन मात्र लालसाओं से सृजित लोक उन्हें पाताल लोक लगता है, जहां ''इस प्रकार के क्रूर और निर्मम भावनाओं के संसार में सांस लेते-लेते उन जैसा ब्राह्मण तो एकदम निस्तेज हो जाएगा।''

प्राणेशाचार्य के आत्मविश्लेषण का यह क्षण उपन्यास को एक निर्णायक मोड़ देता है जो विद्रोह से ज्यादा विद्रोह के प्रारूप और परिणति पर बल देकर एक नए भविष्य के निर्माण की बात करता है। उन्हें प्रतीत होता है कि जब तक वे ब्राह्मणत्व को त्याग कर अलग नहीं हो जाते तब तक ''इन सब उलझनों से स्वतन्त्र नहीं हो पाऊंगा'' और यदि ब्राह्मणत्व को त्याग कर इस लौकिक जगत का अंग बनते हैं तो ''किसी कृमि-कीट की तरह जन्म भर जलूंगा।'' दरअसल उनकी ''सारी यातना, कुल पीड़ा का मूल इसी में है'' कि वे अपने विवेक और संवेदनशीलता से कोई निर्णय और दिशा नहीं ले पा रहे। ''मुझमें दूसरों की आंखांे में आंखें डालकर देखने की हिम्मत आनी चाहिए'' इस बोध के चलते ही उन्हें लगता है कि वे अपने संपूर्ण अतीत - जड़ता और संकीर्णता - से मुक्ति पाकर मनुष्यता का संधान करने वाली दृष्टि पा सकेंगे। निस्संदेह उपन्यासकार ने उन्हें किसी सार्थक परिणति की ओर नहीं पहुंचाया लेकिन नारणप्पा के दाह संस्कार के लिए दुर्वासापुर के लिए तुरन्त रवाना होना उन्हें अपनी जिम्मेदारियों को समझने और अपने ही बलबूते पर उनसे जूझने का अदम्य विश्वास जगाता है। वे ''मनुष्य के रूप मंे प्रेत बनकर संशय के बीच'' डोलते नहीं रहना चाहते। इसलिए निरन्तर आत्मालोचन करके अपने को निःसंग भाव से जांचे जा रहे हैं - ''क्या किसी नये जन्म से पूर्व की यह प्रसव पीड़ा है?''


नारणप्पा और प्राणेशाचार्य से भिन्न उपन्यासकार ने तीन अन्य पात्रों की भी साभिप्राय रचना की है। सर्वप्रथम मंजय्या जो अकुलीन ब्राह्मण होते हुए भी मानवीय दृष्टि से सम्पन्न है। जहां प्लेग जैसी विभीषिका को देखकर कुलीन ब्राह्मण किंककर्त्तव्यविमूढ़ हो गए हैं, वहीं मंजय्या एक मिशन के साथ इस यथार्थ स्थिति से टकराता है और नगरपालिका के डॉक्टरों तथा अन्य कर्मचारियों की सहायता से प्लेग की रोकथाम करने में जुट जाता है। दूसरे, चन्द्री जो प्रत्यक्ष्तया मृत नारणप्पा के शव के साथ कोई भावनात्मक संबंध नहीं रख रही लेकिन मनुष्यता के नाते समय से उसका विधिवत दाह संस्कार करवा देना चाहती है। इसके लिए पहले ब्राह्मणों को अपने स्वर्णााभूषण देने का प्रस्ताव करना और फिर उनकी संशयग्रस्तता देखकर स्वयं स्थिति से निपटने के लिए मुसलमानों को बुलाकर बिना मंत्रोच्चारण और धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न कराए नारणप्पा को अग्नि को समर्पित करना उसे नारणप्पा और अग्रहार के ब्राह्मणों की तुलना में कहीं अधिक 'मनुष्य' बनाते हैं। तीसरा पात्र है पुट्ट। सीधा सरल पुट्ट अपनी सीमाओं में आबद्ध बेहद सामान्य व्यक्ति है लेकिन दूसरों की सहायता करने के लिए बेहद उत्सुक। प्राणेशाचार्य इन तीनों पात्रों द्वारा प्रस्तुत जीवन-शैली को अस्वीकार नहीं करते लेकिन इनकी दृष्टिगत स्थूलता और सतहीपन से त्रस्त अवश्य है। इसलिए यह मार्ग भी उन्हें अपना प्रतीत नहीं होतौ लेकिन यहीं से दिशा लेकर वे इन तीन पात्रों की स्फूर्ति, गति, उत्साह, संकल्पदृढ़ता और निर्णय लेने की क्षमता को अपनी भीतर पैदा करके विवेक से जोड़ना चाहते हैं और फिर निरन्तर इन गुणों का उन्नयन करते रहना चाहते हैं। यही दृष्टि धर्म के रूढ़ रूप और लौकिकता के स्थूल रूप की अपूर्णता के प्रति बोध जगाती है; यहीं से किसी तीसरे विकल्प के संधान की आवश्यकता महसूस होती है और यहीं से मनुष्य धर्म की संभावनाओं की तलाश सम्भव है। वास्तव में यही नयी पीढ़ी, नये समाज और नये भविष्य का संस्कार है।