Sunday, March 1, 2015

क्या हिंदी प्रकाशन जगत में नए दौर की शुरुआत हो गई है?

कल की दोपहर बड़ी ख़ास थी. वसंत की दोपहरें आम तौर पर उदास करने वाली होती हैं. धूप की गर्मी, हवाओं की चोट, गिरते पत्तों का शोर. लेकिन इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर की वह दोपहर ख़ास थी. 28 फरवरी का दिन हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशन समूह राजकमल प्रकाशन समूह का स्थापना दिवस होता है. कल 66वां था. आम तौर पर यह समारोह रात के अँधेरे में होता था कल दिन में हुआ. लेकिन सबसे बदलावों भरा हुआ.

दिन के उजाले में राजकमल प्रकशन समूह ने जब नई नई घोषणाओं की झड़ी लगाई, नए इम्प्रिन्ट्स की बाबत जानकारी साझा की तो मैंने अपने बगल में बैठे मित्र से कहा- देखना अब समय आने वाला है कि हम भी नई कहानी के दौर के लेखकों की तरह अपने लेखन से आजीविका कमा सकेंगे. उसने कहा, तुम हिंदी को लेकर हमेशा उम्मीद से भरे रहते हो. मैंने कहा, हिंदी मेरे लिए उम्मीद का दूसरा नाम है. असल में, इस उम्मीद का कारण था. राजकमल के सम्पादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम ने जब लेखक और प्रकाशक के बीच पारदर्शिता की बात की, यह बताया कि हम ऐसी व्यवस्था की शुरुआत करने जा रहे हैं जिससे लेखकों को यह आसानी से पता चल सकेगा कि उसकी किताबों की बिक्री की क्या स्थिति है. एक हिंदी लेखक के लिए इससे अधिक आश्वस्ति की बात क्या हो सकती है. साफ़ लग रहा था कि राजकमल अपने 66वें साल में एक नए दौर में कदम रख चुका है.

नए बदलावों की शुरुआत इस बार पुरस्कारों में भी दिखाई दी. इससे पहले राजकमल कृति सम्मान के नाम पर अपने प्रमुख लेखकों को पुरस्कृत किया करती थी. इस बार कृति सम्मान नहीं दिया गया. इस बार राजकमल ने  सृजनात्मक गद्य सम्मान जिन दो कृतियों को दिया वे सच में सृजनात्मक गद्य के मील स्तम्भ की तरह हैं- मालचंद तिवाड़ी की किताब ‘बोरुन्दा डायरी’ और रवीश कुमार की ‘इश्क में शहर होना’. यह नए दौर की शुरुआत भर नहीं है उसका स्वीकार भी है.

राजकमल की एक नई टीम बन गई है- सम्पादकीय निदेशक, मैनेजिंग एडिटर, ब्रांड मैनेजर जैसे शब्द इससे पहले मैंने हिंदी प्रकाशन जगत में नहीं सुने थे. साथ में युवा निदेशक मंडल जिनकी जनतांत्रिकता कल के कार्यक्रम में साफ़ झलक रही थी. अपनी स्थापना के 66वें साल में ही सही राजकमल ने पेशेवर रुख अख्तियार करके यह बता दिया है कि प्रकाशन जगत में वह मार्किट लीडर रहा है और नए बदलावों को जगह देकर उसने अपने आपको फिर से मार्किट लीडर के रूप में स्थापित किया है.

मैं राजकमल का मूल रूप से लेखक नहीं हूँ. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक लेखक के रूप में इन बदलावों का स्वागत न करूँ. हिंदी के प्रकाशक पेशेवर हों, पारदर्शी हों राजकमल ने उसका रास्ता दिखा दिया है. यह बता दिया है कि बिना पेशेवर हुए, बिना लोकप्रिय को स्वीकार किये आगे का रास्ता मुश्किल है.

भालचंद नेमाडे, नामवर सिंह को देखना, सुनना तो जैसे बोनस था.


राजकमल का यह स्थापना दिवस हिंदी में अलग से रेखांकित किये जाने लायक है. किया जायेगा. 

Friday, February 27, 2015

अमेजन क्रांति के दौर में हिदी किताबें और पाठक

परसों बिहार के कटिहार से संजय जी का फोन आया था. फोन उठाते ही उन्होंने कहा कि वे करीब एक साल से जानकी पुल समय मिलने पर जरूर पढ़ते हैं. छौ ईंच स्क्रीन वाला मोबाइल फोन ले लिए हैं.

‘ई लप्रेक क्या है?’ उन्होंने छूटते ही पूछा. कहा कि आप जानकी पुल पर उसके बारे में कई बार लिख चुके हैं. मैंने बताया. तो बोले कैसा किताब है? मैंने कहा, 99 रुपये की किताब है. बोले अमेजन पर मिल जायेगा. मैंने कहा, हाँ.

फिर उन्होंने पूछा कि ई नरक मसीहा कैसा किताब है? आप उसके बारे में में भी लिखे थे. मैंने कहा कि एनजीओ कल्चर पर है. बोले, बड़ा चोर होता एनजीओ वाला सब. 10 रुपैया का भूजा खिलाकर 100 रुपये का बिल बनाता है. हम तो अक्सर देखते हैं.

बताया कि 2001 बैच के बीपीएससी के अफसर हैं. कटिहार में मनरेगा की योजनाओं के देखभाल की जिम्मेदारी है. बोले, मत पूछिए, इ अफसर, नेता सब मिलकर एनजीओ खोल लेता है, फिर सरकारी कोष को लूटने का तरीका निकालने में लगा रहता है सब. इहाँ मुफस्सिल में न लाइन रहता है कि टीवी देखें, न कोई उठने बैठने का जगह है. अब अमेजन से किताब मंगा लेते हैं. इ सुविधा यहाँ मिल गया है. दोसरा छौ ईंच का फोन है जिआओमि का. दू-दू दिन बैटरी चल जाता है. इसी पर अखबार पढ़ लेते हैं, आपका जानकी पुल भी. इसी से अमेजन पर किताब का ऑर्डर कर देते हैं.

यह हिंदी पाठकों की बदलती दुनिया है. अमेजन अब वहां भी किताबें पहुंचा रहा है जहाँ न सड़क पहुँच पाई है, न बिजली है, लेकिन राहत की बात है कि वहां उनको अपनी भाषा में घर बैठे किताबें मिल रही हैं. जानकी पुल का अनुभव बताता है कि आज भी हिंदी के पाठक कटिहार, सीतामढ़ी, दरभंगा, चुरू, बीकानेर, जालंधर जैसे शहरों में है. दुर्भाग्य, से आज हिंदी प्रकाशन के जितने प्रयोग हो रहे हैं वे उनको ध्यान में रखकर नहीं हो रहे हैं. ऐसा नहीं है कि बदलाव नहीं हो रहा है. बदलाव हो रहा है. हो ये रहा है कि हिंदी को अपमार्केट बनाया जा रहा है, दिल्ली, मुम्बई के बड़े बड़े संस्थानों में पढने वाले लोग हिंदी में लिख रहे हैं. वे अंग्रेजीदां समाज में हिंदी पाठकों की तलाश में जो लिख रहे हैं दुर्भाग्य से वह न तो साहित्य है न ही हिंदी के साधारण पाठकों की पसंद का है. एक तरफ इस बात का रोना रोया जा रहा है कि हिंदी में पाठक नहीं बढ़ रहे हैं जबकि दूसरी तरफ यह सच्चाई भी है कि हिंदी के आम पाठकों को ध्यान में रखकर किताबें न लिखी जा रही हैं न छापी.

आंकड़े यह बताते हैं कि हिंदी प्रदेशों में पाठक सबसे अधिक बढ़े हैं. वहां अखबारों की बिक्री बढी है. उनके पसंद के अखबार तो छप रहे हैं लेकिन उनके पसंद की किताबें नहीं. हिंदी में नए बनते पाठकों की असीम संख्या को ध्यान में रखकर आज भी बहुत कम छप रहा है. अकारण नहीं है कि अंग्रेजी के युवा पाठकों के पसंदीदा लेखक चेतन भगत, रविन्दर सिंह हिंदी के युवा पाठकों की भी पहली पसंद बन चुके हैं. मैंने रविन्दर सिंह के उपन्यासों के अनुवाद किये हैं. अभी हाल में ही मिलने पर उसने मुझे बताया कि वह अपने गृह राज्य उड़ीसा में जब अपने घर-परिवार या पुराने जानने वालों को अपनी किताब भेंट करता है तो अपने मूल अंग्रेजी उपन्यासों को नहीं बल्कि मेरे द्वारा अनुवाद किये गए हिंदी अनुवादों को भेंट करता है. कारन उसने यह बताया कि उनको अंग्रेजी अच्छी नहीं आती है. और अंग्रेजी के अलावा मेरे उपन्यास हिंदी में ही हैं. हिंदी, यू नो, सब समझ लेते हैं.

तो भाई साहब, एक अंग्रेजी का लेखक इस बात को समझ लेता है कि हिंदी सब समझ लेते हैं लेकिन आप प्रकाशक यह क्यों नहीं समझ पाते कि नए बनते पाठकों के लिए मूल भाषा में लिखी गई किताबें छापने की जरूरत है. ऐसी किताबें जिनमें उनका जीवन हो, सीधी सरल भाषा में थोड़ा बहुत जीवन दर्शन हो, जिसे संजय जी कटिहार में अमेजन से मंगाकर पढ़ सकें.


क्या धीरे धीरे घटित हो रही अमेजन क्रांति के इस दौर में प्रकाशक हिंदी के नए बनते पाठकों की भी सुध लेंगे? यह सवाल है जो मुझे पिछले कई दिनों से परेशान कर रहा है- बतौर लेखक भी, बतौर पाठक भी. 

Thursday, February 26, 2015

बनारस टॉकिज : पुरानी बोतल में नयी शराब

अंग्रेजी में पिछले साल कैम्पस नॉवेल ट्रेंड करता रहा. चेतन भगत का उपन्यास 'हाफ गर्लफ्रेंड', रविंदर सिंह का उपन्यास 'योर ड्रीम्स आर माइन नाऊ' दोनों कैम्पस उपन्यास थे. सत्य व्यास का उपन्यास हिंदी युग्म से प्रकाशित हुआ है 'बनारस टॉकीज' वह भी एक हल्का फुल्का कैम्पस उपन्यास है. इसकी मीडिया में चर्चा भी है लेकिन यह कोई ट्रेंडसेटर उपन्यास नहीं है. बहरहाल, इस उपन्यास पर एक सम्यक टिप्पणी की है युवा संपादक, लेखक वैभव मणि त्रिपाठी ने- मॉडरेटर.
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अंग्रेजी में चेतन भगत ने फाइव प्वाईन्ट समवन नाम से एक उपन्यास लिखा. यह उपन्यास बेस्ट सेलर था और इस उपन्यास को इस मामले में हम लोग मील का पत्थर मान सकते हैं कि रूपा, दृष्टि जैसे प्रकाशकों ने इसके बाद अंग्रेजी में इस उपन्यास की तर्ज़ पर तमाम ऐसे उपन्यास प्रकाशित किये जो दिल्ली और आसपास के कॉलेज कैम्पसों की कहानी, युवा मन के सपनों और सुनहरे भविष्य वाले सुखांतों की कहानियाँ खुद में समेटे रहते थे. धीरे धीरे कैम्पस कथा की ये धारा हिंदी उपन्यासों के संसार में भी दाखिल हुई. इस धारा के पाठक शुरूआती दौर में चर्चित अंग्रेजी बेस्ट सेलर्स के अनुवादों से रूबरू हुए.

इस कैम्पस कथा धारा का बनारस टाकीज़ प्रतिनिधि उपन्यास माना जा सकता है. इस उपन्यास में बनारस है, बी डी हॉस्टल है और पूरी मस्ती करते भावी वकील लोग हैं जो सामान्य जीवन में भी अक्सर दुरूह हो जाया करते हैं. चीज़ों को कॉम्प्लीकेटेड बनाने में महारथी, ऐसे वकीलों की सीधी सरल कहानी... इस सादगी पे कौन न मर जाए ए खुदा!! कहानी में कुछ अपने झोल झाल हैं, बनारस की आत्मा उपन्यास में उस रूप में  मौजूद नहीं है बनारस टाकीज़ नाम होने से जैसी हम अपेक्षा रखते, पर बनारस की आत्मा उस रूप में मौजूद है जैसी इस उपन्यास में होनी चाहिए थी. एक सीमा के बाद अगर उपन्यास बनारस पर फोकस करता तो परकाया प्रवेश जैसी अनुभूति आ सकती थी. बनारस एक सम्मोहन है, पत्थर - पत्थर, रोड़े – रोड़े में पूरा उपन्यास छुपा बैठा है और बनारस से जुडा  उपन्यास लिखने वाले लेखक की असली परीक्षा यही होती है की वो बनारस के सम्मोहन से किस हद तक खुद को दूर रख पाता है. लेखकीय कौशल की इस परीक्षा में सत्य व्यास को सफल माना जा सकता है कि बनारस के सम्मोहन को उन्होंने उपन्यास पर हावी नहीं होने दिया. बनारस सिर्फ प्रेरक तत्व के रूप में उपन्यास में मौजूद है. जो एक चीज़ इस उपन्यास में खटकती है वो है उपन्यास का अंत. यहाँ पर आकर उपन्यास थोडा लडखडाता है पर बनारस तो बनारस है उसने संभाल ही लिया.

उपन्यास कुल मिलाजुला कर बढ़िया लिखा गया है और रोचक है. कहानी में लय है, घटनाओ के हिसाब से देखें तो हॉस्टल का जीवन घटना प्रधान होता है कुछ और घटनाएं तथा कुछ रोचक प्रसंग बढ़ने से उपन्यास की पठनीयता बढ़ जाती. हाँ इससे अगर उपन्यास का आकार कुछ बढ़ता तो उपन्यास का फॉण्ट साइज़ घटा कर पन्नो की संख्या स्थिर रख लेना एक बढ़िया कदम हो सकता था क्योंकि जिस आयु वर्ग के पाठकों पर उपन्यास केन्द्रित है उस पाठक वर्ग के ज्यादातर सदस्यों की आँखें थोडा छोटा फॉण्ट भी आसानी से पढ़ सकती हैं. और थोडा कम मूल्य होने से बेहिचक उपन्यास खरीद लेती हैं.

सत्य व्यास को इस बात के लिए बधाई दी जा सकती है कि उन्होंने एक पठनीय उपन्यास लिखा है, एक ऐसी कम्पनी में काम करना जहाँ अंग्रेजीदां माहौल और अंग्रेजीदां लोग ही नज़र आते हों वहां रह कर हिंदी में लिखना और अच्छा लिखना मायने रखता है. अपनी कुछ-एक कमियों के बाद भी बनारस टाकीज़ पठनीय है और साहब मांग के नहीं खरीद के पढने लायक पैसावसूल उपन्यास है.